Wednesday, July 5, 2017

(७९) एक पोस्ट पर की गई टिप्पणी

आपने लिखा, "...मोदी सरकार की कमियां गिनाने वाले ऐसे भी हैं जिन्हें ये भी पता नहीं कि भारतीय संविधान में कितनी विसंगतियां और पेचीदगियां हैं जिनका लाभ लेकर अब तक भारतीय प्रजातन्त्र और प्रजा दोनों से सिर्फ खिलवाड़ ही हुआ है और कुछ संवैधानिक संशोधनों के बिना देश हित के सभी कार्य कर पाना वह भी शीघ्रता से, एक प्रधान के लिए सम्भव ही नहीं है!"

इस पर मेरा विचार यह है कि व्यवस्था संबंधी जितने भी संवैधानिक नियम-कानून अभी अस्तित्व में हैं, ..यदि उनमें से 50% पर भी शासन-प्रशासन द्वारा ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से अमल हो जाये, तो आम जनता के लिए यह बहुत राहत की बात होगी। ..और यदि मौजूदा कानून-नियमों पर 100% अमल ईमानदारी से हो जाये तो फिर तो जनता ईश्वरीय-राज्य में होने का अनुभव करेगी।
हमारे नियम-कानून इतने भी कमजोर नहीं कि वर्तमान अव्यवस्था का समस्त ठीकरा हम उन पर फोड़ें, ..या उनके कमजोर होने का हवाला देकर अपनी नाकामयाबियों को छुपाएं!
वास्तव में सच तो यह है कि प्रधान और उनके मुख्य सलाहकार लोकहित की दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं रखते, येनकेन-प्रकारेण सत्ता को लंबे समय तक कायम रखने की महत्त्वाकांक्षा पाले हुए हैं, अपनी व्यक्तिगत सोच को ही सर्वोपरि मानते हैं, जब दूसरों को सुनने-समझने की वृत्ति ही नहीं तो फिर कल्पनाशीलता का भी अभाव है, ...और इन सब कमियों के कारण अच्छे शिल्पकार बनने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं (एक प्रधान, देश और समाज को गढ़ता ही है और उसकी भूमिका एक शिल्पकार की ही होती है)।
इच्छाशक्ति और कौशल के परिणाम का एक उदाहरण देता हूं--
आपने पुरानी प्रसिद्ध इमारतें जैसे ताजमहल, फतेहपुर सीकरी, विभिन्न प्राचीन महल और किले, अंग्रेजों के शासनकाल में दुर्गम पहाड़ियों पर बना कालका से शिमला का रेलपथ, इत्यादि को देखा होगा।
बारीकी से इनका निरीक्षण, ततपश्चात तटस्थ चिंतन करें तो पाएंगे कि उस काल में आज सरीखी तकनीक, क्रेन, बुलडोजर, लिफ्ट, जेसीबी मशीन आदि न होते हुए भी तत्कालीन शिल्पियों ने अपनी इच्छशक्ति, कल्पनाशीलता और ईमानदारी से किये गए श्रम की बदौलत ऐसे निर्माण कर दिखाए, जो आज सभी निर्माण-सुविधाओं के होते हुए भी संभव नहीं हैं। आज के भारतीय आर्किटेक्ट या इंजीनियरों को यदि वैसे निर्माणकार्य की चुनौती दी जाए तो वे किसी न किसी कमी या अभाव का बहाना बनाकर उस बीड़े को नहीं उठाएंगे! क्योंकि अक्षम व्यक्ति ही कार्य से बचने के लिए विभिन्न बहाने या कारण खोजता है।
अपने ही शहर में देखता हूं कि हाल ही के कुछ सालों में बनी सरकारी इमारतें अनेकों तकनीकी कमियां रखती हैं और उनका क्षय होना भी आरम्भ हो चुका है!
तो बहाने तो कमजोर व अक्षम लोग ही बनाते हैं। कर्मठ तो उपलब्ध साधनों-संसाधनों के साथ ही सामंजस्य बैठाकर मंजिल पा लेते हैं (वीर अब्दुल हमीद की कहानी यदि याद न हो तो इंटरनेट पर ढूंढ कर पढियेगा)।
एक बात और कि साहसी, विवेकवान और न्याय-पसंद प्रधान, लोकहित में संशोधित या नए कानून भी शीघ्र बना सकते हैं। शीघ्र बना सकने के सामर्थ्य के दो मूल कारण-- 1. संसद में प्रचंड बहुमत होना, 2. लोकहित यदि वास्तव में निहित हो तो फिर समाज और प्रजा से भी प्रचंड सहमति, सहयोग और समर्थन मिलना।
जब यह दोनों साथ में हैं तो फिर क्या गड़बड़ है कि आपने प्रधान के हाथ बंधे होने का हवाला दिया। किसी निज स्वार्थसिद्धि की तमन्ना हो तभी असली कर्म व राष्ट्र का विकास बाधित होता है, और अनेकों एक्सक्यूज़ देता है फिर व्यक्ति।
जितने कानून-नियम हैं अभी, और जितना बहुमत है सदन में, और जितना विशाल जनसमर्थन है अभी..., ऐसा सौभाग्य दोबारा मिलना अत्यंत मुश्किल! तो शिकायतों और कमियों और बेबसी को दर्शाना बंद कीजिये, और लग जाइये भ्रष्टाचार को ढहाने में, सुराज की स्थापना करने में।
ऐसी सुखद स्थिति में भी आपने यदि स्वार्थों के चलते कुछ ठोस न किया तो यह बहुत दुखद होगा।
आपके पास इस समय सबकुछ है। आवश्यकता है तो इच्छाशक्ति और ईमानदारी की।