Sunday, January 10, 2016

(६४) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ७

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
बहुत त्रासद है कि भारत के अधिकांश लोग दुकान की तड़क-भड़क व चकाचौंध से प्रभावित हो जाते हैं परन्तु सामान की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देते हैं! घर की मुर्गी दाल बराबर ...और बाहर घुनी दाल चटखारे लेकर खाते हैं! मोबाइल फोन, इन्टरनेट एवं अन्य तमाम गैजेट्स को पागलों समान ख़ूब अनापशनाप इस्तेमाल करते हैं परन्तु उनके मुख्य लाभ से लगभग वंचित रहते हैं! हम अधिसंख्य वर्तमान भारतवासी ऊपर-ऊपर खूब तैरते हैं लेकिन तलहटी में जाकर रत्न ढूंढने से कतराते हैं! ...तो हमारा यही दृष्टिकोण प्रत्येक स्थान पर प्रतिबिंबित होता है, ..भगवान् के प्रति भी, आस्था के प्रति भी, धार्मिकता के प्रति भी! वास्तव में हम उथले और उन्मादी हैं, इसमें कोई भी शक नहीं!

(२)
बहुत आवश्यक कि मात्र शाब्दिक स्तर पर अधिक समय न रहकर भीतर की यात्रा की जाए. स्वयं को पूर्णतया साधने एवं अन्य सभी के प्रति असली सहिष्णुता रखने का ज्ञान वहीं पर मिलता है. ..सभी वह साध्य करने में सक्षम! मैं अन्यों से भिन्न नहीं और न ही अन्य मेरे से! सब सीढ़ी के भिन्न-भिन्न पायदानों पर हैं बस! ..कुछ मुझसे ऊपर और कुछ नीचे! बस वक्त की और निश्चय करने की बात है, कोई भी कभी भी ऊपर आ सकता है. ..शायद इसी को साधना कहते हैं! कूप माण्डुक्य नहीं बल्कि दृढ़ निश्चय, नम्रता, निरंतरता, धैर्य, अनुशासन, समर्पण, खुला दिमाग, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' स्तरीय विशाल हृदयता आदि इसके मूल तत्व हैं.

(३)
यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे 
तबे एकला चलो रे। .....

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

यदि कोई भी ना बोले ओरे ओ रे ओ अभागे कोई भी ना बोले
यदि सभी मुख मोड़ रहे सब डरा करे
तब डरे बिना ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे
ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

यदि लौट सब चले ओरे ओ रे ओ अभागे लौट सब चले
यदि रात गहरी चलती कोई गौर ना करे
तब पथ के कांटे ओ तू लहू लोहित चरण तल चल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

यदि दिया ना जले ओरे ओ रे ओ अभागे दिया ना जले
यदि बदरी आंधी रात में द्वार बंद सब करे
तब वज्र शिखा से तू ह्रदय पंजर जला और जल अकेला रे
ओ तू हृदय पंजर चला और जल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

Source - http://en.wikipedia.org/wiki/Ekla_Chalo_Re

(४)
हकीकत में करना हो कुछ संभव तो,
कोशिश से माहौल बनाना पड़ता है,
मेहनत से माहौल बदलना पड़ता है,
इन सब के लिए थोड़ा नहीं बहुत बदलना पड़ता है खुद को!
निरुत्तर व विवश कर देता है यह दूसरे को निश्चित ही,
कि वो भी कुछ नहीं, बहुत नहीं, संपूर्णतः बदल जाए!
और .....ऐसा संभव है, ऐसा होता है, मैंने देखा है!

(५)
फटाफट क्रिकेट और दीर्घकालीन राजनीति, दोनों में ही भारतीय कप्तानों की रणनीति से सम्बंधित कुछ भी स्पष्ट अंदाजा लगाना हमारे लिए असंभव सा है, फिर भी हम भावुक भारतीय दर्शक वह करते रहते हैं, और बारम्बार खुश या मायूस होते रहते हैं.
कयास लगाना हम भारतीयों की पुरानी आदत है, खासतौर पर मीडियाकर्मियों की! पर अब चूँकि खेल के ढंग बदल चुके हैं तो हमारे कयासों में भी परिपक्वता अपेक्षित है! खासतौर पर तब तो अवश्य, जब हमें सही मायनों में विकास की सीढ़ियाँ चढ़ना हो; ..हमें कुछ पुरानी बेड़ियाँ तोड़कर आशावादी, सकारात्मक एवं रचनात्मक होना होगा, इसका कोई पर्याय नहीं! मात्र टाइम-पास के लिए बेतरतीब कयास लगाना ठीक नहीं और न ही शब्दों के लच्छे बनाना!

(६)
भगवान् हैं, ज़रूर हैं; उन्हें कुदरत के रूप में भी जाना जाता है; इस कुदरत ने हमें बहुत कुछ निःशुल्क उपलब्ध कराया है, उसी के बल पर हम फलते-फूलते व खुश रहते हैं, ..और इस कुदरत के कुछ नियम हैं; कुछ हम पहले से जानते थे और कुछ पुनः विज्ञान ने भी हमको सिखाये; हम उनको श्रद्धा व आस्था से मानते हुए शिरोधार्य करते हैं तो कुदरत प्रसन्न और हम पर आशीषों की बरसात, अन्यथा...? शायद आवश्यकता है कि हम अपनी आस्था, श्रद्धा व कर्मकांडों-अनुष्ठानों को पुनः समझने की कोशिश करें और उन्हें ईश्वर की अपेक्षा के अनुसार परिष्कृत करें. चूँकि अब हम बौद्धिक व मानसिक रूप से अधिक परिष्कृत, अपडेटेड या अपग्रेडेड हैं तो स्वाभाविक ही है कि ईश्वर भी अब हमसे अधिक प्रौढ़ दृष्टिकोण की मांग करते हैं. ..प्राइमरी कक्षा के बच्चे से अध्यापक अधिक उम्मीद नहीं करता, परन्तु कक्षा दर कक्षा आगे बढ़ते जाने पर अध्यापक की अपेक्षाएं भी क्रमशः बढ़ती हैं और यह स्वाभाविक है.

(७)
बहुत से लोग आज यह मांग करते हैं कि सभ्य एवं ईमानदार लोगों को राजनीति में आना आवश्यक, परन्तु राजनीति में आने के लिए जितने पैसे व दंदफंद की ज़रूरत, क्या वह एक सभ्य, ईमानदार एवं सुपात्र नागरिक के पास होना संभव?
कुपात्र आज संगठित हैं और उन्होंने प्रत्येक वह मार्ग अवरुद्ध कर रखा है जिनसे कि होकर एक वास्तव में योग्य व्यक्ति आगे आ सकता है. महत्वपूर्ण स्तम्भ मीडिया में भी आज कुपात्रों का ही वर्चस्व है. समाज की ऊपर की सतह में सर्वत्र पैसा, लालच और दादागिरी आज सिर चढ़कर बोल रहे हैं, आम आदमी बस किसी तरह दिन काट रहा है, वैसे ही बहुत परेशान है कुछ बोलेगा तो फिर तो परेशानियों की बाढ़ आ जाएगी, सो चुप है, ..कुछ अच्छे ढंग से जीवनयापन की चाह में जाने-अनजाने अब वह भी अधिकांशतः ऊपरी भ्रष्ट समाज का अनुगमन करने लग गया है. यथा राजा तथा प्रजा! ..वास्तव में कुछ बदलना है तो वह शक्तिशाली व सामर्थ्यवान के लिए अधिक सरल है. वह बदलेगा तो उसके अनुयायी भी बदलेंगे अवश्य, ...पर कहीं ऐसा देखा है कभी कि शिष्य के बदलने से गुरु बदल जाए? वैसे अपवाद कहीं भी कभी भी संभव हैं परन्तु यह उलट पद्धति है. ...यह निश्चित है कि ठोस एवं आमूलचूल परिवर्तनों के लिए प्रथमतः समाज की ऊपरी सतह यानी अभिजात-वर्ग में चैतन्य आना / लाना परमावश्यक है.