Saturday, April 30, 2016

(६९) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १२

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
परेशानी हो तो कर्म करने की जरुरत है न कि किसी कर्मकाण्ड की!
और यदि किसी अमुक कर्मकाण्ड से किसी योग्य कर्म करने की प्रेरणा मिलती हो तो उसे करने में कोई आपत्ति नहीं.
कोई विशिष्ट धार्मिक कर्मकाण्ड किसी कर्म का स्थान ले लेगा, यानी शॉर्टकट उपलब्ध करा देगा, इस गलतफहमी में बिलकुल भी न रहिएगा! इसी को अन्धविश्वास और भ्रष्टाचार कहते हैं.
वह शॉर्टकट नहीं वरन ईमानदार कर्म चाहता है.

(२)
कर्मकाण्ड भाव-जागृति हेतु ही होना चाहिए, बिना 'कर्म' (बिना मेहनत या प्रयास) किसी अभीष्ट सिद्धि हेतु नहीं! ..वह भी यथासंभव शुरुआती अवस्था में ही!
..और जो अकर्म-कर्म की बात कही आपने (...ईश्वर कर रहा है और हमसे करा रहा है और सदा हमारे साथ है), वह इतना सरल नहीं! ..बहुधा हम भावुकता में ऐसा कह तो जाते हैं कि हम अकर्म-कर्म कर रहे हैं, परन्तु अधिकांशतः वह कोरी भावना ही होती है, ..सच्चे भाव का अभाव होता है; ...तभी तो अनेकों तथाकथित तत्त्व-ज्ञानियों से से भी पाप होते हैं! ...और तब वे यह नहीं कह सकते कि- "यह ईश्वर कर रहा है और हमसे करा रहा है और सदा हमारे साथ है"! ...ये उनके क्रियमाण-कर्म होते हैं- उनके मन, बुद्धि और विवेक से किये हुए; और ठीकरा फोड़ते हैं भगवान् पर!
मेरा आशय समझ गए होंगे आप. ...किन्तु इसे अन्यथा न लीजिएगा!

(३)
आपने कहा- "अध्यात्म की ऊंची कक्षाओं की पढ़ाई बहुत ही कठिन है और विरले ही उस को समझ पाते हैं. आम तौर पर लोग ग्रॅजुयेशन करते ही अपने नाम के आगे डिग्री लिखने लगते हैं और वास्तविक अनुसंधान से बचते हैं इसका एक कारण यह भी है कि अनुसंधान के परिणाम कभी मिलेंगे भी कि नहीं, यह निश्चित नहीं होता, जबकि धंधा करने के लिये ग्रॅजुयेशन काफी है."
'आपने बिलकुल सही बात कही, परन्तु यह बात आध्यात्मिक मार्गदर्शकों (विभिन्न तथाकथित गुरुओं) पर लागू होती है!
..लेकिन आम व्यक्ति की बात करें तो वह तो अभी तक किसी जूनियर कक्षा में ही अटका है! ..या फिर तथाकथित मार्गदर्शकों ने उसे वहीं पर अटका रखा है!
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रही बात ग्रेजुएशन के पश्चात् के 'अनुसंधान' की, तो अध्यात्म में वहां तक कोई भी पहुँच सकता है, ..एक आम व्यक्ति भी; ..किसी मार्गदर्शन अंतर्गत अथवा बिना किसी मार्गदर्शन के; ..बस दृढ़ निश्चय के साथ जिज्ञासु वृत्ति का होना आवश्यक! ..हर बच्चा (या व्यक्ति) अपने माता-पिता (या जीवन देने वाले) के विषय में जानने हेतु उत्सुक होता है और होना चाहिए! हर एक व्यक्ति को अपने जीवन को या स्वयं को और उससे जुड़ी बातों को खोजना चाहिए, जानना चाहिए, ..इसमें कुछ भी अटपटा नहीं! ..वैज्ञानिक भी तो यही करते हैं- 'अनुसंधान'!

(४)
बड़ा विरोधाभास है कुछ बातों में; एक तरफ आप कहते हैं कि "ईश्वर की हकीकत की थाह पाना मानव मन-मस्तिष्क के बस का नहीं, और दूसरी तरफ आपका यह कहना है कि ईश्वर की निशानियों को हमारा दिल खूब जानता व पहचानता है!" ..मेरा विचार है कि हम खूब जानते हैं कि ईश्वर व ईश्वरीय सिद्धांत, मूलतः प्रकृति के मूल सिद्धांतों के रूप में हमारे सामने प्रकट हैं, ...और हम हैं कि जानते हुए भी मानते नहीं, ..या अपने-आप को इस सिस्टम की परिधि से बाहर समझते हैं! ..शायद यह हमारा कोरा अहंकार है, ...और शायद इसी अहंकारवश हम जड़ और अज्ञानी समान हैं, ...और शायद इसीलिए हम पीढ़ियों से एक जगह (कक्षा में) स्थिर से हैं या अपेक्षाकृत नीचे ही गए हैं! इस भौतिक देह में और इस भौतिक संसार में हमें भौतिकता व आध्यात्मिकता के बीच संतुलन रखना आवश्यक होता है; भौतिक उन्नति तो हम खूब कर रहे हैं परन्तु आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में हम 'अबोध' ही बने हुए हैं, इसी कारण संतुलन बहुत बिगड़ गया है और हम निरंकुशता की हदें पार कर रहे हैं और आकंठ भौतिकता में डूबे हैं अनैतिकता के साथ (क्योंकि आध्यात्मिकता ही नैतिकता के रूप में प्रकट होती है)!

(५)
प्रकाश के विषय में जागृति फ़ैलाने (प्रसार करने) वाले व्यक्ति का प्रथम और अंतिम उद्देश्य केवल प्रकाश (या उसके महत्त्व) का प्रसार करना होता है, उसके किसी एक विशिष्ट ब्रांड का प्रचार नहीं! उसे केवल स्वच्छ और उज्जवल प्रकाश के प्रसार से मतलब होता है तथा वह उसे (प्रकाश को) अनेक स्रोतों में ढूंढकर अनेकों विकल्प प्रस्तुत करता है बिना किसी पूर्वाग्रह के!
जबकि किसी एक बल्ब विशेष (किसी एक बल्ब निर्माता) का प्रतिनिधि (या मालिक) केवल उस बल्ब विशेष का प्रचार करता है, उसे ही अपनाने का आग्रह करता है, अन्य निर्माताओं के समकक्ष उत्पादों को वह निकृष्ट बतलाता है! ..मूलतः वह ब्रांड का प्रचार करता है, प्रकाश का प्रसार नहीं!

सच्चा धार्मिक, 'सार्वभौमिक ज्ञान' रूपी असीमित प्रकाश के 'प्रसार' (spreading) में सहायक होता है या उसके द्वारा यह कार्य स्वयमेव होता है जैसे सूर्य के द्वारा प्रकाश का प्रसार होता है; और अन्धश्रद्ध कट्टर, किसी 'विशिष्ट ब्रांड' के सीमित ज्ञान का 'प्रचार' (publicity) करता है.
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पहली स्थिति में ज्ञान का प्रसार परमात्मा अथवा आत्मा के आदेश से और दूसरी स्थिति में ज्ञान का प्रचार किसी गुरु विशेष के आदेश (अथवा शिक्षा) से होता है.
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पहली स्थिति में सम्पूर्ण समष्टि के दीर्घ हित छुपे होते हैं जबकि दूसरी स्थिति में एक विशिष्ट समुदाय अथवा पंथ के हित छुपे होते हैं.
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प्रथम व्यापकत्व लिए होता है और दूसरे का एक निश्चित दायरा होता है.
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हाँ, यह सच है कि श्री रामकृष्ण परमहंस सरीखे खरे गुरु सदैव "प्रसार" हेतु प्रयत्नशील होते हैं, वे सीमित सोच के नहीं होते बल्कि व्यापकत्व लिए होते हैं. ..और उनकी यह विशेषता हम और आप नहीं निर्धारित कर सकते, उनके देह त्याग के कुछ वर्षों बाद 'सभी' को इसका पता चल पाता है ('केवल दो-चार नजदीकी लोगों' को ही उनकी गहराई का पहले से पता होता है).