Saturday, April 30, 2016

(७०) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १३

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
प्राथमिक कक्षाओं के समस्त संकल्पों-विकल्पों को क्रमशः त्याग कर ही हम सर्वोच्च कक्षा तक पहुँच सकते हैं; काश, यह सबको पता चल जाए और बिना पुनः गिरे हम इस सच पर स्थिर रह पाएं! ऐसा हो जाए तो फिर कलियुग का अंत निश्चित है और सतयुग बाहें फैलाकर हमारा स्वागत करेगा!

(२)
धर्मोपदेशक या मजहबी-शिक्षक का कार्य बहुत ऊंचे दर्जे का है व समाज भी इनके प्रति विशिष्ट आदर-भाव रखता है, थोड़ा लोभ और भय मिश्रित ही सही। तो इन धर्मोपदेशकों का मूल उद्देश्य यही होना चाहिए और यही होता भी था प्राचीनकाल में कि सामान्य लोगों को लोभ व भय से परे ले जाकर, दण्ड-परितोष की भावना से मुक्त करा कर, संघ में सच्चे धर्म (righteousness) की स्थापना करना तथा उसकी खराई को अक्षुण्ण रखना; स्वयं के एवं अन्यों के ज्ञान में लगातार वृद्धि कर निरंतर अल्लाह या प्रकृति के नियमों के और अधिक समीप पहुँचते जाना; धर्म के वाह्य स्वरूप के अवांछित तत्वों व भय-मिश्रित अंधविश्वासों की बेड़ियों को लगातार काटना, आदि-आदि। सारांश में यह कि ज्ञान की अगली कक्षाओं में अनवरत अग्रसर होते / करते जाना।
परन्तु आज ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा है। विभिन्न मजहबी संगठन खुदा व धर्म को और अधिक जटिल बनाने व दुरूह साबित करने में लगे हैं। बजाय अंधविश्वासों को दूर करने के, वे और अधिक अंधविश्वास बढ़ाने में लगे हैं। कारण स्पष्ट है कि आम लोगों को जब धर्म बहुत जटिल व साथ ही भौतिक लाभ पहुंचाने वाला लगेगा तब वे लोभवश इसकी ओर सहज ही आकृष्ट होंगे तथा दुरुहता जान पड़ने के कारण माध्यम बनेंगे आज के तथाकथित मजहबी संगठन व उनसे सम्बद्ध व्यवसायिक धर्मगुरु।
आखिर कब हम सचेत होंगे?

(३)
गलत के खिलाफ आपका रोष जायज है एवं साथ ही आपका दर्द भी समझा जा सकता है.
मोबाइल कम्पनियों की भी होड़, आक्रामक विज्ञापन, अन्य निरुपयोगी सुविधाओं की आदत डलवाना, छुपे खर्च, कामचलाऊ गुणवत्ता, आदि किसी से छुपे नहीं हैं. बेवकूफ बना कर पैसा बटोरने का खेल चल ही रहा है, तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी क्यों पीछे रहेंगी? जिस मूल देश से वे सम्बन्ध रखती हैं वहां तो उनका कार्य साफ-सुथरा है, पर भारत में चूँकि भ्रष्टाचार खूब है, अतः यहाँ वे भी चाँदी काट रहीं हैं. बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं. ..और तो और, हमारे देश की मौजूदा प्रतिभाएं भी इसमें उनकी सहायक सिद्ध हो रही हैं, उदाहरण के लिए बिज़नस मैनेजमेंट (MBA) की पढाई किये लोगों को आज प्राइवेट सेक्टर में जो नौकरियां मिल रही हैं, उनमें अधिकांशतः उनका काम यही होता है कि झूठ-फरेब से भरी मनमोहक और पेचीदा प्रमोशनल स्कीमें कैसे बनाई जायें! ...कैसे भी हो पर पैसा आना चाहिए, भारी टर्नओवर होना चाहिए, चाहे इसके लिए कितने ही झूठे सब्जबाग क्यों न दिखाने पड़ें! भारत में आज यह व्यापार का मूल सिद्धांत बन गया है! ..कहीं न कहीं हमारी या हमारे कुछ अपनों की भी इस कुचक्र में सहभागिता है, ..और वह भी हमारी सहमती से! तटस्थ भाव से ईमानदार अवलोकन की आवश्यकता है!

(४)
कुरीतियों के खिलाफ आपका रोष, विरोध एवं विद्रोह बिलकुल जायज है. ..जिन रीतियों का आज के परिपेक्ष्य में कोई औचित्य नहीं और उनको बस किसी प्रकार से निभाना, लकीर के फ़क़ीर बनने समान है. बदलावों हेतु आपने बहुत ही अच्छे सुझाव दिए हैं. मेरा सल्यूट!
परन्तु, कुछ बदलने के लिए यदि हम क्रोध में दूसरे के कृत्य को कोसते हुए कुछ अलग बात रखेंगे तो हमारी बात कोई नहीं मानेगा! क्योंकि हर एक व्यक्ति की अपनी कुछ न कुछ इगो (अहं) है और जब वह हर्ट होती है तो सामने वाला अपने दिमाग के सभी खिड़की-दरवाजे बंद कर लेता है! ...अपने बच्चों को समझाते हुए क्या हम इस बात का ध्यान नहीं रखते? उनके अपरिपक्व स्वभाव को बदलने हेतु हम कोमलता से सुतर्क देते हैं, सही बात को विभिन्न कोणों से समझाते हैं, और इस प्रकार धीरे-धीरे वे परिपक्व सोच के धनी हो जाते हैं.
हमें धैर्य और कोमलता, नम्रता आदि का दामन नहीं छोड़ना है और अपनी बात भी रखनी है, और सामने वाले के स्तर का भी ध्यान रखना है. ...और यह सब साधते हुए सब सध सकता है, इस उम्मीद को बरक़रार रखना है.
सभी अपने ही हैं, कोई पराया नहीं; कोई आज किसी निचली कक्षा में पढ़ रहा है तो आप जैसा कोई ऊपर की कक्षा में पहुँच चुका है, बहुत से लोग बीच की कक्षाओं में भी हैं. कुछ एक ही कक्षा में बहुत दिन से रुके हुए हैं तो कई निरंतर आगे की कक्षाओं में अग्रसर होते जा रहे हैं. ...हम ऐसे सोचें तो बिना किसी द्वेष के हम समस्त जनों को ऊपर की ओर ले जाने में अवश्य कामयाब होंगे.

(५)
आपने एक बात कही कि "एक चिकित्सक को भी मरीज के हित के लिये शरीर की चीर-फाड [आपरेशन] भी करना पड़ता है, भले ही मरीज उसको पसंद न करे!"
इसमें थोड़ा सा सकारात्मक एवं आशावादी संशोधन-
मरीज को भी जब अपने किसी एक सड़े अंग से यह खतरा बन जाता है कि उसके कारण उसका शेष शरीर भी इन्फेक्टेड हो सकता है तो वह स्वेच्छा से उस अंग को कटवाने सर्जन के पास पहुँच जाता है.
हमें सड़ांध के प्रति जाग्रति लानी होगी, फिर व्यक्ति स्वयं जागरूक होकर परिष्कृत होने का यत्न करेगा ही. किसी अंग के काटे जाने की नौबत आने से पूर्व ही उसे ठीक करने या करवाने का प्रयास करेगा.
इसी प्रकार सामाजिक कुरीतियों को भी बलात् दूर करने का प्रयास उत्तम नहीं, बल्कि उत्तम यह होगा कि हम लेखक संजीदगी के साथ ऐसा आईना पेश करें, जिसमें दाग दिखाई पड़ें. ..जब दाग दिखाई पडेंगे, समझ में आयेंगे, तो व्यक्ति उन्हें स्वतः ही साफ़ करेगा या करवाएगा.
सड़े दांत को कोई भी डेंटिस्ट निकाल सकता है, परन्तु काबिल डेंटिस्ट वही कहलाता है जिसने अपने प्रोफेशनल जीवन में न्यूनतम दांतों को निकाला और अधिकतम दांतों को सुधारा.
पूरी तरह से सड़े दांतों को निकालिए, कोई हर्ज नहीं; पर कुछ दांतों को पूरी तरह से सड़ने के पूर्व सुधारिए भी!
अब उत्तर में यह न कहियेगा कि "मैं कोई डेंटिस्ट नहीं!"

(६९) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १२

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
परेशानी हो तो कर्म करने की जरुरत है न कि किसी कर्मकाण्ड की!
और यदि किसी अमुक कर्मकाण्ड से किसी योग्य कर्म करने की प्रेरणा मिलती हो तो उसे करने में कोई आपत्ति नहीं.
कोई विशिष्ट धार्मिक कर्मकाण्ड किसी कर्म का स्थान ले लेगा, यानी शॉर्टकट उपलब्ध करा देगा, इस गलतफहमी में बिलकुल भी न रहिएगा! इसी को अन्धविश्वास और भ्रष्टाचार कहते हैं.
वह शॉर्टकट नहीं वरन ईमानदार कर्म चाहता है.

(२)
कर्मकाण्ड भाव-जागृति हेतु ही होना चाहिए, बिना 'कर्म' (बिना मेहनत या प्रयास) किसी अभीष्ट सिद्धि हेतु नहीं! ..वह भी यथासंभव शुरुआती अवस्था में ही!
..और जो अकर्म-कर्म की बात कही आपने (...ईश्वर कर रहा है और हमसे करा रहा है और सदा हमारे साथ है), वह इतना सरल नहीं! ..बहुधा हम भावुकता में ऐसा कह तो जाते हैं कि हम अकर्म-कर्म कर रहे हैं, परन्तु अधिकांशतः वह कोरी भावना ही होती है, ..सच्चे भाव का अभाव होता है; ...तभी तो अनेकों तथाकथित तत्त्व-ज्ञानियों से से भी पाप होते हैं! ...और तब वे यह नहीं कह सकते कि- "यह ईश्वर कर रहा है और हमसे करा रहा है और सदा हमारे साथ है"! ...ये उनके क्रियमाण-कर्म होते हैं- उनके मन, बुद्धि और विवेक से किये हुए; और ठीकरा फोड़ते हैं भगवान् पर!
मेरा आशय समझ गए होंगे आप. ...किन्तु इसे अन्यथा न लीजिएगा!

(३)
आपने कहा- "अध्यात्म की ऊंची कक्षाओं की पढ़ाई बहुत ही कठिन है और विरले ही उस को समझ पाते हैं. आम तौर पर लोग ग्रॅजुयेशन करते ही अपने नाम के आगे डिग्री लिखने लगते हैं और वास्तविक अनुसंधान से बचते हैं इसका एक कारण यह भी है कि अनुसंधान के परिणाम कभी मिलेंगे भी कि नहीं, यह निश्चित नहीं होता, जबकि धंधा करने के लिये ग्रॅजुयेशन काफी है."
'आपने बिलकुल सही बात कही, परन्तु यह बात आध्यात्मिक मार्गदर्शकों (विभिन्न तथाकथित गुरुओं) पर लागू होती है!
..लेकिन आम व्यक्ति की बात करें तो वह तो अभी तक किसी जूनियर कक्षा में ही अटका है! ..या फिर तथाकथित मार्गदर्शकों ने उसे वहीं पर अटका रखा है!
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रही बात ग्रेजुएशन के पश्चात् के 'अनुसंधान' की, तो अध्यात्म में वहां तक कोई भी पहुँच सकता है, ..एक आम व्यक्ति भी; ..किसी मार्गदर्शन अंतर्गत अथवा बिना किसी मार्गदर्शन के; ..बस दृढ़ निश्चय के साथ जिज्ञासु वृत्ति का होना आवश्यक! ..हर बच्चा (या व्यक्ति) अपने माता-पिता (या जीवन देने वाले) के विषय में जानने हेतु उत्सुक होता है और होना चाहिए! हर एक व्यक्ति को अपने जीवन को या स्वयं को और उससे जुड़ी बातों को खोजना चाहिए, जानना चाहिए, ..इसमें कुछ भी अटपटा नहीं! ..वैज्ञानिक भी तो यही करते हैं- 'अनुसंधान'!

(४)
बड़ा विरोधाभास है कुछ बातों में; एक तरफ आप कहते हैं कि "ईश्वर की हकीकत की थाह पाना मानव मन-मस्तिष्क के बस का नहीं, और दूसरी तरफ आपका यह कहना है कि ईश्वर की निशानियों को हमारा दिल खूब जानता व पहचानता है!" ..मेरा विचार है कि हम खूब जानते हैं कि ईश्वर व ईश्वरीय सिद्धांत, मूलतः प्रकृति के मूल सिद्धांतों के रूप में हमारे सामने प्रकट हैं, ...और हम हैं कि जानते हुए भी मानते नहीं, ..या अपने-आप को इस सिस्टम की परिधि से बाहर समझते हैं! ..शायद यह हमारा कोरा अहंकार है, ...और शायद इसी अहंकारवश हम जड़ और अज्ञानी समान हैं, ...और शायद इसीलिए हम पीढ़ियों से एक जगह (कक्षा में) स्थिर से हैं या अपेक्षाकृत नीचे ही गए हैं! इस भौतिक देह में और इस भौतिक संसार में हमें भौतिकता व आध्यात्मिकता के बीच संतुलन रखना आवश्यक होता है; भौतिक उन्नति तो हम खूब कर रहे हैं परन्तु आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में हम 'अबोध' ही बने हुए हैं, इसी कारण संतुलन बहुत बिगड़ गया है और हम निरंकुशता की हदें पार कर रहे हैं और आकंठ भौतिकता में डूबे हैं अनैतिकता के साथ (क्योंकि आध्यात्मिकता ही नैतिकता के रूप में प्रकट होती है)!

(५)
प्रकाश के विषय में जागृति फ़ैलाने (प्रसार करने) वाले व्यक्ति का प्रथम और अंतिम उद्देश्य केवल प्रकाश (या उसके महत्त्व) का प्रसार करना होता है, उसके किसी एक विशिष्ट ब्रांड का प्रचार नहीं! उसे केवल स्वच्छ और उज्जवल प्रकाश के प्रसार से मतलब होता है तथा वह उसे (प्रकाश को) अनेक स्रोतों में ढूंढकर अनेकों विकल्प प्रस्तुत करता है बिना किसी पूर्वाग्रह के!
जबकि किसी एक बल्ब विशेष (किसी एक बल्ब निर्माता) का प्रतिनिधि (या मालिक) केवल उस बल्ब विशेष का प्रचार करता है, उसे ही अपनाने का आग्रह करता है, अन्य निर्माताओं के समकक्ष उत्पादों को वह निकृष्ट बतलाता है! ..मूलतः वह ब्रांड का प्रचार करता है, प्रकाश का प्रसार नहीं!

सच्चा धार्मिक, 'सार्वभौमिक ज्ञान' रूपी असीमित प्रकाश के 'प्रसार' (spreading) में सहायक होता है या उसके द्वारा यह कार्य स्वयमेव होता है जैसे सूर्य के द्वारा प्रकाश का प्रसार होता है; और अन्धश्रद्ध कट्टर, किसी 'विशिष्ट ब्रांड' के सीमित ज्ञान का 'प्रचार' (publicity) करता है.
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पहली स्थिति में ज्ञान का प्रसार परमात्मा अथवा आत्मा के आदेश से और दूसरी स्थिति में ज्ञान का प्रचार किसी गुरु विशेष के आदेश (अथवा शिक्षा) से होता है.
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पहली स्थिति में सम्पूर्ण समष्टि के दीर्घ हित छुपे होते हैं जबकि दूसरी स्थिति में एक विशिष्ट समुदाय अथवा पंथ के हित छुपे होते हैं.
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प्रथम व्यापकत्व लिए होता है और दूसरे का एक निश्चित दायरा होता है.
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हाँ, यह सच है कि श्री रामकृष्ण परमहंस सरीखे खरे गुरु सदैव "प्रसार" हेतु प्रयत्नशील होते हैं, वे सीमित सोच के नहीं होते बल्कि व्यापकत्व लिए होते हैं. ..और उनकी यह विशेषता हम और आप नहीं निर्धारित कर सकते, उनके देह त्याग के कुछ वर्षों बाद 'सभी' को इसका पता चल पाता है ('केवल दो-चार नजदीकी लोगों' को ही उनकी गहराई का पहले से पता होता है).

Friday, April 1, 2016

(६८) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ११

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
विभिन्न समाजों (सम्प्रदायों, पंथों) में व्याप्त विभिन्न कुप्रथाओं को जब तक हम धर्म (?) (अर्थात् किसी पंथिक ग्रन्थ में उल्लेखित उपदेश या आज्ञाओं) से जोड़कर देखेंगे तो दो बातें होंगी-
पहली बात कि कुप्रथा के प्रति हमारा मोह या सम्मान बना रहेगा (धार्मिक पक्ष जुड़ा होने के नाते);
और दूसरी बात यह कि अन्य मतावलंबियों के प्रति हमारा द्वेष पूर्व की अपेक्षा और अधिक बढ़ेगा, क्योंकि उनकी व हमारी शिक्षाओं/आदेशों में परस्पर विरोधाभास अवश्य मिलेंगे!
और हम कुत्तों की भांति एक दूसरे से लड़ते रहेंगे! लड़ाई प्रथमतः केवल वह ही बंद करेगा जो अपेक्षाकृत अधिक समझदार होगा! ..किसी की जो चीज या आदत हमें पसंद नहीं, क्या आवश्यकता है कि वही हम भी अपनाएं?!
बहुधा हम 'धर्म' शब्द को 'रिलिजन' के सन्दर्भ में लेते हैं और रिलीजियस निर्देशों को 'धर्म' समझते हैं. जबकि रिलीजियस निर्देश (उपदेश, आज्ञायें, ग्रन्थ) आदि नीतिवचन हैं मात्र, ..और नीतियाँ कालानुसार बदलती हैं, बदलनी चाहियें! ..और ये बदलते रहे भी हैं, उदाहरणार्थ- बाइबिल का पुराना नियम (कठोर, स्थूल) v/s नया नियम (उदार, सूक्ष्म); वेद शिक्षा का क्रमशः स्थूल उपासना से सूक्ष्म उपासना तक जाना; सामान्य विद्यालय में कक्षा दर कक्षा आगे जाने पर पाठ्यक्रम बदलना (सूक्ष्म होना)!
'धर्म' कोई इतना छोटा शब्द नहीं कि विवादों में घिर जाए या उस पर आसानी से प्रश्नचिन्ह खड़े किये जा सकें. 'धर्म' कोई 'उपासना पद्धति या जीवनशैली' नहीं!
प्लीज..., धर्म, रिलिजन, संस्कृति, सभ्यता, नीति, आदेश आदि शब्दों को अलग-अलग गहराई से समझने का यत्न करें! ..इससे व्यर्थ के विवाद बंद होंगे, और तब हम व्यर्थ की बेड़ियाँ काटते हुए वास्तव में विकास की सीढ़ियाँ चढ़ेंगे.

(२)
आपने कहा- "इस देश के लोग भले ही ढोल ढमाकों और हाथियों के जोर पर कभी कभार जाग जाने वाली सरकार पर लाख दोष मढ़ लें परन्तु स्वयं तो कसम खा कर बैठे हैं कि वे अंधे ही बने रहेंगे। जब तक कि वे स्वयं ठोकर नहीं खा लेते।"
..इस बात से मैं पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ. वास्तव में हमारे देश के लोग अन्धविश्वासों में इस कदर जकड़े हैं कि ठोकरें खाने के बाद भी नहीं जागते. विभिन्न उलजलूल धार्मिक मीमांसाओं, तथाकथित (अकाट्य?) धार्मिक आदेशों, उपदेशों आदि ने आमजन को स्थाई रूप से धृतराष्ट्र व गांधारी बना दिया है.
आमजन आज विचित्र सम्मोहन की अवस्था में है जो उसे वैयक्तिक भौतिक उन्नति के विभिन्न शॉर्टकट्स सुझाता है. उसे सचेत करने की बात तो दूर की, उसे और अधिक पथभ्रष्ट करने में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है.
वास्तव में समाज की ऊपरी परत (layer) में उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्ति (जिनमें सरकार और विभिन्न धर्मगुरु भी आते हैं) आज अचेतावस्था में हैं तो निचली परत में अचेतना आना स्वाभाविक ही है.
आज जब मीडिया या सरकार में भी तथाकथित बुद्धिमान लोग एक-दूसरे की तरफ ताकते हुए देखा-देखी या अंदाजे से अपने अगले कदम उठाते हैं, केवल निज हितों को ध्यान में रखते हुए, ..तो प्रजा रूपी बच्चा क्या सीखेगा? आज के धर्मगुरुओं की तो बात ही अनोखी है, मायाजाल फ़ैलाने में लगे हैं और उनके इस मायाजाल को काटने के लिए हम लाख आलोचनाएं कर लें पर स्थिति बदलने वाली नहीं!
स्थिति तब ही बदल पायेगी जब समाज का ईमानदार वर्ग निःस्वार्थ भाव से ऐसी यथार्थ शिक्षा (मिताक्षर व परिष्कृत अध्यात्मशास्त्र) का प्रसार करे जिसको आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी खरा पाया जाए. यह तभी संभव हो पायेगा जब विभिन्न धार्मिक अवधारणाओं की जड़ तक जाकर उनके मंतव्य, मूल, सार आदि को खुले दिमाग से जानने की कोशिश की जाए और साथ ही इस क्रम में स्वतःस्फूर्त अनुभूतिजन्य ज्ञान का सहारा भी लिया जाए.
इस क्रम में कुदरत, प्रकृति और इसका सिस्टम हमें दिशा दिखाता ही है यदि हम मन में पहले से ही कोई धारणा बना कर न चलें तो!
ऐसा ही कुछ प्रयास/प्रयोग मैंने भी किया और इससे जो कुछ भी निकला, उसे बहुत धीरे-धीरे और यथासंभव आसानी से पचने योग्य भाषा में अपने ब्लॉग के माध्यम से समाज के साथ साझा करने की एक कोशिश कर रहा हूँ. कर्म पर मेरा अधिकार है और कर्म के अनुसार उचित समय पर उचित माध्यम से प्रतिक्रिया होनी निश्चित है, परन्तु बाट जोहने की आवश्यकता नहीं क्योंकि प्रकृति का सिस्टम अभूतपूर्व व अद्भुत है!

(३)
अभिभावकों, बड़ों या शुभचिंतकों की दिली ख्वाहिश होती है कि उनका बच्चा नेक राह पर चले.
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नेक राह पर चलने का मतलब किसी धर्म (पंथ) की शिक्षा के अनुसार 'लकीर का फ़क़ीर होना' नहीं वरन ऐसे रास्ते पर चलना जो मौजूदा समय के अनुसार उचित हो और मुझे, साथ ही अन्यों को भी आन्तरिक प्रसन्नता दे.
अपेक्षाकृत और अधिक छोटे शब्द में 'नेक राह पर चलना' मायने 'योग्य एवं न्यायप्रिय पथ पर चलना'.
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बच्चा जब छोटा होता है तो अभिभावक उससे सही काम करवाने के लिए उसे किसी न किसी 'पुरस्कार का लोभ' या 'दंड का भय' दिखाकर नेक राह पर रखने की कोशिश करते हैं.
परन्तु बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ हमारी इस क़वायद का तौर-तरीका परिपक्व एवं यथार्थ के करीब होता जाता है.
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'शैतान' शब्द के परिपेक्ष्य में भी शायद यही बात खरी उतरती है. परिपक्वता की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, प्रौढ़ता को हासिल करते हुए हमारे जेहन में 'शैतान' शब्द का अर्थ अब व्यापक भावार्थ में बदलना चाहिए, क्या आपको यह नहीं लगता?
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तब यह किसी एक अमुक धार्मिक शिक्षा से सम्बंधित न रहकर एक सार्वभौमिक सत्य के रूप में हमें समझ में आयेगा और किसी के लिए भी इसे समझना सरल होगा.
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पहले हम (आम लोग) अपरिपक्व थे, बिलकुल बच्चे जैसे, सो धार्मिक उपदेश भी उसी के अनुसार थे. अब तो हम बड़े हो गए हैं, फिर बचकाना व्यवहार क्यों करें?
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किसी काल में बनी विभिन्न धार्मिक नीतियाँ उस समय की जरूरत, जगह और माहौल के अनुसार तथा उस समय की हमारी बुद्धि को ध्यान में रखते हुए हमें योग्य पथ पर कायम रखने हेतु बनाई गयीं. तो वे नीति स्वरूप ही हुईं और नीतियाँ हमारी प्रौढ़ता के बढ़ने के साथ बदलती हैं, हमने ऊपर देखा था.
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पहले हम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक-दूसरे से अनजान थे, अब तो सम्पूर्ण विश्व एक छोटे से गाँव के समान और सब एक-दूसरे से वाकिफ़.
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अब हमें वास्तव में विकसित होने के लिए किसी भी सभ्यता से कुछ लेने (यदि वह सही है) और अपना कुछ छोड़ने (यदि वह गलत है) में संकोच नहीं होना चाहिए.
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सबका ईश्वर (सर्वोच्च शुभचिंतक/अभिभावक) भी यही चाहता है कि उसके सभी बच्चे परिपक्वता के शिखर तक पहुंचें.
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यदि हम यह नहीं समझ रहे तो माना जा सकता है कि "शैतान" अपनी चाल में अभी तक कामयाब है.
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पुनश्चः - ..अपने धर्म (पौराणिक नीति) पर ही 'सख्ती' के साथ चलना, ऐसा अटल इरादा हमें दूसरों के धर्म या विश्वास के प्रति सशंकित करता है या अन्धश्रद्ध कट्टर में रूपांतरित कर सकता है. फिर हम संकीर्ण हो सकते हैं, अन्यों को नीचा या शैतान तक समझ सकते हैं! ..परन्तु हमें तो विकसित एवं व्यापक होना है न!

(४)
बहुत अच्छा, तीखा व करारा प्रहार- हमारी आज की मानसिकता पर! आंखें खोलने वाला सच बयान किया है आपने.
..वैसे इस सच से बहुत से लोग वाकिफ़ हैं, ..पर आज आईना कौन देखना चाहता है और सच कौन सुनना चाहता है? अतः अधिकांश लोग अँधा और बहरा होने की एक्टिंग करते रहते हैं और जानबूझकर नादान बने रहते हैं.

(५)
नमस्कार बन्धु. आपने कहा- "सरकार और जनता दोनों सचेत हो जाएँ तथा सच्चे सदाचार को अपना लें, तो भ्रष्टाचार का नामो निशान मिट जायेगा। जनता एवं सरकार दोनों को जागृत होना पड़ेगा।"
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पर यह होगा कैसे?? ..नींद खोलने और सदाचार अपनाने के लिए कोई कारण (भय, लालच या 'ज्ञान') तो होना चाहिए उनके पास, जिससे कि वे motivate हो सकें! ज्ञान हो तो सबसे बढ़िया!

(६)
प्रत्येक चीज में 'कमी' और 'अति' दुष्परिणाम लाती है. खाना-पीना, सोना-जागना, मनोरंजन, भावुकता, अभिव्यक्ति, बहस, धार्मिक कृत्य, विश्वास-अविश्वास, प्यार-डांट, एकत्रीकरण-भण्डारण, अपनाना-परित्याग आदि अनेक ऐसे विषयों पर यह बात लागू होती है. आज भारतीय समाज में इन्हीं (कमी और अति) के कारण असंतुलन की स्थिति! ..शायद इस पर और अधिक मनन की आवश्यकता, ...क्षमा करें, इसकी आवश्यकता आपको भी!
साथ ही, प्रवृत्ति और निवृत्ति में संतुलन बैठाने की परम आवश्यकता! ...और निवृत्ति का क्रम प्रवृत्ति के पश्चात् ही! आरंभ में प्रवृत्ति एक स्वाभाविक व न्यायसंगत क्रिया, तथा प्रवृत्ति पश्चात् निवृत्ति की सोच एवं क्रिया अत्यावश्यक- इसमें कोई संदेह नहीं!
कृपया उत्तर अवश्य दें.

(७)
कोई भी प्राचीन धर्मग्रन्थ वहां के लोगों की उस समय की ज़रूरत के हिसाब से लिखे नीतिवचन हैं. प्राचीनकाल में प्रत्येक स्थान के लोगों की परिस्थितियों में भिन्नताएं थीं, सो प्रत्येक समुदाय के नीतिवचनों में शिक्षाएं, वरीयताएं भिन्न थीं.
पहले साधारण मानव अति सीमित था- शायद केवल अपने कबीले तक, ..अब सम्पूर्ण विश्व के लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आ चुके हैं. ..धार्मिक विश्वासों के रूप में अपनी-अपनी प्राचीन धरोहरें भी सबके पास हैं, ..परन्तु अधिकांश अभी तक बेड़ियों में जकड़े हैं, अपने ज्ञान को विस्तार ही नहीं देना चाहते.
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स्थिति तब ही बदल पायेगी जब विभिन्न धार्मिक अवधारणाओं की जड़ तक जाकर उनके मंतव्य, मूल, सार आदि को खुले दिमाग से जानने की कोशिश की जाए और साथ ही इस क्रम में स्वतःस्फूर्त अनुभूतिजन्य ज्ञान का सहारा भी लिया जाए.
इस क्रम में कुदरत, प्रकृति और इसका सिस्टम हमें दिशा दिखाता ही है यदि हम मन में पहले से ही कोई धारणा बना कर न चलें तो!

(८)
बहुत सही चोट की है आपने वर्तमान व्यवस्था पर! ..हम भारतवासियों का जीवन चल नहीं रहा, वरन दौड़ रहा है. दूरी तो बहुत तय करते हैं रोज, परन्तु विस्थापन बहुत थोड़ा सा ही होता है शायद! विकास और मेंटेनेंस की बात कर रहा हूँ मैं! ..भागमभाग बहुत, शोर बहुत, थकान बहुत, परन्तु हाथ कुछ ख़ास नहीं आता. ...क्योंकि भ्रष्टाचारी तरीकों के अतिरिक्त योजनाबद्ध शायद कुछ भी नहीं. सो भ्रष्टाचार के विकास में कोई कमी नहीं और न ही कोई बाधा; शेष सब कुछ आधा (या वो भी जाए भाड़ में)!

(६७) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १०

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
मेरे विचार से दुनिया का प्रत्येक धर्मग्रंथ अपने अनुयायियों को मानवीयता के पथ पर चलने के लिये प्रेरित करता है, दैनंदिन जीवन में नैतिक गुणों के समावेश की अपेक्षा करता है, ..इस्लाम धर्म भी.
और दुनिया में सम्मिलित रूप से कौन से गुण, 'नैतिक गुण' कहलाते हैं, यह सभी धर्मों के लोग भीतर से जानते हैं, ..नास्तिक भी!
तो प्रशंसा उसी व्यक्ति की होती है जिसके आचरण से नैतिक गुण प्रकट होते हैं, ..अन्य समुदाय के व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय भी! इसमें हिन्दू और मुस्लिम जैसी कोई बात नहीं!
यह बात तो हो गयी वैयक्तिक स्तर की. ..अब बात करते हैं सामुदायिक स्तर की, तो किसी भी समुदाय के अधिसंख्य लोग अपने दैनंदिन कार्यों एवं अन्यों के साथ आचरण करते समय सम्मिलित रूप से जिस प्रकार की मानसिकता व नैतिकता को दर्शा रहे हों, उसी के अनुसार वह समुदाय प्रशंसा या आलोचना का पात्र बनता है.
पेशेवर आलोचकों और तथाकथित बुद्धिजीवियों की बात छोड़िये, एक आम आदमी किसी के धर्मग्रंथ के मर्म में नहीं जाता, वह केवल व्यक्ति और उसके समुदाय के लोगों में विद्यमान वर्तमान नैतिकता को ही देखता/ढूंढता है, और उसी के अनुसार वह उसके प्रति अपनी राय बनाता है.
अब कृपया कोई नैतिकता की परिभाषा बताने का अनुरोध ना करे, उसके बारे में आज सब जानते हैं ..और नैतिकता का किसी धर्म से कोई सम्बंध नहीं. लेकिन यदि किसी धर्म की गलत व्याख्या या धार्मिक ठेकेदार के उकसाने की वजह से हमारी नैतिकता प्रभावित होकर निम्नतर होती है, तो निश्चित ही हमें सचेत होने की आवश्यकता है, क्योंकि तब हम अन्यों की निगाह में अज़ीब, विषम या विचित्र (odd) घोषित होते हैं.

(२)
मेरे ख़याल से इंसानियत सबसे बड़ा मजहब है और जो भी शख्स़ इस पथ पर चल रहा है यकीनन वो अपने इष्ट को प्रसन्न कर रहा है और खुद भी अंदरूनी तौर पर ख़ुश है.
ईश्वर, खुदा आदि यदि हैं तो यकीनन उनकी दिली तमन्ना यही होगी कि उनके बच्चे नेक राह पर चलें. दुनिया के तमाम मजहबी ग्रन्थ बुनियादी तौर पर इसी के लिए उकसाते हैं, यह अलग बात है कि आज एक बड़ा तबका इसके उलट चल रहा है क्योंकि वह बुरी तरह से स्वार्थी हो गया है.
अब इंसानियत और नेक राह पर चलना मायने नैतिक उसूलों को अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में लागू करना. और 'यूनिवर्सल मोरल वैल्यूज़' से सभी समुदायों के लोग वाकिफ़ हैं क्योंकि सभी के धर्मग्रंथों का निचोड़ अंत में वही निकलता है. विरले ही उसे जीते हैं और निश्चित रूप से वे ही अंततः हमेशा की ज़िन्दगी या मोक्ष के हकदार होंगे!

(३)
एक बहुत अच्छा लेख, अच्छी व्यंगात्मक शैली के साथ 'भूख' पर वास्तव में अति-सूक्ष्म व गहरा मनन. गागर में सागर भरा है आपने. अंत में एस.एम.एस. भी ख़ूब!
प्रगति के सन्दर्भ में मेरे विचार से distance नहीं, बल्कि displacement मायने रखता है और भारत में कम से कम वह नहीं हुआ! भारत ट्रेडमिल पर है! आज भारत में प्रगति की सूजन है मात्र, ठोस कुछ भी नहीं! आपके अनुसार भी तो समय के साथ सब कुछ पतला होता चला जा रहा है!
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अगले दिन की टिप्पणी- 'मैंने तो यूं ही कहा था, पर बात सच हो गई! आपका displacement भी शून्य हो गया.'
भई वाह! दोनों लेख समान, केवल शीर्षक भिन्न!
आप जहां से चली थीं, वापस ठीक वहीं पर पहुँच गयीं!
पूरी तरह विश्वास हो गया कि वास्तव में भारत ट्रेडमिल पर है!

(४)
सही कहा आपने कि आज हमें ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो परिश्रम से सपने पूरा करना सिखाये.
परन्तु ठोस प्रगति हेतु परिश्रम के साथ एक अन्य चीज का संलग्न होना अत्यावश्यक है- वह है ईमानदारी ...माने नैतिकता. ..नैतिकता के अभाव में भारत में आज सारा परिश्रम क्या पाने के लिए हो रहा है, वह सब जानते हैं.
पूर्वकाल में गुरुओं का यही कार्य हुआ करता था कि वे प्रथमतः राजा (शासन), तत्पश्चात प्रजा जनों को नैतिकता के पथ पर चलने हेतु प्रेरित करते रहें. ..उस समय के गुरुजन स्वार्थ, आडम्बर, लोभ और यश से बिलकुल परे रहते हुए अपना कार्य करते थे और हर किसी को सहज उपलब्ध रहते थे. ...लोक कल्याण ही उनका एकमात्र ध्येय होता था.
परन्तु आज ऐसा संत या गुरु चिराग लेकर ढूंढने पर भी कदाचित न मिलेगा!
इसका सीधा सा अर्थ यह कि राजा व सामान्य प्रजा को नैतिकता के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करने वाले अब नहीं रहे, वे खुद ही भ्रष्ट हो गए. ..तभी तो हर जगह लूट-खसोट मची है!

(५)
आजकल के किशोरों में बढ़ते अवसाद का मूल कारण आज की परिवर्तित जीवन शैली है. वर्तमान जीवनशैली लोगों को एक ऐसी दुनिया में लेकर जा रही है जो कि जीवन की असली सच्चाई से कोसों दूर है. देखा जाए तो प्राकृतिक मानवीय देह और उससे जुड़ी हुई मूलभूत प्राकृतिक आवश्यकताओं में समय के साथ कोई भी प्रकृतिदत्त बदलाव नहीं आया है, परन्तु हम भारतवासी अकारण ही उनमें कृत्रिम परिवर्तन करने की उधेड़बुन में नित लगे रहते हैं और व्यस्त हैं! इस व्यस्तता में हम परस्पर संबंधों की वास्तविक परिभाषा, अर्थ एवं गहराई से भी दूर जाते जा रहे हैं. कहने को हम आगे बढ़ रहे हैं परन्तु वास्तव में हम अधोगामी हो रहे हैं. उदाहरणार्थ- निकट अतीत तक हम मित्रता व मित्र की व्याख्या करने में विशाल, उदार, समझदार एवं गहरे थे, एक निश्चित दायरे में रहते हुए भी एक समयावधि तक हम मित्रता को बड़े अर्थों में लेते थे- बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड जैसी आज वाली परिभाषा न थी, दोस्त बस दोस्त होते थे, चाहे लड़का हो या लड़की; शादी जैसे संबंधों की बात बहुत बाद में आती थी. ..परन्तु आज विपरीत सेक्स से मित्रता होते ही युवा कूदकर तुरंत उसे तथाकथित रूप से गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड मान लेते हैं और उसपर एकाधिकार मानते हुए अपरिपक्व रूप से भावुक हो जाते हैं. जल्दी-जल्दी ब्रेकअप होने और बात-बात पर डिप्रेशन में जाने की यह एक बहुत बड़ी वजह है!

(६)
जब हम परिपक्वता की कुछ सीढ़ियाँ और ऊपर चढ़ जाते हैं तो हमारे लिए पहनावा, खानपान, संस्कृति, यहाँ तक कि विभिन्न धार्मिक क्रियाकलाप तक गौण हो जाते हैं; हम इन सब से ऊपर उठ जाते हैं व अन्य अपेक्षाकृत संकीर्ण लोगों के लिए ऐसा महसूस करते हैं कि वे अभी हमसे निचली कक्षा में हैं शायद इसीलिए वे आज कुछ संकीर्ण हैं, मैं भी तो उसी कक्षा से होते हुए ऊपर उठा हूँ, तो दुराव और परायापन कैसा? और क्यों?
तब मुझे अपने आप में बड़प्पन की अनुभूति होती है (अहंकार की नहीं) और मैं इस कोशिश में रहता हूँ कि अन्यों की अपेक्षा व आग्रह के अनुसार ऐसा कुछ भी करने को तत्पर रहूँ, जो उनकी संस्कृति के अंतर्गत करने का रिवाज हो या जिससे उन्हें अच्छा लगता हो! यकीनन बड़े कद वालों के लिए विभिन्न धार्मिक कृत्य, तौर-तरीके, संस्कृतियाँ आदि जैसी चीजें वाह्य (बाहरी) हैं, ..केवल आन्तरिक पवित्रता ही अहम् (महत्वपूर्ण) है, क्योंकि असली धार्मिकता (righteousness) केवल उसी से प्रकट होती है.
बड़ों के लिए यही बेहतर कि वे छोटों के लिए (समक्ष) छोटे ही बन जायें, क्योंकि इससे छोटों को अच्छा लगता है पर साथ ही उन्हें भी आगे की कक्षाओं में जाने के लिए प्रेरित करते रहें. विज्ञान में भी तो हम ऐसा ही करते हैं- निरंतर परिष्कार (refinement), पर पहले की खोजों पर हँसते नहीं हैं.

(७)
अच्छे अतीत में बहुत अधिक झाँकने से होता कुछ खास नहीं है, बल्कि ख्यालों और सपनों में खो जाने का भय रहता है और इसके अलावा हमारा अहं बढ़ने का खतरा भी रहता है, नया सीखने की वृत्ति कम होती है.
हमारे पुरखे बहुत रईस थे इसमें कोई बड़ी बात नहीं, ..आज हम क्या हैं यह बड़ी बात!
इसलिए विनम्र गुज़ारिश है कि सिर्फ लिखने के लिए मत लिखियेगा.
गुस्ताखी माफ़.

(८)
कुदरत का सिस्टम अनोखा और अचूक. हर घटना-दुर्घटना का कोई तो कारण जरूर, वो बात अलग कि हम कितना समझ पायें! ..और प्रत्येक कारण के मूल में हमारी क्रियाएं! ..और क्रियाओं के मूल में हमारी मानसिकता यानी सोच! ..अब यदि किसी तरह से इस सच्चाई पर हमारा विश्वास जम जाये तो हम सदैव तुरंत लाभ की सोच न रखते हुये दूरगामी परिणामों को भी दिमाग में रखेंगे और सदैव सचेत व साथ ही आश्वस्त रहेंगे कि "प्रत्येक क्रिया के फलस्वरूप एवं तदनुरूप प्रतिक्रिया" के वैज्ञानिक सिद्धांतानुसार ही मैं भी पाऊँगी ही! ..और जिस चीज को हम विज्ञान, तार्किक दृष्टि आदि द्वारा सही पाते हैं उसी के लिये तो अगली पीढी को प्रेरित करेंगे! समझदार लोग भेड़चाल में नहीं खोते हैं, प्रचलित भावना में नहीं बहते हैं, वरन सच्चाई को मानते हैं व उसपर विश्वास कर उस सच्चाई का आगे प्रसार भी करते हैं.