Friday, April 1, 2016

(६८) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ११

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
विभिन्न समाजों (सम्प्रदायों, पंथों) में व्याप्त विभिन्न कुप्रथाओं को जब तक हम धर्म (?) (अर्थात् किसी पंथिक ग्रन्थ में उल्लेखित उपदेश या आज्ञाओं) से जोड़कर देखेंगे तो दो बातें होंगी-
पहली बात कि कुप्रथा के प्रति हमारा मोह या सम्मान बना रहेगा (धार्मिक पक्ष जुड़ा होने के नाते);
और दूसरी बात यह कि अन्य मतावलंबियों के प्रति हमारा द्वेष पूर्व की अपेक्षा और अधिक बढ़ेगा, क्योंकि उनकी व हमारी शिक्षाओं/आदेशों में परस्पर विरोधाभास अवश्य मिलेंगे!
और हम कुत्तों की भांति एक दूसरे से लड़ते रहेंगे! लड़ाई प्रथमतः केवल वह ही बंद करेगा जो अपेक्षाकृत अधिक समझदार होगा! ..किसी की जो चीज या आदत हमें पसंद नहीं, क्या आवश्यकता है कि वही हम भी अपनाएं?!
बहुधा हम 'धर्म' शब्द को 'रिलिजन' के सन्दर्भ में लेते हैं और रिलीजियस निर्देशों को 'धर्म' समझते हैं. जबकि रिलीजियस निर्देश (उपदेश, आज्ञायें, ग्रन्थ) आदि नीतिवचन हैं मात्र, ..और नीतियाँ कालानुसार बदलती हैं, बदलनी चाहियें! ..और ये बदलते रहे भी हैं, उदाहरणार्थ- बाइबिल का पुराना नियम (कठोर, स्थूल) v/s नया नियम (उदार, सूक्ष्म); वेद शिक्षा का क्रमशः स्थूल उपासना से सूक्ष्म उपासना तक जाना; सामान्य विद्यालय में कक्षा दर कक्षा आगे जाने पर पाठ्यक्रम बदलना (सूक्ष्म होना)!
'धर्म' कोई इतना छोटा शब्द नहीं कि विवादों में घिर जाए या उस पर आसानी से प्रश्नचिन्ह खड़े किये जा सकें. 'धर्म' कोई 'उपासना पद्धति या जीवनशैली' नहीं!
प्लीज..., धर्म, रिलिजन, संस्कृति, सभ्यता, नीति, आदेश आदि शब्दों को अलग-अलग गहराई से समझने का यत्न करें! ..इससे व्यर्थ के विवाद बंद होंगे, और तब हम व्यर्थ की बेड़ियाँ काटते हुए वास्तव में विकास की सीढ़ियाँ चढ़ेंगे.

(२)
आपने कहा- "इस देश के लोग भले ही ढोल ढमाकों और हाथियों के जोर पर कभी कभार जाग जाने वाली सरकार पर लाख दोष मढ़ लें परन्तु स्वयं तो कसम खा कर बैठे हैं कि वे अंधे ही बने रहेंगे। जब तक कि वे स्वयं ठोकर नहीं खा लेते।"
..इस बात से मैं पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ. वास्तव में हमारे देश के लोग अन्धविश्वासों में इस कदर जकड़े हैं कि ठोकरें खाने के बाद भी नहीं जागते. विभिन्न उलजलूल धार्मिक मीमांसाओं, तथाकथित (अकाट्य?) धार्मिक आदेशों, उपदेशों आदि ने आमजन को स्थाई रूप से धृतराष्ट्र व गांधारी बना दिया है.
आमजन आज विचित्र सम्मोहन की अवस्था में है जो उसे वैयक्तिक भौतिक उन्नति के विभिन्न शॉर्टकट्स सुझाता है. उसे सचेत करने की बात तो दूर की, उसे और अधिक पथभ्रष्ट करने में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है.
वास्तव में समाज की ऊपरी परत (layer) में उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्ति (जिनमें सरकार और विभिन्न धर्मगुरु भी आते हैं) आज अचेतावस्था में हैं तो निचली परत में अचेतना आना स्वाभाविक ही है.
आज जब मीडिया या सरकार में भी तथाकथित बुद्धिमान लोग एक-दूसरे की तरफ ताकते हुए देखा-देखी या अंदाजे से अपने अगले कदम उठाते हैं, केवल निज हितों को ध्यान में रखते हुए, ..तो प्रजा रूपी बच्चा क्या सीखेगा? आज के धर्मगुरुओं की तो बात ही अनोखी है, मायाजाल फ़ैलाने में लगे हैं और उनके इस मायाजाल को काटने के लिए हम लाख आलोचनाएं कर लें पर स्थिति बदलने वाली नहीं!
स्थिति तब ही बदल पायेगी जब समाज का ईमानदार वर्ग निःस्वार्थ भाव से ऐसी यथार्थ शिक्षा (मिताक्षर व परिष्कृत अध्यात्मशास्त्र) का प्रसार करे जिसको आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी खरा पाया जाए. यह तभी संभव हो पायेगा जब विभिन्न धार्मिक अवधारणाओं की जड़ तक जाकर उनके मंतव्य, मूल, सार आदि को खुले दिमाग से जानने की कोशिश की जाए और साथ ही इस क्रम में स्वतःस्फूर्त अनुभूतिजन्य ज्ञान का सहारा भी लिया जाए.
इस क्रम में कुदरत, प्रकृति और इसका सिस्टम हमें दिशा दिखाता ही है यदि हम मन में पहले से ही कोई धारणा बना कर न चलें तो!
ऐसा ही कुछ प्रयास/प्रयोग मैंने भी किया और इससे जो कुछ भी निकला, उसे बहुत धीरे-धीरे और यथासंभव आसानी से पचने योग्य भाषा में अपने ब्लॉग के माध्यम से समाज के साथ साझा करने की एक कोशिश कर रहा हूँ. कर्म पर मेरा अधिकार है और कर्म के अनुसार उचित समय पर उचित माध्यम से प्रतिक्रिया होनी निश्चित है, परन्तु बाट जोहने की आवश्यकता नहीं क्योंकि प्रकृति का सिस्टम अभूतपूर्व व अद्भुत है!

(३)
अभिभावकों, बड़ों या शुभचिंतकों की दिली ख्वाहिश होती है कि उनका बच्चा नेक राह पर चले.
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नेक राह पर चलने का मतलब किसी धर्म (पंथ) की शिक्षा के अनुसार 'लकीर का फ़क़ीर होना' नहीं वरन ऐसे रास्ते पर चलना जो मौजूदा समय के अनुसार उचित हो और मुझे, साथ ही अन्यों को भी आन्तरिक प्रसन्नता दे.
अपेक्षाकृत और अधिक छोटे शब्द में 'नेक राह पर चलना' मायने 'योग्य एवं न्यायप्रिय पथ पर चलना'.
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बच्चा जब छोटा होता है तो अभिभावक उससे सही काम करवाने के लिए उसे किसी न किसी 'पुरस्कार का लोभ' या 'दंड का भय' दिखाकर नेक राह पर रखने की कोशिश करते हैं.
परन्तु बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ हमारी इस क़वायद का तौर-तरीका परिपक्व एवं यथार्थ के करीब होता जाता है.
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'शैतान' शब्द के परिपेक्ष्य में भी शायद यही बात खरी उतरती है. परिपक्वता की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, प्रौढ़ता को हासिल करते हुए हमारे जेहन में 'शैतान' शब्द का अर्थ अब व्यापक भावार्थ में बदलना चाहिए, क्या आपको यह नहीं लगता?
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तब यह किसी एक अमुक धार्मिक शिक्षा से सम्बंधित न रहकर एक सार्वभौमिक सत्य के रूप में हमें समझ में आयेगा और किसी के लिए भी इसे समझना सरल होगा.
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पहले हम (आम लोग) अपरिपक्व थे, बिलकुल बच्चे जैसे, सो धार्मिक उपदेश भी उसी के अनुसार थे. अब तो हम बड़े हो गए हैं, फिर बचकाना व्यवहार क्यों करें?
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किसी काल में बनी विभिन्न धार्मिक नीतियाँ उस समय की जरूरत, जगह और माहौल के अनुसार तथा उस समय की हमारी बुद्धि को ध्यान में रखते हुए हमें योग्य पथ पर कायम रखने हेतु बनाई गयीं. तो वे नीति स्वरूप ही हुईं और नीतियाँ हमारी प्रौढ़ता के बढ़ने के साथ बदलती हैं, हमने ऊपर देखा था.
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पहले हम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक-दूसरे से अनजान थे, अब तो सम्पूर्ण विश्व एक छोटे से गाँव के समान और सब एक-दूसरे से वाकिफ़.
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अब हमें वास्तव में विकसित होने के लिए किसी भी सभ्यता से कुछ लेने (यदि वह सही है) और अपना कुछ छोड़ने (यदि वह गलत है) में संकोच नहीं होना चाहिए.
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सबका ईश्वर (सर्वोच्च शुभचिंतक/अभिभावक) भी यही चाहता है कि उसके सभी बच्चे परिपक्वता के शिखर तक पहुंचें.
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यदि हम यह नहीं समझ रहे तो माना जा सकता है कि "शैतान" अपनी चाल में अभी तक कामयाब है.
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पुनश्चः - ..अपने धर्म (पौराणिक नीति) पर ही 'सख्ती' के साथ चलना, ऐसा अटल इरादा हमें दूसरों के धर्म या विश्वास के प्रति सशंकित करता है या अन्धश्रद्ध कट्टर में रूपांतरित कर सकता है. फिर हम संकीर्ण हो सकते हैं, अन्यों को नीचा या शैतान तक समझ सकते हैं! ..परन्तु हमें तो विकसित एवं व्यापक होना है न!

(४)
बहुत अच्छा, तीखा व करारा प्रहार- हमारी आज की मानसिकता पर! आंखें खोलने वाला सच बयान किया है आपने.
..वैसे इस सच से बहुत से लोग वाकिफ़ हैं, ..पर आज आईना कौन देखना चाहता है और सच कौन सुनना चाहता है? अतः अधिकांश लोग अँधा और बहरा होने की एक्टिंग करते रहते हैं और जानबूझकर नादान बने रहते हैं.

(५)
नमस्कार बन्धु. आपने कहा- "सरकार और जनता दोनों सचेत हो जाएँ तथा सच्चे सदाचार को अपना लें, तो भ्रष्टाचार का नामो निशान मिट जायेगा। जनता एवं सरकार दोनों को जागृत होना पड़ेगा।"
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पर यह होगा कैसे?? ..नींद खोलने और सदाचार अपनाने के लिए कोई कारण (भय, लालच या 'ज्ञान') तो होना चाहिए उनके पास, जिससे कि वे motivate हो सकें! ज्ञान हो तो सबसे बढ़िया!

(६)
प्रत्येक चीज में 'कमी' और 'अति' दुष्परिणाम लाती है. खाना-पीना, सोना-जागना, मनोरंजन, भावुकता, अभिव्यक्ति, बहस, धार्मिक कृत्य, विश्वास-अविश्वास, प्यार-डांट, एकत्रीकरण-भण्डारण, अपनाना-परित्याग आदि अनेक ऐसे विषयों पर यह बात लागू होती है. आज भारतीय समाज में इन्हीं (कमी और अति) के कारण असंतुलन की स्थिति! ..शायद इस पर और अधिक मनन की आवश्यकता, ...क्षमा करें, इसकी आवश्यकता आपको भी!
साथ ही, प्रवृत्ति और निवृत्ति में संतुलन बैठाने की परम आवश्यकता! ...और निवृत्ति का क्रम प्रवृत्ति के पश्चात् ही! आरंभ में प्रवृत्ति एक स्वाभाविक व न्यायसंगत क्रिया, तथा प्रवृत्ति पश्चात् निवृत्ति की सोच एवं क्रिया अत्यावश्यक- इसमें कोई संदेह नहीं!
कृपया उत्तर अवश्य दें.

(७)
कोई भी प्राचीन धर्मग्रन्थ वहां के लोगों की उस समय की ज़रूरत के हिसाब से लिखे नीतिवचन हैं. प्राचीनकाल में प्रत्येक स्थान के लोगों की परिस्थितियों में भिन्नताएं थीं, सो प्रत्येक समुदाय के नीतिवचनों में शिक्षाएं, वरीयताएं भिन्न थीं.
पहले साधारण मानव अति सीमित था- शायद केवल अपने कबीले तक, ..अब सम्पूर्ण विश्व के लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आ चुके हैं. ..धार्मिक विश्वासों के रूप में अपनी-अपनी प्राचीन धरोहरें भी सबके पास हैं, ..परन्तु अधिकांश अभी तक बेड़ियों में जकड़े हैं, अपने ज्ञान को विस्तार ही नहीं देना चाहते.
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स्थिति तब ही बदल पायेगी जब विभिन्न धार्मिक अवधारणाओं की जड़ तक जाकर उनके मंतव्य, मूल, सार आदि को खुले दिमाग से जानने की कोशिश की जाए और साथ ही इस क्रम में स्वतःस्फूर्त अनुभूतिजन्य ज्ञान का सहारा भी लिया जाए.
इस क्रम में कुदरत, प्रकृति और इसका सिस्टम हमें दिशा दिखाता ही है यदि हम मन में पहले से ही कोई धारणा बना कर न चलें तो!

(८)
बहुत सही चोट की है आपने वर्तमान व्यवस्था पर! ..हम भारतवासियों का जीवन चल नहीं रहा, वरन दौड़ रहा है. दूरी तो बहुत तय करते हैं रोज, परन्तु विस्थापन बहुत थोड़ा सा ही होता है शायद! विकास और मेंटेनेंस की बात कर रहा हूँ मैं! ..भागमभाग बहुत, शोर बहुत, थकान बहुत, परन्तु हाथ कुछ ख़ास नहीं आता. ...क्योंकि भ्रष्टाचारी तरीकों के अतिरिक्त योजनाबद्ध शायद कुछ भी नहीं. सो भ्रष्टाचार के विकास में कोई कमी नहीं और न ही कोई बाधा; शेष सब कुछ आधा (या वो भी जाए भाड़ में)!