Friday, May 6, 2016

(७३) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १६

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
हमें व्यक्ति को नहीं, बल्कि विचार को ध्यान में रखना चाहिये. समर्थन या विरोध 'विचार' का ही होना चाहिए.
बात गलत लगने पर किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि विचार का विरोध करें तो अच्छा रहेगा. ..और सबसे अच्छा तो यह कि बिना किसी का विरोध किये अपनी सही (?) बात प्रस्तुत की जाये, ..बात में दम होगा तो उसकी गूँज होगी अन्यथा....!

(२)
मार्गदर्शकों में अभिभावक (माता-पिता), स्कूली अध्यापक, हमारे समाज के गणमान्य व्यक्ति, धर्मगुरु, सद्गुरु, ईश्वरावतार आदि सभी आ जाते हैं. परन्तु विषय का केंद्र-बिंदु 'वर्तमान समय' के ऐसे लोग हैं, आम समाज के मन पर जिनकी छवि सर्वोच्च रूप से अंकित है, और आम जन उनके अनुयायी हैं, उनका अनुसरण करते हैं. ..आम जन अपरिपक्व हैं, और वे (मार्गदर्शक) पर्याप्त रूप से परिपक्व हैं, उनकी छवि ऐसी है, या वे ऐसा दावा करते हैं; और वे आम जन (या किसी एक समुदाय) को मार्गदर्शित करने वाले की भूमिका में हैं (इससे उन्हें इंकार भी नहीं है)! 'वर्तमान समय' के ऐसे लोगों में वे प्रमुखता से आ जाते हैं जिन पर समाज में नैतिक मूल्य स्थापित करने का दायित्व है और निश्चित रूप से अभिभावक और आध्यात्मिक गुरु उनमें से एक हैं.

(३)
..मैं आपसे एक बात ईमानदारी से शेयर करना चाहता हूँ कि मैंने अध्यात्म के विषय में बहुत अधिक किताबी अध्ययन नहीं किया है, और जो थोड़ा-बहुत पढ़ा भी है, वह भी कुछ अध्यात्म/साधना विषयक अनुभूतियाँ होने के पश्चात् 'कन्फ़र्मेशन' हेतु ही, क्योंकि अचानक यह सब घटित होने के बाद मैं कंफ्यूज़न की स्थिति में था! ..और मैंने मात्र उतना ही पढ़ा जिससे मेरा कंफ्यूज़न कुछ हद तक दूर हो जाए. ..अतः बहुत सी प्रचलित शास्त्रीय संज्ञाओं व परिभाषाओं से सर्वथा अनभिज्ञ हूँ. शब्द व भाषा को केवल इतना ही महत्त्व देता हूँ कि वह अनुभूतिजन्य विचार संप्रेषित करने का माध्यम मात्र है. अतः हो सकता है बल्कि होता ही है कि शास्त्रीय शब्दों का चुनाव मुझसे ढंग से नहीं हो पाता. कृपया इसे अनदेखा करें और शब्दों के पीछे विद्यमान मंतव्य को समझने का यत्न करें.

(४)
आपके कथन के अनुसार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पहले आम जन (90%) भ्रष्ट हुआ, फिर वही बीमारी ऊपर के मार्गदर्शक वर्ग को भी लग गई!
लेकिन मेरा निष्कर्ष कुछ अलग है- किसी अभिभावक का बच्चा या किसी गुरु/सद्गुरु का शिष्य यदि बिगड़ जाए, भ्रष्ट हो जाए, ..तो क्या सम्बंधित अभिभावक या गुरु/सद्गुरु भी उसके पीछे चल कर भ्रष्ट हो जाता है या हो सकता है?? अपवाद को छोड़ दें कृपया, केवल इस पर विचार करें कि अक्सर क्या होता है?? भीतर से जवाब यही आयेगा कि ईमानदार अभिभावक या गुरु अपनी खराई बनाकर रखता है और अथक प्रयास के पश्चात् भी न सुधरने वाले कुछ चेलों को उनके कर्म, प्रारब्ध व समय पर छोड़कर, शेष शिष्यों को योग्यतम रूप से मार्गदर्शित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता है. ...और उसके लिए वह 'आचरण' के माध्यम से शिक्षा का प्रभावी संचरण करता है, केवल 'कथनी' से नहीं!
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पिछले कुछ समय से कदाचित पहले मार्गदर्शकों के आचरण में ही कुछ गिरावट आई जिसके फलस्वरूप उनके अनुयायी (आम जन) भी प्रभावित हुए. ...मार्गदर्शक मात्र 'कथनी' तक सीमित रह गए! ..शनैः शनैः यह रोग बढ़ता ही जा रहा है. हम शिक्षा कुछ दें और करें कुछ और, ..तो क्या होगा? हम अपने निजी जीवन में घनघोर आसक्त हों और पाठ पढाएं अनासक्ति का; हम स्वयं 'निज स्वार्थवश' अक्सर झूठ बोलते हों और पाठ पढाएं सत्य का; ..तो क्या होगा? कोई भी यह बात आसानी से समझ सकता है, फिर भी सहसा विश्वास नहीं होता है!
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आज हमारे समाज की लगातार हो रही नैतिक अवनति के लिए हमारे अधिकांश तथाकथित गुरुजन, मार्गदर्शक एवं हम स्वयं (अभिभावक रूप में) दोषी हैं. जहां कथनी और करनी में अक्सर ही भारी अंतर रहे, वहां की मौजूदा स्थिति के लिए वास्तव में दोषी कौन, अब पाठक सहज ही समझ सकते हैं!
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लेकिन इस काल को आपद्काल समझकर आमजन में से ही कुछ सचेत लोगों को अपना स्तर ऊपर उठाने की भारी आवश्यकता है जिससे इस जीर्णशीर्ण अवस्था से कुछ ऊपर उठने का क्रम आरंभ हो! ..और श्रीमान् जी, निश्चित ही आपके ऊपर भी एक जिम्मेदारी बनती है क्योंकि आप भी उन सचेत लोगों में से एक हैं.
प्रथमतः कुछ लाइट-टावर्स ही वर्टिकली खड़े होकर प्रकाशित हो जायेंगे तो फिर हॉरिजॉन्टली प्रकाश फैलने में समय नहीं लगेगा.

(५)
देश में जितने अधिक लोग जागेंगे और अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत होंगे, उतनी ही तेजी से देश का असली विकास होगा, अन्यथा अब अंग्रेजों की जगह कोई और आ जाएगा!

(६)
दरअसल होता वही है जो हम सही में (वास्तव में) चाहते हैं. अनेक अवसरों पर हमारे ओठों पर कोई और बात होती है और दिल में कोई और! हमारे चाहने से ही कोई सेल्समेन हमारे घर में प्रविष्ट हो सकता है! अब यदि घर पर आया कोई सेल्समेन हमें लूट कर चला जाए, तो अधिक दोष किसका?

(७)
हमें यह नहीं भूलना होगा कि हमारा समाज केवल कुछ ही समय में नीचे नहीं गया है वरन यह धीरे-धीरे हुआ है; और निश्चित ही इसमें सबका योगदान है, हमारा भी! ..और यह भी निश्चित है कि तस्वीर बदलेगी भी धीरे-धीरे..., और इसमें भी हम सब के योगदान की ज़रूरत होगी! हम अपने योगदान में जितने सुस्त रहेंगे, उतना ही विलम्ब होगा अच्छे दिन आने में!