Wednesday, December 9, 2015

(५८) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
'व्यक्ति को समाप्त किया जा सकता है पर विचारों को नहीं ....धर्म के ठेकेदार कभी भी नहीं चाहेंगे उनके पाखंड के जाल को कोई काट कर लोगों को उनके जाल से मुक्त करे ....दयानंद सरस्वती, आचार्य चार्वाक, आर्यभट्ट आदि न जाने कितने ही ऐसे पाखंड के खिलाफ लड़ने वालों की हत्या कर दी इन धर्म के ठेकेदारों ने, पर इनके विचारों को कभी भी मार नहीं सके.'
'धन्यवाद. बिल्कुल सही कहा आपने. लेकिन जो हमारा कर्तव्य है, वह तो हमें करना ही होगा. किसान भी तो कोशिश करके अपने खेत में उग रही फालतू खरपतवार की रोकथाम करता ही है.'

(२)
समाज में कोई व्यक्ति जब कोई कुकृत्य करता है तो तुरंत उपचार के तौर पर उस व्यक्ति को सजा तो दी ही जाती है, परन्तु जागरूक लोग इसके समानांतर यह भी देखते हैं कि अमुक कुकृत्य का विचार पनपा कहाँ से? हमारी कोशिश रहेगी कि उस वैचारिक प्रदूषण का शिकार हमारी अन्य संताने न हों. कुछ संतानों को समझाया जाएगा और कुछ कार्य प्रदूषण फ़ैलाने वाले के विरुद्ध भी होगा.
दूसरी बात कि संस्था व अनुयायी, गुरु व शिष्य; आध्यात्मिक क्षेत्र में इन दोनों के बीच का नाता बहुधा पिता-पुत्र के रिश्ते से बढ़कर होता है. अनुयायी, शिष्य व पुत्र, इन तीनों के द्वारा किये गए अपराध के पीछे उनके अभिभावकों की भी कोई बड़ी पैरेंटिंग मिस्टेक अवश्य रहती है, वैसे अहंवश हम इसको मानते नहीं!
यदि किसी कूड़े के ढेर की वजह से इलाके में बीमारियाँ फ़ैल रही हैं तो कहने को तो बैक्टीरिया उत्तरदायी, हमारा कूड़े के ढेर के पास जाना उत्तरदायी, प्रत्यक्ष कूड़ा ही उत्तरदायी! परन्तु जड़ तो वह जिसने कूड़े का ढेर लगाया, उसी के कारण बैक्टीरिया जन्मे, पनपे और फिर जाने-अनजाने बीमारियाँ फैलीं! यदि हम उसी इलाके के निवासी हैं और कूड़े का ढेर हमारे रास्ते में ही है, तो भला कब तक हम स्वयं को उस कूड़े के समीप से होकर जाने से रोक सकते हैं?
तो कूड़ा फ़ैलाने वाला दोषी! अब उसी प्रकार कूड़े को साफ़ करने की जिम्मेदारी भी किसी न किसी की होती है- नगरपालिका, सफाई-दल आदि. ..यदि ये सब भी अपना काम ईमानदारी से नहीं करते तो दोषी कहलाते हैं. ..और मान लो कि ये ढीठ हो गए तो इलाके के जागरूक लोगों को स्वयं ही सफाई करनी पड़ती है या एप्लीकेशन वगैरह लगानी पड़ती है.
समाज में प्रत्येक का कुछ न कुछ रोल है, यदि वह उसे नहीं निभाता है या गलत ढंग से करता है तो निश्चित रूप से वह दोषी!
और हाँ, 'सनातन' शब्द की आलोचना करने वाला मैं कौन हो सकता हूँ, सनातन तो वह है जो सदा से अस्तित्व में है, वास्तव में खरा है. बात उसके नाम में नहीं बल्कि गुणों में है! अब राम नाम का हर व्यक्ति भगवान् राम जैसे गुणों को प्रकट कर रहा हो यह ज़रूरी तो नहीं!

(३)
मात्र निंदा से आगे इस प्रकार से होने वाली घटनाएं नहीं रुकेंगी, बल्कि इस प्रकार से होने वाली घटनाओं के पीछे के मूल कारणों को नष्ट करना पड़ेगा. ..और मूल कारण है- भावुक जनमानस को 'अन्धविश्वासी कृत्यों' एवं 'अन्य मतावलंबियों के प्रति विरोध-भावना', इन दोनों के लिए उकसाना.

(४)
निश्चित ही हमें स्वयं सचेत होने तथा अपने समाज / संघ को भी सचेत अवस्था में रखने की आवश्यकता है. यह प्रयास करते हुये ही हम सही अर्थों में विकास की सीढियाँ चढ पायेंगे.

(५)
एक प्रश्न दोस्तों.
बहुत भीड़ लगी थी. हर कोई वहां पास जाकर देख रहा था कि क्या हो रहा है? पता चला, भगवान् दूध पी रहे हैं, और उन्हें दूध पिलाने के लिए ही लाइनें लगी हैं. मुआयना करने वालों में अधिसंख्य ने सोचा कि "धन्य हो गए हम.., फालतू में कोई यहाँ लाइन थोड़े ही लगाएगा, आज हमें भी ज़रूर भगवान् की लीला के साक्षात् दर्शन हो जायेंगे!" ...और वे भी उस लाइन में खड़े हो गए और मस्त हो जयजयकार करने लगे.
किसी ने कुछ अलग ढंग से सोचा (हालाँकि वह भी वहां यही देखने गया था कि भीड़ क्यों लगी है), कि ये सब मूर्ख हैं और मात्र भेड़चाल में फंसे हैं! ..वह असमंजस में पड़ गया कि सबको सत्य बताऊँ या चुपचाप यहाँ से चल दूं? सत्य बताने पर भारी जन-विरोध का सामना करने का भय था और चुपचाप चले जाने पर स्वयं की फटकार खाने का भय!
आप सुझाएं कि उसे क्या करना चाहिए?
'जहां भीड़ वहां रत्न', क्या यह सोच सही है? कुछ अर्थहीन और कुछ जबरन विवादास्पद बनाये गए लेखों पर भारी भीड़ देख मैं भी कौतूहलवश वहां पहुँच जाता हूँ पर वहां का हाल देख अचंभित रह जाता हूँ कि बड़े-बड़े महारथी भी उस भीड़ का हिस्सा बनने और वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को आतुर हैं. यह भेड़चाल नहीं तो और क्या है? क्या इसे टाइम-पास कहना उचित होगा?
भई, कुछ तो है जो गलत है! अब आप ही सुझाएं.

(६)
व्यर्थ के झमेलों में पड़े बगैर मैंने बेबाकी से एक आईना दिखाना चाहा, अब चुनाव आपका कि स्वयं में कुछ असामान्यता दिखने पर उसे ठीक करें या दागों को झुठलाने हेतु तर्क-वितर्क करें! अकसर हम अपने अहंकार के कारण परिष्कृत होने की कोशिश नहीं करते और इस बारे में कुछ बात होने पर अपने से निम्न लोगों की ओर इंगित करके कहते हैं कि "हम उनसे तो अच्छे" या "वे हमसे भी बुरे"!
मेरे विचार से यदि हमें वास्तव में ऊपर बढ़ना है तो अपनी कमियों की तरफ तो ध्यान देना ही पड़ेगा, और हमें याद रहना चाहिए कि हम सर्वोत्कृष्ट नहीं, सुधार की गुंजाईश सदैव रहती है. और सुधार तब ही संभव है जब हम अपने को एक स्वच्छ आईने में निहारें व अपने-आप को साफ़ करने का कुछ यत्न भी करें, ..निरंतर! केवल समय काटने के लिए या अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु खोखले तर्क-वितर्कों से हम और कमजोर ही होंगे!