Tuesday, December 29, 2015

(६२) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ५

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
मेरा विचार है कि किसी भी बिगड़ी हुई सामाजिक आदत के ठीक होने की शुरुआत उस समाज के ऊपरी तबके, अर्थात् अभिजात वर्ग से होती है. इसका सबसे बड़ा कारण यह कि अभिजातवर्ग आम लोगों का नेतृत्व कर रहा होता है और शेष बहुसंख्य मात्र अनुयायी होते हैं. अभिजात वर्ग माने- ..नेता, अभिनेता, बड़े अधिकारी, धर्म अथवा सांप्रदायिक गुरु, प्रसिद्ध खिलाड़ी, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, समाजसेवी यानी एक शब्द में और व्यक्त कर सकते हैं इनको कि 'समाज की क्रीमी लेयर'. ..अब इन सबमें भी जितने ऊपर से प्रथमतः शुरुआत हो सके वह बेहतर! अधिकांशतः हर व्यक्ति अपने से ऊपर वाले को टकटकी लगाकर देखता है और उसका अनुकरण व अनुसरण करता है! दो टूक यह कि निश्चित रूप से बदलाव की बड़ी जिम्मेदारी ऊपर के उन लोगों की ही बनती है- जिनके पास सत्ता है, अधिकार हैं, संसाधन हैं, नाम है, रसूख है, मान है व अनुयायी हैं, ..और अखबार व मीडिया के सर्वेसर्वा (आका, मालिक, संपादक) भी इन लोगों में शामिल हैं ही. ..जब ये भी भ्रष्ट हो गए हों तो इनसे ऊपर की सत्ताओं को प्रभावशाली कदम उठाना होगा. .. और यदि वे भी भ्रष्ट रहती हैं एक लम्बे समय तक, तो आम जनता में से ही कोई नेता निकलेगा जो अगुवाई करेगा उस क्रांति की जिनसे स्थितियां बदली जा सकें! ..शायद किसी आपातकाल में कोई सेनाधिकारी ही कोई बड़ा कदम उठा ले. ..इतने विकल्पों के बाद भी यदि परिस्थितियां जस की तस रहती हैं तो फिर हमारा राष्ट्र और नीचे ही जाएगा शनैः-शनैः! ..और तब अमेरिका जैसा कोई उन्नत राष्ट्र भारत की मामले में भी उसी प्रकार हस्तक्षेप करेगा जैसे वह अभी कुछ देशों के हालात ठीक करने के लिए ले रहा है. इसे आप सही कहें या गलत, परन्तु सत्य तो यही है कि कहीं भी हो रहा कोई भी नुकसान बड़े अर्थों में सम्पूर्ण विश्व का ही नुकसान है, और उस नुकसान को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए.

(२)
उनके सितम बहुत हो चुके और हमारे उपदेश भी!
वो आज भी भ्रष्ट तो कमी शायद हमारे उपदेशों में!
कहीं वो उपदेश कोरे तो नहीं, मात्र शब्दों से खिलवाड़ तो नहीं?
कहीं यह सब यह सब पैसे की भूख या यश की प्यास तो नहीं?
पंडित हो या मौलवी, नेता हो या अभिनेता, या फिर पत्रकार,
बोलने में सब बहुत तेज पर भीतर से बेकार;
तभी तो कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है हाहाकार!

(३)
...बस शब्दों में खो न जाना, भावना में बह न जाना;
ध्येय न हो मात्र धन की भूख या यश की प्यास बुझाने का;
बस अपने लिए लिखना या फिर समाज के उत्थान के लिए,
साफ़ मन से, अंतर्मुख होकर, जैसे हो किसी मैडिटेशन में!

(४)
उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण (Liberalization, Privatization, Globalization) के ऊपर पूरा ठीकरा फोड़ना ठीक नहीं, …समस्या के मूल में तो हमारा अपना ही दोष है कि हम ही अपना होश न संभाल सके.
एक फौजी के हाथ में बन्दूक होना एक बात है तथा एक बच्चे को बन्दूक थमाना दूसरी बात, ..बहुत अंतर है दोनों में! ..एक के पास जोश है मगर होश के साथ, और दूसरे के पास मात्र जोश ही है! दो टूक बात तो यही है कि हमारे पथप्रदर्शकों ने हमें हथियार के साथ संलग्न आवश्यक परिपक्वता नहीं दी! ..और असली परिपक्वता का वास हमारी स्वस्थ मानसिकता व दृष्टिकोण में है; …बहुत त्रासद है कि आज यही स्वस्थता नदारद है.

(५)
विडम्बना ही है कि हम आज जीवन के हर क्षेत्र में ऊँचाइयों को छूना चाहते हैं परन्तु मानसिकता या सोच को ऊपर नहीं उठाते! भले ही हमारे पास विभिन्न सांसारिक वैभव व विद्यता प्रचुर मात्रा में हों, तिसपर भी हम बिलकुल खोखले हैं यदि हमारी मानसिकता क्षुद्र ही रह जाती है!

(६)
अवश्य, ..वह सुबह आएगी जब 'पुत्रीवती भव' का आशीर्वाद भी लोग देंगे. ...लोगों के मन में, सोच में, दिल में, बदलाव की हिलोरें उठती हैं जब बात उनके ऊपर आती है; परन्तु वह कड़वा समय जब निकल जाता है तो मानसिकता पुनः वहीं पर आ जाती है, जहां थी! क्योंकि प्रचलित धारा के विरुद्ध हम कुछ भी सोचने और करने से कतराते हैं! आखिर कब तक हम रूढ़ मानसिकता के अनुयायी बने रहेंगे और अपने भीतर की निश्छल ध्वनि को अनसुना करते रहेंगे??

(७)
हिन्दू एवं हिंदुत्व को समझे बिना उसके प्रति क्षुद्र दृष्टिकोण एवं अन्य विचारधाराओं के प्रति अत्यधिक लेकिन कृत्रिम सहिष्णुता, यह आज के तथाकथित नेताओं और बुद्धिजीवियों की वर्तमान क्षुद्र मानसिकता का द्योतक है. …वास्तव में वे किसी के सगे नहीं हैं, बस अवसरवादी हैं. ..या अपनी खोखली विद्यता का गुमान है उन्हें; ...तो कुएं के मेंढक ही हुए वे!
इस समय हर किसी को दलगत तथा व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठने-उठाने की आवश्यकता है, यह तभी संभव होगा जब हम अपनी मानसिकता या सोच को सही मायनों में ऊपर उठायेंगे, और तब ही हम वास्तविक विकास की ओर बढ़ पायेंगे, अन्यथा और नीचे ही जायेंगे.

Thursday, December 24, 2015

(६१) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ४

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
आपका लेख आदिकाल से आजतक की समयावधि के दौरान सेक्स के प्रति पशुओं से भी निम्नतर भारतीय मानसिकता को दिखाने में सर्वथा सफल रहा है. स्त्री और पुरुष, कमोवेश दोनों को ही आपने बराबर से दोषी माना है, शायद स्त्रियों को कुछ अधिक ही! ...परन्तु लोकलाज के भय से आपने समानांतर रूप से स्त्रियों को अधिक भुक्तभोगी दिखाया है, सहानुभूति भी प्रकट की है उनके प्रति! ...जाने-अनजाने यह, लोकलाज के चलते ही सही, ..परन्तु सही बात कह गए आप, यद्यपि मंशा उनको बख्शने की बिलकुल भी न थी आपकी! यही एक आम पुरुष सोच है आज!
मेरा व्यक्तिगत मत है यह, शायद गलत भी लग सकता है आपको, कि स्त्रियों में नैतिकता का स्तर पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक अच्छा था और आज भी है. ...वो अलग बात है कि आज की स्त्री, पुरुष के साथ होड़ कर रही है, ..रेस जारी है जोरों से, ...पर उसे यह भान नहीं कि कुदरत ने तो उसे अधिक अच्छा व सक्षम बनाया है, उसका स्तर अपेक्षाकृत बेहतर है पुरुष से; ..फिर होड़ करके, पुरुष की बराबरी करने के क्रम में तो उसका स्तर गिरेगा ही!! ...और यही हो रहा है आज, ..और पुरुष-प्रधान भारतीय दुनिया हंस रही है, मजाक बना रही है, व्यंग लिख रही है- उस नारी के पराभव पर, जो उससे (पुरुष से) आगे थी कभी, पर आज नीचे जा रही है. मेरी हृदय से अपील है भारतीय स्त्रियों से कि--
"कुदरती रूप से आप बेहतर बनाई गई हैं, सोच में भी और शरीर से भी; मानसिकता भी बेहतर और शारीरिक सक्षमता भी विलक्षण; यही बुनियादी अंतर है आपमें और पुरुष में; इस पर गर्व करें और इसे ऊंचा समझें, क्योंकि वास्तव में यह इस लायक है; इसी कारण आप अधिक सम्मान के योग्य हैं और ऐसा सदा से होता भी आया है; आपके ऊंचे स्तर ने ही भारत के कई हिस्सों में सामाजिक संतुलन बनाकर रखा हुआ है, उदाहरणार्थ- बिहार (जहां पुरुषवर्ग में नैतिकता का टोटा है); व्यर्थ की अंधी दौड़ और होड़ में अपने को नीचे न ले जायें; कुदरत ने आपको जो विलक्षणता दी है, उसे पहचाने, उसका सदुपयोग करें, ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हों और स्वयं की मौलिकता, मौलिक गुणों पर बेहिचक बिंदास गर्व करें. स्त्री और पुरुष की अलग-अलग फंडामेंटल प्रॉपर्टीज़ हैं, बहुत सारी कॉमन हैं पर बहुत सी बिलकुल अलग भी, ..उन्हें परखें, जानें, आजमाएं ..और तब फर्क महसूस करें, ...आपको अपनी मौलिकता से एक दैवीय सुगंध महसूस होगी और अनावश्यक कृत्रिमता से आसुरी दुर्गन्ध. निश्चित रूप से यह बहुत अन्दर की बात है जिसको अनुभव नहीं वरन अनुभूत करना पड़ेगा."

(२)
खाद्य सुरक्षा बिल से जुड़े विवाद और उसकी पैरोकारी करने वाले लोगों में चल रही बहस को समझने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं, जैसे:
1. क्या वाकई केन्द्र सरकार को गरीब की रोटी की नहीं बल्कि अपने वोटबैंक की परवाह है?
2. भूख से मरने वाले लोगों की तादाद में दिनोंदिन वृद्धि होने के बावजूद क्या इस अधिनियम का विरोध करना जायज है?
3. क्या भारत जैसे देश, जहां कदम-कदम पर वर्गीकृत समाज दिखता है, में इस व्यवस्था को लागू करवाना आसान है?
4. क्या इस अधिनियम को महज एक चुनावी स्टंट मानकर इसे अनदेखा किया जाना उचित है?

* आपके पहले बिंदु का उत्तर है- हाँ. ..इसमें कोई शक नहीं कि सरकार को गरीब व भूखी जनता की कुछ परवाह अवश्य होगी परन्तु इस परवाह का कारण जनता की फटेहाल स्थिति से उपजी संवेदनाएं तो कतई नहीं! एक कारण है कि- उन्नत देशों, राष्ट्रसंघ, विश्वबैंक, डब्लू.एच.ओ., विभिन्न वैश्विक सहायता संगठनों, आदि का ध्यान आकृष्ट करना और दिखाना कि- हम भी प्रगतिशील हैं और कुछ कर रहे हैं, आप लोग भी इसे सराहिये और कुछ मदद हो सकती है तो वह भी करिए. …दूसरा कारण जो अधिक बड़ा है वह यह कि- देश के लोगों को दिखाना कि हम वास्तव में फिक्रमंद हैं और राजकोष की गरीबी के बावजूद एक बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं, इसे सराहिये और आगे इस अध्यादेश पर सम्पूर्ण अमल सुनिश्चित करने हेतु कृपया हमें वोट दीजिये!
* आपके दूसरे बिंदु का संक्षिप्त उत्तर है कि हमें इस अध्यादेश का बिलकुल भी विरोध नहीं करना होगा. लाख अदूरदर्शिता के बावजूद इसमें भविष्य के लिए काफी कुछ सकारात्मक छिपा है, यदि भविष्य की सरकारें ईमानदारी से और दृढ़प्रतिज्ञ होकर इस योजना को कुछ सामयिक / व्यावहारिक फेरबदल के साथ अमली जामा पहनाती हैं.
* तीसरे बिंदु पर काफी कुछ कहा जा सकता है परन्तु उसका निचोड़ यह कि- वर्गीकृत समाज तो एक समस्या है ही, परन्तु उससे भी बड़ी समस्या यह है कि हम भारतवासी मानसिक व आध्यात्मिक रूप से बहुत पिछड़े हैं, लगभग अविकसित हैं, बल्कि दिन-प्रतिदिन इसका ग्राफ और नीचे जा रहा है. ऊपर से नीचे तक के लोगों की बुनियादी सोच संग्रह और लालच की है- नेता, अभिनेता, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, धार्मिक गुरु, अध्यापक-वर्ग, उद्योगपति, मीडिया, लगभग सम्पूर्ण अभिजातवर्ग इसकी चपेट में है, भविष्य के प्रति सभी में अजीब सी असुरक्षा की भावना व्याप्त है, जो विभिन्न भौतिक लोभों को 'अनंत' विस्तार देती है! नीचे के तबकों में भी इसका संक्रमण बखूबी फ़ैल चुका है. यानी मदद का नियोजन करने वाले, उसे प्रदत्त कराने वाले एवं मदद के हक़दार, सभी व्यक्ति इन विषाणुओं से प्रभावित हैं. इसके चलते मुझे नहीं लगता कि योजना को मूर्तरूप देना इतना आसान होगा! विपणन और वितरण अत्यधिक भ्रष्टाचार व भारी अव्यवस्था, ..यहाँ तक कि लूटपाट और कत्लेआम का भी भय रहेगा. निश्चित ही यह अतिश्योक्ति नहीं है, व्यर्थ का भय नहीं है, ..वरन यह विश्लेषण हमारी आज की मानसिक व आध्यात्मिक स्थिति के आधार पर किया गया है.
* चौथा बिंदु- हमें इस अधिनियम को अनदेखा नहीं करना है वरन इसे मात्र भविष्य की एक अच्छी योजना की बुनियाद के रूप में देखना है. हमें कहीं न कहीं यह सोच कर संतुष्ट होना होगा कि- किसी भी कारण से ही सही, पर कुछ चिंतन तो हुआ!
हाँ, इतना हम अवश्य जान लें कि दिल्ली अभी बहुत दूर है, क्योंकि ऊपर से लेकर नीचे तक हम तरह-तरह की बेड़ियों में जकड़े हैं, इनसे मुक्ति पाकर ही हम आगे को चल पायेंगे.

(३)
"ऐसी तो कोई रात नहीं जिसकी सुबह न आये इस काली रात की भी सुबह होगी और नयी सुबह आशा की नयी किरण लेकर आएगी |"
"हम सब स्वार्थ से ऊपर उठकर अपना कर्म करें तो युग स्वतः बदल जायेगा और सच की राह पर चलें तो सतयुग जरुर आयेगा |"
"शुरुआत अपने घर से करें, स्वयं अपने कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों का पालन ईमानदारी से करें."
"हमारा परिवार सुसंस्कृत होगा तो समाज सुसंस्कृत होगा और जब समाज सुसंस्कृत होगा तो भारत माँ का स्वरुप बदलेगा, उसका चेहरा गर्व से दमकेगा |"
..बहुत सुंदर पंक्तियाँ और लेख के अंत में बहुत सुंदर सार, ...बदलाव की आशा के सुखद झोंके समान.
गलत चीजों और गलत मानसिकता का अवश्य विरोध करें, परन्तु आशा का दामन और बदलाव हेतु अंतहीन विनम्र प्रयास कभी न छोडें.
बुराई से घृणा करें परन्तु बुरे से नहीं, प्रत्येक व्यक्ति कभी भी बदल सकता है, यदि हम 'अपनेपन' से उसे बदलने की ठान लें तो!
प्रत्येक क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया अवश्य आती है, देर-सवेर हो सकती है पर हमारे सीमित किन्तु निरंतर नेकनीयत प्रयास एक दिन अवश्य फलीभूत होंगे, ऐसा विश्वास मन में सदैव बना रहना चाहिए.
सर्वोत्तम तो यह होगा कि हम जो लिखें, उसे अपने जीवन में लागू भी कर रहे हों, तभी वह प्रभावकारी होगा, अन्यथा कुछ लिखना मात्र लिखने और अहम् की तुष्टि के लिए ही होगा.

(४)
सडकें, चौराहे, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बाबा के दरबार, बसें, ट्रेनें, कैंडल मार्च, रैलियां, तीर्थ, सभाएं, सिनेमा, शमशान; इन सबमें सन्नाटा होता, या फिर इनका आज कोई अस्तित्व ही न होता यदि इन्हें उस भीड़ का सहारा न होता जिसका जिक्र आपने अपनी रचना में किया! ..फिर भी लाभार्थियों द्वारा उस भीड़ की इतनी अवहेलना!? ..और उस भीड़ का भी अपने सामर्थ्य और महत्त्व को न समझ पाना?! ..इसे भीड़ की अचेतावस्था ही कहेंगे शायद!
जिसके वजूद के कारण मुमकिन है इन सब का वजूद;
त्रासद है कि वही भीड़ ढूंढ़ रही आज अपना खुद का वजूद!

(५)
एक लम्बे समय तक इंजन को स्टार्ट रखने और जोर-जोर से एक्सीलेटर लेने से कुछ नहीं होगा, हमें गाड़ी को गियर में डालकर आगे बढ़ाना होगा, और जल्दी ही टॉप गियर तक पहुंचना होगा! ..शोर नहीं, ..दूरी नहीं, …बल्कि विस्थापन महत्वपूर्ण है!

Sunday, December 13, 2015

(६०) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ३

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
दरअसल मनुष्य अपेक्षाकृत एक विकसित मस्तिष्क वाला जीव है, इसलिए वह हर चीज में हिसाब-किताब कुछ ज्यादा ही लगाता है. उसमें एक तरफ संतान अथवा अभिभावक के प्रति राग, अनुराग, ममता, व आसक्ति है तो दूसरी तरफ सांसारिक वस्तुओं का बेहिसाब लोभ, स्वार्थ, अहंकार व असुरक्षा की भावना भी है और इन सब से कपट और पारस्परिक असंख्य अपेक्षाओं का जन्म होता है. यही सब पारिवारिक कलह की जड़ है.
जबकि पशु मनुष्य की तुलना में सरल स्वभाव के होते हैं, ज्यादा गुणा-भाग नहीं करते. इसलिए वे संतान के प्रति तब तक आसक्त रहते हैं जबतक कि वह पर्याप्त रूप से विकसित न हो जाए, उनके द्वारा संतान का पोषण सहज, स्वतःस्फूर्त, स्वतःप्रवर्तित, स्वतःप्रसूत अर्थात् नैसर्गिक रूप से कर्तव्य-स्वरूप होता है; और उसके बाद वे अनासक्ति की ओर बढ़ चलते हैं, एहसान जताने का कोई विचार मन में नहीं आता, संतान से अपेक्षाएं न्यूनतम रखते हैं.
सहजता और सरलता का अन्य कोई विकल्प नहीं. कुछ निरीह पशुओं से मनुष्य यह गुण सीख सकता है.

(२)
बिलकुल ठीक कहा आपने कि सामान्यतः "अपराध एक व्याधिकृत पथ-भ्रष्टता है." ...और अधिकतर मामलों में इस व्याधिकृत पथ-भ्रष्टता का इलाज़ पुनः संस्कृतिकरण अर्थात् सोच को सही दिशा देकर किया जा सकता है. आज के दौर में कुशल मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक इस कार्य को बखूबी अंजाम दे सकते हैं, ...'बहुसंख्य' रोगी ठीक हो सकते हैं, परन्तु ये दोनों ऐसा भी मानते हैं कि अपवाद स्वरूप कुछ रोगी ऐसे भी होते हैं जो किसी प्रकार से ठीक नहीं हो सकते और समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं, जैसे खूंखार आतंकवादी. उन्हें शरीर के सड़े अंग की तरह काट कर अलग करना ही पड़ता है; कुछ की मनोवृत्ति ऐसी होती है कि वे लाख समझाने पर भी बारम्बार अपराध करते हैं, कारावास की कड़ी सजा ही उन्हें कुछ सबक सिखा सकती है! इसलिए रोगी या अपराधी की मानसिकता को सुधारने के प्रयास होने चाहियें, उन प्रयासों के पश्चात् अब उसकी वर्तमान मानसिकता के अनुसार ही उसका दंड तय होना चाहिए.
शब्दों में यह बात बहुत सरल और न्यायपूर्ण लगती है परन्तु आज के परिपेक्ष्य में व्यावहारिक भी नहीं है और संभव भी नहीं, क्योंकि आज वास्तव में विद्वान, नेक और सुलझे हुए सुधारकर्ताओं का भारत में सर्वथा अभाव है और दूसरी बात यह कि देश के सबसे शीर्ष स्थानों पर भी घनघोर अपराधिक मानसिकता का प्रभुत्व है!

(३)
विज्ञापन में "टेढ़ा है पर मेरा है" - यह पंक्ति क्या सन्देश देती है, वह यह कि "ऊपरी आकार या रंग-रूप पर न जाओ दोस्तों! चखकर, खाकर भीतर से महसूस करो कि कैसा लगता है, स्वादिष्ट और पौष्टिक लगा न! जब ऐसा है तो यह टेढ़ा होते हुए भी मुझे प्रिय है."
हमारा भी बाहरी ढांचा, रूप-रंग-आकार, केशविन्यास, वस्त्र इत्यादि भले ही कुरूप हों, ..सब चलेगा, ..परन्तु तब ही, जब हम भीतर से अच्छे हों अर्थात् मन में सुविचार हों, हम कर्मठ हों, ईमानदार हों, सत्यनिष्ठ हों, बोलने में कम और करने में अधिक विश्वास करते हों.
ऐसे ऊपरी रूप से टेढ़े, पर भीतर से सुन्दर देशवासियों पर किसे न गर्व होगा. ...परन्तु अभी ऐसा है क्या??
वर्तमानकाल में हम ऊपर से तो सीधे, परन्तु भीतर से अत्यंत टेढ़े हैं. तो प्रथमतः क्या लेखों और चर्चा के रूप में ऐसा आईना देखना आवश्यक नहीं, जो हमें हमारा भीतरी स्वरूप दिखा सके?
परन्तु साथ ही ब्लॉगर्स सहित समस्त पाठकों को ध्यान रहे कि बारम्बार दर्पण देखने भर से दाग नहीं जायेंगे, ठोस व्यावहारिक प्रयत्न करके उन्हें निरंतरता से साफ़ भी करना पड़ेगा.

(४)
"अगर रातों को जाग कर बच्चे के स्वास्थ्य की चिंता करती है, या उसकी पढाई लिखाई और देख भाल के लिए अपनी किसी महत्वाकांक्षा का बलिदान करती है तो ये उसकी अपनी ख़ुशी, अपना चयन है….बच्चे को दुनिया में लाने से पहले ही माँ को ये पता होता है कि आने वाले दिन उससे ये सब बलिदान माँगेंगे.., ..माँ को उन से अपनी सेवाओ के बदले में कोई हिस्सा नहीं लेना होता है..."
आप द्वारा उपरोक्तलिखित पंक्तियाँ किसी भी माँ को परिपक्व सोच हेतु प्रेरित कर सकतीं हैं, ..पिता को भी..
और एक परिपक्व माँ-पिता की संतानें भी परिपक्व बनेंगी ही.
और तब देश का स्वरूप कुछ सुधेरगा अवश्य.
इस सुखद आशा और विश्वास के साथ आपका आभार.

(५)
जो मुझे आज पसंद नहीं,
जो मेरे दिल को गवारा नहीं...

जरूर उसे कोसूं,
जी भर के गुबार निकालूं...

समाज में दहकन है,
दिलों में प्रतिशोध...

पर क्या यह उचित है,
कि मैं भी चलूं उसी ओर?

..रूकती हूँ सोचती हूँ,
फिर इरादा बनाती हूँ...

कि कोशिश करके डालूंगी,
बीज दिलों में प्यार का...

प्यार का सद्भाव का,
नैतिकता के उत्थान का...

वो ठीक करूंगी मनोवृत्तियां,
जो इस कविता का आधार हैं.

विनम्र प्रार्थना- पद्यात्मक शैली में कमेंट देने का मेरा यह प्रथम दुस्साहस है, अतः शब्दविन्यास अथवा शैली में शास्त्रीयता को मत खोजें.

Friday, December 11, 2015

(५९) सचेतक टिप्पणी संग्रह- २

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
एक आम व्यक्ति के समस्त कृत्य, जिनमें खानपान भी शामिल है, बहुधा संस्कारों, सभ्यता, संस्कृति आदि के ऊपर निर्भर करते हैं. कहीं एक संस्कृति में जो शुभ है, वह किसी अन्य संस्कृति में अशुभ हो सकता है! माने उसका स्वरूप अनेकों विभिन्नताएं लिए हो सकता है और फिर उसमें विरोधाभास भी हो सकते हैं; परन्तु बुनियादी नैतिक मूल्यों का पैमाना, स्वीकार्यता व पहचान आदि सभी जगह कमोवेश एक से ही हैं. माने खानपान जैसे वाह्य कृत्यों में विभिन्नताएं एवं विरोधाभास होते हुए भी नैतिकता के मामले में सबके सुर व स्वर एक समान हैं, इसमें आपको कोई भी संदेह नहीं होना चाहिए! वैसे तर्कों का तो कोई अंत नहीं!!
यानी नैतिक गुणों को प्रधानता देना प्रथम होना चाहिए. लेकिन भारत के वर्तमान धार्मिक (?) माहौल में ऐसा बिलकुल भी नहीं है! इसी आधार पर मैंने कहा कि आजकल किसी व्यक्ति में नैतिकता का पैमाना उसके खानपान से लगाया जाता है. यह पैमाना सर्वथा गलत है! ...दूसरे शब्दों में नैतिकता की उपस्थिति ही वहां मानवीय धर्म के उपस्थित होने का संकेत है. ..और 'धर्म' को मैं 'मानवीय धर्म' से अलग नहीं समझता. ...आप धर्म का मतलब यदि कुछ अन्य समझते हैं तो यह आपकी अपनी सोच है.
पहले हमें मानव होने के नाते मानव से प्रेम करना तो आये! जब प्रथमतः हम मानव से प्रेम करना सीख जायेंगे तो फिर अगले पायदान पर पशुओं से प्रेम करना भी सीख जायेंगे.
परन्तु पहले पायदान पर हम पशु-प्रेम दिखाएं और मानव-प्रेम से हमारा कोई सरोकार ही न हो, यह तो पागलपन है.
बहुत सी ऐसी सभ्यताएं हैं जो सामिष होने के बावजूद मानव हितार्थ कुछ भी करने को तत्पर रहती हैं और दूसरी तरफ अनेकों निरामिष (बाबा, नेता व आम आदमी भी) एक नंबर के व्याभिचारी व भ्रष्ट होते हैं. इसका उल्टा भी पाया जाता है यानी सामिष अनैतिक व निरामिष नैतिक!
यानी खानपान से हम व्यक्ति के भीतर विद्यमान नैतिकता रूपी धर्म का सटीक अंदाजा नहीं लगा सकते! तो फिर हम खानपान को नैतिक-धर्म का पैमाना क्यों बनाएं?
खानपान भले ही अलग हो, सामिष ही हो, पर दिल के भीतर मानव के प्रति सच्चा प्रेम हो, तो उस व्यक्ति को मैं पहले प्रणाम करूँगा. ..और आप?

(२)
"कोमल भावनाएं बनाये रखने के लिए अभ्यास भी उतना ही जरूरी" -- यह अभ्यास प्रथमतः हम अपनी जाति (मनुष्य) से ही प्रारंभ करेंगे, और ऐसा करना ही ज़रूरी!
"किन्तु प्रत्येक जीवन का आदर करना अवश्य नैतिकता में शुमार है" -- प्रत्येक जीवन का आदर करने से पहले हम प्रत्येक मनुष्य का और उसके विश्वास (वाह्य कृत्य सम्बन्धी) का आदर करना तो पहले सीख लें! वाह्य भिन्नताओं को स्वीकार कर उससे व उसकी नैतिकता (आतंरिक समानताओं) से प्रेम करना जानें!
"लगभग सभी संस्कृतियों में मांसाहार भिन्न भिन्न प्रकार के अपराधबोध, हीनता बोध से ग्रसित है" -- ऐसा इसलिए क्योंकि व्यक्ति को रूढ़िवादी (संस्कारजन्य) विश्वासों पर तो विश्वास है परन्तु अपने हृदय से उपजे (आन्तरिक) विश्वास पर नहीं! यदि दोनों विश्वासों में एका होता है तो फिर अंतर्द्वंद नहीं होता और कृत्य करते समय व्यक्ति का सिर गर्व से उठा रहता है, अन्यथा अपराधबोध रहता ही है. इस बारे में मैंने बाइबिल से कुछ उदाहरण दिए हैं (वैसे मैं ईसाई नहीं हूँ फिर भी जहां से भी किसी जिज्ञासा का समाधान मिलता है, लेता अवश्य हूँ).
रही बात सामिष के साथ असहजता की, तो ऐसा दूसरे के वाह्य विश्वास से पूर्वाग्रह या असहमति के कारण होता है; वैसे निरामिष के साथ सामिष भी असहज होता ही है, यदि वह (सामिष) विशाल हृदय नहीं है तो! कारण वही है! बात वहीं पर आकर अटक जाती है कि हम दूसरे की अंदरूनी पवित्रता को अनदेखा कर वाह्य-कृत्यों से उसका अपने साथ मिलान करते हैं और जब वह नहीं होता तो दूसरे को निकृष्ट ठहराते हैं.
एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब हम दूसरे व्यक्ति की आन्तरिक पवित्रता को महसूस कर उसे व उसके वाह्य विश्वास को आदर देते हैं (उसके वाह्य विश्वास अपनाने की बात नहीं कह रहा हूँ), तो हमें दूसरी तरफ से भी सकारात्मक प्रत्युत्तर मिलता है, भले ही उसकी गति मंथर ही क्यों न हो! ..और जब हम दोनों की आन्तरिकता में मिलाप हो जाता है तो हर वह वाह्य कृत्य छूटना आरंभ हो जाता है जो मानवीयता के विरुद्ध है!
उदाहरण के लिए -- दूसरे की, और मानवीयता की पुकार सुन, या आन्तरिक चेतना के कारण सामिष व्यक्ति, निरामिष के साथ खाने पर बैठते हुए बहुधा सामिष को त्याग निरामिष भोजन ग्रहण करता है, जबकि विरले ही इसका विपरीत होता है.
अतः दृष्टिकोण में लचीलापन लाना आवश्यक!

Wednesday, December 9, 2015

(५८) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
'व्यक्ति को समाप्त किया जा सकता है पर विचारों को नहीं ....धर्म के ठेकेदार कभी भी नहीं चाहेंगे उनके पाखंड के जाल को कोई काट कर लोगों को उनके जाल से मुक्त करे ....दयानंद सरस्वती, आचार्य चार्वाक, आर्यभट्ट आदि न जाने कितने ही ऐसे पाखंड के खिलाफ लड़ने वालों की हत्या कर दी इन धर्म के ठेकेदारों ने, पर इनके विचारों को कभी भी मार नहीं सके.'
'धन्यवाद. बिल्कुल सही कहा आपने. लेकिन जो हमारा कर्तव्य है, वह तो हमें करना ही होगा. किसान भी तो कोशिश करके अपने खेत में उग रही फालतू खरपतवार की रोकथाम करता ही है.'

(२)
समाज में कोई व्यक्ति जब कोई कुकृत्य करता है तो तुरंत उपचार के तौर पर उस व्यक्ति को सजा तो दी ही जाती है, परन्तु जागरूक लोग इसके समानांतर यह भी देखते हैं कि अमुक कुकृत्य का विचार पनपा कहाँ से? हमारी कोशिश रहेगी कि उस वैचारिक प्रदूषण का शिकार हमारी अन्य संताने न हों. कुछ संतानों को समझाया जाएगा और कुछ कार्य प्रदूषण फ़ैलाने वाले के विरुद्ध भी होगा.
दूसरी बात कि संस्था व अनुयायी, गुरु व शिष्य; आध्यात्मिक क्षेत्र में इन दोनों के बीच का नाता बहुधा पिता-पुत्र के रिश्ते से बढ़कर होता है. अनुयायी, शिष्य व पुत्र, इन तीनों के द्वारा किये गए अपराध के पीछे उनके अभिभावकों की भी कोई बड़ी पैरेंटिंग मिस्टेक अवश्य रहती है, वैसे अहंवश हम इसको मानते नहीं!
यदि किसी कूड़े के ढेर की वजह से इलाके में बीमारियाँ फ़ैल रही हैं तो कहने को तो बैक्टीरिया उत्तरदायी, हमारा कूड़े के ढेर के पास जाना उत्तरदायी, प्रत्यक्ष कूड़ा ही उत्तरदायी! परन्तु जड़ तो वह जिसने कूड़े का ढेर लगाया, उसी के कारण बैक्टीरिया जन्मे, पनपे और फिर जाने-अनजाने बीमारियाँ फैलीं! यदि हम उसी इलाके के निवासी हैं और कूड़े का ढेर हमारे रास्ते में ही है, तो भला कब तक हम स्वयं को उस कूड़े के समीप से होकर जाने से रोक सकते हैं?
तो कूड़ा फ़ैलाने वाला दोषी! अब उसी प्रकार कूड़े को साफ़ करने की जिम्मेदारी भी किसी न किसी की होती है- नगरपालिका, सफाई-दल आदि. ..यदि ये सब भी अपना काम ईमानदारी से नहीं करते तो दोषी कहलाते हैं. ..और मान लो कि ये ढीठ हो गए तो इलाके के जागरूक लोगों को स्वयं ही सफाई करनी पड़ती है या एप्लीकेशन वगैरह लगानी पड़ती है.
समाज में प्रत्येक का कुछ न कुछ रोल है, यदि वह उसे नहीं निभाता है या गलत ढंग से करता है तो निश्चित रूप से वह दोषी!
और हाँ, 'सनातन' शब्द की आलोचना करने वाला मैं कौन हो सकता हूँ, सनातन तो वह है जो सदा से अस्तित्व में है, वास्तव में खरा है. बात उसके नाम में नहीं बल्कि गुणों में है! अब राम नाम का हर व्यक्ति भगवान् राम जैसे गुणों को प्रकट कर रहा हो यह ज़रूरी तो नहीं!

(३)
मात्र निंदा से आगे इस प्रकार से होने वाली घटनाएं नहीं रुकेंगी, बल्कि इस प्रकार से होने वाली घटनाओं के पीछे के मूल कारणों को नष्ट करना पड़ेगा. ..और मूल कारण है- भावुक जनमानस को 'अन्धविश्वासी कृत्यों' एवं 'अन्य मतावलंबियों के प्रति विरोध-भावना', इन दोनों के लिए उकसाना.

(४)
निश्चित ही हमें स्वयं सचेत होने तथा अपने समाज / संघ को भी सचेत अवस्था में रखने की आवश्यकता है. यह प्रयास करते हुये ही हम सही अर्थों में विकास की सीढियाँ चढ पायेंगे.

(५)
एक प्रश्न दोस्तों.
बहुत भीड़ लगी थी. हर कोई वहां पास जाकर देख रहा था कि क्या हो रहा है? पता चला, भगवान् दूध पी रहे हैं, और उन्हें दूध पिलाने के लिए ही लाइनें लगी हैं. मुआयना करने वालों में अधिसंख्य ने सोचा कि "धन्य हो गए हम.., फालतू में कोई यहाँ लाइन थोड़े ही लगाएगा, आज हमें भी ज़रूर भगवान् की लीला के साक्षात् दर्शन हो जायेंगे!" ...और वे भी उस लाइन में खड़े हो गए और मस्त हो जयजयकार करने लगे.
किसी ने कुछ अलग ढंग से सोचा (हालाँकि वह भी वहां यही देखने गया था कि भीड़ क्यों लगी है), कि ये सब मूर्ख हैं और मात्र भेड़चाल में फंसे हैं! ..वह असमंजस में पड़ गया कि सबको सत्य बताऊँ या चुपचाप यहाँ से चल दूं? सत्य बताने पर भारी जन-विरोध का सामना करने का भय था और चुपचाप चले जाने पर स्वयं की फटकार खाने का भय!
आप सुझाएं कि उसे क्या करना चाहिए?
'जहां भीड़ वहां रत्न', क्या यह सोच सही है? कुछ अर्थहीन और कुछ जबरन विवादास्पद बनाये गए लेखों पर भारी भीड़ देख मैं भी कौतूहलवश वहां पहुँच जाता हूँ पर वहां का हाल देख अचंभित रह जाता हूँ कि बड़े-बड़े महारथी भी उस भीड़ का हिस्सा बनने और वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को आतुर हैं. यह भेड़चाल नहीं तो और क्या है? क्या इसे टाइम-पास कहना उचित होगा?
भई, कुछ तो है जो गलत है! अब आप ही सुझाएं.

(६)
व्यर्थ के झमेलों में पड़े बगैर मैंने बेबाकी से एक आईना दिखाना चाहा, अब चुनाव आपका कि स्वयं में कुछ असामान्यता दिखने पर उसे ठीक करें या दागों को झुठलाने हेतु तर्क-वितर्क करें! अकसर हम अपने अहंकार के कारण परिष्कृत होने की कोशिश नहीं करते और इस बारे में कुछ बात होने पर अपने से निम्न लोगों की ओर इंगित करके कहते हैं कि "हम उनसे तो अच्छे" या "वे हमसे भी बुरे"!
मेरे विचार से यदि हमें वास्तव में ऊपर बढ़ना है तो अपनी कमियों की तरफ तो ध्यान देना ही पड़ेगा, और हमें याद रहना चाहिए कि हम सर्वोत्कृष्ट नहीं, सुधार की गुंजाईश सदैव रहती है. और सुधार तब ही संभव है जब हम अपने को एक स्वच्छ आईने में निहारें व अपने-आप को साफ़ करने का कुछ यत्न भी करें, ..निरंतर! केवल समय काटने के लिए या अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु खोखले तर्क-वितर्कों से हम और कमजोर ही होंगे!

Tuesday, December 8, 2015

(५७) मुफ्त में जाएं धार्मिक सैरसपाटे को!

१- कोई भी वह नतीजा जो हम अपनी मेहनत से निकालते हैं, कोई भी वह कार्य जिसमें हम अपना श्रम (तन, मन, धन) लगाते हैं; हम उसकी कद्र करते हैं, उसे सम्मान देते हैं, उसका मूल्य समझते हैं! लेकिन अनायास ही मुफ्त में मिले रहे तोहफे या सहायता की बहुधा हम कद्र नहीं करते। बहुत दिनों से भूखे, लालची, स्वार्थी, मुफ्तखोर, बाहुबली या दबंग लोग उनको बटोरने के लिए सबकुछ एक कर देते हैं, भारी हौचपौच व अव्यवस्था फैल जाती है; और जो वास्तविक (बहुत ही अल्प संख्या में) जरूरतमंद होते हैं वे पीछे खड़े रह जाते हैं या भगदड़ से खिन्न हो जाने के कारण घर से बाहर ही नहीं निकलते।

२- कोई भी वह कार्य जो आवश्यकता के मुताबिक सही समय पर होता है उससे हमारी आवश्यकता उचित समय पर पूरी होती है, और मन शांत रहता है। लेकिन जब बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य या मूलभूत जरूरतें समय पर पूर्ण नहीं होते तो उनकी कमी के कारण उद्विग्नता बढ़ती जाती है; और फिर यदि एक लम्बे अन्तराल के बाद वे समस्त कार्य एक साथ पूर्ण करने का प्रयास किया जाता है तो हौचपौच मच जाती है, बहुत सारी गलतियाँ होती हैं, गुणवत्ता में कमी आ जाती है या एक साथ निगलने के कारण बदहजमी होने का भी खतरा बन जाता है। और चीजों को लपकने के लिए बहुत से छुपे हुए लालची गीदड़, सियार, लोमड़-लोमड़ी भी आगे आ जाते हैं।

उत्तर प्रदेश की पिछली और वर्तमान सरकारों ने कन्याधन बांटा, बेरोजगारी भत्ता बांटा, मुफ्त मध्यावधि भोजन बांटा, मुफ्त लेपटॉप बांटा, महंगे पत्थर जड़ित बहुत सारी इमारतें, स्मारक, पार्क, चौराहे आदि एकाएक थोक में बनवा दिए; बहुत सारे विकास कार्य (?) एक साथ शुरू करवा दिए और आननफानन में उन्हें पूरा किया गया या किया जा रहा है। उन सबकी प्रासंगिकता, करने के समय, तरीके, गुणवत्ता, लाभ और फल आदि से सभी जागरूक पाठक परिचित होंगे ही! निम्न स्तर का निर्माणकार्य, निरंतर उखड़ती महंगी पत्थर-टाइलें, धंसते इंटरलॉकिंग टाइल्स पथ, थोड़ी बारिश से ही टूटती-धंसती नवनिर्मित सडकें, स्मारकों-इमारतों की अनुपयोगिता आदि किसी से छुपे नहीं है। इसी प्रकार की अदूरदर्शी सोच के चलते हाल ही में लखनऊ में बने आलमबाग व चारबाग के (बहुत महंगे किन्तु बेकार के, और अब मेट्रो लाइन के लिए बाधक) फुटओवर पैदल पुलों को तोड़ने की तैयारी; अब सड़क पार करने हेतु सस्ता किन्तु उपयोगी अंडरग्राउंड रास्ता बनाया जाएगा (भला हो मेट्रोमैन श्रीधरन जी का)!

...अब कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार का एक नया 'शिगूफा' जानने को मिला ही होगा कि प्रदेश के वरिष्ठ नागरिकों को मुफ्त में धार्मिक स्थलों की यात्राएं कराई जा रही हैं!! कितने धार्मिक हैं राजा और शासन; और तदनुसार ही कितने धार्मिक हैं हम (यानी बहुतायत); और कितने धार्मिक होंगे वे लोग जो इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए भगदड़, हौचपौच, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार फैलायेंगे?! चलिए माना कि यह सबकुछ नहीं होगा तो भी इस स्कीम की प्रासंगिकता या औचित्य (लेख के ऊपरी दो बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए) समझ में नहीं आता है! इति।

Tuesday, December 1, 2015

(५६) साईंबाबा बनाम शंकराचार्य

विवाद के मूल को समझने के लिए पिछले कुछ लेखों के अंश

आजकल साधना के नाम पर विभिन्न कर्मकाण्डों, व्रत, पूजापाठ, मंत्रजप आदि को करना; नियमित या किसी दिन-विशेष आराधनालय, सत्संग या प्रवचन में जाना, खानपान में अनेकों विधि-निषेध अपनाना, किसी सम्प्रदाय या संस्था-विशेष का सदस्य बनना जैसे कृत्य आम प्रचलन में हैं। सम्बंधित लोगों से यदि ये सब कृत्य करने का 'वास्तविक' कारण जाना जाए तो यह तथ्य प्रकाश में आता है कि अधिकतर मामलों में लोग किसी न किसी सांसारिक अभिलाषा की पूर्ति हेतु ही ये सब कृत्य करते हैं। कुछ लोग इन कृत्यों के माध्यम से ईश्वर से अपने पापों के लिए क्षमायाचना करते हैं। वास्तव में उनका असली मंतव्य यही होता है कि ईश्वर उनके पापों को अनदेखा कर दें। पिछले पापों को धोने के लिए गंगा में डुबकी लगाना या तीर्थयात्रा करना तो आम प्रचलन में है ही, यह सब जानते हैं। कुछ मामलों में मोक्ष अर्थात् जन्म-मृत्यु के फेरों से मुक्ति हेतु विभिन्न धार्मिक कृत्य किये जाते हैं। ...तो देखने में यही आता है कि विभिन्न धार्मिक कृत्यों के पीछे कुछ न कुछ स्वार्थ छिपा रहता है। भौतिक सुख-संपत्ति और सांसारिक अभिलाषाएं ही आज साधना का प्रमुख लक्ष्य हैं। ...यह भी देखने में आता है कि जब दो राष्ट्रों का परस्पर युद्ध होता है, तो उनके देश के धर्मगुरु ईश्वर से अपने-अपने देश की विजय हेतु कामना-प्रार्थना करते हैं। अब ईश्वर किसे सही मानेगा?

यह प्रचलन भी आम है कि लोग संतान, व्यापार, नौकरी, धन, अधिक मुनाफे, सुख-सम्पदा और विलासिता की चाहत में ईश्वर के मानव-निर्मित छद्म दरबारों में हाजिरी देते हैं, पागलों समान पूजा-अर्चना करते-करवाते हैं। स्पष्ट है कि आज लोगों ने ईश्वर को एक भ्रष्ट और चापलूसी पसंद करने वाला राजा मान लिया है तथा साधना रूपी कृत्यों को रिश्वत में दी जाने वाली भेंट समझ लिया है। साधना करने का मूल उद्देश्य ही पलट गया है। ईश्वर व साधना की इससे बड़ी विडम्बना (उपहास) कदाचित् संभव नहीं। जब धार्मिक कृत्यों को करने-करवाने का उद्देश्य बिलकुल पलट चुका है तो फिर लोगों के अन्य कृत्यों का उद्देश्य पलट जाना तो स्वाभाविक ही है। विरला ही कोई मिलता है जो मात्र भजन के लिए ही भजन कर रहा हो अर्थात् ईश्वर-प्राप्ति हेतु अर्थात् सच्चे ईश्वरीय गुणों को अपने आचरण में आत्मसात् करने हेतु साधना कर रहा हो।

सर्वत्र झूठ व दिखावा देखने को मिल रहा है। आडम्बर का बोलबाला है। पाखंडी लोग, धर्मगुरु आदि खूब लाभ में हैं। कदाचित् धन की अभिलाषा एक बार को न भी हो, तदपि जागतिक यश की अभिलाषा कमोवेश सभी वर्तमान धर्मगुरुओं में कूट-कूट कर भरी है। प्रवचन देते समय या भक्तों से मिलते समय उनके नेत्रों, भावभंगिमाओं और शारीरिक भाषा से इसका पूरा-पूरा भान होता है। अधिकांश मार्गदर्शकों में यथार्थ सहिष्णुता का पुट नहीं मिलता। लोगों, अनुयायियों आदि के खोखले विश्वास को और अधिक खोखलेपन के साथ सुदृढ़ करने हेतु उनके सम्प्रदाय के धर्मगुरु उनके मन में अन्य सम्प्रदायों के प्रति नफरत, द्वेष आदि की भावना भरते हैं। अन्य पंथों की सोच या सिद्धांतों को यदि वे धर्मगुरु किसी कारणवश समर्थन भी देते हैं तो स्पष्ट रूप से वह झूठा व बनावटी प्रतीत होता है। परिणामतः आज प्रत्येक समूह यही जानता और मानता है कि केवल उसी का समूह व उसकी पूजा पद्धति तथा उसके देवता सर्वश्रेष्ठ हैं, अन्यों के निकृष्ट!

व्यर्थ के दिखावों और व्यर्थ की मूर्तिपूजा के घनघोर आलोचक तथा जीवनपर्यंत सादगी से रहने वाले अनेक महानुभावों के आज विशाल मंदिर बन गए हैं। बड़े दिखावे के साथ उनकी प्रतिमाओं की भव्य पूजा-अर्चना होती है। चढ़ावे का कोई अंत नहीं! यह देख आत्मा विलाप करती होगी उन महापुरुषों की! ...अहिंसा के घनघोर समर्थक एक प्राचीन मुनि के वर्तमान धर्मगुरु अनेक बंदूकधारी अंगरक्षकों से घिरे हुए प्रवचन देते देखे जाते हैं। बड़ा हास्यास्पद लगता है यह! कोई उनसे यह पूछे कि अहिंसा के पुजारी के इर्दगिर्द इन बंदूकों का क्या काम? परन्तु आज यह पूछने का साहस किसी में नहीं और न ही समझने का!

आज कोई सम्प्रदाय कुछ बता रहा है तो कोई कुछ और! सब बहलाने-फुसलाने और विभिन्न स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं। अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग! बस एक ही समानता है सबमें कि भव्यता और दिखावा आदि चरम पर हैं। अंधविश्वास बढ़ाने की तो कोई थाह ही नहीं! समय के साथ सिद्धांत और मूल्य बदल चुके हैं। ढोंगियों का राज है। धन और सांसारिक यश उन पर बरस रहा है। पाँचों अंगुलियाँ घी में... और सर कड़ाही में है! अध्यात्म के अन्तरंग में उतरने व उतारने वाले धार्मिक गुरुओं का मिलना आज अति दुष्कर है। आज प्रवचन देने वालों के आंतरिक जीवन में यदि झाँका जाए तो वहां सुनने वालों से भी अधिक गंदगी पाई जाती है। परन्तु लोग यह सब देखकर, जानकर भी आंखें मूंदे हुए हैं। भेड़चाल चल रही है। कारण है-- लोभ, अभिलाषा, लालसा तथा त्वरित सांसारिक लाभ की आकांक्षा। आज के कर्म की कल क्या प्रतिक्रिया आने वाली है इससे अनभिज्ञ भारत की आबादी का एक बड़ा प्रतिशत आज फंतासी अर्थात् कल्पना लोक में मग्न है। विज्ञानवादी भी आज अपना ही 'क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया' का सिद्धांत भुला बैठे हैं।

उथली (सतही) सकाम-भक्तियुक्त भक्तों (तीव्र-आसक्त भक्तों) की भीड़ से धार्मिकता की सूजन निरंतर बढ़ती जा रही है। ..कारण हैं- तीव्र आसक्तियुक्त आज के अधिकाँश धर्मगुरु! ..मेरे विचार से धर्म बिकाऊ नहीं होता। धर्म-शिक्षा में दिया ही जाता है, लिया नहीं जाता। खरा गुरु जीवन-यापन हेतु धर्म का व्यापार नहीं करता। जीवनयापन हेतु न्यूनतम आवश्यक वस्तुएं स्वतः ही बिना किसी विशेष प्रयास के प्राप्त हो जाती हैं, यदि ऐसा नहीं भी होता है तो खरा धर्म-शिक्षक कबीर की भांति जुलाहे का, ईसा मसीह की भांति बढ़ई का, जैसे कार्य करने में कोई संकोच नहीं करेगा। जन-कल्याण हेतु धर्म-शिक्षा अर्थात् 'धर्म' हेतु ही धर्म-शिक्षा तथा भौतिक शरीर की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किसी व्यवसाय / नौकरी आदि के बीच किसी प्रकार का कोई टकराव नहीं होता। हाँ इतना निश्चित है कि सच्चा धर्म-शिक्षक सांसारिक यश व धन का भूखा नहीं होता और अनावश्यक संग्रह व खर्च में उसकी कोई रुचि नहीं होती। उसकी आवश्यकताएं सीमित होती हैं और वह दिखावों से बिलकुल परे रहता है।

सभी जागरूक लोग इस बात से सहमत होंगे कि भारत का विकास ठोस रूप से नहीं हो रहा है, इसमें भी सूजन ही अधिक है!! और ये अंधविश्वासी कृत्य अर्थात् रिद्धि-सिद्धि प्राप्ति (shortcut) का लॉलीपॉप हमें और अधिक अकर्मण्य बनाएगा। आज इन कर्मकांडों की ओर अधिक जन-झुकाव के दो मुख्य कारण हैं-- पहला यह कि, साधारणतया लोग सरलता अर्थात् किसी शार्टकट के माध्यम से अपनी इच्छापूर्ति करना चाहते हैं; और दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक है कि, व्यक्ति को अपने प्रत्येक कृत्य का परिणाम ज्ञात नहीं होता है, सफलता भी मिलती है व असफलता भी। जब व्यक्ति इन रिद्धि-सिद्धि प्राप्ति के अनुष्ठानों के चक्कर में फंस जाता है, तो सफलताओं का श्रेय वह इन अनुष्ठानों को देता है, निहाल हो जाता है तथा असफलता के लिए उसे समझाया जाता है कि अनिष्ट शक्तियों के बहुत प्रभावी (भारी) होने के कारण ऐसा हुआ! ...व्यक्ति संतुष्ट हो जाता है, ...मार्गदर्शकों की रोटियां सिकती रहती हैं।

यद्यपि विभिन्न मनोवैज्ञानिक एवं मानसिक कारणों से आज समाज में धार्मिकता की सूजन बहुत बढ़ी हुई दिखती है पर समानान्तर रूप से यह भी कटु सत्य है कि कर्मकाण्डों के प्रति लोगों की आस्था कम हुई है या कम से कम अनिश्चय की स्थिति तो निरंतर बढ़ ही रही है। 'धार्मिकता की सूजन' कहा, इसी से यह स्पष्ट हो जाता है कि धार्मिक कृत्य तो अब बहुत हैं पर वे प्राणहीन हैं।

हमें यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि ईश्वर हमसे केवल अपने नामस्मरण या पूजा-अर्चना की चाहत नहीं रखता, वह केवल अच्छे विचारों व कार्यों की अपेक्षा रखता है। पूजा-अर्चना तो हम अपना भाव-निर्माण करने व मानसिक रूप से मजबूत बनने के लिए करते हैं। वस्तुतः ईश्वर कोई तानाशाह, अहंकारी, और अपनी ही प्रशंसा या गुणगान सुनने का आदी राजा नहीं है। वह तो कोमल हृदय, निष्पक्ष राजा है, जो अपनी प्रजा को भी ऐसा ही देखना चाहता है। अतः साधना में नामजप या पूजा-अर्चना का प्रयोजन केवल ईश्वर को प्रसन्न करना नहीं, वरन भाव-निर्माण, भाव-वृद्धि, इच्छा-शक्ति एवं मानसिक बलिष्ठता बढ़ाने हेतु है। प्राप्त बलिष्ठता से ही हम ईश्वर के गुणधर्मों (properties) को आत्मसात् कर पायेंगे, आचरण से प्रकट कर पायेंगे। ईश्वरीय गुण अर्थात् सर्वमान्य नैतिक गुण! जब ऐसे गुण होंगे तो साधना सफल हुई, ऐसा समझ सकते हैं! तब हमारी क्रियाएं (कृत्य) उच्चकोटि की होंगी, फलतः मिलने वाली प्रतिक्रियाएं (फल) भी उच्चकोटि की होंगी, स्वतः ही!

वेदान्त एवं अन्य कुछ उच्च प्राचीन साहित्यों में उल्लेखित ब्रह्मांड एवं ईश्वर के 'विज्ञानसम्मत' नियमों-सिद्धांतों की ओर से नेत्रों को मूंद लेने से सच्चाई नहीं बदल जाएगी। आज आवश्यकता है कि अध्यात्म पर से जो विश्वास मर गया है या विकृत हो गया है, उसे जिज्ञासापूर्ण वैज्ञानिक दृष्टि से देखकर तत्पश्चात् अनुभूत कर पुनः जीवित अथवा स्वस्थ किया जाए। ...जैसे विद्यालय में हम उत्तरोत्तर आगे की कक्षाओं में जाते रहते हैं, एक ही कक्षा में रुकना या पीछे की कक्षा में लौटना किसी को नहीं भाता है। ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान व साधना के क्षेत्र में भी हमें निरन्तर आगे की ओर जाने की आवश्यकता है। आइये... झूठे दिखावे, फरेब और दंभ को तिलांजलि देकर, बेड़ियों को काट कर, हम अपने अंतर्मन में झांकें। दिल तक.., आत्मा तक.. जाएं। उससे पूछें, मार्गदर्शन लें और स्वयं को परिष्कृत एवं परिमार्जित करें, वहां से ज्ञान का प्रकाश लेकर निरन्तर आगे की कक्षाओं में जाएं, तथा अन्यों को भी इसी के लिए प्रेरित करें। आज यही प्रासंगिक होगा। इति।