Friday, February 26, 2016

(६६) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ९

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
यह जो पब्लिक है सब जानती है!
सब जानते हैं कि बहुत कुछ गलत है, फिर भी अपनाते हैं!
जब कुछ सही होगा तब भी पहचानेंगे कि कुछ सही हुआ; यह अलग बात कि न मानें!
स्वार्थ व निःस्वार्थ को पहचानना बुद्धिजीवियों को बहुत आता है पर स्वयं की लोकेषणा की बलि देकर सही को स्वीकार करना उन्हें शायद नहीं भाता, तभी तो भारत में सवेरा आने में अभी भी बहुत देर है!

(२)
अंधभक्ति, ढोंग व ढोंगियों से बचना बहुत आवश्यक, परन्तु पड़ोसी को धिक्कारना नहीं है, वरन समझाना है व उन्नत होने के लिए प्रेरित करना है.
इतना क्रोध ठीक नहीं और न ही धिक्कारना सही है.
हम इंसान हैं भगवान् नहीं या सर्वोत्कृष्ट नहीं!
परन्तु असल बात यह है कि हमें आगे को जाना चाहिए और यथार्थ को मानना चाहिए, जो भारत के किसी भी कट्टर पंथ में होता नहीं दीखता, हिन्दू भी आज उसी दायरे में हैं!
हम किसी भी पंथ से हों पर हमें विकसित होना चाहिए और चमत्कार का तिलस्म तोड़कर यथार्थ (विज्ञान) में आना चाहिए, जो हम नहीं कर रहे हैं.
किसी भी उस पुरानी प्रथा को तोड़ने के पक्ष में मैं नहीं जो हमें आज भी विकास की ओर ले जाती हो, पर जो प्रथा हमें बेड़ियों में जकड़कर जड़ कर दे वह टूट ही जाए तो बेहतर!
वेद भी समस्त ज्ञान पाने के पश्चात् स्वयं को (अर्थात् वेदों को) त्यागने की बात कहते हैं! एक कांटे की मदद से पैर में चुभे कांटे को निकालते हैं, फिर दोनों काँटों को पैर (या शरीर) से अलग कर देते हैं! बेकार के (चुभे हुए) कांटे को फेंक देते हैं और मददगार कांटे को सुरक्षित स्थान पर सहेज देते हैं; वह फिर कभी काम आ सकता है!

(३)
आपकी स्वामिभक्ति को सादर नमन. ...परन्तु मुझे अध्यात्म का वह शुद्ध रूप ही पसंद है जोकि अत्यंत सरल व सुगम है, चकाचौंध से रहित है, प्रलोभन से रहित है और सिद्धांत (तत्त्व) से एकाकार कराता है. सिद्धांतनिष्ठ होने की दशा में हम भौतिकता में रहते हुए भी भौतिक तुष्टिकरण से कोसों दूर रहते हैं; मेरे विचार से यही गुण हमें सरल व्यक्तित्व प्रदान करता है और हम वास्तव में एक स्वस्थ जीवन जीते हैं स्वस्थ सोच के साथ. ...तब हमें किसी गुरु या किसी विचारधारा या किसी समुदाय को तुष्ट नहीं करना होता, वरन मात्र अपने आत्मिक स्वरूप के मुताबिक चलकर उसी (पारमात्मिक शक्ति) को तुष्ट करना होता है. इसी को परमानंदावस्था या मोक्षावस्था कहा जा सकता है. सुखद अंत (या आरम्भ) यही है!
किसी भी प्रकार का नकारात्मक विचार कृपया मन में न लायें. आप अपने स्थान पर बिलकुल सही और शायद मैं भी? मार्ग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं परन्तु लक्ष्य शायद समान! और सबसे बड़ी बात यह कि दोनों को अपने 'विश्वास' पर विश्वास है! ..और उससे भी बड़ी बात यह कि दोनों ने सकारात्मक ढंग से एक-दूसरे को समझने का यत्न किया! विरोधाभास होते हुए भी हमें एक-दूसरे के विश्वास की इज्जत करनी चाहिए और वह हमने की! हम इतना भी साध्य कर लें तो मानो हम मानवता की दिशा में एक पायदान ऊपर चढ़ गए! एकएक सीढ़ी ऊपर चढ़ते-चढ़ते हम मंजिल पा ही लेंगे!

(४)
अध्यात्म में एक बात कही जाती है- "जितने प्रकार के व्यक्ति, उतनी ही प्रकार की मानसिक स्थितियां (प्रवृत्तियां), और उतने ही साधना मार्ग"! सघन मनोचिकित्सा में भी एक कुशल मनोचिकित्सक इसी बात का ध्यान रखते हुए रोगी का इलाज करता है. ..एक से लक्षणों वाले रोगियों के लिए भी वह दवा और विशेषकर काउन्सलिंग की अलग-अलग योजना बनाता है. ..ठीक ऐसा ही अध्यात्म-जगत में भी होता है / होना चाहिए. ..एक और उदाहरण- मैं मानता हूँ कि मल्टीविटामिन प्रत्येक के लिए कारगर हो सकती है परन्तु एक सीमा तक! ..यदि रोगी की वास्तविक आवश्यकता को समझकर डॉक्टर उसे कोई विशिष्ट विटामिन ही दे तो शीघ्र, सटीक व पूरा लाभ होता है. खरे गुरु शिष्य की वृत्ति को परखकर उसे उस मार्ग के लिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह शीघ्र व ठोस आध्यात्मिक प्रगति कर सके.
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ऊंचा उठने के लिए गुरु के अतिरिक्त शिष्य की जिज्ञासा, तड़प, लगन, प्रयास और मेहनत आदि भी कार्य करते हैं- 'एकलव्य' की भांति! गुरु तो एक मार्गदर्शक साइनबोर्ड उपलब्ध कराता है, पर उस बोर्ड के मुताबिक चलना पथिक को ही होता है! ..और एक सचेत व इच्छावान पथिक बिना मार्गदर्शक बोर्ड के भी अपना रास्ता व मंजिल ढूंढ सकता है जब बोर्ड में निर्देश गलत हों!
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आज सही मार्गदर्शक बोर्ड्स की बहुत कमी, इसलिए उन भटकाव वाले बोर्ड्स में से सही चुनना / ढूंढना अत्यंत दुष्कर; ..तो फिर व्यक्ति अपनी मदद स्वयं ही क्यों न करे? क्यों विज्ञान से इस बारे में मदद न ले? ..मैंने भी ली है और तब ऐसे लेख लिखने का साहस किया है! परन्तु मैंने कभी भी योग्य मार्गदर्शक बोर्ड होने से इनकार नहीं किया है, बस यह कहा है कि वे अत्यंत अल्प हैं व उन्हें पाना अत्यंत दुष्कर! ..और उनके सही होने की पहचान यही है कि उसपर चल कर स्वयं से कोरी भावना रहित 'सुगंध' आए! आपके साथ यदि ऐसा है तो अवश्य ही आपकी साधना सफल हुई.

(५)
मैंने आपके बताए लिंक से GSSY की साईट को देखा. क्षमा चाहता हूँ मुझे General Benefits of GSSY ही समझ में नहीं आए! समझ में न आने से आशय है कि मुझे उन benefits में से एक भी ऐसा नहीं लगा जो हमारे मानसिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊपर उठा सके यानी हमारी सोच को भीतर से परिष्कृत कर सके. ..दुआ रूपी दवा की एक रहस्यमय दुकान की भांति लगा सब कुछ, जिनसे भौतिक जगत से सम्बंधित कष्ट दूर होने की संभावनाएं हैं परन्तु नैतिक व आध्यात्मिक उत्थान की benefits में कहीं चर्चा मात्र तक नहीं है, क्योंकि एक आम आदमी को उसकी ज़रूरत ही नहीं या ज़रूरत सबसे बाद में, ऐसा समझा है इस संस्था ने!
..जबकि मेरे अनुसार व्यक्ति की आन्तरिक (वैचारिक) शुद्धता ही अध्यात्म में सर्वोच्च स्थान रखती है. यदि वह हो जाए तो सब सध जाएगा, जीवन सफल हो जाएगा और अपने आप से (खुद से) अच्छी अनुभूति होगी, गर्व होगा! ..आखिर कब हम बाहर से अन्दर की यात्रा करेंगे? GSSY भी हमें वाह्य स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रलोभन ही देता है, आत्मिक गुणों का वहां कोई स्थान नहीं! ..और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि वहां निरर्थक रहस्य एवं व्यक्ति पूजा को प्रधानता है, जबकि असली अध्यात्म रहस्यों पर से पर्दा हटाता है, व्यक्ति-निष्ठा का विरोध करता है, लोकेषणा का विरोध करता है, हमें सरल, सत्यवादी व न्यायपूर्ण बनाता है! क्या GSSY इसमें से कुछ भी करता है? यदि करता है तो कैसे? कृपया स्पष्ट रूप से बताएं.

(६)
आपने कुछ अन्यथा ले लिया बात को! ..एक ही तराजू से तौलने का कोई प्रश्न ही नहीं. ..वर्तमान सन्दर्भ में मैंने एक जनरल बात कही; वैसे अपवाद हैं, अच्छे गुरु भी हैं लेकिन बहुत कम! ..वर्तमान स्थिति से वे भी बहुत दुखी / खिन्न हैं; और ऐसे गुरु अपना 'प्रचार' नहीं करते वरन 'धर्म' (righteousness) का 'प्रसार' करते हैं. चिराग लेकर उन्हें ढूंढना पड़ेगा! ..वे मंच से नहीं वरन नेपथ्य से कार्य करते हैं बिना किसी लोकेषणा के लालच से! ..और इनकी बताई साधना से अवश्य ही आध्यात्मिक प्रगति होती है.

(७)
एक बात कहूं पते की! ..कि आपको यदि प्राकृतिक या मानवीय सिद्धांत समझ में आते हैं तो समस्त निष्ठा उन्हीं के प्रति कर लें, सब कुछ प्राप्त हो जाएगा बिलकुल सही पद्धति से!
तब आपको व्यक्ति (गुरु) निष्ठ होने की आवश्यकता नहीं, किसी संस्थानिष्ठ होने की आवश्यकता नहीं और ईश्वरनिष्ठ होने की भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि आप असल सिद्धांतनिष्ठ हैं!
आप राजा पर विश्वास करें न करें, राजा के आगे शीश झुकाएं न झुकाएं; परन्तु यदि आप उसके नियमों, सिद्धांतों या कानूनों को मानते हैं तो एक अच्छे राजा के लिए यही बहुत है! गारंटी है कि आप सुख से रहेंगे.