Tuesday, December 29, 2015

(६२) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ५

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रंखला

(१)
मेरा विचार है कि किसी भी बिगड़ी हुई सामाजिक आदत के ठीक होने की शुरुआत उस समाज के ऊपरी तबके, अर्थात् अभिजात वर्ग से होती है. इसका सबसे बड़ा कारण यह कि अभिजातवर्ग आम लोगों का नेतृत्व कर रहा होता है और शेष बहुसंख्य मात्र अनुयायी होते हैं. अभिजात वर्ग माने- ..नेता, अभिनेता, बड़े अधिकारी, धर्म अथवा सांप्रदायिक गुरु, प्रसिद्ध खिलाड़ी, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, समाजसेवी यानी एक शब्द में और व्यक्त कर सकते हैं इनको कि 'समाज की क्रीमी लेयर'. ..अब इन सबमें भी जितने ऊपर से प्रथमतः शुरुआत हो सके वह बेहतर! अधिकांशतः हर व्यक्ति अपने से ऊपर वाले को टकटकी लगाकर देखता है और उसका अनुकरण व अनुसरण करता है! दो टूक यह कि निश्चित रूप से बदलाव की बड़ी जिम्मेदारी ऊपर के उन लोगों की ही बनती है- जिनके पास सत्ता है, अधिकार हैं, संसाधन हैं, नाम है, रसूख है, मान है व अनुयायी हैं, ..और अखबार व मीडिया के सर्वेसर्वा (आका, मालिक, संपादक) भी इन लोगों में शामिल हैं ही. ..जब ये भी भ्रष्ट हो गए हों तो इनसे ऊपर की सत्ताओं को प्रभावशाली कदम उठाना होगा. .. और यदि वे भी भ्रष्ट रहती हैं एक लम्बे समय तक, तो आम जनता में से ही कोई नेता निकलेगा जो अगुवाई करेगा उस क्रांति की जिनसे स्थितियां बदली जा सकें! ..शायद किसी आपातकाल में कोई सेनाधिकारी ही कोई बड़ा कदम उठा ले. ..इतने विकल्पों के बाद भी यदि परिस्थितियां जस की तस रहती हैं तो फिर हमारा राष्ट्र और नीचे ही जाएगा शनैः-शनैः! ..और तब अमेरिका जैसा कोई उन्नत राष्ट्र भारत की मामले में भी उसी प्रकार हस्तक्षेप करेगा जैसे वह अभी कुछ देशों के हालात ठीक करने के लिए ले रहा है. इसे आप सही कहें या गलत, परन्तु सत्य तो यही है कि कहीं भी हो रहा कोई भी नुकसान बड़े अर्थों में सम्पूर्ण विश्व का ही नुकसान है, और उस नुकसान को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए.

(२)
उनके सितम बहुत हो चुके और हमारे उपदेश भी!
वो आज भी भ्रष्ट तो कमी शायद हमारे उपदेशों में!
कहीं वो उपदेश कोरे तो नहीं, मात्र शब्दों से खिलवाड़ तो नहीं?
कहीं यह सब यह सब पैसे की भूख या यश की प्यास तो नहीं?
पंडित हो या मौलवी, नेता हो या अभिनेता, या फिर पत्रकार,
बोलने में सब बहुत तेज पर भीतर से बेकार;
तभी तो कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है हाहाकार!

(३)
...बस शब्दों में खो न जाना, भावना में बह न जाना;
ध्येय न हो मात्र धन की भूख या यश की प्यास बुझाने का;
बस अपने लिए लिखना या फिर समाज के उत्थान के लिए,
साफ़ मन से, अंतर्मुख होकर, जैसे हो किसी मैडिटेशन में!

(४)
उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण (Liberalization, Privatization, Globalization) के ऊपर पूरा ठीकरा फोड़ना ठीक नहीं, …समस्या के मूल में तो हमारा अपना ही दोष है कि हम ही अपना होश न संभाल सके.
एक फौजी के हाथ में बन्दूक होना एक बात है तथा एक बच्चे को बन्दूक थमाना दूसरी बात, ..बहुत अंतर है दोनों में! ..एक के पास जोश है मगर होश के साथ, और दूसरे के पास मात्र जोश ही है! दो टूक बात तो यही है कि हमारे पथप्रदर्शकों ने हमें हथियार के साथ संलग्न आवश्यक परिपक्वता नहीं दी! ..और असली परिपक्वता का वास हमारी स्वस्थ मानसिकता व दृष्टिकोण में है; …बहुत त्रासद है कि आज यही स्वस्थता नदारद है.

(५)
विडम्बना ही है कि हम आज जीवन के हर क्षेत्र में ऊँचाइयों को छूना चाहते हैं परन्तु मानसिकता या सोच को ऊपर नहीं उठाते! भले ही हमारे पास विभिन्न सांसारिक वैभव व विद्यता प्रचुर मात्रा में हों, तिसपर भी हम बिलकुल खोखले हैं यदि हमारी मानसिकता क्षुद्र ही रह जाती है!

(६)
अवश्य, ..वह सुबह आएगी जब 'पुत्रीवती भव' का आशीर्वाद भी लोग देंगे. ...लोगों के मन में, सोच में, दिल में, बदलाव की हिलोरें उठती हैं जब बात उनके ऊपर आती है; परन्तु वह कड़वा समय जब निकल जाता है तो मानसिकता पुनः वहीं पर आ जाती है, जहां थी! क्योंकि प्रचलित धारा के विरुद्ध हम कुछ भी सोचने और करने से कतराते हैं! आखिर कब तक हम रूढ़ मानसिकता के अनुयायी बने रहेंगे और अपने भीतर की निश्छल ध्वनि को अनसुना करते रहेंगे??

(७)
हिन्दू एवं हिंदुत्व को समझे बिना उसके प्रति क्षुद्र दृष्टिकोण एवं अन्य विचारधाराओं के प्रति अत्यधिक लेकिन कृत्रिम सहिष्णुता, यह आज के तथाकथित नेताओं और बुद्धिजीवियों की वर्तमान क्षुद्र मानसिकता का द्योतक है. …वास्तव में वे किसी के सगे नहीं हैं, बस अवसरवादी हैं. ..या अपनी खोखली विद्यता का गुमान है उन्हें; ...तो कुएं के मेंढक ही हुए वे!
इस समय हर किसी को दलगत तथा व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठने-उठाने की आवश्यकता है, यह तभी संभव होगा जब हम अपनी मानसिकता या सोच को सही मायनों में ऊपर उठायेंगे, और तब ही हम वास्तविक विकास की ओर बढ़ पायेंगे, अन्यथा और नीचे ही जायेंगे.