Sunday, March 29, 2009

(३) धर्म और अध्यात्म


(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-१

यदि हम वर्तमान तक उपलब्ध प्रामाणिक या अप्रामाणिक इतिहास को देखें, तो हमें ज्ञात होता है कि काल के या समय के प्रत्येक चरण में अच्छे और बुरे लोग थे। हाँ, इनका प्रतिशत भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न हो सकता है, पर ऐसा नहीं था कि हम किसी भी युग को परिपूर्ण अर्थात् केवल अच्छा या सात्त्विक कह सकें। जब हम बात करते हैं अच्छाई या बुराई की, तो अच्छे या बुरे का निर्णय हम किस आधार पर करते हैं? क्या अच्छे या बुरे की पहचान के लिए प्रत्येक पंथ या समुदाय में कोई स्पष्ट नियम बनाये गए हैं? यदि हैं भी, तो क्या वे नियम समर्थ हैं, या थे, प्रत्येक प्रसंग या घटना के लिए? यदि कोई पंथ यह कहता है कि हाँ, तो फिर भी वहां की सरकारों ने इतने नियम व कानून क्यों बनाये हैं न्याय करने के लिए, जो वहां के धार्मिक ग्रंथों में दिए गए नियमों से कदाचित् भिन्न ही हैं? अर्थात् अच्छे और बुरे के ज्ञान के लिए हम 'सर्वकाल' किसी एक धार्मिक ग्रन्थ में दिए गए नियमों का सहारा लेते हैं, या ले सकते हैं, यह कहना अविवेकपूर्ण साहस ही होगा। यहाँ तक कि यदि हम अत्यंत प्राचीन जातियों के अति प्राचीन ग्रंथों का अवलोकन करें तो पता चलता है कि समय के साथ नियम व नीतियां बदलती गयीं। यानी उन ग्रंथों में भी कालानुसार नीतियों और नियमों या आज्ञाओं में परिवर्तन आते चले गए।

तो हमें पता चलता है कि तत्कालीन ग्रन्थ लेखकों को भी समयानुसार या आवश्यकतानुसार नीति-परिवर्तन की आवश्यकता पड़ी। या किसी पंथ के एक ग्रन्थ में यदि कुछ नियम प्रतिपादित किये गए, तो कुछ वर्षों के बाद उसी पंथ के अगले किसी ग्रन्थ में कुछ नए नियम या पुराने नियमों में बदलाव दिखाई पड़ता है। या किसी पंथ में यदि एक ही ग्रन्थ लिखा गया और उसमें प्रारंभ से अंत तक नीतियों, नियमों, या आज्ञाओं में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता, तो यह कहना भी बड़े साहस की बात है कि उस पंथ के सभी लोग आज भी उस ग्रन्थ की सभी आज्ञाओं, नियमों, सिद्धांतों या नीतियों का अक्षरशः पालन करते ही हैं। ऐसे में तो प्रत्येक व्यक्ति दिग्भ्रमित हो सकता है कि कैसे मैं वर्तमान में अच्छे और बुरे की सही-सही पहचान कर तदनुसार आचरण करूँ? वस्तुतः ऐसे सभी धार्मिक ग्रन्थ, जिनमें कुछ स्पष्ट नियम, नीतियाँ या आज्ञाएँ दी गयी हों, धार्मिक ग्रन्थ न होकर केवल नीति-विषयक ग्रन्थ ही हैं, या वे धर्म और नीति के मिश्रित स्वरूप हैं। तो फिर प्रश्न यह उठता है कि धर्म क्या है? यह भी प्रश्न उठता है कि अच्छे व बुरे की पहचान हमें कैसे हो सकती है? वर्तमान में कैसे हम श्रेष्ठ कर्म कर पाएं या कैसे हम आनंदित रह सकें? क्या इन सब के निर्धारण के लिए कोई परिपूर्ण ग्रन्थ है? आदि।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-२

तो मन के इस भटकाव व उलझन को विराम देने के लिए सर्वप्रथम कुछ मूलभूत बातें जानना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। पहले हम शब्दों के माध्यम से 'धर्म' को समझने का प्रयास करते हैं। शास्त्रकारों ने 'धर्म' शब्द की अनेकों परिभाषाएं दी हैं, उनको पढ़ने से 'धर्म' शब्द का अर्थ यह समझ में आता है कि 'धर्म' अर्थात् योग्य एवं न्यायपूर्ण आचरण या कार्य, जिनके माध्यम से हम ऐहिक एवं पारलौकिक उन्नति कर सकें। 'धर्म' अर्थात् ऐसा योग्य आचार अथवा कार्य, जो हमें वाह्य (भौतिक) एवं आन्तरिक सुख प्रदान करा सके। श्रेयस्कर आचरण कौन सा है, इसे निर्धारित करने का कार्य मानवीय बुद्धि का नहीं, बल्कि केवल एक दिव्य अलौकिक शक्ति का है, ऐसा सभी पंथ मानते हैं।

और सभी पंथ यह दावा भी करते हैं कि उनके धार्मिक ग्रन्थ उसी दिव्य अलौकिक शक्ति द्वारा या उसकी प्रेरणा द्वारा लिखे गए हैं, अतः जो भी उनमें है वही धर्म है।

यदि हम यह मानते हैं कि सभी धार्मिक पंथों का ईश्वर एक ही है और वह वही अलौकिक दिव्य शक्ति है, तो फिर उनके ग्रंथों में दी गयीं धर्म नीतियाँ या सिद्धांत भिन्न-भिन्न क्यों? जब यह प्रश्न जोर देकर उठाया जाता है तो उन पंथों के सभी वर्तमान धर्मगुरु यही कहते हैं कि उनके पंथ का ग्रन्थ एवं ईश्वर ही प्रामाणिक है, श्रेष्ठ है; अन्य सब निम्न श्रेणी के या झूठे हैं। केवल उन्हीं के धर्मसिद्धांत व नियम सत्य हैं, शेष के मानवीय बुद्धि द्वारा ही रचित हैं।

वस्तुतः प्रत्येक पंथ के शीर्ष स्तर पर जब ऐसी सोच या मनोवृत्ति होती है, तो परस्पर धार्मिक द्वेष या पंथिक द्वेष जन्म लेता है। यही द्वेष विश्व भर में फ़ैली अनेक बुराइयों व वैमनस्य की जड़ है। अपने-अपने ईश्वर को एवं धार्मिक ग्रन्थ को ही श्रेष्ठतम कहने का दावा करना (बिना यह समझे कि भिन्नता क्यों है?) अहं सूचक है। अहं का यह पर्दा जब तक हमारे मन कि आँखों पर पड़ा रहेगा, हमें वास्तविक ज्ञान नहीं मिल सकता। केवल स्वयं को ही श्रेष्ठतम समझना व अन्य को कनिष्ठ, सभी पंथों कि यह सोच बहुत खतरनाक है। वस्तुतः सभी धर्मग्रन्थ नीतियों के माध्यम से हमें धर्ममार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।

आज हम विज्ञान के क्षेत्र में देखते हैं, तो बहुत हद तक सभी नियमों व सिद्धांतों में विश्व स्तर पर एकरूपता है। यानी हम कह सकते हैं कि विज्ञान के क्षेत्र में सभी नियमों व सिद्धांतों का वैश्वीकरण हो चुका है। यद्यपि शोध एवं अनुसंधान लगातार चलता रहता है, पर विज्ञान के कुछ नियमों या सिद्धांतों में यदि इन शोधों के फलस्वरूप कुछ परिवर्तन आता है या कोई नयी बात पता चलती है, तो वह बात या खोज या परिवर्तन विश्व स्तर पर मान्य होता है, दुनिया भर के वैज्ञानिक उसे मान्यता देते हैं। पर धर्म के क्षेत्र में भी क्या ऐसा ही है? बिलकुल भी नहीं। क्यों? क्योंकि विज्ञान तो तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित है, जबकि धर्म तो वास्तव में अनुभूति पर ही आधारित है, जो शब्दों या शाब्दिक व्याख्या से परे है। अर्थात् किसी अनुभूति को हम शब्दों के माध्यम से परिपूर्णता की हद तक व्यक्त नहीं कर सकते।

जो बात किसी को अनुभूति द्वारा पता चली है, वह बात किसी अन्य को भी ठीक-ठीक तभी पता चल सकती है जब उसको भी वही अनुभूति हो।

पुनः हम मूल विषय पर आते हैं कि जब ईश्वर या परमेश्वर एक ही हैं तो फिर उनके द्वारा या उनकी प्रेरणा द्वारा रचे गए ग्रंथों में असमानताएं क्यों? क्योंकि अधर्म को दूर करने के लिए ये कालानुसार, स्थानानुसार, व समुदायानुसार लिखे गए। इनके लिखने का आशय यही था कि इनमें बताई गयी नीतियों पर चल कर तत्कालीन लोग पुनः धर्म की ओर मुड़ें।

ये असमानताएं इसलिए भी हैं, क्योंकि 'धर्म' (एवं ईश्वर) तथा सभी 'धार्मिक ग्रन्थ', ये दोनों अलग-अलग विषय हैं। समझने के लिए आगे चर्चा करते हैं।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-३

'धर्म' (एवं ईश्वर) अनुभूति का विषय है, तथा 'धार्मिक ग्रन्थ' वस्तुतः किसी धर्म की व्याख्या या निर्धारण कर सकने में असमर्थ हैं क्योंकि वास्तव में लगभग सभी 'धार्मिक ग्रन्थ', धार्मिक ग्रन्थ हैं ही नहीं, वरन मात्र नीतिविषयक ग्रन्थ ही हैं। सभी धार्मिक ग्रंथों में कुछ विशेष नीतियां, सिद्धांत या नियम प्रतिपादित किये गए हैं। ये सभी नियम उस काल के (जिस काल में वह ग्रन्थ लिखा गया) लोगों के आचरण को ध्यान में रख कर अर्थात् तत्कालीन धर्म को ध्यान में रख कर बनाये गए थे। इनको बनाने का आशय यही था कि तत्कालीन लोग कम से कम गलतियाँ कर केवल यथासंभव श्रेष्ठ आचरण करें अर्थात् धर्म का निर्वाह करें। पर प्रत्येक युग या काल में लोगों की मानसिक क्षमता व संस्कार भिन्न रहे होंगे आज की तुलना में या किसी और युग (या काल) की तुलना में या अन्य किसी स्थान की तुलना में। तो फिर इन धर्मग्रंथों में समानता कैसे संभव हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक ग्रन्थ अपने-अपने समय में उस काल के लोगों की बौद्धिक क्षमता, आचरण, स्थान विशेष आदि को ध्यान में रख कर लिखे गए।

पहले से ही विश्व अनेक टुकड़ों में विभाजित था। अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग ढंग से मानव सभ्यता का विकास या पराभव चरणबद्ध ढंग से हुआ। हमारे पास उपलब्ध प्रामाणिक इतिहास से ही हमें यह जानने को मिलता है कि विश्व के अनेक हिस्सों पर बसे लोग किन्हीं अन्य हिस्सों पर बसे लोगों की जानकारी में धीरे-धीरे ही आये। विभिन्न देशों के व्यक्तियों ने जब लम्बी यात्राएं कीं, तो उन्हें अन्य देशों व संस्कृतियों के विषय में पता चला। यही कारण है, प्रत्येक देश के ईश्वर व ग्रन्थ भिन्न-भिन्न हैं। यही नहीं किसी एक ही देश में भी (जैसे भारत में) अनेक भाषाएं, पंथ एवं 'ईश्वर के रूप' हैं। आज हम भौतिक रूप से तो बहुत विकसित हो गए हैं पर धर्म के सम्बन्ध में अभी भी इतनी संकुचितता रखते हैं और उपरोक्त बातें जानते हुए भी आँखें मूंदे हुए हैं और केवल अपने ईश्वर, पंथ और ग्रन्थ को ही श्रेष्ठतम का दर्जा देते हैं व अन्य को कनिष्ठ (निम्न) घोषित करते हैं। हम यह क्यों नहीं समझते कि प्रत्येक धर्मग्रन्थ (?) वस्तुतः स्थानविशेष, समुदाय विशेष, समय विशेष, परिस्थिति विशेष आदि को ध्यान में रख कर रचे गए नीतिशास्त्रक या पथप्रदर्शक ग्रन्थ ही हैं मात्र। 'धर्म' तो शब्द, समय, स्थान, समुदाय आदि से परे है, केवल किसी विशेष परिस्थिति में भिन्न आकार ले सकता है बस, वह भी असामान्य परिस्थिति के सामान्य होने तक के समय के लिए। पूरे विश्व में, प्रत्येक काल में, प्रत्येक स्थान पर यह एक ही था व अभी भी एक ही है व सदैव एक ही रहेगा। अतः शब्दों में सरलता से समझने व समझाने के लिए हम इसे 'सनातन विश्व धर्म' कह सकते हैं।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-४

सनातन शब्द का अर्थ है - सदैव रहने वाला,शाश्वत व चैतन्यमय। जिसका कोई आदि-अंत न हो। अर्थात् धर्म का इतिहास अनंत है और यह (धर्म) विश्व के समस्त मनुष्यों में समान रूप से विद्यमान है। धर्म अर्थात् योग्य व न्यायपूर्ण आचरण के निर्धारण के पीछे एक ही दिव्य अलौकिक शक्ति का हाथ है, जो संभवता अदृश्य व निराकार है, पर उसका वर्णन भिन्न-भिन्न पंथों व समुदायों में ईश्वर के भिन्न-भिन्न नामों व रूपों के द्वारा मिलता है। पर फिर से बात वहीं पर आ जाती है कि प्रत्येक समुदाय व जाति अज्ञानवश या अहंवश अपने ही ईश्वर को श्रेष्ठतम व अन्य को कनिष्ठ या अयोग्य या झूठा ठहराती है। विभिन्न कालों में धार्मिक व्यक्तियों एवं विद्वानों द्वारा लिखे गए नीति ग्रंथों को वे धार्मिक ग्रन्थ कहते हैं और उनकी सभी बातों को वे श्रेष्ठतम कहते हैं व अन्य को कनिष्ठ।

मैं फिर से कहूँगा कि किसी के लिए यह कहना बड़े साहस कि बात है कि किसी एक ग्रन्थ में लिखी गयी सभी नीतियाँ 'सर्वकाल' में वैसे की वैसे ही (अर्थात् जैसे मूल रूप में लिखी गयी थीं) अपनाना संभव या लाभकारी हो सकता है। अर्थात् समयानुसार, कालानुसार, स्थानानुसार, सभ्यता व संस्कृति अनुसार नीतियों को कुछ न कुछ बदलने की आवश्यकता पड़ती रही है व आगे भी पड़ती रहेगी, जब तक कि प्रत्येक मनुष्य धार्मिक न हो जाये। तो क्या अभी सब धार्मिक नहीं हैं? वे धार्मिक क्यों नहीं हैं? वे धार्मिक कैसे हो सकते हैं? धर्म का ज्ञान हमें कैसे संभव हो पायेगा? सब धार्मिक हो जायेंगे, तो नीति ग्रंथों की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ेगी? धर्म अपरिवर्तनशील क्यों है? केवल विशेष परिस्थिति में धर्म के स्वरूप का कुछ समय के लिए बदलना क्या उसके मूल गुण 'अपरिवर्तनीय' के विरुद्ध नहीं है? क्या हम धर्म की संस्थापना पूरे विश्व में कर पुनः धर्म राज्य या ईश्वरीय राज्य स्थापित कर सकते हैं? इन सभी व अन्य प्रश्नों के उत्तर पर हम आगे मनन करेंगे ....।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-५

चूँकि ऐसे योग्य व न्यायपूर्ण आचरण, कार्य, या कृत्यों को 'धर्म' कहा गया है जो मनुष्य को वाह्य (भौतिक) समृद्धि एवं साथ ही आन्तरिक आनंद दे पाएं। तो यह कहा जा सकता है कि जब तक उपरोक्त दोनों (वाह्य तथा आन्तरिक सुख समृद्धि) प्रत्येक मानव को प्राप्त नहीं होते, तब तक अधर्म जीवित है। जब तक योग्य व अयोग्य दोनों तरह के कार्य मनुष्य कर रहा है, तब तक सब लोग धार्मिक नहीं हैं। योग्य व अयोग्य के निर्णय जब तक होते रहेंगे, अच्छे व बुरे पर बहस जब तक चलती रहेगी, एक-दूसरे के कार्यों / आचरण को जब तक लोग सही या गलत ठहराते रहेंगे, तब तक यह माना जा सकता है कि सब धार्मिक नहीं हैं।

कोई अच्छा नीति विषयक ग्रन्थ बुराइयों को काफी हद तक नियंत्रित कर सकने में समर्थ तो अवश्य हो सकता है, पर उस ग्रन्थ के मनन से, चिंतन से, या उसमें बताई गयी बातों को अक्षरशः अमल में लाने से सभी बुराइयाँ विश्व से समाप्त हो सकती हैं इसमें संदेह है, क्योंकि मनुष्य का अहं ऐसा होने न देगा। और दूसरी बात यह कि धर्मग्रंथों में उपलब्ध अधिकाँश नीतियाँ व नियम, दंड या प्रलोभन पर आधारित हैं। दंड या प्रलोभन के द्वारा यदि मनुष्य ने धर्माचरण स्थाई रूप से अपनाना होता, तो वह अब तक हो चुका होता; अर्थात् दंड या प्रलोभन अस्थाई रूप से तो धर्माचरण के लिए बाध्य कर सकते हैं पर स्थाई रूप से यह प्रक्रिया कारगर नहीं। फिर पहले तो मानव भौतिक रूप से इतना विकसित नहीं था अर्थात् पहले मन, बुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण इतना अधिक नहीं अपनाता था, जितना आधुनिक युग में अपनाता है। अब इस वैज्ञानिक युग में केवल प्रमाण को ही आधार मानने वाले मनुष्य के लिए तो उन प्राचीन ग्रंथों की दंड या प्रलोभन पर आधारित शिक्षाओं (नीतियों) को मानना और भी अधिक दुरूह हो गया है। तभी तो आज हम सर्वत्र गलत कामों को धड़ल्ले के साथ होता हुआ देखते हैं। आज की पीढ़ी साकार या निराकार ईश्वर के दंड या प्रलोभन की उन पुरानी नीतियों पर विश्वास नहीं करती या बहुत कम करती है जो विभिन्न ग्रंथों के माध्यम से बतायी गयी हैं।

तो यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में सभी लोग पुनः धर्माचरण की ओर उन्मुख हों, अर्थात् योग्य व न्यायपूर्ण मार्ग पर चलें, इसके लिए आवश्यकता है कि पुरानी नीतियों में समयानुसार शोधन एवं संशोधन कार्य किया जाये क्योंकि जब तक धर्म पुनर्स्थापित नहीं होता, किसी न किसी नीति की आवश्यकता पड़ेगी ही तब तक। उदाहरणार्थ - यदि कोई व्यक्ति धार्मिक हो, तो वह योग्य कार्य जैसे बुजुर्गों का आदर स्वतः ही करेगा। यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करता तो उसे समझाना पड़ता है कि प्रेम करना, आदर करना अच्छी बात है। 'प्रेम करो, बड़ों का आदर करो' यह समझाना नीति ही हुई। ऐसे ही सत्य बोलने के विषय में समझाना भी नीति विषयक ही है। धार्मिक तो स्वतः ही सत्य बोलेगा, उसे नीतिशास्त्र की आवश्यकता नहीं। तो क्या हम ऐसे छोटे-छोटे कृत्यों के लिए भी असंख्य नीति वचन पुनः लिखेंगे जो पहले भी अनेक ग्रंथों में विस्तार से लिखे ही हुए हैं? या विभिन्न कर्मकांडों पर पुनः शोध कर उन्हें नए स्वरूप में लोगों के सामने लायेंगे? मेरा मानना है कि जिन प्राचीन कर्मकांडों से पहले ही नयी पीढ़ी का मोह भंग हो चुका है या वे कुछ कर्मकांड करते भी हैं तो बस यंत्रवत ही, उन कर्मकांडों का कोई नया सुधरा स्वरूप उन्हें स्थाई रूप से पुनः धर्म के मार्ग पर ले जा सकता है इसमें १००% संदेह है। यदि हम एक बार को मान भी लें कि कोई अमुक कर्मकांड किसी अभीष्ट फल की प्राप्ति करा सकता हो, पर कोई कर्मकांड मनुष्य को धर्माचरण के मार्ग पर स्थाई रूप से चला सके, ऐसा नहीं हो सकता अब।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-६

तो वर्तमान युग व परिस्थितियों को देखते हुए धर्म की पुनर्स्थापना के लिए एक ही नीति शेष बचती है, वह है मानव में आन्तरिक चेतना का विकास। आन्तरिक चेतना या चैतन्य को जागृत करने के लिए एक ही विषय या नीति का सहारा लिया जा सकता है, वह है - अध्यात्मशास्त्र का अभ्यास व इसका व्यापक प्रसार। अध्यात्मशास्त्र बिलकुल भी कठिन नहीं है, नीतियों या आज्ञाओं पर आधारित नहीं है और आजकल की वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने वाली नयी पीढ़ी व पुराने लोग भी सरलता से इसे समझ-समझा सकते हैं।

वास्तव में अध्यात्म चेतना पर आधारित शास्त्र है। हमने पहले भी कहा था कि सही और गलत आचरण का निर्णय करने वाली शक्ति कोई दिव्य या अलौकिक ही है, मानवीय बुद्धि नहीं। अध्यात्म के द्वारा हम इस दिव्य अलौकिक शक्ति से साक्षात्कार करते हैं। जब यह साक्षात्कार होता है तो हमारा चैतन्य जागृत होता है और तब हमें स्वयं ही समझ में आता है कि धर्म अर्थात् क्या। और तब हम स्वतः ही धार्मिकता के मार्ग पर चलने लगते हैं। यदि अध्यात्म का व्यापक प्रसार हो तो अवश्य ही एक दिन ईश्वरीय राज्य की स्थापना निश्चित है। अब हम अध्यात्म के विषय में सरल शब्दों में चर्चा करेंगे।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-७

कई बार कोई कार्य करते समय, जो समाज के अन्य लोग भी करते रहते हैं, आपको भीतर से यानी मन या हृदय से यह आवाज़ आती है कि अमुक कार्य गलत है। आप कुछ क्षण सोचते हैं, फिर सिर झटक कर वह कार्य पुनः करने लगते हैं यह सोच कर कि बहुत से अन्य लोग भी तो ऐसा कर रहे हैं। ऐसा अनेक लोगों के साथ अनेक कार्य करते समय होता है। आपको इतना तो पता चलता ही है कि अंतर्मन से कभी-कभी या अक्सर ही ऐसी कानों से न सुनाई देने वाली आवाज़ आया करती है जो सही लगती है, पर बहुधा लोग इसे अनदेखा कर पुनः उसी कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आप मन की उस आवाज़ पर ध्यान देते हैं और तदनुसार कार्य करते हैं जैसा कि अंतर्मन का आदेश होता है। जब आप ऐसा करते हैं कि अंतर्मन की उस आवाज़ को सुन कर तदनुसार कार्य (सही कार्य) करते हैं तो आपको एक अनोखे आनंद का अनुभव होता है या शान्ति महसूस होती है।

वस्तुतः यह आवाज़ अंतर्मन की न होकर उसी दिव्य अलौकिक शक्ति की होती है जो सही व गलत का निर्णय लेती है। ऎसी आनंद देने वाली घटनाएं सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक पंथ व समुदाय के लोगों व नास्तिकों के साथ भी होती हैं। उपरोक्त आवाज़ या आदेश ही धर्म की आवाज़ है। पर फिर भी सबकी वृत्ति सर्वकाल सत्य की ओर ही झुकती हो यह कहना बड़े साहस की बात है। क्योंकि किसी भी कार्य को करने के लिए आपके मन में जो निर्देश आता है वह उस दिव्य शक्ति का भी हो सकता है और आपके मन में बने हुए किसी संस्कार का भी। उदाहरण के लिए - राह में चलते-चलते आपने अचानक कोई आईसक्रीम का ठेला देखा और आपके मन से यह आवाज़ आयी कि चलो आईसक्रीम खाएं, तो आप यह नहीं कह सकते कि यह आवाज़ आपकी चेतना (या चैतन्य) की है या दिव्य शक्ति की है, बल्कि यह आवाज़ तो आपके मन में बने आईसक्रीम के संस्कार (impression) द्वारा आयी, क्योंकि जब भी आपने अपने जीवन में पहली बार आईसक्रीम को देखा या खाया तो उसी समय आपके मन में उसका एक संस्कार (impression) अंकित हो गया, और संस्कार जल्दी मिटते नहीं वरन बढ़ते ही हैं।

अतः हम यह कह सकते हैं कि सामान्यतः, एक सामान्य व्यक्ति के मन में आने वाला विचार संस्कार-जनित ही होता है। हाँ कुछ एक अवसरों पर गलत कार्य के विरुद्ध चेतावनी या अच्छे कार्य के प्रति प्रेरणा हमें काफी भीतर से और जोरदार ढंग से आती प्रतीत होती है, यही हमारी चेतना या चैतन्य की ध्वनि होती है। यही धर्माचरण के लिए आदेश होता है उस दिव्य शक्ति का। और यदि हम उस जोरदार व मजबूत ध्वनि या आदेश के अनुसार कार्य करते हैं तो एक अनोखे आत्मसंतोष की अनुभूति करते हैं। तब आप कभी-कभी यह भी कहते हैं कि मैं अपने आनंद या ख़ुशी को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। वास्तव में अनुभूति होती ही है शब्दों से परे।

पर जो कभी-कभी होता है वह निरंतर हो, तो क्या हम यह नहीं कह पाएंगे कि हाँ, अब नीतियों की आवश्यकता नहीं, अब धर्माचरण तो स्वतः ही हो रहा है। चैतन्य की दिव्य वाणी सदैव सुनाई देने पर सदैव ही अच्छे कार्य संपादित होंगे व सदैव ही हम आनंदमय रहेंगे। अतः ऐसा निरंतर होता रहे इसके लिए आवश्यकता है कि हम अपने आपको, इस सृष्टि को व उस परम शक्ति को जानें, जो इन सब का कारण है।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-८

कुछ लोग कहेंगे, या कहते ही हैं कि बुद्धिजीवी वर्ग धर्म व अध्यात्म का शत्रु है। या कुछ यह भी कहते हैं कि विज्ञान ही अध्यात्म व धर्म के पराभव का कारण है। वास्तव में ये सब बातें वर्तमान समयानुसार धार्मिक शिक्षा के अभाव या कमज़ोरियों को ढकने के लिए बहाना मात्र है। विज्ञान के अध्ययन से तो आज की पीढ़ी में जिज्ञासा व कारणभाव जानने की लालसा बढ़ गयी है। इसी जिज्ञासा व खोजी-वृत्ति से सत्य का आंकलन और अच्छी तरह से हो सकता है। कारणभाव जानने पर श्रद्धा का निर्माण होगा ही। यही जिज्ञासा, खोजी-वृत्ति, सत्य का आंकलन करने की क्षमता; तदुपरांत श्रद्धा व भाव, ये सब मिलकर दिव्य शक्ति से साक्षात्कार करायेंगे व लोग धर्मी बनेंगे। अंध-भक्ति व खोखले विश्वास को हम श्रद्धा नहीं कह सकते। अतः विषय को ठीक से समझने व जानने के लिए जिज्ञासु बुद्धिजीवी या वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना तो और भी अच्छा है। वास्तव में अध्यात्म बुद्धि व शब्दों से परे का ही शास्त्र है पर उसे चरणबद्ध ढंग से समझने के लिए सर्वप्रथम बुद्धि का उपयोग आवश्यक है। समझने व अध्ययन-उपरांत; साधना व निरंतर अभ्यास से ही बुद्धि से परे शब्दातीत आत्मानुभूति संभव हो सकती है।

अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में। अब अगला प्रश्न या जिज्ञासा यह कि आत्मा अर्थात् क्या? आत्मा हम उसी चेतना या चैतन्य को कह सकते हैं, जिसका हमने पहले वर्णन किया था। यह वही दिव्य शक्ति है जिसके कारण हम जीवित हैं या अस्तित्व में हैं। यही वह शक्ति है जो हमें वास्तविक धर्म का परिचय कराती है या करा सकती है। यदि हम एक शब्द में आत्मा के मूल गुण को बताएं तो वह है - सच्चिदानंद अर्थात सत्+चित्+आनंद। सत् अर्थात् सदैव रहने वाली (सनातन) तथा शुद्ध, चित् अर्थात् चैतन्यमय, आनंद अर्थात् आनंदमय। यह निर्गुण व निराकार है, अर्थात् इसका कोई आकार या स्वरूप नहीं है जिसे हम आँखों से देख सकें। आँखों से न दिखायी देने वाली पर फिर भी अतिमहत्त्वपूर्ण; विज्ञान की भाषा में बोलें तो यह हमारे भौतिक (स्थूल) शरीर का सॉफ्टवेयर है। हमारा भौतिक स्थूल शरीर यानी हार्डवेयर व आत्मा यानी सॉफ्टवेयर। यह हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर एक-दूसरे के पूरक हैं। पर अधिक महत्त्वपूर्ण सॉफ्टवेयर ही है क्योंकि यदि यह निकल गया तो ऊपर से ठीक-ठाक दिखने वाला शरीर वस्तुतः मृत ही हो जाता है कंप्यूटर की तरह ही। यह तो मात्र सरलता से समझने के लिए उदाहरण था। वास्तव में आत्मा का महत्त्व कहीं अधिक है और पूरी तरह से आत्मा को जानने व इसे शुद्ध रूप में प्रकट करने का (यानी इसके ऊपर जमी धूल-गर्त साफ़ करने का) कार्य ही हम अध्यात्मशास्त्र के द्वारा करते हैं। अध्यात्म की भाषा में आत्मा-विषयी अध्ययन को सूक्ष्म का अध्ययन भी कहते हैं व विज्ञान को स्थूल का अध्ययन। अर्थात् शारीरिक व्याधियों या समस्याओं का समाधान हम अधिकांशतः विज्ञानशास्त्र द्वारा करते हैं व आध्यात्मिक (सूक्ष्म की) समस्याओं का समाधान हम अध्यात्मशास्त्र द्वारा करते हैं। अब हम अध्यात्मशास्त्र के विषय को ही आगे बढ़ाते हैं ....

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-९

प्रत्येक मानव का प्राथमिक लक्ष्य और अंतिम लक्ष्य क्या है? केवल और केवल सुख-प्राप्ति। व्यक्ति अपने जीवनकाल में जो कुछ भी करता है, वह सुख पाने के लिए ही। पढ़ाई-लिखाई करता है, व्यवसाय करता है, नौकरी करता है, बड़ा घर बनता है, अच्छा खाता-पीता है; सब इसलिए कि सुख-प्राप्ति हो सके। कुछ लोग सुख पाने के लिए गलत कार्य भी करते हैं (जिनको शायद उनका मन सही समझता है पर अंतरात्मा गलत)। अर्थात् प्रत्येक प्राणी का हर कार्य करने का मूल उद्देश्य सुख-प्राप्ति ही होता है। शायद कुछ लोग कहें कि हम अपने से अधिक दूसरों का ध्यान रखते हैं, हमेशा दूसरों के लिए ही कर्म करते हैं। तो यदि उनसे पूछा जाये, "आप ऐसा क्यों करते हैं?", तो उनका जवाब यही होगा कि मानसिक या आत्मिक सुख पाने के लिए। अर्थात् सभी कृत्यों का मूल उद्देश्य सुख पाना ही है, चाहे वह शारीरिक सुख हो अथवा मानसिक सुख। जैसे टी वी पर कोई फिल्म या कार्यक्रम हम मानसिक प्रसन्नता पाने के लिए देखते हैं। ... पर यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो इतने प्रयास करने के बाद भी क्या स्थाई सुख-शांति हमें मिल पाती है? या क्या वास्तविक सुख-शांति हमें मिल पाती है? बहुत से लोगों का अब यह प्रश्न होगा कि स्थाई सुख-शांति और वास्तविक सुख-शांति, यह सब क्या होता है? अरे हमें सुख तो मिलता ही है बराबर, थोड़ी-थोड़ी देर का सही, पर मिलता तो रहता है।

पर आप सोचिये कि जब आप सोते हैं, छह-आठ घंटे की नींद लेते हैं, तो निद्रावस्था में संभवतः आप तुलनात्मक रूप से अधिक सुख व चैन का अनुभव करते हैं। जब उठते (जागते) हैं तो एक नयी स्फूर्ति व ताजगी का अनुभव करते हैं। अब आप कहेंगे, "क्या अधिक सुख पाने के लिए हमें अधिक सोना पड़ेगा? सोते ही रहेंगे तो स्थूल शरीर की भौतिक आवश्यकताएं हम कैसे पूरी करेंगे? नौकरी-व्यवसाय आदि करना है या नहीं?" .... यह उदाहरण तो केवल समझने हेतु ही था वस्तुतः। यदि हम थोड़ा वैज्ञानिक दृष्टिकोण लगायें समझने के लिए, तो हमें पता चलेगा कि सोते समय हम अपेक्षाकृत अधिक सुख महसूस कर पाए, वह इसलिए क्योंकि निद्रावस्था के दौरान हमारे मन में आने वाले विचारों का प्रवाह थम सा गया था। विचारों का यह अभाव ही हमारे अधिक सुख का कारण था। विचारों का प्रवाह छह-आठ घंटे थमा रहा, तो हम पुनः स्फूर्त या चार्ज हो गए, तरोताजा हो गए। यदि छह-आठ घंटे सोने के बजाय इतनी ही अवधि हम केवल लेटे ही रहें तो क्या हम इतने तरोताजा हो सकते हैं? कभी नहीं। अर्थात् पहली बात यह सिद्ध हुई कि मन में आने वाले विचारों में कमी लाकर हम अधिक स्फूर्ति व चेतना का अनुभव कर सकते हैं। क्या ऐसा जागृत अवस्था में भी संभव हो सकता है? बिल्कुल हो सकता है जब हम आत्मा के स्वरूप को पूरी तरह से जानें, समझें। आगे इसका अध्ययन हम चरणबद्ध ढंग से इस प्रकार से करेंगे - (१) परमात्मा, (२) आत्मा, (३) सूक्ष्म देह या लिंगदेह, (४) इन्द्रिय, आदि के विषय में। क्रम में कुछ बदलाव हो सकता है।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-१०

वैसे तो धर्म पूरी तरह से अनुभूति का विषय है, शब्दों से परे है। फिर भी हम 'सचेतक ब्लॉग' के इस लेख में व अन्य लेखों में भी 'धर्म और अध्यात्म' को शब्दों के माध्यम से समझने का यथासम्भव प्रयास करेंगे। यह ऐसा ही होगा जैसे हम किसी एक ही वस्तु की विभिन्न कोणों से कई तस्वीरें लेकर उसे समझने-समझाने का प्रयास करते हैं। कोण भिन्न-भिन्न होने से किसी को वे तस्वीरें भिन्न-भिन्न वस्तुओं की भी प्रतीत हो सकती हैं, पर वस्तुतः वे एक ही वस्तु की होंगी।

परमात्मा यानी विश्व बल्कि ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च शक्ति, जिसे हम पंथानुसार अलग-अलग नामों से जानते हैं। मूल रूप से यह दिव्य शक्ति निर्गुण निराकार ही है, पर समय-समय पर विश्व के विभिन्न स्थानों पर दुष्टों के नाश व मानव जाति के हितार्थ यह साकार रूप में अनेक बार, अनेक जगह, भिन्न-भिन्न नामों से पृथ्वी पर अवतरित हुई। उनके उपकारों से अभिभूत तत्कालीन लोग या समुदाय तदनुसार उनकी साकार पूजा-उपासना करने लगे और समय बीतते-बीतते लोगों की यह आस्था आगे की पीढ़ियों में भी जारी रही। शायद यही एकमात्र कारण है कि आज उस एक परमात्मा की इतने साकार रूपों में उपासना होती है। हर समुदाय व पंथ अपने-अपने इष्ट को ही अधिक महत्त्व देता है। पर यदि तटस्थ भाव से, साक्षीभाव से, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचें तो इतने सारे इष्ट देवता, सब एक ही हैं, उनमें कोई अंतर नहीं, सिवाय उनके नाम व स्थूल गुणों के।

वास्तव में परमात्मा, परमेश्वर, ईश्वर या प्रभु; शब्दों में हम उसे जो भी कहें, पुकारने के लिए या समझने के लिए, वह एक ही है। हम उसे प्रकृति भी कह सकते हैं। वही इस सृष्टि का रचयिता है। उसकी कृतियों में से एक हम भी हैं। मानव द्वारा बनायी गयी हर वस्तु भी इसी सृष्टि या प्रकृति के पदार्थों से बन पायी है। अबतक प्राप्त ज्ञान के आधार पर हम कह सकते हैं कि संभवतः मानव उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति है। संभवतः मानव को ही इतना अधिक सोचने-समझने की शक्ति, मन व बुद्धि आदि मिले हैं। यदि हम गंभीरता से स्वयं के बारे में सोचें कि ईश्वर ने हमें विभिन्न ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन व बुद्धि क्यों प्रदान किये हैं? तो अन्दर से यही उत्तर मिलेगा कि निश्चित तौर पर केवल अच्छा सोचने, समझने, देखने, सुनने व करने के लिए। क्योंकि अच्छे या सही कार्य अथवा आचरण ही हमें वास्तविक सुख का अनुभव कराते हैं। अध्यात्म में इसी सर्वोच्च सुख को अर्थात् अंतरात्मा को होने वाली अनुकूल संवेदना को हम आनंद कहते हैं। दुःख अर्थात् मन, बुद्धि व शरीर यानी हार्डवेयर को होने वाली प्रतिकूल संवेदना तथा सुख अर्थात् इस हार्डवेयर को ही होने वाली अनुकूल संवेदना। ये स्थायी नहीं होते। पर अंतरात्मा को होने वाली अनुकूल संवेदना को ही हम वास्तविक आनंद कहते हैं, जैसे निद्रावस्था का सुख। अंतरात्मा (आत्मा) का मूल गुण ही सच्चिदानंद है तो फिर प्रतिकूल संवेदना अर्थात् दुःख का अनुभव हमें क्यों होता है? यह समझते हुए भी कि प्रकृति या परमात्मा को हमसे केवल अच्छे कार्य ही अपेक्षित हैं, हम बुरे कार्य भी क्यों करते हैं? इन प्रश्नों का समाधान अब हम खोजते हैं ....

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वास्तव में हमारी आत्मा, परमात्मा का ही एक छोटा सा अंश है। जैसे सागर की एक बूँद। समझने के लिए यहाँ हम शाब्दिक कल्पना का सहारा लेंगे। पृथ्वी या भूलोक पर सृष्टि की रचना हेतु परमात्मा ने अपने विभिन्न चैतन्यमय अंशों को अर्थात् आत्माओं को उसने विभिन्न जीवों को जन्म देकर उनके सॉफ्टवेयर के रूप में उनके स्थूल शरीरों में स्थापित किया। परमात्मा का अभिप्राय यही रहा होगा कि प्रत्येक आत्मा जीव रूप में इस भूलोक पर, जो उसने निर्मित किया, जाकर रहे व आनंदपूर्वक रह कर कुछ सीखे और भूलोक को जीवंत रखे। यानी परमेश्वर ने अपने ही अंशों को, जो निराकार व अदृश्य ही हैं, शरीर रूपी साकार व इन्द्रियों सहित एक साधन प्रदान किया, जिससे वह सूक्ष्म अंश (या आत्मा), स्थूल या भौतिक कार्य करने में समर्थ हो सके। साथ ही साथ वह इस भौतिक जगत् के बारे में जानकारी भी प्राप्त कर सके। वास्तव में इस आत्मा का मूल गुणधर्म भी वही है जो परमात्मा का है अर्थात् सच्चिदानंद (सत्+चित्+आनंद)। पर चूँकि इसे इस भौतिक भूलोक पर भेजा गया, तो एक भौतिक देह भी प्रदान की गयी जिसमें ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के अतिरिक्त मन व बुद्धि भी हैं। पर इस भौतिक शरीर में जीवन होने, या इसके चमत्कारी रूप से सामर्थ्यवान होने के पीछे कारण वह आत्मा ही है, वह सॉफ्टवेयर ही है, जो अब तक विज्ञान के लिए भी पहेली ही है।

वस्तुतः इस पहेली को हम समझते नहीं, आत्मा या परमात्मा के बारे में अधिक कुछ भी नहीं जानते या जानना भी नहीं चाहते और अपने इस भौतिक शरीर के सामर्थ्य के नशे (अहं) में डूबे रहते हैं। जबकि हमको भी भीतर से यह पता होता है कि यह शरीर भी अन्य भौतिक वस्तुओं की तरह ही है और एक दिन समाप्त होना ही है। फिर भी हम राग-द्वेष और अहं के मद् में इतना डूबे रहते हैं कि अपने-आप को यानी इस शरीर को अमर ही समझते हैं या बल्कि यही समझते हैं कि यह भौतिक शरीर यानी मैं। परन्तु वास्तव में मैं तो वह सूक्ष्म शक्ति या आत्मा है जो परमात्मा का ही एक अंश है। यह सब न समझते हुए दिन प्रतिदिन हम स्वार्थी और लोभी होते जा रहे हैं उन सुखों की प्राप्ति के लिए, जो वास्तव में भौतिक व अस्थायी हैं और प्रतिफल में उसी मात्रा में दुःख भी देते हैं, जिनको शायद हम भांप नहीं पाते या ऐसा करना ही नहीं चाहते। क्योंकि हमारा सम्पूर्ण ध्यान या एकाग्रता भौतिक रूप से उन्नति करने में है। भौतिक उन्नति करने में कोई बुराई नहीं, पर पागलों समान उसी के पीछे भागना हमें आनंद की या सर्वोच्च श्रेणी के आत्मिक सुख की प्राप्ति नहीं करा सकता। यदि बहुत अधिक भौतिक सुख हमें वास्तविक आनंद देने में समर्थ होता, तो बड़े-बड़े नेता, व्यावसायिक या नौकरशाह रात में चैन से सोने लिए नींद की गोलियां नहीं लेते या उच्च रक्तचाप, मधुमेह या विभिन्न मानसिक रोगों से पीड़ित नहीं होते, उनकी आकस्मिक मृत्यु न हुआ करती, आदि-आदि। यानी जो जितना भौतिक सुखों के पीछे पागल, उतना ही त्रस्त भी बैचेनी से।

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... पर फिर भी कुछ ऐसे लोग होते हैं जो भौतिक रूप से समृद्ध भी हैं और शांत व सुखी भी। इस प्रकार के लोग बहुधा धर्म मार्ग पर चलते हैं, तभी वे सदैव सहज रह पाते हैं। ऐसे सहज व आनंदित व्यक्ति आपको मध्यम व निम्न वर्ग में भी मिलेंगे। अर्थात् सहजता व आनंदित रहने के लिए धनी होना या कम धनी होना या निर्धन होना, यह सब कुछ भी महत्त्व नहीं रखता। अर्थात् दुःखी लोग भी सभी वर्गों में होते हैं व सुखी लोग भी। अर्थात् अधिक भौतिक समृद्धि इस बात का ठोस आश्वासन नहीं देती कि आप वास्तव में सुखी व आनंदित रहेंगे ही। और साथ ही इनका (धन आदि का) अभाव भी सदैव दुःखों का कारण नहीं होता। अधिकांश व्यक्ति जीवन भर अपने सामर्थ्य, राग-द्वेष तथा दूसरे और भी अहमों के नशे में चूर तो रहते हैं पर वास्तविकता से उनका सामना तब होता है जब वे मृत्युशैया पर होते हैं। यह वह समय होता है जब उनकी आत्मा का साथ भौतिक संसार से, धन से, वैभव से छूट रहा होता है। उस अल्पकाल में उनको यह अहसास होता है कि 'अरे! जीवन भर, इतने वर्ष हम क्या करते रहे; जिनके पीछे पागलों समान दौड़ते रहे वे सब यहीं छूटे जा रहे हैं। वर्षों जिस धन व समृद्धि के लिए मैंने दिन-रात एक कर दिया, वह सब तो यहीं छूटा जा रहा है। इस समय कुछ भी मेरे काम नहीं आ पा रहा है। आह ... यह मैं क्या करता रहा? ... पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और व्यक्ति को कुछ की आशीषों व कुछ की अनिष्ट-कामनाओं के बीच यह नश्वर शरीर छोड़ना ही पड़ता है।

तो क्या अब भी आपको यह महसूस नहीं होता कि हम परमात्मा और आत्मा के स्वरूप को और नज़दीक से जानें। सही व न्यायपूर्ण कार्यों के सम्बन्ध में जानें, जो ईश्वर या प्रकृति हमसे चाहती है, जिसे हम धर्म कहते हैं, धार्मिकता कहते हैं।

हमने कई प्राचीन ग्रंथों में पढ़ा ही है कि पहले मनुष्य की आयु बहुत अधिक होती थी। कुछ ऋषि-मुनियों के सैकड़ों-हजारों वर्ष तप करने व जीवित रहने के भी कुछ दृष्टांत मिलते हैं; पर समय व काल बीतते-बीतते मानव की आयु शनैः-शनैः कम होती गयी और आज वर्तमान कलयुग में तो बहुत कम हो चुकी है। साथ ही हमें यह भी पढ़ने को मिलता है कि पहले के मानव (भारत के) बौद्धिकता व आचरण की दृष्टि से अत्यंत उच्चकोटि के थे, दुष्ट लोग भी थे पर अच्छाई सदैव बुराई पर हावी रही। पर काल बीतते-बीतते अच्छाइयों में, सादगी व सरलता में कमी आती गयी तथा दुष्टता, लोभ, स्वार्थ, द्वेष आदि अवगुण बढ़ते चले गए, जिसके कारण अराजकता बढ़ती चली गयी और आज अब तक के सर्वोच्च शिखर पर है। ये उपरोक्त बातें बुद्धिजीवी व वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले मानते ही हैं। अर्थात् हमने यह पाया कि आदिकाल से वर्तमान काल तक एक चीज़ बढ़ी और एक चीज़ घटी। यानी अराजकता बढ़ती गयी और आयु घटती गयी। इसका तात्पर्य यही है कि दोनों में कुछ पारस्परिक सम्बन्ध है। यदि हम शुद्ध मन व गंभीरता से विचार करते हैं तो यह बात उभर कर सामने आती है -

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सृष्टि की रचना करने वाले परमेश्वर ने मानव को भी बनाया और उसको चलायमान करने के लिए उसके सॉफ्टवेयर के रूप में अपने ही अंशों यानी आत्माओं को उनमें स्थापित किया। जब हम यह कहते हैं कि आत्मा परमात्मा का ही अंश है तो यह भी कह सकते हैं कि इस आत्मा के मूल गुणधर्म परमात्मा के समान ही हैं - सच्चिदानंद। तो हम यह भी कह सकते हैं कि ईश्वर ने मानव को मूल रूप से अपने गुणों के अनुरूप ही बनाया था प्रारंभ में। अर्थात् उत्पत्ति के समय संभवतः ईश्वर ने अपने ही साकार रूप मानव को अमरत्व प्रदान कर चिरकाल के लिए इस भूलोक पर भेजा था। इस साकार रूप को ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि भी प्रदान की थी। और फिर इन सब की मदद से कार्य करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया था अर्थात् कार्यों में कोई हस्तक्षेप नहीं। मानव स्वतंत्र था, और है भी, सभी प्रकार के कार्य करने के लिए। पर उस समय एक ही प्रकार के कार्य होते थे या होते होंगे, केवल अच्छी प्रकृति के ही। परमात्मा का यद्यपि कोई भी हस्तक्षेप नहीं था, तदपि वह मानव से केवल अच्छे कार्यों की ही अपेक्षा करता था क्योंकि मानव उसी का साकार रूप जो था।

एक बात और, कि परमेश्वर ने या प्रकृति ने इस ब्रह्माण्ड में हर चीज, हर क्रिया पूरी तरह से नियमबद्ध कर रखी थी / है। यह बात विज्ञान भी पूरी तरह से मानता है। इसी नियमबद्धता को जानने का प्रयास हम निरंतर करते रहते हैं। जो हम प्रामाणिक रूप से जान जाते हैं, वह विज्ञान की परिधि में आ जाता है। प्रकृति के इन नियमों के अंतर्गत ही हमारी हर क्रिया के फलस्वरूप हमें प्रतिक्रिया प्राप्त होने का नैसर्गिक प्रावधान है। इस भूलोक पर रहते-रहते मानव ने अपनी इन्द्रियों, मन व बुद्धि की मदद से जब प्राकृतिक नियमों के अनुकूल भौतिक रूप से उन्नति करनी आरम्भ की, तो ईश्वर को खुशी ही हुई क्योंकि भौतिक उन्नति होने से अनेक सुख व साधन उपलब्ध हो रहे थे। ये साधन मानव जीवन के लिए अतिउपयोगी थे। इन साधनों से व नित्य नवीन खोजों से मानव को भूलोक पर अधिक सुख-सुविधाएं प्राप्त हो रहीं थीं। प्रारंभिक काल (जिसे हम सतयुग भी कह सकते हैं) में मानव यथासंभव प्राकृतिक नियमों के अनुकूल कार्य करता था। पर कालांतर में उसके मन पर आगंतुक संस्कारों का बनना आरम्भ हो गया और इन प्राकृतिक गुणों के विपरीत संस्कारों से बहुत सी इच्छाएं उठनी शुरू हो गयीं व धीरे-धीरे मानव में अहंकार ने जन्म लिया। इन संस्कारों व अहंवश मानव भ्रम में फंस गया व आत्मा के मूल गुणधर्म के विपरीत आचरण करने लग गया। प्रकृति-नियम विरुद्ध जाने की प्रतिक्रिया स्वरुप परमेश्वरी नियमों ने मानव जीवनकाल को सीमित कर दिया अर्थात् एक आयु के पश्चात् मानवों की मृत्यु होने लगी।

पर चूँकि परमेश्वर बहुत दयालु व न्यायप्रिय है अतः कुछ योग्य (या अयोग्य भी) आत्माओं को पुनर्जन्म के रूप में यह मानव योनि दोबारा या कई बार पुनः प्राप्त होती है, जिससे वे पुनः अपने कर्मों एवं प्रारब्ध की सहायता से उन्नति कर सकें (नोट - प्रारब्ध या भाग्य का निर्माण संस्कारजनित कार्यों पर निर्भर करता है, यह प्रकृति के नियमों के अंतर्गत ही होता है। इनमें से एक नियम है - क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया)। पहले के मानव धार्मिक अर्थात् ईश्वरीय गुणों के अनुरूप कर्म करने वाले थे तो दीर्घायु थी, पर कालांतर में गलतियाँ बढ़ने के साथ-साथ मनुष्य की आयु भी कम होती जा रही है। मन पर अंकित अप्राकृतिक व आगंतुक संस्कारों द्वारा नियंत्रित व घटित कार्य ही इसका व अन्य दुःखों का मूल कारण हैं। अधर्म (प्रकृति-विरुद्ध कार्यों) को कम करने, लोगों को अपने आचरण व उपदेशों द्वारा शिक्षित करने व दुष्टों का नाश करने हेतु परमात्मा (pure soul या शुद्ध आत्मा) ने विभिन्न साकार रूपों में समयानुसार, स्थानानुसार, व समुदायानुसार अनेक बार इस भूलोक पर अवतरण किया, जिन्हें ईश्वर के भिन्न-भिन्न रूपों या नामों से हम आज भी जानते हैं। अधर्म को कम करने के लिए ही समयानुसार, स्थानानुसार, व समुदायानुसार ईश्वरीय प्रेरणा से अनेक धार्मिक ग्रन्थ भी रचित हुए, जो वास्तव में नीति-विषयक ग्रन्थ ही थे और वे सभी तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार लिखे गए। अतः वे सभी ग्रन्थ व ईश्वरीय रूप हमारे लिए समान रूप से पूजनीय हैं; वे सभी समान रूप से श्रेष्ठ भी हैं।

पर पुनः हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि धर्म का स्वरूप तो आरम्भ से एक ही है और वह शुद्ध रूप से चेतना या चैतन्य पर आधारित है व अपरिवर्तनीय है। यह केवल विशेष परिस्थिति में अर्थात् आपद्काल में ही परिवर्तनीय होता है पर अस्थाई रूप से ही, केवल कुछ समय के लिए ही (धर्म रक्षा हेतु, प्राकृतिक संतुलन को पुनर्स्थापित करने हेतु)। अतः यदि हम विभिन्न धर्म-ग्रंथों को देखें, तो वे सभी अलग-अलग तरह के आपद्कालों में मानव के मार्गदर्शन के लिए लिखे गए। अतः वे सभी ग्रन्थ, धर्म और नीति के सम्मिश्रण से बने हैं तथा सर्वकाल हमें कतिपय परिस्थितियों में प्रेरणा तो दे सकते हैं, पर चिरकाल हर परिस्थिति में मार्गदर्शन करने में असमर्थ ही हैं। धार्मिकता को नीति की आवश्यकता नहीं और विभिन्न नीतियाँ अधर्म के प्रकारानुसार ही बनायी जाती हैं। अधर्म अनेकों प्रकार का हो सकता है। यही कारण है कि प्राचीन ग्रंथों में कई विरोधाभास मिलते हैं। धर्म के विषय में वे लगभग एक ही बात कहते हैं, पर नीतियों या नियमों के विषय में अलग-अलग।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-१४

हम फिर से अपने मूल विषय पर आ जाते हैं। .... परमेश्वर ने मानव को प्रथम जन्म में प्रारब्ध-रहित ही भूलोक में भेजा और हमें अपने मन, बुद्धि व इन्द्रियों की मदद से कर्म करने की पूरी स्वतन्त्रता दी (यह स्वतन्त्रता आज भी है)। कालांतर में हमारे अप्राकृतिक कार्यों के कारण धनात्मक व ऋणात्मक संचित का निर्माण हुआ। तो फिर आगामी जन्मों में, हमारे कर्मों द्वारा जनित संचित के अनुसार हमारे अच्छे व बुरे भाग्य (प्रारब्ध) का निर्माण हुआ। यानी अपने भाग्य के निर्माण के लिए हम स्वयं ही उत्तरदायी हैं। इसे अधिक समझने के लिए हमें यह भी जानना उचित होगा कि पूर्व जन्मों के संचित के कारण प्रत्येक अभीष्ट फल के लिए हमारा वर्तमान प्रारब्ध पूर्वनिर्धारित है। सभी प्रकार के अभीष्ट फलों के लिए प्रारब्ध का प्रतिशत अलग-अलग होता है, जिसे कोई भी किसी माध्यम से नहीं जान सकता। और प्रत्येक अभीष्ट फल की प्राप्ति हेतु कुछ कर्म करना भी आवश्यक होता है। तो प्रारब्ध की मात्रा का हमें पता नहीं, कर्म करना हमारे वश में है, तो अभीष्ट फल प्राप्ति के लिए हमें हमारे कर्मों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। कभी-कभी थोड़ा सा प्रयास या कर्म करने पर ही अभीष्ट फल की प्राप्ति हो जाती है, तो कभी-कभी लाख प्रयास करने पर भी हम अभीष्ट फल नहीं प्राप्त कर पाते। यह सब ईश्वरेच्छा नहीं, हमारे अपने ही पूर्व कर्मों द्वारा बने भाग्य का खेल है; हाँ, इसके नियम अवश्य ही ईश्वर या प्रकृति द्वारा लागू किये गए हैं।

किसी भी अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिए कर्म और प्रारब्ध में गुणात्मक सम्बन्ध होता है; पर कर्मों के अनुसार संचित का भी प्रावधान है, जो बाद में प्रारब्ध के साथ ही सम्मिलित हो जाता है। अर्थात् गणित की भाषा में उपरोक्त कथन को हम यूं लिख सकते हैं - [कर्मxप्रारब्ध = फल] या 'कर्म गुणा प्रारब्ध बराबर फल'।

उपरोक्त सूत्र के अनुसार हम एक उदाहरण देखते हैं - मान लीजिये 'अ' और 'ब' दो युवक हैं, दोनों एक ही साथ पढ़ाई कर रहे हैं और लगभग समान अंकों से उत्तीर्ण भी हो रहे हैं हैं। उनका मानसिक व बौद्धिक स्तर भी उनके अध्यापक लगभग एक जैसा बताते हैं। वे दोनों ही डॉक्टर बनना चाहते हैं। वे दोनों मेडिकल प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं। 'अ' का चयन पहले प्रयास में ही हो जाता है, पर 'ब' का चयन लगातार पांच प्रयासों के बाद होता है और मान लीजिये उनके समतुल्य कोई 'स' भी है, अथक प्रयासों के बाद भी जिसका चयन नहीं हो पाता; और बाद में आयु-सीमा निकल जाने के बाद वह स्वयं का एक व्यवसाय खोलता है और उसकी दाल-रोटी उसी से चलने लगती है। तीन लगभग एक से मेधावी छात्रों के साथ यह अलग-अलग न्याय क्यों हुआ? 'अ' का प्रारब्ध डॉक्टर बनने के १००% था, अतः उसे एक ही प्रयास या कर्म करना पड़ा अर्थात् [१x१०० = १००] सूत्र [कर्मxप्रारब्ध = फल] के अनुसार; 'ब' का प्रारब्ध २०% था, अतः उसे पॉँच गुना प्रयास या कर्म करना पड़ा अर्थात् [५x२० = १००]; 'स' का प्रारब्ध इस जन्म में डॉक्टर बनने के लिए संभवतः शून्य था, अतः अथक परिश्रम व अनेक प्रयास (माना १० प्रयास) करने बाद भी वह डॉक्टर नहीं बन पाया अर्थात् [१०x० = ०].

पर पहले से प्रारब्ध किसी को पता नहीं चल सकता। केवल अभीष्ट कार्य के हो सकने की निश्चित समय सीमा निकल जाने के बाद ही यह पता चल पाता है कि वस्तुतः यह तो मेरे भाग्य में था ही नहीं। डॉक्टरी की प्रवेश परीक्षा हेतु अधिकतम आयु सीमा निकल जाने के बाद ही 'स' को ज्ञात हो पाया कि डॉक्टर बनना उसके भाग्य में नहीं इस जन्म में।

'ब' को भी पहले से प्रारब्ध का कोई भान नहीं था। यदि तीन-चार प्रयासों के बाद वह हिम्मत हार जाता, तो वह भी डॉक्टर न बन पाता, क्योंकि प्रारब्धानुसार उसे पांच प्रयास करने ही थे।

अतः हमने यह पाया कि किसी भी अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिए हम कर्म और प्रारब्ध, दोनों पर समान रूप से आश्रित हैं। पर चूँकि प्रारब्ध हमें ज्ञात नहीं हो सकता और कर्म करना हमारे हाथ में है, तो फिर हमें कर्म को ही अधिक महत्त्व देना अनिवार्य हो जाता है। हमारे समस्त कर्म हमारे दिव्य स्वरूप के मूल गुणों के अनुरूप कैसे संभव हों, यह हम बाद में देखेंगे।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-१५

... इससे पहले हमने चर्चा की थी मन, बुद्धि, अहं व संस्कारों की। अब हम इनके बारे में और गहराई से जानने का प्रयत्न करते हैं - ... ईश्वर ने हमें ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, मन एवं बुद्धि के साथ यह जो भौतिक शरीर प्रदान किया है, समझने के लिए उसे दो भागों में विभक्त करके देखते हैं - (१) स्थूल देह, (२) लिंग देह (आन्तरिक देह) या जीव; ... स्थूल देह में वे सारी चीजें आ जाती हैं जिन्हें हम परोक्ष रूप से देख सकते हैं, छू सकते हैं, व अनुभव कर सकते हैं; जैसे हमारा स्थूल शरीर, इसकी पॉँच कर्मेन्द्रियाँ - हाथ, पांव, वाणी या मुख, जननेंद्रिय एवं गुदा। पांच ज्ञानेन्द्रियाँ - कान, नाक, आँख, जीभ एवं त्वचा। तथा इस शरीर के भीतर स्थित सभी अंग-प्रत्यंग आदि भी स्थूल देह के अंतर्गत ही आते हैं। स्थूल देह से सम्बंधित लगभग सभी बातों से हम भली-भांति परिचित हो चुके हैं, अर्थात् यह विज्ञान की परिधि में आ चुका है व वैज्ञानिक उपायों से इनकी देख-रेख हम भली-भांति कर सकते हैं।

अब हम चर्चा करते हैं लिंग देह की, जो सूक्ष्म है, आँखों से नहीं दिखाई पड़ती और विभिन्न अनुसंधानों व खोजों से इसे थोड़ा-बहुत जान पाए हैं। सूक्ष्म देहों में केवल मन एवं बुद्धि ही ऐसे हैं, जिन्हें विज्ञान आंशिक रूप से समझ पाया है, क्योंकि कुछ हद तक ये स्थूल मस्तिष्क (brain) से सम्बन्ध रखते हैं। अतः हम देखते हैं कि अनेक मानसिक कष्टों / बीमारियों का इलाज हम वैज्ञानिक रीतियों से कर सकते हैं। पर लिंग देह के कई और भी भाग हैं, जिन्हें हम केवल अध्यात्म अर्थात् सूक्ष्म के ज्ञान से ही समझने का प्रयास कर सकते हैं। शब्दों में व्यक्त करें तो - .. वर्तमान में लिंग देह के दो घटक हैं - (१) आत्मा, (२) अविद्या (सृष्टि के आरम्भ में एक ही घटक था - वह था आत्मा)।

'आत्मा' लिंगदेह या आतंरिक देह का प्रमुख घटक है। आत्मा का मूल गुणधर्म है - सच्चिदानंद (सत्+चित्+आनंद)। सत् अर्थात् सदैव रहने वाला, चित् अर्थात् चैतन्यमय तथा आनंद अर्थात् सुखमय। यह परमात्मा का ही एक अंश है। वर्तमान में इस आत्मा के चारों ओर जो एक आवरण है, उसे अविद्या कहते हैं। पुनः अविद्या के चार प्रमुख घटक हैं - (१) मन (वाह्य मन), (२) चित्त (अंतर्मन), (३) बुद्धि, (४) अहं। अहं अर्थात् जीव को परमेश्वर से भिन्न समझना। मन का कार्य संकल्प या विकल्प तलाशना है व बुद्धि उनमें से एक को चुनती है। बुद्धि को हम विवेक भी कहते हैं। बुद्धि अंतर्मन में विद्यमान बड़े संस्कारों या वृत्ति पर निर्भर है। अध्यात्म में मन एवं बुद्धि को भी वाह्य माना जाता है, बस आत्मा को ही आन्तरिक माना जाता है। पर चूँकि मन एवं बुद्धि आत्मा के चारों ओर अविद्या का आवरण निर्माण करने के लिए उत्तरदायी हैं, अतः इनका भी अध्ययन हम अध्यात्म के अंतर्गत करते हैं, जिससे इनके कुप्रभावों को हम आध्यात्मिक उपायों द्वारा कम या दूर कर सकें। इनका प्रभाव दूर करने पर ही वस्तुतः हमारी सूक्ष्म देह (या आत्मा) अपने शुद्ध मूल दिव्य रूप में प्रकट होगी; तब हम वास्तव में धर्म मार्ग पर चल सकेंगे, क्योंकि आत्मा के तीन मूल गुणधर्म में एक 'चैतन्य' है। यह चैतन्य ही हमारे स्थूल देह के माध्यम से धर्म का पालन कराने में समर्थ है। केवल यह चैतन्य ही स्वतः धर्म या धार्मिकता को प्रकट करता है। आगे हम लिंगदेह-अंतर्गत अविद्या के उपरोक्त उल्लिखित घटकों, विशेषतः मन के विषय में और जानकारी लेते हैं ....।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-१६

शाब्दिक कल्पना के अनुसार, हम जिसे मन कहते हैं, वह दो भागों में बँटा है - (१) वाह्य मन, (२) अंतर्मन या चित्त। वाह्य मन का आकार छोटा व अंतर्मन (चित्त) का आकार अपेक्षाकृत काफी बड़ा होता है। वर्तमान काल में सामान्य व्यक्ति की आत्मा के चारों ओर अविद्या का घना आवरण होने के कारण हमारी कर्मेन्द्रियों द्वारा किये जाने वाले अधिकांश कार्य इस अविद्या के घटक 'मन' के निर्देशानुसार ही होते हैं। आत्मा से निर्देश-स्पंदन कर्मेन्द्रियों तक जा ही नहीं पाते, क्योंकि अविद्या का घना आवरण जो है आत्मा के चारों ओर। तो फिर मन से हमारी कर्मेन्द्रियों को कार्य करने का निर्देश कैसे जाता है?, अब हम यह देखेंगे -

क्रिया का स्वरूप -

(१) बाहर से स्पंदन ज्ञानेन्द्रियों (आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा) के माध्यम से अंतर्मन में जाते हैं (वाह्य मन से होते हुए)। इन्हें सूचना स्पंदन कह सकते हैं।
(२) स्पंदन भीतर पहुँचने पर तदनुसार अंतर्मन में संस्कार (impression) बनता है (संस्कार पहले से भी हो सकता है)।
(३) अंतर्मन में बने संस्कार से पुनः स्पंदन (विचार) वाह्य मन में जाते हैं। इन्हें क्रिया-विचार स्पंदन कह सकते हैं।
(४) क्रिया-विचारों के वाह्य मन में पहुँचने के बाद, तदनुसार यहाँ से कर्मेन्द्रियों को कार्य हेतु निर्णायक निर्देश जाता है। और फिर उन्हीं निर्देशों के अनुसार कार्य होता है।

हमारे अंतर्मन में अनेक छोटे-बड़े संस्कार हैं, लगातार कुछ नए भी बनते रहते हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी कार्य के लिए जिम्मेदार संस्कार, उस कार्य के समाप्त होने के बाद नष्ट नहीं होता; तथा बाद में जब-जब उस संस्कार-अनुरूप स्पंदनों का आदान-प्रदान पुनः होता है, तो वह संस्कार और भी अधिक बड़ा हो जाता है।

अब हम यह सोचेंगे कि यदि हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों से काम लेना बंद कर दें यानी आँख, कान, नाक आदि बंद कर लें, तो क्या किसी कार्य के लिए विचार नहीं आयेंगे? ... विचार तो अब भी आयेंगे, क्योंकि अब वे अंतर्मन में विद्यमान संस्कारों (impressions) से आ रहे हैं। अविद्या का तीसरा घटक 'बुद्धि' बड़े संस्कारों व उनसे बनी वृत्ति के ऊपर निर्भर है। वे जैसे होंगे, सात्त्विक, राजसिक या तामसिक, हमारी बुद्धि भी कमोवेश वैसी ही होगी। उपरोक्त घटकों के कारण अविद्या का चौथा घटक अहं बना, अर्थात् स्वयं को परमात्मा से भिन्न मानना। मन के विषय में और अधिक जानकारी हम इस ब्लॉग के ही एक अन्य लेख "मन" में लेंगे।

(धर्म और अध्यात्म) पृष्ठ-१७

अब प्रश्न यह उठता है कि जब तक आत्मा के चारों ओर अविद्या का घना आवरण है, हमारी चैतन्यमय आत्मा के निर्देश (जो वस्तुतः धर्म ही है) हमारी कर्मेन्द्रियों तक कैसे पहुँचेंगे? ये निर्देश केवल तब ही पहुँच सकते हैं जब अविद्या का आवरण टूटे। एकाग्रता व अन्य साधन-साधनाओं से यह बीच-बीच में थोड़ा टूटता भी है, जब हमें यह अनुभूति होती है कि काफी भीतर से कोई दिव्य सन्देश आ रहा है, जो हमें सत्य (धर्म) प्रतीत होता है। पर चूँकि हमारी वृत्ति इसके विपरीत है, अतः हम ऎसी अनुभूतियाँ बहुत कम ही ले पाते हैं। आत्मा के चारों ओर जो अविद्या का आवरण है, उसके घटकों का नाश करना ही प्रथम आवश्यक है। यदि यह कार्य चरणबद्ध व नियोजित ढंग से किया जाए, तो सभी के लिए यह संभव है। यह सब केवल गहन आत्मिक चिंतन-मनन व शुद्ध आध्यात्मिक साधना करने अर्थात् चिंतन-मनन के बाद तदनुसार प्रभावी रूप से कृत्य करने अर्थात् उसे रोजमर्रा के जीवन में कड़ाई से लागू करने से ही संभव हो सकता है। अध्यात्म केवल पढ़ने, सुनने या समझने का शास्त्र नहीं है, बल्कि यह सब करके अमल में लाने का शास्त्र है। यही यथार्थ आध्यात्मिक साधना है। इसलिए मैंने पहले भी चर्चा की थी कि अन्य नीतियाँ, जो पहले प्रभावी थीं, वर्तमान समय में लगभग निष्प्रभावी हैं। वर्तमान काल में संभवतः एक ही नीति प्रभावी हो सकती है, वह है अध्यात्म-प्रसार की नीति। ऎसी शुद्ध नीति, जो मानव को उसकी आत्मा (वास्तविक अस्तित्व) से परिचित करा सके। क्योंकि धर्म उसी में निहित है, या वह साक्षात् धर्म ही है। आत्म-साक्षात्कार से ही वस्तुतः धर्म की पुनर्स्थापना होगी। मैं मानता हूँ कि यह एक कठिन कार्य है, पर असंभव नहीं। इति।