Thursday, December 24, 2015

(६१) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ४

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
आपका लेख आदिकाल से आजतक की समयावधि के दौरान सेक्स के प्रति पशुओं से भी निम्नतर भारतीय मानसिकता को दिखाने में सर्वथा सफल रहा है. स्त्री और पुरुष, कमोवेश दोनों को ही आपने बराबर से दोषी माना है, शायद स्त्रियों को कुछ अधिक ही! ...परन्तु लोकलाज के भय से आपने समानांतर रूप से स्त्रियों को अधिक भुक्तभोगी दिखाया है, सहानुभूति भी प्रकट की है उनके प्रति! ...जाने-अनजाने यह, लोकलाज के चलते ही सही, ..परन्तु सही बात कह गए आप, यद्यपि मंशा उनको बख्शने की बिलकुल भी न थी आपकी! यही एक आम पुरुष सोच है आज!
मेरा व्यक्तिगत मत है यह, शायद गलत भी लग सकता है आपको, कि स्त्रियों में नैतिकता का स्तर पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक अच्छा था और आज भी है. ...वो अलग बात है कि आज की स्त्री, पुरुष के साथ होड़ कर रही है, ..रेस जारी है जोरों से, ...पर उसे यह भान नहीं कि कुदरत ने तो उसे अधिक अच्छा व सक्षम बनाया है, उसका स्तर अपेक्षाकृत बेहतर है पुरुष से; ..फिर होड़ करके, पुरुष की बराबरी करने के क्रम में तो उसका स्तर गिरेगा ही!! ...और यही हो रहा है आज, ..और पुरुष-प्रधान भारतीय दुनिया हंस रही है, मजाक बना रही है, व्यंग लिख रही है- उस नारी के पराभव पर, जो उससे (पुरुष से) आगे थी कभी, पर आज नीचे जा रही है. मेरी हृदय से अपील है भारतीय स्त्रियों से कि--
"कुदरती रूप से आप बेहतर बनाई गई हैं, सोच में भी और शरीर से भी; मानसिकता भी बेहतर और शारीरिक सक्षमता भी विलक्षण; यही बुनियादी अंतर है आपमें और पुरुष में; इस पर गर्व करें और इसे ऊंचा समझें, क्योंकि वास्तव में यह इस लायक है; इसी कारण आप अधिक सम्मान के योग्य हैं और ऐसा सदा से होता भी आया है; आपके ऊंचे स्तर ने ही भारत के कई हिस्सों में सामाजिक संतुलन बनाकर रखा हुआ है, उदाहरणार्थ- बिहार (जहां पुरुषवर्ग में नैतिकता का टोटा है); व्यर्थ की अंधी दौड़ और होड़ में अपने को नीचे न ले जायें; कुदरत ने आपको जो विलक्षणता दी है, उसे पहचाने, उसका सदुपयोग करें, ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हों और स्वयं की मौलिकता, मौलिक गुणों पर बेहिचक बिंदास गर्व करें. स्त्री और पुरुष की अलग-अलग फंडामेंटल प्रॉपर्टीज़ हैं, बहुत सारी कॉमन हैं पर बहुत सी बिलकुल अलग भी, ..उन्हें परखें, जानें, आजमाएं ..और तब फर्क महसूस करें, ...आपको अपनी मौलिकता से एक दैवीय सुगंध महसूस होगी और अनावश्यक कृत्रिमता से आसुरी दुर्गन्ध. निश्चित रूप से यह बहुत अन्दर की बात है जिसको अनुभव नहीं वरन अनुभूत करना पड़ेगा."

(२)
खाद्य सुरक्षा बिल से जुड़े विवाद और उसकी पैरोकारी करने वाले लोगों में चल रही बहस को समझने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं, जैसे:
1. क्या वाकई केन्द्र सरकार को गरीब की रोटी की नहीं बल्कि अपने वोटबैंक की परवाह है?
2. भूख से मरने वाले लोगों की तादाद में दिनोंदिन वृद्धि होने के बावजूद क्या इस अधिनियम का विरोध करना जायज है?
3. क्या भारत जैसे देश, जहां कदम-कदम पर वर्गीकृत समाज दिखता है, में इस व्यवस्था को लागू करवाना आसान है?
4. क्या इस अधिनियम को महज एक चुनावी स्टंट मानकर इसे अनदेखा किया जाना उचित है?

* आपके पहले बिंदु का उत्तर है- हाँ. ..इसमें कोई शक नहीं कि सरकार को गरीब व भूखी जनता की कुछ परवाह अवश्य होगी परन्तु इस परवाह का कारण जनता की फटेहाल स्थिति से उपजी संवेदनाएं तो कतई नहीं! एक कारण है कि- उन्नत देशों, राष्ट्रसंघ, विश्वबैंक, डब्लू.एच.ओ., विभिन्न वैश्विक सहायता संगठनों, आदि का ध्यान आकृष्ट करना और दिखाना कि- हम भी प्रगतिशील हैं और कुछ कर रहे हैं, आप लोग भी इसे सराहिये और कुछ मदद हो सकती है तो वह भी करिए. …दूसरा कारण जो अधिक बड़ा है वह यह कि- देश के लोगों को दिखाना कि हम वास्तव में फिक्रमंद हैं और राजकोष की गरीबी के बावजूद एक बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं, इसे सराहिये और आगे इस अध्यादेश पर सम्पूर्ण अमल सुनिश्चित करने हेतु कृपया हमें वोट दीजिये!
* आपके दूसरे बिंदु का संक्षिप्त उत्तर है कि हमें इस अध्यादेश का बिलकुल भी विरोध नहीं करना होगा. लाख अदूरदर्शिता के बावजूद इसमें भविष्य के लिए काफी कुछ सकारात्मक छिपा है, यदि भविष्य की सरकारें ईमानदारी से और दृढ़प्रतिज्ञ होकर इस योजना को कुछ सामयिक / व्यावहारिक फेरबदल के साथ अमली जामा पहनाती हैं.
* तीसरे बिंदु पर काफी कुछ कहा जा सकता है परन्तु उसका निचोड़ यह कि- वर्गीकृत समाज तो एक समस्या है ही, परन्तु उससे भी बड़ी समस्या यह है कि हम भारतवासी मानसिक व आध्यात्मिक रूप से बहुत पिछड़े हैं, लगभग अविकसित हैं, बल्कि दिन-प्रतिदिन इसका ग्राफ और नीचे जा रहा है. ऊपर से नीचे तक के लोगों की बुनियादी सोच संग्रह और लालच की है- नेता, अभिनेता, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, धार्मिक गुरु, अध्यापक-वर्ग, उद्योगपति, मीडिया, लगभग सम्पूर्ण अभिजातवर्ग इसकी चपेट में है, भविष्य के प्रति सभी में अजीब सी असुरक्षा की भावना व्याप्त है, जो विभिन्न भौतिक लोभों को 'अनंत' विस्तार देती है! नीचे के तबकों में भी इसका संक्रमण बखूबी फ़ैल चुका है. यानी मदद का नियोजन करने वाले, उसे प्रदत्त कराने वाले एवं मदद के हक़दार, सभी व्यक्ति इन विषाणुओं से प्रभावित हैं. इसके चलते मुझे नहीं लगता कि योजना को मूर्तरूप देना इतना आसान होगा! विपणन और वितरण अत्यधिक भ्रष्टाचार व भारी अव्यवस्था, ..यहाँ तक कि लूटपाट और कत्लेआम का भी भय रहेगा. निश्चित ही यह अतिश्योक्ति नहीं है, व्यर्थ का भय नहीं है, ..वरन यह विश्लेषण हमारी आज की मानसिक व आध्यात्मिक स्थिति के आधार पर किया गया है.
* चौथा बिंदु- हमें इस अधिनियम को अनदेखा नहीं करना है वरन इसे मात्र भविष्य की एक अच्छी योजना की बुनियाद के रूप में देखना है. हमें कहीं न कहीं यह सोच कर संतुष्ट होना होगा कि- किसी भी कारण से ही सही, पर कुछ चिंतन तो हुआ!
हाँ, इतना हम अवश्य जान लें कि दिल्ली अभी बहुत दूर है, क्योंकि ऊपर से लेकर नीचे तक हम तरह-तरह की बेड़ियों में जकड़े हैं, इनसे मुक्ति पाकर ही हम आगे को चल पायेंगे.

(३)
"ऐसी तो कोई रात नहीं जिसकी सुबह न आये इस काली रात की भी सुबह होगी और नयी सुबह आशा की नयी किरण लेकर आएगी |"
"हम सब स्वार्थ से ऊपर उठकर अपना कर्म करें तो युग स्वतः बदल जायेगा और सच की राह पर चलें तो सतयुग जरुर आयेगा |"
"शुरुआत अपने घर से करें, स्वयं अपने कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों का पालन ईमानदारी से करें."
"हमारा परिवार सुसंस्कृत होगा तो समाज सुसंस्कृत होगा और जब समाज सुसंस्कृत होगा तो भारत माँ का स्वरुप बदलेगा, उसका चेहरा गर्व से दमकेगा |"
..बहुत सुंदर पंक्तियाँ और लेख के अंत में बहुत सुंदर सार, ...बदलाव की आशा के सुखद झोंके समान.
गलत चीजों और गलत मानसिकता का अवश्य विरोध करें, परन्तु आशा का दामन और बदलाव हेतु अंतहीन विनम्र प्रयास कभी न छोडें.
बुराई से घृणा करें परन्तु बुरे से नहीं, प्रत्येक व्यक्ति कभी भी बदल सकता है, यदि हम 'अपनेपन' से उसे बदलने की ठान लें तो!
प्रत्येक क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया अवश्य आती है, देर-सवेर हो सकती है पर हमारे सीमित किन्तु निरंतर नेकनीयत प्रयास एक दिन अवश्य फलीभूत होंगे, ऐसा विश्वास मन में सदैव बना रहना चाहिए.
सर्वोत्तम तो यह होगा कि हम जो लिखें, उसे अपने जीवन में लागू भी कर रहे हों, तभी वह प्रभावकारी होगा, अन्यथा कुछ लिखना मात्र लिखने और अहम् की तुष्टि के लिए ही होगा.

(४)
सडकें, चौराहे, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बाबा के दरबार, बसें, ट्रेनें, कैंडल मार्च, रैलियां, तीर्थ, सभाएं, सिनेमा, शमशान; इन सबमें सन्नाटा होता, या फिर इनका आज कोई अस्तित्व ही न होता यदि इन्हें उस भीड़ का सहारा न होता जिसका जिक्र आपने अपनी रचना में किया! ..फिर भी लाभार्थियों द्वारा उस भीड़ की इतनी अवहेलना!? ..और उस भीड़ का भी अपने सामर्थ्य और महत्त्व को न समझ पाना?! ..इसे भीड़ की अचेतावस्था ही कहेंगे शायद!
जिसके वजूद के कारण मुमकिन है इन सब का वजूद;
त्रासद है कि वही भीड़ ढूंढ़ रही आज अपना खुद का वजूद!

(५)
एक लम्बे समय तक इंजन को स्टार्ट रखने और जोर-जोर से एक्सीलेटर लेने से कुछ नहीं होगा, हमें गाड़ी को गियर में डालकर आगे बढ़ाना होगा, और जल्दी ही टॉप गियर तक पहुंचना होगा! ..शोर नहीं, ..दूरी नहीं, …बल्कि विस्थापन महत्वपूर्ण है!