Sunday, May 1, 2016

(७१) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १४

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
पितरात्माओं की प्रगति के परिपेक्ष्य में प्रथम चरण पर समझने-समझाने के लिए सूक्ष्मात्मा व सूक्ष्म तरंगों से सम्बंधित आपकी अवधारणा या संकल्पना को आगे बढाते हुए कुछ अन्य विचार-
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कदाचित् प्राचीनकाल में तत्कालीन ज्ञानी-जनों को ब्रह्माण्ड के समूचे आध्यात्मिक रखरखाव का ख्याल था. वैयक्तिक एवं वैश्विक सर्वांगीण विकास एवं सुख-समृद्धि, सुकून, संतुलन आदि के लिए यह एक आवश्यक विचार था. इसके लिए उन्होंने शायद विधि-विधानों एवं धार्मिक अनुष्ठानों के रूप में कुछ स्थूल प्रबंध किये. इनका उद्देश्य मात्र प्रारंभिक भाव-जागृति (initial trigger for respect and emotions) था. एक बार जब भाव स्थापित हो जाता था तो फिर हमारे सहित अन्य आत्माओं की आध्यात्मिक प्रगति भी सुनिश्चित हो जाती थी.
"आध्यात्मिक प्रगति", यह एक आवश्यक बात है सही मायनों में मानव बनने हेतु, या उससे भी ऊपर देवत्व या ईश्वरत्व को अनुभूत करने हेतु.
पितरात्माओं की सुख-शांति से जुड़े सभी कृत्यों का उद्देश्य उनके एवं स्वयं के लिए आध्यात्मिक अर्थों में महानता एवं व्यापकता का मार्ग प्रशस्त करना होता था, जो मोक्ष को जाता था. मोक्ष अर्थात् ज्ञान की परम/सर्वोच्च अवस्था, संतुलन की अवस्था! इसे जीवित रहते ही पाना (या पितरों को उपलब्ध कराना) संभव है. इससे ही विश्व में धर्म अर्थात् righteousness का स्थायित्व संभव है.
इस कृत्य में पितरों सहित सभी के हित का विचार व भाव निज-हित की अपेक्षा अधिक था.
लेकिन समय बीतते-बीतते भाव-जागृति का कार्य एक किनारे होता चला गया और विभिन्न वैयक्तिक स्वार्थों ने उसका स्थान ले लिया. ...सर्वप्रथम मीडिएटर (पंडित-पुरोहित) करप्ट हुए, फिर देखा-देखी यजमान भी! आज का हाल सभी जानते हैं पर मानते नहीं हैं!
सब कुछ गलत भाव/तरीके/मंशा से करने से श्रेयस्कर है कि कुछ भी न किया जाए, बस मन ही मन श्रद्धा सुमन अर्पित किये जायें, वह भी यदि संभव हो तो! मुख से कुछ, कर्म से कुछ, मन में कुछ, दिल में कुछ; यदि सब कुछ भिन्न-भिन्न है, तो भारी गड़बड़ है और सब निराधार है! 'लकीर के फ़क़ीर' ही बनना है तो बात दूसरी है! "जहां भाव वहां देव", यह न भूलें! भाव के बिना सब निरर्थक और भाव की उत्पत्ति कार्यकारणभाव समझने से ही होती है, जिसका नितांत अभाव! निराधार श्रद्धा, अंधश्रद्धा समान ही है! इसे उतार फेंकें!

(२)
पहले से लिखे हुए पर बहुत ज्यादा विचार-विमर्श करने तथा पक्ष-विपक्ष में बहुत सारी दलीलें देने से हम मौजूदा हकीकत से परे चले जाते हैं. ..जब हम बहुत अधिक कंफ्यूज़ हों तो क्या आपको यह नहीं लगता कि हमें जीवन की फिलोसोफी व डिवाइन एनर्जी आदि के बारे में नए सिरे से कुछ अवधारणाओं या संकल्पनाओं के माध्यम से शुरू कर स्वयं ही तह तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए?
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विज्ञान एवं गणित में भी तो हम आरंभिक अवस्था में यही करते हैं! ..और फिर धीरे-धीरे गुत्थी को काफी हद तक सुलझा लेते हैं. ..और आगे भी विकास के क्रम में हम उसमें और आगे बढ़ते हुए सकारात्मक फेरबदल करते हुए उसे और अधिक परिष्कृत (refine) करते रहते हैं!
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सरल शब्दों में, किसी भी फिलोसोफी पर बेवजह बहुत अधिक मंथन पर अर्थ से अनर्थ हो जाता है और अलग-अलग कुनबे/फिरके बन जाते हैं, उस फिलोसोफी का मंतव्य, सार, रूप आदि विकृत हो जाते हैं. ..परस्पर द्वेष उत्पन्न होता है सो अलग!
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तो, या तो हमें प्रोग्रेसिव दृष्टिकोण से फेरबदल करना आना चाहिए, या तो फिर हम एक नए सिरे से यानी 'a' से, ऊपर सुझाये गए तरीके से पुनः शुरुआत करें (कंफ्यूज़न की स्थिति में).

(३)
हमारे गिरते 'सिविक सेन्स' के कारण आपने जो आशंका व्यक्त की है, उसमें आपने काफी उदारता दिखाई है!
यदि हालात ऐसे ही रहे तो मेरे विचार से तो हमें 'ठहरा' हुआ नहीं बल्कि 'गिरा' हुआ घोषित किया जाएगा, क्योंकि सड़ांध दिन-प्रतिदिन द्रुत गति से बढ़ रही है! हम भारतवासी भागदौड़, उठापटक, छीनाझपटी, विभिन्न भ्रष्टाचारों आदि में गहरे उतरते जा रहे हैं! आम आदमी को दिशानिर्देशित करने वाले आज के मीडियाकर्मी, राजनीतिज्ञ, धर्मगुरु, ब्यूरोक्रेट्स, डॉक्टर, संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े लोग (जज, वकील, पुलिस), व्यापारीवर्ग, आदि सभी अभिजातवर्ग के लोग (ऊंचे व जिम्मेदार लोग) भी जब लगातार 'गिर' रहे हैं तो फिर आम आदमी का हाल क्या होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. हम आज पडोसी देशों से भारत की तुलना भी करते हैं तो किससे, ...पाकिस्तान से! ..चीन से क्यों नहीं? पाकिस्तान के मुकाबले अपनी उपलब्धियां गिना कर हम फूले नहीं समाते, ..और जब बारी आती है चीन से तुलना करने की, तो हम उसके नकारात्मक पक्षों की ही चर्चा करते हैं, सकारात्मक एवं सार्थक पक्षों को देखना ही नहीं चाहते! वास्तव में हम अकर्मण्य, कामचोर, भगोड़े, झूठे, मक्कार और भ्रष्ट होते जा रहे हैं- ऊपरी वर्ग से निचले वर्ग तक!
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फिर भी हमें (जो आज जागरूक हैं) रिपेयरिंग और रिफाईन्मेंट का प्रयास करना होगा एक नए सिरे से, एक नई सोच के साथ! ..हालात सुधरने में देर-सवेर हो सकती है पर सुधरेंगे कैसे नहीं, यह जोश होना चाहिए. ..और साथ ही होश भी! हम उबर सकते हैं, हम उबरेंगे; यदि हम जैसों की भावनाएं व इरादे नेक हों तो! ..वास्तव में आपसे मिलकर ख़ुशी हुई और एक आशा का संचार भी! क्योंकि दाग वही साफ कर सकता है जो दागों को देखना और महसूस करना जाने!

(४)
सही बात है आपकी कि जब तक हमारी 'सोच' परिष्कृत नहीं होगी, सभी वर्कशॉप फेल हो जायेंगी. यद्यपि इस प्रकार की ट्रेनिंग का मूल उद्देश्य 'सोच' को ठीक करना ही होता है, परन्तु बहुधा इनमें वो गहराई नहीं होती जो हमें अन्दर से झिंझोड़कर जगा सके, सचेत कर सके, वास्तव में 'अच्छा' और 'सच्चा' बना सके! गहराई आ पाना तब ही संभव है जब कुछ आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी शामिल किया जाए.
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किसी के भी पूर्णतया स्वस्थ होने की चार शर्तें हैं- १. वह शारीरिक रूप से स्वस्थ हो, २. वह मानसिक रूप से स्वस्थ हो, ३. वह सामाजिक रूप से स्वस्थ हो, ४. वह आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ हो.
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बहुधा हमारे वर्तमान समाज व शिक्षा में उपरोक्त क्रमानुसार १ से ३ पर तो ध्यान दिया जाता है पर ४ पर बिलकुल भी नहीं! ...उत्तर में शायद आप कहें कि अधिकांश लोग तो धार्मिक भी होते हैं, पूजा-पाठ आदि भी करते हैं! ..परन्तु यह सब करने का अर्थ यह कतई नहीं कि वह व्यक्ति आध्यात्मिक गुणों को प्रकट कर रहा है!
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इसे सारांश में समझने के लिए कृपया इसे पढ़ें- "आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ अर्थात्"

(५)
आपने पारिवारिक व सामाजिक रिश्तों के बनने-बिगड़ने तथा उसके पीछे के कारणों, स्वार्थों आदि पर मनन किया है. एक युवा जब जीवन के इस पक्ष की ओर गंभीरता से निहारता है तो मन में एक उम्मीद जगती है कि हमारे समाज में मानवीय मूल्य शायद पुनः स्थापित हों! ..शायद हम व्यर्थ की भागमभाग से ऊपर उठकर जीवन के असली पहलुओं को जानें-पहचानें! ...दुर्भाग्य से आज की युवा पीढ़ी में इसका अभाव है क्योंकि उन्हें इस सम्बन्ध में अपने बड़ों से ही कोई शिक्षा या प्रेरणा नहीं मिली! ..देखा जाए तो पिछली कई पीढ़ियों से हम रूपए-पैसे, स्वार्थ आदि को ही महत्व दे रहे हैं, मानवीय मूल्यों को नहीं! रिश्तों को भी हम स्वार्थानुसार ही बनाते-बिगाड़ते हैं! अब हमें जागना और बदलना होगा, तभी हम अन्दर से खुश होंगे, हमारी प्रसन्नता टिकाऊ होगी और यह जीवनशैली हमें ठोस रूप से संतोष देगी!

(६)
जहां कोई 'मत' होगा, वहां मतभेद अवश्य होगा; जहां कोई 'वाद' होगा, वहां विवाद होना निश्चित है.
लेकिन विज्ञान में थोड़ा अलग है. वहां हर चीज काफी ठोस तथ्यों पर आधारित होती है, अतः मतभेद या विवाद बहुत कम होते हैं. साइंस को हिंदी में विज्ञान या शास्त्र (जैसे- भौतिक-शास्त्र या भौतिक विज्ञान, रसायन-शास्त्र या रसायन विज्ञान) कहा जाता है. विज्ञान, साइंस या शास्त्र (समझने के लिए कुछ भी कहें), यह सिद्धांतों पर आधारित होता है, वे भी ऐसे सिद्धांत जिन्हें सब सरलता से देख सकें या कम से कम महसूस या अनुभूत कर सकें.
वर्तमान में प्रचलित धार्मिक-सिद्धांतों (?) में कुछ भी ऐसा नहीं, क्योंकि सिद्धांतों का आज वजूद ही नहीं, ..वे सब टूटफूट चुके हैं, विकृत हो चुके हैं; ..हमीं ने या हमारे आकाओं ने ऐसा किया है! बेवजह की मनमानी से वे सिद्धांत, अब सिद्धांत रह ही नहीं गए, ..इसीलिए अब काफी अरसे से विभिन्न 'मत' एवं 'वाद' बनते हैं. ..हम जितने खोखले (निराधार/सिद्धांत-रहित) 'मत' और 'वादों' को जन्म देंगे, उतने ही मतभेद व विवाद जन्म लेंगे! आज भारत में हर जगह यही हो रहा है और मानवता पिसती जा रही है!

(७)
ब्रह्माण्ड का एक निराला सिस्टम है. इस सिस्टम के जितने भेद खुलते जा रहे हैं, वे विज्ञान की परिधि में आते चले जा रहे हैं. ..और इस सिस्टम के जो भेद मनुष्य अभी तक नहीं जान सका है, उसके अंतर्गत होने वाली किसी भी रचनात्मक या विध्वंसात्मक गतिविधि के लिए अज्ञानी लोग ईश्वर को जिम्मेदार ठहराते हैं.
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हाँ, जब बात इसकी आती है कि यह सिस्टम ओरिजिनेट किसने किया? तो हम मात्र एक सुप्रीम पॉवर की कल्पना कर सकते हैं, इसी सुप्रीम प्राधिकारी को हम ईश्वर-अल्लाह का नाम दे देते/सकते हैं.
विज्ञान में भी तो अनेकों कल्पनाओं से शुरू करके आगे बढ़ते हैं, और आगे उनमें से अनेक कल्पनायें (सब नहीं) हकीकत में बदलती हैं.
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लेकिन फ़िलहाल हम एक नतीजे पर तो पहुँच ही चुके हैं कि प्रकृति में सब कुछ नियमबद्ध है, जो उन नियमों का आदर करता है, वह सुखी रहता है और जो उनका उल्लंघन करता है वह किसी परेशानी में अवश्य पड़ता है.
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लेकिन इसके उलट, ..बिना उल्लंघन किये भी जब कोई परेशानी में पड़ता है और आदर न करने के बावजूद भी कोई सुख में है तो इस विपरीत स्थिति का समाधान हम एक्शन-रिएक्शन के सिद्धांत से पाते हैं. प्रकृति या विज्ञान के नियमानुसार, त्वरित और विलंबित, दोनों प्रकार के रिएक्शन संभव हैं.., और यदि ऊर्जा की अक्षुण्णता व संरक्षण का सिद्धांत भी इसमें जोड़ दें तो रिएक्शन का किसी कनवर्टेड फॉर्म में आना भी संभव है! मोटे तौर पर- पॉजिटिव के फलस्वरूप पॉजिटिव, नेगेटिव के फलस्वरूप नेगेटिव प्रतिक्रिया; लेकिन कब (त्वरित/विलंबित), किस अवस्था (फॉर्म) में और किस माध्यम से, इसकी सटीक गणना करने में अभी मौजूदा विज्ञान असमर्थ है!
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यानी इन सब की मदद से हम मोटे तौर से इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि कोई भी एक्सीडेंट, एक्सीडेंटली नहीं होता!!!
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विज्ञान में भी आरंभिक अवस्थाओं में हम मोटे (धुंधले) तौर पर ही किसी नतीजे पर पहुँचते हैं और बाद में शायद किसी ठोस नतीजे पर!