Saturday, April 30, 2016

(७०) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १३

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
प्राथमिक कक्षाओं के समस्त संकल्पों-विकल्पों को क्रमशः त्याग कर ही हम सर्वोच्च कक्षा तक पहुँच सकते हैं; काश, यह सबको पता चल जाए और बिना पुनः गिरे हम इस सच पर स्थिर रह पाएं! ऐसा हो जाए तो फिर कलियुग का अंत निश्चित है और सतयुग बाहें फैलाकर हमारा स्वागत करेगा!

(२)
धर्मोपदेशक या मजहबी-शिक्षक का कार्य बहुत ऊंचे दर्जे का है व समाज भी इनके प्रति विशिष्ट आदर-भाव रखता है, थोड़ा लोभ और भय मिश्रित ही सही। तो इन धर्मोपदेशकों का मूल उद्देश्य यही होना चाहिए और यही होता भी था प्राचीनकाल में कि सामान्य लोगों को लोभ व भय से परे ले जाकर, दण्ड-परितोष की भावना से मुक्त करा कर, संघ में सच्चे धर्म (righteousness) की स्थापना करना तथा उसकी खराई को अक्षुण्ण रखना; स्वयं के एवं अन्यों के ज्ञान में लगातार वृद्धि कर निरंतर अल्लाह या प्रकृति के नियमों के और अधिक समीप पहुँचते जाना; धर्म के वाह्य स्वरूप के अवांछित तत्वों व भय-मिश्रित अंधविश्वासों की बेड़ियों को लगातार काटना, आदि-आदि। सारांश में यह कि ज्ञान की अगली कक्षाओं में अनवरत अग्रसर होते / करते जाना।
परन्तु आज ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा है। विभिन्न मजहबी संगठन खुदा व धर्म को और अधिक जटिल बनाने व दुरूह साबित करने में लगे हैं। बजाय अंधविश्वासों को दूर करने के, वे और अधिक अंधविश्वास बढ़ाने में लगे हैं। कारण स्पष्ट है कि आम लोगों को जब धर्म बहुत जटिल व साथ ही भौतिक लाभ पहुंचाने वाला लगेगा तब वे लोभवश इसकी ओर सहज ही आकृष्ट होंगे तथा दुरुहता जान पड़ने के कारण माध्यम बनेंगे आज के तथाकथित मजहबी संगठन व उनसे सम्बद्ध व्यवसायिक धर्मगुरु।
आखिर कब हम सचेत होंगे?

(३)
गलत के खिलाफ आपका रोष जायज है एवं साथ ही आपका दर्द भी समझा जा सकता है.
मोबाइल कम्पनियों की भी होड़, आक्रामक विज्ञापन, अन्य निरुपयोगी सुविधाओं की आदत डलवाना, छुपे खर्च, कामचलाऊ गुणवत्ता, आदि किसी से छुपे नहीं हैं. बेवकूफ बना कर पैसा बटोरने का खेल चल ही रहा है, तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी क्यों पीछे रहेंगी? जिस मूल देश से वे सम्बन्ध रखती हैं वहां तो उनका कार्य साफ-सुथरा है, पर भारत में चूँकि भ्रष्टाचार खूब है, अतः यहाँ वे भी चाँदी काट रहीं हैं. बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं. ..और तो और, हमारे देश की मौजूदा प्रतिभाएं भी इसमें उनकी सहायक सिद्ध हो रही हैं, उदाहरण के लिए बिज़नस मैनेजमेंट (MBA) की पढाई किये लोगों को आज प्राइवेट सेक्टर में जो नौकरियां मिल रही हैं, उनमें अधिकांशतः उनका काम यही होता है कि झूठ-फरेब से भरी मनमोहक और पेचीदा प्रमोशनल स्कीमें कैसे बनाई जायें! ...कैसे भी हो पर पैसा आना चाहिए, भारी टर्नओवर होना चाहिए, चाहे इसके लिए कितने ही झूठे सब्जबाग क्यों न दिखाने पड़ें! भारत में आज यह व्यापार का मूल सिद्धांत बन गया है! ..कहीं न कहीं हमारी या हमारे कुछ अपनों की भी इस कुचक्र में सहभागिता है, ..और वह भी हमारी सहमती से! तटस्थ भाव से ईमानदार अवलोकन की आवश्यकता है!

(४)
कुरीतियों के खिलाफ आपका रोष, विरोध एवं विद्रोह बिलकुल जायज है. ..जिन रीतियों का आज के परिपेक्ष्य में कोई औचित्य नहीं और उनको बस किसी प्रकार से निभाना, लकीर के फ़क़ीर बनने समान है. बदलावों हेतु आपने बहुत ही अच्छे सुझाव दिए हैं. मेरा सल्यूट!
परन्तु, कुछ बदलने के लिए यदि हम क्रोध में दूसरे के कृत्य को कोसते हुए कुछ अलग बात रखेंगे तो हमारी बात कोई नहीं मानेगा! क्योंकि हर एक व्यक्ति की अपनी कुछ न कुछ इगो (अहं) है और जब वह हर्ट होती है तो सामने वाला अपने दिमाग के सभी खिड़की-दरवाजे बंद कर लेता है! ...अपने बच्चों को समझाते हुए क्या हम इस बात का ध्यान नहीं रखते? उनके अपरिपक्व स्वभाव को बदलने हेतु हम कोमलता से सुतर्क देते हैं, सही बात को विभिन्न कोणों से समझाते हैं, और इस प्रकार धीरे-धीरे वे परिपक्व सोच के धनी हो जाते हैं.
हमें धैर्य और कोमलता, नम्रता आदि का दामन नहीं छोड़ना है और अपनी बात भी रखनी है, और सामने वाले के स्तर का भी ध्यान रखना है. ...और यह सब साधते हुए सब सध सकता है, इस उम्मीद को बरक़रार रखना है.
सभी अपने ही हैं, कोई पराया नहीं; कोई आज किसी निचली कक्षा में पढ़ रहा है तो आप जैसा कोई ऊपर की कक्षा में पहुँच चुका है, बहुत से लोग बीच की कक्षाओं में भी हैं. कुछ एक ही कक्षा में बहुत दिन से रुके हुए हैं तो कई निरंतर आगे की कक्षाओं में अग्रसर होते जा रहे हैं. ...हम ऐसे सोचें तो बिना किसी द्वेष के हम समस्त जनों को ऊपर की ओर ले जाने में अवश्य कामयाब होंगे.

(५)
आपने एक बात कही कि "एक चिकित्सक को भी मरीज के हित के लिये शरीर की चीर-फाड [आपरेशन] भी करना पड़ता है, भले ही मरीज उसको पसंद न करे!"
इसमें थोड़ा सा सकारात्मक एवं आशावादी संशोधन-
मरीज को भी जब अपने किसी एक सड़े अंग से यह खतरा बन जाता है कि उसके कारण उसका शेष शरीर भी इन्फेक्टेड हो सकता है तो वह स्वेच्छा से उस अंग को कटवाने सर्जन के पास पहुँच जाता है.
हमें सड़ांध के प्रति जाग्रति लानी होगी, फिर व्यक्ति स्वयं जागरूक होकर परिष्कृत होने का यत्न करेगा ही. किसी अंग के काटे जाने की नौबत आने से पूर्व ही उसे ठीक करने या करवाने का प्रयास करेगा.
इसी प्रकार सामाजिक कुरीतियों को भी बलात् दूर करने का प्रयास उत्तम नहीं, बल्कि उत्तम यह होगा कि हम लेखक संजीदगी के साथ ऐसा आईना पेश करें, जिसमें दाग दिखाई पड़ें. ..जब दाग दिखाई पडेंगे, समझ में आयेंगे, तो व्यक्ति उन्हें स्वतः ही साफ़ करेगा या करवाएगा.
सड़े दांत को कोई भी डेंटिस्ट निकाल सकता है, परन्तु काबिल डेंटिस्ट वही कहलाता है जिसने अपने प्रोफेशनल जीवन में न्यूनतम दांतों को निकाला और अधिकतम दांतों को सुधारा.
पूरी तरह से सड़े दांतों को निकालिए, कोई हर्ज नहीं; पर कुछ दांतों को पूरी तरह से सड़ने के पूर्व सुधारिए भी!
अब उत्तर में यह न कहियेगा कि "मैं कोई डेंटिस्ट नहीं!"

(६९) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १२

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
परेशानी हो तो कर्म करने की जरुरत है न कि किसी कर्मकाण्ड की!
और यदि किसी अमुक कर्मकाण्ड से किसी योग्य कर्म करने की प्रेरणा मिलती हो तो उसे करने में कोई आपत्ति नहीं.
कोई विशिष्ट धार्मिक कर्मकाण्ड किसी कर्म का स्थान ले लेगा, यानी शॉर्टकट उपलब्ध करा देगा, इस गलतफहमी में बिलकुल भी न रहिएगा! इसी को अन्धविश्वास और भ्रष्टाचार कहते हैं.
वह शॉर्टकट नहीं वरन ईमानदार कर्म चाहता है.

(२)
कर्मकाण्ड भाव-जागृति हेतु ही होना चाहिए, बिना 'कर्म' (बिना मेहनत या प्रयास) किसी अभीष्ट सिद्धि हेतु नहीं! ..वह भी यथासंभव शुरुआती अवस्था में ही!
..और जो अकर्म-कर्म की बात कही आपने (...ईश्वर कर रहा है और हमसे करा रहा है और सदा हमारे साथ है), वह इतना सरल नहीं! ..बहुधा हम भावुकता में ऐसा कह तो जाते हैं कि हम अकर्म-कर्म कर रहे हैं, परन्तु अधिकांशतः वह कोरी भावना ही होती है, ..सच्चे भाव का अभाव होता है; ...तभी तो अनेकों तथाकथित तत्त्व-ज्ञानियों से से भी पाप होते हैं! ...और तब वे यह नहीं कह सकते कि- "यह ईश्वर कर रहा है और हमसे करा रहा है और सदा हमारे साथ है"! ...ये उनके क्रियमाण-कर्म होते हैं- उनके मन, बुद्धि और विवेक से किये हुए; और ठीकरा फोड़ते हैं भगवान् पर!
मेरा आशय समझ गए होंगे आप. ...किन्तु इसे अन्यथा न लीजिएगा!

(३)
आपने कहा- "अध्यात्म की ऊंची कक्षाओं की पढ़ाई बहुत ही कठिन है और विरले ही उस को समझ पाते हैं. आम तौर पर लोग ग्रॅजुयेशन करते ही अपने नाम के आगे डिग्री लिखने लगते हैं और वास्तविक अनुसंधान से बचते हैं इसका एक कारण यह भी है कि अनुसंधान के परिणाम कभी मिलेंगे भी कि नहीं, यह निश्चित नहीं होता, जबकि धंधा करने के लिये ग्रॅजुयेशन काफी है."
'आपने बिलकुल सही बात कही, परन्तु यह बात आध्यात्मिक मार्गदर्शकों (विभिन्न तथाकथित गुरुओं) पर लागू होती है!
..लेकिन आम व्यक्ति की बात करें तो वह तो अभी तक किसी जूनियर कक्षा में ही अटका है! ..या फिर तथाकथित मार्गदर्शकों ने उसे वहीं पर अटका रखा है!
.
रही बात ग्रेजुएशन के पश्चात् के 'अनुसंधान' की, तो अध्यात्म में वहां तक कोई भी पहुँच सकता है, ..एक आम व्यक्ति भी; ..किसी मार्गदर्शन अंतर्गत अथवा बिना किसी मार्गदर्शन के; ..बस दृढ़ निश्चय के साथ जिज्ञासु वृत्ति का होना आवश्यक! ..हर बच्चा (या व्यक्ति) अपने माता-पिता (या जीवन देने वाले) के विषय में जानने हेतु उत्सुक होता है और होना चाहिए! हर एक व्यक्ति को अपने जीवन को या स्वयं को और उससे जुड़ी बातों को खोजना चाहिए, जानना चाहिए, ..इसमें कुछ भी अटपटा नहीं! ..वैज्ञानिक भी तो यही करते हैं- 'अनुसंधान'!

(४)
बड़ा विरोधाभास है कुछ बातों में; एक तरफ आप कहते हैं कि "ईश्वर की हकीकत की थाह पाना मानव मन-मस्तिष्क के बस का नहीं, और दूसरी तरफ आपका यह कहना है कि ईश्वर की निशानियों को हमारा दिल खूब जानता व पहचानता है!" ..मेरा विचार है कि हम खूब जानते हैं कि ईश्वर व ईश्वरीय सिद्धांत, मूलतः प्रकृति के मूल सिद्धांतों के रूप में हमारे सामने प्रकट हैं, ...और हम हैं कि जानते हुए भी मानते नहीं, ..या अपने-आप को इस सिस्टम की परिधि से बाहर समझते हैं! ..शायद यह हमारा कोरा अहंकार है, ...और शायद इसी अहंकारवश हम जड़ और अज्ञानी समान हैं, ...और शायद इसीलिए हम पीढ़ियों से एक जगह (कक्षा में) स्थिर से हैं या अपेक्षाकृत नीचे ही गए हैं! इस भौतिक देह में और इस भौतिक संसार में हमें भौतिकता व आध्यात्मिकता के बीच संतुलन रखना आवश्यक होता है; भौतिक उन्नति तो हम खूब कर रहे हैं परन्तु आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में हम 'अबोध' ही बने हुए हैं, इसी कारण संतुलन बहुत बिगड़ गया है और हम निरंकुशता की हदें पार कर रहे हैं और आकंठ भौतिकता में डूबे हैं अनैतिकता के साथ (क्योंकि आध्यात्मिकता ही नैतिकता के रूप में प्रकट होती है)!

(५)
प्रकाश के विषय में जागृति फ़ैलाने (प्रसार करने) वाले व्यक्ति का प्रथम और अंतिम उद्देश्य केवल प्रकाश (या उसके महत्त्व) का प्रसार करना होता है, उसके किसी एक विशिष्ट ब्रांड का प्रचार नहीं! उसे केवल स्वच्छ और उज्जवल प्रकाश के प्रसार से मतलब होता है तथा वह उसे (प्रकाश को) अनेक स्रोतों में ढूंढकर अनेकों विकल्प प्रस्तुत करता है बिना किसी पूर्वाग्रह के!
जबकि किसी एक बल्ब विशेष (किसी एक बल्ब निर्माता) का प्रतिनिधि (या मालिक) केवल उस बल्ब विशेष का प्रचार करता है, उसे ही अपनाने का आग्रह करता है, अन्य निर्माताओं के समकक्ष उत्पादों को वह निकृष्ट बतलाता है! ..मूलतः वह ब्रांड का प्रचार करता है, प्रकाश का प्रसार नहीं!

सच्चा धार्मिक, 'सार्वभौमिक ज्ञान' रूपी असीमित प्रकाश के 'प्रसार' (spreading) में सहायक होता है या उसके द्वारा यह कार्य स्वयमेव होता है जैसे सूर्य के द्वारा प्रकाश का प्रसार होता है; और अन्धश्रद्ध कट्टर, किसी 'विशिष्ट ब्रांड' के सीमित ज्ञान का 'प्रचार' (publicity) करता है.
.
पहली स्थिति में ज्ञान का प्रसार परमात्मा अथवा आत्मा के आदेश से और दूसरी स्थिति में ज्ञान का प्रचार किसी गुरु विशेष के आदेश (अथवा शिक्षा) से होता है.
.
पहली स्थिति में सम्पूर्ण समष्टि के दीर्घ हित छुपे होते हैं जबकि दूसरी स्थिति में एक विशिष्ट समुदाय अथवा पंथ के हित छुपे होते हैं.
.
प्रथम व्यापकत्व लिए होता है और दूसरे का एक निश्चित दायरा होता है.
.
हाँ, यह सच है कि श्री रामकृष्ण परमहंस सरीखे खरे गुरु सदैव "प्रसार" हेतु प्रयत्नशील होते हैं, वे सीमित सोच के नहीं होते बल्कि व्यापकत्व लिए होते हैं. ..और उनकी यह विशेषता हम और आप नहीं निर्धारित कर सकते, उनके देह त्याग के कुछ वर्षों बाद 'सभी' को इसका पता चल पाता है ('केवल दो-चार नजदीकी लोगों' को ही उनकी गहराई का पहले से पता होता है).

Friday, April 1, 2016

(६८) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ११

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
विभिन्न समाजों (सम्प्रदायों, पंथों) में व्याप्त विभिन्न कुप्रथाओं को जब तक हम धर्म (?) (अर्थात् किसी पंथिक ग्रन्थ में उल्लेखित उपदेश या आज्ञाओं) से जोड़कर देखेंगे तो दो बातें होंगी-
पहली बात कि कुप्रथा के प्रति हमारा मोह या सम्मान बना रहेगा (धार्मिक पक्ष जुड़ा होने के नाते);
और दूसरी बात यह कि अन्य मतावलंबियों के प्रति हमारा द्वेष पूर्व की अपेक्षा और अधिक बढ़ेगा, क्योंकि उनकी व हमारी शिक्षाओं/आदेशों में परस्पर विरोधाभास अवश्य मिलेंगे!
और हम कुत्तों की भांति एक दूसरे से लड़ते रहेंगे! लड़ाई प्रथमतः केवल वह ही बंद करेगा जो अपेक्षाकृत अधिक समझदार होगा! ..किसी की जो चीज या आदत हमें पसंद नहीं, क्या आवश्यकता है कि वही हम भी अपनाएं?!
बहुधा हम 'धर्म' शब्द को 'रिलिजन' के सन्दर्भ में लेते हैं और रिलीजियस निर्देशों को 'धर्म' समझते हैं. जबकि रिलीजियस निर्देश (उपदेश, आज्ञायें, ग्रन्थ) आदि नीतिवचन हैं मात्र, ..और नीतियाँ कालानुसार बदलती हैं, बदलनी चाहियें! ..और ये बदलते रहे भी हैं, उदाहरणार्थ- बाइबिल का पुराना नियम (कठोर, स्थूल) v/s नया नियम (उदार, सूक्ष्म); वेद शिक्षा का क्रमशः स्थूल उपासना से सूक्ष्म उपासना तक जाना; सामान्य विद्यालय में कक्षा दर कक्षा आगे जाने पर पाठ्यक्रम बदलना (सूक्ष्म होना)!
'धर्म' कोई इतना छोटा शब्द नहीं कि विवादों में घिर जाए या उस पर आसानी से प्रश्नचिन्ह खड़े किये जा सकें. 'धर्म' कोई 'उपासना पद्धति या जीवनशैली' नहीं!
प्लीज..., धर्म, रिलिजन, संस्कृति, सभ्यता, नीति, आदेश आदि शब्दों को अलग-अलग गहराई से समझने का यत्न करें! ..इससे व्यर्थ के विवाद बंद होंगे, और तब हम व्यर्थ की बेड़ियाँ काटते हुए वास्तव में विकास की सीढ़ियाँ चढ़ेंगे.

(२)
आपने कहा- "इस देश के लोग भले ही ढोल ढमाकों और हाथियों के जोर पर कभी कभार जाग जाने वाली सरकार पर लाख दोष मढ़ लें परन्तु स्वयं तो कसम खा कर बैठे हैं कि वे अंधे ही बने रहेंगे। जब तक कि वे स्वयं ठोकर नहीं खा लेते।"
..इस बात से मैं पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ. वास्तव में हमारे देश के लोग अन्धविश्वासों में इस कदर जकड़े हैं कि ठोकरें खाने के बाद भी नहीं जागते. विभिन्न उलजलूल धार्मिक मीमांसाओं, तथाकथित (अकाट्य?) धार्मिक आदेशों, उपदेशों आदि ने आमजन को स्थाई रूप से धृतराष्ट्र व गांधारी बना दिया है.
आमजन आज विचित्र सम्मोहन की अवस्था में है जो उसे वैयक्तिक भौतिक उन्नति के विभिन्न शॉर्टकट्स सुझाता है. उसे सचेत करने की बात तो दूर की, उसे और अधिक पथभ्रष्ट करने में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है.
वास्तव में समाज की ऊपरी परत (layer) में उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्ति (जिनमें सरकार और विभिन्न धर्मगुरु भी आते हैं) आज अचेतावस्था में हैं तो निचली परत में अचेतना आना स्वाभाविक ही है.
आज जब मीडिया या सरकार में भी तथाकथित बुद्धिमान लोग एक-दूसरे की तरफ ताकते हुए देखा-देखी या अंदाजे से अपने अगले कदम उठाते हैं, केवल निज हितों को ध्यान में रखते हुए, ..तो प्रजा रूपी बच्चा क्या सीखेगा? आज के धर्मगुरुओं की तो बात ही अनोखी है, मायाजाल फ़ैलाने में लगे हैं और उनके इस मायाजाल को काटने के लिए हम लाख आलोचनाएं कर लें पर स्थिति बदलने वाली नहीं!
स्थिति तब ही बदल पायेगी जब समाज का ईमानदार वर्ग निःस्वार्थ भाव से ऐसी यथार्थ शिक्षा (मिताक्षर व परिष्कृत अध्यात्मशास्त्र) का प्रसार करे जिसको आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी खरा पाया जाए. यह तभी संभव हो पायेगा जब विभिन्न धार्मिक अवधारणाओं की जड़ तक जाकर उनके मंतव्य, मूल, सार आदि को खुले दिमाग से जानने की कोशिश की जाए और साथ ही इस क्रम में स्वतःस्फूर्त अनुभूतिजन्य ज्ञान का सहारा भी लिया जाए.
इस क्रम में कुदरत, प्रकृति और इसका सिस्टम हमें दिशा दिखाता ही है यदि हम मन में पहले से ही कोई धारणा बना कर न चलें तो!
ऐसा ही कुछ प्रयास/प्रयोग मैंने भी किया और इससे जो कुछ भी निकला, उसे बहुत धीरे-धीरे और यथासंभव आसानी से पचने योग्य भाषा में अपने ब्लॉग के माध्यम से समाज के साथ साझा करने की एक कोशिश कर रहा हूँ. कर्म पर मेरा अधिकार है और कर्म के अनुसार उचित समय पर उचित माध्यम से प्रतिक्रिया होनी निश्चित है, परन्तु बाट जोहने की आवश्यकता नहीं क्योंकि प्रकृति का सिस्टम अभूतपूर्व व अद्भुत है!

(३)
अभिभावकों, बड़ों या शुभचिंतकों की दिली ख्वाहिश होती है कि उनका बच्चा नेक राह पर चले.
.
नेक राह पर चलने का मतलब किसी धर्म (पंथ) की शिक्षा के अनुसार 'लकीर का फ़क़ीर होना' नहीं वरन ऐसे रास्ते पर चलना जो मौजूदा समय के अनुसार उचित हो और मुझे, साथ ही अन्यों को भी आन्तरिक प्रसन्नता दे.
अपेक्षाकृत और अधिक छोटे शब्द में 'नेक राह पर चलना' मायने 'योग्य एवं न्यायप्रिय पथ पर चलना'.
.
बच्चा जब छोटा होता है तो अभिभावक उससे सही काम करवाने के लिए उसे किसी न किसी 'पुरस्कार का लोभ' या 'दंड का भय' दिखाकर नेक राह पर रखने की कोशिश करते हैं.
परन्तु बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ हमारी इस क़वायद का तौर-तरीका परिपक्व एवं यथार्थ के करीब होता जाता है.
.
'शैतान' शब्द के परिपेक्ष्य में भी शायद यही बात खरी उतरती है. परिपक्वता की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, प्रौढ़ता को हासिल करते हुए हमारे जेहन में 'शैतान' शब्द का अर्थ अब व्यापक भावार्थ में बदलना चाहिए, क्या आपको यह नहीं लगता?
.
तब यह किसी एक अमुक धार्मिक शिक्षा से सम्बंधित न रहकर एक सार्वभौमिक सत्य के रूप में हमें समझ में आयेगा और किसी के लिए भी इसे समझना सरल होगा.
.
पहले हम (आम लोग) अपरिपक्व थे, बिलकुल बच्चे जैसे, सो धार्मिक उपदेश भी उसी के अनुसार थे. अब तो हम बड़े हो गए हैं, फिर बचकाना व्यवहार क्यों करें?
.
किसी काल में बनी विभिन्न धार्मिक नीतियाँ उस समय की जरूरत, जगह और माहौल के अनुसार तथा उस समय की हमारी बुद्धि को ध्यान में रखते हुए हमें योग्य पथ पर कायम रखने हेतु बनाई गयीं. तो वे नीति स्वरूप ही हुईं और नीतियाँ हमारी प्रौढ़ता के बढ़ने के साथ बदलती हैं, हमने ऊपर देखा था.
.
पहले हम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक-दूसरे से अनजान थे, अब तो सम्पूर्ण विश्व एक छोटे से गाँव के समान और सब एक-दूसरे से वाकिफ़.
.
अब हमें वास्तव में विकसित होने के लिए किसी भी सभ्यता से कुछ लेने (यदि वह सही है) और अपना कुछ छोड़ने (यदि वह गलत है) में संकोच नहीं होना चाहिए.
.
सबका ईश्वर (सर्वोच्च शुभचिंतक/अभिभावक) भी यही चाहता है कि उसके सभी बच्चे परिपक्वता के शिखर तक पहुंचें.
.
यदि हम यह नहीं समझ रहे तो माना जा सकता है कि "शैतान" अपनी चाल में अभी तक कामयाब है.
.
पुनश्चः - ..अपने धर्म (पौराणिक नीति) पर ही 'सख्ती' के साथ चलना, ऐसा अटल इरादा हमें दूसरों के धर्म या विश्वास के प्रति सशंकित करता है या अन्धश्रद्ध कट्टर में रूपांतरित कर सकता है. फिर हम संकीर्ण हो सकते हैं, अन्यों को नीचा या शैतान तक समझ सकते हैं! ..परन्तु हमें तो विकसित एवं व्यापक होना है न!

(४)
बहुत अच्छा, तीखा व करारा प्रहार- हमारी आज की मानसिकता पर! आंखें खोलने वाला सच बयान किया है आपने.
..वैसे इस सच से बहुत से लोग वाकिफ़ हैं, ..पर आज आईना कौन देखना चाहता है और सच कौन सुनना चाहता है? अतः अधिकांश लोग अँधा और बहरा होने की एक्टिंग करते रहते हैं और जानबूझकर नादान बने रहते हैं.

(५)
नमस्कार बन्धु. आपने कहा- "सरकार और जनता दोनों सचेत हो जाएँ तथा सच्चे सदाचार को अपना लें, तो भ्रष्टाचार का नामो निशान मिट जायेगा। जनता एवं सरकार दोनों को जागृत होना पड़ेगा।"
.
पर यह होगा कैसे?? ..नींद खोलने और सदाचार अपनाने के लिए कोई कारण (भय, लालच या 'ज्ञान') तो होना चाहिए उनके पास, जिससे कि वे motivate हो सकें! ज्ञान हो तो सबसे बढ़िया!

(६)
प्रत्येक चीज में 'कमी' और 'अति' दुष्परिणाम लाती है. खाना-पीना, सोना-जागना, मनोरंजन, भावुकता, अभिव्यक्ति, बहस, धार्मिक कृत्य, विश्वास-अविश्वास, प्यार-डांट, एकत्रीकरण-भण्डारण, अपनाना-परित्याग आदि अनेक ऐसे विषयों पर यह बात लागू होती है. आज भारतीय समाज में इन्हीं (कमी और अति) के कारण असंतुलन की स्थिति! ..शायद इस पर और अधिक मनन की आवश्यकता, ...क्षमा करें, इसकी आवश्यकता आपको भी!
साथ ही, प्रवृत्ति और निवृत्ति में संतुलन बैठाने की परम आवश्यकता! ...और निवृत्ति का क्रम प्रवृत्ति के पश्चात् ही! आरंभ में प्रवृत्ति एक स्वाभाविक व न्यायसंगत क्रिया, तथा प्रवृत्ति पश्चात् निवृत्ति की सोच एवं क्रिया अत्यावश्यक- इसमें कोई संदेह नहीं!
कृपया उत्तर अवश्य दें.

(७)
कोई भी प्राचीन धर्मग्रन्थ वहां के लोगों की उस समय की ज़रूरत के हिसाब से लिखे नीतिवचन हैं. प्राचीनकाल में प्रत्येक स्थान के लोगों की परिस्थितियों में भिन्नताएं थीं, सो प्रत्येक समुदाय के नीतिवचनों में शिक्षाएं, वरीयताएं भिन्न थीं.
पहले साधारण मानव अति सीमित था- शायद केवल अपने कबीले तक, ..अब सम्पूर्ण विश्व के लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आ चुके हैं. ..धार्मिक विश्वासों के रूप में अपनी-अपनी प्राचीन धरोहरें भी सबके पास हैं, ..परन्तु अधिकांश अभी तक बेड़ियों में जकड़े हैं, अपने ज्ञान को विस्तार ही नहीं देना चाहते.
.
स्थिति तब ही बदल पायेगी जब विभिन्न धार्मिक अवधारणाओं की जड़ तक जाकर उनके मंतव्य, मूल, सार आदि को खुले दिमाग से जानने की कोशिश की जाए और साथ ही इस क्रम में स्वतःस्फूर्त अनुभूतिजन्य ज्ञान का सहारा भी लिया जाए.
इस क्रम में कुदरत, प्रकृति और इसका सिस्टम हमें दिशा दिखाता ही है यदि हम मन में पहले से ही कोई धारणा बना कर न चलें तो!

(८)
बहुत सही चोट की है आपने वर्तमान व्यवस्था पर! ..हम भारतवासियों का जीवन चल नहीं रहा, वरन दौड़ रहा है. दूरी तो बहुत तय करते हैं रोज, परन्तु विस्थापन बहुत थोड़ा सा ही होता है शायद! विकास और मेंटेनेंस की बात कर रहा हूँ मैं! ..भागमभाग बहुत, शोर बहुत, थकान बहुत, परन्तु हाथ कुछ ख़ास नहीं आता. ...क्योंकि भ्रष्टाचारी तरीकों के अतिरिक्त योजनाबद्ध शायद कुछ भी नहीं. सो भ्रष्टाचार के विकास में कोई कमी नहीं और न ही कोई बाधा; शेष सब कुछ आधा (या वो भी जाए भाड़ में)!

(६७) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १०

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
मेरे विचार से दुनिया का प्रत्येक धर्मग्रंथ अपने अनुयायियों को मानवीयता के पथ पर चलने के लिये प्रेरित करता है, दैनंदिन जीवन में नैतिक गुणों के समावेश की अपेक्षा करता है, ..इस्लाम धर्म भी.
और दुनिया में सम्मिलित रूप से कौन से गुण, 'नैतिक गुण' कहलाते हैं, यह सभी धर्मों के लोग भीतर से जानते हैं, ..नास्तिक भी!
तो प्रशंसा उसी व्यक्ति की होती है जिसके आचरण से नैतिक गुण प्रकट होते हैं, ..अन्य समुदाय के व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय भी! इसमें हिन्दू और मुस्लिम जैसी कोई बात नहीं!
यह बात तो हो गयी वैयक्तिक स्तर की. ..अब बात करते हैं सामुदायिक स्तर की, तो किसी भी समुदाय के अधिसंख्य लोग अपने दैनंदिन कार्यों एवं अन्यों के साथ आचरण करते समय सम्मिलित रूप से जिस प्रकार की मानसिकता व नैतिकता को दर्शा रहे हों, उसी के अनुसार वह समुदाय प्रशंसा या आलोचना का पात्र बनता है.
पेशेवर आलोचकों और तथाकथित बुद्धिजीवियों की बात छोड़िये, एक आम आदमी किसी के धर्मग्रंथ के मर्म में नहीं जाता, वह केवल व्यक्ति और उसके समुदाय के लोगों में विद्यमान वर्तमान नैतिकता को ही देखता/ढूंढता है, और उसी के अनुसार वह उसके प्रति अपनी राय बनाता है.
अब कृपया कोई नैतिकता की परिभाषा बताने का अनुरोध ना करे, उसके बारे में आज सब जानते हैं ..और नैतिकता का किसी धर्म से कोई सम्बंध नहीं. लेकिन यदि किसी धर्म की गलत व्याख्या या धार्मिक ठेकेदार के उकसाने की वजह से हमारी नैतिकता प्रभावित होकर निम्नतर होती है, तो निश्चित ही हमें सचेत होने की आवश्यकता है, क्योंकि तब हम अन्यों की निगाह में अज़ीब, विषम या विचित्र (odd) घोषित होते हैं.

(२)
मेरे ख़याल से इंसानियत सबसे बड़ा मजहब है और जो भी शख्स़ इस पथ पर चल रहा है यकीनन वो अपने इष्ट को प्रसन्न कर रहा है और खुद भी अंदरूनी तौर पर ख़ुश है.
ईश्वर, खुदा आदि यदि हैं तो यकीनन उनकी दिली तमन्ना यही होगी कि उनके बच्चे नेक राह पर चलें. दुनिया के तमाम मजहबी ग्रन्थ बुनियादी तौर पर इसी के लिए उकसाते हैं, यह अलग बात है कि आज एक बड़ा तबका इसके उलट चल रहा है क्योंकि वह बुरी तरह से स्वार्थी हो गया है.
अब इंसानियत और नेक राह पर चलना मायने नैतिक उसूलों को अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में लागू करना. और 'यूनिवर्सल मोरल वैल्यूज़' से सभी समुदायों के लोग वाकिफ़ हैं क्योंकि सभी के धर्मग्रंथों का निचोड़ अंत में वही निकलता है. विरले ही उसे जीते हैं और निश्चित रूप से वे ही अंततः हमेशा की ज़िन्दगी या मोक्ष के हकदार होंगे!

(३)
एक बहुत अच्छा लेख, अच्छी व्यंगात्मक शैली के साथ 'भूख' पर वास्तव में अति-सूक्ष्म व गहरा मनन. गागर में सागर भरा है आपने. अंत में एस.एम.एस. भी ख़ूब!
प्रगति के सन्दर्भ में मेरे विचार से distance नहीं, बल्कि displacement मायने रखता है और भारत में कम से कम वह नहीं हुआ! भारत ट्रेडमिल पर है! आज भारत में प्रगति की सूजन है मात्र, ठोस कुछ भी नहीं! आपके अनुसार भी तो समय के साथ सब कुछ पतला होता चला जा रहा है!
.
अगले दिन की टिप्पणी- 'मैंने तो यूं ही कहा था, पर बात सच हो गई! आपका displacement भी शून्य हो गया.'
भई वाह! दोनों लेख समान, केवल शीर्षक भिन्न!
आप जहां से चली थीं, वापस ठीक वहीं पर पहुँच गयीं!
पूरी तरह विश्वास हो गया कि वास्तव में भारत ट्रेडमिल पर है!

(४)
सही कहा आपने कि आज हमें ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो परिश्रम से सपने पूरा करना सिखाये.
परन्तु ठोस प्रगति हेतु परिश्रम के साथ एक अन्य चीज का संलग्न होना अत्यावश्यक है- वह है ईमानदारी ...माने नैतिकता. ..नैतिकता के अभाव में भारत में आज सारा परिश्रम क्या पाने के लिए हो रहा है, वह सब जानते हैं.
पूर्वकाल में गुरुओं का यही कार्य हुआ करता था कि वे प्रथमतः राजा (शासन), तत्पश्चात प्रजा जनों को नैतिकता के पथ पर चलने हेतु प्रेरित करते रहें. ..उस समय के गुरुजन स्वार्थ, आडम्बर, लोभ और यश से बिलकुल परे रहते हुए अपना कार्य करते थे और हर किसी को सहज उपलब्ध रहते थे. ...लोक कल्याण ही उनका एकमात्र ध्येय होता था.
परन्तु आज ऐसा संत या गुरु चिराग लेकर ढूंढने पर भी कदाचित न मिलेगा!
इसका सीधा सा अर्थ यह कि राजा व सामान्य प्रजा को नैतिकता के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करने वाले अब नहीं रहे, वे खुद ही भ्रष्ट हो गए. ..तभी तो हर जगह लूट-खसोट मची है!

(५)
आजकल के किशोरों में बढ़ते अवसाद का मूल कारण आज की परिवर्तित जीवन शैली है. वर्तमान जीवनशैली लोगों को एक ऐसी दुनिया में लेकर जा रही है जो कि जीवन की असली सच्चाई से कोसों दूर है. देखा जाए तो प्राकृतिक मानवीय देह और उससे जुड़ी हुई मूलभूत प्राकृतिक आवश्यकताओं में समय के साथ कोई भी प्रकृतिदत्त बदलाव नहीं आया है, परन्तु हम भारतवासी अकारण ही उनमें कृत्रिम परिवर्तन करने की उधेड़बुन में नित लगे रहते हैं और व्यस्त हैं! इस व्यस्तता में हम परस्पर संबंधों की वास्तविक परिभाषा, अर्थ एवं गहराई से भी दूर जाते जा रहे हैं. कहने को हम आगे बढ़ रहे हैं परन्तु वास्तव में हम अधोगामी हो रहे हैं. उदाहरणार्थ- निकट अतीत तक हम मित्रता व मित्र की व्याख्या करने में विशाल, उदार, समझदार एवं गहरे थे, एक निश्चित दायरे में रहते हुए भी एक समयावधि तक हम मित्रता को बड़े अर्थों में लेते थे- बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड जैसी आज वाली परिभाषा न थी, दोस्त बस दोस्त होते थे, चाहे लड़का हो या लड़की; शादी जैसे संबंधों की बात बहुत बाद में आती थी. ..परन्तु आज विपरीत सेक्स से मित्रता होते ही युवा कूदकर तुरंत उसे तथाकथित रूप से गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड मान लेते हैं और उसपर एकाधिकार मानते हुए अपरिपक्व रूप से भावुक हो जाते हैं. जल्दी-जल्दी ब्रेकअप होने और बात-बात पर डिप्रेशन में जाने की यह एक बहुत बड़ी वजह है!

(६)
जब हम परिपक्वता की कुछ सीढ़ियाँ और ऊपर चढ़ जाते हैं तो हमारे लिए पहनावा, खानपान, संस्कृति, यहाँ तक कि विभिन्न धार्मिक क्रियाकलाप तक गौण हो जाते हैं; हम इन सब से ऊपर उठ जाते हैं व अन्य अपेक्षाकृत संकीर्ण लोगों के लिए ऐसा महसूस करते हैं कि वे अभी हमसे निचली कक्षा में हैं शायद इसीलिए वे आज कुछ संकीर्ण हैं, मैं भी तो उसी कक्षा से होते हुए ऊपर उठा हूँ, तो दुराव और परायापन कैसा? और क्यों?
तब मुझे अपने आप में बड़प्पन की अनुभूति होती है (अहंकार की नहीं) और मैं इस कोशिश में रहता हूँ कि अन्यों की अपेक्षा व आग्रह के अनुसार ऐसा कुछ भी करने को तत्पर रहूँ, जो उनकी संस्कृति के अंतर्गत करने का रिवाज हो या जिससे उन्हें अच्छा लगता हो! यकीनन बड़े कद वालों के लिए विभिन्न धार्मिक कृत्य, तौर-तरीके, संस्कृतियाँ आदि जैसी चीजें वाह्य (बाहरी) हैं, ..केवल आन्तरिक पवित्रता ही अहम् (महत्वपूर्ण) है, क्योंकि असली धार्मिकता (righteousness) केवल उसी से प्रकट होती है.
बड़ों के लिए यही बेहतर कि वे छोटों के लिए (समक्ष) छोटे ही बन जायें, क्योंकि इससे छोटों को अच्छा लगता है पर साथ ही उन्हें भी आगे की कक्षाओं में जाने के लिए प्रेरित करते रहें. विज्ञान में भी तो हम ऐसा ही करते हैं- निरंतर परिष्कार (refinement), पर पहले की खोजों पर हँसते नहीं हैं.

(७)
अच्छे अतीत में बहुत अधिक झाँकने से होता कुछ खास नहीं है, बल्कि ख्यालों और सपनों में खो जाने का भय रहता है और इसके अलावा हमारा अहं बढ़ने का खतरा भी रहता है, नया सीखने की वृत्ति कम होती है.
हमारे पुरखे बहुत रईस थे इसमें कोई बड़ी बात नहीं, ..आज हम क्या हैं यह बड़ी बात!
इसलिए विनम्र गुज़ारिश है कि सिर्फ लिखने के लिए मत लिखियेगा.
गुस्ताखी माफ़.

(८)
कुदरत का सिस्टम अनोखा और अचूक. हर घटना-दुर्घटना का कोई तो कारण जरूर, वो बात अलग कि हम कितना समझ पायें! ..और प्रत्येक कारण के मूल में हमारी क्रियाएं! ..और क्रियाओं के मूल में हमारी मानसिकता यानी सोच! ..अब यदि किसी तरह से इस सच्चाई पर हमारा विश्वास जम जाये तो हम सदैव तुरंत लाभ की सोच न रखते हुये दूरगामी परिणामों को भी दिमाग में रखेंगे और सदैव सचेत व साथ ही आश्वस्त रहेंगे कि "प्रत्येक क्रिया के फलस्वरूप एवं तदनुरूप प्रतिक्रिया" के वैज्ञानिक सिद्धांतानुसार ही मैं भी पाऊँगी ही! ..और जिस चीज को हम विज्ञान, तार्किक दृष्टि आदि द्वारा सही पाते हैं उसी के लिये तो अगली पीढी को प्रेरित करेंगे! समझदार लोग भेड़चाल में नहीं खोते हैं, प्रचलित भावना में नहीं बहते हैं, वरन सच्चाई को मानते हैं व उसपर विश्वास कर उस सच्चाई का आगे प्रसार भी करते हैं.

Friday, February 26, 2016

(६६) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ९

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
यह जो पब्लिक है सब जानती है!
सब जानते हैं कि बहुत कुछ गलत है, फिर भी अपनाते हैं!
जब कुछ सही होगा तब भी पहचानेंगे कि कुछ सही हुआ; यह अलग बात कि न मानें!
स्वार्थ व निःस्वार्थ को पहचानना बुद्धिजीवियों को बहुत आता है पर स्वयं की लोकेषणा की बलि देकर सही को स्वीकार करना उन्हें शायद नहीं भाता, तभी तो भारत में सवेरा आने में अभी भी बहुत देर है!

(२)
अंधभक्ति, ढोंग व ढोंगियों से बचना बहुत आवश्यक, परन्तु पड़ोसी को धिक्कारना नहीं है, वरन समझाना है व उन्नत होने के लिए प्रेरित करना है.
इतना क्रोध ठीक नहीं और न ही धिक्कारना सही है.
हम इंसान हैं भगवान् नहीं या सर्वोत्कृष्ट नहीं!
परन्तु असल बात यह है कि हमें आगे को जाना चाहिए और यथार्थ को मानना चाहिए, जो भारत के किसी भी कट्टर पंथ में होता नहीं दीखता, हिन्दू भी आज उसी दायरे में हैं!
हम किसी भी पंथ से हों पर हमें विकसित होना चाहिए और चमत्कार का तिलस्म तोड़कर यथार्थ (विज्ञान) में आना चाहिए, जो हम नहीं कर रहे हैं.
किसी भी उस पुरानी प्रथा को तोड़ने के पक्ष में मैं नहीं जो हमें आज भी विकास की ओर ले जाती हो, पर जो प्रथा हमें बेड़ियों में जकड़कर जड़ कर दे वह टूट ही जाए तो बेहतर!
वेद भी समस्त ज्ञान पाने के पश्चात् स्वयं को (अर्थात् वेदों को) त्यागने की बात कहते हैं! एक कांटे की मदद से पैर में चुभे कांटे को निकालते हैं, फिर दोनों काँटों को पैर (या शरीर) से अलग कर देते हैं! बेकार के (चुभे हुए) कांटे को फेंक देते हैं और मददगार कांटे को सुरक्षित स्थान पर सहेज देते हैं; वह फिर कभी काम आ सकता है!

(३)
आपकी स्वामिभक्ति को सादर नमन. ...परन्तु मुझे अध्यात्म का वह शुद्ध रूप ही पसंद है जोकि अत्यंत सरल व सुगम है, चकाचौंध से रहित है, प्रलोभन से रहित है और सिद्धांत (तत्त्व) से एकाकार कराता है. सिद्धांतनिष्ठ होने की दशा में हम भौतिकता में रहते हुए भी भौतिक तुष्टिकरण से कोसों दूर रहते हैं; मेरे विचार से यही गुण हमें सरल व्यक्तित्व प्रदान करता है और हम वास्तव में एक स्वस्थ जीवन जीते हैं स्वस्थ सोच के साथ. ...तब हमें किसी गुरु या किसी विचारधारा या किसी समुदाय को तुष्ट नहीं करना होता, वरन मात्र अपने आत्मिक स्वरूप के मुताबिक चलकर उसी (पारमात्मिक शक्ति) को तुष्ट करना होता है. इसी को परमानंदावस्था या मोक्षावस्था कहा जा सकता है. सुखद अंत (या आरम्भ) यही है!
किसी भी प्रकार का नकारात्मक विचार कृपया मन में न लायें. आप अपने स्थान पर बिलकुल सही और शायद मैं भी? मार्ग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं परन्तु लक्ष्य शायद समान! और सबसे बड़ी बात यह कि दोनों को अपने 'विश्वास' पर विश्वास है! ..और उससे भी बड़ी बात यह कि दोनों ने सकारात्मक ढंग से एक-दूसरे को समझने का यत्न किया! विरोधाभास होते हुए भी हमें एक-दूसरे के विश्वास की इज्जत करनी चाहिए और वह हमने की! हम इतना भी साध्य कर लें तो मानो हम मानवता की दिशा में एक पायदान ऊपर चढ़ गए! एकएक सीढ़ी ऊपर चढ़ते-चढ़ते हम मंजिल पा ही लेंगे!

(४)
अध्यात्म में एक बात कही जाती है- "जितने प्रकार के व्यक्ति, उतनी ही प्रकार की मानसिक स्थितियां (प्रवृत्तियां), और उतने ही साधना मार्ग"! सघन मनोचिकित्सा में भी एक कुशल मनोचिकित्सक इसी बात का ध्यान रखते हुए रोगी का इलाज करता है. ..एक से लक्षणों वाले रोगियों के लिए भी वह दवा और विशेषकर काउन्सलिंग की अलग-अलग योजना बनाता है. ..ठीक ऐसा ही अध्यात्म-जगत में भी होता है / होना चाहिए. ..एक और उदाहरण- मैं मानता हूँ कि मल्टीविटामिन प्रत्येक के लिए कारगर हो सकती है परन्तु एक सीमा तक! ..यदि रोगी की वास्तविक आवश्यकता को समझकर डॉक्टर उसे कोई विशिष्ट विटामिन ही दे तो शीघ्र, सटीक व पूरा लाभ होता है. खरे गुरु शिष्य की वृत्ति को परखकर उसे उस मार्ग के लिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह शीघ्र व ठोस आध्यात्मिक प्रगति कर सके.
.
ऊंचा उठने के लिए गुरु के अतिरिक्त शिष्य की जिज्ञासा, तड़प, लगन, प्रयास और मेहनत आदि भी कार्य करते हैं- 'एकलव्य' की भांति! गुरु तो एक मार्गदर्शक साइनबोर्ड उपलब्ध कराता है, पर उस बोर्ड के मुताबिक चलना पथिक को ही होता है! ..और एक सचेत व इच्छावान पथिक बिना मार्गदर्शक बोर्ड के भी अपना रास्ता व मंजिल ढूंढ सकता है जब बोर्ड में निर्देश गलत हों!
.
आज सही मार्गदर्शक बोर्ड्स की बहुत कमी, इसलिए उन भटकाव वाले बोर्ड्स में से सही चुनना / ढूंढना अत्यंत दुष्कर; ..तो फिर व्यक्ति अपनी मदद स्वयं ही क्यों न करे? क्यों विज्ञान से इस बारे में मदद न ले? ..मैंने भी ली है और तब ऐसे लेख लिखने का साहस किया है! परन्तु मैंने कभी भी योग्य मार्गदर्शक बोर्ड होने से इनकार नहीं किया है, बस यह कहा है कि वे अत्यंत अल्प हैं व उन्हें पाना अत्यंत दुष्कर! ..और उनके सही होने की पहचान यही है कि उसपर चल कर स्वयं से कोरी भावना रहित 'सुगंध' आए! आपके साथ यदि ऐसा है तो अवश्य ही आपकी साधना सफल हुई.

(५)
मैंने आपके बताए लिंक से GSSY की साईट को देखा. क्षमा चाहता हूँ मुझे General Benefits of GSSY ही समझ में नहीं आए! समझ में न आने से आशय है कि मुझे उन benefits में से एक भी ऐसा नहीं लगा जो हमारे मानसिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊपर उठा सके यानी हमारी सोच को भीतर से परिष्कृत कर सके. ..दुआ रूपी दवा की एक रहस्यमय दुकान की भांति लगा सब कुछ, जिनसे भौतिक जगत से सम्बंधित कष्ट दूर होने की संभावनाएं हैं परन्तु नैतिक व आध्यात्मिक उत्थान की benefits में कहीं चर्चा मात्र तक नहीं है, क्योंकि एक आम आदमी को उसकी ज़रूरत ही नहीं या ज़रूरत सबसे बाद में, ऐसा समझा है इस संस्था ने!
..जबकि मेरे अनुसार व्यक्ति की आन्तरिक (वैचारिक) शुद्धता ही अध्यात्म में सर्वोच्च स्थान रखती है. यदि वह हो जाए तो सब सध जाएगा, जीवन सफल हो जाएगा और अपने आप से (खुद से) अच्छी अनुभूति होगी, गर्व होगा! ..आखिर कब हम बाहर से अन्दर की यात्रा करेंगे? GSSY भी हमें वाह्य स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रलोभन ही देता है, आत्मिक गुणों का वहां कोई स्थान नहीं! ..और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि वहां निरर्थक रहस्य एवं व्यक्ति पूजा को प्रधानता है, जबकि असली अध्यात्म रहस्यों पर से पर्दा हटाता है, व्यक्ति-निष्ठा का विरोध करता है, लोकेषणा का विरोध करता है, हमें सरल, सत्यवादी व न्यायपूर्ण बनाता है! क्या GSSY इसमें से कुछ भी करता है? यदि करता है तो कैसे? कृपया स्पष्ट रूप से बताएं.

(६)
आपने कुछ अन्यथा ले लिया बात को! ..एक ही तराजू से तौलने का कोई प्रश्न ही नहीं. ..वर्तमान सन्दर्भ में मैंने एक जनरल बात कही; वैसे अपवाद हैं, अच्छे गुरु भी हैं लेकिन बहुत कम! ..वर्तमान स्थिति से वे भी बहुत दुखी / खिन्न हैं; और ऐसे गुरु अपना 'प्रचार' नहीं करते वरन 'धर्म' (righteousness) का 'प्रसार' करते हैं. चिराग लेकर उन्हें ढूंढना पड़ेगा! ..वे मंच से नहीं वरन नेपथ्य से कार्य करते हैं बिना किसी लोकेषणा के लालच से! ..और इनकी बताई साधना से अवश्य ही आध्यात्मिक प्रगति होती है.

(७)
एक बात कहूं पते की! ..कि आपको यदि प्राकृतिक या मानवीय सिद्धांत समझ में आते हैं तो समस्त निष्ठा उन्हीं के प्रति कर लें, सब कुछ प्राप्त हो जाएगा बिलकुल सही पद्धति से!
तब आपको व्यक्ति (गुरु) निष्ठ होने की आवश्यकता नहीं, किसी संस्थानिष्ठ होने की आवश्यकता नहीं और ईश्वरनिष्ठ होने की भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि आप असल सिद्धांतनिष्ठ हैं!
आप राजा पर विश्वास करें न करें, राजा के आगे शीश झुकाएं न झुकाएं; परन्तु यदि आप उसके नियमों, सिद्धांतों या कानूनों को मानते हैं तो एक अच्छे राजा के लिए यही बहुत है! गारंटी है कि आप सुख से रहेंगे.

Tuesday, January 19, 2016

(६५) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ८

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
आपने कहा- "वे अपने माता पिता का दुःख दर्द तो समझ सकती हैं पर सास ससुर का क्यों नहीं शायद इसलिए वे कभी २४ घंटे सास ससुर के पास हैं और मायके कभी कभी आती हैं इसलिए उन्हें अपने माता पिता का दुःख तो नजर आ जाता है पर सास ससुर का नहीं ?"
..मेरे विचार से वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि विवाह से पहले बेटी २४ घंटे अपने माता-पिता के साथ वर्षों तक रही होती है, उनके प्रति उसका स्नेह बचपन से बना होता है जबकि सास-ससुर के साथ उसकी भेंट और रहना उसके लिए एक नई शुरुआत होती है. इसमें बहुत सारी समझदारी, परिपक्वता और मानवीय संवेदनाओं को समझने की आवश्यकता होती है- माता-पिता, सास-ससुर, पति, बहू इन सब को. ..अशुभ तब होता है जब इनमें से कोई एक भी परस्पर रिश्तों की गहराई को समझने-समझाने का, त्याग का, परस्पर स्नेह का, एक-दूसरे की परवाह का, मानवीयता के मान रखने का गंभीर प्रयत्न नहीं करता. उपरोक्त रिश्तों में तीन स्त्रियाँ हैं और तीन पुरुष. इनमें से कोई भी आग लगा सकता है और कोई भी आग लगने के समस्त कारणों को समाप्त कर सकता है, यदि वह ठान ले तो..! ..और क्या ही अच्छा हो कि इसकी शिक्षा हमें (लड़का-लड़की दोनों को) बचपन से ही सुसंस्कार के रूप में मिले. ..सचेत रहें कि बचपन में दिए गए या मिले अच्छे या बुरे संस्कार सुकोमल मनों पर शीघ्रता से और दीर्घकाल के लिए अंकित हो जाते हैं, ..और हमारी वृत्ति वैसी ही बन जाती है, और वह वृत्ति हमारे प्रत्येक क्रियाकलाप में प्रतिबिंबित होती है.

(२)
उपरोक्त कुछएक अपवादों को छोड़ दें तो हमारे उत्तरप्रदेश व अन्य कुछ हिन्दीभाषी प्रदेशों के अधिकांश लोग बचपन से रिटायरमेंट तक का जीवन यंत्रवत व औपचारिक रूप से बिताते हैं, लगभग मूल्य-विहीन! ..तो बुढ़ापे में शारीरिक और मानसिक दुर्बलताओं के बीच क्या खाक नई शुरुआत कर पाएंगे वे ? अधिकांश को जवानी में जब अच्छी व सकारात्मक सोच अपनाने को कहो तो कहते हैं अभी कमा-धमा लें, यह सब रिटायरमेंट के बाद देखेंगे! ..और बाद में कुछ भी नया और खासतौर पर वह जो आपकी वृत्ति के विपरीत हो, शुरू करना बहुत कठिन होता है. ..पुनः यह ध्यान रहे कि वृत्ति नींव बहुधा बचपन में ही पड़ती है.

(३)
आपने ठीक कहा. निश्चित ही पुरुषों में भी भावनाएं व कोमलताएं कूट-कूट कर भरी होती हैं, ..परन्तु बीज रूप में ! दुर्भाग्य कि हमारे मौजूदा समाज में इन बीजों को पोषक वातावरण देने की परंपरा नहीं है, जिससे इनका अंकुरण संभव हो सके. ..यही कारण है कि 'हमारे' समाज के अधिसंख्य पुरुष 'घातक मानसिकता' के होते / दीखते हैं. ..अब तो स्त्रियाँ भी इसी राह पर चल पड़ी हैं, उनमें भी साइकोसोमेटिक रोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है!

(४)
आपका कहना है- "अभिजातवर्ग ही आगे क्यों आये पहल करने?" ..'क्यों?' ..यह शब्द बहुत सरल सा है किसी भी चर्चा को आगे बढ़ाने हेतु!
यदि आप अपने परिवार की एक बड़ी, समझदार, जिम्मेदार एवं साथ ही सामर्थ्यशाली सदस्य हैं और आपको परिवार की फ़िक्र है तो फिर निश्चित ही परिवार की 'सर्वांगीण' उन्नति हेतु आप आगे आयेंगी ही. किसी भी टीम या जहाज का कप्तान भी तो यही करता है. वह आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेता है और शेष टीम को लीड करता है उसे सर्वोच्चता या लक्ष्य तक तक पहुँचाने के लिए. वह समझता है कि उसके श्रम, मेहनत और किस्मत के गठजोड़ से उसे यह जिम्मेदारी मिल पाई है सो उसे लगनपूर्वक निभाता है जिससे कि उसके पद और उसकी जिम्मेदारी की सार्थकता सिद्ध हो सके. गरिमा के अनुकूल कार्य संपादन से उसे आन्तरिक सुखद अनुभूति होती है और दुनिया भी उसे चिरकाल तक याद रखती है. ..यदि उसके कोई इष्ट भगवान् हों तो अवश्य ही वह भी उसके इन्हीं कृत्यों से वास्तव में प्रसन्न होते हैं! संक्षेप में प्रथमतः इन्हीं बातों पर गौर करके अभिजात वर्ग अपना कर्तव्य निबाहने को उद्यत हो सकता है. ..वैसे इसके बाद भी अनेकों "क्यों?" की गुंजाइश रहती है और रहेगी, यदि हम प्रत्येक बात में अबोध बने रहते हैं!

(५)
आपने बिलकुल सही कहा कि "मानवीय अधिकार को रुढिवादिता और अंध श्रध्दा के नाम पर किसी चीज़ को किसी पर थोपे जाने से रोकने तक नहीं सीमित किया जाना चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को (एक हद तक) उसकी परंपरा संस्कृति और और धर्म का पालन करने का भी पूरा अधिकार होता है."
...परन्तु हर किसी व्यक्ति को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि क्या वह दूसरे की सभ्यता, संस्कृति व धार्मिक विश्वास का आदर भी करता है या नहीं? ...और वह उसके घर जाकर उसके माहौल के हिसाब से रहने का प्रयास भी करता है या नहीं? ...यदि हम दूसरे की सभ्यता को कुछ नहीं समझते, उसको सदैव तुच्छ साबित करने की कोशिश में रहते हैं, और अपने से जुडी हर चीज को ही सर्वोत्तम मानते हैं तो हम अन्धश्रद्ध कट्टर कहलाते हैं, ..और तब परस्पर सहिष्णुता को कमजोर करने का कारण बनते हैं!
मेरे हिसाब से कोई भी प्राचीन धर्म वहां के लोगों की उस समय की ज़रूरत के हिसाब से लिखे नीतिवचन हैं. प्राचीनकाल में प्रत्येक स्थान के लोगों की परिस्थितियों में भिन्नताएं थीं, सो प्रत्येक समुदाय के नीतिवचनों में शिक्षाएं, वरीयताएं भिन्न थीं.
पहले साधारण मानव अति सीमित था- शायद केवल अपने कबीले तक, ..अब सम्पूर्ण विश्व के लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आ चुके हैं. ...धार्मिक विश्वासों के रूप में अपनी-अपनी प्राचीन धरोहरें भी सबके पास हैं, ...परन्तु अधिकांश अभी तक बेड़ियों में जकड़े हैं, अपने ज्ञान को विस्तार ही नहीं देना चाहते, ..कुछ की पूर्वकाल में रही 'देह उघाड़ने' की संस्कृति भी बढ़ रही है और कुछ की 'पर्दे' की संस्कृति भी! प्रत्येक जन कुंए का मेंढक बना बैठा है. अब वर्तमान में हमारी वास्तविक आवश्यकता क्या है जो हमें असल सुकून दे पाए, इस पर किसी का ध्यान नहीं!
..शायद नीतिवचनों को समयानुसार फिर से लिखे जाने की ज़रूरत है!

(६)
कमेंट्स के रूप में चर्चा बहुत अच्छी हो रही है. ...मेरे विचार से लोगों की खान-पान पद्धति पर जलवायु और कार्य की परिस्थितियों का बहुत गहरा असर पड़ता है। कुछ गर्म परन्तु तटीय क्षेत्रों में, मरुस्थलों में , बंजर भूभागों में व पर्वतीय क्षेत्रों आदि में खेती बहुत दुरूह या असंभव होती है, अतः वहां के निवासियों को अनाज, दालें, खाद्य वनस्पतियाँ सरलता से उपलब्ध नहीं होतीं और वे अधिकतर सामिष भोजन पर ही निर्भर रहते हैं। कार्य की परिस्थितियों, जैसे- जो सात्त्विक माहौल में रहते हैं, ब्राह्मण वर्ण का कार्य करते हैं, धर्म-शिक्षण या विद्यादान आदि की सेवा करते हैं, उन्हें शारीरिक श्रम अधिक नहीं करना पड़ता, अतः वे सामान्य निरामिष भोजन पर आश्रित रह अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। सामिष भोजन व तम्बाकू, मद्य आदि रज-तमात्मक हैं। संभवतः इसीलिए संस्कृति व धर्मानुसार भी ब्राह्मण वर्ण में सामिष भोजन व धूम्र / मद्यपान आदि वर्जित माना गया है! पर जिन लोगों को लगातार रज और तम की परिस्थितियों में रहकर कठोर श्रम करना पड़ता है, उन्हें रज व तम के प्रभाव से जूझने हेतु रज-तमात्मक भोजन की आवश्यकता पड़ती है। पुरानी कहावत है - लोहे को लोहा ही काट सकता है! बहुत अधिक शारीरिक श्रम एवं कठोर व विषम कार्य परिस्थितियों के बीच कार्य करने वाले व्यक्तियों को तुंरत व अधिक बल-उर्जा आदि हेतु सामिष भोजन व अन्य मद्य, तम्बाकू जैसे उत्तेजक पदार्थों का सीमित सेवन करना कभी-कभी अपरिहार्य हो जाता है। पर जागरूक, सुसंस्कृत व सचेत रहने वाले इन पदार्थों के 'अनिष्टकारी पहलुओं' से यथासंभव बचे रहते हैं। इन परिस्थितियों में कार्य करने वालों के उदाहरण के रूप में हम मुख्यतः सैनिकों व अन्य क्षात्र-वर्ग तथा कुछ हद तक वैश्य व शूद्र-वर्ग को भी ले सकते हैं। परन्तु गौर करें कि भारत में रज-तमात्मक परिस्थितियों में कार्य करने वालों में मुख्यतः या केवल भारतीय सेना के लोग ही स्थिति-अनुरूप आवश्यक रज-तमात्मक वस्तुओं का नियमित सेवन करने के बावजूद 'सुसभ्य व जागरूक' हैं; अन्य क्षात्र वर्ग, वैश्य वर्ग या शूद्र वर्ग में सेवन के मामले में 'अनुशासनहीनता व अति' दिखाई पड़ती है। संभवतः यह हमारी संस्कृति की ही कमी है या हम परिपक्व नहीं हैं।

Sunday, January 10, 2016

(६४) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ७

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
बहुत त्रासद है कि भारत के अधिकांश लोग दुकान की तड़क-भड़क व चकाचौंध से प्रभावित हो जाते हैं परन्तु सामान की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देते हैं! घर की मुर्गी दाल बराबर ...और बाहर घुनी दाल चटखारे लेकर खाते हैं! मोबाइल फोन, इन्टरनेट एवं अन्य तमाम गैजेट्स को पागलों समान ख़ूब अनापशनाप इस्तेमाल करते हैं परन्तु उनके मुख्य लाभ से लगभग वंचित रहते हैं! हम अधिसंख्य वर्तमान भारतवासी ऊपर-ऊपर खूब तैरते हैं लेकिन तलहटी में जाकर रत्न ढूंढने से कतराते हैं! ...तो हमारा यही दृष्टिकोण प्रत्येक स्थान पर प्रतिबिंबित होता है, ..भगवान् के प्रति भी, आस्था के प्रति भी, धार्मिकता के प्रति भी! वास्तव में हम उथले और उन्मादी हैं, इसमें कोई भी शक नहीं!

(२)
बहुत आवश्यक कि मात्र शाब्दिक स्तर पर अधिक समय न रहकर भीतर की यात्रा की जाए. स्वयं को पूर्णतया साधने एवं अन्य सभी के प्रति असली सहिष्णुता रखने का ज्ञान वहीं पर मिलता है. ..सभी वह साध्य करने में सक्षम! मैं अन्यों से भिन्न नहीं और न ही अन्य मेरे से! सब सीढ़ी के भिन्न-भिन्न पायदानों पर हैं बस! ..कुछ मुझसे ऊपर और कुछ नीचे! बस वक्त की और निश्चय करने की बात है, कोई भी कभी भी ऊपर आ सकता है. ..शायद इसी को साधना कहते हैं! कूप माण्डुक्य नहीं बल्कि दृढ़ निश्चय, नम्रता, निरंतरता, धैर्य, अनुशासन, समर्पण, खुला दिमाग, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' स्तरीय विशाल हृदयता आदि इसके मूल तत्व हैं.

(३)
यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे 
तबे एकला चलो रे। .....

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

यदि कोई भी ना बोले ओरे ओ रे ओ अभागे कोई भी ना बोले
यदि सभी मुख मोड़ रहे सब डरा करे
तब डरे बिना ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे
ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

यदि लौट सब चले ओरे ओ रे ओ अभागे लौट सब चले
यदि रात गहरी चलती कोई गौर ना करे
तब पथ के कांटे ओ तू लहू लोहित चरण तल चल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

यदि दिया ना जले ओरे ओ रे ओ अभागे दिया ना जले
यदि बदरी आंधी रात में द्वार बंद सब करे
तब वज्र शिखा से तू ह्रदय पंजर जला और जल अकेला रे
ओ तू हृदय पंजर चला और जल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

Source - http://en.wikipedia.org/wiki/Ekla_Chalo_Re

(४)
हकीकत में करना हो कुछ संभव तो,
कोशिश से माहौल बनाना पड़ता है,
मेहनत से माहौल बदलना पड़ता है,
इन सब के लिए थोड़ा नहीं बहुत बदलना पड़ता है खुद को!
निरुत्तर व विवश कर देता है यह दूसरे को निश्चित ही,
कि वो भी कुछ नहीं, बहुत नहीं, संपूर्णतः बदल जाए!
और .....ऐसा संभव है, ऐसा होता है, मैंने देखा है!

(५)
फटाफट क्रिकेट और दीर्घकालीन राजनीति, दोनों में ही भारतीय कप्तानों की रणनीति से सम्बंधित कुछ भी स्पष्ट अंदाजा लगाना हमारे लिए असंभव सा है, फिर भी हम भावुक भारतीय दर्शक वह करते रहते हैं, और बारम्बार खुश या मायूस होते रहते हैं.
कयास लगाना हम भारतीयों की पुरानी आदत है, खासतौर पर मीडियाकर्मियों की! पर अब चूँकि खेल के ढंग बदल चुके हैं तो हमारे कयासों में भी परिपक्वता अपेक्षित है! खासतौर पर तब तो अवश्य, जब हमें सही मायनों में विकास की सीढ़ियाँ चढ़ना हो; ..हमें कुछ पुरानी बेड़ियाँ तोड़कर आशावादी, सकारात्मक एवं रचनात्मक होना होगा, इसका कोई पर्याय नहीं! मात्र टाइम-पास के लिए बेतरतीब कयास लगाना ठीक नहीं और न ही शब्दों के लच्छे बनाना!

(६)
भगवान् हैं, ज़रूर हैं; उन्हें कुदरत के रूप में भी जाना जाता है; इस कुदरत ने हमें बहुत कुछ निःशुल्क उपलब्ध कराया है, उसी के बल पर हम फलते-फूलते व खुश रहते हैं, ..और इस कुदरत के कुछ नियम हैं; कुछ हम पहले से जानते थे और कुछ पुनः विज्ञान ने भी हमको सिखाये; हम उनको श्रद्धा व आस्था से मानते हुए शिरोधार्य करते हैं तो कुदरत प्रसन्न और हम पर आशीषों की बरसात, अन्यथा...? शायद आवश्यकता है कि हम अपनी आस्था, श्रद्धा व कर्मकांडों-अनुष्ठानों को पुनः समझने की कोशिश करें और उन्हें ईश्वर की अपेक्षा के अनुसार परिष्कृत करें. चूँकि अब हम बौद्धिक व मानसिक रूप से अधिक परिष्कृत, अपडेटेड या अपग्रेडेड हैं तो स्वाभाविक ही है कि ईश्वर भी अब हमसे अधिक प्रौढ़ दृष्टिकोण की मांग करते हैं. ..प्राइमरी कक्षा के बच्चे से अध्यापक अधिक उम्मीद नहीं करता, परन्तु कक्षा दर कक्षा आगे बढ़ते जाने पर अध्यापक की अपेक्षाएं भी क्रमशः बढ़ती हैं और यह स्वाभाविक है.

(७)
बहुत से लोग आज यह मांग करते हैं कि सभ्य एवं ईमानदार लोगों को राजनीति में आना आवश्यक, परन्तु राजनीति में आने के लिए जितने पैसे व दंदफंद की ज़रूरत, क्या वह एक सभ्य, ईमानदार एवं सुपात्र नागरिक के पास होना संभव?
कुपात्र आज संगठित हैं और उन्होंने प्रत्येक वह मार्ग अवरुद्ध कर रखा है जिनसे कि होकर एक वास्तव में योग्य व्यक्ति आगे आ सकता है. महत्वपूर्ण स्तम्भ मीडिया में भी आज कुपात्रों का ही वर्चस्व है. समाज की ऊपर की सतह में सर्वत्र पैसा, लालच और दादागिरी आज सिर चढ़कर बोल रहे हैं, आम आदमी बस किसी तरह दिन काट रहा है, वैसे ही बहुत परेशान है कुछ बोलेगा तो फिर तो परेशानियों की बाढ़ आ जाएगी, सो चुप है, ..कुछ अच्छे ढंग से जीवनयापन की चाह में जाने-अनजाने अब वह भी अधिकांशतः ऊपरी भ्रष्ट समाज का अनुगमन करने लग गया है. यथा राजा तथा प्रजा! ..वास्तव में कुछ बदलना है तो वह शक्तिशाली व सामर्थ्यवान के लिए अधिक सरल है. वह बदलेगा तो उसके अनुयायी भी बदलेंगे अवश्य, ...पर कहीं ऐसा देखा है कभी कि शिष्य के बदलने से गुरु बदल जाए? वैसे अपवाद कहीं भी कभी भी संभव हैं परन्तु यह उलट पद्धति है. ...यह निश्चित है कि ठोस एवं आमूलचूल परिवर्तनों के लिए प्रथमतः समाज की ऊपरी सतह यानी अभिजात-वर्ग में चैतन्य आना / लाना परमावश्यक है.

Friday, January 1, 2016

(६३) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ६

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
पूरा दोष आयातित संस्कृति का नहीं, बल्कि दोष हमारे विवेक का है कि हम उस संस्कृति का केवल आधा-अधूरा वह ही अंश ग्रहण करते हैं जो हानिकारक है; सकारात्मक पक्ष को हम प्रायः अनदेखा करते हैं. विदेशी संस्कृति की भोग, विलास, आराम से जुडी हुई चीजें ही हमें भाती हैं, जो हमें अकर्मण्य, भ्रष्ट या व्यर्थ में ही व्यस्त करती हैं यानी मानसिकता को दूषित करती हैं; जबकि उसी आयातित संस्कृति के कर्म, कर्तव्य, अनुशासन, जिम्मेदारी, शिष्टाचार आदि से जुड़े सार्थक पहलुओं को हम अनदेखा ही कर देते हैं.
यदि हमें वास्तव में आगे बढ़ना है तो किसी भी विकसित सभ्यता के सकारात्मक पक्ष को आंकना आना चाहिए. किसी भी ठोस विकास के पीछे नकारात्मकता से अधिक अंश में सकारात्मकता होती है. सकारात्मकता के अधिक होने पर ही चरित्र व राष्ट्र का विकास संभव होता है. ...और वह हम भारतवासियों को दिखती नहीं, यही आज की त्रासदी है!

(२)
आमतौर पर बचपन में हमारा ६० प्रतिशत से अधिक समय घर पर पारिवारिक सदस्यों के बीच ही गुजरता है और हमें 'अच्छा या बुरा' मानसिक पोषण वहीँ से अधिक मात्रा में मिलता है, तदनुरूप व्यक्तित्व की बुनियाद बनती है. ..और यदि उसमें प्रदूषण अधिक हुआ तो आने वाली पीढ़ी की, वर्तमान से भी अधिक भ्रष्ट होने की प्रबल सम्भावना बनती है. ..हमारे यहाँ उत्तरोत्तर ऐसा ही हो रहा है. हमें सचेत होना होगा और कुछ ठोस कदम उठाना भी होगा.

(३)
वैचारिक मतभेद तो होगा ही यदि हम मन में पहले से कोई धारणा बनाकर चलते हैं, ..और प्रत्येक सामान्य व्यक्ति के मन में कोई न कोई पूर्वस्थापित धारणा होती अवश्य है- कम-ज्यादा मात्रा में हो सकती है. ..कुछ लेखों को पढ़ने का मजा तभी है जब हम उन धारणाओं को कुछ समय के लिए एक किनारे रखें, और कुछ नई अनुभूति महसूस करें; क्योंकि ऐसे लेख मात्र कुछ लिखने के लिए ही नहीं लिखे जाते, वरन वे अनुभवों और अनुभूतियों पर आधारित होते हैं.

(४)
आपने पीछे छुपे बीज या मंतव्य को खूब पहचाना. एक निर्विवादित ग्लोबल धर्म की संभावनाएं टटोलना और स्मूथली उस तक पहुंचना, यही लक्ष्य है. पार्शियल होने का कोई प्रश्न ही नहीं, पर अभियान की कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ती है, और इस कारण प्रारंभ में वह (अभियान) कुछ पार्शियल प्रतीत हो सकता है. परन्तु विश्वास दिलाता हूँ कि उत्तरोत्तर सार्वभौमिक नैतिक गुणों की छाया में इसमें प्रासंगिक विज्ञान का दखल भी बढ़ेगा. चूँकि इरादे नेक हैं, अतः कुछ सार्थक होने की आशा बलवती है. अंकुरण कब होगा यह तो मालुम नहीं, परन्तु होगा तो अवश्य यह दृढ़ विश्वास.

(५)
आपकी बातों से या उनके मंतव्य से मैं सहमत नहीं. यदि कोई व्यक्ति मात्र 'दुरूह कर्मकाण्ड' कर देश का प्रधानमंत्री बन सकता है तो देश में ऐसे-ऐसे सिरफिरे बैठे हैं जो इस अभीष्ट की प्राप्ति हेतु अपना, आपका या मेरा शीश भी काटने में तनिक भी न हिचकेंगे, यदि उस कर्मकाण्ड की अधिकतम मांग यह भी है तो!
यदि ऐसा होना संभव होता तो पता नहीं इस देश का (में) क्या होता?
मेरे विचार से 'कर्मकांड' वह धार्मिक कृत्य है जो हमें कतिपय परिस्थितियों में योग्य कर्म हेतु प्रेरणा, साहस व संकल्प देता है. ..और हम निर्भय होकर प्रयास (कर्म) करते हैं और एक दिन अभीष्ट की प्राप्ति में सफल होते हैं.
यानी अभीष्ट की प्राप्ति हेतु कदाचित् प्रेरणा या आत्मबल तो कर्मकाण्ड प्रदान कर सकता है, परन्तु उसके पश्चात् "योग्य कर्म" (योग्य प्रयास, मेहनत, क्रिया) करना हमारे लिए अत्यावश्यक होता है.
..और यदि हम "कर्मकाण्ड" जैसे अवलंब के बिना ही "योग्य कर्म" के लिए प्रेरित हो सकें तो कितना अच्छा! ...और दिखावटी कर्मकांडों से तो हमें बहुत दूरी बनाने की आवश्यकता!
कोई भी बैसाखी के सहारे नहीं चलना चाहता, तो फिर हम क्यों चलें? बच्चे को भी १-२ वर्ष की अवस्था तक सहारा दिया जाता है, फिर वह स्वयं चल सकता है! ..और यदि समर्थता आ जाने के बाद भी वह सहारा लेकर ही चलता है तो लोग उसपर हँसते हैं!
हम बलवान हैं, हमें झूठे सहारों की आवश्यकता नहीं! यह वाक्य अहंकार नहीं वरन गर्व का सूचक है!

(६)
भावना व निष्ठा की बात खूब कही आपने! मैं सहमत हूँ आपसे.
प्रत्येक स्थान पर सुधार होने के बजाय दोष घुस आने की बात भी सही है आपकी.
हर विकसित देश आज इसीलिए विकसित है क्योंकि सुधार, संकल्प, भावना व निष्ठा से ही असली विकास होता है और वे वहां होंगे अवश्य, यह अलग बात कि हम न मानें!

(७)
क्षमा चाहता हूँ एक धृष्टता के लिए, कि समय काटने के लिए कोरे तर्क-वितर्क करना मेरी फितरत में नहीं!
हाँ, सार्थक बिंदु तक पहुँचने हेतु जितने भी तर्क-वितर्क हों, उतना ही अच्छा.

(८)
"यदि कुछ लोग कहते हैं कि वे अपेक्षाकृत सूक्ष्मतर आध्यात्मिक जगत में पहुंच चुके हैं, तो मैं बेहिचक उनसे कहूँगा कि वे अब कर्मकाण्डों का परित्याग कर दें, परन्तु उन कर्मकाण्डों के प्रति हीन भावना न रखें"
जी बिलकुल, क्योंकि हम सभी एक-एक कक्षा कर ऊपर की ओर बढ़ते हैं! और पिछली कक्षाओं के अध्यापकों और विद्यार्थियों के लिए अच्छी भावना रखते हैं. अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने के बाद भी उसी कक्षा में रुके रहने की जिद करना नादानी या बेवकूफी कही जाती है! हाँ, शीर्ष पर कुछ देर रुकने का मन अवश्य करता है और रुकना भी चाहिए; पर नीचे वालों के लिए दिल में आदर लिए.

Tuesday, December 29, 2015

(६२) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ५

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
मेरा विचार है कि किसी भी बिगड़ी हुई सामाजिक आदत के ठीक होने की शुरुआत उस समाज के ऊपरी तबके, अर्थात् अभिजात वर्ग से होती है. इसका सबसे बड़ा कारण यह कि अभिजातवर्ग आम लोगों का नेतृत्व कर रहा होता है और शेष बहुसंख्य मात्र अनुयायी होते हैं. अभिजात वर्ग माने- ..नेता, अभिनेता, बड़े अधिकारी, धर्म अथवा सांप्रदायिक गुरु, प्रसिद्ध खिलाड़ी, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, समाजसेवी यानी एक शब्द में और व्यक्त कर सकते हैं इनको कि 'समाज की क्रीमी लेयर'. ..अब इन सबमें भी जितने ऊपर से प्रथमतः शुरुआत हो सके वह बेहतर! अधिकांशतः हर व्यक्ति अपने से ऊपर वाले को टकटकी लगाकर देखता है और उसका अनुकरण व अनुसरण करता है! दो टूक यह कि निश्चित रूप से बदलाव की बड़ी जिम्मेदारी ऊपर के उन लोगों की ही बनती है- जिनके पास सत्ता है, अधिकार हैं, संसाधन हैं, नाम है, रसूख है, मान है व अनुयायी हैं, ..और अखबार व मीडिया के सर्वेसर्वा (आका, मालिक, संपादक) भी इन लोगों में शामिल हैं ही. ..जब ये भी भ्रष्ट हो गए हों तो इनसे ऊपर की सत्ताओं को प्रभावशाली कदम उठाना होगा. .. और यदि वे भी भ्रष्ट रहती हैं एक लम्बे समय तक, तो आम जनता में से ही कोई नेता निकलेगा जो अगुवाई करेगा उस क्रांति की जिनसे स्थितियां बदली जा सकें! ..शायद किसी आपातकाल में कोई सेनाधिकारी ही कोई बड़ा कदम उठा ले. ..इतने विकल्पों के बाद भी यदि परिस्थितियां जस की तस रहती हैं तो फिर हमारा राष्ट्र और नीचे ही जाएगा शनैः-शनैः! ..और तब अमेरिका जैसा कोई उन्नत राष्ट्र भारत की मामले में भी उसी प्रकार हस्तक्षेप करेगा जैसे वह अभी कुछ देशों के हालात ठीक करने के लिए ले रहा है. इसे आप सही कहें या गलत, परन्तु सत्य तो यही है कि कहीं भी हो रहा कोई भी नुकसान बड़े अर्थों में सम्पूर्ण विश्व का ही नुकसान है, और उस नुकसान को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए.

(२)
उनके सितम बहुत हो चुके और हमारे उपदेश भी!
वो आज भी भ्रष्ट तो कमी शायद हमारे उपदेशों में!
कहीं वो उपदेश कोरे तो नहीं, मात्र शब्दों से खिलवाड़ तो नहीं?
कहीं यह सब यह सब पैसे की भूख या यश की प्यास तो नहीं?
पंडित हो या मौलवी, नेता हो या अभिनेता, या फिर पत्रकार,
बोलने में सब बहुत तेज पर भीतर से बेकार;
तभी तो कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है हाहाकार!

(३)
...बस शब्दों में खो न जाना, भावना में बह न जाना;
ध्येय न हो मात्र धन की भूख या यश की प्यास बुझाने का;
बस अपने लिए लिखना या फिर समाज के उत्थान के लिए,
साफ़ मन से, अंतर्मुख होकर, जैसे हो किसी मैडिटेशन में!

(४)
उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण (Liberalization, Privatization, Globalization) के ऊपर पूरा ठीकरा फोड़ना ठीक नहीं, …समस्या के मूल में तो हमारा अपना ही दोष है कि हम ही अपना होश न संभाल सके.
एक फौजी के हाथ में बन्दूक होना एक बात है तथा एक बच्चे को बन्दूक थमाना दूसरी बात, ..बहुत अंतर है दोनों में! ..एक के पास जोश है मगर होश के साथ, और दूसरे के पास मात्र जोश ही है! दो टूक बात तो यही है कि हमारे पथप्रदर्शकों ने हमें हथियार के साथ संलग्न आवश्यक परिपक्वता नहीं दी! ..और असली परिपक्वता का वास हमारी स्वस्थ मानसिकता व दृष्टिकोण में है; …बहुत त्रासद है कि आज यही स्वस्थता नदारद है.

(५)
विडम्बना ही है कि हम आज जीवन के हर क्षेत्र में ऊँचाइयों को छूना चाहते हैं परन्तु मानसिकता या सोच को ऊपर नहीं उठाते! भले ही हमारे पास विभिन्न सांसारिक वैभव व विद्यता प्रचुर मात्रा में हों, तिसपर भी हम बिलकुल खोखले हैं यदि हमारी मानसिकता क्षुद्र ही रह जाती है!

(६)
अवश्य, ..वह सुबह आएगी जब 'पुत्रीवती भव' का आशीर्वाद भी लोग देंगे. ...लोगों के मन में, सोच में, दिल में, बदलाव की हिलोरें उठती हैं जब बात उनके ऊपर आती है; परन्तु वह कड़वा समय जब निकल जाता है तो मानसिकता पुनः वहीं पर आ जाती है, जहां थी! क्योंकि प्रचलित धारा के विरुद्ध हम कुछ भी सोचने और करने से कतराते हैं! आखिर कब तक हम रूढ़ मानसिकता के अनुयायी बने रहेंगे और अपने भीतर की निश्छल ध्वनि को अनसुना करते रहेंगे??

(७)
हिन्दू एवं हिंदुत्व को समझे बिना उसके प्रति क्षुद्र दृष्टिकोण एवं अन्य विचारधाराओं के प्रति अत्यधिक लेकिन कृत्रिम सहिष्णुता, यह आज के तथाकथित नेताओं और बुद्धिजीवियों की वर्तमान क्षुद्र मानसिकता का द्योतक है. …वास्तव में वे किसी के सगे नहीं हैं, बस अवसरवादी हैं. ..या अपनी खोखली विद्यता का गुमान है उन्हें; ...तो कुएं के मेंढक ही हुए वे!
इस समय हर किसी को दलगत तथा व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठने-उठाने की आवश्यकता है, यह तभी संभव होगा जब हम अपनी मानसिकता या सोच को सही मायनों में ऊपर उठायेंगे, और तब ही हम वास्तविक विकास की ओर बढ़ पायेंगे, अन्यथा और नीचे ही जायेंगे.

Thursday, December 24, 2015

(६१) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ४

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
आपका लेख आदिकाल से आजतक की समयावधि के दौरान सेक्स के प्रति पशुओं से भी निम्नतर भारतीय मानसिकता को दिखाने में सर्वथा सफल रहा है. स्त्री और पुरुष, कमोवेश दोनों को ही आपने बराबर से दोषी माना है, शायद स्त्रियों को कुछ अधिक ही! ...परन्तु लोकलाज के भय से आपने समानांतर रूप से स्त्रियों को अधिक भुक्तभोगी दिखाया है, सहानुभूति भी प्रकट की है उनके प्रति! ...जाने-अनजाने यह, लोकलाज के चलते ही सही, ..परन्तु सही बात कह गए आप, यद्यपि मंशा उनको बख्शने की बिलकुल भी न थी आपकी! यही एक आम पुरुष सोच है आज!
मेरा व्यक्तिगत मत है यह, शायद गलत भी लग सकता है आपको, कि स्त्रियों में नैतिकता का स्तर पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक अच्छा था और आज भी है. ...वो अलग बात है कि आज की स्त्री, पुरुष के साथ होड़ कर रही है, ..रेस जारी है जोरों से, ...पर उसे यह भान नहीं कि कुदरत ने तो उसे अधिक अच्छा व सक्षम बनाया है, उसका स्तर अपेक्षाकृत बेहतर है पुरुष से; ..फिर होड़ करके, पुरुष की बराबरी करने के क्रम में तो उसका स्तर गिरेगा ही!! ...और यही हो रहा है आज, ..और पुरुष-प्रधान भारतीय दुनिया हंस रही है, मजाक बना रही है, व्यंग लिख रही है- उस नारी के पराभव पर, जो उससे (पुरुष से) आगे थी कभी, पर आज नीचे जा रही है. मेरी हृदय से अपील है भारतीय स्त्रियों से कि--
"कुदरती रूप से आप बेहतर बनाई गई हैं, सोच में भी और शरीर से भी; मानसिकता भी बेहतर और शारीरिक सक्षमता भी विलक्षण; यही बुनियादी अंतर है आपमें और पुरुष में; इस पर गर्व करें और इसे ऊंचा समझें, क्योंकि वास्तव में यह इस लायक है; इसी कारण आप अधिक सम्मान के योग्य हैं और ऐसा सदा से होता भी आया है; आपके ऊंचे स्तर ने ही भारत के कई हिस्सों में सामाजिक संतुलन बनाकर रखा हुआ है, उदाहरणार्थ- बिहार (जहां पुरुषवर्ग में नैतिकता का टोटा है); व्यर्थ की अंधी दौड़ और होड़ में अपने को नीचे न ले जायें; कुदरत ने आपको जो विलक्षणता दी है, उसे पहचाने, उसका सदुपयोग करें, ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हों और स्वयं की मौलिकता, मौलिक गुणों पर बेहिचक बिंदास गर्व करें. स्त्री और पुरुष की अलग-अलग फंडामेंटल प्रॉपर्टीज़ हैं, बहुत सारी कॉमन हैं पर बहुत सी बिलकुल अलग भी, ..उन्हें परखें, जानें, आजमाएं ..और तब फर्क महसूस करें, ...आपको अपनी मौलिकता से एक दैवीय सुगंध महसूस होगी और अनावश्यक कृत्रिमता से आसुरी दुर्गन्ध. निश्चित रूप से यह बहुत अन्दर की बात है जिसको अनुभव नहीं वरन अनुभूत करना पड़ेगा."

(२)
खाद्य सुरक्षा बिल से जुड़े विवाद और उसकी पैरोकारी करने वाले लोगों में चल रही बहस को समझने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं, जैसे:
1. क्या वाकई केन्द्र सरकार को गरीब की रोटी की नहीं बल्कि अपने वोटबैंक की परवाह है?
2. भूख से मरने वाले लोगों की तादाद में दिनोंदिन वृद्धि होने के बावजूद क्या इस अधिनियम का विरोध करना जायज है?
3. क्या भारत जैसे देश, जहां कदम-कदम पर वर्गीकृत समाज दिखता है, में इस व्यवस्था को लागू करवाना आसान है?
4. क्या इस अधिनियम को महज एक चुनावी स्टंट मानकर इसे अनदेखा किया जाना उचित है?

* आपके पहले बिंदु का उत्तर है- हाँ. ..इसमें कोई शक नहीं कि सरकार को गरीब व भूखी जनता की कुछ परवाह अवश्य होगी परन्तु इस परवाह का कारण जनता की फटेहाल स्थिति से उपजी संवेदनाएं तो कतई नहीं! एक कारण है कि- उन्नत देशों, राष्ट्रसंघ, विश्वबैंक, डब्लू.एच.ओ., विभिन्न वैश्विक सहायता संगठनों, आदि का ध्यान आकृष्ट करना और दिखाना कि- हम भी प्रगतिशील हैं और कुछ कर रहे हैं, आप लोग भी इसे सराहिये और कुछ मदद हो सकती है तो वह भी करिए. …दूसरा कारण जो अधिक बड़ा है वह यह कि- देश के लोगों को दिखाना कि हम वास्तव में फिक्रमंद हैं और राजकोष की गरीबी के बावजूद एक बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं, इसे सराहिये और आगे इस अध्यादेश पर सम्पूर्ण अमल सुनिश्चित करने हेतु कृपया हमें वोट दीजिये!
* आपके दूसरे बिंदु का संक्षिप्त उत्तर है कि हमें इस अध्यादेश का बिलकुल भी विरोध नहीं करना होगा. लाख अदूरदर्शिता के बावजूद इसमें भविष्य के लिए काफी कुछ सकारात्मक छिपा है, यदि भविष्य की सरकारें ईमानदारी से और दृढ़प्रतिज्ञ होकर इस योजना को कुछ सामयिक / व्यावहारिक फेरबदल के साथ अमली जामा पहनाती हैं.
* तीसरे बिंदु पर काफी कुछ कहा जा सकता है परन्तु उसका निचोड़ यह कि- वर्गीकृत समाज तो एक समस्या है ही, परन्तु उससे भी बड़ी समस्या यह है कि हम भारतवासी मानसिक व आध्यात्मिक रूप से बहुत पिछड़े हैं, लगभग अविकसित हैं, बल्कि दिन-प्रतिदिन इसका ग्राफ और नीचे जा रहा है. ऊपर से नीचे तक के लोगों की बुनियादी सोच संग्रह और लालच की है- नेता, अभिनेता, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, धार्मिक गुरु, अध्यापक-वर्ग, उद्योगपति, मीडिया, लगभग सम्पूर्ण अभिजातवर्ग इसकी चपेट में है, भविष्य के प्रति सभी में अजीब सी असुरक्षा की भावना व्याप्त है, जो विभिन्न भौतिक लोभों को 'अनंत' विस्तार देती है! नीचे के तबकों में भी इसका संक्रमण बखूबी फ़ैल चुका है. यानी मदद का नियोजन करने वाले, उसे प्रदत्त कराने वाले एवं मदद के हक़दार, सभी व्यक्ति इन विषाणुओं से प्रभावित हैं. इसके चलते मुझे नहीं लगता कि योजना को मूर्तरूप देना इतना आसान होगा! विपणन और वितरण अत्यधिक भ्रष्टाचार व भारी अव्यवस्था, ..यहाँ तक कि लूटपाट और कत्लेआम का भी भय रहेगा. निश्चित ही यह अतिश्योक्ति नहीं है, व्यर्थ का भय नहीं है, ..वरन यह विश्लेषण हमारी आज की मानसिक व आध्यात्मिक स्थिति के आधार पर किया गया है.
* चौथा बिंदु- हमें इस अधिनियम को अनदेखा नहीं करना है वरन इसे मात्र भविष्य की एक अच्छी योजना की बुनियाद के रूप में देखना है. हमें कहीं न कहीं यह सोच कर संतुष्ट होना होगा कि- किसी भी कारण से ही सही, पर कुछ चिंतन तो हुआ!
हाँ, इतना हम अवश्य जान लें कि दिल्ली अभी बहुत दूर है, क्योंकि ऊपर से लेकर नीचे तक हम तरह-तरह की बेड़ियों में जकड़े हैं, इनसे मुक्ति पाकर ही हम आगे को चल पायेंगे.

(३)
"ऐसी तो कोई रात नहीं जिसकी सुबह न आये इस काली रात की भी सुबह होगी और नयी सुबह आशा की नयी किरण लेकर आएगी |"
"हम सब स्वार्थ से ऊपर उठकर अपना कर्म करें तो युग स्वतः बदल जायेगा और सच की राह पर चलें तो सतयुग जरुर आयेगा |"
"शुरुआत अपने घर से करें, स्वयं अपने कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों का पालन ईमानदारी से करें."
"हमारा परिवार सुसंस्कृत होगा तो समाज सुसंस्कृत होगा और जब समाज सुसंस्कृत होगा तो भारत माँ का स्वरुप बदलेगा, उसका चेहरा गर्व से दमकेगा |"
..बहुत सुंदर पंक्तियाँ और लेख के अंत में बहुत सुंदर सार, ...बदलाव की आशा के सुखद झोंके समान.
गलत चीजों और गलत मानसिकता का अवश्य विरोध करें, परन्तु आशा का दामन और बदलाव हेतु अंतहीन विनम्र प्रयास कभी न छोडें.
बुराई से घृणा करें परन्तु बुरे से नहीं, प्रत्येक व्यक्ति कभी भी बदल सकता है, यदि हम 'अपनेपन' से उसे बदलने की ठान लें तो!
प्रत्येक क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया अवश्य आती है, देर-सवेर हो सकती है पर हमारे सीमित किन्तु निरंतर नेकनीयत प्रयास एक दिन अवश्य फलीभूत होंगे, ऐसा विश्वास मन में सदैव बना रहना चाहिए.
सर्वोत्तम तो यह होगा कि हम जो लिखें, उसे अपने जीवन में लागू भी कर रहे हों, तभी वह प्रभावकारी होगा, अन्यथा कुछ लिखना मात्र लिखने और अहम् की तुष्टि के लिए ही होगा.

(४)
सडकें, चौराहे, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बाबा के दरबार, बसें, ट्रेनें, कैंडल मार्च, रैलियां, तीर्थ, सभाएं, सिनेमा, शमशान; इन सबमें सन्नाटा होता, या फिर इनका आज कोई अस्तित्व ही न होता यदि इन्हें उस भीड़ का सहारा न होता जिसका जिक्र आपने अपनी रचना में किया! ..फिर भी लाभार्थियों द्वारा उस भीड़ की इतनी अवहेलना!? ..और उस भीड़ का भी अपने सामर्थ्य और महत्त्व को न समझ पाना?! ..इसे भीड़ की अचेतावस्था ही कहेंगे शायद!
जिसके वजूद के कारण मुमकिन है इन सब का वजूद;
त्रासद है कि वही भीड़ ढूंढ़ रही आज अपना खुद का वजूद!

(५)
एक लम्बे समय तक इंजन को स्टार्ट रखने और जोर-जोर से एक्सीलेटर लेने से कुछ नहीं होगा, हमें गाड़ी को गियर में डालकर आगे बढ़ाना होगा, और जल्दी ही टॉप गियर तक पहुंचना होगा! ..शोर नहीं, ..दूरी नहीं, …बल्कि विस्थापन महत्वपूर्ण है!