Tuesday, February 16, 2010

(२७) दिसम्बर २००३ के कुछ पन्ने

प्रकाश और अंधकार
आज समाज में जो इतना तम है या अज्ञान है उसकी जड़ कहां पर है, इस पर एक विचार। अनुकूलता-प्रतिकूलता, सुख-दुःख, अच्छा-बुरा, कोलाहल-शांति, दिन-रात, प्रकाश-अंधकार आदि एक-दूसरे के कारण ही हमें पता चलते हैं या परस्पर पूरक प्रतीत होते हैं। पर क्या वस्तुतः ऐसा ही है? इस पर विचार किया तो पता चला कि कुछ-कुछ तो ऐसा ही है, पर कुछ हमारा भ्रम भी है। उदाहरण के लिए - प्रकाश-अंधकार के विषय में ही विचार करें तो हम पाएंगे कि हमें वास्तव में पता ही नहीं है कि अंधकार क्यों है और यह कहां विद्यमान है!

अंधकार तो तभी होता है जब प्रकाश या प्रकाश-स्रोत का अभाव होता है, अन्यथा अंधेरे का अस्तित्व ही नहीं! प्रकाश का स्रोत होता है। हम व्यावहारिक जीवन में भी देखते हैं कि बल्ब नहीं जलता या फ्यूज़ हो जाता है तो अंधेरा हो जाता है, बिजली का बटन बंद कर देते हैं तो अंधेरा हो जाता है, सूरज ढल जाता है तो अंधेरा हो जाता है। प्रकाश के कुछ स्रोत या कारण हम दीपक, बल्ब (विद्युत ऊर्जा) या सूर्य के रूप में देखते हैं, पर क्या कोई बता सकता है कि अंधकार का कोई स्रोत या अलग से कोई कारण है क्या? वस्तुतः अंधकार का स्रोत या कारण अलग से कोई है ही नहीं, फिर भी उसका अस्तित्व है! वह तभी जब प्रकाश स्रोत बंद हो जाए, समाप्त हो जाए। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक रूप से यदि देखा जाए तो आज तमगुण अधिक इसलिए हैं क्योंकि सर्वत्र सत्त्वगुणों का अभाव है।

आज समाज में तमोगुणों का बोलबाला तथा सत्त्वगुणों का अभाव दीखता है। ... और बहुत से ज्ञानी लोगों द्वारा बताया जाता है कि तमोगुण का स्रोत इस लोक तथा किसी अन्य लोक की कुछ अनिष्ट शक्तियां हैं | ऐसा जान कर हम कर्मकाण्ड, यज्ञ, मंत्रजप, आदि से तम के कारणों या अनिष्ट शक्तियों को मारने-भगाने के प्रयत्न करने में लगे हैं। यह सब थोड़ी मात्रा में करना तो कुछ हद तक समझ में भी आता है, पर पागलों समान अनिष्ट का अस्तित्व समाप्त करने का प्रयास मूर्खता ही प्रतीत होता है। वास्तविकता तो यह है कि सत्त्वगुण यदि बढ़ जाएंगे तो अंधकार रूपी तमगुण स्वयं ही भाग जाएंगे, जैसे सूर्य के निकलते ही अंधेरा गायब हो जाता है।

सत्त्वगुण के मुख्यतः दो स्रोत हैं -- (१) सूक्ष्म रूप से यदि देखा जाए तो ईश्वर, जैसे कि प्रकाश के संदर्भ में प्राकृतिक स्रोत के रूप में सूर्य। और (२) स्थूल रूप से देखा जाए तो हमारा क्रियमाण अर्थात् हमारी स्थूल देह द्वारा किया गया कार्य; जैसे हमने प्रकाश के संदर्भ में बल्ब, ट्यूबलाईट और बिजली आदि का प्रयोग देखा था। प्रकाश-अंधकार के परिपेक्ष्य में जो महत्त्व सूर्य का था यानी प्राकृतिक, सबसे बड़ा एवं सदैव रहने वाला प्रकाशस्रोत, ठीक यही महत्त्व सत्त्व-तम के विवेचन में ईश्वर का है। ईश्वर यानी विश्व बल्कि ब्रह्माण्ड की सबसे प्रधान व बड़ी सत्त्वगुणी शक्ति, जिसके समक्ष अंधकार रूपी तामसिक और अनिष्ट शक्तियां सदैव नतमस्तक रही हैं। ऐसे ईश्वर की यदि हम सच्चे मन से भावपूर्ण साधना करेंगे, तो ईश्वरीय गुण यानी सत्त्वगुण हमारे भीतर स्वयं ही आएंगे। और जब एक बार प्रकाशपुंज जला नहीं कि अंधेरे यानी तम-गुणों का अस्तित्व समाप्त होना शुरू! प्रकाश के सम्बन्ध में जैसे सूर्य के अतिरिक्त हम अन्य भौतिक माध्यमों से भी प्रकाश उत्पन्न करते हैं, ठीक वैसे ही अन्य माध्यम के रूप में क्रियमाण भी जब अच्छे से अच्छा करने की चेष्टा करेंगे तो इससे भी तमोगुण रूपी अंधकार दूर होगा। अर्थात् उपरोक्त अध्ययन के अनुसार, स्वयं भावपूर्ण साधना करेंगे अर्थात् ईश्वर के समीप जाएंगे और स्वयं के क्रियमाण पर भी ध्यान देंगे अर्थात् अच्छे कार्य ही करेंगे, तो इन दो प्रयासों से स्वयं के तमगुण कम होंगे ही। साथ ही समष्टि हेतु भी ऐसा ही प्रयत्न करेंगे। वास्तव में यही आध्यात्मिक साधना व अध्यात्मप्रसार है। वस्तुतः अंधकार हमारे अंतर्मन में है, यह उपर्लिखित दो स्रोतों यानी ईश्वर एवं हमारे क्रियमाण, इन दोनों से ही दूर होने वाला है। अनिष्ट शक्ति जैसी कोई चीज यदि है तो क्या अच्छी शक्तियां नहीं हैं उनसे निपटने के लिए? या हमें अपनी भक्ति और ईश्वर की शक्ति पर कोई संदेह है क्या?

भय और निर्भयता
पिछला अध्ययन जो हमने प्रकाश व अंधकार का किया, ठीक उसी प्रकार से भय का अस्तित्व है। अंधकार के जैसे ही भय का अस्तित्व है। भय का कोई अलग से स्रोत नहीं है। वह तभी होता है जब हममें निर्भयता या आत्मबल की कमी होती है। निर्भयता व आत्मबल की कमी हममें ईश्वरीय गुणों या सत्त्वगुणों की कमी के कारण ही होती है। यदि हमें ईश्वर पर अगाध श्रद्धा है तो हममें सात्त्विक गुण अधिक होंगे, तब आवश्यक निर्भयता व आत्मबल ईश्वर हमें स्वयं ही प्रदान करेंगे। अंधकार के समान ही डर या भय की कोई सीमा नहीं, तभी तो हमें सूक्ष्म अनिष्ट शक्तियों का भय भी सताता रहता है। भय से ही मन में नाना प्रकार के वहम आते हैं, जो वस्तुतः निरर्थक विचार यानी obsession ही हैं। और इस प्रकार के निरर्थक विचारों या भय रूपी जाल में जब हम जकड़ते चले जाते हैं तब हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। जब-जब हम भक्ति से परे जाते हैं या ईश्वर से परे जाते हैं, तब-तब हमें तम या भय का सामना करना पड़ता है। वास्तव में भय अज्ञान का एक ऐसा जाल है जिसमें केवल कमजोर व्यक्ति ही फंस सकता है। कमजोर व्यक्ति अर्थात् आत्मिक रूप से कमजोर व्यक्ति; जिसको स्वयं पर, ईश्वर पर, ईश्वर की शक्ति व न्यायप्रियता पर कोई संदेह हो। अनिष्ट शक्ति जैसे व्यर्थ के प्रपंचों के जाल में फंस कर हम ईश्वर-शक्ति को व निज-क्रियमाण को कमजोर साबित करने में लगे हैं। यह गलत है। आत्मविश्वास प्रबल हो, ईश्वर पर प्रगाढ़ आस्था हो तो भय या अनिष्ट शक्तियों का कोई अस्तित्व ही नहीं। व्यर्थ में ऐसे प्रपंचों में समय गंवाना ठीक नहीं। सूक्ष्म अनिष्ट शक्तियों के अस्तित्व के बारे में एक बार को तो भरोसा किया जा सकता है कि उनका अस्तित्व है पर वे हमारा कुछ बिगाड़ सकती हैं अथवा ऐसा कर रही हैं, यह बताना या ऐसा समझाना भय को बढ़ावा देना ही हुआ, आत्मबल कम करना ही हुआ या ईश्वर की सत्त्वशक्ति पर संदेह करने समान ही हुआ। वस्तुतः जब हमारा आत्मबल कमजोर होता है तब इस प्रकार के व्याख्यानों या सोच से तम का बोलबाला हो जाता है और हमें व्यर्थ के भय सताने लगते हैं। अपने गलत क्रियमाण के फल को भी हम अनिष्ट शक्तियों का प्रभाव मानने लगते हैं। हम क्रियमाण गलत करते हैं और समझते ऐसा हैं कि अनिष्ट शक्तियों के कारण ही यह सब गलत हुआ। या स्थूल के कुछ दोषों के पीछे की नियम-बद्धता को भी भली-भांति देखते नहीं हैं और सूक्ष्म व अनिष्ट शक्तियों को ही इनके पीछे दोषी करार देते हैं। अर्थात् जब बड़े या परिपक्व व्यकि के ऊपर इस प्रकार का विपरीत प्रभाव गलत व्याख्यानों के द्वारा पड़ सकता है तो बच्चों की कोमल भावनाओं व उनके मस्तिष्क पर पड़ रहे कुप्रभाव के विषय में भी कुछ विचार कीजिए। व्यर्थ के भय के संस्कारों का कितना भयावह असर हो सकता है, यह कल्पना से परे है। अतः यह कदापि आवश्यक नहीं कि भय उत्पन्न कर समष्टि को साधना के लिए प्रेरित किया जाए; बल्कि आत्मबल बढ़ाने, भक्ति बढ़ाने, भाव बढ़ाने आदि पर ही जोर दिया जाना चाहिए। यही वास्तविक अध्यात्मप्रसार होगा।

ईश्वर हमसे क्या चाहता है? कुछ और विचार ....
ईश्वर ने १००% क्रियमाण के साथ हमें यानी अपने छोटे से अंश यानी आत्मा को मानव रूप में इस पृथ्वी पर प्रथम जन्म के रूप में जब भेजा तो आत्मा को यह शरीर अर्थात् स्थूल देह, मन एवं बुद्धि आदि प्रदान किए, ज्ञानेन्द्रियां एवं कर्मेन्द्रियां प्रदान कीं। अर्थात् १००% क्रियमाण, प्रारब्ध शून्य, इन्द्रियों सहित मानव देह। इसका सीधा सा अर्थ यही हुआ कि ईश्वर ने प्रथम जन्म के समय यह सब निर्धारित कर हमें कर्मों के लिए इस मृत्युलोक में स्वतंत्र छोड़ दिया। हमारा प्रारब्ध हमारे हवाले ही था। यानी जन्म देने के पश्चात् क्रियमाण में किसी प्रकार का ईश्वरीय हस्तक्षेप नहीं। निष्कर्ष यही निकलता है कि ईश्वर हमसे केवल कर्मों की अपेक्षा रखता है और वह भी केवल अच्छे या सात्त्विक, ईश्वरीय गुणों बल्कि सिद्धांतों के अनुरूप। परन्तु ऐसा नहीं कि यह सब करने के लिए ईश्वर का हम पर कोई दबाव है। लेकिन यह भी तय है कि वह चाहता यही है कि हमारे कार्य सात्त्विक ही हों, तभी तो कार्यों के अनुसार ही संचित का प्रावधान है - धनात्मक या ऋणात्मक; और वही अगले जन्म का प्रारब्ध हो जाता है। अगले जन्म में हम संचित के अनुरूप ही स्वतः कुछ भोगते हैं और शेष क्रियमाण द्वारा। पहले के कुछ लेखों में भी हम अध्ययन कर ही चुके हैं कि प्रकृति के अन्य ज्ञात नियमों की भांति ही ये नियम हैं, इसमें अचरज या संदेह वाली कोई बात नहीं। अर्थात् ईश्वर अपनी प्रशंसा सुनने का आदी राजा नहीं है जो भजन कीर्तन या अन्य कर्मकाण्डों द्वारा आत्ममुग्ध होता रहे। वरन वह तो कुछ अटल नियमों व सिद्धांतों से बद्ध, ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च न्यायिक शक्ति है और उसके संविधान से सब परिचित हैं, चाहे वे स्वीकार करें अथवा नहीं।

हम बहुत से कर्मवादी लोगों को देखते हैं जिनमें अधिकतर विज्ञान को मानते हैं, ईश्वर को भी वे मानते हैं, पर सिद्धांत रूप में, अधिकांशतः निराकार रूप में; और कोई विशेष कर्मकाण्ड या पूजा आदि भी नहीं करते। वे कर्म पर और आत्मबल पर विश्वास रखते हैं और यदि उनका प्रारब्ध भी अच्छा हुआ तो वे वर्तमान जीवन में सफल रहते हैं, साथ ही प्रसन्न भी रहते हैं; शोधकार्यों व नयी खोजों में अपेक्षित सफलता पाते हैं। ऐसे लोगों पर ईश्वर की कृपादृष्टि सदैव रहती है क्योंकि उनके समस्त कार्य सत् के लिए होते हैं, समष्टि के हितार्थ होते हैं; वे गलत कार्य नहीं करते, ईमानदारी जैसे गुण उनमें रहते ही हैं। यही उनकी पूजा-उपासना या साधना है। यही सब तो ईश्वर को अपेक्षित है। परन्तु ऐसे लोगों का प्रतिशत बहुत कम है। बहुतायत के लिए अच्छे कर्म करना कठिन इसलिए होता है क्योंकि उनमें सत्त्वगुणों की कमी होती है। तो सत्त्वगुणों को बढ़ाने के लिए ईश्वरभक्ति व साधना यानी अध्यात्म का मार्ग ही उचित है व सरल है। वास्तव में यह भी एक प्रकार का 'क्रियमाण' ही है। अतः ईश्वर को अपेक्षित है अच्छा क्रियमाण, अच्छे क्रियमाण हेतु आवश्यक हैं सत्त्व गुण, सत्त्वगुणों का आधार है आत्मिक बल और आत्मिक बल बढ़ाने के लिए आवश्यक है आध्यात्मिक साधना। कालानुसार, स्तरानुसार, वर्णानुसार व आश्रमानुसार साधना भिन्न-भिन्न हो सकती है। पुनः यह भी एक प्रकार का 'क्रियमाण' रूपी 'साधन' ही है जो इसलिए अपनाया जाता है जिससे कि ईश्वर को अपेक्षित अन्य सर्व क्रियमाण हमसे संभव हो सकें।

साधना अर्थात् साधन ही। सुप्त पड़े भावों की जाग्रति हेतु अथवा ईश्वरीय गुणों से पुनः साक्षात्कार हेतु ही हम साधना करते हैं। साधना रूपी साधन से हम ईश्वरीय सिद्धांतानुसार चलने के लिए प्रेरित होते हैं। साधना करने का प्रयोजन ईश्वर को प्रसन्न करना नहीं है और न ही ईश्वर केवल साधना से, नामजप से, कर्मकाण्डों आदि से प्रसन्न होने वाला है। वह तो साधना रूपी साधन से उपजे व अपनाए गए ईश्वरीय गुणों से ही प्रसन्न होगा। अर्थात् अंततः वह हमारे सत्त्वगुण आधारित सुन्दर क्रियमाण अर्थात् 'साध्य' से ही प्रसन्न होगा, कोरी साधन-साधनाओं से नहीं।

विचार-मंथन की आवश्यकता
जब हम अध्यात्म-प्रसार के क्षेत्र में कार्य कर रहे होते हैं अर्थात् समष्टि में प्रसार, तब हमें तरह-तरह की विचारधारा के लोग मिलते हैं। साधना के लिए सबके अलग-अलग दृष्टिकोण होते हैं। कोई अन्धविश्वास में जकड़ा मिलता है तो कोई अन्धविश्वास का घनघोर विरोधी, कोई भीतर से अंधविश्वासों या कर्मकाण्डों का विरोधी तो होता है परन्तु फिर भी ऐसा कर रहा होता है क्योंकि उसके गुरु ने उसे बुद्धिलय या मनोलय के विषय में इतनी घुट्टी पिला रखी होती है कि वह निज विवेक से सही-गलत पहचानना ही नहीं चाहता। इस प्रकार श्रद्धावश बुद्धिलय, मनोलय कर व्यक्ति जो साधना कर रहा होता है वह कदाचित उसके लिए तो बिलकुल ठीक हो सकती है पर अन्य कोई उसे गलत भी समझ सकता है, और कभी-कभी वह साधना नियम-सिद्धांतों की दृष्टि से गलत भी हो सकती है या उस साधना से अन्धविश्वास को बढ़ावा मिल रहा होता है। कोई भी क्रिया यदि पूर्वस्थापित शाश्वत नियम या सिद्धांत के विपरीत की जाती है तो वह गलत तो है ही, साथ ही वह क्रिया अन्धविश्वास को भी बढ़ाती है। अन्धविश्वास से ही अनावश्यक भय उपजता है तथा हम अज्ञान रूपी तम के जाल में फंस जाते हैं। अभी-अभी एक बहुत महत्त्वपूर्ण विचार मन में आया है कि कहते हैं कि विज्ञान अन्धविश्वास को रोकने में सहायक है क्योंकि विज्ञानवादी नियमबद्धता व कार्यकारणभाव बता कर बहुत सारे अंधविश्वासों की कलई खोल सकते हैं। और ऐसा भी बहुत कहा जाता है कि वर्तमानकाल में अध्यात्म की दुनिया में अंधविश्वासों की अधिकता है। यह बात किसी हद तक ठीक है। क्योंकि, चूँकि अध्यात्म कृत्य एवं अनुभूति का शास्त्र है; अनुभूति तो शब्दातीत होती है, विज्ञान के नियमों से परे होती है, उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता; इसी बात का लाभ उठा कर कुछ साधक ऊटपटांग, गलत, झूठ व भ्रमित करने वाली अनुभूतियों का बखान करते हैं या यह सब उन साधकों के मन के निरर्थक विचार या obsession भी हो सकते हैं! कुल मिलाकर कारण चाहे कुछ भी हो, ऐसी मिथ्या व निरर्थक अनुभूतियों के बखान से अन्धविश्वास या भय ही पनपता है, बहुतों के मन में शुद्ध अध्यात्म के प्रति विश्वसनीयता भी कम हो जाती है।

जिस प्रकार विज्ञान नियमों या कारणभाव का हवाला देकर अंधविश्वासों को रोकने का प्रयास करता है, आध्यात्मिक गुरु भी क्या यही कार्य नहीं कर सकते?? वे कर सकते हैं। वे समाज में फ़ैल रहे या फैलाए जा रहे भ्रामक प्रचार-प्रसार को रोक सकते हैं। वे चाहें तो इसे रोकें व अध्यात्म को सरल, सरस, सुगम व अन्धविश्वासरहित करें। केवल अंधविश्वासों को तिलांजलि दे कर ही अध्यात्म की गूढ़ता कम की जा सकती है। वर्तमान मार्गदर्शकों द्वारा विचार-मंथन करने से ही यह संभव होगा। आलोचनाएं, समालोचनाएं आदि भी धैर्यपूर्वक सुन कर उनपर ठंडे दिमाग से विचार करना होगा। मथने से ही मक्खन प्राप्त होता है और समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से हम सब परिचित हैं ही। विचारों को मथें, अंधकार व भय के आवरण को हटा आध्यात्मिक साधना की गूढ़ता को कम कर इसे सर्वसाधारण के लिए ग्राह्य बनाएं। गूढ़ता जैसा इसमें कुछ है ही नहीं। अंधविश्वासों की अधिकता के कारण ही अध्यात्म गूढ़ प्रतीत होता है, भ्रामक प्रतीत होता है। कुछ आध्यात्मिक गुरुओं को लगता है कि जब तक अध्यात्म गूढ़ रहेगा, तभी तक उनकी पूछ रहेगी या यश-सम्मान आदि मिलता रहेगा। सर्वप्रथम वे यह सोचें कि सर्वसाधारण का ध्येय क्या है? वह है प्रसन्नता या आनंद। इसकी प्राप्ति के लिए सर्वसाधारण को अंततः तत्त्वनिष्ठ या सिद्धांतनिष्ठ होना पड़ेगा, व्यक्तिनिष्ठ या संस्थानिष्ठ नहीं। गुरुओं द्वारा सर्वसाधारण को इस स्थान पर ले जाने का यत्न करते हुए उन्हें सतत यह भान कराना होगा कि ईश्वरीय तत्त्व के समक्ष तम, भय या किसी अनिष्ट शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं या ये सब प्रभावहीन हैं। जब ऐसा भाव हम सतत रखेंगे तो अध्यात्म की सभी गूढ़ताएं तो कम होंगी ही, साथ ही अंधविश्वासों से भी मुक्ति मिलेगी। आइए गूढ़ता, निरर्थक विचार (obsession) व अन्धविश्वास समाप्त करें; ईश्वर की शक्ति पर संदेह न करें, अपनी भक्ति पर संदेह न करें व ईश्वरीय गुणों के अनुरूप क्रियमाण करने में जुट जाएं।

वस्तुतः ईश्वर की हमसे यही अपेक्षा है कि आत्मा को दी गयी देह का सुन्दर से सुन्दर उपयोग हो मात्र भूलोक के लिए! भुवलोक तो मृत्यु के पश्चात् की बात है। कहा जाता है कि जब कोई कार्य कर रहे हों तो ध्यान मात्र उसी ओर रहना चाहिए, अन्यत्र नहीं जाना चाहिए। अन्यत्र ध्यान भटकने से हमारा वर्तमान कर्म व उसकी गुणवत्ता प्रभावित होते हैं। अतः सर्वप्रथम हमें वर्तमान समय के लिए अर्थात् भूलोक प्रवास के लिए दी गयी आज्ञा व अपेक्षा को ही शिरोधार्य करना है। यही हमारी एकाग्रता व सही दिशा में कार्य करने का सूचक होगा, अन्य बंधन या भय हमें त्यागने होंगे। जब हम व्यर्थ की बातों को त्यागेंगे तभी हम परिपूर्णता की ओर जाएंगे। सर्वसाधारण आज वही अपनाने की चेष्टा करता है जिसमें उसे परिपूर्णता का एहसास होता है। अध्यात्म में भी वह परिपूर्णता चाहता है। कारणभाव जानने पर हमारी आस्था प्रगाढ़ होती है। अकाट्य नियमों, सिद्धांतों व कार्यकारणभाव के आधार पर ही बुद्धि अनेक विकल्पों में से सही का चुनाव करती है। अतः अध्यात्म-प्रसारक के लिए भी यह अति आवश्यक हो जाता है कि उसके द्वारा प्रस्तुत सिद्धांत, कथन या तर्क में परिपूर्णता हो। उसके कृत्य, व्यवहार आदि शुद्ध व अनुकरणीय हों। हर कोई इतना ज्ञानी नहीं कि वह सिर्फ आपके गुण देखे और अवगुणों को अनदेखा कर दे, ऐसा सामर्थ्य किसी-किसी में ही होता है। सर्वसाधारण को गुरु अथवा मार्गदर्शक में परिपूर्णता चाहिए, वैचारिक परिपूर्णता चाहिए। परिपूर्णता होगी अकाट्यता के साथ, सत्यता के साथ, यथार्थवादिता के साथ, तब ही अधिक से अधिक जनसमुदाय अध्यात्म की ओर उन्मुख होगा। मामूली सा अवगुण भी अन्य बहुत से गुणों का महत्त्व कम या समाप्त कर सकता है। इसी प्रकार एक गलत या मिथ्या वैचारिक अवधारणा शेष सही अवधारणाओं का महत्त्व कम कर देती है। तो फिर प्रसारक परिपूर्णता को क्यों नहीं अपनाते? पारदर्शिता के साथ वैचारिक परिपूर्णता लाने का प्रयास होना चाहिए, समस्त अवधारणाएं सुस्पष्ट व यथार्थवादी होनी चाहिएं।

ईश्वर की अन्य अपेक्षाएं
भूलोक का निर्माण ईश्वर ने अपने उन्हीं अंशों के लिए किया जिन्हें वह देह रूपी स्थूल आवरण देकर यहां भेजता है। ईश्वर ने भूलोक पर नाना प्रकार की वस्तुएं कच्चे पदार्थ के रूप में डाल रखीं हैं। उन कच्चे पदार्थों में अनेक प्रकार के रहस्य छुपे हुए हैं जिन पर शोध कार्य कर हमें कुछ निर्माण करना है। भोग संबंधी वस्तुएं भी उनसे निर्मित हो सकती हैं। वस्तुतः इसी शोध कार्य को आधुनिक युग में हमने विज्ञान का नाम दे दिया है। ज्ञानी लोग इस भूलोक को मायाजाल इसीलिए कहते हैं क्योंकि भूलोक की वस्तुएं आत्मा के लिए मात्र तब तक महत्त्व रखती हैं जब तक आत्मा का भूलोक पर प्रवास है। इसके पश्चात् इनका कोई महत्त्व नहीं रह जाता। अतः यदि हमें बहुत दूर का विचार करना है तो इस माया का कोई भी महत्त्व नहीं। तब तो हमें प्रयास कर यह देह त्याग देनी चाहिए! पर हम ऐसा बिलकुल भी नहीं करते क्योंकि ईश्वर ने हमें इस माया को जानने के लिए ही तो इस भूलोक पर भेजा है। अर्थात् माया का भोग हमें किसी न किसी रूप में करना ही है। पर उसमें आसक्ति नहीं रखनी है, यह भान सतत रहना चाहिए। आसक्ति ही तम की जड़ है। आसक्तिरहित भोग ईश्वर को मान्य है। अच्छे क्रियमाण द्वारा प्राप्त किया गया भोग ईश्वर को मान्य है। पर गलत तरीकों से यदि कोई भोग-विलासिता की चीजें एकत्रित करता है तो यह सब ईश्वरीय गुणों के, सिद्धांतों के विपरीत हुआ; यह गलत होगा। ईश्वर द्वारा प्रदत्त कच्चे पदार्थों से खोज करके, शोध करके नए-नए उपकरण या भोग की वस्तुएं या मानव हित की वस्तुओं का निर्माण करना आत्मा का अभ्यासवर्ग या प्रशिक्षण ही हुआ। प्रकृति के रहस्यों को खोजना, प्रत्येक क्रिया के कारणभाव को पता करना, नियमबद्ध करना, यही सब कार्य तो वैज्ञानिक करते हैं। यह भी साधना का ही एक रूप है क्योंकि ईश्वर यही तो चाहता है कि उसके यानी ईश्वर के सभी छोटे-छोटे अंश अर्थात् आत्माएं उसी ईश्वर की भांति समर्थता व सम्पूर्णता की दिशा में निरन्तर अग्रसर हों। यह आत्मा के अभ्यासवर्ग का ही एक भाग है। यदि मनुष्य वर्तमान हेतु या आगे भविष्य में आने वाले अन्य मनुष्यों हेतु यानी आत्माओं हेतु कोई शोध कार्य कर रहा है, रहस्यों पर से पर्दा उठा रहा है, भोग की भी वस्तुएं जुटा रहा है तो इस कार्य में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। क्योंकि इसमें ईश्वर को भी कोई आपत्ति नहीं है। बल्कि यह तो उसकी हमारे से अपेक्षा है।

अतः ईश्वरीय गुणों को आत्मसात करते हुए यानी बेहतर क्रियमाण के द्वारा यदि हम आसक्तिरहित भोग-विलास भी करते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं। दूसरे को किंचित मात्र भी कष्ट न हो, यदि ऐसा हम सदैव ध्यान में रखते हैं तो माया का उपभोग गलत नहीं है; क्योंकि हमें तो ईश्वर प्रदत्त इस भूलोक के समस्त अनुभव लेने ही चाहिएं। पर यह ध्यान हमेशा रखना है कि हमें किसी भी वस्तु में आसक्ति नहीं रखनी है। संभवतः यही बात कलियुग में सब भूल गए हैं, तभी तो सर्वत्र इतना लोभ, कपट और व्यभिचार फैला हुआ है। अर्थात् आसक्ति से ही आज तम की इतनी अधिकता हो गयी है। बल्कि सत्य यह है कि आज सत्त्वगुण कम हो गए हैं। सत्त्वगुण कम हो गए हैं तो सुख, चैन, आनंद सब छिन गया है हमसे। अतः हमें अपना ध्यान सिर्फ इस लक्ष्य पर ही केंद्रित रखना है कि हम अधिक से अधिक सात्त्विक परिणामोन्मुख क्रियमाण कैसे करें! भूलोक का अध्ययन, ईश्वर प्रदत्त कच्चे पदार्थों से नयी-नयी वस्तुओं का निर्माण का अभ्यास, प्रकृति यानी सृष्टि के नियमों व सिद्धांतों का अध्ययन, वर्तमान भूलोक प्रवासियों एवं भविष्य में आने वाली आत्माओं की सुविधा हेतु बेहतर से बेहतर संसाधन जुटाना, समस्त रहस्यों को जानने का प्रयास, प्रत्येक क्रिया के पीछे का कारणभाव खोजना, प्रत्येक क्रिया को नियमबद्ध करना आदि ये कुछ ऐसे कार्य हैं जो हमें समर्थता व सम्पूर्णता की ओर ले जाते हैं। क्या इस प्रकार विकसित होना बुरी बात है? तो फिर बहुत से ज्ञानी लोग ऐसा करने वालों से या विज्ञान से क्यों द्वेष रखते हैं या उनसे प्रतिद्वंदिता क्यों दर्शाते हैं? बार-बार तुलना क्यों करते हैं? क्या किसी के बार-बार तुलना करने से कोई बात सिद्ध हो सकती है? उदाहरण -- हम गुरु को नहीं अपनाते, गुरु हमें अपनाते हैं। अमुक मेरा शिष्य है, जब यह बात कोई गुरु कहेगा तभी यह माना जाएगा कि वास्तव में अमुक उनका शिष्य है। अर्थात् किसी अन्य को यानी सम्बंधित व्यक्ति को भी तो कुछ कहना चाहिए। स्वयं कुछ भी हम कहते रहे उसका कोई भी महत्त्व नहीं!

भुवलोक संबंधी बातें क्या आवश्यक हैं?
पूर्व अध्ययन में हमने देखा कि ईश्वर ने हमें यानी आत्मा को इन्द्रिय सहित स्थूल देह देकर प्रशिक्षण एवं साधना (क्रियमाण) हेतु कुछ वर्षों के लिए इस भूलोक पर भेजा है। अतः हमने उन्हीं बातों का सर्वप्रथम ध्यान रखना है, जिनकी चर्चा हमने ऊपर की है। हमें विषयवस्तु दी गयी है यह भूलोक। अतः सर्वप्रथम आवश्यक है कि हम केवल हमारे भूलोक प्रवास के कार्यों पर ही पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें, अन्यत्र नहीं। क्योंकि मुख्य विषय से भटकने पर एकाग्रता में कमी आएगी, फलस्वरूप हम अपेक्षित कार्य नहीं कर पाएंगे। फिर हम भुवलोक का इतना क्यों विचार करते हैं? क्या हमें ईश्वर की शक्ति पर एवं उसकी कार्यप्रणाली पर कोई संदेह है? या हमें भुवलोक में उपस्थित अच्छी आत्माओं की क्षमता पर कोई संदेह है? जैसे हम भूलोक की आत्माएं भूलोक के कार्यों पर ही ध्यान केंद्रित कर रही हैं, उसी प्रकार भुवलोक के लिए भी ईश्वर का कुछ न कुछ आदेश या अपेक्षा भुवलोक की आत्माओं से भी होगी ही। हम सर्वशक्तिमान ईश्वर की कार्य-वितरण प्रणाली में क्यों हस्तक्षेप करें? जब हम यह भूलोक छोड़कर भुवलोक में यदि जाएंगे तो वहां का कार्य देखेंगे। हम अभी से भुवलोक का सोचकर अपनी एकाग्रता क्यों भंग कर रहे हैं और क्यों व्यर्थ के जाल एवं प्रपंचों में फंस रहे हैं? हम केवल एक स्थान पर अपना ध्यान केंद्रित करें यही उत्तम होगा अर्थात् अपने इस भूलोक प्रवास की उपयोगिता सिद्ध करें। अतः पहले विचार की गयीं सभी बातों का पुनः अवलोकन अंतिम बार करते हैं -- हम केवल यथार्थ में ही रहें, ईश्वर आज्ञा या अपेक्षा का पुनः स्मरण करें, अपने कुछ समय के ही भूलोक प्रवास के प्रयोजन को भली-भांति समझें, केवल मुख्य विषयवस्तु पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें। भूलोक प्रवास यानी आत्मा का प्रायोगिक प्रशिक्षण कार्यक्रम; आत्मा की प्रगति, विकास अथवा परिपूर्णता हेतु। ईश्वर की भक्ति, उस पर पूर्ण आस्था एवं सुन्दर क्रियमाण, यही हमारा मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। प्रसारकों के लिए भी यह आवश्यक बात पुनः दोहरा सकते हैं कि किसी भी चीज की कमी या अति घातक हो सकती है, विशेषकर अध्यात्मप्रसार के क्षेत्र में। ठीक इसी सिद्धांत को पकड़ कर हमें अध्यात्मप्रसार हेतु आवश्यक तत्वों की मात्रा का संतुलन ठीक करना ही होगा। हमें समष्टि में संतुलित रूप से अध्यात्मप्रसार कर सत्त्वगुण बढ़ाने की चेष्टा करनी होगी। अध्यात्मप्रसार जल्दी से हो जाए इसके लिए यह कतई आवश्यक नहीं कि हम व्यर्थ के प्रपंचों या अनावश्यक भय को अध्यात्म में शामिल करें या बारम्बार विज्ञान को निकृष्ट दर्जे का साबित करने की चेष्टा करें। यह अति होगी और प्रसार के लिए घातक भी। केवल सरल, सच्ची, भावपूर्ण व भक्तिपूर्ण साधना से ही हमें अपेक्षित सुन्दर क्रियमाण हेतु आवश्यक आत्मबल प्राप्त हो सकता है। अतः पहले के विवरण को पुनः दो-तीन बार पढ़कर यथार्थ को समझने का प्रयास करें, फिर तदनुसार संतुलित कर्म करें। पहले लोक (भूलोक) सुधारें, फिर परलोक! इति।

Sunday, February 7, 2010

(२६) ईश्वर बड़ा या ईश्वरीय तत्त्व ?

तत्त्व यानी सिद्धांत (real or divine substance, principle)। हम ईश्वर का नामजप, पूजा-उपासना, कर्मकाण्ड आदि तो किया करते हैं, परन्तु यह जानने का प्रयास नहीं करते कि आखिर यह सब हम क्यों करते हैं? अधिकांश जनों का यह विश्वास होता है कि यह सब करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और उनकी आशीषें सदैव हमारे साथ रहती हैं। कोई भी मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद या चर्च आदि मार्ग में पड़ते हैं तो लोग सिर झुका कर नमन करते हुए आगे बढ़ते हैं। यह सब हम ईश्वर या अपने इष्ट को सम्मान देने एवं उनकी कृपादृष्टि बने रहने के लिए करते हैं। सप्ताह के कुछ विशेष दिनों में लोग आराधनालय जाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं, व्रत आदि रखते हैं। धर्माचार्यों का भी आग्रह रहता ही है कि जनसाधारण यह सब नित्यप्रति करे। पर विचार कीजिए कि क्या ईश्वर इन सब कृत्यों से ही क्या प्रसन्न हो जाते हैं और हम पर अपनी आशीषें बरसाते हैं? उदाहरण के लिए - अधिकांश ईसाई समुदायों में इस बात पर विश्वास करने को अत्यधिक बल दिया जाता है कि यीशु मसीह परमेश्वर के इकलौते पुत्र थे, जो सम्पूर्ण मानव जाति के पापों के प्रायश्चित्त के तौर पर बलिदान हो गए। कहा जाता है, जो इस बात पर विश्वास करेगा, केवल वही स्वर्ग अथवा पुनरुत्थान का अधिकारी होगा। परमेश्वर की आशीषें उस पर बरसेंगी। हिदुओं में भी इससे मिलते-जुलते बहुत से मिथक हैं। कई पौराणिक कथाओं व व्रत कथाओं में कुछ विशिष्ट कर्मकाण्डों और विधियों को करने पर बल दिया गया है और न करने पर ईश्वर द्वारा क्रोधित हो जाने एवं दण्ड देने का भय भी दिखाया गया है। अर्थात् लगभग प्रत्येक संप्रदाय के धर्मग्रंथों एवं धर्मगुरुओं द्वारा ईश्वर को एक ऐसे शक्तिशाली राजा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो बहुत बलशाली है, हम सब उसकी प्रजा हैं और उसकी प्रजा यदि उसके बल और नाम को मानेगी तथा उसकी जय-जयकार करती रहेगी, तो वह ईश्वरीय राजा प्रजा से प्रसन्न होकर उसपर अपनी कृपावर्षा करता रहेगा; विपरीत करने पर वह रुष्ट होकर दण्ड देगा।

अब हम अपने विवेक से एक अच्छे मानवीय राजा के विषय में सोचें, इतिहास को भी उलटें-पलटें, तो पाएंगे कि मनुष्य जाति में भी ऐसे राजा लोकप्रिय हुए जिन्होंने न्याय का अवलंबन लिया, व्यर्थ के बल प्रदर्शन का नहीं। हमेशा से ऐसे राजा को ही प्रजा ने चाहा है, जो न्यायप्रिय हो, जिसके सिद्धांत अच्छे हों, उन सिद्धांतों के अनुरूप ही राज्य के नियम-कानून हों। साथ ही एक अच्छे और न्यायप्रिय मानवीय राजा की अपनी प्रजा से सदैव यह अपेक्षा रहती है कि उसकी प्रजा उसके बनाए सिद्धांतवादी नियमों का भली-भांति पालन करे। वह चापलूसी या मात्र अपनी जय-जयकार से प्रसन्न नहीं होता वरन प्रजा जनों की नेकनीयती व सिद्धांतानुसार कर्तव्यपालन से प्रसन्न होता है। अर्थात् वह अपनी पूजा से नहीं बल्कि अपने सिद्धांतों की पूजा से संतुष्ट होता है। और जो कोई भी उसके सिद्धांतों की अवहेलना करता है पर उसके समक्ष सदैव उसकी जय-जयकार करता है, उसे वह एक नंबर का चापलूस समझता है और उससे अप्रसन्न ही रहता है, समय आने पर उसे दण्ड भी देता है।

अब तनिक यह विचार कीजिए कि एक अच्छे मानवीय राजा के ये लक्षण हैं, ये गुण हैं, तो ईश्वर की तो बात ही निराली होगी, क्योंकि सभी मान्यताओं के अनुसार निर्विवादित रूप से वह ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च न्यायप्रिय शक्ति है। वह है, इस बात को लगभग हर कोई मानता है। उसके सिद्धांतों व गुणों के विषय में भी लगभग सभी संप्रदायों में एक सी अवधारणा है। फिर हम यह कैसे मान सकते हैं कि ईश्वर मात्र अपनी जय-जयकार सुनने का आदी राजा है! एक तरफ हम विश्वास करते हैं कि वह हमारे दिल या मन में चल रही बात भी समझ सकता है, हमारे सब छुपे कार्यों पर उसकी दृष्टि है, कर्म के अनुसार हमें दण्ड या परितोष मिलता है; और दूसरी तरफ हम कोई प्रसंग आने पर मात्र कुछ समय उसको याद कर लेते हैं, उसकी जय-जयकार कर लेते हैं, परन्तु शेष समय उसके सिद्धांतों पर चलने से आंख चुराते हैं! अधिकांशतः अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए ही उससे मदद मांगते हैं। और जहां व्यवहार में ईश्वरीय सिद्धांतों के अनुसरण की बात आती है, वहां हम बहाने गढ़ लेते हैं। प्रत्येक परिपक्व व धर्मभीरू व्यक्ति ईश्वर के सिद्धांतों से भली-भांति परिचित है, कर्म-आधारित परितोष व दण्ड व्यवस्था से भी परिचित है, पर जब उन्हें अपनाने व आचरण से प्रकट का समय आता है, तब उन सिद्धांतों से अनभिज्ञ बन जाता है या भीतर ही भीतर उन पर अविश्वास करता है; फिर भी नियमपूर्वक जप-तप व कर्मकाण्ड आदि करता है! यह तो दोहरा आचरण हुआ। यह लगभग वही बात हुई कि हम कोरी चापलूसी पर उतर आए।

फिर भी कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें नामजप, पूजा-अर्चना, कर्मकाण्ड आदि से अच्छा लगता है, शांति मिलती है, तो ऐसे लोगों के लिए यह सब करना सही भी है। क्योंकि महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उनको अच्छा लग रहा है, शांति मिल रही है अर्थात् उनमें ईश्वर व ईश्वरीय गुणों के प्रति श्रद्धा-भाव कुछ तो पहले से है और कुछ इन कृत्यों को करने से बढ़ रहा है। यह श्रद्धा व भाव ही व्यक्ति को ईश्वरीय सिद्धांतों व गुणों के समीप लाता है और व्यक्ति उन सिद्धांतों के अनुरूप आचरण करने लगता है। बच्चा विद्यालय में पढ़ने जाता है, अध्यापकों के प्रति आस्था और सम्मान की भावना होती है तो शीघ्र उनके बताए सिद्धांतों को पकड़ता है। पर यदि वह केवल अध्यापकों के पांव ही पकड़ता रहे और सोचे कि वे मुझसे प्रसन्न होकर उत्तीर्ण कर देंगे, तो यह गलत बात है। मेहनत तो करनी ही पड़ेगी, और मेहनत करने वाले बच्चे को ही अच्छे अंक मिलते हैं, केवल चरण पकड़ने वाले को नहीं। यह बात भी ठीक है कि यदि अध्यापकों के प्रति आदरभाव कम होगा तो उनके सिद्धांतों को भी पकड़ने में बच्चा पीछे रहेगा। पर श्रेष्ठ अध्यापकों को शिष्यों का सिद्धांतों का पालन करते देखना अच्छा लगता है, कोरी चापलूसी करना नहीं। फिर जो सिद्धांत पर चलता है, वह सम्मान देता ही है।

बच्चा जब छोटी कक्षा में होता है, तब अध्यापक के पढाने का ढंग कुछ और ही होता है। वह शिष्य को कड़े अनुशासन में रखता है, बार-बार रटाता है। बाद में अगली कक्षाओं में क्रमशः रटाने की अपेक्षा समझाने का क्रम अधिक होता जाता है। शिष्य भी कम में ही अधिक समझने की योग्यता अर्जित करने लगता है। पढ़ने और पढ़ाने दोनों की पद्धति सूक्ष्मतर होती जाती है। अंत में उच्चतम कक्षाओं में अध्यापक शिष्य से बिलकुल मित्रवत हो जाते हैं, समकक्ष सा मानने लगते हैं। शिष्य तब भी उनका सम्मान करता है। इस पूरी बात में उल्लेखनीय यह है कि बच्चे का ज्ञान पाने का सफर बहुत नीचे से आरंभ होता है और क्रमशः ऊपर की ओर जाता है। इस क्रम में कभी यह नहीं होता कि उत्तीर्ण होने के बाद भी बच्चा उसी कक्षा में पुनः-पुनः पढ़ता रहे। न यह बच्चा चाहता है और न ही अध्यापक। फिर हम शिष्य या भक्त और हमारे वर्तमान गुरुजन ऐसा क्यों कर रहे हैं? बहुत समय हमने स्थूल कृत्यों में व्यतीत कर लिया। वह घड़ी कब आयेगी जब हम प्रौढ़ होकर ज्ञान की अगली कक्षाओं में जाएंगे? कब हम ईश्वर रूपी सर्वोच्च गुरु से मित्रवत होंगे? निचली कक्षाओं में तो ब्रह्मज्ञानी स्थूल देहधारी ही हमारे गुरु होते हैं पर ज्ञान की ऊपरी कक्षाओं में तो गुरु के रूप में हमें साक्षात् ब्रह्म मिलते हैं! और वह सूक्ष्म ब्रह्म हमसे सिद्धांतों के खरे पालन की अपेक्षा करते हैं, रटी-रटाई बातों की नहीं। वह अपनी प्रशंसा सुनने के आदी राजा समान नहीं हैं। वह ऐसे न्यायप्रिय राजा हैं जो स्वयं अपने बनाए सिद्धांतों से बद्ध है। इति।

Thursday, February 4, 2010

(२५) धार्मिक कर्मकाण्ड - अपनाएं, छोड़ें या बदलें ?

समय के साथ-साथ हिंदू समाज में बहुत से कर्मकाण्डों का प्रवेश हो चुका है। गर्भ में आगमन से लेकर मृत्युपरांत तक नाना प्रकार के कर्मकाण्ड चलते ही रहते हैं। इसके अतिरिक्त तीज-त्यौहारों पर एवं प्रतिदिन किये जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों की संख्या भी बहुत अधिक है। इनमें से केवल कुछ धार्मिक कृत्य ही साधारण व्यक्ति स्वयं कर पाता है, शेष कृत्य पण्डित, पण्डे, पुरोहित या आचार्य आदि द्वारा संपन्न कराए जाते हैं। कर्मकाण्ड करते या करवाते समय बहुतों के मन में यह प्रश्न उठता होगा कि 'क्या ये कर्मकाण्ड वास्तव में औचित्यपूर्ण हैं?' यदि उनसे पूछा जाए या वे स्वयं से ही पूछें तो व्यक्ति-अनुसार कई प्रकार के उत्तर मिलेंगे। कुछ का कथन होगा कि इससे उन्हें अच्छा लगता है। कुछ का कथन होगा कि 'हम यह नहीं करेंगे तो भगवान् नाराज हो जाएंगे।' कुछ का कथन होगा कि 'भगवान् इन सब कृत्यों के करने से प्रसन्न हो जाएंगे।' परन्तु अधिकांश का कथन होगा कि 'हमारे यहाँ ऐसी ही परम्परा चली आ रही है, उसी का निर्वाह हम भी कर रहे हैं, समाज में रहना है तो सामाजिक परम्पराओं का निर्वाह करना ही होगा।' .... अर्थात् हम देखते हैं लोग किसी न किसी भावनावश, भयवश, लोभवश या जगनिन्दा से बचने हेतु धार्मिक कृत्य कर-करवा रहे हैं और इनके करने का कोई ठोस औचित्य बताने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। बहुत ही कम ऐसे लोग होते हैं जिनको इन कृत्यों से वास्तव में कोई आध्यात्मिक अनुभूति होती है, वैसे किसी मनोवैज्ञानिक प्रभाव को अनुभूति समझ लेना बहुत आम बात है।

यद्यपि विभिन्न मनोवैज्ञानिक एवं मानसिक कारणों से आज समाज में धार्मिकता की सूजन बहुत बढ़ी हुई दिखती है पर समानान्तर रूप से यह भी कटु सत्य है कि कर्मकाण्डों के प्रति लोगों की आस्था कम हुई है या कम से कम अनिश्चय की स्थिति तो निरंतर बढ़ ही रही है। 'धार्मिकता की सूजन' कहा, इसी से यह स्पष्ट हो जाता है कि धार्मिक कृत्य तो अब बहुत हैं पर वे प्राण-विहीन हैं। यह जानने के पश्चात् मनन करना आवश्यक प्रतीत होता है कि जीवन के लगभग हर मोड़ पर आने वाले ये धार्मिक कृत्य क्या अत्यावश्यक हैं? इन धार्मिक कर्मकाण्डों को अपनाया जाए, छोड़ा जाए या बदला जाए?

सर्वप्रथम तो यह जानना बहुत आवश्यक हो जाता है कि कर्मकाण्डों की उत्पत्ति कैसे व क्यों हुई? जैसा कि हमने पहले के लेखों में भी इससे मिलते-जुलते अनेक विषयों पर चर्चा की ही है, उन्हीं को कुछ दोहराते व आगे बढ़ाते हुए चलते हैं।

मनुष्य एक आत्मिक प्राणी है। आत्मा के स्वरूप व गुणों पर हम पहले भी बहुत चर्चा कर चुके हैं। हम जानते हैं कि विश्व के सभी स्थानों पर मान्य सर्वोत्कृष्ट मानवीय गुण ही वस्तुतः आत्मा के मूल गुणों के बहुत समीप हैं। अतः प्रत्येक काल में तत्कालीन ज्ञानी महापुरुषों ने जनसाधारण को उन गुणों के समीप लाने हेतु उस समय के लोगों की बौद्धिक क्षमता के अनुसार अनेक शिक्षाओं को कुछ वाह्य धार्मिक स्थूल कृत्यों से जोड़ा। फलस्वरूप समाज-अनुरूप नाना प्रकार के कर्मकाण्डों को जन्म दिया। वस्तुतः ये सब क्रिया-कलाप ईश्वरीय गुणों को जानने व आत्मसात् करने हेतु माध्यम या साधन ही थे, साध्य नहीं। आशय केवल यही था कि कुछ स्थूल कृत्यों में ही किसी प्रकार से लोगों का मन रम जाए, जिससे लोगों के आचरण में धार्मिकता (righteousness) का समावेश सुनिश्चित हो सके, समाज का संतुलन बना रहे। सरल स्वभाव होने के कारण पहले लोग इन धार्मिक कृत्यों के प्रति आस्थावान थे। इन्हीं से उनका अंतःकरण शुद्ध हो जाता था, भक्तिभाव जागृत हो जाता था और नीतिपूर्ण कार्य करते थे अर्थात् आध्यात्मिक स्तर ऊंचा हो जाने से नैतिक मूल्य भी स्वतः बलिष्ठ हो जाते थे। विभिन्न कर्मकाण्ड न केवल व्यक्ति के अंतःकरण को शुद्ध करने का कार्य करते थे अपितु उसके मन में सम्बंधित कार्य एवं व्यक्ति के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता का भाव भी उत्पन्न करते थे, उदाहरणार्थ - जन्म, विवाह और मृत्यु पर किए जाने वाले कर्मकाण्ड। कुल मिलाकर सभी ज्ञानी महापुरुषों का मंतव्य यही था कि कर्मकाण्डों का आधार लेकर साधारण जनमानस शुद्ध व सात्त्विक रहे व समाजव्यवस्था उत्तम बनी रहे। सरलता व सहजता हेतु सगुण भक्ति का सुन्दर आलंबन लिए यह प्रक्रिया बहुत कारगर थी, लेकिन मात्र ज्ञान की प्रारंभिक अवस्थाओं हेतु ही। आगे की अवस्थाओं में आवश्यकतानुसार और अधिक परिपक्व ज्ञान भी मार्गदर्शक सर्वसाधारण को देते थे।

धीरे-धीरे समय ने करवट ली और माया से संबद्ध आत्मिक प्राणी ने माया के विषय में अपने ज्ञान को बढ़ाना आरंभ किया। व्यक्ति में मानसिक व बौद्धिक परिवर्तन होना आरंभ हुआ। सरलता और भोलापन पहले की अपेक्षा कम होता गया। व्यक्ति हर बात, हर घटना का प्रमाण खोजने लगा। अनेक स्थानों पर उसे आशातीत सफलता प्राप्त भी हुई, विशेषकर स्थूल खोजों में। विज्ञान की शिक्षा-पद्धति में वैश्विक स्तर पर क्रान्तिकारी परिवर्तन आए। आध्यात्मिक रूप से उन्नत होने के लिए भी व्यक्ति ने अपने सामर्थ्यानुसार प्रयास किए, कारणभाव जानने के प्रयास किए। अतः समानान्तर रूप से आध्यात्मिक शिक्षा के तौर-तरीकों में भी परिवर्तन आना अपेक्षित था। परन्तु दुर्भाग्य से भारत आध्यात्मिक शिक्षा-पद्धति में परिवर्तन करने में असफल रहा। तथाकथित ज्ञानी मार्गदर्शकों का अपना ही स्वरूप बदलता गया। वे निरंतर नीचे की ओर जाने लगे, धन व यश के लोभ ने उन्हें आ घेरा। वे स्वयं तो पतित हुए ही, उन्होंने अन्यों को भी भ्रमित करना प्रारंभ कर दिया। तदुपरांत यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है।

हिंदू समाज में समय के साथ-साथ धर्म-शिक्षा के स्तर में कोई परिवर्तन या सुधार तो हुआ नहीं, बल्कि अनेकों दोष ही घुस आये। देखा जाए तो कर्मकाण्डों का आरंभ त्रेतायुग से हुआ था और द्वापर युग में ये अपने चरम पर थे। तब तक इनका स्वरूप शुद्ध था। उस कालखण्ड तक पण्डितों या पुरोहितों का आध्यात्मिक स्तर ऊंचा था, अंतःकरण स्वच्छ था, वर्णाश्रम व्यवस्था का समुचित पालन करते-करवाते थे, समाज व्यवस्था उत्तम रखने का भान था, जीवनशैली सात्त्विक व साधारण थी। पर कलियुग आते-आते वह बात न रही। संभवतः इस स्थिति का पूर्वाभास तत्कालीन ज्ञानियों को हो गया था, इसीलिए अनेक हिंदू धर्मग्रंथों में कलियुग में 'कर्मकाण्ड साधना' का परित्याग कर उससे सूक्ष्मतर 'नामजप साधना' करने के लिए कहा गया है। कारण खोजें तो अनेक हैं। उनमें से प्रमुख हैं - कालानुसार लोगों की मानसिक एवं बौद्धिक क्षमता में परिवर्तन आना, जिज्ञासु वृत्ति का बढ़ना, भोलापन कम होना, मनुष्य की आयु का कम होते जाना, भाषा संबंधी परिवर्तन होना (संस्कृत भाषा का धीरे-धीरे लोप होना), ज्ञानियों में अहंभाव व विभिन्न प्रकार के लोभ पनपना, समाज का विभिन्न संप्रदायों में बंटना, जनसंख्या बढ़ना, कर्मकाण्डों में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों एवं उनकी गुणवत्ता का ह्रास होना आदि।

इतिहास को भी यदि हम समग्र रूप से बिना किसी पूर्वाग्रह के देखें तो यह पाएंगे कि द्वापरयुग तक सब कुछ संतुलित था, पर उसके पश्चात् हिंदू समुदाय में विद्यमान कर्मकाण्डों का स्वरूप बिगड़ता चला गया। हजारों प्रकार की जातियां तदनुसार देवी-देवता, दान के नाम पर निकम्मे लोगों का पालन-पोषण, अनगिनत हानिकारक रूढियों, रस्म-रिवाजों, पूजा-उपासना पद्धतियों, अनुष्ठानों, कर्मकाण्डों आदि की भरमार ने हिंदुओं को दिग्भ्रमित तथा मानसिक व आध्यात्मिक रूप से पंगु सा कर दिया। आज भाव को तो छोड़ दीजिए कोरा विश्वास भी दुर्लभ है, फिर भी लोक-निंदा से बचने के लिए लोग अंधाधुंध ये उपर्लिखित कृत्य बस आँख मूँद कर किए जा रहे हैं। जैसे-तैसे सब निपटाते हुए कामकाज चल रहा है। पण्डित भी मस्त यजमान भी मस्त! क्या इस प्रकार की अंधी दौड़ का कोई औचित्य है? मैं तो कहता हूँ कि इस प्रकार अपनी आँखों में स्वयं धूल झोंकने से अच्छा है कि ये सब करना बंद किया जाए या वर्तमान ज्ञानी महापुरुष आगे आएं और जनसाधारण का निःस्वार्थ मार्गदर्शन करें, स्थिति में शीघ्र व ठोस परिवर्तन लाने का प्रयास करें।

कल पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा लिखित एक पुस्तक पढ़ रहा था। उसमें उन्होंने कहा था कि 'आध्यात्मिकता न वेश से सम्बन्ध रखती है, न पूजा-पाठ से, न जप-तप से। इन सब को करते हुए भी मनुष्य एक नंबर का पाखंडी, आडम्बरी और स्वार्थपरायण हो सकता है। यह नकली अध्यात्मवाद समाज के लिए अभिशाप सिद्ध हो रहा है और लोगों में अंधविश्वास तथा झूठी श्रद्धा का एक बड़ा कारण बना हुआ है। गुरुनानकदेव जी की तरह सभी हिंदुओं को इस ठग-विद्या को जड़ से समाप्त करना होगा।' यह कार्य हमारे अगुवों यानी अभिजात वर्ग द्वारा पहले किए जाने पर समाज में शीघ्र क्रांति आयेगी। आगे एक और स्थान पर वह कहते हैं कि 'हमें खेद के साथ यह कहना पड़ता है कि हिंदुओं के धार्मिक संस्कारों तथा अन्य जातीय कृत्यों को संस्कृत भाषा में ही किए जाने का आग्रह, एक वर्ग विशेष के स्वार्थ की दृष्टि से ही किया जाता है। वह वर्ग चाहता था कि धर्मकृत्य सदैव एक ऐसी भाषा में कराये जाएं, जिसका ज्ञान अन्यों को बहुत कम है, उससे सब उनके ऊपर ही निर्भर रहेंगे और उनको सहज में ही सुखपूर्वक निर्वाह करने का अवसर प्राप्त हो सकेगा।'

निश्चित रूप से समाज व्यवस्था को उत्तम रखने और लोगों की भाव-भावनाओं को उच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए कर्मकाण्डों का एक बड़ा महत्त्व था। परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उपरोक्त अभीष्ट साध्य करने हेतु यह (कर्मकाण्ड) एक साधन मात्र था। समयानुसार सामाजिक एवं बौद्धिक परिवर्तन होने के साथ तत्कालीन ज्ञानियों द्वारा इसका परिष्कार व संशोधन आदि किया जाना अत्यावश्यक था (जैसे - भाषा के सम्बन्ध में ही ऊपर के परिच्छेद में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कथन देखें)। श्रद्धा पहले संस्कृत भाषा में व्यक्त होती थी, कालांतर में वही श्रद्धा हिंदी या किसी क्षेत्रीय भाषा में व्यक्त करने-करवाने में ज्ञानी मार्गदर्शकों को क्या आपत्ति थी? कर्मकाण्ड करना है तो लोग संस्कृत सीख लें, इस प्रकार का आग्रह अब अप्रासंगिक होगा। समय के साथ-साथ अन्य बहुत सी बातों के समान भाषा में भी परिवर्तन आया। कर्मकाण्ड सबकी समझ में आएं और सब सरलता से इन्हें कर सकें, इसके लिए संस्कृत भाषा से हिंदी व अन्य भाषाओं में इनका अनुवाद करना लाभकारी रहता। मैं तो कहता हूँ कि अब भी देर नहीं हुई है, समाज के अगुवे ज्ञानी महापुरुष आगे आएं और निःस्वार्थ भाव से इस कार्य को आगे बढ़ाकर समाज को दिग्भ्रमित और पथभ्रष्ट होने से बचाएं। व्यक्ति जब स्वयं कोई कृत्य करेगा तब ही उसमें खरा श्रद्धाभाव उत्पन्न होगा। स्वयं कसरत करने से ही शरीर स्वस्थ बनेगा, कोई और कसरत करे और आपका शरीर पुष्ट हो, यह नहीं हो सकता। अर्थात् जब मनुष्य स्वयं अपनी भाषा में भली-भांति समझते हुए कर्मकाण्डों को संपन्न करेगा तभी उसे सच्ची अनुभूति होगी। किसी भी कर्मकाण्ड या पूजा-उपासना का सच्चा लक्ष्य है भाव जागृत कर आपको ईश्वर के समीप ले जाना। यह तभी संभव है जब आप अपनी भाषा में, अपने शब्दों में स्वयं यह सब करें। आरंभ में घर के सब सदस्य नहीं तो केवल एक-दो सदस्य ही यदि यह सब स्वयं करने में सक्षम होंगे तो अन्यों का उत्साह स्वयं ही बढ़ेगा। पर फिर से दोहराऊंगा कि समाज में प्रतिष्ठित ज्ञानियों व अभिजातवर्ग के पहल करने पर ही कर्मकाण्डों का स्वरूप सुधरेगा, अन्यथा मात्र लकीर के फकीर बने रहने से उत्तम होगा कि व्यर्थ का दिखावा त्याग कर इन प्राण-विहीन कर्मकाण्डों का परित्याग करें।

सत्य तो यह है कि द्वापरयुग से अब तक के लंबे समय में हमें आध्यात्मिक रूप से अत्यधिक उन्नत हो जाना चाहिए था, परन्तु हम भारतवासी निरन्तर नीचे की ओर ही गए। ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि हम ज्ञान की अगली अवस्थाओं में जाना ही भूल गए, हमारे पथप्रदर्शक भी सोते रहे। विद्यालय में भी तो एक कक्षा उत्तीर्ण कर अगली कक्षा में जाते हैं, पुनः उसी कक्षा में बैठने की गलती नहीं करते। प्रथम कक्षा में 'अ' से अनार जानने के लिए हमें अनार का चित्र या मूर्ति दिखाई जाती है, जबकि अगली कक्षाओं में ऐसा नहीं होता। कक्षा दर कक्षा क्रमशः हमारा ज्ञान विस्तृत एवं सूक्ष्मतर होता चला जाता है। विज्ञान के क्षेत्र में हम व हमारे मार्गदर्शक जितने चौकन्ने और गतिशील रहे उतनी प्रगति दिखाई पड़ती है, पर अध्यात्म के क्षेत्र में स्थूल कर्मकाण्डों से सूक्ष्मतर जाने के बजाय हम वह स्थूल ज्ञान भी विस्मृत कर बैठे। अब यदि कुछ लोग कहते हैं कि वे अपेक्षाकृत सूक्ष्मतर आध्यात्मिक जगत में पहुंच चुके हैं, तो मैं बेहिचक उनसे कहूँगा कि वे अब कर्मकाण्डों का परित्याग कर दें, परन्तु उन कर्मकाण्डों के प्रति हीन भावना न रखें, क्योंकि आज भी कई व्यक्ति उसी या उससे नीचे की कक्षा में होंगे और कभी आप भी वहां रहे होंगे। अतः मेरा वैयक्तिक निष्कर्ष यह है कि भौतिक जीवन में आने वाले कुछ विशेष अवसरों पर लोग अपनी श्रद्धा व सामर्थ्यानुसार स्थूल अथवा सूक्ष्म कर्मकाण्ड करें, श्रद्धा-विहीन यंत्रवत कुछ करने से उत्तम है कि कुछ न करें। भाव जागृत होने की आशा या इच्छा हो तो यंत्रवत करते रहने में भी कोई बुराई नहीं है। स्मरण रहे कि भाव सर्वोपरि है और यह किसी विशिष्ट भाषा या विधि पर तनिक भी आश्रित नहीं है। इति।

Tuesday, February 2, 2010

(२४) ऑस्ट्रेलिया बनाम मुंबई

पिछले कई दिनों से दो मिलते-जुलते महत्त्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे समाचारपत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित हो रहे हैं। पहला मुद्दा ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमलों का है तथा दूसरा मुद्दा मुंबई में हिंदी भाषियों के ऊपर हो रहे हमलों का है। दोनों स्थानों पर विवाद के मूलतः दो मुख्य कारण हैं -- (१) अधिसंख्य प्रवासियों, विशेषकर नए प्रवासियों द्वारा वहां की मूल संस्कृति का अनादर व अवहेलना करना, (२) मूल निवासियों में व्याप्त असुरक्षा की भावना। ऑस्ट्रेलिया में काफी पहले से रह रहे कुछ भारतीय स्वीकार करते हैं कि अब उनमें भारत से ऑस्ट्रेलिया आने वाले नए प्रवासियों के प्रति पहले जैसा लगाव नहीं रहा। ऑस्ट्रेलिया में पुराने बसे भारतीय अब प्रयास करते हैं कि हाल ही में भारत से ऑस्ट्रेलिया आने वालों से दूरी बना कर रखी जाए। इसके अनेक कारण हैं। वे आगे कहते हैं कि भारत से आने वाले युवकों का यहाँ झुण्ड बना कर चलना, रेल यात्रा के दौरान मोबाइल फोन पर ऊँचे स्वर में बात करना, यात्रा के दौरान बुजुर्गों, महिलाओं व बच्चों के लिए सीट न छोड़ना जैसी बातें ऑस्ट्रेलिया के मूल नागरिकों को नहीं भाती। यहाँ तक कि कई भारतीय अपने परिवार की स्त्रियों की सुरक्षा के विषय में चिंतित रहते हैं कि कोई भारतीय ही उन्हें परेशान न कर दे।

न्यूनाधिक लगभग यही हाल मुंबई का है। अंतर केवल इतना है कि इस मुद्दे पर महाराष्ट्र के कुछ राजनीतिक दल आक्रामक एवं सतही राजनीति पर उतर आये हैं। जबकि उधर ऑस्ट्रेलियाई सरकार बहुत संयम से विवेकपूर्ण कदम उठा रही है। मुंबई के राजनेताओं के विरोध का मुद्दा अब भाषा पर केंद्रित है, वे हिंदी भाषियों व राष्ट्रभाषा हिंदी के विरोध पर उतर आये हैं। जबकि उधर ऑस्ट्रेलिया में वहां की सरकार व लोगों के विरोध का मुद्दा नैतिकता से सम्बन्ध रखता है। मूलतः वे भारतीयों के दुर्व्यवहार एवं अनैतिक कार्यों से व्यथित हैं। भूतकाल में ऑस्ट्रेलियाई जो भी रहे हों, जैसे भी रहे हों, पर वर्तमान में वे नैतिकता और अनुशासन की दृष्टि से हम वर्तमान अधिसंख्य भारतीयों से बहुत आगे हैं। विकसित देशों के नागरिकों के इन गुणों की चर्चा विस्तार से पिछले अनेक लेखों में हो चुकी है। वस्तुतः इन गुणों से युक्त आचरण ही उनकी वर्तमान संस्कृति है, जिसे उन्होंने बड़े यत्न से बनाया होगा। नवप्रवेशी भारतीयों का उजड्ड व्यवहार ठहरे हुए शांत पानी में पत्थर फेंकने समान उद्विग्नता फ़ैलाने का कार्य करता है, फलतः वहां के निवासियों में रोष व असुरक्षा की भावना घर कर जाती है और प्रतिक्रियात्मक हिंसा जन्म लेती है।

वैसे कोई भी ये उपरोक्त पंक्तियाँ पढ़े तो यही कहेगा कि मुम्बईया राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया बिलकुल सही व नैसर्गिक है। पर कम से कम मैं इस बात से असहमत हूँ। यह सही बात है कि प्रत्येक प्रवासी नागरिक का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि वह जिस भी प्रान्त में जाए, वहां की संस्कृति को आत्मसात करे, उसका आदर करे, उसमें घुल-मिल जाए और सबसे बड़ी बात यह कि मूल निवासियों एवं संस्कृति के प्रति उसके हृदय में विनम्रता व कृतज्ञता का भाव हो। यही खरी नैतिकता की मांग है, यही धार्मिकता (righteousness) है। यदि इन सब बातों का प्रत्येक प्रवासी गंभीरता से ध्यान रखे तो मूल निवासी व प्रवासी के मध्य सौहार्द बना रह सकता है। यदि प्रवासी जन उपरोक्त कथित प्रवासी-धर्म का परित्याग करते हैं तो वे मूल निवासियों में परायेपन व असुरक्षा की भावना का बीजारोपण करेंगे, फलतः कभी न कभी कठोर प्रतिक्रिया का सामना अवश्य करेंगे। प्रत्येक क्रिया के फलस्वरूप तदनुरूप प्रतिक्रिया का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक नियम हम सब को ज्ञात है ही। .... परन्तु मुंबई में हिंदी भाषी प्रदेशों के प्रवासियों को अपने व्यवहार के कारण उपजी नैसर्गिक प्रतिक्रिया के साथ-साथ कुछ अप्राकृतिक प्रतिक्रियाओं का भी सामना करना पड़ रहा है। यह अति है और यह हिंदी भाषा व हिंदी भाषी विरोध के रूप में हमारे समक्ष है।

वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत ऑस्ट्रेलिया भारत से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र है, वहां के कुछ अपने नियम व कानून हैं जो वहां सबको मान्य करने ही होते हैं। इसके पालन में कठोरता चलती है। इसके साथ ही वहां की कुछ निजी संस्कृति भी है, व्यवहार के कुछ तौर-तरीके हैं, जिनके पालन में कठोरता तो नहीं चलती पर उनका पालन करना सभ्यता व विनम्रता का सूचक माना जाता है। नवप्रवेशी भारतीयों ने सरकारी नियम व कानून तो कम तोड़े, पर वहां की संस्कृति पर अवश्य कुठाराघात किया होगा, जिसकी प्रतिक्रिया उन्होंने भुगती। परन्तु मुंबई के विषय में यदि बात करें तो वह अविभाज्य स्वतंत्र भारत राष्ट्र का मात्र एक नगर है और भारत के संविधान एवं कानूनों के अंतर्गत आता है। नियमों व कानूनों के अनुसार हिंदी इस राष्ट्र की मातृभाषा व राष्ट्रभाषा है और साथ ही भारत का प्रत्येक नागरिक शिक्षा, रोजगार या अन्य किसी भी कारण से भारत के किसी भी नगर में जाने के लिए स्वतंत्र है। इसलिए नागरिकों के इस अधिकार का हनन व राष्ट्रभाषा का विरोध करना राष्ट्रीय नियमों-कानूनों का सरासर उल्लंघन करना होगा। रही बात मराठी भाषा सीखने के आग्रह की, तो शिष्टाचार के अंतर्गत प्रत्येक प्रवासी को इसकी अवश्य चेष्टा करनी चाहिए, इससे उनके ज्ञान का व समाज का दायरा भी बढ़ेगा। पर यदि वह मराठी सीखने में असफल भी रहता है तो भी राष्ट्रभाषा हिंदी के ज्ञान के चलते उसके किसी भी कार्य में रूकावट आने की कोई संभावना नहीं होनी चाहिए। राष्ट्रभाषा हिंदी का ज्ञान मुंबई एवं महाराष्ट्र सहित समग्र भारतीयों को होना ही चाहिए, यह उनके लिए गर्व की बात होगी साथ ही राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान का सूचक भी। इति।