Tuesday, May 3, 2011

(४६) मिलीजुली बातें - १

  • किसी भी साधना, पूजा-अर्चना अथवा धार्मिक कृत्य करने का लक्ष्य एवं उसका केंद्रबिंदु आत्मसाक्षात्कार होना चाहिए।
  • आत्मसाक्षात्कार या ईश्वर का साक्षात्कार, इन दोनों में कोई भेद नहीं। यथार्थ धर्म उसी में निहित है या वह ही साक्षात् धर्म है। यहां 'धर्म' का अर्थ है- 'योग्य एवं न्यायप्रिय आचरण' (righteousness)।
  • विभिन्न प्रतीक, प्रतिमाएं, आराधनालय और इन सबसे सम्बंधित कर्मकाण्ड इत्यादि तो साधना की बाल्यावस्था में सहायक साधन मात्र हैं। परन्तु इन सब से गुजरते हुए साधक को उत्तरोत्तर उन्नति के पथ पर अग्रसर होना चाहिए।
  • साधक को क्रमशः उच्चतर अवस्था में पहुंचना चाहिए। यद्यपि उच्चतर अवस्था में पहुंचते-पहुंचते साधना के स्थूल साधन छूटते जाते हैं, तदपि कोई इनका आलंबन लेता रहता है तो यह कोई पाप नहीं। अवश्य ही इसका कोई कारण होगा। कभी-कभी यह कृत्य अन्य अविकसित मनों को साधना में प्रवृत्त करने हेतु किया जाता है।
  • अविकसित या अपरिपक्व मनों के लिए स्थूल प्रतीकों की मदद से पूजा-आराधना करना उच्च आध्यात्मिक भावों को ग्रहण करने का सुन्दर उपाय है। यह ठीक वैसा ही है जैसे विद्यालयी शिक्षा के आरंभ में बच्चों को 'a b c d' या 'क ख ग घ' सिखाने के लिए विभिन्न चित्रों, प्रतीकों एवं खिलौनों की मदद ली जाती है। बाद में इनका प्रयोग क्रमशः कम होता जाता है।
  • हमारे लिए यह गौरव की बात हो सकती है कि हमारा देश 'भारत' आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से बहुत धनी रहा है।
  • दुःख की बात है कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में पुराने अन्धविश्वास बढ़ते-बढ़ते विभिन्न विधि-विधानों की विपुल राशि के रूप में परिणत व स्थापित हो गए हैं। साधना की दृष्टि से यह अच्छा नहीं हुआ। इस पद्धति से तो हम पीछे को जा रहे हैं।
  • अन्धविश्वास रूपी स्थूल कर्मकाण्डों में उलझे रहना अर्थात् इन्द्रियों में ही उलझकर संतोष मानना! हमें तो इन्द्रियों से परे की यात्रा करनी है।
  • दुर्भाग्य से अधिकांश लोग आज व्यक्ति में धर्म की उपस्थिति का आंकलन इन्हीं कर्मकाण्डों या वाह्य आडम्बरों से ही करते हैं। वाह्य विधि-विधानों एवं विधि-निषेधों की आज भरमार है।
  • कर्मकाण्डों के प्रति अत्यधिक आसक्ति ने तथा इसी में तृप्ति मानने के कारण ने, हमारे और सत्य के बीच एक मजबूत दीवार खड़ी कर रखी है।
  • वास्तव में सत्य बहुत छोटा सा व सहज ही उपलब्ध होने वाला है, परन्तु विविध मत-मतान्तरों की कल्पनाओं में उलझकर हम स्वयं ही इसकी सहज उपलब्धता को दुष्कर कर रहे हैं, स्वयं से दूर कर रहे हैं।
  • विविध कर्मकाण्डों का महत्त्व तभी है, वे तभी सार्थक हैं, जब वे हममें पुरुषार्थ को जागृत करें, सुन्दर कर्म करने की प्रेरणा दें और हमारे मन के विचारों को उन्नत कर हमें दिव्य पूर्णता का एहसास कराएं। अर्थात् वे हमारी आंतरिक यात्रा आरंभ कराएं, तभी बात बने।
  • भीतर प्रकाश होगा, तभी अंधेरा भागेगा। हम अंधेरा होने पर कितना ही चीखें-चिल्लाएं; उससे कुछ नहीं होने का! पर दियासलाई की एक तीली जलाते ही अंधेरा गायब हो जाता है। तो आंतरिक अंधेरा मिटाने के लिए आत्मिक प्रकाशस्रोत को पाना ही होगा। इसका कोई अन्य विकल्प नहीं।
  • पर फिर भी यह कहूँगा कि वाह्य साकार ईश्वर की धारणा कोई असत्य नहीं। ईश्वर सम्बन्धी विभिन्न धारणाएं सत्य हैं और पूर्णता की लक्ष्यप्राप्ति हेतु यात्रा में ये भिन्न-भिन्न स्तर मात्र हैं। या दूसरे शब्दों में, आत्मसाक्षात्कार या ईश्वरप्राप्ति हेतु की जाने वाली विभिन्न सगुण उपासनाएं उस साधक (पूजक) की प्रगति की अवस्था को प्रकट करती हैं।
  • सगुण से निर्गुण की यात्रा आवश्यक है। बीच में एक स्थान पर अधिक ठहराव घातक है।
  • साधना की प्राथमिक कक्षाओं में हम जानते हैं कि व्यक्ति व ईश्वर भिन्न-भिन्न। तभी तो हम ईश्वर के विभिन्न साकार प्रतीकों की उपासना करते हैं | परन्तु जैसे-जैसे हम स्थूल से सूक्ष्म में जाते हैं, हमें स्वयं अपने ही भीतर ईश्वरत्व के दर्शन होते हैं। इसी स्थिति को अनुभूत कराना ही प्रत्येक साधना-पद्धति का चरम लक्ष्य होना चाहिए, यह ध्यान रहे। अन्यथा वह पद्धति अयोग्य है, उसे बदलें।
  • विश्व की कोई भी उपासना पद्धति यदि आपमें दैवी गुणों जैसे- प्रेम, सत्य, अहिंसा, अनुशासन, न्यायप्रियता आदि को शनैः-शनैः गहराई के साथ बढ़ा रही है, तो निश्चित ही वह पद्धति आपमें क्रमशः 'विस्थापन' ला रही है, अन्यथा आप मात्र लंबी 'दूरी' तय कराने वाली किसी गौण पद्धति का शिकार बन चुके हैं, यह जान लीजिए।
  • साधना के फल के रूप में 'विस्थापन' होना चाहिए, 'दूरी' का अधिक महत्त्व नहीं! क्योंकि बारम्बार लंबी दूरियां तय कर पुनः-पुनः उसी स्थान पर वापस आ जाना कोई बुद्धिमानी नहीं, यह ऊर्जा व समय का दुरुपयोग है। विस्थापन होगा तभी प्रत्यक्षीकरण संभव है अन्यथा अस्पष्ट रूप से बड़बड़ाते, गुनगुनाते, या घुटनों के बल बैठे कई जन्म यूं ही बीत जायेंगे।
  • ईश्वरीय ज्ञान अन्यों को भी बांटना अति उत्तम कार्य है। परन्तु देखा जा रहा है कि देने वाला इसके बदले में धन या यश या इन दोनों की प्रगाढ़ अभिलाषा रखता है।
  • पहले के समय में सामान्य विद्यालयी शिक्षा के सम्बन्ध में कहा जाता था कि धन के लिए शिक्षा देना बुरी बात है और जो विद्या को पुण्य वस्तु मानते हुए भी उसका सौदा धनादि से करता है, वह उसको कलंक लगाता है; तो फिर आध्यात्मिक ज्ञान को प्रदान करने वाले आज के लोभी सौदागरों के विषय में आप क्या कहेंगे? अधिक धन/यश की चाह में ये आपको केवल घुमा-फिरा रहे हैं, पर आपका विस्थापन तो शून्य है! और कभी-कभी तो यह विस्थापन उलटी दिशा में भी हो जाता है!
  • सच्ची धार्मिक सहिष्णुता का भी आज घनघोर अभाव है। यदि आप स्वयं को सहिष्णु मानते हैं तो यह जांचें कि क्या आप ऐसा मानते हैं कि, "भिन्न-भिन्न धर्मों व सम्प्रदायों से ज्ञान के भिन्न-भिन्न अंशों की नदियाँ आकर एक समुद्र में मिलती हैं, जहां विभिन्न अंश मिलकर पूर्ण हो जाते हैं। या, ऐसा है कि विभिन्न धार्मिक मत एक ही ईश्वर की भिन्न-भिन्न कोणों से ली गई फोटो समान हैं; कोण भिन्न होने से ही उनमें असमानता दिखती है। विभिन्न कोणों से देखने पर तो हमारी दृष्टि व दृश्य दोनों ही व्यापक हो जाते हैं! ... और परमेश्वर इतना सामर्थ्यवान है कि वह आवश्यकतानुसार कभी भी, कहीं भी, किसी भी साकार रूप में अवतरित हो सकने में सक्षम है। विश्व के सभी धर्मों के इष्ट इसी बात के द्योतक हैं।"
  • विभिन्न धर्म-मतों के प्रति सहिष्णुता बनाए रखने का एक और बड़ा कारण यह दिखाई पड़ता है कि एक सर्वोच्च लक्ष्य की कल्पना सभी धार्मिक पंथ कर सकते हैं, वह है- एक सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्ता से साक्षात्कार का लक्ष्य। पन्थानुसार उसका वाह्य स्वरूप अवश्य भिन्नता लिए होता है, इसके कारण पर हम पिछले बिंदु में ही मनन कर चुके हैं।
  • यह सब जानते हुए भी प्रायः हम असहिष्णु रहते हैं, परस्पर द्वेष रखते हैं। खोजें तो मूल कारण वही मिलते हैं- हमारा व हमारे धर्मगुरुओं का अहं, लालसाएं, हमारा कुएं के मेंढक की भांति एक छोटे से स्थान पर ही कूदते रहना अर्थात् व्यापकता का अभाव, दूसरों को समझ सकने की वृत्ति का अभाव आदि।
  • सच में आज हमारी सोच बहुत सीमित है, और इस सीमित व अहंकारी सोच ने आज ईश्वर को भी बहुत सीमित व छोटा कर दिया है। विज्ञान ने आज विश्व को एक छोटे से गांव में बदल दिया है, हम एक-दूसरे के बहुत निकट आ गए हैं; पर हमारे इष्ट, हमारे आराध्य!? विडम्बना ही है कि वे आज भी बहुत दूर-दूर हैं!