Tuesday, May 31, 2011

(४९) परिपक्वता- कुछ और तथ्य...

पिछले कुछ लेखों में हमने सर्वांगीण रूप से विकसित व प्रौढ़ होने के संदर्भ में अनेक तथ्यों पर गौर किया। उसी क्रम में कुछ और तथ्य प्रस्तुत हैं। विश्व में बल्कि ब्रह्माण्ड में जितनी दूर तक हमारी दृष्टि व अवलोकन की पहुंच है, उसके अनुसार वैदिक ज्ञान प्राचीनतम ज्ञान है। मात्र उसी के विषय में कहा जाता है कि उसका रचियता कोई नहीं है; वह सिद्धांत रूप में सदा से ही ब्रह्माण्ड में विद्यमान था; हमारे कुछ प्राचीन ऋषियों ने उन सिद्धांतों को क्रमशः प्रत्यक्षतः अनुभूत किया व अपने शिष्यों को भी बताया। इस प्रकार धीरे-धीरे वह ज्ञान आगे की पीढ़ियों में अग्रसारित होता गया। संभवतः यह दुनिया का अकेला ऐसा शास्त्र है जिसका रचियता कोई मानव, संत, पैगम्बर या ऋषि नहीं वरन स्वयं ईश्वर हैं, ऐसा माना जाता है। हिंदु मतानुसार वेद अनादि तथा अनंत हैं। इन वेदों का भी यदि हम समग्र रूप से एवं निष्पक्ष या तटस्थ भाव से अवलोकन करें तो पाएंगे कि समय के साथ-साथ इनमें भी परिपक्वता आती गई। वेदों के आरंभिक भाग में जहां विविध कर्मकाण्डों को प्रधानता दी गई है, वहीं वेदों के शीर्ष भाग अर्थात् वेदान्त या उपनिषद् में सूक्ष्म आध्यात्मिक साधना पर बल दिया गया है। अर्थात् हम देखते हैं कि आरंभ में ईश्वर ने भी मनुष्य को साधना की ओर उन्मुख करने के लिए प्रथमतः स्थूल साधनों को अपनाने को कहा, जिससे उचित भाव की निर्मिति सहजता से संभव हो सके; और भाव निर्मिति हो जाने के पश्चात् ईश्वर ने मनुष्य को क्रमशः अगली कक्षाओं में जाने के लिए तैयार किया और इसके लिए साधना-पद्धति को क्रमशः विकसित एवं सूक्ष्म किया; और वेदान्त में यह सूक्ष्मता संभवतः अपने चरम पर थी। इस प्रकार हमने देखा कि ईश्वर ने जड़-बुद्धि मनुष्य को विकसित एवं परिपक्व करने हेतु एक योजनाबद्ध सैद्धांतिक कार्यक्रम को कुछ ऋषियों की अनुभूतियों के माध्यम से प्रकट किया। और ईश्वर की यह योजना स्पष्ट रूप से हमें प्रगति की राह दिखाती है। एक जड़-बुद्धि या आरंभिक स्तर पर खड़े साधक को ज्ञान पाने का क्रम निम्नतम कक्षा से ही आरंभ करना होता है। वहीं से प्रारंभ कर उसे क्रमशः ज्ञान की उच्चतर कक्षाओं में जाना होता है। इस 'आध्यात्मिक ज्ञान विश्वविद्यालय' में किसी भी समय विशेष पर कोई साधक किसी आरंभिक कक्षा में ही है, तो कोई अन्य साधक उससे काफी ऊपर की कक्षा में है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है; हर किसी को निरन्तर ज्ञान की ऊपरी कक्षा में जाना ही होगा, वह जाएगा ही, इसका सतत प्रयत्न व इसपर विश्वास हर किसी को होना चाहिए। आगे को बढ़ते हुए हमें कुछ चीजों को पीछे छोड़ना ही पड़ता है, त्यागना ही पड़ता है। यहां छोड़ने या त्यागने का अर्थ यह नहीं कि हम उससे घृणा करके या उसे तुच्छ जानकर ऐसा कर रहे हैं वरन यह कि आगे बढ़ने के क्रम में एक साधन का कार्य समाप्त हो जाने पर हम उसे धन्यवाद देते हैं, उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, और फिर उससे अधिक परिष्कृत साधन का अवलंबन लेकर आगे को अग्रसर होते हैं। यदि हमारा ज्ञान ठोस है और हम निश्चित रूप से परिपक्वता की ओर अग्रसर हैं, तो हम त्याग दिए गए साधन के प्रति कोई हीन या तुच्छ भावना कदापि नहीं रखते हैं। क्या सामान्य स्कूली शिक्षा में हम ऐसा तुच्छ दृष्टिकोण रखते हैं? कदापि नहीं! वहां प्राथमिक शिक्षा के लिए अति सामान्य पाठ्यक्रम होता है और उच्चतर कक्षाओं के लिए अपेक्षाकृत अत्यधिक परिष्कृत पाठ्यक्रम होता है; इसके बावजूद कभी भी किसी भी विद्यार्थी के मन में कोई उच्च या निम्न भावना नहीं पनपती है। नीचे की कक्षा का छात्र जानता है कि एक दिन वह भी ऊपर की कक्षा में पहुंचेगा और वहीं ऊपर की कक्षा का छात्र भी भली-भांति यह जानता है कि वह भी निम्नतर कक्षाओं को पार करता हुआ चरणबद्ध ढंग से ऊपर तक पहुंचा है। सीनियर एवं जूनियर, सभी एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं; परस्पर अनोखा सौहार्द रहता है। .... परन्तु आज धर्म या अध्यात्म के क्षेत्र में क्या ऐसा है??

धर्म के क्षेत्र में पता है क्या हो रहा है?? वहां आज ज्ञान के शिखर पर पहुंचे हुए ऐसे व्यक्ति बहुत ही कम हैं जो अन्य स्तरों पर खड़े लोगों के प्रति सहिष्णु रह सकें! अधिकांश व्यक्ति आज ज्ञान की निम्नतम, निम्नतर या मध्यम कक्षाओं में हैं और संभवतः कोई विरला ही होगा जो 'आध्यात्मिक ज्ञान विश्वविद्यालय' के वास्तविक उदार चरित्र, नियमावली और भाईचारे के नियमों से भली-भांति परिचित हो! आखिर हम क्यों नहीं समझते कि यह 'आध्यात्मिक ज्ञान विश्वविद्यालय' भी सामान्य जागतिक विषयों के एक महाविद्यालय की भांति ही है! जिस प्रकार एक बड़े या विशाल महाविद्यालय में प्राथमिक कक्षाओं से लेकर विविध विधाओं पर आधारित उच्चतर पाठ्यक्रम भी रहते हैं; कोई प्राथमिक कक्षा में है, कोई माध्यमिक में, तो कोई डॉक्टरी पढ़ रहा है, कोई इंजीनियरिंग, तो कोई अन्य कोई कोर्स कर रहा है। सब अपने-आप में मगन हैं, सब जानते हैं कि अपनी-अपनी भूमिका का निर्वहन वे भली-भांति कर रहे हैं। प्रत्येक को अपनी पढ़ाई, अपनी कक्षा, अपनी विधा आदि पर गर्व है। गर्व है, परन्तु घमंड नहीं! इसीलिए वे सब एक परिवार की भांति रहते हैं, मिलजुल कर, एक-दूसरे का ध्यान रखते हुए। अहं का कोई भी टकराव नहीं होता है उनके मध्य! .... परन्तु धर्म के क्षेत्र में लोगों के विविध कृत्यों को समग्र रूप से यदि 'आध्यात्मिक ज्ञान विश्वविद्यालय' की विविध कक्षाओं के रूप में देखा जाए तो आज हमें यहां किसी भी प्रकार के भाईचारे या सौहार्द के दर्शन नहीं होते। इसके लिए इस विश्वविद्यालय के अध्यापक, लेक्चरर, प्रोफेसर, प्रधानाचार्य, प्रबंधक, अभिभावक आदि प्रमुख रूप से दोषी हैं। कदाचित् ये सब स्वयं ही इन पदों के योग्य नहीं हैं, या हों भी तो भी इतना तो निश्चित है कि ये अपनी-अपनी भूमिकाओं व कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन नहीं कर रहे हैं। आज इस 'आध्यात्मिक ज्ञान विश्वविद्यालय' में घनघोर अव्यवस्था का साम्राज्य है। अध्यापन का स्तर इतना गिरा हुआ है कि कई-कई वर्षों से विद्यार्थी एक ही कक्षा में ही रुके हुए हैं, उत्तीर्ण होकर अगली कक्षाओं में जा ही नहीं पा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि विद्यार्थियों में प्रतिभा की कमी है, अपितु वहां ऐसा कोई भी मार्गदर्शक नहीं है जो उनको अगली कक्षाओं का महत्व समझा सके। सभी गुरु निम्नतर कक्षाओं में ही अपने शिष्यों को यह घुट्टी पिला रहे हैं कि उनके लिए यही कक्षा सर्वश्रेष्ठ है, सालों-साल इसी कक्षा में रहकर ही वे डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त कर लेंगे! वे शिष्यों को समझाते हैं कि अन्य कक्षाएं या पाठ्यक्रम बिलकुल निम्न या निकृष्ट हैं, उनके विद्यार्थियों के समीप भी न जाओ! शिक्षा व शिक्षण को सूक्ष्मतर करने के बजाय वे इसको निरन्तर स्थूलता की ओर ढकेल रहे हैं; कारण एक ही है कि वे नहीं चाहते कि उनका प्रभुत्व कम हो। प्रभुत्व कम होगा तो धन और यश का मिलना भी तो कम हो जाएगा!

परन्तु ऐसा नहीं है! सामान्य भौतिक शिक्षण की श्रेष्ठ संस्था (स्कूल-कॉलेज) में हम देखते हैं कि वहां का प्रशासन प्राइमरी कक्षाओं के अध्यापकों को उच्चतर कक्षाओं के अध्यापकों से कम वेतन या कम मान-सम्मान नहीं देता है। वहां के विद्यार्थी भी सभी शिक्षकों के लिए समान रवैया रखते हैं, बल्कि कुछ मामलों में तो प्राथमिक कक्षाओं के शिक्षकों को अधिक मान-सम्मान मिलता है, क्योंकि यह माना जाता है कि बच्चे की जड़ों को मजबूती प्राथमिक शिक्षक ही देते हैं। यह सब इसलिए होता है क्योंकि देने और पाने का मोल सब जानते हैं। शिक्षकों को बिना मांगे सबकुछ मिल जाता है और विद्यार्थी व अभिभावकों के मन में शिक्षक के प्रति कृतज्ञता स्वतः ही उमड़ती है। क्रिया के फलस्वरूप एवं क्रिया के अनुसार प्रतिक्रिया निश्चित होती है, संभवतः अधिकांश भारतीय आध्यात्मिक गुरु यह भूल गए हैं! आज वे प्रतिक्रियात्मक लाभ जबरन अपने स्वार्थानुसार पाना चाहते हैं, इसीलिए उनके मन, विचार और कृत्य इतने संकुचित हैं। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई में हम देखते हैं कि कोई शिष्य अपने अध्यापक से भी आगे निकल जाता है, उनसे भी योग्य व ऊंचे पद पर पहुंच जाता है, तदपि वह अपने अध्यापक को नहीं भूलता; और अध्यापक को भी अपने ऐसे शिष्यों पर सदैव गर्व रहता है, समय आने पर अक्सर वे निःसंकोच अपने भूतपूर्व शिष्यों से परामर्श मांगने जाते हैं! धर्म या अध्यात्म के क्षेत्र में आपने विगत कुछ वर्षों में ऐसा सुना है क्या?? .... सब मिलेगा और बढ़कर मिलेगा, शर्त बस यह है कि पहले कुछ दिया जाए! .... रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बल पर अधिक फसल तो प्राप्त की जा सकती है, परन्तु उससे प्राप्त अनाज गुणविहीन या हानिकारक ही होगा! कुछ उत्तेजक औषधियां और अनाप-शनाप व्यायाम हमारे शरीर-सौष्ठव को आकर्षक तो बना सकते हैं, परन्तु भीतर से हमारा शरीर खोखला होता जाएगा। आज जनभावनाओं को भड़काकर विभिन्न सम्प्रदाय स्वयं को विशाल और सामर्थ्यवान बनाने की चेष्टा अवश्य कर रहे हैं, परन्तु उनके इस कृत्य से जनसाधारण आध्यात्मिक रूप से निरन्तर पतन की कगार पर जा रहा है। परिपक्वता की स्थिति में तो सहिष्णुता बढ़ती है, परन्तु आज वह घट रही है तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि हम पुनः शैशवावस्था की ओर जा रहे हैं। आपको याद होगा कि पहले के समय में प्रचलन के बिलकुल विरुद्ध कुछ कहने वाले को भी कौतूहल की दृष्टि से देखा जाता था और लोग उसकी बात सुनते थे, समझ में आने पर मान्य भी करते थे; उसकी आवाज को बलात् दबाया नहीं जाता था। उदाहरण के लिए- कर्मकाण्ड आधारित आरंभिक वेद शिक्षा के प्रत्ययन के कुछ उपरांत उद्भवित ज्ञानकाण्ड आधारित वेदान्त/उपनिषद् शिक्षाएं, बुद्ध द्वारा निरीश्वरवाद की शिक्षा देने के बावजूद तत्कालीन हिंदुओं द्वारा उन्हें विष्णु का अवतार घोषित करना, बाइबल के पुराने नियम के बाद यीशु मसीह की शिक्षाओं पर आधारित नया नियम प्रतिपादित होना और उसे प्रचंड सामाजिक मान्यता मिलना, चार्वाक जैसे ऋषि को भी सम्मान मिलना, गुरुनानकदेव जी की वेदान्त आधारित शिक्षा को अपार समर्थन मिलना, कबीर की निर्भीक, कटाक्षपूर्ण एवं निर्गुण भक्ति आधारित शिक्षाओं को हृदयों में बड़ा स्थान मिलना आदि। यह सब इसलिए सम्भव हुआ कि उस समय के धार्मिक अगुवा अपेक्षाकृत परिपक्व थे। परन्तु आज रूढ़िवादिता इतनी बढ़ गई है कि सत्य को प्रकाशित करने वाले व्यक्ति को तथाकथित स्वयंभू धर्मरक्षकों के हिंसात्मक विरोध का सामना करना पड़ता है। हमारे वर्तमान धर्मगुरु नवीन आचार पद्धतियों या विकास के कट्टर विरोधी हैं। वे नवान्वेषी सत्यों या वेदान्त सरीखे पुरातन सत्य-स्रोतों से दूर भागते व भगाते हैं, उनकी सदैव निंदा करते हैं और इस प्रकार आध्यात्मिक विकास को अवरुद्ध करने का कार्य कर रहे हैं। उदाहरण के लिए हाल ही में एक निर्भीक संत को एक तथाकथित धर्मरक्षक ने इसलिए शारीरिक आघात पहुँचाया क्योंकि उन्होंने कहा था कि "अमरनाथ में बनने वाला बर्फ का शिवलिंग एक स्वाभाविक प्राकृतिक क्रिया है, उसमें चमत्कार जैसा कुछ भी नहीं।" यह बिलकुल सत्य है और इसका वैज्ञानिक आधार भी है, यह हमारी सरकार भी जानती है और अमरनाथ की प्रबंधक संस्था भी। फिर भी कुछ वर्ष पूर्व प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक रूप से शिवलिंग न बन पाने की दशा में कृत्रिम रूप से शिवलिंग का निर्माण कराया गया। एक ही बार इस प्रकार का रहस्योद्घाटन हो पाया, परन्तु पता नहीं कितनी बार....!? आस्था को जीवित रखने के इस प्रकार के प्रयास को आप क्या कहेंगे?? आखिर हम कब अध्यात्म के मूल भाग को जानेंगे?? कब तक हम निवृत्त हो चुके गौण भागों को पकड़े रखेंगे?? हम कब परिपक्व होंगे?? इति।

Saturday, May 7, 2011

(४८) प्रौढ़ता

पीछे हमने चर्चा की थी (मिलीजुली बातें - १ में), कि "हमें क्रमशः प्रौढ़ (परिपक्व) होना चाहिए। हमारी साधना भी हमारी मानसिक व बौद्धिक प्रौढ़ता के साथ-साथ प्रौढ़ होनी चाहिए। विद्यालय में एक ही कक्षा में वर्षों तक बैठे रहना ठीक नहीं!" उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहना चाहूँगा कि आखिर आज तक हमें यह ठीक से पता क्यों नहीं चल पाया कि हमारे देवताओं, इष्टों और उनकी प्रेरणा से रचित धर्मग्रंथों की शिक्षाओं में भेद क्यों हैं!? पिछले कुछ वर्षों से विज्ञान की प्रगति की अपेक्षा आध्यात्मिक ज्ञान की प्रगति बहुत ही कम हुई है। हम साधना की पुरानी रूढ़ियों में ही अटके हुए हैं, जड़ हैं, और विस्थापन या उन्नति चाहते ही नहीं शायद!!

यदि हम मनुष्य के मानसिक एवं बौद्धिक विकास पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि हम पहले की तुलना में अत्यधिक उन्नत हो चुके हैं, हमारा भौतिक जीवन-स्तर पहले की अपेक्षा बहुत ऊपर आ गया है; लेकिन हमारे आध्यात्मिक ज्ञान का क्या?? वहां तो हम स्थिर हैं या पहले की तुलना में पतन ही हुआ है हमारा! पिछले कुछ वर्षों में पुराने अन्धविश्वास बढ़ते-बढ़ते विभिन्न विधि-विधानों की विपुल राशि के रूप में परिणत व स्थापित हो गए हैं। उन्हें छाती से लगाये विभिन्न सम्प्रदाय अपने में ही मदमस्त हैं और अन्य मतावलम्बियों के प्रति शंकालु एवं असहिष्णु रहते हैं, उनके मतों में कमजोरियां व विरोधाभास खोजते रहते हैं।

विभिन्न धार्मिक शिक्षाओं में वाह्यतः अनेकों भेद एवं विरोधाभास क्यों रहे, इसे समझने के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत है -- हमारा कोई बहुत छोटा सा भाई-बहन अथवा संतान आदि है। हम आमतौर पर उससे क्या अपेक्षा करते हैं? यदि हम उसे बिलकुल अपना समझते हैं तो यही अपेक्षा करते हैं कि वह ठीक रास्ते पर चले, उसके विचारों व कार्यों में उत्कृष्टता रहे, कमी व अति से बचते हुए वह सदैव 'संतुलित' व्यवहार करे। यहां 'संतुलित' शब्द पर इसलिए जोर दिया कि इसमें सब कुछ शामिल हो जाता है। इसके लिए हम 'आमतौर' पर क्या प्रयत्न करते हैं? ... जब वह बहुत छोटा बच्चा होता है तो उसे योग्य कार्य करने के लिए प्रेरित करने हेतु 'उसके' स्तर पर जाकर प्यार से समझाते हैं; उससे अच्छा कार्य करवाने के लिए कभी टॉफी, गुब्बारे, खिलौने आदि जैसे पुरस्कार का प्रलोभन भी देते हैं; और कभी अत्यधिक जिद करने पर या कहना न मानने पर उसे धमकाते भी हैं कि तुम्हें चूहे, बिल्ली या कटखने बन्दर वाली कोठरी में बन्द कर देंगे! यद्यपि परितोष का लोभ एवं दंड का भय दिखाना गलत है, और हम यह समझते भी हैं; तद्यपि हम ऐसा करते हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि हम ये सब इसलिए कर रहे हैं कि हमारी संतान आगे जाकर योग्य व संतुलित बने। कोई पूर्वाग्रह नहीं होता है हमारे मन में। .... लेकिन कुछ वर्षों बाद अब वह बच्चा कुछ बड़ा हो चुका है। अब वह जानता है कि कोठरी में कोई कटखना चूहा, बिल्ली या बन्दर नहीं है; आपके परितोष रूपी हथकंडों से भी वह परिचित हो चुका है| अर्थात् उसका बौद्धिक व मानसिक विकास पहले की तुलना में कुछ उन्नत हो गया है। अब आपके समझाने के तौर-तरीके बदल जाते हैं, वे भी कुछ परिपक्व हो जाते हैं! पर समझाने का लक्ष्य, आशय या उद्देश्य तब भी वही है कि संतान योग्य व संतुलित बने। ..... फिर एक दिन आपकी संतान व्यस्क हो जाती है; अब उसका बौद्धिक व मानसिक स्तर काफी बढ़ चुका है। अब आप उसे मित्रवत् समझते हैं; आपके समझाने में पारदर्शिता होती है, सत्य का आलंबन होता है; क्योंकि आपको पता है कि बचकानी हरकतें अब नहीं चलेंगी, व्यवहार में प्रौढ़ता लानी ही पड़ेगी, अन्यथा दाल नहीं गलेगी! यानी हमने देखा कि समय के साथ-साथ हमारी वाह्य क्रियाएं बदलती चली गयीं, परन्तु हमारा मूल उद्देश्य वही रहा कि हमारी संतान क्रमशः प्रौढ़ बने, संतुलित बने।

पहले भी और अब भी, जब कभी भी आपकी संतान का संतुलन बिगड़ने को हुआ, उसके व्यवहार में, आचरण में, किसी बात की कमी या अति दिखाई दी तो आपने तुरंत योग्य कदम उठाया। परिस्थिति अनुसार कभी नरम तो कभी गरम! जब कभी किसी कर्म विशेष के लिए हमारी संतान सुस्त दिखती है तो हम उसका उत्साह बढ़ाते हैं, उसे वह करने के लिए उकसाते हैं; और कभी-कभी उसके प्रयासों में जान फूंकने के लिए हमारे उकसाने का परिमाण बहुत अधिक हो जाता है। यद्यपि ऐसा करना समय की मांग होती है, परन्तु कभी-कभी इसका दुष्परिणाम भी देखने में आता है कि हमारे जोश दिलाने पर संतान उस कर्म विशेष को इतना अधिक करने लग जाती है कि अन्य कार्य बाधित होने लगते हैं; संतुलन बिगड़ने लगता है। एक जागरूक और प्यार करने वाले अभिभावक को तुरंत इसका भान होता है और अब वह अपनी संतान से कहता है कि "बहुत हुआ; अब रुको, रुको!" अर्थात् एक कुशल अभिभावक स्थितियों को नियंत्रण में रखने के लिए कभी कुछ तो कभी कुछ समझाते रहते हैं। आपके सुझावों में, शिक्षाओं में और क्रियाओं में कभी-कभी जबरदस्त विरोधाभास दिखता है। परन्तु उस विरोधाभास का एकमात्र कारण यही होता है कि स्थितियां नियंत्रण में रहें और हमारी संतान निरन्तर परिपक्वता को प्राप्त करे।

हम जानते हैं कि 'संतुलन' की कोई भी स्थिति कभी भी परम, चरम या अंतिम (ultimate) नहीं हो सकती; सुधार की गुंजाईश सदैव बनी रहती है, जबतक कि हम ईश्वर तुल्य न हो जाएं। परन्तु यह सोचकर हम केवल हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठते और निरन्तर आगे को उन्नत होने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। और यह सब हम इसीलिए करते हैं क्योंकि हम निरन्तर आशान्वित रहते हैं कि कभी तो हम चरम पर पहुंच ही सकते हैं, या कम से कम उसके निकट तो पहुंच ही सकते हैं।

अब प्रश्न यह उठता है कि उपर्लिखित बातों या दृष्टिकोण को और अधिक व्यापक कर क्या हम ईश्वर की कल्पना एक अभिभावक के रूप में नहीं कर सकते? भारत में हम देखते हैं कि हम उत्तर भारतीय अपनी संतान को यहीं की परिस्थितियों के हिसाब से तौर-तरीके सिखाते हैं और हिंदी में समझाते हैं; वहीं कर्नाटक राज्य का अभिभावक अपनी संतान को कन्नड़ भाषा में वहां के तौर-तरीकों के अनुसार विकसित करने का प्रयत्न करता है। हर स्थान पर परिस्थितियां भिन्न हैं; विदेशों में भी। भाषाएँ, रहन-सहन, सामाजिक तौर-तरीके, धार्मिक मान्यताएं, इष्ट, आदि सब कुछ ही भिन्न है। तो फिर हर स्थान के अभिभावकों के अपनी संतान को 'संतुलित' बनाने के तरीके भिन्न क्यों न होंगे? पर हाँ, लक्ष्य या कारण वही होगा जो आपका है कि संतान योग्य, न्यायप्रिय एवं संतुलित बने। हाँ, इस अच्छेपन की परिभाषा व सीमा कदाचित् भिन्न-भिन्न हो सकती है क्योंकि हम भगवान नहीं! पर भगवान तो बहुत शक्तिशाली व योग्य हैं न! उनसे कभी कोई गलती हो सकती है क्या? चलिए, हम भगवान को नहीं मानते तो भी कोई बात नहीं, पर इतना तो मानेंगे ही कि समय-समय पर समाज विशेष के योग्य व्यक्तियों ने उस समाज को उस काल की परिस्थितियों के अनुसार मार्गदर्शित करने का प्रयास किया। उनका वही प्रयास विभिन्न धर्मग्रंथों के रूप में आज हमारे समक्ष है। सभी स्थानों पर परिस्थितियां भिन्न थीं; भाषाओं, तौर-तरीकों आदि में भी भिन्नताएं थीं, विशेष बात यह कि कालानुसार एवं स्थानानुसार लोगों का मानसिक व बौद्धिक स्तर काफी भिन्न था; तो फिर समाधान रूपी उपायों या वचनों में सर्वकाल एकरूपता सम्भव हो सकती थी क्या?? यह बिलकुल असंभव है। पर गौर से, सहिष्णु दृष्टि से और तटस्थता से देखा जाए तो मार्गदर्शक या अवतार की भूमिका में रहे तत्कालीन ज्ञानी जनों का आशय व लक्ष्य वही था कि उनकी संतान सरीखे सभी आम लोग क्रमशः योग्य व संतुलित होते जाएं। आम प्रजा में कभी किसी चीज या गुण की कमी दिखने पर उन्होंने कुछ कृत्यों द्वारा उसे बढ़ाने के लिए उकसाया; और फिर कभी जब उनकी प्रजा असंतुलित होकर वह कृत्य अत्यधिक व मनमाने ढंग से करने लग गई और अति के कारण उसके अन्य कार्यों की उत्कृष्टता में कमी आने लगी, तो पुनः किसी अन्य अवतार रूप में भगवान ने उन्हें वह कृत्य करने के लिए एकदम से रोका भी! यानी, कभी किसी अवतार रूप में कहा कि यह करो; और कभी किसी अवतार रूप में यह कहा कि ऐसा अब न करो! वाह्यता यह विरोधाभास जान पड़ता है, परन्तु उद्देश्य पर गौर करें तो ऐसा कदापि नहीं! जब किसी ईश्वरावतार ने कुछ करने को कहा तो उद्देश्य यही था कि वह कृत्य कर उसकी संतान अच्छा व संतुलित बनने के लिए प्रेरित हो। उसकी संतान वह कृत्य करने से संतुलित भी हो गई; पर उसके पश्चात् भी जब उसकी संतान आंखें बन्द कर वही कृत्य 'रूढ़ियों' के रूप में करने लगी तथा शेष कार्य बाधित होने लगे, तो ईश्वर ने पुनः किसी अन्य अवतार के रूप में प्रकट होकर कहा कि, "बस करो, बस करो; अब बहुत हुआ!" पुनः, इस शिक्षा का भी उद्देश्य यही था कि उसकी संतान अच्छी व योग्य बने। जैसे-जैसे हम उन्नत होते गए, भगवान द्वारा और अधिक उन्नत ज्ञान की वर्षा होने लगी; तथा साथ ही ऊपर उठने के बाद जब-जब हम पतन की ओर गए, तब-तब हमें ईश्वर की झिड़की मिली। अब हम ध्यान से देखें तो हमारे धर्मग्रंथों की शिक्षाओं में ऊपर मनन की गई सभी बातों के प्रमाण मिलते हैं।

अब तो हमें समझ ही जाना चाहिए कि वेद, उपनिषद, पुराण, बौद्ध शिक्षा, बाइबल, कुरान आदि सब अपने-अपने स्थान पर ठीक हैं और उनसे सम्बंधित ईश्वरावतारों का उद्देश्य भी एक ही था। वे एक ही परमेश्वर के अनेक रूप थे जो अपनी संतानों के हितार्थ परिस्थिति अनुसार भिन्नताएं लिए प्रकट हुए और उनका योग्य मार्गदर्शन किया। हम कौन होते हैं जो उनके कार्यों और सोच पर अंगुली उठाएं? हम उस काल को अनुभूत नहीं कर सकते, मात्र कल्पना ही कर सकते हैं। अतः अपनी सीमाओं को पहचान कर संतुलन, सौहार्द एवं सहिष्णुता का परिचय दें व उनके द्वारा सम्पादित कार्यों पर अपनी सीमित बुद्धि द्वारा प्रश्नचिन्ह न लगाएं, वरन सम्पूर्ण दृश्य को सकारात्मक एवं व्यापक दृष्टिकोण से देखने का प्रयत्न करें, सब स्पष्ट हो जाएगा। हम यह जान लें कि ईश्वर ने मार्गदर्शन देते-देते आज हमें इस स्थिति में पहुंचा दिया है कि आज हम अपने वर्तमान और भविष्य की साधना एवं सोच का निर्धारण स्वयं कर सकते हैं। कदाचित् हमें और अधिक मार्गदर्शित करने अब कोई नया अवतार नहीं आएगा, जो नए सिरे से नीतियों को परिभाषित करे। विज्ञान के विकास और वैश्वीकरण के चलते हम सभी आज एक-दूसरे के बहुत समीप आ चुके हैं। विभिन्न समूहों, संघों या देशों के व्यक्तियों को अब तक मिला ईश्वरीय ज्ञान और समस्त नीतिवचन हमारे समक्ष हैं, वहां की तत्कालीन भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों से भी हम पूरी तरह से अवगत हैं। अब हमें सब कुछ सकारात्मक एवं परिपक्व दृष्टि से देखना आना चाहिए। आइये ..., अपनी प्रौढ़ता, परिपक्वता को प्रकाशित करें और उन्नति के पथ पर आगे को बढ़ें। बहुत दिन स्थिर व संकुचित रह चुके, अब व्यापक बनें। इति।

Thursday, May 5, 2011

(४७) मिलीजुली बातें - २

  • विश्व के सभी प्रमुख धर्म-मतों का यह मानना है कि मनुष्य आरंभ में निष्पाप व पवित्र था, परन्तु बाद में वह क्रमशः पतित होता गया।
  • यदि हम हिंदु शास्त्रों में उल्लेखित विभिन्न युगों (सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलियुग) की अवधारणा को देखें तो भी उपरोक्त कथन की ही पुष्टि होती है।
  • बाइबल में भी समय के साथ-साथ लोगों के चारित्रिक पतन के विषय में कुछ ऐसा ही उल्लेख है। उसमें प्रथम नर व नारी (आदम व हव्वा) को ईश्वर के समान ही गुणों वाला बताया गया है। पर यह भी बताया गया है कि समय के साथ गलतियाँ करते-करते क्रमशः उनका पतन होता गया।
  • ये अवधारणाएं स्पष्ट रूप से यही इंगित करती हैं कि मनुष्य मूल रूप से सर्वथा पवित्र व गुणी है, परन्तु उस पर अर्थात् उसके मन पर बहुत से अयोग्य संस्कारों की मैल जम गई है; और यह मैल उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही है।
  • विश्व के प्रमुख धर्म-मतों के प्राचीन शास्त्रों में भूलोक पर भ्रष्टता के अत्यधिक बढ़ जाने पर प्रलय या प्राकृतिक विनाश आने का भी वर्णन मिलता है। अर्थात् अति अंततः विनाश का कारण बनती है।
  • क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया का सिद्धांत तो विज्ञानी भी मानते ही हैं। क्रिया व्यक्तिगत भी हो सकती है और समष्टिगत भी; तो प्रतिक्रिया भी तदनुरूप होनी निश्चित होती है।
  • जब यह कहा जाता है कि मूलरूप से व्यक्ति पवित्र व ज्ञानी है, तो वहां व्यक्ति से आशय होता है कि संस्कार-रहित जीव; जिसके मन पर अभी दुनियावी संस्कार अंकित नहीं हुए हैं।
  • जब व्यक्ति का मन संस्कार-रहित होगा, तो फिर उस व्यक्ति के समस्त क्रियाकलाप किसकी मदद से होंगे? तब उसके कृत्य आत्मा के निर्देशानुसार सम्पादित होंगे; और आत्मा तो परमात्मा का ही एक अंश है, उसी के तुल्य है। यही कारण था कि आरंभ के नर-नारी पवित्रता लिए थे; क्योंकि सृष्टि के आरंभ में या सतयुग के आरंभ में वे लगभग संस्कार-विहीन थे।
  • पिछले अनेक लेखों में उल्लेखित अनेक विश्लेषणों से हम इस बात से तो भली-भांति परिचित एवं सहमत ही होंगे कि हमारी देह का असली सॉफ्टवेर (software) आत्मा ही है और यह सर्वथा पवित्र, ज्ञानमय एवं अक्षुण्ण है। और मन के विषय में अधिक जानकारी आप 'मन' नामक लेख से ले सकते हैं।
  • हिंदु मतानुसार, जब हमारा शरीर नाश हो जाता है, तब इस स्थूल शरीर से एक सूक्ष्म शरीर बाहर निकलता है। इसे आध्यात्मिक भाषा में जीव, लिंगदेह, सूक्ष्मदेह, आंतरिक देह इत्यादि शब्दों से सम्बोधित किया जाता है।
  • अब हम चर्चा करते हैं इस सूक्ष्मदेह की, जो सूक्ष्म है, आँखों से नहीं दिखाई पड़ती और विभिन्न अनुसंधानों व खोजों से इसे थोड़ा-बहुत जान पाए हैं। सूक्ष्मदेह के घटकों में केवल मन एवं बुद्धि ही ऐसे हैं, जिन्हें विज्ञान आंशिक रूप से समझ पाया है, क्योंकि कुछ हद तक ये स्थूल मस्तिष्क (brain) से सम्बन्ध रखते हैं। अतः हम देखते हैं कि अनेक मानसिक कष्टों/बीमारियों का इलाज हम वैज्ञानिक रीतियों से कर सकते हैं। पर सूक्ष्मदेह के कई और भी भाग हैं, जिन्हें हम केवल अध्यात्म अर्थात् सूक्ष्म के ज्ञान से ही समझने का प्रयास कर सकते हैं। शब्दों में व्यक्त करें तो - ... वर्तमान में सूक्ष्मदेह के दो घटक हैं - (१) आत्मा, (२) अविद्या (सृष्टि के आरम्भ में एक ही घटक था - वह था आत्मा)।
  • सूक्ष्मदेह या आतंरिक देह का प्रमुख घटक 'आत्मा' है। आत्मा का मूल गुणधर्म है - सच्चिदानंद (सत्+चित्+आनंद)। सत् अर्थात् सदैव रहने वाला, चित् अर्थात् चैतन्यमय तथा आनंद अर्थात् सुखमय। यह परमात्मा का ही एक अंश है। वर्तमान में इस आत्मा के चारों ओर जो एक आवरण है, उसे अविद्या कहते हैं। पुनः अविद्या के चार प्रमुख घटक हैं - (१) मन (वाह्य मन), (२) चित्त (अंतर्मन), (३) बुद्धि, (४) अहं। 'मन' वाह्य इन्द्रियों से सम्पर्क साधता है और उनसे प्राप्त स्पंदनों को चित्त तक ले जाता है तथा पुनः चित्त में निर्मित क्रिया-निर्देशों को वाह्य इन्द्रियों तक पहुंचाता है । 'चित्त' (अंतर्मन) में विभिन्न संस्कार एकत्रित रहते हैं। 'बुद्धि' को हम विवेक भी कहते हैं, बुद्धि अंतर्मन में विद्यमान बड़े संस्कारों या वृत्ति पर निर्भर है; यह बाहर से आए स्पंदनों या चित्त के संस्कारों से, या इन दोनों से क्रिया-निर्देश को बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। और 'अहं' अर्थात् जीव को परमेश्वर से भिन्न समझना।
  • अध्यात्म में मन एवं बुद्धि को भी वाह्य माना जाता है, बस आत्मा को ही आन्तरिक माना जाता है। पर चूँकि मन एवं बुद्धि आत्मा के चारों ओर अविद्या का आवरण निर्माण करने के लिए उत्तरदायी हैं, अतः इनका भी अध्ययन हम अध्यात्म के अंतर्गत करते हैं, जिससे इनके कुप्रभावों को हम आध्यात्मिक उपायों द्वारा कम या दूर कर सकें। इनका प्रभाव दूर करने पर ही वस्तुतः हमारी सूक्ष्मदेह अपने शुद्ध मूल दिव्य रूप में प्रकट होगी; तब हम वास्तव में धर्म मार्ग पर चल सकेंगे, क्योंकि आत्मा के तीन मूल गुणधर्मों में एक 'चैतन्य' है।
  • सारांश में, लिंगदेह या सूक्ष्मदेह के दो मुख्य घटक हैं- (१) आत्मा, (२) अविद्या। 'अविद्या' अर्थात् मन के समस्त संस्कार, बुद्धि, अहं आदि।
  • स्थूल शरीर के नाश के उपरांत उससे निकली सूक्ष्मदेह भूलोक से ऊपर को उठती है। उसके ऊपर उठने की गति और ऊंचाई उसके भार पर निर्भर करती है। भार अविद्या का ही होता है, आत्मा तो भारहीन होती है। और फिर सूक्ष्मदेह को उसके भारानुसार ऊपर के लोकों (कक्षाओं, orbits) में स्थान मिलता है। ऊपर के लोकों से तात्पर्य है कि भूलोक की अपेक्षा क्रमशः अधिक अच्छे लोक। और सर्वोच्च लोक को जाना अर्थात् परमेश्वर के सीधे सान्निध्य में पहुंचना अर्थात् आत्मा का परमात्मा में विलय। यह तभी संभव है जब व्यक्ति की अविद्या पूर्णतया मिट चुकी हो।
  • भूलोक पर अगले स्थूल जन्म से पूर्व, सूक्ष्मदेह अपने भारानुसार विभिन्न सूक्ष्म लोकों में प्रवास करतीं हैं, और फिर उचित समय आने पर अपने पूर्व संचित के अनुसार विभिन्न योनियों एवं परिस्थितियों में पुनः भूलोक पर जन्म लेतीं हैं। अर्थात् आगामी जन्म की अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियां एवं योनि-निर्धारण हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों के संचित पर निर्भर करता है।
  • सभी लोकों में केवल भूलोक ही आत्मा की कर्मभूमि कही गई है। अच्छा या बुरा कर्म यहीं पर होता है, समस्त पाप व पुण्य यहीं पर होते हैं; ... और ये सब भी मनुष्य-योनि में ही सम्भव हैं। साधना कर संस्कारों का नाश करना व पूर्णत्व को प्राप्त करना भी मानव-योनि में ही सम्भव है। अन्य योनियों में तो केवल प्रारब्ध को भोगा जाता है।

Tuesday, May 3, 2011

(४६) मिलीजुली बातें - १

  • किसी भी साधना, पूजा-अर्चना अथवा धार्मिक कृत्य करने का लक्ष्य एवं उसका केंद्रबिंदु आत्मसाक्षात्कार होना चाहिए।
  • आत्मसाक्षात्कार या ईश्वर का साक्षात्कार, इन दोनों में कोई भेद नहीं। यथार्थ धर्म उसी में निहित है या वह ही साक्षात् धर्म है। यहां 'धर्म' का अर्थ है- 'योग्य एवं न्यायप्रिय आचरण' (righteousness)।
  • विभिन्न प्रतीक, प्रतिमाएं, आराधनालय और इन सबसे सम्बंधित कर्मकाण्ड इत्यादि तो साधना की बाल्यावस्था में सहायक साधन मात्र हैं। परन्तु इन सब से गुजरते हुए साधक को उत्तरोत्तर उन्नति के पथ पर अग्रसर होना चाहिए।
  • साधक को क्रमशः उच्चतर अवस्था में पहुंचना चाहिए। यद्यपि उच्चतर अवस्था में पहुंचते-पहुंचते साधना के स्थूल साधन छूटते जाते हैं, तदपि कोई इनका आलंबन लेता रहता है तो यह कोई पाप नहीं। अवश्य ही इसका कोई कारण होगा। कभी-कभी यह कृत्य अन्य अविकसित मनों को साधना में प्रवृत्त करने हेतु किया जाता है।
  • अविकसित या अपरिपक्व मनों के लिए स्थूल प्रतीकों की मदद से पूजा-आराधना करना उच्च आध्यात्मिक भावों को ग्रहण करने का सुन्दर उपाय है। यह ठीक वैसा ही है जैसे विद्यालयी शिक्षा के आरंभ में बच्चों को 'a b c d' या 'क ख ग घ' सिखाने के लिए विभिन्न चित्रों, प्रतीकों एवं खिलौनों की मदद ली जाती है। बाद में इनका प्रयोग क्रमशः कम होता जाता है।
  • हमारे लिए यह गौरव की बात हो सकती है कि हमारा देश 'भारत' आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से बहुत धनी रहा है।
  • दुःख की बात है कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में पुराने अन्धविश्वास बढ़ते-बढ़ते विभिन्न विधि-विधानों की विपुल राशि के रूप में परिणत व स्थापित हो गए हैं। साधना की दृष्टि से यह अच्छा नहीं हुआ। इस पद्धति से तो हम पीछे को जा रहे हैं।
  • अन्धविश्वास रूपी स्थूल कर्मकाण्डों में उलझे रहना अर्थात् इन्द्रियों में ही उलझकर संतोष मानना! हमें तो इन्द्रियों से परे की यात्रा करनी है।
  • दुर्भाग्य से अधिकांश लोग आज व्यक्ति में धर्म की उपस्थिति का आंकलन इन्हीं कर्मकाण्डों या वाह्य आडम्बरों से ही करते हैं। वाह्य विधि-विधानों एवं विधि-निषेधों की आज भरमार है।
  • कर्मकाण्डों के प्रति अत्यधिक आसक्ति ने तथा इसी में तृप्ति मानने के कारण ने, हमारे और सत्य के बीच एक मजबूत दीवार खड़ी कर रखी है।
  • वास्तव में सत्य बहुत छोटा सा व सहज ही उपलब्ध होने वाला है, परन्तु विविध मत-मतान्तरों की कल्पनाओं में उलझकर हम स्वयं ही इसकी सहज उपलब्धता को दुष्कर कर रहे हैं, स्वयं से दूर कर रहे हैं।
  • विविध कर्मकाण्डों का महत्त्व तभी है, वे तभी सार्थक हैं, जब वे हममें पुरुषार्थ को जागृत करें, सुन्दर कर्म करने की प्रेरणा दें और हमारे मन के विचारों को उन्नत कर हमें दिव्य पूर्णता का एहसास कराएं। अर्थात् वे हमारी आंतरिक यात्रा आरंभ कराएं, तभी बात बने।
  • भीतर प्रकाश होगा, तभी अंधेरा भागेगा। हम अंधेरा होने पर कितना ही चीखें-चिल्लाएं; उससे कुछ नहीं होने का! पर दियासलाई की एक तीली जलाते ही अंधेरा गायब हो जाता है। तो आंतरिक अंधेरा मिटाने के लिए आत्मिक प्रकाशस्रोत को पाना ही होगा। इसका कोई अन्य विकल्प नहीं।
  • पर फिर भी यह कहूँगा कि वाह्य साकार ईश्वर की धारणा कोई असत्य नहीं। ईश्वर सम्बन्धी विभिन्न धारणाएं सत्य हैं और पूर्णता की लक्ष्यप्राप्ति हेतु यात्रा में ये भिन्न-भिन्न स्तर मात्र हैं। या दूसरे शब्दों में, आत्मसाक्षात्कार या ईश्वरप्राप्ति हेतु की जाने वाली विभिन्न सगुण उपासनाएं उस साधक (पूजक) की प्रगति की अवस्था को प्रकट करती हैं।
  • सगुण से निर्गुण की यात्रा आवश्यक है। बीच में एक स्थान पर अधिक ठहराव घातक है।
  • साधना की प्राथमिक कक्षाओं में हम जानते हैं कि व्यक्ति व ईश्वर भिन्न-भिन्न। तभी तो हम ईश्वर के विभिन्न साकार प्रतीकों की उपासना करते हैं | परन्तु जैसे-जैसे हम स्थूल से सूक्ष्म में जाते हैं, हमें स्वयं अपने ही भीतर ईश्वरत्व के दर्शन होते हैं। इसी स्थिति को अनुभूत कराना ही प्रत्येक साधना-पद्धति का चरम लक्ष्य होना चाहिए, यह ध्यान रहे। अन्यथा वह पद्धति अयोग्य है, उसे बदलें।
  • विश्व की कोई भी उपासना पद्धति यदि आपमें दैवी गुणों जैसे- प्रेम, सत्य, अहिंसा, अनुशासन, न्यायप्रियता आदि को शनैः-शनैः गहराई के साथ बढ़ा रही है, तो निश्चित ही वह पद्धति आपमें क्रमशः 'विस्थापन' ला रही है, अन्यथा आप मात्र लंबी 'दूरी' तय कराने वाली किसी गौण पद्धति का शिकार बन चुके हैं, यह जान लीजिए।
  • साधना के फल के रूप में 'विस्थापन' होना चाहिए, 'दूरी' का अधिक महत्त्व नहीं! क्योंकि बारम्बार लंबी दूरियां तय कर पुनः-पुनः उसी स्थान पर वापस आ जाना कोई बुद्धिमानी नहीं, यह ऊर्जा व समय का दुरुपयोग है। विस्थापन होगा तभी प्रत्यक्षीकरण संभव है अन्यथा अस्पष्ट रूप से बड़बड़ाते, गुनगुनाते, या घुटनों के बल बैठे कई जन्म यूं ही बीत जायेंगे।
  • ईश्वरीय ज्ञान अन्यों को भी बांटना अति उत्तम कार्य है। परन्तु देखा जा रहा है कि देने वाला इसके बदले में धन या यश या इन दोनों की प्रगाढ़ अभिलाषा रखता है।
  • पहले के समय में सामान्य विद्यालयी शिक्षा के सम्बन्ध में कहा जाता था कि धन के लिए शिक्षा देना बुरी बात है और जो विद्या को पुण्य वस्तु मानते हुए भी उसका सौदा धनादि से करता है, वह उसको कलंक लगाता है; तो फिर आध्यात्मिक ज्ञान को प्रदान करने वाले आज के लोभी सौदागरों के विषय में आप क्या कहेंगे? अधिक धन/यश की चाह में ये आपको केवल घुमा-फिरा रहे हैं, पर आपका विस्थापन तो शून्य है! और कभी-कभी तो यह विस्थापन उलटी दिशा में भी हो जाता है!
  • सच्ची धार्मिक सहिष्णुता का भी आज घनघोर अभाव है। यदि आप स्वयं को सहिष्णु मानते हैं तो यह जांचें कि क्या आप ऐसा मानते हैं कि, "भिन्न-भिन्न धर्मों व सम्प्रदायों से ज्ञान के भिन्न-भिन्न अंशों की नदियाँ आकर एक समुद्र में मिलती हैं, जहां विभिन्न अंश मिलकर पूर्ण हो जाते हैं। या, ऐसा है कि विभिन्न धार्मिक मत एक ही ईश्वर की भिन्न-भिन्न कोणों से ली गई फोटो समान हैं; कोण भिन्न होने से ही उनमें असमानता दिखती है। विभिन्न कोणों से देखने पर तो हमारी दृष्टि व दृश्य दोनों ही व्यापक हो जाते हैं! ... और परमेश्वर इतना सामर्थ्यवान है कि वह आवश्यकतानुसार कभी भी, कहीं भी, किसी भी साकार रूप में अवतरित हो सकने में सक्षम है। विश्व के सभी धर्मों के इष्ट इसी बात के द्योतक हैं।"
  • विभिन्न धर्म-मतों के प्रति सहिष्णुता बनाए रखने का एक और बड़ा कारण यह दिखाई पड़ता है कि एक सर्वोच्च लक्ष्य की कल्पना सभी धार्मिक पंथ कर सकते हैं, वह है- एक सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्ता से साक्षात्कार का लक्ष्य। पन्थानुसार उसका वाह्य स्वरूप अवश्य भिन्नता लिए होता है, इसके कारण पर हम पिछले बिंदु में ही मनन कर चुके हैं।
  • यह सब जानते हुए भी प्रायः हम असहिष्णु रहते हैं, परस्पर द्वेष रखते हैं। खोजें तो मूल कारण वही मिलते हैं- हमारा व हमारे धर्मगुरुओं का अहं, लालसाएं, हमारा कुएं के मेंढक की भांति एक छोटे से स्थान पर ही कूदते रहना अर्थात् व्यापकता का अभाव, दूसरों को समझ सकने की वृत्ति का अभाव आदि।
  • सच में आज हमारी सोच बहुत सीमित है, और इस सीमित व अहंकारी सोच ने आज ईश्वर को भी बहुत सीमित व छोटा कर दिया है। विज्ञान ने आज विश्व को एक छोटे से गांव में बदल दिया है, हम एक-दूसरे के बहुत निकट आ गए हैं; पर हमारे इष्ट, हमारे आराध्य!? विडम्बना ही है कि वे आज भी बहुत दूर-दूर हैं!