Sunday, May 1, 2016

(७२) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १५

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
वस्तुतः कर्म करना हमारे वश में है और यदि कर्म में कुछ बात होगी तो फल आयेगा ही! कब, कहाँ और कैसे, ..इसका उत्तर देने में बड़े-बड़े ज्ञानी असमर्थ हैं!
बीज के गुण-अनुरूप ही पौधा निकलता है. पथरीली भूमि में, चट्टानों पर और रसोईघर के डिब्बे में बीज महीनों-वर्षों तक अंकुरित नहीं होता, परन्तु योग्य वातावरण पाते ही वह 'क्रियाशील' हो जाता है!
कभी-कभी कुछ अच्छे बीज स्वयं ही नष्ट हो जाते हैं और कुछ को वातावरण या परिस्थितियां भी नष्ट कर देती हैं, इसके बावजूद किसान, किसानी नहीं छोड़ता है ..और अंततः सफल होता ही है! वैसे अपवाद भी होते हैं परन्तु उनका प्रतिशत या अनुपात बहुत कम या नगण्य ही! ..तो कुछ-एक असफलताओं से हम उस कर्म को नहीं त्याग सकते जो बहुधा हमें वास्तव में खरा फल दे सकता है! ..किसी-किसी अत्यंत दुष्कर व जटिल कर्म को करते समय हमें समय की बाधा नहीं होती, क्योंकि हम अनंत हैं! ..कुछ प्रयास इस जन्म में, और बचा हुआ फिर कभी... (law of conservation of energy applies here)!

(२)
माया अर्थात् यह संसार या विशेषकर यह भूलोक (भौतिकता), ..और यह एक आत्मा के लिए अस्थाई या अल्पकालिक है, कुछ ही समय का पड़ाव! ..ऐसा पड़ाव जो आध्यात्मिक जगत से पृथक है, ..और जुड़ा हुआ भी! पृथक इसलिए क्योंकि प्रत्येक भौतिक चीज नश्वर और आत्मा रूपी ऊर्जा स्थाई! मनुष्य रूपी जीव बुनियादी रूप से 'आध्यात्मिक' परन्तु इस शरीर में, एक सांघिक ढांचे में 'भौतिक'! ..और जब सबकुछ प्रकृति के नियमों के अधीन, तो यह सब भी उसी सिस्टम के अंतर्गत! ..अतः जड़ साधु-सन्यासियों की भांति जग को ठुकराना या उसके प्रति संवेदनहीन रहना गलत! ..इस मानव देह और इस नश्वर जगत में ही हमारी आध्यात्मिक साधना (अविद्या का नाश) संभव व सार्थक! ..तो क्यों इसको निकृष्ट या त्याज्य समझा जाए? ..इसलिए 'माया' अच्छी भी और बुरी भी! ..हम एकदम से इसी ख़ारिज करें, इतनी बुरी भी नहीं.., क्योंकि यह हमारे लिए एक बड़ी प्रयोगशाला, व्यायामशाला, विद्यालय सभी कुछ, ..जहां से होकर आध्यात्मिक चरम का मार्ग जाता है; ..और चूँकि यह (माया) 'अंत' नहीं वरन 'मार्ग' है अतः इतनी अच्छी भी नहीं कि हम इसके प्रति तीव्र-आसक्त हो जायें!
..फिर भी हम मुसाफिर ही सही, कुछ समय तो हमें यहाँ बिताना ही होता है और एक 'सिस्टम' के तहत सांघिक रूप से ही (वैज्ञानिक भी मानते हैं कि मनुष्य मूलतः एक सामाजिक प्राणी है)! ..तो फिर इस प्रवासकाल में हमें 'सिस्टम' को मानते हुए 'प्रवृत्ति' को अपनाना पड़ता है, ..परन्तु 'सिस्टम' के अंतर्गत ही समानांतर रूप से 'निवृत्ति' भी आवश्यक होती है! बहुधा यह बात हमें याद नहीं रहती और हम इस जगत रूपी विद्यालय में उन्नति नहीं कर पाते और अनेक जन्मों/पीढ़ियों तक एक ही कक्षा में ही रह जाते हैं!
दूसरे प्रश्न का उत्तर- हम एक साधारण विद्यालय में भी तो कुछ समय के लिए प्रवेश लेते हैं, फिर भी जब तक वहां रहते हैं तब तक वहां के क्रियाकलापों में हिस्सा बनते हैं, और उस विद्यालय की बेहतरी के लिए कुछ न कुछ योगदान देते हैं. संयोग से हमीं बड़े और योग्य होकर जब उस विद्यालय में अध्यापक, प्रधानाचार्य या प्रबंधक पद तक पहुँच जाते हैं तो बहुत सी उन परिपाटियों, व्यवस्थाओं आदि को बदलने/सुधारने का प्रयत्न करते हैं जो विद्यार्थी जीवन में हमें खटक रही होती थीं! ..परन्तु यह सब हम अब कर पा रहे होते हैं तो एक 'योग्यता' व 'अधिकार' पाने के पश्चात्!
शब्द अपर्याप्त.

(३)
मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने ब्लॉग-पोस्ट से कुछ टिप्पणियां डिलीट की हैं.
कारण-- मैं ऐसा किसान हूँ जो इस ब्लॉग-समूह रूपी खेत में कुछ अच्छे बीज बोने के लिए प्रयत्नशील है- बिलकुल नेक इरादे से, बिना किसी की भावना को आहत किए.
फिर यदि यहाँ कोई खरपतवार उग आती है तो उसे साफ़ करना इस किसान की मजबूरी नहीं, बल्कि कर्तव्य है. ..अब कोई इस खरपतवार को गुणी जड़ीबूटी समझ बैठे तो वह नाराज होने के लिए स्वतंत्र है!
गलत करना जितना बड़ा पाप है; उतना ही बड़ा पाप, गलत को सहना या उसका पोषण करना, भी है. ..और यह मुझसे हो नहीं पाता, इसे आप इस ब्लॉग के अधिकांश लेखों में महसूस कर सकते हैं.
कोमलता व नम्रता का अर्थ यह नहीं कि हम दुर्बल बन जायें (या समझे जायें)! श्रीकृष्ण जी ने हमें इसका सुस्पष्ट उदाहरण दिया है अपने जीवन से! उनके जीवन-प्रसंगों में थोड़ा गहराई में जाने की आवश्यकता है बस! फिर मात्र बुराई से घृणा होगी, बुरे से नहीं! केवल साक्षीभाव से नहीं वरन निष्पक्षता व तटस्थता से देखना और करना संभव हो जाएगा तब!

(४)
निश्चित ही हम खुशफ़हमी और कल्पनालोक में ही हैं, ..और जड़ से हो गए हैं! आत्ममुग्धता हमें आभासी उत्कृष्टता का छलावा देती है और हम उस पर इतराते हुए सबसे ऊपर होने की गलतफ़हमी में रहते हुए निश्चिन्त हो रुक (थम) से गए हैं! ..और लम्बे समय से रुका (जमा) हुआ स्वच्छ पानी भी....!!
..और हम परिवर्तन के नाम पर जो परिवर्तन भी कर रहे हैं, खास तौर पर हमारे तथाकथित अगुआ, ..वे उसी प्रकार हैं जैसा कि यह लेख (अभिजात वर्ग) बताता है; ..और ये बातें सर्वविदित हैं, मैंने कोई नई बात नहीं बताई!

(५)
जैसे आप वैसा ही मैं! लेकिन इस मानव देह में हम भिन्न-भिन्न दीखते हैं! हम 'यहां' और 'इस' देह में हैं इसका अर्थ ही यही कि हम अपूर्ण हैं, ..और पूर्णता हेतु एक-दूसरे पर आश्रित! ..इसीलिए हम संघ-स्वरूप रहते हैं! ...संघ में एक साथ रहना है तो एक-दूसरे को समझना आवश्यक! ..और परस्पर मित्र बन कर ही हम यह काम कर सकते हैं.
आपको सादर नमस्कार.

(६)
धर्म तो सर्वदा उपस्थित है ही, परन्तु विविध आडम्बरों ने उसे ढक सा लिया है. ..इनके चलते उसका प्रत्यक्ष प्रकटीकरण बहुत कठिन हो गया है! और उसके अभाव में (ढके होने से) सबकुछ अव्यवस्थित हो गया है!

(७)
"एक विदेशी बहुत बड़ा नास्तिक था..उसने कई देश देखे पर भारत नही...किसी ने सलाह दी, "भारत बहुत धार्मिक देश है...एक बार जाओ.." वह विदेशी भारत भ्रमण पर आ गया...उत्तर प्रदेश..बिहार...मध्य प्रदेश....कई जगह गया..जब वापस अपने देश पहुँचा तो बहुत बड़ा धार्मिक बन गया ..पूछने पर बोला,"..जैसे वो देश चल रहा है उसे निश्चित ही भगवान चला रहा है...वहां सब भगवान भरोसे ही है...."
'अच्छा व्यंग हमारे मौजूदा हालात पर! यह सही बात है कि हमारा देश भगवान् भरोसे चल रहा है, और संभवतः यही देखकर भारत के अधिकांश तथाकथित विचारक निश्चिन्त हैं कि एक दिन सब कुछ स्वतः ठीक हो जाएगा!
लेकिन हमें यह जानना और समझना चाहिए कि इतने भ्रष्ट माहौल के बावजूद यदि गाड़ी चल रही है तो निश्चित ही यह बिलकुल वैसा ही है- मानों हम पुरखों की जमा-पूँजी से जीवन चला रहे हैं मगर निकट अतीत व वर्तमान में लगभग अकर्मण्य ही हैं! ..और एक दिन यह जमा-पूँजी समाप्त होना निश्चित है!!'