Tuesday, October 10, 2017

(८३) चर्चाएं ...भाग - 2

(१) भगवान एक हैं - फिर भी लोग इस बात को क्यों नहीं समझ पाते?
इसका एक ही कारण दिखता है कि धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में हम सभी पंथों के लोग वर्षों से एक ही स्थान पर रुके हुए हैं, विज्ञान के क्षेत्र में हम व्यापक होकर कहाँ से कहाँ पहुँच गए परन्तु धर्म के क्षेत्र में हम अभी भी कुंए के मेंढक हैं. धर्म और ईश्वर आखिर हैं क्या, और क्यों, आपस में लड़ने से पहले इस पर कभी विचार कभी किया हमने!? "धर्म" अर्थात् ऐसा योग्य आचरण अथवा कार्य, जो हमें वाह्य (भौतिक) एवं आन्तरिक सुख प्रदान करा सके. श्रेयस्कर आचरण कौन सा है, इसे निर्धारित करने का कार्य मानवीय बुद्धि का नहीं, बल्कि केवल एक दिव्य अलौकिक शक्ति (सार्वभौमिक परमात्मा) का है, ऐसा सभी पंथ मानते हैं. ..यदि हम यह मानते हैं कि सभी धार्मिक पंथों का ईश्वर एक ही है और वह वही दिव्य अलौकिक शक्ति है, तो फिर उनके धर्मग्रंथों में दी गयीं नीतियों और आदेशों में भिन्नता क्यों, ईश्वर के नाम भिन्न क्यों? हास्यास्पद यह कि सभी के धर्मगुरु कहते हैं कि उनके पंथ का धर्मग्रन्थ और ईश्वर ही प्रामाणिक है; अन्य सब निम्न श्रेणी के या झूठे हैं! वस्तुतः प्रत्येक पंथ के शीर्ष स्तर पर जब ऐसी सोच या मनोवृत्ति होती है, तब परस्पर धार्मिक या पंथिक द्वेष जन्म लेता है. यही द्वेष विश्व भर में फैली अनेक बुराइयों एवं वैमनस्य की जड़ है. बिना यह समझे कि यह भिन्नता क्यों है, अपने-अपने ईश्वर और धर्मग्रन्थ को ही श्रेष्ठतम कहने का दावा करना अहं-सूचक है. वस्तुतः विश्व के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग ढंग से मानव सभ्यता का क्रमिक विकास हुआ. तब यातायात के इतने साधन उपलब्ध न होने से लोग अपने-अपने क्षेत्रों, कबीलों और संघों तक ही सीमित रहते थे. यही तो मूल कारण था कि भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का निर्माण हुआ एवं एक-दूसरे की बात समझने-समझाने के लिए असंख्य भाषाओँ का भी क्रमिक उदय एवं विकास हुआ. ..विकास के इस क्रम में सभी समुदायों में अच्छाई भी उभरी और बुराई भी. मूलतः आत्मिक प्राणी होने के कारण सभी संघों के तत्कालीन प्रबुद्ध, अग्रणी और नेतृत्व-क्षमतावान चुनिन्दा जनों को अच्छाई यानी "धर्म" का महत्त्व समझ में आया; और फिर उन्होंने अपने लोगों को "योग्य आचरण" यानी धर्म के मार्ग पर प्रवृत्त करने लिए स्थान-काल-परिस्थिति अनुसार, तत्कालीन लोगों के विवेक, बुद्धि, भाषा और संस्कृति अनुसार, कुछ नियम और आज्ञाएं लिखीं, बताईं या लागू कीं. ... निराकार सार्वभौमिक परमेश्वर को भी शब्दों के माध्यम से कुछ-कुछ समझाने की कोशिश की. ...समझने में सुविधा और श्रद्धा के सरल निर्माण हेतु देश-काल-संस्कृति-परिस्थिति अनुसार कालांतर में ईश्वर के विभिन्न सगुण रूपों का भी उदय हुआ. समय-समय पर किसी संघ में बुराई के अत्यधिक बढ़ जाने पर उस काल के किसी योग्य, न्यायप्रिय व साहसी ने अवतार रूप में दुष्टों का संहार करके आम जन को राहत पहुंचाई एवं लोककथाओं में अपनी उपस्थिति सदैव के लिए दर्ज की (आध्यात्मिक दृष्टि से हम सब भी तो छोटे-छोटे अवतार ही तो हैं). इतिहास गवाह है कि विभिन्न देशों के व्यक्तियों ने जब लम्बी यात्राएं की, तो उन्हें अन्य देशों व संस्कृतियों के बारे में पता चला. यही कारण है कि प्रत्येक समुदाय व संघ के ईश्वर एवं धार्मिक ग्रन्थ भिन्नता लिए हैं! सिर्फ भारत में ही कितनी अधिक भाषाएँ, सभ्यताएं, संस्कृतियाँ, ईश्वर के नाम एवं रूप हैं तो सम्पूर्ण विश्व के बारे में जरा सोचिए! ...अरे, इतना जानने के बाद भी धर्म के नाम पर लड़ने वाले संकुचित, खोखले और पिछड़े हैं भीतर से! ....परमेश्वर अर्थत ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च सत्ता को जानने-समझने के लिए विभिन्न उपासना पद्धतियाँ, धार्मिक कृत्य, कर्मकांड आदि सब एक प्रकार से माध्यम ही हैं उस तक पहुँचने का; ये सब लोगों की संस्कृति का ही एक हिस्सा हैं, तभी तो ये स्थान एवं जाति अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं! ...बस एक ही चीज पूरे संसार में, सब लोगों में, सब पंथों में, समुदायों में एक सी पाई जाती है, वह है एक सर्वोच्च अद्भुत शक्ति को मान्यता; जो अदृश्य व निराकार है, परन्तु हर जगह विद्यमान है! ...एक और चीज पूरे संसार में, सब लोगों में, पंथों में एक सी पाई जाती है, वह है- यथासंभव श्रेष्ठ (सर्वमान्य, सार्वभौमिक) नैतिक मूल्यों को अपनाना. ....तथापि एक चीज अस्थाई है और सब जगह अलग-अलग पाई जाती है, वह है- ईश्वर के विभिन्न नाम, रूप, उपासना पद्धतियाँ, ..यानी अलग-अलग संस्कृतियाँ!!! ...अब लोग ही फैसला करें कि 'सिद्धांत' रूपी 'धर्म' बड़ा है या 'संस्कृति' रूपी 'धर्म'!!! 'लौकिक धर्म' के नाम पर आपस में लड़ने वाले बहुत से लोगों को अभी यह भी ज्ञात नहीं होगा कि अध्यात्म आखिर है क्या???? अध्यात्म वह है जो हमें 'सिद्धांत' रूपी 'धर्म' से परिचित कराता है!

(२) भगवान् ने कभी नहीं कहा कि मेरी पूजा करो फिर भी लोग करते हैं क्यों? हम अक्सर देखते है कि लोग अपना काम वगैरह छोड़कर मंदिर में जाते हैं, खुद तो जाते हैं अपने छोटों को भी ले जाते है चाहे इसके लिए उन्हें उनके काम से वंचित क्यों ना करना पड़े, कहते हैं पुण्य मिलेगा, भगवान् आपकी सहायता करेगा कैसे?
परमात्मा के गुणों को अपने भीतर विकसित एवं दृढ़ करने के लिए तथा चंचल मन के विरुद्ध जाकर 'धर्म' यानी अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा व ऊर्जा पाने के लिए एक सामान्य व्यक्ति को कुछ ध्यान-स्मरण आवश्यक होता है. परमात्मा तो अदृश्य व निराकार है, तो समझने में सुविधा और भाव के सरल निर्माण हेतु प्रत्येक समाज के प्रबुद्धों ने अतीत में देश-काल-संस्कृति-समय एवं तत्कालीन लोगों की बुद्धि-विवेक अनुसार ईश्वर के विभिन्न सगुण रूपों की आराधना आरंभ की. आशय नेक था और वह केवल यही था कि तत्कालीन आम लोग प्रेरित होकर यथासंभव योग्य आचरण करें. ...संस्कृति-अनुसार प्रेरणा पाने का यह अद्भुत तरीका कालांतर में एक रूढ़िवादी सभ्यता में परिवर्तित हो गया! ...अब लोग बस पूजा-पाठ करते हैं, पूछो क्यों करते हैं, तो विरले ही यह जवाब सुनने को मिलेगा कि 'ईश्वरीय गुणों को आत्मसात करने के लिए'!!! समय के साथ हमने पूजा-अर्चना करने का लक्ष्य बदल दिया, बहुधा अब वह 'सकाम' है! परमेश्वर भी अवश्य खिन्न होंगे यह सब देखकर! ...पर फिर भी वह कुछ नहीं करेंगे, ...करेंगे तो उनके नियम, सिद्धांत व अनोखी स्वचालित न्याय-व्यवस्था!

(३) पाप और पुण्य का भेद समझना मुश्किल क्यों हो जाता है....?
ऐसा कर्म जिससे 'धर्म' (नैतिकता द्वारा अनुमोदित न्याय, सही बात, निर्दोष) की रक्षा हो, केवल वह ही करने योग्य है. ....ऐसा विचार या कर्म, जो शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, या आध्यात्मिक, इन चार रूप से किसी को (स्वयं या/और अन्य किसी को) नुकसान पहुंचाए, वह गलत (पाप) होगा, ...शेष सब सही!!! ...केवल किसी आपातकाल में (अर्थात् उपर्लिखित परिभाषित 'धर्म' के संकटकाल में), केवल धर्म (सत्य) की रक्षा और पुनर्स्थापना हेतु किसी को उपरोक्त चार तरह से आहत भी करना पड़े, तो वह कोई पाप नहीं, ....लेकिन ध्यान रहे कि कार्य संपन्न होते ही यानी सत्य की रक्षा होते ही तुरंत 'सामान्य धर्म' में लौटना अत्यंत आवश्यक, अन्यथा व्यक्ति गंभीर पाप का भागी होगा. अधिकांशतः हमें 'सामान्य धर्म' का अनुपालन ही करना होता है.

(४) अध्यात्म से जुड़ने का सही अर्थ क्या है...? लोग गलत बाबाओं के पास जा कर आध्यात्मिक होने की गलतफहमी पाल लेते हैं...!
अध्यात्म वह है जो "सिद्धांत" रूपी "धर्म" से हमारा परिचय कराता है. हमारी आत्मा उस धर्म से सराबोर है; या यह भी कहें कि आत्मा, साक्षात् धर्मस्वरूप ही है तो भी यह कोई अतिशयोक्ति वाली बात नहीं! किसी स्थूल गुरु या मार्गदर्शक से हमें केवल कुछ ऊपरी दिशा-निर्देश मिल सकते हैं, पर यात्रा तो हमें अपने प्रयासों से ही करनी होती है. ..लेकिन अज्ञानतावश लोग किसी गुरु या बाबा को ही सबकुछ (ईश्वर तक) मानकर अपना सबकुछ उसपर लुटा देते हैं. स्मरण रहे कि एक खरे गुरु को भौतिक लालसाएं छू भी नहीं सकतीं और वह बहुत साधारण जीवन व्यतीत करते हैं, बिना औपचारिकताओं के वह सबको सहज उपलब्ध रहते हैं. ..वह शिष्यों की भीड़ लगाने में विश्वास नहीं करते.

(५) आज देश अनेकों चुनौतियों का सामना कर रहा है ...आपके विचार में सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती कौन सी है? देश में गरीबी, बेरोज़गारी, बढ़ती असमानता, धार्मिक असहिष्णुता, रिश्वतखोरी प्रमुख है.
अच्छा मुद्दा उठाया आपने. आपने हमारे समक्ष खड़ी मौजूदा चुनौतियों के कुछ उदाहरण भी दिए! लेकिन मुख्य प्रश्न आपका यह है कि "सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती कौन सी है?" समस्या की जड़ में जाना हो तो कुछ खोदकर जड़ को ढूंढना आवश्यक. ...समस्या रूपी पेड़ की कुछ टहनियां या कुछ पत्ते काटने-छांटने से पेड़ नष्ट नहीं होगा, जड़ पर प्रहार करना होगा! ...मेरे विचार से देश में (दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड़कर) जहाँ भी गरीबी, बेरोजगारी, रिश्वतखोरी, असमानता, धार्मिक असहिष्णुता आदि जैसी समस्याएं हैं, उनकी जड़ में वहां के समाज (अभिजात वर्ग और अगुवाओं सहित) में व्याप्त नैतिक पतन है! ..कई बुद्धिजीवी कहेंगे कि "गरीब या बेरोजगार से नैतिकता की उम्मीद क्यों करते हो भाई!?" ...जी हाँ, ..बिलकुल सही बात है आपकी, मेरे विचार से भी नैतिकता की उम्मीद सदैव ऊपर (राजा, मंत्री, पुलिस, वकील, डॉक्टर, अभिजातवर्ग, व्यवसाई, नौकरीपेशा आदि) से ही आरंभ होनी चाहिए. ...क्या वहां पर्याप्त नैतिकता है????? लगभग सभी किसी न किसी प्रकार से किसी न किसी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं! कल की खबरों में एक खुलासा देखा कि उत्तरप्रदेश की अनेक ग्रामीण सरकारी पाठशालाओं में नियुक्त अध्यापकों ने भाड़े पर टीचर रखे हुए हैं (खुद हजारों रुपए प्रति माह वेतन लेकर केवल कुछ सौ रुपयों पर)!!! कहीं किसी अध्यापिका का पति ही भाड़े पर लगा है, कहीं मिड डे मील का रसोइया, कहीं सफाई कर्मचारी की बेटी, तो कहीं आंगनबाड़ी वाली महिला एक्स्ट्रा पार्ट-टाइम जॉब के रूप में नियुक्त कर रखी है. बढ़ती दुर्घटनाओं से चिंतित रेलवे का भी एक फैसला पढ़ने में आया कि फ़ील्ड-वर्क (जैसे खलासी, लाइनमैन आदि) के पद अब बहुत उच्चशिक्षा प्राप्त अभ्यर्थियों से नहीं भरे जायेंगे! ..क्योंकि उन्हें काम करने में शर्म आती है, और वे अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं करते! कुछ ऐसा ही नवनियुक्त सरकारी सफाई-कर्मचारी भी करते हैं! इसी प्रकार का कार्य पी.एम.एस अंतर्गत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में तैनात सरकारी डॉक्टर भी करते हैं, ..महीने में दो-चार दिन जाकर पूरे महीने का वेतन उठाते हैं और शहर में प्राइवेट प्रैक्टिस भी करते हैं! सब के सब बटोरने में, नोचने में लगे हैं! सभी इसी फिराक और होड़ में हैं कि कौन किसको अधिक 'चूना' लगा सकता है! पुलिस, प्रशासन आदि की बात भी करें तो कई दिन लग जायेंगे, ...उनके बारे में कुछ छुपा नहीं है किसी से! ...यानी इन सब बातों से क्या सिद्ध हुआ कि पिछड़े प्रदेश, इस वजह से पिछड़े हैं क्योंकि वहां नैतिकता को हाशिये पर डाल दिया गया है! ...तो सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती हमारे समक्ष है तो वह है नैतिकता की! ...मनुष्य को मानव बनना होगा! जब हम अच्छे और सरल बनेंगे, दूसरे का हक़ मारना बंद करेंगे, अपना काम सिर उठाकर गर्व से करेंगे, जिम्मेदार बनेंगे, वेतन या फीस के बदले ईमानदारी से अपेक्षित काम करेंगे, तभी दुर्दिन दूर होंगे. ..इस स्थिति के लिए तथाकथित बड़ों (गुरुओं और नेताओं) को ही पहल करनी होगी.
...समाज में नैतिकता इसीलिये कम है क्योंकि परमेश्वर, प्रकृति आदि के नियमों और सिद्धांतों पर किसी को विश्वास ही नहीं रहा! किताबों में नियम-सिद्धांत खूब पढ़ते हैं, रटते हैं, ..और उन पर बड़े-बड़े भाषण, व्याख्यान, प्रवचन आदि भी देते हैं, पर स्वयं को उनकी परिधि से बाहर मानते हैं!!! अध्यात्म को मात्र पढ़ना या समझना काफी नहीं, उसके क्रियान्वयन से ही बात बनती है.

(६) लोग अक्सर अपनेआप को तकलीफ देकर भगवान को खुश करने की कोशिश करते हैं क्यों? जैसे हम व्रत करते हैं और नंगे पांव मंदिर के चक्कर लगाते हैं, ज्यादा भीड़ में घुस जाते हैं और बाद में बीमार पड़ जाते हैं; ये सब कोई अपने लिए नहीं करता लेकिन जिनके लिए करता है वो उसका मूल्य समझते हैं क्या? अगर भगवान को खुश करने के लिए तो कोई वो काम क्यों नही करता जिससे बाकियों की सोच सही हो और बढे?!
अक्सर लोग खुद अपनी या अपने किसी परिजन की कोई अभिलाषा पूर्ण करने के लिए, अथवा मन की शांति और हृदय की पवित्रता हेतु पूजा-पाठ, व्रत, दर्शन, आदि करते हैं. इसमें कोई भी संदेह नहीं कि इस प्रक्रिया में वो कुछ त्यागते हैं और कुछ कष्ट उठाते हैं. बहुत से पंथों में पूजा के विशिष्ट दिनों में व्रत आदि का प्रावधान इसलिए है कि उस अवसर पर हम अपनी इन्द्रियों के स्वाद, लालच आदि को त्यागकर कुछ संयम रखना सीखें. 'संयम' भी परमेश्वर का ही एक गुण है. लेकिन भारी भीड़ में धूप, गर्मी, या भीषण सर्दी और बरसात में लाइनें लगाकर, भारी कष्ट उठाकर व बीमार पड़कर भगवान् का दर्शन करने से उन्हें क्या लाभ पहुँचता है, उनका कौन सा गुण बढ़ता है, यह मेरी समझ से परे है! ...हाँ, शांत वातावरण वाले किसी पूजा स्थल पर दर्शन करने जाना और भावपूर्ण वातावरण में परिक्रमा आदि करना तो अवश्य ही उतने समय के लिए हृदय को पवित्र और मन को शांत कर देता है. ...बस एक बात और हो जाये तो कितना ही अच्छा हो कि हमारी ये धार्मिक गतिविधियाँ किसी विशिष्ट स्वार्थभावना से (अर्थात् सकाम) ना हों! इनसे यदि सत्य, संयम, उदारता सरीखे ईश्वरीय गुणों में वृद्धि हो रही हो तो समझ लेना चाहिए कि दर्शन, पूजा, व्रत, कष्ट उठाना आदि सफल रहे, अन्यथा पुनर्विचार की आवश्यकता! ....आपके मूल प्रश्न पर आते हैं, ...भगवान् तो अपनेआप में ही खुशी का समुद्र हैं, हम उनको क्या खुश करेंगे!!! हाँ, यदि हम ऐसा सोचते हैं कि हमारे किसी स्थूल धार्मिक अनुष्ठान से प्रसन्न होकर भगवान् हमें मनचाहा वरदान दे देंगे, तो यह हमारी भूल है! यदि ऐसा संभव होता तो विश्व में यह चीजें सबसे अधिक हमारे भारत में ही होने के कारण हम आज सर्वोच्च शिखर पर होते! ...कुछ लोग शायद तर्क दें कि हाँ, हमारा भारत कभी इन्हीं कारणों से शिखर पर था! ...मेरा उत्तर होगा कि, ..जी हाँ, बिलकुल था और इन्हीं कारणों से ही था; ...लेकिन तब विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य बड़ा होता था; ..निजी अभिलाषाओं तक सीमित न होकर वह समस्त प्राणिजगत के कल्याणार्थ तथा धर्म (सत्य व न्याय) की रक्षा के निमित्त होता था. ..तब हम पूजा-पाठ, व्रत, दर्शन, तपस्या, अनुष्ठान आदि से अपनी मलिनताओं और अवगुणों को धो कर अपनी पवित्र आत्मा को प्रकट करते थे; ...आत्मा के प्रकटीकरण होते ही साक्षात् ईश्वर से साक्षात्कार संभव होता था, ...और फिर हमें वे प्रत्येक अपेक्षित योग्यताएं मिलती थीं, जिनके बल पर हम "सत्य व न्याय" (धर्म) को पुनर्स्थापित करने में सफल होते थे, फिर हमारी जयजयकार होती थी, हम सिरमौर घोषित होते थे! .....यह था भारत का स्वर्णिम अतीत! लेकिन अभी हमारा आशय या लक्ष्य आदि इतना महान होता है क्या?

(७) अधिकाँश लोगों को दूसरों में दोष दिखाई देते है किन्तु अपनी स्लेट साफ़ क्यों दिखती है...? बहुत बड़ी विडंबना है ...क्यों?
जी हाँ, बिलकुल सही कहा आपने कि यह बहुत बड़ी विडम्बना है. इसका मूल कारण "प्रत्येक व्यक्ति का अपना अहंकार" है. व्यक्ति को अपनी बुद्धि, जाति, पंथ, उपासना पद्धति, ईश्वर-रूप, भक्ति, भाषा, संस्कृति, भौतिक हैसीयत (संपन्नता), पसंद-नापसंद आदि का अहंकार हो सकता है! जिस भी चीज का अहंकार व्यक्ति को होता है, वह अन्यों को उस क्षेत्र में छोटा व हीन समझता है! विश्व के इस भाग में अहंकार कुछ अधिक ही है! विरले ही ऐसा देखने में आता है कि किसी को अपने दोष स्वीकार्य हों, ...या वह दूसरे के गुणों की उन्मुक्तता से (दिल खोलकर) सराहना कर सके!!! मजे की बात यह है कि धार्मिक सभाओं या सत्संगों आदि में भी सामान्य साधकों से लेकर बड़े मार्गदर्शकों तक में यह मनोवृत्ति देखी जा सकती है! अहंकार ही है यह, जो हमें निरंतर यह बताता, जताता और समझाता रहता है कि तुम और तुमसे जुड़ी हर चीज सर्वोत्तम, शेष सब दीन-हीन! अनेक सत्संगों में अहं-निर्मूलन हेतु विशेष वर्कशॉप देखीं हैं मैंने, लेकिन सूक्ष्म निरीक्षण करने पर यह पाया कि यह कई स्वभावदोष और अहंकार तो अवश्य कम करती है लेकिन अनेक अन्य उपजा भी देती है. .....दार्शनिक भाव से विवेचना करें तो निष्कर्ष पाते हैं कि जीवन में हम अनेक भूमिकाओं में होते हैं; ...कहीं हम कुछ 'सीखते' हैं और कहीं कुछ 'सिखाते' हैं! ...जब हम सीख रहे हों तो सिखाने वाले के केवल गुणों पर ध्यान दें, तभी हम कुछ सीख पायेंगे; ...और जब हम किसी को कुछ सिखा रहे हों तो उसके अवगुणों पर अवश्य समुचित ध्यान दें, तभी हम उसका उचित विकास कर पायेंगे. ..ये दोनों काम अहंकार को किनारे कर देने पर ही संभव हो सकते हैं. यदि लोगों में खुद सुधरकर फिर अन्य को अपना समझकर सुधारने की सच्ची भूख जागेगी तभी अहंकार कुछ कम होगा और समाज श्रेष्ठ बनेगा. आश्चर्य की बात है कि सबके जीवन में ऐसा होता भी है, उदाहरण- अभिभावकों (खासतौर पर एक जागरूक माँ) द्वारा बच्चे को सिखाना, ...अपने बच्चे को कुछ सिखाने की प्रक्रिया में माँ अनेक गुण पहले खुद आत्मसात करती है, फिर बड़े मनोयोग से अपने बच्चे को भी सिखाती है. कैसे सीखती है और कैसे सिखाती है? ...बिलकुल वैसे जैसे ऊपर बताया! वह अपने अहं को न्यून करके ही उचित चीजें सीख पाती है और बच्चे के प्रत्येक अवगुण पर नजर रखते हुए उसे सर्वगुणसंपन्न बनाने की निःस्वार्थ चेष्टा करती है!

(८) अहंकार और स्वाभिमान में क्या अंतर है? अहंकार में कोई भी अपनेआप को सबसे अधिक शक्तिशाली समझता है तो अहंकार हो जाता है, नहीं तो बिना कुछ किये ही लोग दूसरों के सामने हारे मान लेते है क्यों?
जिसमें अहंकार होता है वह अपने बल, बुद्धि, राज्य, भाषा, संस्कृति और अपनी प्रत्येक चीज को पर "घमंड" करता है, उन्हें "श्रेष्ठतम" समझता है और अन्यों की तुच्छ या हीन!! इस कारण वह आक्रान्ता (आक्रामक) हो जाता है. वह दूसरों पर विचारों या अस्त्रशस्त्र से हमला करता रहता है, अपना वर्चस्व स्थापित करने की चेष्टा करता है. इस क्रम में वह धर्म (सत्य एवं न्याय) की भी अवहेलना करता है. ....जिसमें स्वाभिमान होता है, वह अपने बल, बुद्धि, राज्य, भाषा, संस्कृति और अपनी प्रत्येक चीज पर "गर्व" करता है, उन्हें "श्रेष्ठ" समझता है (लेकिन श्रेष्ठतम नहीं) और अन्यों की भी इन्हीं चीजों का सम्मान करता है. वह दूसरों से भी कुछ-कुछ सीखकर व सहयोग लेकर अपने से जुड़ी हर चीज को और बेहतर बनाने की सतत चेष्टा करता रहता है. वह आक्रान्ता नहीं होता, परन्तु अपने पर किये आक्रमण को सहन भी नहीं करता, समुचित प्रत्युत्तर अवश्य देता है, प्रत्येक दशा में वह धर्म (सत्य एवं न्याय) का पक्ष लेता है. ....तीसरे प्रकार के वो होते हैं जो बिना प्रतिरोध किये अधर्मी अहंकारी आतताई के समक्ष घुटने टेक देते हैं, या जान कर भी अनजान बने रहते हैं, वे कायर और नपुंसक होते हैं!

(९) सांसारिक सुखों की तलाश में आज लोग अधिक दुखी क्यों दिखाई देते हैं...? वास्तविक खुशी मन की शांति है, या अत्यधिक आराम सुविधा का संग्रह?
सांसारिक सुखों की तलाश में आज लोग इतना अधिक दुखी इसलिए दिखाई पड़ते हैं क्योंकि वे बहुत 'बड़ा' सोचते हैं! बड़ा यानी प्रचुर सुख-सामग्री, प्रचुर आमदनी, बहुत सारा लाभ! इस 'बड़े' की कोई सीमा नहीं होती जबकि हमारे शरीर की आवश्यकताओं की एक सीमा है! बहुत ज्यादा के चक्कर में हम सही ढंग से मिल रहा 'थोड़ा' या 'पर्याप्त' ठुकरा देते हैं, और इस कारण भी बेरोजगारी जैसे संकट में भी पड़ जाते हैं या बहुत घाटा उठा जाते हैं. फलतः अनेकों मानसिक या मनोदैहिक रोगों को न्योता दे बैठते हैं. अपने शरीर और परिवार की आवश्यकताओं के अनुरूप जरूरी भौतिक संसाधन जुटाना कोई बुरी बात नहीं, ...लेकिन लिप्सा में पड़कर उन आवश्यकताओं को विलासिता की हद तक विस्तारित करना दुखों को आमंत्रित करना ही है. उदाहरण के लिए-- "कहते हैं, जल ही जीवन है, ...तो क्या हम बहुत सारा पानी एकसाथ पी सकते हैं?" क्या हम शरीर (पेट) की भूख से बहुत अधिक मात्रा में इकट्ठा खा सकते हैं?? यदि आवश्यकता से बहुत अधिक पानी पियेंगे या खाना खायेंगे तो संकट में पड़ जायेंगे!!! ...ठीक ऐसा ही विलासिता की चीजें आवश्यकता से अधिक जुटाने पर भी होता है, उसका भी साइड इफ़ेक्ट होता है, पर वो हम नजरअंदाज कर देते हैं, और साइड इफ़ेक्ट के तौर पर मन की शांति खो बैठते हैं! उदाहरण के लिए-- मेरे परिवार के आकार के अनुसार मानों मुझे एक गेस्ट-रूम सहित तीन-चार कमरे का मकान पर्याप्त है, तो फिर यदि मैं दस कमरे का मकान खरीद लेता हूँ तो उसकी देखरेख, सफाई, मेंटेनेंस आदि पर समय, ऊर्जा व धन आदि क्या अधिक खर्च नहीं करना पड़ेगा!? उस धन को जुटाने के लिए क्या अधिक मेहनत और जोड़तोड़ नहीं करना पड़ेगा? क्या उस एक्स्ट्रा मेहनत या जोड़तोड़ की कोई सार्थकता बता सकते हैं??? इन्वेस्टमेंट के पॉइंट ऑफ़ व्यू से हम अनेक प्लाट, जमीनें आदि खरीद लेते हैं और उनकी सुरक्षा, देखरेख आदि के लिए हमारी रातों की नींदें हराम हो जाती हैं. पैसों से तो हम अमीर हो जाते हैं, लेकिन मन की शांति और आनंद के दृष्टिकोण से गरीबी हमपर हावी होने लगती है! हाँ, किसी बहुत ही नेक इरादे से ज्यादा काम करना, और ज्यादा कमाना हमें और अधिक आनंदित कर सकता है! लेकिन अनावश्यक संग्रह से हमें फिर भी दुःख ही पहुंचेगा.

(१०) आध्यात्मिक चर्चा में - अध्यात्म से सम्बन्धित प्रश्न क्यों नही पूछते हैं?
बिलकुल सही है आपका कहना. यहाँ नौकरी कैसे मिले, रोजगार में कैसे तरक्की हो जैसे गैर-आध्यात्मिक प्रश्नों के अतिरिक्त अन्य भी बहुत से ऐसे मुद्दे लिखे जाते हैं जिनका अध्यात्म से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता! अध्यात्म का शुद्ध अर्थ आखिर है क्या, केवल इसी पर एक लम्बी चर्चा हो जाये तो लोगों को कुछ बुनियादी बातें पता चल जायें! ..अध्यात्म से परिचय दरअसल हमारे व्यावहारिक जीवन को भी बहुत प्रकाशित करता है, उसे संवारता है. लेकिन श्रीमान् जी, साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि आध्यात्मिक चर्चा से क्या व्यवहार यानी असल भौतिक जीवन में भी कुछ सुधार आ रहा है या नहीं! केवल अनुष्ठान, ध्यान, साधना आदि ही इस बात के सूचक नहीं हैं कि हम साधक हैं और हम अध्यात्म से जुड़े हैं! बल्कि हमारे आम जीवन में नैतिकता की मात्रा यह निर्धारित करती है कि हम कितने आध्यात्मिक हैं! हमारी नैतिकता ही हमारी आध्यात्मिकता का दृश्य पैमाना है! ...अतः नैतिक गुणों या नैतिक मूल्यों की चर्चा भी एक प्रकार से आध्यात्मिक चर्चा ही होगी!

(११) भगवान् पर हमेशा भरोसा और विश्वास बना रहे इसलिए क्या किया जाये, क्योंकि निराशा के कारण भरोसा कम होता जाता है!?
भगवान् और भगवान् द्वारा बनाई गयी इस प्रकृति के नियम व सिद्धांत बहुत ही भरोसे और विश्वास के लायक हैं! इनके अनुसार हमें मिलने वाले हर दुःख और हर सुख के पीछे कारण के तौर पर कहीं न कहीं हम भी जुड़े होते हैं. जरा सोचिए- भगवान् कैसे हैं? भीतर से जवाब आएगा- बहुत ही नेक-दिल, विनम्र, सत्य को पसंद करने वाले एवं न्यायप्रिय. भगवान् यदि बहुत अच्छे व्यक्तित्व के स्वामी हैं तो वो हमसे क्या उम्मीद रखते होंगे? जवाब यह होगा कि- अच्छी सोच, नेक व्यवहार और ईमानदारी व लगन के साथ हर एक काम को करना! यदि हम इस प्रकार से हैं तो हम ऐसे ही नेक और कर्मठ बने रहकर यह भरोसा रख सकते हैं कि हमारे भी अच्छे दिन जरूर आयेंगे! लेकिन, यदि हमारी सोच और काम में मिलावट है तो हमारे दुःख बढ़ेंगे ही, घटेंगे नहीं; चाहे हम कितनी भी पूजा और किसी पंडित से कितने भी अनुष्ठान करवा लें! भगवान् एक ऐसा राजा है जो अपनी जयजयकार, फूलमाला व प्रसाद आदि चढाने आदि से खुश नहीं होता बल्कि वह हमारे अच्छे कामों और अच्छी सोच से प्रभावित होता है! वह चापलूसी पसंद राजा नहीं है! हम हर पल उसकी निगाह में हैं! अतः भरोसा रखिये निराशा के बादल एक दिन जरूर छटेंगे! जरूरी नहीं कि दुःख अभी के कर्म की वजह से हों, वो पुराने किसी कर्म की वजह से भी हो सकते हैं जो आपकी यादाश्त में ही नहीं! ..पर दुःख है तो कारण भी हम ही! ..आगे सुख आएगा तो भी कारण हम ही! ऐसा विश्वास रखेंगे तो दुःख परेशान नहीं कर पाएगा! सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं! आजके किये अच्छे का अच्छा फल आने में कुछ देर हो सकती है पर वो आएगा जरूर, चाहे वो किसी बदले हुए रूप में आए. अच्छा बन के और अच्छा करके भरोसा रखें कि अवश्य ही भगवान् इसे एक दिन ब्याज-समेत लौटायेंगे!

(१२) आज हमारे विद्यालय बच्चों के लिए असुरक्षित क्यों बनते जा रहे हैं...?
सामान्य समाज में भी तेजी से फैल रहा नैतिक पतन इसका एकमात्र कारण है! बस कहने को ही हम विकसित हो रहे हैं! विकास के साथ जब तक नैतिकता संलग्न न हो, वो विकास नहीं अभिशाप है!
आज के अधिकांश प्राइवेट स्कूल शिक्षा की दुकानें बनकर रह गए हैं. और अधिकांश अभिभावक भी मात्र मोटी फीस देकर निश्चिन्त होकर बाकी चीजों से मुंह मोड़ लेते हैं! सब अति व्यस्तता का रोना रोते हैं, ...लेकिन यह अति-व्यस्तता क्यों है? यदि हम व्यस्तता के क्षणों की गुणवत्ता का लेखाजोखा करें तो पता चलेगा कि कुछ बेवजह की व्यस्तता हमें नैतिकता की पटरी से नीचे उतार रही है! हम अभिभावक हों या स्कूल का स्टाफ, सभी आज नीचे को जा रहे हैं, लेकिन अपने व अपनों के लिए बेहतरी की उम्मीद पालते हैं! समाज में नैतिकता के ह्रास का प्रदूषण यदि फैलेगा तो चपेट में हम भी आयेंगे ही! भूकंप में पृथ्वी यदि डोलेगी तो झटका हमें भी लगेगा ही! हम सामाजिक प्राणी हैं, हमें समाज से सरोकार होता है, तो उसको ठीक करने की कोशिश क्यों नहीं करते? कुछ खुद सुधरें और कुछ औरों को भी प्रेरित करें, उस बेवजह की व्यस्तता को कम करें जो हमें और समाज को रसातल में लेकर जा रही है.
पुनः एक पाठक का कमेंट-- साइंस बरदान है या अभिशाप, इसे तर्क से आप स्वयं खुद से पूछें.
मेरा उत्तर-- हमने एक बार भी नहीं कहा कि साइंस अभिशाप है! हमने कहा कि जिस तरह से विकास हो रहा है, उस क्रम में हम नैतिकता को समानांतर रूप से नहीं लेकर चल रहे हैं, फलस्वरूप आपाधापी वाला विकास अभिशाप सिद्ध हो रहा है। विज्ञान तो अतुलनीय सिद्धांतों का पिटारा है भाई जी; उसमें कोई भी कमी नहीं। हां, उसको अप्लाई करने के हमारे ढंग में त्रुटि संभव है। जैसे परमाणु ऊर्जा का आविष्कार विज्ञान की एक बड़ी देन है। अब कुछ लोग इससे बिजली उत्पादन जैसा उपयोगी कार्य करते हैं, तो कोई विध्वंसक बम बनाता है। ऐसे ही इंटरनेट एक वैज्ञानिक खोज है; कोई इसे ज्ञान और उपयोगी जानकारियां हासिल करने के लिए इस्तेमाल करता है, तो कोई वीडियो गेम और अन्य समय-नाशक दुरुपयोग के लिए। विज्ञान ने हमको ताकत दी है विकास करने की। अब हमारे ऊपर है कि हम इस ताकत का सदुपयोग करें या दुरुपयोग। विज्ञान रूपी सिद्धांत गलत नहीं, उसे प्रयोग करने वाला हमारा विवेक सही या गलत होता है।

(१३) संसार को सुख पहुँचाना ही परमात्मा को सुख पहुँचाना है!?
जी हाँ, बिलकुल! ...मेरे विचार से इस संसार को परमात्मा ने ही रचा है, तो परमात्मा की कृति को कोई नुकसान या दुःख पहुँचाने की हम सोच भी कैसे सकते हैं? परमात्मा द्वरा रचित सभी स्थूल (भौतिक) चीजों में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है और सूक्ष्म चीजों में श्रेष्ठ है मनुष्य देह में उपस्थित आत्मा! मानव देह व आत्मा के अलावा भी सबकुछ यद्यपि परमात्मा द्वारा रचित है और हमें उनका भी ध्यान रखना है, तथापि वरीयता क्रम में अन्य सभी का नंबर मनुष्य और मनुष्यता के पश्चात् ही आता है. हम यह पहली चीज साध लेंगे तो अन्य स्वतः ही सध जायेंगी.

(१४) क्या स्वयं से संन्यास लेना सम्भव है? यदि हाँ, तो कैसे?
संन्यास से आपका क्या अर्थ है? यदि संन्यास से आपका अर्थ यह है कि घरद्वार छोड़कर हरिद्वार, काशी आदि जैसे तीर्थस्थलों में जाकर किसी आश्रम या मठ आदि में रहना, ..तो मेरा उत्तर होगा कि यह केवल नाम का (स्थूल) संन्यास होगा! असली संन्यास वो भी नहीं जिसके लिए बहुत से तथाकथित संत-महात्मा आह्वान करते हैं कि चल-अचल संपत्ति आश्रम के नाम कर दो और यहाँ आकर सेवा करो! .....संन्यास लेने का वास्तविक अर्थ है कि- अपनी दुनियावी इच्छाओं-आकांक्षाओं को उम्र बढ़ने के साथ सीमित करते जाना; किसी वस्तु या व्यक्ति का त्याग नहीं बल्कि उनके प्रति आसक्ति (संग्रह की प्रवृत्ति व मोह आदि का) का त्याग करना; संन्यास का अर्थ जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना नहीं बल्कि जिम्मेदारियों को बिना किसी लालच या स्वार्थ आदि के और अधिक लगन से निभाना है! यानी, ...लालच, स्वार्थ, अनावश्यक संग्रह, मोह, और आसक्ति आदि को क्रमशः त्यागना ही वास्तविक संन्यास है! ...और यह स्वयं से संभव है. सौ प्रतिशत!

(१५) पश्चिमी सभ्यता की नक़ल समाज को किस प्रकार दुष्प्रभावित कर रही है..?
माफ़ कीजियेगा, ..यहाँ आप कुछ वह गलती कर रही हैं जो हमारे रूढ़िवादी 'बड़े' लोग (नेता व साधू-संत) करते आए हैं कि आज हमारे समाज में व्याप्त विभिन्न बुराईयों का ठीकरा सीधे-सीधे पश्चिमी सभ्यता के सिर मढ़ देना! यदि एक बार को हम यह मान भी लेते हैं कि हमारे समाज में आज व्याप्त भ्रष्टाचार, अनैतिकता, व्यभिचार, खून-खराबा, समय की बर्बादी आदि अवगुण पश्चिमी सभ्यता की देन हैं, ..तो यह भी तुरंत मान लेना पड़ेगा कि पश्चिमी देशों के समाज में भी उपरोक्त अवगुण प्रचुर मात्रा में हैं!!! तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि आज अधिकांश पश्चिमी देश बहुमुखी विकास कर चुके हैं या तेजी से कर रहे हैं! ...क्या इन अवगुणों के साथ उनका यह विकास संभव हो पाता??? हम देखते हैं कि उनके यहाँ कानून और न्यायव्यवस्था बहुत बेहतर है, हर चीज का परेशानी-रहित एक सटीक सिस्टम है; वहां एक दुर्घटनाग्रस्त घायल को चिकित्सीय सुविधाएं तुरंत और परेशानी-रहित तरीके से मुहैया होती हैं; बीमा-क्लेम या बैंकिंग सिस्टम भी बहुत पारदर्शी और परेशानी-रहित है; विभिन्न टैक्स भी लोग ईमानदारी से भरते हैं; एक इनोसेंट पर्सन के लिए कानूनी पेचीदगियां बिलकुल नहीं हैं, लेकिन एक अपराधी का बच पाना बेहद मुश्किल है; जो भी लॉ एंड आर्डर का ईमानदारी से पालन करता है वह खुद को सामान्यतः बहुत प्रोटेक्टेड और सेफ फील करता है; आम जनता में अनुशासन और केयरिंग की भावना साफ दिखती है, कोई लाइन तोड़कर पहले जाने की जद्दोजहद करता नहीं दीखता, बुजुर्गों और प्रेगनेंट महिलाओं को लोग आउट ऑफ़ टर्न पहले मौका देते हैं; संसद में एक-दूसरे के ऊपर कुर्सियां नहीं फेंकी जातीं; राजनीति में अधिकांशतः दो ही प्रमुख राष्ट्रीय दल होते हैं, हर नेता अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग अलापता नहीं दिखता, शालीनता से बहस करने की कोशिश रहती है; डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक अपना-अपना काम निष्ठा व लगन से करते हैं, इसीलिए वहां मानव-त्रुटि के कारण आकस्मिक मृत्यु या दुर्घटनाएं लगभग नगण्य हैं; .....अब फाइव डे वीक में वो पांच दिन डट के काम करते हैं और फिर जो दो दिन वे मौज-मस्ती करते हैं उसमें कम से कम एक दिन वे पूरे परिवार के साथ बिताते हैं; वर्क फ़ोन और पर्सनल फोन अलग होता है तथा इसी प्रकार वर्किंग लाइफ और पर्सनल लाइफ भी; हौचपौच, व्यर्थ की भागादौड़ी, ट्रेनों में शोरशराबा विरले ही देखने को मिलता है; एक ही धर्मग्रन्थ से बहुत कुछ व्यावहारिक शिक्षा ले लेते हैं; अन्य धर्मों के प्रति उचित सहिष्णुता देखने को मिलती है; विश्व में कहीं भी कोई त्रासदी या प्राकृतिक आपदा आए तो वो सच्ची मदद पहुँचाने की चेष्टा करते हैं!!! ...इतने ही उदाहरण काफी हैं यह बताने के लिए कि बहुत से महत्वपूर्ण मामलों में निःसंदेह वे हमसे बेहतर हैं, इसीलिए वे विकसित राष्ट्र हैं! ...और हमपर वर्षों से विकासशील का तमगा लगा हुआ है! क्यों??? ...क्योंकि हम 'श्रीकृष्ण' की भी केवल रासलीला को ही देखते हैं वो भी व्यभिचारी दृष्टि से; ...पता नहीं कहाँ से सुना और सीखे लेकिन निश्चित ही बहुत से नशेड़ी भी भांग, धतूरा, मद्य, चरस, गांजा और अन्य अनेक नशीली चीजें 'शिवजी' के नाम पर लेते हैं (बाबा और भक्त दोनों), ...मौके-माहौल के हिसाब से हमारी वरीयताएं झट से बदल जाती हैं! ....दरअसल हमने उपर्लिखित दूषित प्रवृत्ति से अभी तक पश्चिमी सभ्यता में भी बुरा ही खोजा और उसे फ़ौरन अपना लिया, लेकिन अच्छे को देख ही नहीं पाए, ...या देखना ही नहीं चाहते! देखिये, ...अच्छा और बुरा हर जगह होता है, हर सभ्यता के कुछ गुण या दोष हैं; ...लेकिन असली विकास वहीं होता है जहाँ अच्छाई, बुराई पर हावी रहे! पश्चिमी विकसित देशों में अच्छाईयाँ, बुराईयों से अधिक हैं और वे बुराई पर हावी हैं; जबकि हमारे यहाँ बुरे से बुरा खोजकर उसे अपनाने की दूषित प्रवृत्ति है, इसीलिए हम दिनप्रतिदिन खोखले विकास की ओर अग्रसर हैं.

Saturday, October 7, 2017

(८२) चर्चाएं ...भाग - 1

एक आध्यात्मिक वेबसाइट के चर्चा सेक्शन पर उपस्थित ज्ञानियों, साधकों और जिज्ञासुओं के द्वारा छेड़ी गयी कुछ चर्चाओं पर मैं भी कुछ प्रतिक्रियाएं देने का प्रयास करता रहता हूँ. उन्हीं को संकलित कर कुछ ब्लॉग-पोस्ट्स के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ.

(१) क्या इस संसार में केवल दुःख ही दुःख है?
आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी, "कोई भी घटना अकारण नहीं होती (दुःख और सुख भी)." जो कोई भी जिस किसी भी अवस्था (दुःख-सुख) को महसूस कर रहा है, उस अवस्था के उत्पन्न होने के लिए परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से उसका भी एक बड़ा योगदान रहता है. क्रिया-प्रतिक्रिया के वैज्ञानिक सिद्धांत के रूप में न्यूटन जी का भी यही कहना है (प्रतिक्रिया त्वरित अथवा विलंबित भी हो सकती है). अतः वैज्ञानिक रूप से भी यह सिद्ध होता है कि दुःख और सुख हमारे ही कारण (क्रिया अनुसार) आता है और मात्र अपने 'कर्म' से ही हम उसे नियंत्रित कर सकते हैं.

(२) मानव अनंत आनंद चाहता है पर वह यह नहीं जानता कि उसे कैसे और कहाँ से प्राप्त करें!?
देखिए सच तो यह है कि पढ़े-लिखे लोगों को अब भलीभांति यह "ज्ञान" है कि आनंद कहाँ और कैसे मिलेगा! लेकिन जब तक उस "ज्ञान" को अप्लाई नहीं किया जायेगा, इम्प्लीमेंट नहीं होगा, तब तक व्यक्ति उसे वस्तुतः पा नहीं पाएगा! "मैं तैराकी से सम्बंधित कितनी भी किताबें पढ़ लूं, कितना भी ज्ञान हासिल कर लूं; वो मुझे तैराकी नहीं सिखा पाएगा! ..तैराक बनने के लिए मुझे पानी में उतरकर ज्ञान को व्यवहार में उतारना ही पड़ेगा!" निचोड़ यह कि मात्र पढ़कर, सीखकर और ढेर सारा ज्ञान बटोरकर हम आनंदित नहीं हो सकते, ...हाँ, ब्रह्मराक्षस (अहंकारी ज्ञानी) अवश्य बन सकते हैं.

(३) अपने को कैसे जाना जा सकता है?
व्यक्ति में स्वयं को जानने की पर्याप्त भूख यानी प्रबल जिज्ञासा या तड़प होनी चाहिए. ऐसा होने पर अपने भीतर से ही या अन्यत्र कहीं से आपको समुचित जवाब अवश्य मिलेगा. स्वयं को जानने की प्रक्रिया में शाब्दिक ज्ञान होना पर्याप्त नहीं, अनुभूति होनी आवश्यक है. और साधना में उपरोक्त लिखित गुण होने से ही "असली" अनुभूति होनी संभव होती है. वैसे हम अधिकांशतः कोरी भावना के स्तर पर ही रह जाते हैं अतः हमारी अनुभूतियाँ भी मन के स्तर की ही होती हैं, आत्मा या सूक्ष्म के स्तर की नहीं होतीं, अर्थात यथार्थ नहीं होतीं! यथार्थ अनुभूति न होने या मन के स्तर पर ही रह जाने या कोरी भावना में बहने का मुख्य कारण यह होता है कि आज के युग में व्यक्ति कोई संकट या दुःख आने पर ही अध्यात्म की ओर मुड़ता है. आर्त या परेशान व्यक्ति बहुधा भावुक ही होता है, उसकी साधना 'सकाम' होती है! अतः स्वयं या ईश्वर की खोज की साधना सदैव 'निष्काम' भाव से हो तो ही सफलता मिलती है.

(४) आत्मज्ञान के बिना योगी भोगी बन जाता है?
जिनके पास आत्मज्ञान नहीं, जो आध्यात्मिक गुणों में लीन नहीं, केवल वे ही तो छद्म (नकली या आभासी) आध्यात्मिक साम्राज्य बनाते हैं! आध्यात्मिक गुणों के अभाव में ऐसे योगी केवल धन-यश की कामना से जनसाधारण को बड़े-बड़े सपने दिखाते हैं, उन्हें ईश्वर-प्राप्ति का लालच देते हैं, उन्हें सांसारिक आकांक्षाओं की पूर्ति का लालच देते हैं, परीक्षा में उत्तीर्ण होने, नौकरी पाने, धन पाने आदि का उपाए सुझाते हैं या वरदान देते हैं. जबकि वास्तव में खरा आत्मज्ञानी कभी भी अपना या अपने बड़े होने का, या ईश्वर के किसी विशिष्ट रूप का, या रिद्धि-सिद्धि आदि का "प्रचार" नहीं करता, वो केवल सादगी से धर्म (राइटियसनेस) का "प्रसार" करता है! आत्मज्ञान रहित योगी, एक भोगी की भांति भौतिक संसाधन एकत्रित करके अपना साम्राज्य विस्तारित करता रहता है, उसमें लोकहित की भावना केवल दिखाने के लिए होती है, वस्तुतः वह अपना स्वहित ही साध रहा होता है; एक सामान्य जन को उससे मुलाकात करना सरलता से संभव नहीं होता. जबकि एक आत्मज्ञानी कभी भी भौतिक संग्रहण में विश्वास नहीं रखता, और वह सबको सहज ही उपलब्ध होता है (उससे कोई भी कभी भी मिल सकता है)! बहुत बड़े मूलभूत अंतर हैं ये इन दोनों के! लेकिन आमजन को यह देखने की फुर्सत कहाँ, ...भौतिकतावाद के इस युग में वह तो केवल तड़क-भड़क की ओर ही आकर्षित होता है!

(५) आज धर्म के नाम पर बढ़ते अपराधों के लिए कौन उत्तरदायी है...?
इसके लिए दोषी हैं-- (१) आम आदमी के निजी स्वार्थ, लालच, निकम्मापन, कोरी भावुकता, अशिक्षा, अंधश्रद्धा, भेड़चाल, फालतू के कामों में व्यस्तता, अच्छी बातों को केवल सुनना लेकिन अमल नहीं करना, नैतिक रूप से कमजोर होना, केवल स्वकेंद्रित होना. ..(२) राजनेताओं का घोर अवसरवादी होना, अति भ्रष्ट होना, सत्तालोलुप होना, वोट बैंक की खातिर सांप्रदायिक (पक्षपाती) होना, देख-सुन कर भी आफतों के हल के लिए समय पर कोई कदम ना उठाना, धन-यश का जबरदस्त लालच होना और हासिल कर लेने के बाद पतितता की सीमाएं लांघना. ..(३) सभी धर्मों के धार्मिक मार्गदर्शकों का प्रसिद्धि या/और धन के लिए अत्यधिक लोभी होना, धन-यश को पाने के लिए अनुयायियों को अनेकों काल्पनिक सब्जबाग दिखाना, अपने आप को स्वयंभू गुरु और ईश्वर तक घोषित करना, धन और यश के प्राप्त हो जाने पर उनमें विभिन्न पतित इच्छाएं उत्पन्न होना और फलतः जघन्य पाप करना.

(६) व्यक्ति कब और कैसे सही रूप से जागरूक होता है...? क्या केवल शिक्षा द्वारा जागरूकता संभव है?
शिक्षा द्वारा पर्याप्त जागरूकता संभव है, ...कहा तो यही जाता है ..और दुनिया के अधिकांश भूभाग पर यह बात खरी उतरी भी है. ..परन्तु हम भारतवासी खासतौर पर हिन्दीभाषी बेल्ट इसका अपवाद है! हमारे नीति-नियंताओं (राजनीतिज्ञों) की असीम कृपा से देश के लोगों में जब "पिछड़ा" बनने की होड़ हो तब हमारा देश आगे कैसे बढेगा? इस स्थिति में तो कितना भी पढ़-लिख कर भी हम पिछड़े या विकासशील का तमगा ही सदा के लिए लगाये रखेंगे! अगड़ा व जागरूक होने की रीढ़ तोड़ने की रही-सही कसर तथाकथित बाबा और धार्मिक गुरु पूरी किये दे रहे हैं! निचोड़ यह कि अवसरवादी राजनेताओं और ढोंगी बाबाओं की छत्रछाया में शिक्षा भी हमें कभी जागरूक नहीं कर सकती!!! उम्र गुजारने के साथ यह तजुर्बा हुआ है कि "वस्तुतः हमारी जागरूकता का ग्राफ नीचे को ही जा रहा है. हमें प्राप्त व्हाट्सएप एवं अन्य मीडिया संदेशों में इसकी छवि साफतौर पर दिखती है." और तो और..., हमारे इसी उन्नत कहे जाने वाले मंच पर उठाये जाने वाले सवालों को टटोल लें! ...क्या आपने ऐसा अनुभव किया?

(७) कट्टर धर्मान्धता अध्यात्म पथ पर सबसे बड़ी रूकावट है ...क्या आप इस मत से सहमत हैं...?
जी हाँ मैं सहमत हूँ आपसे. यह बहुत त्रासद है कि अन्धश्रद्ध कट्टरपन दिनोंदिन बढ़ रहा है और खरे अध्यात्म से लोग विमुख हो रहे हैं! विभिन्न तथाकथित बाबा, गुरु आदि तो इसके लिए जिम्मेदार हैं ही, हम आम जनता भी कोई कम दोषी नहीं! सर्वत्र लोभ एवं स्वार्थों का बोलबाला है! बाबा जैसे लोग यदि झूठे सब्जबाग दिखाते हैं तो हम भी तो लालच के मारे उसमें फंस जाते हैं और वांछित पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं! लोभ और लालच ने हमारे बुद्धि-विवेक को हर लिया है! खरा अध्यात्म चूंकि हमें स्वच्छ आईना दिखाता है तो इसीलिए हम उससे बचते हैं! मजे की बात यह कि खरा अध्यात्म बहुत सरल और अल्प लेकिन शक्तिशाली सिद्धांतों वाला है और लगभग सब उससे परिचित भी हैं लेकिन लोभ एवं स्वार्थों के चलते हम इतने भ्रष्ट हो गए हैं कि उसे पहचानने व जानने से इंकार कर देते हैं; ऐसे अभिनय करते हैं मानों वह (अध्यात्म) बहुत दुरूह है और हमारे लिए नहीं बना!!! बहुत हास्यास्पद और त्रासद है यह स्थिति!

(८) जीवन में सुधार किस आयु से आना ज़रूरी है...? अधिकाँश लोग यौवन तक जीवन को केवल मौज मस्ती का ही एक भाग मानते हैं!?
यह प्रश्न अपने में ही बेहद हास्यास्पद है! सुधार यानी इम्प्रूवमेंट की कहीं कोई आयु अथवा समय होता है!? किसी भी व्यक्ति को इम्प्रूवमेंट की भूख हमेशा होनी चाहिए और वो कभी सेचुरेट नहीं होनी चाहिए. ...और हाँ..., यदि आपके अनुसार यदि अधिकांश लोग यौवन तक जीवन को केवल मौज-मस्ती का ही एक भाग मानते हैं, ..तो मेरे अनुसार मौज-मस्ती कोई पाप नहीं यदि वह समझदारी से मानवता, उचित मर्यादा और सामाजिक गरिमा का ध्यान रखते हुए की गयी है! मैं तो कहता हूँ कि व्यक्ति को किसी भी आयु में खिलंदड़ा (खुशमिजाज और भरपूर मस्त) रहना चाहिए! क्या गंभीरता ओढ़ लेना ही व्यक्तित्व में सुधार या इम्प्रूवमेंट का परिचायक है?! संक्षेप में उत्तर यह कि मौज-मस्ती करते हुए भी समानांतर रूप से पर्याप्त सुधार संभव हैं और उनका आरंभ शैशवावस्था से ही होना चाहिए तथा जीवनभर जारी रहना चाहिए.

(९) भगवान् के न्याय पर कब प्रश्नचिन्ह लगाने को हम मजबूर हो जाते हैं? क्या ऐसा करना उचित भी है...?
गर्भावस्था में ही अथवा जन्मते ही नवजात अबोध शिशु की मृत्यु; इसके अलावा सूखे, बाढ़, भुखमरी, प्राकृतिक आपदा, युद्ध, आतंकी हमलों अथवा किसी दुर्घटना के कारण निर्दोषों या मासूमों की मृत्यु. ये सब देखकर एक सामान्य व्यक्ति को यही लगता है कि ईश्वर के न्याय में कहीं गड़बड़ है, उसका विश्वास डगमगाता है, वह ईश्वर को कोसता भी है. तब बड़े-बूढ़े या अन्य समझदार परिजन यह कहकर उन्हें सांत्वना देते हैं कि "शायद ईश्वर की यही मर्जी थी!" यह सुनकर दुखियों का मन शांत तो हो जाता है, पर सवाल यह उठता है किक्या इस प्रकार की सांत्वना देकर हम भगवान् के न्याय पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहे!? जिस पूजा-आराधना का हवाला देकर कोसते हुए हम यह कहते हैं कि सारी उपासना-अनुष्ठान बेकार गए, तो क्या हम यह समझते हैं कि पूजा-आराधना ही हमारी सुरक्षा की गारंटी है!? अध्यात्म के अनुसार और आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी सच तो यही है कि कोई एक्सीडेंट भी एक्सिडेंटली नहीं होता! मूल में कोई कारण तो अवश्य होता है! ...और वह कारण भगवान्, प्रकृति, या कुदरत के नियमों का निष्ठुर होना तो बिलकुल भी नहीं है! यह तो सब मानते ही हैं कि कोई सिस्टम तो है जिसके अंतर्गत समस्त गतिविधियाँ चल रही हैं; पहले अध्यात्म ने और अब विज्ञान ने उस सिस्टम की अनेकों परतें तो आम आदमी के लिए खोल ही दी हैं. तो फिर क्या ही अच्छा हो कि हम उस सिस्टम को फ़ॉलो करें. हम सिस्टम के अनुसार चलेंगे तो सुख से रहेंगे और विरुद्ध जायेंगे तो सिस्टम के अनुसार ही हम कुछ नकारात्मक भी पायेंगे, यह सोच आज नदारद है. सिस्टम को आप कोई घूस नहीं दे सकते! हमारी ज्यादातर आराधनाओं को हम ईश्वर को दिया उपहार या घूस ही तो समझते हैं और उसकी एवज में उससे बच्चों समान अपेक्षाएं रखते हैं! ....आदर्श रूप से हमारी किसी भी पूजा-अर्चना का मूल उद्देश्य यही होना चाहिए कि ईश्वर तू हमें अपने गुणों से सराबोर कर हमें अपने समान ही नेकी और न्यायपूर्ण पथ पर चला. जब हम ऐसे हो जायेंगे तो फिर भविष्य के दिन या जन्म अच्छे ही होंगे!

(१०) क्या अध्यात्म मार्ग पर चल कर व्यक्ति दोष रहित हो जाता है?
अध्यात्म के मार्ग पर चलने से व्यक्ति सही और गलत में वास्तविक अंतर को समझता है, अपने लिए सही को चुन सकता है. इससे धीरे-धीरे दोष कम होते हैं या फिर दोषों की तीव्रता घटती है. दोषरहित हो जाना तो बहुत बड़ी बात है, बहुत-बहुत मुश्किल है, ...लेकिन असंभव नहीं!

(११) अध्यात्म पथ पर चलने में सबसे बड़ी चुनौती कौन सी आती है और क्यों....? कहते हैं कि अध्यात्म का मार्ग सबसे कठिन मार्ग है...!?
सबसे पहले ईश्वर के सार्वभौमिक गुणों या ईश्वर-निर्मित प्रकृति के सिद्धांतों पर विश्वास दृढ़ करने की चुनौती! क्योंकि अक्सर हम सिद्धांत जानते तो हैं, पर स्वयं को उन सिद्धांतों की परिधि से बाहर मानते हैं! ..तो विश्वास तो खोखला हो गया हमारा! अध्यात्म में मात्र "भाव" (विकल्परहित विश्वास) का ही महत्व है. ...दूसरी चुनौती सामने आती है- अध्यात्म और व्यवहार (प्रतिदिन के कार्यों) के मध्य संतुलन बैठाने की, ..क्योंकि अध्यात्म, ईश्वर या प्रकृति के नैसर्गिक सिद्धांत कुछ कह रहे होते हैं और सामान्य समाज (आमजन) कुछ अन्य कर रहा होता है! यह देखकर अत्यधिक मानसिक अंतर्द्वद्व होता है! ...इसके अलावा अध्यात्म का मार्ग सबसे कठिन होने का भ्रम इसलिए है क्योंकि हममें से निन्यानवे प्रतिशत लोग हर काम में मात्र अनुयायी हैं (पहल करना नहीं जानते या करना नहीं चाहते), और चूंकि आज समाज के व्यवहार में हमें खरी आध्यात्मिकता देखने को नहीं मिलती है तो इस कारण हम प्रेरित नहीं हो पाते अध्यात्म का अनुसरण करने के लिए!

(१२) कहते हैं- आशा तृष्णा न मिटी , मिट मिट गए शरीर, ...क्या हम अपनी इच्छाओं पर विजय पा सकते है ? यदि हाँ तो कैसे...?
इच्छाओं को मारना और इच्छाओं को नियंत्रित करना, ये दो अलग-अलग बातें हैं. यदि इच्छाओं को नियंत्रित करना ही इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना है, तो जी हाँ यह संभव है. लेकिन समस्त इच्छाओं (सात्त्विक, राजसिक और तामसिक) को मारना या पूर्ण रूप से समाप्त कर देना ही इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना है तो वह तो मनुष्यों के लिए संभव नहीं! आत्मा जब तक मानव देह में है, उसकी कुछ मूलभूत आवश्यकताएं तो रहेंगी ही और उनको पूरा करने के लिए इच्छा उठना तो स्वाभाविक ही है. इच्छा उठेगी तो प्रयास होगा, प्रयास होगा तो ही आवश्यकता की पूर्ति होगी. अब कोई यह कहे कि भौतिक देह में रहकर कोई भौतिक आवश्यकता या लालसा न हो तो वह झूठ होगा. हाँ, लालसाओं को कम करना व नियंत्रित करना मानव के वश में है. जो "सही में मूलभूत" आवश्यकताएं हों बस उन्हीं पर ही फोकस कर उन्हें न्यायोचित ढंग से प्राप्त करने का निरंतर अभ्यास मनुष्य को यह विजय प्राप्त करा सकता है.

(१३) देश में नारी वर्ग कब और कैसे सुरक्षित अनुभव कर पायेगा....?? नारी को लेकर देश में राजनीति तो बहुत हो रही है किन्तु दुर्भाग्यवश स्थिति दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है, ....क्यों?
संकोचों को त्यागकर हमें समस्या की जड़ में जाना आवश्यक. हमारे समाज में दिन-प्रतिदिन अनाचार व व्याभिचार (विवाहेतर सम्बन्ध) बढ़ रहा है जिसके फलस्वरूप दुराचार भी बढ़ रहा है. आयु बढ़ने के साथ होने वाले हार्मोनल परिवर्तनों के कारण स्त्री और पुरुष दोनों में दैहिक आकर्षण जन्म लेता है. इस तृष्णा की सम्मानजनक और गरिमामय पूर्ति हेतु सभी सम्प्रदायों के धार्मिक ग्रंथों में कुछ नियमों, आज्ञाओं के तहत एक उपयुक्त आयु में विवाह संस्कार की व्यवस्था बताई गयी है. इन्हीं में अन्य संतुतियों के माध्यम से अन्य अनेक रिश्तों (जैसे माता-पिता, भाई-बहन, भाभी, देवर आदि) की भी व्याख्या की गयी है. समाज जब तक इन संतुतिओं और निर्बंधों को 'धर्म' या 'अकाट्य नियम' जानकर मानता रहा, तब तक सब 'लगभग' ठीक रहा. धार्मिक अगुवाओं की ही मेहरबानी से अब जब समस्त धर्म-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है तो नैतिकता की अनुपस्थिति में लड़के और लड़कियां दोनों निरंकुश से हो गए हैं. विवाहेतर (विवाह से पूर्व एवं पश्चात्) सम्बन्ध बढ़ते जा रहे हैं. ...इस अनैतिकता के दौर में शारीरिक गठन अधिक पुष्ट होने के कारण पुरुष अधिक आक्रामक हो गया है. स्त्री-पुरुष के बीच परस्पर सहमति से भी यदि व्यभिचार होता है तो भी उसके पश्चात् एक स्त्री को ही उसका दुष्प्रभाव झेलना पड़ता है. कारण यह कि व्यभिचार पश्चात् पुरुष में कोई भी शारीरिक प्रभाव-दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, जबकि स्त्री की देह में अवश्य ही अनेक परिवर्तन होते हैं. दिखाई और महसूस हो सकने वाले दैहिक प्रभावों की वजह से स्त्री के मन-मस्तिष्क पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है. यदि वह बहुत ही दुश्चरित्र न हो तो अवश्य ही वह गहरे सदमे और डिप्रेशन में चली जाती है, जबकि सम्बंधित पुरुष ऐसा कोई भी परिवर्तन या प्रभाव नहीं झेलता. मात्र यही कारण है कि पुरुष अधिक आक्रामक और कामी और ढीठ हो गया है. ऐसे पाप वो अतीत में भी करता था पर उसका आधिक्य अब इसलिए भी हो गया है क्योंकि स्त्रियों का भी उकसावा उसे अब अधिक मात्रा में मिलता है. 'लिव-इन' परंपरा इसका एक ज्वलंत उदाहरण है. महानगरों में पढ़ने और नौकरी करने वाले लड़के-लड़कियों के बीच इसका चलन बढ़ता जा रहा है. प्रचलित विवाह-व्यवस्था से इतर अन्य ढंग ढूँढने से आरंभ में तो आजादी महसूस होती है, परन्तु सुख के निरंतरता की गारंटी जैसी चीज नदारद रहती है, एक ठोस सामाजिक जीवन से वह युगल वंचित रह जाता है. इनके अलावा सस्ता होता इन्टरनेट डाटा और इन्टरनेट पर बढती पोर्नोग्रफिक सामग्री भी व्यभिचार और दुराचार की एक बड़ी वजह है. उसके कारण अब ११-१२ वर्ष की अवस्था में ही यौन सम्बन्ध बनने लग गए हैं या कम से कम उनकी पूरी जानकारी तो हो ही जाती है. लोग कहते हैं कि परिवर्तन अपरिहार्य होता है! क्या प्रकृति के नियमों-सिद्धांतों में, या हमारी देह में कोई परिवर्तन आया है पिछले सैकड़ों वर्षों में?? क्या धरती पर गुरुत्वाकर्षण के मान 9.8 में कोई बदलाव आया है? क्या हमारा शरीर बदल कर बन्दर जैसा हो गया है? क्या भगवान बदल गए हैं? क्या नैतिक मूल्यों की परिभाषा बदल गयी है? ...जब यह सब नहीं बदला तो क्यों हम प्राचीन अकाट्य और आज भी प्रासंगिक नियमों को तोड़ने हेतु इतना व्यग्र हैं? पुरानी परम्पराएं तोडिये..., पर केवल वो, जो आज अप्रासंगिक हैं, कमजोर हो गयी हैं, बूढी हो गयी हैं! स्त्रियों को स्वयं, और पुरुषों को भी स्त्रियों की उपर्लिखित शारीरिक और मानसिक कोमलताओं को समझकर तदनुसार श्रेष्ठ एवं गरिमामय आचरण करना सीखना होगा. एक माँ को भी आज आगे आकर बाल्यकाल से ही अपनी संतानों को इसका पाठ पढ़ाना होगा.

(१४) धर्म को लेकर आज लोगों के मन में बहुत से प्रश्न उठ रहे हैं, क्यों? क्या यदि धर्म न होता तो इंसान जानवरों जैसा व्यवहार करता?
मुझे लग रहा है कि 'धर्म' शब्द से आपका आशय रिलिजन है, तो विभिन्न रिलिजन पर से विश्वास उठने का एक बड़ा कारण उनमें आ गयी कट्टरता ही है. अंधी कट्टरता तो अन्यों के साथ भेदभाव और वैमनस्य को बढ़ा रही है. इसके अलावा बहुत सारे अन्धविश्वास और पाखंड, पाखंडी भी घुस गए हैं सभी पंथों के शीर्ष में! इनके बीच असली 'धर्म', जो सर्वथा योग्य और न्यायप्रिय आचरण का स्रोत है, वह कहीं खो गया है.असली 'धर्म' (राइटियसनेस) तो वैसे सभी पंथों के केंद्र में बीजस्वरूप विद्यमान है, किन्तु उसे देखने और पोषण देने का कार्य कोई भी पंथ आज करता नहीं दिखता (सबसे सहिष्णु हिन्दू भी नहीं, वे भी आज दिग्भ्रमित हैं), ...तो फिर एक जाग्रत नागरिक इन सब तथाकथित धर्मों (पंथों) के जंजाल से उकता चुका है. उसे यथार्थ "धर्म" से कोई परेशानी नहीं है और वो उसके भीतर ही है, और वही तो व्यक्ति को इन पंथिक जंजालों से मुक्त करवाना चाहता है.आपके दूसरे प्रश्न का उत्तर है कि यथार्थ "धर्म" तो सार्वभौमिक है, विभिन्न पंथों या किसी विशेष जीवन पद्धति (जैसी कि हिन्दू शब्द की व्याख्या हो रही है) से भी परे है. यथार्थ 'धर्म' (विशुद्ध ईश्वरीय ज्ञान) तो सभी मानवों के भीतर नैसर्गिक रूप से विद्यमान है. अतः यदि तथाकथित धर्म अर्थात पंथिक ज्ञान उपलब्ध न होता तो भी इन्सान आध्यात्मिक विकास के क्रम में आगे को बढ़ता ही.

(१५) "निवृत्ति" और जिम्मेदारियों से भागने के बीच क्या अंतर है?
प्रश्न अच्छा पूछना चाहा है आपने! ..."निवृत्ति" का अर्थ है कार्यमुक्ति, रिटायरमेंट, या परित्याग! ..."निवृत्ति" का अर्थ जिम्मेदारियों से मुक्ति या जिम्मेदारियों का परित्याग कदापि नहीं है और ना ही इसका अर्थ किसी लक्ष्य के प्रति प्रयासों को छोड़ देना है! "निवृत्ति" सदैव ही "प्रवृत्ति" पश्चात् होती है! पहले 'प्रवृत्ति'..., उसके बाद ही 'निवृत्ति'! "प्रवृत्ति" अर्थात् टेंडेंसी, रुझान, उन्मुखता, और प्रवणता. यानी प्रयास करके कुछ प्राप्त करना, वह भी पूरी तरह से! ...आधे वाक्य या आधी शिक्षा से हमेशा नुकसान ही हुआ है! सच तो यह है कि त्याग उसी का संभव है जो आलरेडी मेरे पास है या मुझे सहज ही प्राप्य है! प्राचीन नीतिवचनों में कभी भी किसी लक्ष्य की ओर उन्मुख होने (प्रवृत्ति) को मना नहीं किया गया है, बल्कि हर सही और न्यायपूर्ण लक्ष्य को गंभीर व न्यायोचित पुरुषार्थ (श्रम) से हासिल करने पर जोर दिया गया है. हम (आत्मा) एक भौतिक देह में हैं तो कुछ भौतिक आवश्यकताएं होना भी अवश्यम्भावी ही है; तो फिर उन्हें प्राप्त करना (प्रवृत्ति) तो अत्यावश्यक; ..पुनः, चूंकि हम मूलतः एक आध्यात्मिक देह हैं और एक समयकाल के पश्चात् यह भौतिक देह त्यागने का समय निकट आता ही है, ...तो यह समय निकट आते-आते हमें अपने श्रम से प्राप्त भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति (अटैचमेंट) के त्याग (यानी 'निवृत्ति') की भी गंभीर जरूरत! निचोड़ यह कि फिजिकल शरीर व जीवन के लिए कुछ आवश्यक सांसारिक चीजों को प्राप्त करना आवश्यक ताकि हम (भौतिक शरीर) भलीभांति और सुख से जीवित रह सकें. लेकिन इस भौतिक शरीर की एक मर्यादा, सीमा या आयु और उसके बाद हमारा आध्यात्मिक जीवन ही शेष रह जायेगा; तो फिर उस यात्रा की तैयारी भी बहुत जरूरी! उस यात्रा में भौतिक वस्तुओं का फिर कोई रोल (भूमिका) नहीं! तो आवश्यकता के अनुरूप ही प्रयास आवश्यक होते हैं. आवश्यकता न होने पर भी हम कुछ चीजों को यदि अपने साथ ढोते हैं तो वे बोझ बन जाती हैं! तो इस भौतिक जगत में प्रवेश करते ही "प्रवृत्ति" आवश्यक, ..फिर इस जगत से निकासी का समय आते-आते "निवृत्ति" भी आवश्यक! कितना ही अच्छा हो कि प्रत्येक "प्रवृत्ति"के साथ-साथ समानांतर रूप से हमें "निवृत्ति" का भी भान रहे! पुनः स्पष्ट कर दें कि "निवृत्ति" का अर्थ किसी वस्तु या व्यक्ति का 'त्याग' नहीं बल्कि उसके प्रति 'आसक्ति' (अटैचमेंट) का त्याग है! आशा है सब स्पष्ट हो गया होगा, अन्यथा आगे और प्रश्न कर सकते हैं.

(१६) आत्मा कौन है? आत्मा के विषय में जानकारी, आत्मा का स्वरूप!? आध्यात्मिक साधना क्या?
अच्छा आध्यात्मिक प्रश्न पूछा आपने! अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में! अपने भीतर की चेतना अथवा चैतन्य को हम आत्मा कह सकते हैं, जिसके कारण हम जीवित हैं या अस्तित्व में हैं. यही वह शक्ति है जो हमें वास्तविक धर्म (सर्वथा योग्य एवं न्यायपूर्ण आचरण) का परिचय कराती है या करा सकती है. यदि हम एक शब्द में आत्मा के मूल गुण को बताएं तो वह है- "सच्चिदानंद" अर्थात् सत् (सतत/सदैव रहने वाली) चित् (चैतन्यमय) आनंद (आनंदमय)! इसका कोई आकार या स्वरूप नहीं है जिसे हम आँखों से देख सकें. आँखों से ना दिखाई देने वाली फिर भी बहुत महत्त्वपूर्ण, विज्ञान की भाषा में बोलें तो यह हमारे भौतिक (स्थूल) शरीर का सॉफ्टवेयर है. हमारा भौतिक या स्थूल शरीर यानी हार्डवेयर, और आत्मा अर्थात् शरीर रूपी हार्डवेयर का ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर!! इस दुनिया के कार्यकलापों को संपन्न करने-कराने हेतु ये हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर एक-दूसरे के लिए पूरक हैं. पर अधिक महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर ही है! क्योंकि यदि यह निकल गया तो ऊपर से ठीकठाक दिखने वाला शरीर भी मृत घोषित होता है. ...और शरीर भंगुर है, धीरे-धीरे बूढ़ा होकर नष्ट होता है जबकि आत्मा नित-नवीन है! यह तो मात्र सरलता से समझने हेतु एक उदाहरण था. वास्तव में आत्मा का महत्त्व कहीं अधिक है. ..और आत्मा को पूरी तरह से जानने-समझने व इसे शुद्ध रूप में प्रकट करने का (यानी इसके ऊपर जमी धूल-गर्त साफ करने का) कार्य हम अध्यात्मशास्त्र (आध्यात्मिक साधना) द्वारा करते हैं. भलीभांति स्मरण रहे कि एक खरी आध्यात्मिक साधना, कुछ भी प्राप्त नहीं करवाती, कोई चमत्कार नहीं करती, कोई रिद्धि-सिद्धि प्रदान नहीं करती; वरन वह केवल आत्मा के ऊपर के विकारों, गन्दगी और धूल-गर्त आदि को साफ करती है! पश्चात् आत्मा सर्वथा समर्थ होती है! विज्ञान की भाषा में आध्यात्मिक साधना एक एंटीवायरस के समान है जो आत्मा रूपी ऑपरेटिंग सिस्टम को हानिकारक वायरसों से मुक्त कराता है. इससे सिस्टम अपने मूल रूप में अधिक दक्षता से काम करता है!

(१७) गुरु कैसा होना चाहिए? और हम कितने गुरु बना सकते हैं एक, दो या फिर जितने चाहो उतने?? कोई वैदिक उदाहरण?
सच्चे स्थूल (मानव देह) गुरु में अहंकार, धन या यश की भूख आदि किंचित मात्र भी नहीं होते. सीधा, सच्चा और सरल जीवन व्यतीत करते हैं. आडम्बरों और औपचारिकताओं से कोसों दूर रहते हैं. सबसे बड़ी बात कि वह प्रत्येक शिष्य या जिज्ञासु को सहज एवं सदैव उपलब्ध रहते हैं. ...रही बात गुरु धारण करने की तो हम सच तो यह है कि अध्यात्म में शिष्य गुरु को धारण नहीं करता, अपितु गुरु शिष्य को धारण करते हैं! शिष्य या जिज्ञासु में योग्यता या पात्रता देखकर ही एक खरा गुरु उसे स्वीकारता है. ..वैसे गुरु के सीधे संपर्क में न रहते हुए भी एकलव्य समान एक लगनशील शिष्य किसी भी गुरु से बहुत कुछ सीख सकता है! उत्तरोत्तर सीखते जाने के लिए व्यक्ति क्रमशः कितने भी गुरुओं की सहायता ले सकता है, यदि उसे अनंत के लिए उड़ान भरनी है! मेरे विचार से, प्रगति के इस क्रम में शिष्य के जीवन में आने वाले सभी गुरु अपने उस शिष्य से बहुत प्रसन्न होंगे! ...और अंत में बात किसी वैदिक उदाहरण की..., तो श्रीमान्, वो तो मेरे पास नहीं! शब्दों, विश्लेषणों और उदाहरणों के चक्रव्यूह में फंसकर मात्र इतिहासकार बन जाने को मैं अध्यात्म-साधना नहीं समझता हूँ. ..कहीं पढ़ा था कि, आध्यात्मिक-साधना सदैव हमें आगे की कक्षाओं में जाने को प्रेरित करती है, निरंतर चलाएमान रहने की अपेक्षा करती है; यहाँ तक कि "वेद" भी हमें यह कहते हैं कि "जब तुम हमें समझ जाओ और हृदयंगम कर चुको, तो हमें भी त्यागकर और आगे को..., हमसे भी आगे...., अनंत की तरफ बढ़ो!"

(१८) गुरु शरीर है या ज्ञान है?
अध्यात्म के संदर्श में "गुरु" एक सूक्ष्म, निर्गुण, निराकार "तत्त्व" (एलिमेंट या सब्सटेंस) है. यह तत्त्व हमें सूक्ष्म (कंसाईज़) तरीके से आत्मज्ञान सिखाता या सिखा सकता है. ...कभी किसी स्थूल देह के माध्यम से यदि यह तत्त्व कार्य करता है, तो वह देह सगुण (व्यक्ति रूप) गुरु कहलाती है. मेरे अनुभव के अनुसार 'निन्यानवे प्रतिशत' मामलों में केवल सूक्ष्म निराकार 'गुरु-तत्त्व' ही कार्य करता है! ...यह तत्त्व, वातावरण में सदैव एवं सहज ही उपलब्ध रहता है (जैसे मोबाइल फोन की तरंगें), ...हमें ही पर्याप्त जिज्ञासा व तड़प से अपनेआप को ट्यून करना पड़ता है जिससे हम इन्हें ग्रहण कर पाएं. आध्यात्मिक ज्ञानप्राप्ति हेतु (यानी स्वयं और भगवान् को पता करने व प्राप्त करने के लिए) जब हममें पर्याप्त जिज्ञासा और तड़प जन्म लेती है तब हम इस गुरु-तत्त्व को ग्रहण करने योग्य बनते हैं.

(१९) भगवान कहां है कोई बता सकता है क्या, और कहां रहते हैं?
बचपन से हरेक व्यक्ति ने अपने-अपने धर्म (विश्वास) की वजह से भगवान् की किसी न किसी खास आकृति या/और नाम के रूप में कल्पना अवश्य की है. बड़े होने पर कन्फ्यूजन होना स्वाभाविक है कि इतने सारे भगवान् तो होने संभव नहीं, सच्चा भगवान् आखिर है कौन सा? प्रत्येक धर्म (विश्वास) के पदाधिकारी जब अपने-अपने भगवान् को ही सच्चा भगवान् ठहराते हैं तो दिमाग और घूम जाता है!!! इस कन्फ्यूज्ड दिमाग से ही यथार्थ भगवान् की खोज शुरू होती है. ...आप भी प्रबल जिज्ञासा लेकर अपने पैरों (प्रयासों) से खोजिये, उत्तर अवश्य मिलेगा. आध्यात्मिक (मैं और भगवान् सम्बन्धी) ज्ञान की यात्रा दूसरे के पैरों से होना संभव ही नहीं! आपकी स्वयं की अनुभूति ही आपको 'पक्का' यकीन दिला सकती है कि भगवान् मायने यह...! मेरी या अन्यों की अनुभूतियाँ या ज्ञान आपको और अधिक कंफ्यूज ही करेगा, क्योंकि सबके अलग-अलग उत्तर होंगे. ...क्योंकि सच तो यही है कि कुछेक को छोडकर अधिकांश ज्ञानियों की व्याख्या अभी भी अनुभूति रहित ज्ञान से उपजी है! भगवान् को जानना है तो प्रबल इच्छा, तड़प और समर्पण भाव से आत्ममंथन व गहरे चिंतन की आवश्यकता है वो भी खुद से, बिना किसी अवलम्बन के! किसी गुरु या समझदार व्यक्ति से केवल कुछ मार्गदर्शन मिल सकता है, मंजिल नहीं! जिम-ट्रेनर या कोई कोच हमें कुछ टिप्स मात्र देता है, व्यायाम हमें खुद ही करना पड़ता है! किसी की भी कसरत से सिर्फ उसी का शरीर बलवान बनता है! ऐसा संभव ही नहीं कि जिम-ट्रेनर व्यायाम करे और सिक्स-पैक्स आपके बन जायें! आप कोई बल प्राप्त करते हैं तो उस बल को भीतर से केवल आप ही महसूस कर सकते हैं कोई दूसरा नहीं (इसी को अनुभूति कहते हैं)! माना कि यदि कोई ईश्वर को प्राप्त भी कर चुका है तो उसकी अनुभूति वह आपको कैसे करा सकता है?! अच्छे से स्मरण रहे, अध्यात्म का मूलभूत सिद्धांत है-- "जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियाँ (स्वभाव), उतने ही साधना-मार्ग!" अतः आपसे यदि कोई यह कहे कि अमुक (फलाने) मार्ग पर चलकर मैंने ईश्वर को प्राप्त किया, तो जरूरी नहीं कि उसी मार्ग से आपको भी वह अनुभूति हो सके!

(२०) प्रकृति, पुरुष और परमात्मा मे क्या अंतर है? हम स्थूल रूप में प्रकृति को ही गुरु मानते है क्योकि, हम मनुष्य की हर विज्ञान की खोज अधिकतर प्रकृति का सूक्ष्म अवलोकन कर निकाली है, क्या प्रकृति मनुष्य के वश है या मनुष्य प्रकृति के वश या सब परमात्मा के अधीन है या परमात्मा भी इस प्रकृति के अधीन है??
आदरणीय श्रीमान् जी, सादर प्रणाम. कुछ कहने से पहले स्पष्ट कर दूं कि मैंने अध्यात्म का कोई भी ज्ञान शास्त्रीय पद्धति से नहीं पाया है; अध्यात्म को जितना भी आजतक समझा है वह सब स्वयं ही गिरते-पड़ते, और वह भी विज्ञान के चश्मे से! "...(१) सॉफ्टवेयर के रूप में कोई तो ऑपरेटिंग सिस्टम या ऊर्जा इस देह के भीतर विद्यमान होती है, जिससे हमारा शरीर जिन्दा व चलायमान रहता है, अध्यात्म में जिसे आत्मा का नाम दिया गया है. ...(२) सभी देहों में समान प्रॉपर्टीज़ (गुणधर्म) के साथ आत्मा का एक ही स्वरूप विद्यमान होता है. ...(३) देह एवं मस्तिष्क (ब्रेन) तथा उसमें उपस्थित संस्कार, वृत्ति आदि प्रत्येक में (उसकी अपनी सोच और कर्म के अनुसार) भिन्न-भिन्न होती है, इसी कारण उनका आचरण, व्यवहार आदि भिन्नता लिए होता है. ...(४) बूंद रूपी इतनी सारी आत्माएं हैं, तो विशाल सागर (परमात्मा) भी अवश्य होगा, जिसमें से विलग होकर ये देहों में आई हैं! आत्मा यदि निराकार, अदृश्य और सनातन (सदैव अस्तित्व में, अविनाशी) है तो परमात्मा भी ऐसा ही होगा/है. ...(५) आत्मा की सफल अनुभूति के अतिरिक्त हमें एक बात और समझ में आती है (जिसका अनुमोदन विज्ञान भी करता है) कि हमारी पृथ्वी सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक 'सिस्टम' के अधीन है, इस सिस्टम को हम प्रकृति का सिस्टम या प्रकृति के नियम भी कहते हैं! जैसे गुरुत्वाकर्षण का नियम, क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम, ऊर्जा की अक्षुण्णता का सिद्धांत (यानी ऊर्जा नष्ट नहीं होती), ..आदि-आदि. ...(६) यह सब है तो इनका निर्माणकर्ता कोई तो अवश्य होगा (जिसको हम परमात्मा कहते हैं) अर्थात् परमात्मा की सफल अनुभूति हमें प्रकृति और उसके अकाट्य नियम व सिद्धांत कराते हैं! ...(७) परमात्मा ने समस्त ब्रह्माण्ड रचा, एक ही बार में बहुत सारे चिरस्थाई नियम-सिद्धांत बनाये (जिनको हम विज्ञान द्वारा धीरे-धीरे जान रहे हैं), मानव सहित बहुत सारे जीवों को जन्म दिया, उनकी भौतिक देहों के जीवित रहने के लिए उनके ऑपरेटिंग सिस्टम के तौर पर अपने कुछ सनातन अंशों (आत्माओं) को उनमें स्थापित किया; ...(८) सबसे बड़ी बात कि शरीरों को भौतिक और भंगुर बनाया.. ...(९) ..और मानव शरीर को कुछ ख़ास ही बनाया जिसमें उत्कृष्ट हार्डवेयर प्रयुक्त किया गया, पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कर्मेन्द्रियों के अतिरिक्त इस हार्डवेयर (देह) का एक विशिष्ट हिस्सा बहुत उन्नत ब्रेन (मस्तिष्क) भी है.., जो हमारे विचारों, संस्कारों और वृत्ति (प्रवृत्ति) का कारखाना व वेयरहाउस (गोदाम) है. हमारे अधिकतर काम और सोच आज इसी के द्वारा नियंत्रित होती है! ...(१०) परमात्मा ने यह सब रचकर, नियम-कानून (प्रकृति के सिद्धांत) बनाकर हमें स्वतंत्र छोड़ दिया (सोचने और करने की स्वतंत्रता देकर). ...(११) इसके बाद वह है..., लेकिन बंधा है अपने ही नियमों-सिद्धांतों के अंतर्गत सब होता देखने के लिए. ..वह है..., लेकिन हस्तक्षेप बिलकुल भी नहीं करता क्योंकि उसके नियम-सिद्धांत पर्याप्त हैं स्वतः न्याय होने देने के लिए. ..वह है..., उन्हीं सब गुणधर्मों के साथ, जो आत्मा के हैं, इसलिए जब भी हम कातर होकर उससे विनय-अनुनय करते हैं तो वह बदले में केवल यह कृपा करता है कि हमें आत्मा (परमात्मा) के मूल गुणों से बारम्बार परिचित कराता रहता है..., क्योंकि मात्र उन्हीं गुणों को जीवन में उतार कर (अमल करके) हम आनंदित रह सकते हैं और मोक्ष (चिरस्थाई आनंद) का अनुभव जीते जी और दैहिक मृत्यु के पश्चात् भी कर सकते हैं. .....(क्रमशः... फिर कभी)
...सार्वभौमिक रूप से विश्व में व्याप्त एवं मान्य नैतिक गुण ही परमात्मा के मूल गुणधर्म हैं (क्योंकि दुनियावी संस्कारों को एक किनारे कर देने पर प्रत्येक की शुद्ध आत्मा से भी ऐसी ही ध्वनि आती है)! परमात्मा निराकार होते हुए भी प्रकृति के रूप में व्यक्त होता है. परमात्मा के नियम-सिद्धांत आदि भी प्रकृति के जाने-अनजाने नियम-सिद्धांतों के रूप में हमारे समक्ष हैं. व्यक्ति प्रकृति के अधीन है; यदि वह प्रकृति के नियमों को सम्मान देकर उनपर चलता है तो सुख में रहता है, अन्यथा संकट में पड़ता है. परमात्मा यद्यपि रचियता है इस प्रकृति का और इससे जुड़े प्रत्येक नियम का, ...तथापि प्रकृति का "संविधान" रचने के बाद वह भी इससे बद्ध है.

(२१) यदि अंतरात्मा की आवाज़ होती है तो वे सब को सुनाई क्यों नहीं देती...?
एक जलते हुए यानी प्रकाशित बल्ब के ऊपर यदि हम एक मोटा तौलिया, कंबल या कोई आवरण डालकर उसे ढक दें, तो उस जलते बल्ब का प्रकाश अस्तित्व में होते हुए भी हमें दिखाई नहीं पड़ता या कपड़े की मोटाई के अनुसार वह प्रकाश हमें हल्का सा दिखाई पड़ता है। ...समझने के लिए बल्ब यानी आत्मा; प्रकाश यानी आत्मिक प्रकाश (आत्मा की आवाज या मार्गदर्शन); बल्ब के ऊपर आवरण यानी हमारे मन पर अंकित संस्कार (वर्तमान एवं पूर्व के भी), हमारे स्वभाव-केंद्र, हमारी प्रवृत्ति, सोच, आदि। ..इस मानसिक आवरण के कारण आत्मा के दिशा-निर्देश हमारी ज्ञानेन्द्रियों या कर्मेन्द्रियों तक नहीं पहुंच पाते और हमारे अधिकतर निर्णय या कार्य मन में विद्यमान संस्कारों के निर्देशानुसार होते हैं! ...इससे एक अन्य प्रश्न का भी उत्तर मिलता है कि "आत्मा सबकी एक परंतु सोच व कर्म अलग कैसे?" उत्तर होगा-- आत्मा सबमें एक पर आवरण का प्रकार प्रत्येक पर भिन्न-भिन्न! यही कारण है हमारी भिन्नता का!

(२२) क्यों हम अपने द्वारा किये गए हर कर्म के उत्तरदायी होते है? हम लोग अक्सर भावना के शिकार हो जाते है हमारे आपने लोग कभी कभी हमें गलत काम करने के किये विवश कर देत्ते है और कभी कभी परिस्थिति के शिकार भी हो जाते है!?
चूंकि प्रत्येक कार्य को करने के लिए फैसला हमें ही लेना होता है, तब भी यदि हम यह जानते हुए भी कोई वह कार्य करते हैं जिसको हम भलीभांति समझ रहे हैं कि वो गलत काम है, ...तो उसके उत्तरदाई पूरी तरह से हम ही होते हैं। इसमें कोई भी संदेह नहीं! ....हाँ, यदाकदा किसी आपातकाल में "धर्म" यानी 'सही' की रक्षा हेतु कोई गलत काम भी करते हैं तो वो कोई अपराध नहीं! लेकिन ध्यान रखें कि सत्य की रक्षा होते ही उस गलत काम को छोड़कर वापस हमें 'सही' मार्ग पर 'तुरंत' लौटना होगा, अन्यथा फिर हम उत्तरदाई होंगे। इसे 'आपदधर्म' भी कह सकते हैं. ..पुनः, सचेत रहें कि 'आपदधर्म' केवल 'अल्पकाल' के लिए, केवल 'धर्मरक्षा' के लिए (सत्य एवं न्याय की रक्षा के लिए) होता है, और कार्य पूर्ण होते ही उसे (आपदधर्म को) त्यागकर 'सामान्य सही मार्ग' पर तुरंत लौटना आवश्यक होता है, अन्यथा हम पाप के भागी बनते हैं!

(२३) आम जीवनयापन के अतिरिक्त जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या होना चाहिए?
आध्यात्मिक गुणों का व्यवहारिक अमल कर अच्छा इंसान और बेहतर नागरिक बनना; इसके लिए शैशवकाल से ही अच्छे लोगों और उत्कृष्ट साहित्य की संगत जरूरी।

(२४) क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, इसपर कैसे विजय पाएं...?
अबतक के विचार-मंथन से हमने मोटे तौर पर यह तो निष्कर्ष निकाल ही लिया होगा कि 'क्रोध' हमारे (यानी आत्मा के) मूल गुणधर्म का हिस्सा नहीं!!! यह एक आगंतुक संस्कार है, जब हम ऐसा समझ लेंगे तो धीरे-धीरे उसपर नियंत्रण पा लेंगे. ...बड़ा हठी होता है 'क्रोध', लेकिन है तो अनचाहा आगंतुक ही, ...तो निपटा जा सकता है उससे जैसे हम अपने घर में घुस आए किसी अनचाहे उचक्के आततायी से निपटते हैं. ...एक अन्य उपाय-- ...जैसे निरंतर प्रकाश के सान्निध्य में रहकर हम अंधकार से दूर रह सकते हैं वैसे ही अच्छी संगति, अच्छे विचारों और आत्मा के करीब रहकर हम क्रोध से परे रह सकते हैं.
उपरोक्त प्रयास हम पहले स्वयं करें तदोपरांत इसके लिए पर्याप्त जनजागृति भी करें तो हमारे समाज में आत्मिक गुण बढ़ेंगे, फलतः हिंसा व अपराध भी कम होंगे.

(२५) क्रोध से बचने का क्या उपाय है?
सात्त्विक विचारों के सान्निध्य में सतत रहना ही क्रोध को टालने या नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय है, जैसे कोई दीपक प्रज्जवलित करने पर ही अंधकार का नाश संभव होता है.

(२६) क्या कारण है हम हमेशा सही होते है और दूसरे गलत?
हमारा "अहंकार" ही हमें हमेशा यह बताता और जताता है कि दूसरे गलत या हीन हैं और केवल हम ही श्रेष्ठ! आध्यात्मिक (धार्मिक) जगत में भी यह बीमारी बहुत है.

(२७) सुखी होने का मूल मंत्र क्या है?
आत्मा और आत्मा के गुणों को खोजते रहें, उन्हें जानते-पहचानते रहें, ...फिर सबसे बड़ी बात कि उनपर अमल भी करते चलें। अवश्य ही हम खरा सुख प्राप्त करेंगे ही।

(२८) भगवान में न्याय और कृपा- दोनों पूरे-के-पूरे हैं, वे कृपा करते ही रहते हैं, कृपा करना उनका स्वभाव है! हम उन्हें दोषी क्यों बनाते हैं?
हम मूर्ख और मूढ़बुद्धि हैं इसीलिये! ..यह बात नहीं कि ईश्वर के बारे में पता नहीं हमको, फिर भी.....!! ..शायद ईश्वर और ईश्वर निर्मित प्रकृति के अकाट्य नियमों पर हमारा विश्वास खोखला है, और ईश्वर के तथाकथित ढोंगी मीडिएटर्स पर हम कुछ ज्यादा ही आश्रित हैं!

(२९) सकारात्मक कर्म नकारात्मक को काटता है?
नहीं, एक-दूसरे से कटते नहीं है! सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के कर्मों के फल कर्म की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग प्राप्त होते हैं। अच्छे के बदले अच्छा, और बुरे के बदले बुरा! ...दोनों का खाता अलग-अलग होता है।

Tuesday, July 18, 2017

(८१) नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों और वैवाहिक संबंधों में सादृश्यता

(१) नौकरियों में आजकल एक अच्छी प्रथा है कि "एक व्यक्ति - एक पद"। अर्थात् व्यक्ति केवल एक ही जगह या एक ही पद पर कार्य कर सकता है, क्योंकि एक से अधिक जगह कार्य करने पर निष्ठा एवं हितों का प्रभावित होना संभव होता है।
* अतीत में विवाह संस्कार (प्रथा) का जन्म भी कदाचित् इसी दृष्टिकोण के साथ हुआ होगा!

(२) एक ही समय में एक से अधिक स्थानों पर कार्य करने से या एक से अधिक व्यक्तियों के लिए कार्य करने से परस्पर निष्ठा एवं हितों के टकराव के अतिरिक्त, अनेकों मतभेद भी जन्म लेते हैं, जिनकी परिणति भयंकर कलह और कोर्ट-कचहरी भी हो सकती है। फलतः मन की शांति, सम्मान और साख पर विपरीत असर पड़ सकता है।
* अनेक से दैहिक अन्तरंग सम्बन्ध बनाने का भी यही परिणाम होता है। यहां स्पष्ट कर दूं कि स्वस्थ मित्रता एक चीज है और दैहिक अन्तरंग सम्बन्ध एक दूसरी चीज। स्वस्थ मित्रता छुपानी नहीं पड़ती, जबकि चलन या प्रथा विरुद्ध बनाया गया कोई भी अन्तरंग सम्बन्ध छुपाने की कोशिश रहती है।

(३) किसी नौकरी में व्यक्ति, नियोक्ता को कुछ (श्रम) देता है और बदले में नियोक्ता उस व्यक्ति को कुछ (वेतन) देता है। उस रिश्ते में दोनों के स्वार्थ के साथ उनके हित भी शामिल रहते हैं। कोई व्यक्ति यदि छुपकर चोरी से समानांतर रूप से किसी अन्य नियोक्ता के लिए भी कार्य करता है तो व्यक्ति आवश्यकता से अधिक स्वार्थी, लालची एवं कमजोर चरित्र का माना जाता है।
* जीवनसाथी के अतिरिक्त किसी अन्य से दैहिक अन्तरंग सम्बन्ध रखने के मामले में भी यही बात खरी उतरती है।

(४) किसी नियोक्ता और उसके साथ जुड़े व्यक्ति के आपसी सम्बन्ध तब तक मधुर और स्थाई बने रहते हैं जब तक कि वे दोनों एक-दूसरे की भावनाओं और आवश्यकताओं की कद्र करते हैं।
* ऐसा ही कुछ ध्यान रखने पर वैवाहिक सम्बन्ध भी अटूट रहते हैं।

(५) नियोक्ता या कर्मचारी में से किसी एक के भी अधिक स्वार्थी या अवसरवादी या लोभी होने पर उनका सम्बन्ध टूटता है।
* वैवाहिक रिश्तों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है।

(६) वेतन एक से और काम किसी अन्य के लिए करना, या किसी से काम लेना और वेतन किसी अन्य को देना; ऐसा बिलकुल भी नहीं चलता। जाहिर (प्रकट और वैध) रिश्ता एक पल में टूट जाता है!
* इसी प्रकार अन्तरंग सम्बन्ध किसी से और विवाह किसी अन्य से, या फिर एक से विवाह और अन्य से अन्तरंग सम्बन्ध; यह बिलकुल भी नहीं चलता। चलेगा तो छुपकर; और भेद खुलने पर उन्हें स्वार्थी, लालची एवं कमजोर चरित्र का माना जायेगा और वैध रिश्ता टूटेगा अथवा उसमें भारी दरार पड़ेगी।

कुछ और मिली-जुली बातें--
दोस्ती और रिश्ता (फ्रेंडशिप और रिलेशन) दोनों अलग-अलग चीजें हैं। दोस्ती माने स्वस्थ मित्रता। खरी दोस्ती सामान्यतः किसी स्वार्थ अथवा भौतिक या दैहिक लालच पर नहीं टिकी होती। इसीलिए दोस्ती से बड़ा कुछ नहीं, इसीलिए दोस्ती अनेकों से की जा सकती है, दोस्ती लिंगभेद से परे होती है।
हम मनुष्य इतने विशाल हृदयी नहीं कि स्वार्थों से परे रह पाएं, और इतने समर्थ भी नहीं कि आवश्यकताएं ही न हों। तो विभिन्न भौतिक स्वार्थों और आवश्यकताओं की गरिमापूर्ण ढंग से पूर्ति के लिए हमारे पूर्व नीति-नियंताओं ने अतीत में कुछ सामाजिक व्यवस्था बनाई। इसी व्यवस्था के अंतर्गत रिश्तों का जन्म हुआ, उन्हें कुछ नाम दिए गए, जैसे माँ, पिता, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन, पति, पत्नी आदि-आदि।
प्रेमी-प्रेमिका भी एक प्रकार का रिश्ता ही है, किन्तु अतीत के उदाहरण उठाकर देखें तो यह रिश्ता अस्थाई ही माना गया है। भविष्य में इसकी परिणति विवाह-सम्बन्ध के रूप में हुई है या तो यह टूटा है। और यदि आगे चला है तो छुपकर ही, एक अवैध सम्बन्ध के रूप में!
समाज-व्यवस्था बनाये रखने के निमित्त निर्मित किये गए इन रिश्तों के बीच दोस्ती या स्वस्थ मित्रता सदा से अस्तित्व में रही है। इसको सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, तभी तो ऐसे कहा जाता है-- "मैं तुम्हारा पिता हूँ, लेकिन इससे पहले मैं तुम्हारा दोस्त हूँ"; "मैं आपकी पत्नी हूँ लेकिन इससे पहले एक अच्छी दोस्त हूँ"; "तुम मेरी माँ कम और दोस्त ज्यादा हो"। दोस्ती की महिमा का बखान करने वाले ऐसे वाक्य अक्सर सभी रिश्तों के मध्य नजर आते हैं।

कोई वेतनभोगी कर्मचारी भी अपने किसी निहायत खाली समय में, नियोक्ता के प्रति बिना किसी निष्ठा या हित के टकराव की कीमत पर, बिना किसी स्वार्थ या लालच के किसी अन्य को कोई सलाह देता है या किसी अन्य के काम में कोई मदद करता है तो इसमें उसके नियोक्ता को कोई भी आपत्ति नहीं होती।
ठीक इसी प्रकार का संतुलन हमें रिश्तों और दोस्ती के बीच भी बनाना चाहिए। अर्थात् किसी रिश्ते को किसी अन्य की दोस्ती से अधिक वरीयता देनी चाहिए। दोस्ती करें लेकिन रिश्ते की कीमत पर नहीं; क्योंकि प्रत्येक रिश्ता एक विशेष उद्देश्य से बना है, उसमें कुछ करार (नियम, शर्तें, अनुबंध) है।

क्या ही अच्छा हो कि हम प्रत्येक रिश्ते में दोस्ती को भी घोल दें। लेकिन हम मानव हैं, ऐसा कर न पायेंगे! यदि ऐसा संभव हो गया तो फिर जरूरत पड़ने पर कोई भी व्यक्ति किसी भी नियोक्ता का कोई भी काम कभी भी कर दिया करेगा; और आवश्यकता पड़ने पर किसी भी नियोक्ता से अपनी जरूरतों के लिए कितना भी धन ईमानदारी से ले लेगा!! ऐसा होना तो असंभव ही दीखता है! परस्पर सम्पूर्ण निःस्वार्थता और ईमानदारी स्थापित होना बहुत दूर की कोड़ी है! इसीलिए हमारे पूर्वजों ने कुछ समाज-व्यवस्था बनाई और उसके अंतर्गत रिश्ते-नाते बने; जिसके कारण लोग परस्पर एक सभ्य, गरिमामय और सौहार्दपूर्ण वातावरण में रह पाते हैं, अन्यथा अनाचार फैलते देर न लगती!
फिर भी देखा जाता रहा है कि इस सब सामाजिक व्यवस्था के बावजूद भी अनाचार अपना सिर उठाता रहा है। आज के दौर में लिव-इन कल्चर एवं विवाहेत्तर अन्तरंग सम्बन्ध पनप रहे हैं। बहुधा ये सम्बन्ध चोरी-छुपे ही बनाये जाते हैं। छुपकर वही काम किया जाता है, जो गलत हो! कुछ तथाकथित बोल्ड लोग खुलेआम इन संबंधों का प्रदर्शन करते हैं और इन संबंधों में कोई बुराई नहीं समझते। लेकिन तटस्थ और गहरी समझ से इन संबंधों को निहारा जाये तो पायेंगे कि इनके पीछे स्वार्थ, वासना, लोभ आदि संलग्न रहते ही हैं। रिश्तों की प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के विपरीत इन संबंधों में कोई गहरा आत्मीय करार नहीं होता है। अतः कुछ ही आगे चलकर निष्ठा एवं हितों का जबरदस्त टकराव सामने आता है; फलस्वरूप अवसाद, लड़ाई-झगडा, जग-हंसाई आदि के साथ-साथ चरित्र की दुर्बलता उजागर होती है। सम्बंधित स्त्री-पुरुष या तो पशुवत तामसिक प्रवृत्ति का हो जाता है या फिर अवसादग्रस्त! लगभग असंभव ही है कि किसी के हितों का नुकसान हुए बगैर, निःस्वार्थ और विशुद्ध दोस्ती के वातावरण में लिव-इन या विवाहेत्तर सम्बन्ध खुलेआम 'चिरकाल' के लिए बने रह सकें! इति।

Thursday, July 6, 2017

(८०) गुरुपूर्णिमा विशेष

'गुरु' शब्द का सबसे सरल अर्थ है कि जो भी हमें कुछ सीख दे वो गुरु है। जिस पल हमें जिससे भी कोई सीख मिलती है, उस पल वह हमारा गुरु है। माता-पिता, भाई-बहन, नाते-रिश्तेदार, समाज, अध्यापक, ये सभी हमारे लिए गुरु ही हैं। जीवन में घटने वाले प्रसंग भी हमें कुछ सिखाते हैं, तो वे भी एक प्रकार से हमारे गुरु ही हुए।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से हम मूलतः एक सूक्ष्म तत्त्व (आत्मा) हैं, जो एक स्थूल देह (भौतिक शरीर) में प्रवास करता है। वैसे तो प्रत्येक आत्मा सम्पूर्ण ज्ञान से सराबोर है या यूं कहें कि पहले से ही सीखी-सिखाई है, फिर भी इस पर 'अविद्या' का आवरण चढ़ा होता है जिसके कारण उसके ज्ञान से व्यक्ति वंचित ही रहता है। 'अविद्या' मात्र एक शब्द है समझने के लिए। 'अविद्या' अर्थात् उस मनुष्य का मन, चित्त (अंतर्मन), बुद्धि और अहंकार। व्यक्ति के अंतर्मन में जन्म-जन्मान्तर के संस्कार, तीव्र इच्छाएं, रूचि-अरूचि केंद्र, स्वभाव केंद्र, विशेषताओं के केंद्र, लेन-देन केंद्र आदि इस जन्म के आरंभ से ही विद्यमान रहते हैं। जन्म पश्चात् ये सब चीजें आत्मा के इर्दगिर्द अपना मकड़जाल पहले से ही फैलाए होती हैं, भले ही आरंभ में ये सब सुप्तावस्था में ही होती हैं! इस आवरण के कारण हमारी इन्द्रियों को आत्मा रूपी ज्ञान-स्रोत से ज्ञान का प्रकाश बहुत कम (लगभग नगण्य) ही मिलता है। बाद में शिशु के बड़ा होते-होते उसके मन पर इस जन्म के संस्कार (सीखें) भी अंकित होना शुरू होते हैं। कुछ वर्तमान कारणों से और कुछ प्रारब्ध के कारण इस समय जैसी परिस्थितियां समक्ष आती हैं या बनती हैं, वे सोये हुए पूर्व संस्कारों के लिए पोषक वातावरण उपलब्ध कराती हैं, फलतः वे संस्कार भी आयु बढ़ने के साथ-साथ शनैः शनैः जाग्रत होना आरंभ कर देते हैं। इस जन्म में निर्मित संस्कार और पूर्वजन्मों के संस्कार दोनों मिलकर व्यक्ति के वर्तमान व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
इस दौरान व्यक्ति को बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता पड़ती है। इस क्रम में बहुत से माध्यमों से वह सीख प्राप्त करता है। जिससे भी वह सीख प्राप्त करता है, शाब्दिक रूप से उसे 'गुरु' की संज्ञा दी गयी है।
जैसे मनुष्य मूलतः एक सूक्ष्म तत्त्व है, ठीक वैसे ही 'गुरु' भी मूलतः एक सूक्ष्म तत्त्व ही है। कभी वह अदृश्य सूक्ष्म ज्ञान स्पंदनों के रूप में कार्य करता है, तो कभी वह स्थूल देह (जीव, मनुष्य अथवा प्रसंग) से आने वाले मार्गदर्शन के रूप में कार्य करता है। जब हममें जिज्ञासा अपने चरम पर होती है तो गुरु-तत्त्व सूक्ष्म रूप से कार्य करता है और बहुत शीघ्र सिखाता है। इसका एक रोचक उदाहरण-- विद्यालय की परीक्षाओं के दिनों में जब घर में पढ़ते समय किसी प्रश्न का अर्थ या गणित के किसी सवाल का जवाब नहीं सूझ रहा होता है, तो उसके हल के लिए हम बहुत व्यग्र हो जाते हैं; फिर अचानक शौच या स्नान या निद्रा (अर्धनिद्रा) के समय अनायास ही हमें उसका हल मिल जाता है। किसी व्यक्ति ने तो आकर हमें उसका हल बताया नहीं, फिर कैसे मिल गया अचानक?! हमारी तीव्र जिज्ञासा के कारण ऊपर लिखी अवस्थाओं में हम वाह्य जगत से कट गए और उस प्रश्न पर पूरी तरह से केन्द्रित हो गए, तो हमारे लिए उपलब्ध आन्तरिक एवं वाह्य, सभी सूक्ष्म ज्ञान-स्रोत सक्रिय हो गए और हमें हल मिल गया! अब यह कहना बहुत मुश्किल कि हल भीतर के ज्ञान-स्रोत (आत्मा) से मिला या फिर बाहरी किसी सूक्ष्म ज्ञान-केंद्र से! प्रत्यक्ष में सिद्ध न हो सकने वाली वास्तविकता तो यह है कि सभी आत्माएं सूक्ष्म रूप से एक ही हैं या परस्पर सम्बद्ध हैं; आवश्यकतानुसार या परिस्थिति-अनुसार हमें योग्य स्थान से योग्य मार्गदर्शन (सूक्ष्म अथवा स्थूल में) मिल जाता है, शर्त यह कि हम पूरी तरह से जिज्ञासु हों!
यूं तो मान्यता यही है कि इसी गुरुतत्त्व को पूजने हेतु, कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु गुरुपूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है, पर इसमें इतना अवश्य जोड़ना चाहूंगा कि प्राचीन गणनाओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु-तत्त्व अत्यधिक सक्रिय होता है (विशेषकर सूक्ष्म स्तर पर)। अतः इस दिन गुरुतत्त्व के प्रति पूरी तरह से समर्पित होकर सम्पूर्ण श्रद्धाभाव से जब हम दिन व्यतीत करते हैं (ऊपर से दिखने में रोजाना की तरह ही, पर भीतरी रूप से भाव से ओतप्रोत), तो गुरुतत्त्व अन्य दिनों की अपेक्षा इस दिन सूक्ष्म अथवा स्थूल रूप से हमारी कई गुना अधिक मदद करता है। हमारा भाव एवं समर्पण, सक्रिय गुरुतत्त्व के हमतक सुगम संचरण के लिए पोषक वातावरण तैयार करता है। गुरुतत्त्व से मिलने वाली मदद या सीख का सबसे बड़ा परिणाम यह होता है कि हमारे आत्मा पर ढका आवरण धीरे-धीरे नष्ट होता है, और इसके कारण अब हमारी ज्ञानेन्द्रियों-कर्मेन्द्रियों को धीरे-धीरे अविद्या के स्थान पर आत्मा से शुद्ध ज्ञान-प्रकाश मिलना आरंभ होता है। हम आध्यात्मिक रूप से उन्नत होते जाते हैं। भौतिक जगत अब हमारे लिए पहेली नहीं रह जाता और न ही अपनी चकाचौंध से हमें हैरान कर पाता है। पर्याप्त सीख हासिल करने के पश्चात् हम एक सहज और खुशनुमा जीवन जीते हैं, हमारे अधिकतर निर्णय भले और न्यायोचित होते हैं। हमें जीवन का अर्थ बखूबी समझ में आ जाता है। विभिन्न धर्म (पंथ) और धर्म-संस्कृति सम्बन्धी वाद-विवाद हमारे लिए गौण हो जाते हैं। पश्चात् हम भगवा चोला पहनकर साधू-सन्यासी नहीं बन जाते बल्कि औरों की तरह सामाजिक जीवन ही जीते हैं। कमाते भी हैं, खर्च भी करते हैं, बचाते भी हैं; वैवाहिक जीवन भी व्यतीत करते हैं; माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी भी बनते हैं; लेकिन इन सब क्रियाओं के दौरान भीतरी रूप से हम कुछ अलग से होते हैं- बिलकुल सहज और मस्त! भविष्य की चिंता व प्रारब्ध से शिकायतें भी न्यूनतम हो जाती हैं। क्योंकि हम यथार्थ रूप से धर्म-ज्ञान (right knowledge) और धार्मिकता (righteousness) को प्राप्त कर लेते हैं। इति।

Wednesday, July 5, 2017

(७९) एक पोस्ट पर की गई टिप्पणी

आपने लिखा, "...मोदी सरकार की कमियां गिनाने वाले ऐसे भी हैं जिन्हें ये भी पता नहीं कि भारतीय संविधान में कितनी विसंगतियां और पेचीदगियां हैं जिनका लाभ लेकर अब तक भारतीय प्रजातन्त्र और प्रजा दोनों से सिर्फ खिलवाड़ ही हुआ है और कुछ संवैधानिक संशोधनों के बिना देश हित के सभी कार्य कर पाना वह भी शीघ्रता से, एक प्रधान के लिए सम्भव ही नहीं है!"

इस पर मेरा विचार यह है कि व्यवस्था संबंधी जितने भी संवैधानिक नियम-कानून अभी अस्तित्व में हैं, ..यदि उनमें से 50% पर भी शासन-प्रशासन द्वारा ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से अमल हो जाये, तो आम जनता के लिए यह बहुत राहत की बात होगी। ..और यदि मौजूदा कानून-नियमों पर 100% अमल ईमानदारी से हो जाये तो फिर तो जनता ईश्वरीय-राज्य में होने का अनुभव करेगी।
हमारे नियम-कानून इतने भी कमजोर नहीं कि वर्तमान अव्यवस्था का समस्त ठीकरा हम उन पर फोड़ें, ..या उनके कमजोर होने का हवाला देकर अपनी नाकामयाबियों को छुपाएं!
वास्तव में सच तो यह है कि प्रधान और उनके मुख्य सलाहकार लोकहित की दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं रखते, येनकेन-प्रकारेण सत्ता को लंबे समय तक कायम रखने की महत्त्वाकांक्षा पाले हुए हैं, अपनी व्यक्तिगत सोच को ही सर्वोपरि मानते हैं, जब दूसरों को सुनने-समझने की वृत्ति ही नहीं तो फिर कल्पनाशीलता का भी अभाव है, ...और इन सब कमियों के कारण अच्छे शिल्पकार बनने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं (एक प्रधान, देश और समाज को गढ़ता ही है और उसकी भूमिका एक शिल्पकार की ही होती है)।
इच्छाशक्ति और कौशल के परिणाम का एक उदाहरण देता हूं--
आपने पुरानी प्रसिद्ध इमारतें जैसे ताजमहल, फतेहपुर सीकरी, विभिन्न प्राचीन महल और किले, अंग्रेजों के शासनकाल में दुर्गम पहाड़ियों पर बना कालका से शिमला का रेलपथ, इत्यादि को देखा होगा।
बारीकी से इनका निरीक्षण, तत्पश्चात तटस्थ चिंतन करें तो पाएंगे कि उस काल में आज सरीखी तकनीक, क्रेन, बुलडोजर, लिफ्ट, जेसीबी मशीन आदि न होते हुए भी तत्कालीन शिल्पियों ने अपनी इच्छशक्ति, कल्पनाशीलता और ईमानदारी से किये गए श्रम की बदौलत ऐसे निर्माण कर दिखाए, जो आज सभी निर्माण-सुविधाओं के होते हुए भी संभव नहीं हैं। आज के भारतीय आर्किटेक्ट या इंजीनियरों को यदि वैसे निर्माणकार्य की चुनौती दी जाए तो वे किसी न किसी कमी या अभाव का बहाना बनाकर उस बीड़े को नहीं उठाएंगे! क्योंकि अक्षम व्यक्ति ही कार्य से बचने के लिए विभिन्न बहाने या कारण खोजता है।
अपने ही शहर में देखता हूं कि हाल ही के कुछ सालों में बनी सरकारी इमारतें अनेकों तकनीकी कमियां रखती हैं और उनका क्षय होना भी आरम्भ हो चुका है!
तो बहाने तो कमजोर व अक्षम लोग ही बनाते हैं। कर्मठ तो उपलब्ध साधनों-संसाधनों के साथ ही सामंजस्य बैठाकर मंजिल पा लेते हैं (वीर अब्दुल हमीद की कहानी यदि याद न हो तो इंटरनेट पर ढूंढ कर पढियेगा)।
एक बात और कि साहसी, विवेकवान और न्याय-पसंद प्रधान, लोकहित में संशोधित या नए कानून भी शीघ्र बना सकते हैं। शीघ्र बना सकने के सामर्थ्य के दो मूल कारण-- 1. संसद में प्रचंड बहुमत होना, 2. लोकहित यदि वास्तव में निहित हो तो फिर समाज और प्रजा से भी प्रचंड सहमति, सहयोग और समर्थन मिलना।
जब यह दोनों साथ में हैं तो फिर क्या गड़बड़ है कि आपने प्रधान के हाथ बंधे होने का हवाला दिया। किसी निज स्वार्थसिद्धि की तमन्ना हो तभी असली कर्म व राष्ट्र का विकास बाधित होता है, और अनेकों एक्सक्यूज़ देता है फिर व्यक्ति।
जितने कानून-नियम हैं अभी, और जितना बहुमत है सदन में, और जितना विशाल जनसमर्थन है अभी..., ऐसा सौभाग्य दोबारा मिलना अत्यंत मुश्किल! तो शिकायतों और कमियों और बेबसी को दर्शाना बंद कीजिये, और लग जाइये भ्रष्टाचार को ढहाने में, सुराज की स्थापना करने में।
ऐसी सुखद स्थिति में भी आपने यदि स्वार्थों के चलते कुछ ठोस न किया तो यह बहुत दुखद होगा।
आपके पास इस समय सबकुछ है। आवश्यकता है तो इच्छाशक्ति और ईमानदारी की।

Friday, June 30, 2017

(७८) बुजुर्गों के साथ संतानों का व्यवहार

अक्सर बहुत सी शिकायतें होती हैं हमें! ...कुछ अपने भाग्य से, कुछ वर्तमान समय से और कुछ अपनी संतानों या नई पीढ़ी के व्यवहार से। कुछ दिन पूर्व सोशल मीडिया पर इन्हीं शिकायतों से सम्बंधित किसी के तीन दुखड़े पढ़े-
(१) "आज की पीढ़ी बहुत समझदार हो गयी है। आज लोग अपनी सुविधा और उपयोग के हिसाब से रिश्तों का मूल्यांकन करते और निभाते हैं। समय और उपयोगिता के हिसाब से रिश्ते निभाने का गणित बदलता रहता है। जो रिश्तों की इस गणित को नहीं समझता या उचित नहीं मानता, उसे दुखी होना ही पड़ेगा या फिर उसे रिश्ते खारे लगेंगे या फिर वह सब से कटकर ही रह पाएगा। बुजुर्गों की अहमियत इसीलिए खत्म होती जा रही है, वृद्धाश्रम की जरूरत इसीलिए बढ़ गयी है।"
(२) "माता को मंदिरों में पूजने से पहले अपने घर में अपनी माता को तो देखें कि उसे कोई तकलीफ तो नहीं है। वह खुश है न? यदि हम उसकी सुध नहीं ले सकते, वह प्रसन्न नहीं है तो दुनिया के किसी मंदिर में, किसी माता को हम प्रसन्न नहीं कर सकते और उसकी कृपा या आशीर्वाद प्राप्त नहीं कर सकते।"
(३) "लोग कहते हैं कि जब कोई अपना दूर चला जाए तो तकलीफ होती है। परन्तु असली तकलीफ तब होती है जब कोई अपना पास होकर भी दूरियां बना ले।"

यहाँ शिकायत मुख्यतः अपनों से है। ...और अपने भी वे, जो शिकायतकर्ता की अगली पीढ़ी के हैं।

मेरा दृष्टिकोण -- यदि किसी भी स्थिति (हालात) पर तटस्थरूप से दृष्टिपात किया जाये तो हम पायेंगे कि कोई भी स्थिति अकारण नहीं उपजती। उसके मूल में कोई तो कारण अवश्य होता है। और यदि वह स्थिति हमसे भी सम्बंधित है तो उस स्थिति के उपजने के मूलभूत कारणों में से एक, हम भी हैं। और यदि वह स्थिति (हालात) व्यक्तिगत रूप से सिर्फ मेरे से ही सम्बंधित है तो उस स्थिति का मूलभूत कारण भी मुख्यतः मैं स्वयं ही हूँ!
ईश्वर या प्रकृति के इस अनोखे ब्रह्माण्डीय सिस्टम में सबकुछ क्रमबद्ध है, अटल है। मनुष्य रूप में हर व्यक्ति निरंतर कुछ बोता रहता है और कुछ काटता रहता है। बीज के अनुसार ही फसल का निर्माण होता है। विज्ञान भी इस बात पुष्टि "क्रिया-प्रतिक्रिया" के सिद्धांत द्वारा करता ही है। प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया तो अवश्यंभावी है। हाँ, प्रतिक्रिया त्वरित या विलंबित हो सकती है, उसका स्वरूप भी बदल सकता है। लेकिन इस त्वरित या विलंबित या बदले स्वरूप की सटीक गणना व व्याख्या करना तो विज्ञान के लिए भी संभव नहीं है।
अर्थ यह कि, व्यक्ति को उपरोक्त सिद्धांत और सिस्टम पर पूरा भरोसा रखकर समस्त कर्म करने चाहियें। जिस दिन जिस व्यक्ति का विश्वास इस सिद्धांत पर जम जायेगा, उस दिन से उसके तो अच्छे दिन आने शुरू हो जायेंगे!
अच्छे दिनों से अर्थ यह कि, चिंता से और शिकायत से मुक्ति। सैद्धांतिक रूप से बलिष्ठ होते ही हमारे द्वारा बोये जाने वाले बीजों की गुणवत्ता का हम खास ध्यान रखेंगे, खेत की मिट्टी को भी सुरक्षित तरीकों से उपजाऊ बनायेंगे, क्योंकि अब हम अच्छे से जानते हैं कि आने वाली फसल की गुणवत्ता हमारी इसी सचेतना पर निर्भर है। सिस्टम हमें अच्छे नतीजों के लिए पूर्णतया आश्वस्त करता है। हममें से लगभग सभी इस बात को जानते हैं लेकिन इस सिद्धांत पर विश्वास रखकर अपने समस्त कर्म कितने करते हैं! सिस्टम को धोखा देकर बच निकलना असम्भव ही है!
और जब हम सिस्टम की अपेक्षाओं के अनुसार स्वतः ही खरे कर्म करने लगते हैं तो कुछ समय पश्चात् हमारे साथ बहुधा अच्छा ही घटित होने लगता है। बुरा भी घटित होता है, लेकिन जब बुरा घटित होता है तो हम तुरंत समझ जाते हैं कि यह कोई ईश्वर का प्रकोप नहीं, किसी की बुरी नजर नहीं, दुर्भाग्य नहीं; बल्कि यह तो हमारे द्वारा अतीत में बोये गए किसी गलत बीज की कड़वी फसल है जो हमें कुछ विलम्ब से प्राप्त हुई!
हम कमजोर मानवों का यह स्वभाव होता है कि हमें कोई भी दुःख बहुत बड़ा लगता है और बड़े से बड़े सुख को कुछ ही क्षणों में बिसरा देते हैं। या फिर कभी ऐसा भी करते हैं कि जैसे किसी दुर्घटना में जान बाल-बाल बची तो उसका श्रेय अपने द्वारा किये पुण्यों को देते हैं; और जब कभी कुछ दुखद हो जाये तो कारण या दोष किसी अन्य में ढूंढते हैं! यानी हम ऐसा समझते हैं कि अच्छा तो अपने कारण हुआ और बुरा किसी अन्य के कारण!!! जबकि वास्तविकता यह है कि अच्छा भी अपने कारण होता है और बुरा भी अपने ही कारण (बात जब व्यक्तिगत स्तर की हो तब)।
अब समझ में आ रहा होगा कि कुछ बच्चे या नौजवान अपने माँ-बाप को क्यों नहीं पूछते! यह पूर्व की किसी गलत क्रिया के बदले में आयी एक दुखद घटना है! कोई अपरिचित भी मुझे यूं ही गाली देता है तो प्रथम प्रश्नचिह्न मुझे स्वयं खुद के ऊपर लगाना चाहिए कि यदि वह पागल नहीं तो अकारण तो वह मुझे गाली नहीं देगा!
मूलतः बच्चों को इस अपेक्षा, आशा या स्वार्थ के साथ पालना ही गलत है कि बड़े होकर वे हमारा ध्यान रखेंगे। प्रत्येक उस पुण्य का मीठा फल अवश्य मिलता है जो असली हो; लेकिन असली पुण्य तो वह है जो निःस्वार्थ हो। स्वार्थ की भावना रखकर किया गया लालन-पोषण बच्चे में भी स्वार्थ-रूप में प्रतिबिंबित होगा। और यदि आप स्वार्थ से पूर्णतया परे रहे तो भी संतान ने दुःख पहुँचाया तो अवश्य ही यह पूर्व की किसी अन्य गलत क्रिया की परिवर्तित अवस्था में आयी एक कड़वी प्रतिक्रिया है।
अच्छा तो हो कि हम अपना ध्यान मात्र नौनिहालों के चरित्र निर्माण पर, उनके अच्छा नागरिक और विशाल हृदयी बनने पर केन्द्रित करें, वह भी किसी बड़े लक्ष्य हेतु, जो केवल हमसे सम्बद्ध न होकर समष्टि (सम्पूर्ण मानवजाति) के हित से सम्बंधित हो। हमारा हित तो यह ईश्वरीय सिस्टम बोनस में साध देगा।
हमारा ध्येय सर्वश्रेष्ठ संस्कार प्रथम स्वयं धारण कर, तदुपरांत उन्हें अमल में लाते हुए अपने नौनिहालों को भी उनके लिए प्रेरित करना होना चाहिए। हम उन्हें संस्कारवान या धर्मनिष्ठ (righteous) बनाने की भरसक कोशिश करें पर जिद नहीं कि उनसे किसी तरह वो काम करवा ही लें। अर्थात् हम अपना सर्वश्रेष्ठ से भी आगे का प्रयास करें, पर बलात् थोपने की कोशिश न करें। हमने यह किया तो मानों हमारा कर्म (सिखाने का) पूर्ण हुआ, अब आगे संतान का कर्म और उसका भाग्य यानी उसके पूर्व कर्मों का लेखा। अब स्वविवेक तथा वर्तमान में पाई शिक्षा एवं संस्कारों की मदद से अपने कर्म को उसे स्वयं ही निर्धारित करना है, ...और इस कर्म की मदद से अपने भाग्य से भी आगे उसे स्वयं ही जूझना है; पर हर दशा में, लेकिन सही दिशा में उसका सहयोग करना अभिभावक का कर्तव्य-कर्म होता है।
हमें हमारे कर्तव्य-कर्म देखने और करने हैं केवल, ...स्वयं करके संतान को भी कर्तव्य-कर्म का पाठ पढ़ाना है लेकिन अपने स्वार्थ के लिए संतान से कर्तव्य-कर्मों की अपेक्षा नहीं करनी है। हमारी शिक्षा में गहराई और दम होगा तो हमारा खयाल किसी न किसी माध्यम से यह ईश्वरीय सिस्टम स्वयं रख लेगा। इति।

Friday, May 19, 2017

(७७) भ्रष्टाचार का वायरस

पिछले दिनों मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने वर्तमान में समक्ष खड़े कुछ ज्वलंत सवालों या मुद्दों को सोशल मीडिया पर उठाया। ये मुद्दे हैं -- भ्रष्टाचार, आरक्षण के नुकसान, संविदाकर्मियों का दुखड़ा, सरकारी शिक्षकों की अकर्मण्यता, चिकित्सा सेवाओं के हाल-बेहाल, किसानों की कर्जा माफी, महंगाई, नोटबंदी, आतंकवाद, अलगाववाद, महिला आरक्षण बिल।

अभी हम इन उपरोक्त मुद्दों में से प्रथम यानी "भ्रष्टाचार" को ही लेते हैं, क्योंकि मेरे हिसाब से "भ्रष्टाचार" शब्द के अर्थ की परिधि बहुत बड़ी है और इसमें हमारे समाज के लगभग सभी दुर्गुण समाहित हो जाते हैं।
"भ्रष्टाचार" अर्थात् "भ्रष्ट आचार" अर्थात् भ्रष्ट आचरण या भ्रष्ट चालचलन या भ्रष्ट प्रबंधन या भ्रष्ट नीति या भ्रष्ट आचारसंहिता या भ्रष्ट दस्तूर या भ्रष्ट सलूक या भ्रष्ट नियम-कानून या भ्रष्ट अनुष्ठान या भ्रष्ट कार्यवाही। अंग्रेजी में "भ्रष्टाचार अर्थात् "corruption" अर्थात्-- CORRUPTED conduct, ethics, manners, customs, ethos, moral, praxis, proceeding, rules of conduct, deportment, behaviour, law, law and order, principle, rite, etc.

कंप्यूटर में जब कोई वायरस घुसकर फाइल्स को करप्ट करना शुरू करता है तो हम एंटीवायरस की मदद लेते हैं। लेकिन एंटीवायरस को परास्त कर वह वायरस यदि सिस्टम की लगभग सभी फाइलों को corrupt कर देता है तो हम संकट में पड़ जाते हैं और हमें बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। अंततः समस्त डाटा को धो कर कंप्यूटर के सॉफ्टवेर का पुनर्निर्माण (reinstallation) करना पड़ता है। बाद में हम अपेक्षाकृत अधिक तगड़ा एंटीवायरस डालते हैं। पर क्या हम आंख मींचकर इस नए एंटीवायरस पर विश्वास कर सकते हैं?? शायद नहीं!! ..तो अब हम क्या करते हैं कि अब हम कंप्यूटर को बहुत सावधानी से उपयोग करते हैं; अनावश्यक, असुरक्षित या संदेहास्पद साइट्स पर जाने से बचते हैं। यानी हमारे काम करने का तरीका अब संयमित और संतुलित हो जाता है। यानी अपनी सोच, बुद्धि और विवेक को अब हम निरंतर परिष्कृत करते हुए जाग्रत या सचेत रहते हैं और खतरों व उनसे होने वाले नुकसान से बचे रहते हैं।
अर्थात् हमने देखा कि वायरस हमले से सिस्टम को corrupt होने से बचाने हेतु मन, बुद्धि, आदि को नियंत्रित करना और सोच को परिष्कृत एवं संतुलित करना ही स्थाई उपाय है (भला एंटीवायरस कहाँ-कहाँ तक हमारी रक्षा करेगा)।
इसी प्रकार, नित नए नियम-कानून (एंटीवायरस) बनाकर हमारे समाज में व्याप्त घने भ्रष्टाचार (वायरस के हमले) को भेद पाना संभव नहीं!! हमें लोगों के "बुनियादी" आचार-विचार को परिष्कृत करने पर जोर देना होगा।
जरा सोचिए तो कि हम लोग भ्रष्ट आचरण करते ही क्यों हैं, इसकी जड़ कहाँ पर है? इसकी जड़ें हैं हमारी मूल सोच में! हमारी बुनियादी सोच ही जब भटकी हुई हो तो हमारे समस्त क्रिया-कलाप तो भटकेंगे ही! किसी भी आचार या आचरण का सीधा सम्बन्ध हमारी सोच (मानसिकता) से है। हमारी सोच में आज भटकाव बहुत अधिक है, शायद यही कारण है कि बहुधा हम अपने असल जीवन में अनावश्यक, असुरक्षित और संदेहास्पद दिशाओं में अपने मन को दौड़ाते रहते हैं और बेवजह ही संकटों में पड़ते रहते हैं। कहने को हम बहुत व्यस्त रहते हैं, बहुत काम करते हैं; लेकिन बदले में अंततः हम बोझिल थकान ही पाते हैं। अचीवमेंट या ठोस उपलब्धि की भावना हममें नदारद ही रहती है। इतनी व्यस्तता के पश्चात् प्रसन्नता भी जो हम पाते हैं वो भी बहुत टिकाऊ नहीं होती! बस दौड़ते जा रहे हैं हम अंधे विक्षिप्त की भांति! फिजिक्स की भाषा में कहें तो - डिस्टेंस तो बहुत ट्रेवल करते हैं हम, परन्तु डिस्प्लेसमेंट बहुत कम पाते हैं! वजह वही कि हम बस भागे जा रहे हैं, व्यस्तता अपनाये और ओढ़े हुए हैं; कहाँ अपना समय और ऊर्जा खर्च करने हैं इसका होश हम गवां बैठे हैं!!
आज एक आम भारतीय नौजवान की वरीयताओं पर एक नजर डालिए- किसी तरह पढाई, फिर नौकरी (जिसमें काम हल्का और वेतन तगड़ा हो; काम ज्यादा भी कर लेंगे मगर वेतन बढ़िया हो), काम के घंटों में और इसके आगे-पीछे भी व्हाट्सएप, फेसबुक, गाने, वीडियो-गेम, फिल्में, गर्ल या बॉय फ्रेंड का साथ, कार, पार्टियाँ, आदि-आदि। हमारे आकाओं और सरकार को भी मोटे तौर पर यही लगता है कि नौकरी और पैसा कमाना ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है (शिक्षा की गुणवत्ता जाये भाड़ में)। तो समाज में नयी-नयी नौकरियों का सृजन होने लगा। नौकरियों के सृजन के लिए नियोक्ताओं द्वारा नए-नए काम ढूंढे जाने लगे। दिल्ली, लखनऊ जैसी राजधानियों में अब नौकरियों या काम की कोई कमी नहीं है, यदि नौजवान लड़का या लड़की बस करने को तत्पर हो जाये तो (यानी वो कामचोर न हो तो)। तनख्वाह की कोई चिंता नहीं कितनी भी हो चलेगा, बस इन्टरनेट और मनोरंजन का निकलता रहे तो भी गनीमत! कॉमन यूथ इसी दिशा में भाग रहा है। बड़े शहरों में उपभोक्तावाद को बहुत बढ़ावा मिलने से कॉमन मैन की दिमागी और शारीरिक व्यस्तता बेकार में ही बहुत बढ़ गयी है। घर-बाहर के काम बहुत बढ़ गए। उन कामों को स्वयं करना व्यस्तता के कारण बहुत दूभर हो गया। उन कामों को किसी अन्य से करवाना भी बहुत पेचीदा और खर्चीला हो गया। तो फिर अनेक बिचौलिया कंपनियां खुल गयीं आपकी मदद के लिए। तो फिर उनमें कर्मचारी भी रखे गए। काम और नौकरियां बढती गयीं और बढती जा रही हैं! समझ में नहीं आ रहा कि इसकी सराहना करूं या आलोचना करूं! मेरी समझ में इस सब भागमभाग में आज का यूथ सामाजिक सरोकारों, जानकारियों, कर्तव्यों आदि से दूर होता चला जा रहा है। सामान्य ज्ञान भी औसत से कम होता जा रहा है, मानवीय भावनाएं कम होती जा रही हैं, शुष्कता बढ़ती जा रही है, मशीन सा बनता जा रहा है मानव! सब बिजी हैं और अपने किसी भी काम के लिए दूसरे पर निर्भर हैं! सब एक-दूसरे का काम कर रहे हैं, एक-दूसरे के लिए काम कर रहे हैं; यही उनका काम है और यही उनकी नौकरी है, और उस काम के बदले दूसरे को पैसा दे रहे हैं और दूसरे से पैसा ले भी रहे हैं। हमारा ही पैसा हमारे ही बीच में घूम रहा है! मैं भी दूसरों का काम करने के लिए नौकरी करता हूँ, पैसा कमाता हूँ, व्यस्त रहता हूँ; फिर कमाई हुई तनख्वाह से मैं अपने काम अन्यों से करवाता हूँ! चक्र चलता रहता है। हर कामकाजी व्यक्ति गर्व से कहता है कि मैं नौकरी करता हूँ, और साथ ही यह भी कहता है कि मैं अपने हर काम नौकरों से करवाता हूँ! अपने से जुड़े छोटे-छोटे कामों के लिए आज हम दूसरों पर निर्भर हैं, और दूसरे लोग किन्हीं अन्य तीसरों पर!! और यह सब व्यायाम-कसरत इसलिए कि सबको नौकरी चाहिए, पैसा चाहिए! ..और पैसा भी बहुत सारा, क्योंकि आवश्यकताएं तो दिन-प्रतिदिन बढती जा रही हैं या हम बढाते जा रहे हैं!
तो फिर जब पैसा बहुत सारा चाहिए तो किसी को तो धोखा देना ही पड़ेगा, किसी को तो बेवकूफ बनाना ही पड़ेगा! खुद को आलरेडी इतना व्यस्त कर देने के बाद सोचने-विचारने की इतनी क्षमता ही कहाँ बची कि नैतिकता को निहारा जा सके! सो नैतिकता को बिसार दिया, नकार दिया और हो गए हम भ्रष्ट; और करने लगे "भ्रष्टाचार" धड़ल्ले से!
जब-जब संयम के बाँध तोड़कर अनावश्यक ही इधर-उधर सर्फिंग की तो अपने कंप्यूटर सिस्टम को corrupt कर लिया ..और वास्तविक जीवन में भी जब-जब संयम के बांध तोड़कर अनावश्यक ही मन और शरीर को इधर-उधर व्यस्त करके उलझा लिया तो अपने आचारों को भ्रष्ट कर लिया! ऐसे ही भ्रष्टाचार पनपा।
तो अंतत हमने पाया कि भ्रष्टाचार रूपी वायरस को पूर्णतया (जड़ से) समाप्त करने के लिए मन और बुद्धि को स्वच्छ, संयमित एवं अनुशासित करने की आवश्यकता है। बहुत सारे नियम-कानून (एंटीवायरस) हमारे सिस्टम के संक्रमित न होने की कोई गारंटी नहीं दे सकते! हमारी भ्रष्ट और भटकी सोच ही हमारे भ्रष्ट आचार का मूल कारण है!
सरकार और समाज के वर्तमान क्रियाकलापों का यदि सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन किया जाये तो हम पायेंगे कि नौकरी या काम आदि के लिए की जा रहीं बहुत सी कसरतें मात्र समय और ऊर्जा का भारी दुरुपयोग हैं! इनसे भागमभाग (विकास की सूजन) तो बढ़ रही है पर राष्ट्र का असली विकास बुरी तरह से बाधित हो रहा है। इस राष्ट्र के सभी लोग प्रचंड रूप से व्यस्त तो होते चले जा रहे हैं पर मानवता, नैतिकता, गरिमा और विकास आदि सब रसातल में जा रहे हैं।
अंत में व्यर्थ की कसरत का मात्र एक उदाहरण देता हूँ-- दोपहिया वाहन का थर्ड पार्टी बीमा। कुछ पुराना हो जाने पर हमारे यहाँ लोग अक्सर अपने दोपहिया वाहन का थर्ड पार्टी बीमा कराते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि वो अब यह सोचते हैं कि पर्याप्त ध्यान रखने पर गाड़ी चोरी नहीं होती और एक्सीडेंट भी नगण्य होता है, परन्तु इसके मुकाबले डर के कारण हर साल भारी प्रीमियम बीमा कम्पनी को देना पड़ता है। तो जागरूक उपभोक्ता थर्ड पार्टी बीमे पर आ जाते हैं। वो क्या और क्यों होता है? मेरी समझ से यदि मेरी बाइक से किसी को कोई चोट या नुकसान पहुंचे तो पीड़ित व्यक्ति हर्जाना मांग सकता है; ऐसे में इंश्योरेंस कंपनी हमारी तरफ से वो हर्जाना पीड़ित को अदा करेगी। पिछले वर्ष तक यह बीमा लगभग सात-आठ सौ रुपये में होता था (अभी शायद बढ़ गया है) और हर वाहनधारी कानूनन यह बीमा करवाने को बाध्य है, यह अनिवार्य है; इसीलिए सब इसे करवाते हैं। किसी भी महानगर में लाखों दोपहिया वाहन होते हैं, दर्जनों बीमा कंपनियां हैं, उनके बीसियों कार्यालय हैं, वहां सैकड़ों-हजारों कर्मचारी और एजेंट्स हैं, वेबसाइट्स भी हैं; ऑनलाइन या मैन्युअली प्रीमियम देने के विकल्प हैं, एजेंटों की सेवा भी ली जा सकती है। तो वहां प्रतिदिन लाखों-करोड़ों रूपया प्रीमियम के रूप में एकत्रित होता है; इस राशि का एक बड़ा अंश बीमा कार्यालय की बिल्डिंग, किराये, वेबसाइट्स और मुख्यतः कर्मचारियों की तनख्वाह पर खर्च होता है। इस राशि का एक बहुत छोटा सा अंश अत्यल्प पीड़ितों को हर्जाना देने में और शेष बचा अंश बीमा कंपनी के मालिकों को जाता है। अब देखिये, RTO कार्यालय व्यस्त, चेकिंग स्टाफ व्यस्त, उपभोक्ता व्यस्त, बीमा कम्पनियाँ व्यस्त, और तो और घूसखोर भी व्यस्त!! एक ही शहर में लाखों रुपये डेली का कलेक्शन, हजारों व्यस्त, सैकड़ों को रोजगार, और विरले ही (कभीकभार) किसी को हर्जाना देने की नौबत!! इस भ्रष्ट व्यवस्था में मैंने तो आजतक दोपहिया वाहन से चोटिल किसी 'असली' पीड़ित को कानूनन हर्जाना ठोकते नहीं देखा और न ही सुना, न कभी पढ़ा! मेरी निगाह में दोपहिया वाहन का यह बीमा कानून एक फिजूल की कसरत है, इससे असली फायदा बीमा कंपनी मालिक को है न कि किसी पीड़ित को (क्योंकि वे तो अत्यल्प अथवा नगण्य हैं); और बीमा कंपनी टिप के तौर पर अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देती है। अधिकांश नौकरियों व काम आदि का सृजन आज ऐसे ही होता है। इति।