Tuesday, July 18, 2017

(८१) नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों और वैवाहिक संबंधों में सादृश्यता

(१) नौकरियों में आजकल एक अच्छी प्रथा है कि "एक व्यक्ति - एक पद"। अर्थात् व्यक्ति केवल एक ही जगह या एक ही पद पर कार्य कर सकता है, क्योंकि एक से अधिक जगह कार्य करने पर निष्ठा एवं हितों का प्रभावित होना संभव होता है।
* अतीत में विवाह संस्कार (प्रथा) का जन्म भी कदाचित् इसी दृष्टिकोण के साथ हुआ होगा!

(२) एक ही समय में एक से अधिक स्थानों पर कार्य करने से या एक से अधिक व्यक्तियों के लिए कार्य करने से परस्पर निष्ठा एवं हितों के टकराव के अतिरिक्त, अनेकों मतभेद भी जन्म लेते हैं, जिनकी परिणति भयंकर कलह और कोर्ट-कचहरी भी हो सकती है। फलतः मन की शांति, सम्मान और साख पर विपरीत असर पड़ सकता है।
* अनेक से दैहिक अन्तरंग सम्बन्ध बनाने का भी यही परिणाम होता है। यहां स्पष्ट कर दूं कि स्वस्थ मित्रता एक चीज है और दैहिक अन्तरंग सम्बन्ध एक दूसरी चीज। स्वस्थ मित्रता छुपानी नहीं पड़ती, जबकि चलन या प्रथा विरुद्ध बनाया गया कोई भी अन्तरंग सम्बन्ध छुपाने की कोशिश रहती है।

(३) किसी नौकरी में व्यक्ति, नियोक्ता को कुछ (श्रम) देता है और बदले में नियोक्ता उस व्यक्ति को कुछ (वेतन) देता है। उस रिश्ते में दोनों के स्वार्थ के साथ उनके हित भी शामिल रहते हैं। कोई व्यक्ति यदि छुपकर चोरी से समानांतर रूप से किसी अन्य नियोक्ता के लिए भी कार्य करता है तो व्यक्ति आवश्यकता से अधिक स्वार्थी, लालची एवं कमजोर चरित्र का माना जाता है।
* जीवनसाथी के अतिरिक्त किसी अन्य से दैहिक अन्तरंग सम्बन्ध रखने के मामले में भी यही बात खरी उतरती है।

(४) किसी नियोक्ता और उसके साथ जुड़े व्यक्ति के आपसी सम्बन्ध तब तक मधुर और स्थाई बने रहते हैं जब तक कि वे दोनों एक-दूसरे की भावनाओं और आवश्यकताओं की कद्र करते हैं।
* ऐसा ही कुछ ध्यान रखने पर वैवाहिक सम्बन्ध भी अटूट रहते हैं।

(५) नियोक्ता या कर्मचारी में से किसी एक के भी अधिक स्वार्थी या अवसरवादी या लोभी होने पर उनका सम्बन्ध टूटता है।
* वैवाहिक रिश्तों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है।

(६) वेतन एक से और काम किसी अन्य के लिए करना, या किसी से काम लेना और वेतन किसी अन्य को देना; ऐसा बिलकुल भी नहीं चलता। जाहिर (प्रकट और वैध) रिश्ता एक पल में टूट जाता है!
* इसी प्रकार अन्तरंग सम्बन्ध किसी से और विवाह किसी अन्य से, या फिर एक से विवाह और अन्य से अन्तरंग सम्बन्ध; यह बिलकुल भी नहीं चलता। चलेगा तो छुपकर; और भेद खुलने पर उन्हें स्वार्थी, लालची एवं कमजोर चरित्र का माना जायेगा और वैध रिश्ता टूटेगा अथवा उसमें भारी दरार पड़ेगी।

कुछ और मिली-जुली बातें--
दोस्ती और रिश्ता (फ्रेंडशिप और रिलेशन) दोनों अलग-अलग चीजें हैं। दोस्ती माने स्वस्थ मित्रता। खरी दोस्ती सामान्यतः किसी स्वार्थ अथवा भौतिक या दैहिक लालच पर नहीं टिकी होती। इसीलिए दोस्ती से बड़ा कुछ नहीं, इसीलिए दोस्ती अनेकों से की जा सकती है, दोस्ती लिंगभेद से परे होती है।
हम मनुष्य इतने विशाल हृदयी नहीं कि स्वार्थों से परे रह पाएं, और इतने समर्थ भी नहीं कि आवश्यकताएं ही न हों। तो विभिन्न भौतिक स्वार्थों और आवश्यकताओं की गरिमापूर्ण ढंग से पूर्ति के लिए हमारे पूर्व नीति-नियंताओं ने अतीत में कुछ सामाजिक व्यवस्था बनाई। इसी व्यवस्था के अंतर्गत रिश्तों का जन्म हुआ, उन्हें कुछ नाम दिए गए, जैसे माँ, पिता, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन, पति, पत्नी आदि-आदि।
प्रेमी-प्रेमिका भी एक प्रकार का रिश्ता ही है, किन्तु अतीत के उदाहरण उठाकर देखें तो यह रिश्ता अस्थाई ही माना गया है। भविष्य में इसकी परिणति विवाह-सम्बन्ध के रूप में हुई है या तो यह टूटा है। और यदि आगे चला है तो छुपकर ही, एक अवैध सम्बन्ध के रूप में!
समाज-व्यवस्था बनाये रखने के निमित्त निर्मित किये गए इन रिश्तों के बीच दोस्ती या स्वस्थ मित्रता सदा से अस्तित्व में रही है। इसको सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, तभी तो ऐसे कहा जाता है-- "मैं तुम्हारा पिता हूँ, लेकिन इससे पहले मैं तुम्हारा दोस्त हूँ"; "मैं आपकी पत्नी हूँ लेकिन इससे पहले एक अच्छी दोस्त हूँ"; "तुम मेरी माँ कम और दोस्त ज्यादा हो"। दोस्ती की महिमा का बखान करने वाले ऐसे वाक्य अक्सर सभी रिश्तों के मध्य नजर आते हैं।

कोई वेतनभोगी कर्मचारी भी अपने किसी निहायत खाली समय में, नियोक्ता के प्रति बिना किसी निष्ठा या हित के टकराव की कीमत पर, बिना किसी स्वार्थ या लालच के किसी अन्य को कोई सलाह देता है या किसी अन्य के काम में कोई मदद करता है तो इसमें उसके नियोक्ता को कोई भी आपत्ति नहीं होती।
ठीक इसी प्रकार का संतुलन हमें रिश्तों और दोस्ती के बीच भी बनाना चाहिए। अर्थात् किसी रिश्ते को किसी अन्य की दोस्ती से अधिक वरीयता देनी चाहिए। दोस्ती करें लेकिन रिश्ते की कीमत पर नहीं; क्योंकि प्रत्येक रिश्ता एक विशेष उद्देश्य से बना है, उसमें कुछ करार (नियम, शर्तें, अनुबंध) है।

क्या ही अच्छा हो कि हम प्रत्येक रिश्ते में दोस्ती को भी घोल दें। लेकिन हम मानव हैं, ऐसा कर न पायेंगे! यदि ऐसा संभव हो गया तो फिर जरूरत पड़ने पर कोई भी व्यक्ति किसी भी नियोक्ता का कोई भी काम कभी भी कर दिया करेगा; और आवश्यकता पड़ने पर किसी भी नियोक्ता से अपनी जरूरतों के लिए कितना भी धन ईमानदारी से ले लेगा!! ऐसा होना तो असंभव ही दीखता है! परस्पर सम्पूर्ण निःस्वार्थता और ईमानदारी स्थापित होना बहुत दूर की कोड़ी है! इसीलिए हमारे पूर्वजों ने कुछ समाज-व्यवस्था बनाई और उसके अंतर्गत रिश्ते-नाते बने; जिसके कारण लोग परस्पर एक सभ्य, गरिमामय और सौहार्दपूर्ण वातावरण में रह पाते हैं, अन्यथा अनाचार फैलते देर न लगती!
फिर भी देखा जाता रहा है कि इस सब सामाजिक व्यवस्था के बावजूद भी अनाचार अपना सिर उठाता रहा है। आज के दौर में लिव-इन कल्चर एवं विवाहेत्तर अन्तरंग सम्बन्ध पनप रहे हैं। बहुधा ये सम्बन्ध चोरी-छुपे ही बनाये जाते हैं। छुपकर वही काम किया जाता है, जो गलत हो! कुछ तथाकथित बोल्ड लोग खुलेआम इन संबंधों का प्रदर्शन करते हैं और इन संबंधों में कोई बुराई नहीं समझते। लेकिन तटस्थ और गहरी समझ से इन संबंधों को निहारा जाये तो पायेंगे कि इनके पीछे स्वार्थ, वासना, लोभ आदि संलग्न रहते ही हैं। रिश्तों की प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के विपरीत इन संबंधों में कोई गहरा आत्मीय करार नहीं होता है। अतः कुछ ही आगे चलकर निष्ठा एवं हितों का जबरदस्त टकराव सामने आता है; फलस्वरूप अवसाद, लड़ाई-झगडा, जग-हंसाई आदि के साथ-साथ चरित्र की दुर्बलता उजागर होती है। सम्बंधित स्त्री-पुरुष या तो पशुवत तामसिक प्रवृत्ति का हो जाता है या फिर अवसादग्रस्त! लगभग असंभव ही है कि किसी के हितों का नुकसान हुए बगैर, निःस्वार्थ और विशुद्ध दोस्ती के वातावरण में लिव-इन या विवाहेत्तर सम्बन्ध खुलेआम 'चिरकाल' के लिए बने रह सकें! इति।

Thursday, July 6, 2017

(८०) गुरुपूर्णिमा विशेष

'गुरु' शब्द का सबसे सरल अर्थ है कि जो भी हमें कुछ सीख दे वो गुरु है। जिस पल हमें जिससे भी कोई सीख मिलती है, उस पल वह हमारा गुरु है। माता-पिता, भाई-बहन, नाते-रिश्तेदार, समाज, अध्यापक, ये सभी हमारे लिए गुरु ही हैं। जीवन में घटने वाले प्रसंग भी हमें कुछ सिखाते हैं, तो वे भी एक प्रकार से हमारे गुरु ही हुए।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से हम मूलतः एक सूक्ष्म तत्त्व (आत्मा) हैं, जो एक स्थूल देह (भौतिक शरीर) में प्रवास करता है। वैसे तो प्रत्येक आत्मा सम्पूर्ण ज्ञान से सराबोर है या यूं कहें कि पहले से ही सीखी-सिखाई है, फिर भी इस पर 'अविद्या' का आवरण चढ़ा होता है जिसके कारण उसके ज्ञान से व्यक्ति वंचित ही रहता है। 'अविद्या' मात्र एक शब्द है समझने के लिए। 'अविद्या' अर्थात् उस मनुष्य का मन, चित्त (अंतर्मन), बुद्धि और अहंकार। व्यक्ति के अंतर्मन में जन्म-जन्मान्तर के संस्कार, तीव्र इच्छाएं, रूचि-अरूचि केंद्र, स्वभाव केंद्र, विशेषताओं के केंद्र, लेन-देन केंद्र आदि इस जन्म के आरंभ से ही विद्यमान रहते हैं। जन्म पश्चात् ये सब चीजें आत्मा के इर्दगिर्द अपना मकड़जाल पहले से ही फैलाए होती हैं, भले ही आरंभ में ये सब सुप्तावस्था में ही होती हैं! इस आवरण के कारण हमारी इन्द्रियों को आत्मा रूपी ज्ञान-स्रोत से ज्ञान का प्रकाश बहुत कम (लगभग नगण्य) ही मिलता है। बाद में शिशु के बड़ा होते-होते उसके मन पर इस जन्म के संस्कार (सीखें) भी अंकित होना शुरू होते हैं। कुछ वर्तमान कारणों से और कुछ प्रारब्ध के कारण इस समय जैसी परिस्थितियां समक्ष आती हैं या बनती हैं, वे सोये हुए पूर्व संस्कारों के लिए पोषक वातावरण उपलब्ध कराती हैं, फलतः वे संस्कार भी आयु बढ़ने के साथ-साथ शनैः शनैः जाग्रत होना आरंभ कर देते हैं। इस जन्म में निर्मित संस्कार और पूर्वजन्मों के संस्कार दोनों मिलकर व्यक्ति के वर्तमान व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
इस दौरान व्यक्ति को बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता पड़ती है। इस क्रम में बहुत से माध्यमों से वह सीख प्राप्त करता है। जिससे भी वह सीख प्राप्त करता है, शाब्दिक रूप से उसे 'गुरु' की संज्ञा दी गयी है।
जैसे मनुष्य मूलतः एक सूक्ष्म तत्त्व है, ठीक वैसे ही 'गुरु' भी मूलतः एक सूक्ष्म तत्त्व ही है। कभी वह अदृश्य सूक्ष्म ज्ञान स्पंदनों के रूप में कार्य करता है, तो कभी वह स्थूल देह (जीव, मनुष्य अथवा प्रसंग) से आने वाले मार्गदर्शन के रूप में कार्य करता है। जब हममें जिज्ञासा अपने चरम पर होती है तो गुरु-तत्त्व सूक्ष्म रूप से कार्य करता है और बहुत शीघ्र सिखाता है। इसका एक रोचक उदाहरण-- विद्यालय की परीक्षाओं के दिनों में जब घर में पढ़ते समय किसी प्रश्न का अर्थ या गणित के किसी सवाल का जवाब नहीं सूझ रहा होता है, तो उसके हल के लिए हम बहुत व्यग्र हो जाते हैं; फिर अचानक शौच या स्नान या निद्रा (अर्धनिद्रा) के समय अनायास ही हमें उसका हल मिल जाता है। किसी व्यक्ति ने तो आकर हमें उसका हल बताया नहीं, फिर कैसे मिल गया अचानक?! हमारी तीव्र जिज्ञासा के कारण ऊपर लिखी अवस्थाओं में हम वाह्य जगत से कट गए और उस प्रश्न पर पूरी तरह से केन्द्रित हो गए, तो हमारे लिए उपलब्ध आन्तरिक एवं वाह्य, सभी सूक्ष्म ज्ञान-स्रोत सक्रिय हो गए और हमें हल मिल गया! अब यह कहना बहुत मुश्किल कि हल भीतर के ज्ञान-स्रोत (आत्मा) से मिला या फिर बाहरी किसी सूक्ष्म ज्ञान-केंद्र से! प्रत्यक्ष में सिद्ध न हो सकने वाली वास्तविकता तो यह है कि सभी आत्माएं सूक्ष्म रूप से एक ही हैं या परस्पर सम्बद्ध हैं; आवश्यकतानुसार या परिस्थिति-अनुसार हमें योग्य स्थान से योग्य मार्गदर्शन (सूक्ष्म अथवा स्थूल में) मिल जाता है, शर्त यह कि हम पूरी तरह से जिज्ञासु हों!
यूं तो मान्यता यही है कि इसी गुरुतत्त्व को पूजने हेतु, कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु गुरुपूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है, पर इसमें इतना अवश्य जोड़ना चाहूंगा कि प्राचीन गणनाओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु-तत्त्व अत्यधिक सक्रिय होता है (विशेषकर सूक्ष्म स्तर पर)। अतः इस दिन गुरुतत्त्व के प्रति पूरी तरह से समर्पित होकर सम्पूर्ण श्रद्धाभाव से जब हम दिन व्यतीत करते हैं (ऊपर से दिखने में रोजाना की तरह ही, पर भीतरी रूप से भाव से ओतप्रोत), तो गुरुतत्त्व अन्य दिनों की अपेक्षा इस दिन सूक्ष्म अथवा स्थूल रूप से हमारी कई गुना अधिक मदद करता है। हमारा भाव एवं समर्पण, सक्रिय गुरुतत्त्व के हमतक सुगम संचरण के लिए पोषक वातावरण तैयार करता है। गुरुतत्त्व से मिलने वाली मदद या सीख का सबसे बड़ा परिणाम यह होता है कि हमारे आत्मा पर ढका आवरण धीरे-धीरे नष्ट होता है, और इसके कारण अब हमारी ज्ञानेन्द्रियों-कर्मेन्द्रियों को धीरे-धीरे अविद्या के स्थान पर आत्मा से शुद्ध ज्ञान-प्रकाश मिलना आरंभ होता है। हम आध्यात्मिक रूप से उन्नत होते जाते हैं। भौतिक जगत अब हमारे लिए पहेली नहीं रह जाता और न ही अपनी चकाचौंध से हमें हैरान कर पाता है। पर्याप्त सीख हासिल करने के पश्चात् हम एक सहज और खुशनुमा जीवन जीते हैं, हमारे अधिकतर निर्णय भले और न्यायोचित होते हैं। हमें जीवन का अर्थ बखूबी समझ में आ जाता है। विभिन्न धर्म (पंथ) और धर्म-संस्कृति सम्बन्धी वाद-विवाद हमारे लिए गौण हो जाते हैं। पश्चात् हम भगवा चोला पहनकर साधू-सन्यासी नहीं बन जाते बल्कि औरों की तरह सामाजिक जीवन ही जीते हैं। कमाते भी हैं, खर्च भी करते हैं, बचाते भी हैं; वैवाहिक जीवन भी व्यतीत करते हैं; माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी भी बनते हैं; लेकिन इन सब क्रियाओं के दौरान भीतरी रूप से हम कुछ अलग से होते हैं- बिलकुल सहज और मस्त! भविष्य की चिंता व प्रारब्ध से शिकायतें भी न्यूनतम हो जाती हैं। क्योंकि हम यथार्थ रूप से धर्म-ज्ञान (right knowledge) और धार्मिकता (righteousness) को प्राप्त कर लेते हैं। इति।

Wednesday, July 5, 2017

(७९) एक पोस्ट पर की गई टिप्पणी

आपने लिखा, "...मोदी सरकार की कमियां गिनाने वाले ऐसे भी हैं जिन्हें ये भी पता नहीं कि भारतीय संविधान में कितनी विसंगतियां और पेचीदगियां हैं जिनका लाभ लेकर अब तक भारतीय प्रजातन्त्र और प्रजा दोनों से सिर्फ खिलवाड़ ही हुआ है और कुछ संवैधानिक संशोधनों के बिना देश हित के सभी कार्य कर पाना वह भी शीघ्रता से, एक प्रधान के लिए सम्भव ही नहीं है!"

इस पर मेरा विचार यह है कि व्यवस्था संबंधी जितने भी संवैधानिक नियम-कानून अभी अस्तित्व में हैं, ..यदि उनमें से 50% पर भी शासन-प्रशासन द्वारा ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से अमल हो जाये, तो आम जनता के लिए यह बहुत राहत की बात होगी। ..और यदि मौजूदा कानून-नियमों पर 100% अमल ईमानदारी से हो जाये तो फिर तो जनता ईश्वरीय-राज्य में होने का अनुभव करेगी।
हमारे नियम-कानून इतने भी कमजोर नहीं कि वर्तमान अव्यवस्था का समस्त ठीकरा हम उन पर फोड़ें, ..या उनके कमजोर होने का हवाला देकर अपनी नाकामयाबियों को छुपाएं!
वास्तव में सच तो यह है कि प्रधान और उनके मुख्य सलाहकार लोकहित की दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं रखते, येनकेन-प्रकारेण सत्ता को लंबे समय तक कायम रखने की महत्त्वाकांक्षा पाले हुए हैं, अपनी व्यक्तिगत सोच को ही सर्वोपरि मानते हैं, जब दूसरों को सुनने-समझने की वृत्ति ही नहीं तो फिर कल्पनाशीलता का भी अभाव है, ...और इन सब कमियों के कारण अच्छे शिल्पकार बनने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं (एक प्रधान, देश और समाज को गढ़ता ही है और उसकी भूमिका एक शिल्पकार की ही होती है)।
इच्छाशक्ति और कौशल के परिणाम का एक उदाहरण देता हूं--
आपने पुरानी प्रसिद्ध इमारतें जैसे ताजमहल, फतेहपुर सीकरी, विभिन्न प्राचीन महल और किले, अंग्रेजों के शासनकाल में दुर्गम पहाड़ियों पर बना कालका से शिमला का रेलपथ, इत्यादि को देखा होगा।
बारीकी से इनका निरीक्षण, ततपश्चात तटस्थ चिंतन करें तो पाएंगे कि उस काल में आज सरीखी तकनीक, क्रेन, बुलडोजर, लिफ्ट, जेसीबी मशीन आदि न होते हुए भी तत्कालीन शिल्पियों ने अपनी इच्छशक्ति, कल्पनाशीलता और ईमानदारी से किये गए श्रम की बदौलत ऐसे निर्माण कर दिखाए, जो आज सभी निर्माण-सुविधाओं के होते हुए भी संभव नहीं हैं। आज के भारतीय आर्किटेक्ट या इंजीनियरों को यदि वैसे निर्माणकार्य की चुनौती दी जाए तो वे किसी न किसी कमी या अभाव का बहाना बनाकर उस बीड़े को नहीं उठाएंगे! क्योंकि अक्षम व्यक्ति ही कार्य से बचने के लिए विभिन्न बहाने या कारण खोजता है।
अपने ही शहर में देखता हूं कि हाल ही के कुछ सालों में बनी सरकारी इमारतें अनेकों तकनीकी कमियां रखती हैं और उनका क्षय होना भी आरम्भ हो चुका है!
तो बहाने तो कमजोर व अक्षम लोग ही बनाते हैं। कर्मठ तो उपलब्ध साधनों-संसाधनों के साथ ही सामंजस्य बैठाकर मंजिल पा लेते हैं (वीर अब्दुल हमीद की कहानी यदि याद न हो तो इंटरनेट पर ढूंढ कर पढियेगा)।
एक बात और कि साहसी, विवेकवान और न्याय-पसंद प्रधान, लोकहित में संशोधित या नए कानून भी शीघ्र बना सकते हैं। शीघ्र बना सकने के सामर्थ्य के दो मूल कारण-- 1. संसद में प्रचंड बहुमत होना, 2. लोकहित यदि वास्तव में निहित हो तो फिर समाज और प्रजा से भी प्रचंड सहमति, सहयोग और समर्थन मिलना।
जब यह दोनों साथ में हैं तो फिर क्या गड़बड़ है कि आपने प्रधान के हाथ बंधे होने का हवाला दिया। किसी निज स्वार्थसिद्धि की तमन्ना हो तभी असली कर्म व राष्ट्र का विकास बाधित होता है, और अनेकों एक्सक्यूज़ देता है फिर व्यक्ति।
जितने कानून-नियम हैं अभी, और जितना बहुमत है सदन में, और जितना विशाल जनसमर्थन है अभी..., ऐसा सौभाग्य दोबारा मिलना अत्यंत मुश्किल! तो शिकायतों और कमियों और बेबसी को दर्शाना बंद कीजिये, और लग जाइये भ्रष्टाचार को ढहाने में, सुराज की स्थापना करने में।
ऐसी सुखद स्थिति में भी आपने यदि स्वार्थों के चलते कुछ ठोस न किया तो यह बहुत दुखद होगा।
आपके पास इस समय सबकुछ है। आवश्यकता है तो इच्छाशक्ति और ईमानदारी की।

Friday, June 30, 2017

(७८) बुजुर्गों के साथ संतानों का व्यवहार

अक्सर बहुत सी शिकायतें होती हैं हमें! ...कुछ अपने भाग्य से, कुछ वर्तमान समय से और कुछ अपनी संतानों या नई पीढ़ी के व्यवहार से। कुछ दिन पूर्व सोशल मीडिया पर इन्हीं शिकायतों से सम्बंधित किसी के तीन दुखड़े पढ़े-
(१) "आज की पीढ़ी बहुत समझदार हो गयी है। आज लोग अपनी सुविधा और उपयोग के हिसाब से रिश्तों का मूल्यांकन करते और निभाते हैं। समय और उपयोगिता के हिसाब से रिश्ते निभाने का गणित बदलता रहता है। जो रिश्तों की इस गणित को नहीं समझता या उचित नहीं मानता, उसे दुखी होना ही पड़ेगा या फिर उसे रिश्ते खारे लगेंगे या फिर वह सब से कटकर ही रह पाएगा। बुजुर्गों की अहमियत इसीलिए खत्म होती जा रही है, वृद्धाश्रम की जरूरत इसीलिए बढ़ गयी है।"
(२) "माता को मंदिरों में पूजने से पहले अपने घर में अपनी माता को तो देखें कि उसे कोई तकलीफ तो नहीं है। वह खुश है न? यदि हम उसकी सुध नहीं ले सकते, वह प्रसन्न नहीं है तो दुनिया के किसी मंदिर में, किसी माता को हम प्रसन्न नहीं कर सकते और उसकी कृपा या आशीर्वाद प्राप्त नहीं कर सकते।"
(३) "लोग कहते हैं कि जब कोई अपना दूर चला जाए तो तकलीफ होती है। परन्तु असली तकलीफ तब होती है जब कोई अपना पास होकर भी दूरियां बना ले।"

यहाँ शिकायत मुख्यतः अपनों से है। ...और अपने भी वे, जो शिकायतकर्ता की अगली पीढ़ी के हैं।

मेरा दृष्टिकोण -- यदि किसी भी स्थिति (हालात) पर तटस्थरूप से दृष्टिपात किया जाये तो हम पायेंगे कि कोई भी स्थिति अकारण नहीं उपजती। उसके मूल में कोई तो कारण अवश्य होता है। और यदि वह स्थिति हमसे भी सम्बंधित है तो उस स्थिति के उपजने के मूलभूत कारणों में से एक, हम भी हैं। और यदि वह स्थिति (हालात) व्यक्तिगत रूप से सिर्फ मेरे से ही सम्बंधित है तो उस स्थिति का मूलभूत कारण भी मुख्यतः मैं स्वयं ही हूँ!
ईश्वर या प्रकृति के इस अनोखे ब्रह्माण्डीय सिस्टम में सबकुछ क्रमबद्ध है, अटल है। मनुष्य रूप में हर व्यक्ति निरंतर कुछ बोता रहता है और कुछ काटता रहता है। बीज के अनुसार ही फसल का निर्माण होता है। विज्ञान भी इस बात पुष्टि "क्रिया-प्रतिक्रिया" के सिद्धांत द्वारा करता ही है। प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया तो अवश्यंभावी है। हाँ, प्रतिक्रिया त्वरित या विलंबित हो सकती है, उसका स्वरूप भी बदल सकता है। लेकिन इस त्वरित या विलंबित या बदले स्वरूप की सटीक गणना व व्याख्या करना तो विज्ञान के लिए भी संभव नहीं है।
अर्थ यह कि, व्यक्ति को उपरोक्त सिद्धांत और सिस्टम पर पूरा भरोसा रखकर समस्त कर्म करने चाहियें। जिस दिन जिस व्यक्ति का विश्वास इस सिद्धांत पर जम जायेगा, उस दिन से उसके तो अच्छे दिन आने शुरू हो जायेंगे!
अच्छे दिनों से अर्थ यह कि, चिंता से और शिकायत से मुक्ति। सैद्धांतिक रूप से बलिष्ठ होते ही हमारे द्वारा बोये जाने वाले बीजों की गुणवत्ता का हम खास ध्यान रखेंगे, खेत की मिट्टी को भी सुरक्षित तरीकों से उपजाऊ बनायेंगे, क्योंकि अब हम अच्छे से जानते हैं कि आने वाली फसल की गुणवत्ता हमारी इसी सचेतना पर निर्भर है। सिस्टम हमें अच्छे नतीजों के लिए पूर्णतया आश्वस्त करता है। हममें से लगभग सभी इस बात को जानते हैं लेकिन इस सिद्धांत पर विश्वास रखकर अपने समस्त कर्म कितने करते हैं! सिस्टम को धोखा देकर बच निकलना असम्भव ही है!
और जब हम सिस्टम की अपेक्षाओं के अनुसार स्वतः ही खरे कर्म करने लगते हैं तो कुछ समय पश्चात् हमारे साथ बहुधा अच्छा ही घटित होने लगता है। बुरा भी घटित होता है, लेकिन जब बुरा घटित होता है तो हम तुरंत समझ जाते हैं कि यह कोई ईश्वर का प्रकोप नहीं, किसी की बुरी नजर नहीं, दुर्भाग्य नहीं; बल्कि यह तो हमारे द्वारा अतीत में बोये गए किसी गलत बीज की कड़वी फसल है जो हमें कुछ विलम्ब से प्राप्त हुई!
हम कमजोर मानवों का यह स्वभाव होता है कि हमें कोई भी दुःख बहुत बड़ा लगता है और बड़े से बड़े सुख को कुछ ही क्षणों में बिसरा देते हैं। या फिर कभी ऐसा भी करते हैं कि जैसे किसी दुर्घटना में जान बाल-बाल बची तो उसका श्रेय अपने द्वारा किये पुण्यों को देते हैं; और जब कभी कुछ दुखद हो जाये तो कारण या दोष किसी अन्य में ढूंढते हैं! यानी हम ऐसा समझते हैं कि अच्छा तो अपने कारण हुआ और बुरा किसी अन्य के कारण!!! जबकि वास्तविकता यह है कि अच्छा भी अपने कारण होता है और बुरा भी अपने ही कारण (बात जब व्यक्तिगत स्तर की हो तब)।
अब समझ में आ रहा होगा कि कुछ बच्चे या नौजवान अपने माँ-बाप को क्यों नहीं पूछते! यह पूर्व की किसी गलत क्रिया के बदले में आयी एक दुखद घटना है! कोई अपरिचित भी मुझे यूं ही गाली देता है तो प्रथम प्रश्नचिह्न मुझे स्वयं खुद के ऊपर लगाना चाहिए कि यदि वह पागल नहीं तो अकारण तो वह मुझे गाली नहीं देगा!
मूलतः बच्चों को इस अपेक्षा, आशा या स्वार्थ के साथ पालना ही गलत है कि बड़े होकर वे हमारा ध्यान रखेंगे। प्रत्येक उस पुण्य का मीठा फल अवश्य मिलता है जो असली हो; लेकिन असली पुण्य तो वह है जो निःस्वार्थ हो। स्वार्थ की भावना रखकर किया गया लालन-पोषण बच्चे में भी स्वार्थ-रूप में प्रतिबिंबित होगा। और यदि आप स्वार्थ से पूर्णतया परे रहे तो भी संतान ने दुःख पहुँचाया तो अवश्य ही यह पूर्व की किसी अन्य गलत क्रिया की परिवर्तित अवस्था में आयी एक कड़वी प्रतिक्रिया है।
अच्छा तो हो कि हम अपना ध्यान मात्र नौनिहालों के चरित्र निर्माण पर, उनके अच्छा नागरिक और विशाल हृदयी बनने पर केन्द्रित करें, वह भी किसी बड़े लक्ष्य हेतु, जो केवल हमसे सम्बद्ध न होकर समष्टि (सम्पूर्ण मानवजाति) के हित से सम्बंधित हो। हमारा हित तो यह ईश्वरीय सिस्टम बोनस में साध देगा।
हमारा ध्येय सर्वश्रेष्ठ संस्कार प्रथम स्वयं धारण कर, तदुपरांत उन्हें अमल में लाते हुए अपने नौनिहालों को भी उनके लिए प्रेरित करना होना चाहिए। हम उन्हें संस्कारवान या धर्मनिष्ठ (righteous) बनाने की भरसक कोशिश करें पर जिद नहीं कि उनसे किसी तरह वो काम करवा ही लें। अर्थात् हम अपना सर्वश्रेष्ठ से भी आगे का प्रयास करें, पर बलात् थोपने की कोशिश न करें। हमने यह किया तो मानों हमारा कर्म (सिखाने का) पूर्ण हुआ, अब आगे संतान का कर्म और उसका भाग्य यानी उसके पूर्व कर्मों का लेखा। अब स्वविवेक तथा वर्तमान में पाई शिक्षा एवं संस्कारों की मदद से अपने कर्म को उसे स्वयं ही निर्धारित करना है, ...और इस कर्म की मदद से अपने भाग्य से भी आगे उसे स्वयं ही जूझना है; पर हर दशा में, लेकिन सही दिशा में उसका सहयोग करना अभिभावक का कर्तव्य-कर्म होता है।
हमें हमारे कर्तव्य-कर्म देखने और करने हैं केवल, ...स्वयं करके संतान को भी कर्तव्य-कर्म का पाठ पढ़ाना है लेकिन अपने स्वार्थ के लिए संतान से कर्तव्य-कर्मों की अपेक्षा नहीं करनी है। हमारी शिक्षा में गहराई और दम होगा तो हमारा खयाल किसी न किसी माध्यम से यह ईश्वरीय सिस्टम स्वयं रख लेगा। इति।

Friday, May 19, 2017

(७७) भ्रष्टाचार का वायरस

पिछले दिनों मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने वर्तमान में समक्ष खड़े कुछ ज्वलंत सवालों या मुद्दों को सोशल मीडिया पर उठाया। ये मुद्दे हैं -- भ्रष्टाचार, आरक्षण के नुकसान, संविदाकर्मियों का दुखड़ा, सरकारी शिक्षकों की अकर्मण्यता, चिकित्सा सेवाओं के हाल-बेहाल, किसानों की कर्जा माफी, महंगाई, नोटबंदी, आतंकवाद, अलगाववाद, महिला आरक्षण बिल।

अभी हम इन उपरोक्त मुद्दों में से प्रथम यानी "भ्रष्टाचार" को ही लेते हैं, क्योंकि मेरे हिसाब से "भ्रष्टाचार" शब्द के अर्थ की परिधि बहुत बड़ी है और इसमें हमारे समाज के लगभग सभी दुर्गुण समाहित हो जाते हैं।
"भ्रष्टाचार" अर्थात् "भ्रष्ट आचार" अर्थात् भ्रष्ट आचरण या भ्रष्ट चालचलन या भ्रष्ट प्रबंधन या भ्रष्ट नीति या भ्रष्ट आचारसंहिता या भ्रष्ट दस्तूर या भ्रष्ट सलूक या भ्रष्ट नियम-कानून या भ्रष्ट अनुष्ठान या भ्रष्ट कार्यवाही। अंग्रेजी में "भ्रष्टाचार अर्थात् "corruption" अर्थात्-- CORRUPTED conduct, ethics, manners, customs, ethos, moral, praxis, proceeding, rules of conduct, deportment, behaviour, law, law and order, principle, rite, etc.

कंप्यूटर में जब कोई वायरस घुसकर फाइल्स को करप्ट करना शुरू करता है तो हम एंटीवायरस की मदद लेते हैं। लेकिन एंटीवायरस को परास्त कर वह वायरस यदि सिस्टम की लगभग सभी फाइलों को corrupt कर देता है तो हम संकट में पड़ जाते हैं और हमें बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। अंततः समस्त डाटा को धो कर कंप्यूटर के सॉफ्टवेर का पुनर्निर्माण (reinstallation) करना पड़ता है। बाद में हम अपेक्षाकृत अधिक तगड़ा एंटीवायरस डालते हैं। पर क्या हम आंख मींचकर इस नए एंटीवायरस पर विश्वास कर सकते हैं?? शायद नहीं!! ..तो अब हम क्या करते हैं कि अब हम कंप्यूटर को बहुत सावधानी से उपयोग करते हैं; अनावश्यक, असुरक्षित या संदेहास्पद साइट्स पर जाने से बचते हैं। यानी हमारे काम करने का तरीका अब संयमित और संतुलित हो जाता है। यानी अपनी सोच, बुद्धि और विवेक को अब हम निरंतर परिष्कृत करते हुए जाग्रत या सचेत रहते हैं और खतरों व उनसे होने वाले नुकसान से बचे रहते हैं।
अर्थात् हमने देखा कि वायरस हमले से सिस्टम को corrupt होने से बचाने हेतु मन, बुद्धि, आदि को नियंत्रित करना और सोच को परिष्कृत एवं संतुलित करना ही स्थाई उपाय है (भला एंटीवायरस कहाँ-कहाँ तक हमारी रक्षा करेगा)।
इसी प्रकार, नित नए नियम-कानून (एंटीवायरस) बनाकर हमारे समाज में व्याप्त घने भ्रष्टाचार (वायरस के हमले) को भेद पाना संभव नहीं!! हमें लोगों के "बुनियादी" आचार-विचार को परिष्कृत करने पर जोर देना होगा।
जरा सोचिए तो कि हम लोग भ्रष्ट आचरण करते ही क्यों हैं, इसकी जड़ कहाँ पर है? इसकी जड़ें हैं हमारी मूल सोच में! हमारी बुनियादी सोच ही जब भटकी हुई हो तो हमारे समस्त क्रिया-कलाप तो भटकेंगे ही! किसी भी आचार या आचरण का सीधा सम्बन्ध हमारी सोच (मानसिकता) से है। हमारी सोच में आज भटकाव बहुत अधिक है, शायद यही कारण है कि बहुधा हम अपने असल जीवन में अनावश्यक, असुरक्षित और संदेहास्पद दिशाओं में अपने मन को दौड़ाते रहते हैं और बेवजह ही संकटों में पड़ते रहते हैं। कहने को हम बहुत व्यस्त रहते हैं, बहुत काम करते हैं; लेकिन बदले में अंततः हम बोझिल थकान ही पाते हैं। अचीवमेंट या ठोस उपलब्धि की भावना हममें नदारद ही रहती है। इतनी व्यस्तता के पश्चात् प्रसन्नता भी जो हम पाते हैं वो भी बहुत टिकाऊ नहीं होती! बस दौड़ते जा रहे हैं हम अंधे विक्षिप्त की भांति! फिजिक्स की भाषा में कहें तो - डिस्टेंस तो बहुत ट्रेवल करते हैं हम, परन्तु डिस्प्लेसमेंट बहुत कम पाते हैं! वजह वही कि हम बस भागे जा रहे हैं, व्यस्तता अपनाये और ओढ़े हुए हैं; कहाँ अपना समय और ऊर्जा खर्च करने हैं इसका होश हम गवां बैठे हैं!!
आज एक आम भारतीय नौजवान की वरीयताओं पर एक नजर डालिए- किसी तरह पढाई, फिर नौकरी (जिसमें काम हल्का और वेतन तगड़ा हो; काम ज्यादा भी कर लेंगे मगर वेतन बढ़िया हो), काम के घंटों में और इसके आगे-पीछे भी व्हाट्सएप, फेसबुक, गाने, वीडियो-गेम, फिल्में, गर्ल या बॉय फ्रेंड का साथ, कार, पार्टियाँ, आदि-आदि। हमारे आकाओं और सरकार को भी मोटे तौर पर यही लगता है कि नौकरी और पैसा कमाना ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है (शिक्षा की गुणवत्ता जाये भाड़ में)। तो समाज में नयी-नयी नौकरियों का सृजन होने लगा। नौकरियों के सृजन के लिए नियोक्ताओं द्वारा नए-नए काम ढूंढे जाने लगे। दिल्ली, लखनऊ जैसी राजधानियों में अब नौकरियों या काम की कोई कमी नहीं है, यदि नौजवान लड़का या लड़की बस करने को तत्पर हो जाये तो (यानी वो कामचोर न हो तो)। तनख्वाह की कोई चिंता नहीं कितनी भी हो चलेगा, बस इन्टरनेट और मनोरंजन का निकलता रहे तो भी गनीमत! कॉमन यूथ इसी दिशा में भाग रहा है। बड़े शहरों में उपभोक्तावाद को बहुत बढ़ावा मिलने से कॉमन मैन की दिमागी और शारीरिक व्यस्तता बेकार में ही बहुत बढ़ गयी है। घर-बाहर के काम बहुत बढ़ गए। उन कामों को स्वयं करना व्यस्तता के कारण बहुत दूभर हो गया। उन कामों को किसी अन्य से करवाना भी बहुत पेचीदा और खर्चीला हो गया। तो फिर अनेक बिचौलिया कंपनियां खुल गयीं आपकी मदद के लिए। तो फिर उनमें कर्मचारी भी रखे गए। काम और नौकरियां बढती गयीं और बढती जा रही हैं! समझ में नहीं आ रहा कि इसकी सराहना करूं या आलोचना करूं! मेरी समझ में इस सब भागमभाग में आज का यूथ सामाजिक सरोकारों, जानकारियों, कर्तव्यों आदि से दूर होता चला जा रहा है। सामान्य ज्ञान भी औसत से कम होता जा रहा है, मानवीय भावनाएं कम होती जा रही हैं, शुष्कता बढ़ती जा रही है, मशीन सा बनता जा रहा है मानव! सब बिजी हैं और अपने किसी भी काम के लिए दूसरे पर निर्भर हैं! सब एक-दूसरे का काम कर रहे हैं, एक-दूसरे के लिए काम कर रहे हैं; यही उनका काम है और यही उनकी नौकरी है, और उस काम के बदले दूसरे को पैसा दे रहे हैं और दूसरे से पैसा ले भी रहे हैं। हमारा ही पैसा हमारे ही बीच में घूम रहा है! मैं भी दूसरों का काम करने के लिए नौकरी करता हूँ, पैसा कमाता हूँ, व्यस्त रहता हूँ; फिर कमाई हुई तनख्वाह से मैं अपने काम अन्यों से करवाता हूँ! चक्र चलता रहता है। हर कामकाजी व्यक्ति गर्व से कहता है कि मैं नौकरी करता हूँ, और साथ ही यह भी कहता है कि मैं अपने हर काम नौकरों से करवाता हूँ! अपने से जुड़े छोटे-छोटे कामों के लिए आज हम दूसरों पर निर्भर हैं, और दूसरे लोग किन्हीं अन्य तीसरों पर!! और यह सब व्यायाम-कसरत इसलिए कि सबको नौकरी चाहिए, पैसा चाहिए! ..और पैसा भी बहुत सारा, क्योंकि आवश्यकताएं तो दिन-प्रतिदिन बढती जा रही हैं या हम बढाते जा रहे हैं!
तो फिर जब पैसा बहुत सारा चाहिए तो किसी को तो धोखा देना ही पड़ेगा, किसी को तो बेवकूफ बनाना ही पड़ेगा! खुद को आलरेडी इतना व्यस्त कर देने के बाद सोचने-विचारने की इतनी क्षमता ही कहाँ बची कि नैतिकता को निहारा जा सके! सो नैतिकता को बिसार दिया, नकार दिया और हो गए हम भ्रष्ट; और करने लगे "भ्रष्टाचार" धड़ल्ले से!
जब-जब संयम के बाँध तोड़कर अनावश्यक ही इधर-उधर सर्फिंग की तो अपने कंप्यूटर सिस्टम को corrupt कर लिया ..और वास्तविक जीवन में भी जब-जब संयम के बांध तोड़कर अनावश्यक ही मन और शरीर को इधर-उधर व्यस्त करके उलझा लिया तो अपने आचारों को भ्रष्ट कर लिया! ऐसे ही भ्रष्टाचार पनपा।
तो अंतत हमने पाया कि भ्रष्टाचार रूपी वायरस को पूर्णतया (जड़ से) समाप्त करने के लिए मन और बुद्धि को स्वच्छ, संयमित एवं अनुशासित करने की आवश्यकता है। बहुत सारे नियम-कानून (एंटीवायरस) हमारे सिस्टम के संक्रमित न होने की कोई गारंटी नहीं दे सकते! हमारी भ्रष्ट और भटकी सोच ही हमारे भ्रष्ट आचार का मूल कारण है!
सरकार और समाज के वर्तमान क्रियाकलापों का यदि सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन किया जाये तो हम पायेंगे कि नौकरी या काम आदि के लिए की जा रहीं बहुत सी कसरतें मात्र समय और ऊर्जा का भारी दुरुपयोग हैं! इनसे भागमभाग (विकास की सूजन) तो बढ़ रही है पर राष्ट्र का असली विकास बुरी तरह से बाधित हो रहा है। इस राष्ट्र के सभी लोग प्रचंड रूप से व्यस्त तो होते चले जा रहे हैं पर मानवता, नैतिकता, गरिमा और विकास आदि सब रसातल में जा रहे हैं।
अंत में व्यर्थ की कसरत का मात्र एक उदाहरण देता हूँ-- दोपहिया वाहन का थर्ड पार्टी बीमा। कुछ पुराना हो जाने पर हमारे यहाँ लोग अक्सर अपने दोपहिया वाहन का थर्ड पार्टी बीमा कराते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि वो अब यह सोचते हैं कि पर्याप्त ध्यान रखने पर गाड़ी चोरी नहीं होती और एक्सीडेंट भी नगण्य होता है, परन्तु इसके मुकाबले डर के कारण हर साल भारी प्रीमियम बीमा कम्पनी को देना पड़ता है। तो जागरूक उपभोक्ता थर्ड पार्टी बीमे पर आ जाते हैं। वो क्या और क्यों होता है? मेरी समझ से यदि मेरी बाइक से किसी को कोई चोट या नुकसान पहुंचे तो पीड़ित व्यक्ति हर्जाना मांग सकता है; ऐसे में इंश्योरेंस कंपनी हमारी तरफ से वो हर्जाना पीड़ित को अदा करेगी। पिछले वर्ष तक यह बीमा लगभग सात-आठ सौ रुपये में होता था (अभी शायद बढ़ गया है) और हर वाहनधारी कानूनन यह बीमा करवाने को बाध्य है, यह अनिवार्य है; इसीलिए सब इसे करवाते हैं। किसी भी महानगर में लाखों दोपहिया वाहन होते हैं, दर्जनों बीमा कंपनियां हैं, उनके बीसियों कार्यालय हैं, वहां सैकड़ों-हजारों कर्मचारी और एजेंट्स हैं, वेबसाइट्स भी हैं; ऑनलाइन या मैन्युअली प्रीमियम देने के विकल्प हैं, एजेंटों की सेवा भी ली जा सकती है। तो वहां प्रतिदिन लाखों-करोड़ों रूपया प्रीमियम के रूप में एकत्रित होता है; इस राशि का एक बड़ा अंश बीमा कार्यालय की बिल्डिंग, किराये, वेबसाइट्स और मुख्यतः कर्मचारियों की तनख्वाह पर खर्च होता है। इस राशि का एक बहुत छोटा सा अंश अत्यल्प पीड़ितों को हर्जाना देने में और शेष बचा अंश बीमा कंपनी के मालिकों को जाता है। अब देखिये, RTO कार्यालय व्यस्त, चेकिंग स्टाफ व्यस्त, उपभोक्ता व्यस्त, बीमा कम्पनियाँ व्यस्त, और तो और घूसखोर भी व्यस्त!! एक ही शहर में लाखों रुपये डेली का कलेक्शन, हजारों व्यस्त, सैकड़ों को रोजगार, और विरले ही (कभीकभार) किसी को हर्जाना देने की नौबत!! इस भ्रष्ट व्यवस्था में मैंने तो आजतक दोपहिया वाहन से चोटिल किसी 'असली' पीड़ित को कानूनन हर्जाना ठोकते नहीं देखा और न ही सुना, न कभी पढ़ा! मेरी निगाह में दोपहिया वाहन का यह बीमा कानून एक फिजूल की कसरत है, इससे असली फायदा बीमा कंपनी मालिक को है न कि किसी पीड़ित को (क्योंकि वे तो अत्यल्प अथवा नगण्य हैं); और बीमा कंपनी टिप के तौर पर अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देती है। अधिकांश नौकरियों व काम आदि का सृजन आज ऐसे ही होता है। इति।