Friday, April 1, 2016

(६७) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १०

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
मेरे विचार से दुनिया का प्रत्येक धर्मग्रंथ अपने अनुयायियों को मानवीयता के पथ पर चलने के लिये प्रेरित करता है, दैनंदिन जीवन में नैतिक गुणों के समावेश की अपेक्षा करता है, ..इस्लाम धर्म भी.
और दुनिया में सम्मिलित रूप से कौन से गुण, 'नैतिक गुण' कहलाते हैं, यह सभी धर्मों के लोग भीतर से जानते हैं, ..नास्तिक भी!
तो प्रशंसा उसी व्यक्ति की होती है जिसके आचरण से नैतिक गुण प्रकट होते हैं, ..अन्य समुदाय के व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय भी! इसमें हिन्दू और मुस्लिम जैसी कोई बात नहीं!
यह बात तो हो गयी वैयक्तिक स्तर की. ..अब बात करते हैं सामुदायिक स्तर की, तो किसी भी समुदाय के अधिसंख्य लोग अपने दैनंदिन कार्यों एवं अन्यों के साथ आचरण करते समय सम्मिलित रूप से जिस प्रकार की मानसिकता व नैतिकता को दर्शा रहे हों, उसी के अनुसार वह समुदाय प्रशंसा या आलोचना का पात्र बनता है.
पेशेवर आलोचकों और तथाकथित बुद्धिजीवियों की बात छोड़िये, एक आम आदमी किसी के धर्मग्रंथ के मर्म में नहीं जाता, वह केवल व्यक्ति और उसके समुदाय के लोगों में विद्यमान वर्तमान नैतिकता को ही देखता/ढूंढता है, और उसी के अनुसार वह उसके प्रति अपनी राय बनाता है.
अब कृपया कोई नैतिकता की परिभाषा बताने का अनुरोध ना करे, उसके बारे में आज सब जानते हैं ..और नैतिकता का किसी धर्म से कोई सम्बंध नहीं. लेकिन यदि किसी धर्म की गलत व्याख्या या धार्मिक ठेकेदार के उकसाने की वजह से हमारी नैतिकता प्रभावित होकर निम्नतर होती है, तो निश्चित ही हमें सचेत होने की आवश्यकता है, क्योंकि तब हम अन्यों की निगाह में अज़ीब, विषम या विचित्र (odd) घोषित होते हैं.

(२)
मेरे ख़याल से इंसानियत सबसे बड़ा मजहब है और जो भी शख्स़ इस पथ पर चल रहा है यकीनन वो अपने इष्ट को प्रसन्न कर रहा है और खुद भी अंदरूनी तौर पर ख़ुश है.
ईश्वर, खुदा आदि यदि हैं तो यकीनन उनकी दिली तमन्ना यही होगी कि उनके बच्चे नेक राह पर चलें. दुनिया के तमाम मजहबी ग्रन्थ बुनियादी तौर पर इसी के लिए उकसाते हैं, यह अलग बात है कि आज एक बड़ा तबका इसके उलट चल रहा है क्योंकि वह बुरी तरह से स्वार्थी हो गया है.
अब इंसानियत और नेक राह पर चलना मायने नैतिक उसूलों को अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में लागू करना. और 'यूनिवर्सल मोरल वैल्यूज़' से सभी समुदायों के लोग वाकिफ़ हैं क्योंकि सभी के धर्मग्रंथों का निचोड़ अंत में वही निकलता है. विरले ही उसे जीते हैं और निश्चित रूप से वे ही अंततः हमेशा की ज़िन्दगी या मोक्ष के हकदार होंगे!

(३)
एक बहुत अच्छा लेख, अच्छी व्यंगात्मक शैली के साथ 'भूख' पर वास्तव में अति-सूक्ष्म व गहरा मनन. गागर में सागर भरा है आपने. अंत में एस.एम.एस. भी ख़ूब!
प्रगति के सन्दर्भ में मेरे विचार से distance नहीं, बल्कि displacement मायने रखता है और भारत में कम से कम वह नहीं हुआ! भारत ट्रेडमिल पर है! आज भारत में प्रगति की सूजन है मात्र, ठोस कुछ भी नहीं! आपके अनुसार भी तो समय के साथ सब कुछ पतला होता चला जा रहा है!
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अगले दिन की टिप्पणी- 'मैंने तो यूं ही कहा था, पर बात सच हो गई! आपका displacement भी शून्य हो गया.'
भई वाह! दोनों लेख समान, केवल शीर्षक भिन्न!
आप जहां से चली थीं, वापस ठीक वहीं पर पहुँच गयीं!
पूरी तरह विश्वास हो गया कि वास्तव में भारत ट्रेडमिल पर है!

(४)
सही कहा आपने कि आज हमें ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो परिश्रम से सपने पूरा करना सिखाये.
परन्तु ठोस प्रगति हेतु परिश्रम के साथ एक अन्य चीज का संलग्न होना अत्यावश्यक है- वह है ईमानदारी ...माने नैतिकता. ..नैतिकता के अभाव में भारत में आज सारा परिश्रम क्या पाने के लिए हो रहा है, वह सब जानते हैं.
पूर्वकाल में गुरुओं का यही कार्य हुआ करता था कि वे प्रथमतः राजा (शासन), तत्पश्चात प्रजा जनों को नैतिकता के पथ पर चलने हेतु प्रेरित करते रहें. ..उस समय के गुरुजन स्वार्थ, आडम्बर, लोभ और यश से बिलकुल परे रहते हुए अपना कार्य करते थे और हर किसी को सहज उपलब्ध रहते थे. ...लोक कल्याण ही उनका एकमात्र ध्येय होता था.
परन्तु आज ऐसा संत या गुरु चिराग लेकर ढूंढने पर भी कदाचित न मिलेगा!
इसका सीधा सा अर्थ यह कि राजा व सामान्य प्रजा को नैतिकता के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करने वाले अब नहीं रहे, वे खुद ही भ्रष्ट हो गए. ..तभी तो हर जगह लूट-खसोट मची है!

(५)
आजकल के किशोरों में बढ़ते अवसाद का मूल कारण आज की परिवर्तित जीवन शैली है. वर्तमान जीवनशैली लोगों को एक ऐसी दुनिया में लेकर जा रही है जो कि जीवन की असली सच्चाई से कोसों दूर है. देखा जाए तो प्राकृतिक मानवीय देह और उससे जुड़ी हुई मूलभूत प्राकृतिक आवश्यकताओं में समय के साथ कोई भी प्रकृतिदत्त बदलाव नहीं आया है, परन्तु हम भारतवासी अकारण ही उनमें कृत्रिम परिवर्तन करने की उधेड़बुन में नित लगे रहते हैं और व्यस्त हैं! इस व्यस्तता में हम परस्पर संबंधों की वास्तविक परिभाषा, अर्थ एवं गहराई से भी दूर जाते जा रहे हैं. कहने को हम आगे बढ़ रहे हैं परन्तु वास्तव में हम अधोगामी हो रहे हैं. उदाहरणार्थ- निकट अतीत तक हम मित्रता व मित्र की व्याख्या करने में विशाल, उदार, समझदार एवं गहरे थे, एक निश्चित दायरे में रहते हुए भी एक समयावधि तक हम मित्रता को बड़े अर्थों में लेते थे- बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड जैसी आज वाली परिभाषा न थी, दोस्त बस दोस्त होते थे, चाहे लड़का हो या लड़की; शादी जैसे संबंधों की बात बहुत बाद में आती थी. ..परन्तु आज विपरीत सेक्स से मित्रता होते ही युवा कूदकर तुरंत उसे तथाकथित रूप से गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड मान लेते हैं और उसपर एकाधिकार मानते हुए अपरिपक्व रूप से भावुक हो जाते हैं. जल्दी-जल्दी ब्रेकअप होने और बात-बात पर डिप्रेशन में जाने की यह एक बहुत बड़ी वजह है!

(६)
जब हम परिपक्वता की कुछ सीढ़ियाँ और ऊपर चढ़ जाते हैं तो हमारे लिए पहनावा, खानपान, संस्कृति, यहाँ तक कि विभिन्न धार्मिक क्रियाकलाप तक गौण हो जाते हैं; हम इन सब से ऊपर उठ जाते हैं व अन्य अपेक्षाकृत संकीर्ण लोगों के लिए ऐसा महसूस करते हैं कि वे अभी हमसे निचली कक्षा में हैं शायद इसीलिए वे आज कुछ संकीर्ण हैं, मैं भी तो उसी कक्षा से होते हुए ऊपर उठा हूँ, तो दुराव और परायापन कैसा? और क्यों?
तब मुझे अपने आप में बड़प्पन की अनुभूति होती है (अहंकार की नहीं) और मैं इस कोशिश में रहता हूँ कि अन्यों की अपेक्षा व आग्रह के अनुसार ऐसा कुछ भी करने को तत्पर रहूँ, जो उनकी संस्कृति के अंतर्गत करने का रिवाज हो या जिससे उन्हें अच्छा लगता हो! यकीनन बड़े कद वालों के लिए विभिन्न धार्मिक कृत्य, तौर-तरीके, संस्कृतियाँ आदि जैसी चीजें वाह्य (बाहरी) हैं, ..केवल आन्तरिक पवित्रता ही अहम् (महत्वपूर्ण) है, क्योंकि असली धार्मिकता (righteousness) केवल उसी से प्रकट होती है.
बड़ों के लिए यही बेहतर कि वे छोटों के लिए (समक्ष) छोटे ही बन जायें, क्योंकि इससे छोटों को अच्छा लगता है पर साथ ही उन्हें भी आगे की कक्षाओं में जाने के लिए प्रेरित करते रहें. विज्ञान में भी तो हम ऐसा ही करते हैं- निरंतर परिष्कार (refinement), पर पहले की खोजों पर हँसते नहीं हैं.

(७)
अच्छे अतीत में बहुत अधिक झाँकने से होता कुछ खास नहीं है, बल्कि ख्यालों और सपनों में खो जाने का भय रहता है और इसके अलावा हमारा अहं बढ़ने का खतरा भी रहता है, नया सीखने की वृत्ति कम होती है.
हमारे पुरखे बहुत रईस थे इसमें कोई बड़ी बात नहीं, ..आज हम क्या हैं यह बड़ी बात!
इसलिए विनम्र गुज़ारिश है कि सिर्फ लिखने के लिए मत लिखियेगा.
गुस्ताखी माफ़.

(८)
कुदरत का सिस्टम अनोखा और अचूक. हर घटना-दुर्घटना का कोई तो कारण जरूर, वो बात अलग कि हम कितना समझ पायें! ..और प्रत्येक कारण के मूल में हमारी क्रियाएं! ..और क्रियाओं के मूल में हमारी मानसिकता यानी सोच! ..अब यदि किसी तरह से इस सच्चाई पर हमारा विश्वास जम जाये तो हम सदैव तुरंत लाभ की सोच न रखते हुये दूरगामी परिणामों को भी दिमाग में रखेंगे और सदैव सचेत व साथ ही आश्वस्त रहेंगे कि "प्रत्येक क्रिया के फलस्वरूप एवं तदनुरूप प्रतिक्रिया" के वैज्ञानिक सिद्धांतानुसार ही मैं भी पाऊँगी ही! ..और जिस चीज को हम विज्ञान, तार्किक दृष्टि आदि द्वारा सही पाते हैं उसी के लिये तो अगली पीढी को प्रेरित करेंगे! समझदार लोग भेड़चाल में नहीं खोते हैं, प्रचलित भावना में नहीं बहते हैं, वरन सच्चाई को मानते हैं व उसपर विश्वास कर उस सच्चाई का आगे प्रसार भी करते हैं.