Sunday, December 13, 2015

(६०) सचेतक टिप्पणी संग्रह- ३

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
दरअसल मनुष्य अपेक्षाकृत एक विकसित मस्तिष्क वाला जीव है, इसलिए वह हर चीज में हिसाब-किताब कुछ ज्यादा ही लगाता है. उसमें एक तरफ संतान अथवा अभिभावक के प्रति राग, अनुराग, ममता, व आसक्ति है तो दूसरी तरफ सांसारिक वस्तुओं का बेहिसाब लोभ, स्वार्थ, अहंकार व असुरक्षा की भावना भी है और इन सब से कपट और पारस्परिक असंख्य अपेक्षाओं का जन्म होता है. यही सब पारिवारिक कलह की जड़ है.
जबकि पशु मनुष्य की तुलना में सरल स्वभाव के होते हैं, ज्यादा गुणा-भाग नहीं करते. इसलिए वे संतान के प्रति तब तक आसक्त रहते हैं जबतक कि वह पर्याप्त रूप से विकसित न हो जाए, उनके द्वारा संतान का पोषण सहज, स्वतःस्फूर्त, स्वतःप्रवर्तित, स्वतःप्रसूत अर्थात् नैसर्गिक रूप से कर्तव्य-स्वरूप होता है; और उसके बाद वे अनासक्ति की ओर बढ़ चलते हैं, एहसान जताने का कोई विचार मन में नहीं आता, संतान से अपेक्षाएं न्यूनतम रखते हैं.
सहजता और सरलता का अन्य कोई विकल्प नहीं. कुछ निरीह पशुओं से मनुष्य यह गुण सीख सकता है.

(२)
बिलकुल ठीक कहा आपने कि सामान्यतः "अपराध एक व्याधिकृत पथ-भ्रष्टता है." ...और अधिकतर मामलों में इस व्याधिकृत पथ-भ्रष्टता का इलाज़ पुनः संस्कृतिकरण अर्थात् सोच को सही दिशा देकर किया जा सकता है. आज के दौर में कुशल मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक इस कार्य को बखूबी अंजाम दे सकते हैं, ...'बहुसंख्य' रोगी ठीक हो सकते हैं, परन्तु ये दोनों ऐसा भी मानते हैं कि अपवाद स्वरूप कुछ रोगी ऐसे भी होते हैं जो किसी प्रकार से ठीक नहीं हो सकते और समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं, जैसे खूंखार आतंकवादी. उन्हें शरीर के सड़े अंग की तरह काट कर अलग करना ही पड़ता है; कुछ की मनोवृत्ति ऐसी होती है कि वे लाख समझाने पर भी बारम्बार अपराध करते हैं, कारावास की कड़ी सजा ही उन्हें कुछ सबक सिखा सकती है! इसलिए रोगी या अपराधी की मानसिकता को सुधारने के प्रयास होने चाहियें, उन प्रयासों के पश्चात् अब उसकी वर्तमान मानसिकता के अनुसार ही उसका दंड तय होना चाहिए.
शब्दों में यह बात बहुत सरल और न्यायपूर्ण लगती है परन्तु आज के परिपेक्ष्य में व्यावहारिक भी नहीं है और संभव भी नहीं, क्योंकि आज वास्तव में विद्वान, नेक और सुलझे हुए सुधारकर्ताओं का भारत में सर्वथा अभाव है और दूसरी बात यह कि देश के सबसे शीर्ष स्थानों पर भी घनघोर अपराधिक मानसिकता का प्रभुत्व है!

(३)
विज्ञापन में "टेढ़ा है पर मेरा है" - यह पंक्ति क्या सन्देश देती है, वह यह कि "ऊपरी आकार या रंग-रूप पर न जाओ दोस्तों! चखकर, खाकर भीतर से महसूस करो कि कैसा लगता है, स्वादिष्ट और पौष्टिक लगा न! जब ऐसा है तो यह टेढ़ा होते हुए भी मुझे प्रिय है."
हमारा भी बाहरी ढांचा, रूप-रंग-आकार, केशविन्यास, वस्त्र इत्यादि भले ही कुरूप हों, ..सब चलेगा, ..परन्तु तब ही, जब हम भीतर से अच्छे हों अर्थात् मन में सुविचार हों, हम कर्मठ हों, ईमानदार हों, सत्यनिष्ठ हों, बोलने में कम और करने में अधिक विश्वास करते हों.
ऐसे ऊपरी रूप से टेढ़े, पर भीतर से सुन्दर देशवासियों पर किसे न गर्व होगा. ...परन्तु अभी ऐसा है क्या??
वर्तमानकाल में हम ऊपर से तो सीधे, परन्तु भीतर से अत्यंत टेढ़े हैं. तो प्रथमतः क्या लेखों और चर्चा के रूप में ऐसा आईना देखना आवश्यक नहीं, जो हमें हमारा भीतरी स्वरूप दिखा सके?
परन्तु साथ ही ब्लॉगर्स सहित समस्त पाठकों को ध्यान रहे कि बारम्बार दर्पण देखने भर से दाग नहीं जायेंगे, ठोस व्यावहारिक प्रयत्न करके उन्हें निरंतरता से साफ़ भी करना पड़ेगा.

(४)
"अगर रातों को जाग कर बच्चे के स्वास्थ्य की चिंता करती है, या उसकी पढाई लिखाई और देख भाल के लिए अपनी किसी महत्वाकांक्षा का बलिदान करती है तो ये उसकी अपनी ख़ुशी, अपना चयन है….बच्चे को दुनिया में लाने से पहले ही माँ को ये पता होता है कि आने वाले दिन उससे ये सब बलिदान माँगेंगे.., ..माँ को उन से अपनी सेवाओ के बदले में कोई हिस्सा नहीं लेना होता है..."
आप द्वारा उपरोक्तलिखित पंक्तियाँ किसी भी माँ को परिपक्व सोच हेतु प्रेरित कर सकतीं हैं, ..पिता को भी..
और एक परिपक्व माँ-पिता की संतानें भी परिपक्व बनेंगी ही.
और तब देश का स्वरूप कुछ सुधेरगा अवश्य.
इस सुखद आशा और विश्वास के साथ आपका आभार.

(५)
जो मुझे आज पसंद नहीं,
जो मेरे दिल को गवारा नहीं...

जरूर उसे कोसूं,
जी भर के गुबार निकालूं...

समाज में दहकन है,
दिलों में प्रतिशोध...

पर क्या यह उचित है,
कि मैं भी चलूं उसी ओर?

..रूकती हूँ सोचती हूँ,
फिर इरादा बनाती हूँ...

कि कोशिश करके डालूंगी,
बीज दिलों में प्यार का...

प्यार का सद्भाव का,
नैतिकता के उत्थान का...

वो ठीक करूंगी मनोवृत्तियां,
जो इस कविता का आधार हैं.

विनम्र प्रार्थना- पद्यात्मक शैली में कमेंट देने का मेरा यह प्रथम दुस्साहस है, अतः शब्दविन्यास अथवा शैली में शास्त्रीयता को मत खोजें.

Friday, December 11, 2015

(५९) सचेतक टिप्पणी संग्रह- २

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
एक आम व्यक्ति के समस्त कृत्य, जिनमें खानपान भी शामिल है, बहुधा संस्कारों, सभ्यता, संस्कृति आदि के ऊपर निर्भर करते हैं. कहीं एक संस्कृति में जो शुभ है, वह किसी अन्य संस्कृति में अशुभ हो सकता है! माने उसका स्वरूप अनेकों विभिन्नताएं लिए हो सकता है और फिर उसमें विरोधाभास भी हो सकते हैं; परन्तु बुनियादी नैतिक मूल्यों का पैमाना, स्वीकार्यता व पहचान आदि सभी जगह कमोवेश एक से ही हैं. माने खानपान जैसे वाह्य कृत्यों में विभिन्नताएं एवं विरोधाभास होते हुए भी नैतिकता के मामले में सबके सुर व स्वर एक समान हैं, इसमें आपको कोई भी संदेह नहीं होना चाहिए! वैसे तर्कों का तो कोई अंत नहीं!!
यानी नैतिक गुणों को प्रधानता देना प्रथम होना चाहिए. लेकिन भारत के वर्तमान धार्मिक (?) माहौल में ऐसा बिलकुल भी नहीं है! इसी आधार पर मैंने कहा कि आजकल किसी व्यक्ति में नैतिकता का पैमाना उसके खानपान से लगाया जाता है. यह पैमाना सर्वथा गलत है! ...दूसरे शब्दों में नैतिकता की उपस्थिति ही वहां मानवीय धर्म के उपस्थित होने का संकेत है. ..और 'धर्म' को मैं 'मानवीय धर्म' से अलग नहीं समझता. ...आप धर्म का मतलब यदि कुछ अन्य समझते हैं तो यह आपकी अपनी सोच है.
पहले हमें मानव होने के नाते मानव से प्रेम करना तो आये! जब प्रथमतः हम मानव से प्रेम करना सीख जायेंगे तो फिर अगले पायदान पर पशुओं से प्रेम करना भी सीख जायेंगे.
परन्तु पहले पायदान पर हम पशु-प्रेम दिखाएं और मानव-प्रेम से हमारा कोई सरोकार ही न हो, यह तो पागलपन है.
बहुत सी ऐसी सभ्यताएं हैं जो सामिष होने के बावजूद मानव हितार्थ कुछ भी करने को तत्पर रहती हैं और दूसरी तरफ अनेकों निरामिष (बाबा, नेता व आम आदमी भी) एक नंबर के व्याभिचारी व भ्रष्ट होते हैं. इसका उल्टा भी पाया जाता है यानी सामिष अनैतिक व निरामिष नैतिक!
यानी खानपान से हम व्यक्ति के भीतर विद्यमान नैतिकता रूपी धर्म का सटीक अंदाजा नहीं लगा सकते! तो फिर हम खानपान को नैतिक-धर्म का पैमाना क्यों बनाएं?
खानपान भले ही अलग हो, सामिष ही हो, पर दिल के भीतर मानव के प्रति सच्चा प्रेम हो, तो उस व्यक्ति को मैं पहले प्रणाम करूँगा. ..और आप?

(२)
"कोमल भावनाएं बनाये रखने के लिए अभ्यास भी उतना ही जरूरी" -- यह अभ्यास प्रथमतः हम अपनी जाति (मनुष्य) से ही प्रारंभ करेंगे, और ऐसा करना ही ज़रूरी!
"किन्तु प्रत्येक जीवन का आदर करना अवश्य नैतिकता में शुमार है" -- प्रत्येक जीवन का आदर करने से पहले हम प्रत्येक मनुष्य का और उसके विश्वास (वाह्य कृत्य सम्बन्धी) का आदर करना तो पहले सीख लें! वाह्य भिन्नताओं को स्वीकार कर उससे व उसकी नैतिकता (आतंरिक समानताओं) से प्रेम करना जानें!
"लगभग सभी संस्कृतियों में मांसाहार भिन्न भिन्न प्रकार के अपराधबोध, हीनता बोध से ग्रसित है" -- ऐसा इसलिए क्योंकि व्यक्ति को रूढ़िवादी (संस्कारजन्य) विश्वासों पर तो विश्वास है परन्तु अपने हृदय से उपजे (आन्तरिक) विश्वास पर नहीं! यदि दोनों विश्वासों में एका होता है तो फिर अंतर्द्वंद नहीं होता और कृत्य करते समय व्यक्ति का सिर गर्व से उठा रहता है, अन्यथा अपराधबोध रहता ही है. इस बारे में मैंने बाइबिल से कुछ उदाहरण दिए हैं (वैसे मैं ईसाई नहीं हूँ फिर भी जहां से भी किसी जिज्ञासा का समाधान मिलता है, लेता अवश्य हूँ).
रही बात सामिष के साथ असहजता की, तो ऐसा दूसरे के वाह्य विश्वास से पूर्वाग्रह या असहमति के कारण होता है; वैसे निरामिष के साथ सामिष भी असहज होता ही है, यदि वह (सामिष) विशाल हृदय नहीं है तो! कारण वही है! बात वहीं पर आकर अटक जाती है कि हम दूसरे की अंदरूनी पवित्रता को अनदेखा कर वाह्य-कृत्यों से उसका अपने साथ मिलान करते हैं और जब वह नहीं होता तो दूसरे को निकृष्ट ठहराते हैं.
एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब हम दूसरे व्यक्ति की आन्तरिक पवित्रता को महसूस कर उसे व उसके वाह्य विश्वास को आदर देते हैं (उसके वाह्य विश्वास अपनाने की बात नहीं कह रहा हूँ), तो हमें दूसरी तरफ से भी सकारात्मक प्रत्युत्तर मिलता है, भले ही उसकी गति मंथर ही क्यों न हो! ..और जब हम दोनों की आन्तरिकता में मिलाप हो जाता है तो हर वह वाह्य कृत्य छूटना आरंभ हो जाता है जो मानवीयता के विरुद्ध है!
उदाहरण के लिए -- दूसरे की, और मानवीयता की पुकार सुन, या आन्तरिक चेतना के कारण सामिष व्यक्ति, निरामिष के साथ खाने पर बैठते हुए बहुधा सामिष को त्याग निरामिष भोजन ग्रहण करता है, जबकि विरले ही इसका विपरीत होता है.
अतः दृष्टिकोण में लचीलापन लाना आवश्यक!

Wednesday, December 9, 2015

(५८) सचेतक टिप्पणी संग्रह- १

मेरे और पाठकों के बीच संवादों की एक श्रृंखला

(१)
'व्यक्ति को समाप्त किया जा सकता है पर विचारों को नहीं ....धर्म के ठेकेदार कभी भी नहीं चाहेंगे उनके पाखंड के जाल को कोई काट कर लोगों को उनके जाल से मुक्त करे ....दयानंद सरस्वती, आचार्य चार्वाक, आर्यभट्ट आदि न जाने कितने ही ऐसे पाखंड के खिलाफ लड़ने वालों की हत्या कर दी इन धर्म के ठेकेदारों ने, पर इनके विचारों को कभी भी मार नहीं सके.'
'धन्यवाद. बिल्कुल सही कहा आपने. लेकिन जो हमारा कर्तव्य है, वह तो हमें करना ही होगा. किसान भी तो कोशिश करके अपने खेत में उग रही फालतू खरपतवार की रोकथाम करता ही है.'

(२)
समाज में कोई व्यक्ति जब कोई कुकृत्य करता है तो तुरंत उपचार के तौर पर उस व्यक्ति को सजा तो दी ही जाती है, परन्तु जागरूक लोग इसके समानांतर यह भी देखते हैं कि अमुक कुकृत्य का विचार पनपा कहाँ से? हमारी कोशिश रहेगी कि उस वैचारिक प्रदूषण का शिकार हमारी अन्य संताने न हों. कुछ संतानों को समझाया जाएगा और कुछ कार्य प्रदूषण फ़ैलाने वाले के विरुद्ध भी होगा.
दूसरी बात कि संस्था व अनुयायी, गुरु व शिष्य; आध्यात्मिक क्षेत्र में इन दोनों के बीच का नाता बहुधा पिता-पुत्र के रिश्ते से बढ़कर होता है. अनुयायी, शिष्य व पुत्र, इन तीनों के द्वारा किये गए अपराध के पीछे उनके अभिभावकों की भी कोई बड़ी पैरेंटिंग मिस्टेक अवश्य रहती है, वैसे अहंवश हम इसको मानते नहीं!
यदि किसी कूड़े के ढेर की वजह से इलाके में बीमारियाँ फ़ैल रही हैं तो कहने को तो बैक्टीरिया उत्तरदायी, हमारा कूड़े के ढेर के पास जाना उत्तरदायी, प्रत्यक्ष कूड़ा ही उत्तरदायी! परन्तु जड़ तो वह जिसने कूड़े का ढेर लगाया, उसी के कारण बैक्टीरिया जन्मे, पनपे और फिर जाने-अनजाने बीमारियाँ फैलीं! यदि हम उसी इलाके के निवासी हैं और कूड़े का ढेर हमारे रास्ते में ही है, तो भला कब तक हम स्वयं को उस कूड़े के समीप से होकर जाने से रोक सकते हैं?
तो कूड़ा फ़ैलाने वाला दोषी! अब उसी प्रकार कूड़े को साफ़ करने की जिम्मेदारी भी किसी न किसी की होती है- नगरपालिका, सफाई-दल आदि. ..यदि ये सब भी अपना काम ईमानदारी से नहीं करते तो दोषी कहलाते हैं. ..और मान लो कि ये ढीठ हो गए तो इलाके के जागरूक लोगों को स्वयं ही सफाई करनी पड़ती है या एप्लीकेशन वगैरह लगानी पड़ती है.
समाज में प्रत्येक का कुछ न कुछ रोल है, यदि वह उसे नहीं निभाता है या गलत ढंग से करता है तो निश्चित रूप से वह दोषी!
और हाँ, 'सनातन' शब्द की आलोचना करने वाला मैं कौन हो सकता हूँ, सनातन तो वह है जो सदा से अस्तित्व में है, वास्तव में खरा है. बात उसके नाम में नहीं बल्कि गुणों में है! अब राम नाम का हर व्यक्ति भगवान् राम जैसे गुणों को प्रकट कर रहा हो यह ज़रूरी तो नहीं!

(३)
मात्र निंदा से आगे इस प्रकार से होने वाली घटनाएं नहीं रुकेंगी, बल्कि इस प्रकार से होने वाली घटनाओं के पीछे के मूल कारणों को नष्ट करना पड़ेगा. ..और मूल कारण है- भावुक जनमानस को 'अन्धविश्वासी कृत्यों' एवं 'अन्य मतावलंबियों के प्रति विरोध-भावना', इन दोनों के लिए उकसाना.

(४)
निश्चित ही हमें स्वयं सचेत होने तथा अपने समाज / संघ को भी सचेत अवस्था में रखने की आवश्यकता है. यह प्रयास करते हुये ही हम सही अर्थों में विकास की सीढियाँ चढ पायेंगे.

(५)
एक प्रश्न दोस्तों.
बहुत भीड़ लगी थी. हर कोई वहां पास जाकर देख रहा था कि क्या हो रहा है? पता चला, भगवान् दूध पी रहे हैं, और उन्हें दूध पिलाने के लिए ही लाइनें लगी हैं. मुआयना करने वालों में अधिसंख्य ने सोचा कि "धन्य हो गए हम.., फालतू में कोई यहाँ लाइन थोड़े ही लगाएगा, आज हमें भी ज़रूर भगवान् की लीला के साक्षात् दर्शन हो जायेंगे!" ...और वे भी उस लाइन में खड़े हो गए और मस्त हो जयजयकार करने लगे.
किसी ने कुछ अलग ढंग से सोचा (हालाँकि वह भी वहां यही देखने गया था कि भीड़ क्यों लगी है), कि ये सब मूर्ख हैं और मात्र भेड़चाल में फंसे हैं! ..वह असमंजस में पड़ गया कि सबको सत्य बताऊँ या चुपचाप यहाँ से चल दूं? सत्य बताने पर भारी जन-विरोध का सामना करने का भय था और चुपचाप चले जाने पर स्वयं की फटकार खाने का भय!
आप सुझाएं कि उसे क्या करना चाहिए?
'जहां भीड़ वहां रत्न', क्या यह सोच सही है? कुछ अर्थहीन और कुछ जबरन विवादास्पद बनाये गए लेखों पर भारी भीड़ देख मैं भी कौतूहलवश वहां पहुँच जाता हूँ पर वहां का हाल देख अचंभित रह जाता हूँ कि बड़े-बड़े महारथी भी उस भीड़ का हिस्सा बनने और वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को आतुर हैं. यह भेड़चाल नहीं तो और क्या है? क्या इसे टाइम-पास कहना उचित होगा?
भई, कुछ तो है जो गलत है! अब आप ही सुझाएं.

(६)
व्यर्थ के झमेलों में पड़े बगैर मैंने बेबाकी से एक आईना दिखाना चाहा, अब चुनाव आपका कि स्वयं में कुछ असामान्यता दिखने पर उसे ठीक करें या दागों को झुठलाने हेतु तर्क-वितर्क करें! अकसर हम अपने अहंकार के कारण परिष्कृत होने की कोशिश नहीं करते और इस बारे में कुछ बात होने पर अपने से निम्न लोगों की ओर इंगित करके कहते हैं कि "हम उनसे तो अच्छे" या "वे हमसे भी बुरे"!
मेरे विचार से यदि हमें वास्तव में ऊपर बढ़ना है तो अपनी कमियों की तरफ तो ध्यान देना ही पड़ेगा, और हमें याद रहना चाहिए कि हम सर्वोत्कृष्ट नहीं, सुधार की गुंजाईश सदैव रहती है. और सुधार तब ही संभव है जब हम अपने को एक स्वच्छ आईने में निहारें व अपने-आप को साफ़ करने का कुछ यत्न भी करें, ..निरंतर! केवल समय काटने के लिए या अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु खोखले तर्क-वितर्कों से हम और कमजोर ही होंगे!

Tuesday, December 8, 2015

(५७) मुफ्त में जाएं धार्मिक सैरसपाटे को!

१- कोई भी वह नतीजा जो हम अपनी मेहनत से निकालते हैं, कोई भी वह कार्य जिसमें हम अपना श्रम (तन, मन, धन) लगाते हैं; हम उसकी कद्र करते हैं, उसे सम्मान देते हैं, उसका मूल्य समझते हैं! लेकिन अनायास ही मुफ्त में मिले रहे तोहफे या सहायता की बहुधा हम कद्र नहीं करते। बहुत दिनों से भूखे, लालची, स्वार्थी, मुफ्तखोर, बाहुबली या दबंग लोग उनको बटोरने के लिए सबकुछ एक कर देते हैं, भारी हौचपौच व अव्यवस्था फैल जाती है; और जो वास्तविक (बहुत ही अल्प संख्या में) जरूरतमंद होते हैं वे पीछे खड़े रह जाते हैं या भगदड़ से खिन्न हो जाने के कारण घर से बाहर ही नहीं निकलते।

२- कोई भी वह कार्य जो आवश्यकता के मुताबिक सही समय पर होता है उससे हमारी आवश्यकता उचित समय पर पूरी होती है, और मन शांत रहता है। लेकिन जब बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य या मूलभूत जरूरतें समय पर पूर्ण नहीं होते तो उनकी कमी के कारण उद्विग्नता बढ़ती जाती है; और फिर यदि एक लम्बे अन्तराल के बाद वे समस्त कार्य एक साथ पूर्ण करने का प्रयास किया जाता है तो हौचपौच मच जाती है, बहुत सारी गलतियाँ होती हैं, गुणवत्ता में कमी आ जाती है या एक साथ निगलने के कारण बदहजमी होने का भी खतरा बन जाता है। और चीजों को लपकने के लिए बहुत से छुपे हुए लालची गीदड़, सियार, लोमड़-लोमड़ी भी आगे आ जाते हैं।

उत्तर प्रदेश की पिछली और वर्तमान सरकारों ने कन्याधन बांटा, बेरोजगारी भत्ता बांटा, मुफ्त मध्यावधि भोजन बांटा, मुफ्त लेपटॉप बांटा, महंगे पत्थर जड़ित बहुत सारी इमारतें, स्मारक, पार्क, चौराहे आदि एकाएक थोक में बनवा दिए; बहुत सारे विकास कार्य (?) एक साथ शुरू करवा दिए और आननफानन में उन्हें पूरा किया गया या किया जा रहा है। उन सबकी प्रासंगिकता, करने के समय, तरीके, गुणवत्ता, लाभ और फल आदि से सभी जागरूक पाठक परिचित होंगे ही! निम्न स्तर का निर्माणकार्य, निरंतर उखड़ती महंगी पत्थर-टाइलें, धंसते इंटरलॉकिंग टाइल्स पथ, थोड़ी बारिश से ही टूटती-धंसती नवनिर्मित सडकें, स्मारकों-इमारतों की अनुपयोगिता आदि किसी से छुपे नहीं है। इसी प्रकार की अदूरदर्शी सोच के चलते हाल ही में लखनऊ में बने आलमबाग व चारबाग के (बहुत महंगे किन्तु बेकार के, और अब मेट्रो लाइन के लिए बाधक) फुटओवर पैदल पुलों को तोड़ने की तैयारी; अब सड़क पार करने हेतु सस्ता किन्तु उपयोगी अंडरग्राउंड रास्ता बनाया जाएगा (भला हो मेट्रोमैन श्रीधरन जी का)!

...अब कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार का एक नया 'शिगूफा' जानने को मिला ही होगा कि प्रदेश के वरिष्ठ नागरिकों को मुफ्त में धार्मिक स्थलों की यात्राएं कराई जा रही हैं!! कितने धार्मिक हैं राजा और शासन; और तदनुसार ही कितने धार्मिक हैं हम (यानी बहुतायत); और कितने धार्मिक होंगे वे लोग जो इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए भगदड़, हौचपौच, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार फैलायेंगे?! चलिए माना कि यह सबकुछ नहीं होगा तो भी इस स्कीम की प्रासंगिकता या औचित्य (लेख के ऊपरी दो बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए) समझ में नहीं आता है! इति।

Tuesday, December 1, 2015

(५६) साईंबाबा बनाम शंकराचार्य

विवाद के मूल को समझने के लिए पिछले कुछ लेखों के अंश

आजकल साधना के नाम पर विभिन्न कर्मकाण्डों, व्रत, पूजापाठ, मंत्रजप आदि को करना; नियमित या किसी दिन-विशेष आराधनालय, सत्संग या प्रवचन में जाना, खानपान में अनेकों विधि-निषेध अपनाना, किसी सम्प्रदाय या संस्था-विशेष का सदस्य बनना जैसे कृत्य आम प्रचलन में हैं। सम्बंधित लोगों से यदि ये सब कृत्य करने का 'वास्तविक' कारण जाना जाए तो यह तथ्य प्रकाश में आता है कि अधिकतर मामलों में लोग किसी न किसी सांसारिक अभिलाषा की पूर्ति हेतु ही ये सब कृत्य करते हैं। कुछ लोग इन कृत्यों के माध्यम से ईश्वर से अपने पापों के लिए क्षमायाचना करते हैं। वास्तव में उनका असली मंतव्य यही होता है कि ईश्वर उनके पापों को अनदेखा कर दें। पिछले पापों को धोने के लिए गंगा में डुबकी लगाना या तीर्थयात्रा करना तो आम प्रचलन में है ही, यह सब जानते हैं। कुछ मामलों में मोक्ष अर्थात् जन्म-मृत्यु के फेरों से मुक्ति हेतु विभिन्न धार्मिक कृत्य किये जाते हैं। ...तो देखने में यही आता है कि विभिन्न धार्मिक कृत्यों के पीछे कुछ न कुछ स्वार्थ छिपा रहता है। भौतिक सुख-संपत्ति और सांसारिक अभिलाषाएं ही आज साधना का प्रमुख लक्ष्य हैं। ...यह भी देखने में आता है कि जब दो राष्ट्रों का परस्पर युद्ध होता है, तो उनके देश के धर्मगुरु ईश्वर से अपने-अपने देश की विजय हेतु कामना-प्रार्थना करते हैं। अब ईश्वर किसे सही मानेगा?

यह प्रचलन भी आम है कि लोग संतान, व्यापार, नौकरी, धन, अधिक मुनाफे, सुख-सम्पदा और विलासिता की चाहत में ईश्वर के मानव-निर्मित छद्म दरबारों में हाजिरी देते हैं, पागलों समान पूजा-अर्चना करते-करवाते हैं। स्पष्ट है कि आज लोगों ने ईश्वर को एक भ्रष्ट और चापलूसी पसंद करने वाला राजा मान लिया है तथा साधना रूपी कृत्यों को रिश्वत में दी जाने वाली भेंट समझ लिया है। साधना करने का मूल उद्देश्य ही पलट गया है। ईश्वर व साधना की इससे बड़ी विडम्बना (उपहास) कदाचित् संभव नहीं। जब धार्मिक कृत्यों को करने-करवाने का उद्देश्य बिलकुल पलट चुका है तो फिर लोगों के अन्य कृत्यों का उद्देश्य पलट जाना तो स्वाभाविक ही है। विरला ही कोई मिलता है जो मात्र भजन के लिए ही भजन कर रहा हो अर्थात् ईश्वर-प्राप्ति हेतु अर्थात् सच्चे ईश्वरीय गुणों को अपने आचरण में आत्मसात् करने हेतु साधना कर रहा हो।

सर्वत्र झूठ व दिखावा देखने को मिल रहा है। आडम्बर का बोलबाला है। पाखंडी लोग, धर्मगुरु आदि खूब लाभ में हैं। कदाचित् धन की अभिलाषा एक बार को न भी हो, तदपि जागतिक यश की अभिलाषा कमोवेश सभी वर्तमान धर्मगुरुओं में कूट-कूट कर भरी है। प्रवचन देते समय या भक्तों से मिलते समय उनके नेत्रों, भावभंगिमाओं और शारीरिक भाषा से इसका पूरा-पूरा भान होता है। अधिकांश मार्गदर्शकों में यथार्थ सहिष्णुता का पुट नहीं मिलता। लोगों, अनुयायियों आदि के खोखले विश्वास को और अधिक खोखलेपन के साथ सुदृढ़ करने हेतु उनके सम्प्रदाय के धर्मगुरु उनके मन में अन्य सम्प्रदायों के प्रति नफरत, द्वेष आदि की भावना भरते हैं। अन्य पंथों की सोच या सिद्धांतों को यदि वे धर्मगुरु किसी कारणवश समर्थन भी देते हैं तो स्पष्ट रूप से वह झूठा व बनावटी प्रतीत होता है। परिणामतः आज प्रत्येक समूह यही जानता और मानता है कि केवल उसी का समूह व उसकी पूजा पद्धति तथा उसके देवता सर्वश्रेष्ठ हैं, अन्यों के निकृष्ट!

व्यर्थ के दिखावों और व्यर्थ की मूर्तिपूजा के घनघोर आलोचक तथा जीवनपर्यंत सादगी से रहने वाले अनेक महानुभावों के आज विशाल मंदिर बन गए हैं। बड़े दिखावे के साथ उनकी प्रतिमाओं की भव्य पूजा-अर्चना होती है। चढ़ावे का कोई अंत नहीं! यह देख आत्मा विलाप करती होगी उन महापुरुषों की! ...अहिंसा के घनघोर समर्थक एक प्राचीन मुनि के वर्तमान धर्मगुरु अनेक बंदूकधारी अंगरक्षकों से घिरे हुए प्रवचन देते देखे जाते हैं। बड़ा हास्यास्पद लगता है यह! कोई उनसे यह पूछे कि अहिंसा के पुजारी के इर्दगिर्द इन बंदूकों का क्या काम? परन्तु आज यह पूछने का साहस किसी में नहीं और न ही समझने का!

आज कोई सम्प्रदाय कुछ बता रहा है तो कोई कुछ और! सब बहलाने-फुसलाने और विभिन्न स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं। अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग! बस एक ही समानता है सबमें कि भव्यता और दिखावा आदि चरम पर हैं। अंधविश्वास बढ़ाने की तो कोई थाह ही नहीं! समय के साथ सिद्धांत और मूल्य बदल चुके हैं। ढोंगियों का राज है। धन और सांसारिक यश उन पर बरस रहा है। पाँचों अंगुलियाँ घी में... और सर कड़ाही में है! अध्यात्म के अन्तरंग में उतरने व उतारने वाले धार्मिक गुरुओं का मिलना आज अति दुष्कर है। आज प्रवचन देने वालों के आंतरिक जीवन में यदि झाँका जाए तो वहां सुनने वालों से भी अधिक गंदगी पाई जाती है। परन्तु लोग यह सब देखकर, जानकर भी आंखें मूंदे हुए हैं। भेड़चाल चल रही है। कारण है-- लोभ, अभिलाषा, लालसा तथा त्वरित सांसारिक लाभ की आकांक्षा। आज के कर्म की कल क्या प्रतिक्रिया आने वाली है इससे अनभिज्ञ भारत की आबादी का एक बड़ा प्रतिशत आज फंतासी अर्थात् कल्पना लोक में मग्न है। विज्ञानवादी भी आज अपना ही 'क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया' का सिद्धांत भुला बैठे हैं।

उथली (सतही) सकाम-भक्तियुक्त भक्तों (तीव्र-आसक्त भक्तों) की भीड़ से धार्मिकता की सूजन निरंतर बढ़ती जा रही है। ..कारण हैं- तीव्र आसक्तियुक्त आज के अधिकाँश धर्मगुरु! ..मेरे विचार से धर्म बिकाऊ नहीं होता। धर्म-शिक्षा में दिया ही जाता है, लिया नहीं जाता। खरा गुरु जीवन-यापन हेतु धर्म का व्यापार नहीं करता। जीवनयापन हेतु न्यूनतम आवश्यक वस्तुएं स्वतः ही बिना किसी विशेष प्रयास के प्राप्त हो जाती हैं, यदि ऐसा नहीं भी होता है तो खरा धर्म-शिक्षक कबीर की भांति जुलाहे का, ईसा मसीह की भांति बढ़ई का, जैसे कार्य करने में कोई संकोच नहीं करेगा। जन-कल्याण हेतु धर्म-शिक्षा अर्थात् 'धर्म' हेतु ही धर्म-शिक्षा तथा भौतिक शरीर की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किसी व्यवसाय / नौकरी आदि के बीच किसी प्रकार का कोई टकराव नहीं होता। हाँ इतना निश्चित है कि सच्चा धर्म-शिक्षक सांसारिक यश व धन का भूखा नहीं होता और अनावश्यक संग्रह व खर्च में उसकी कोई रुचि नहीं होती। उसकी आवश्यकताएं सीमित होती हैं और वह दिखावों से बिलकुल परे रहता है।

सभी जागरूक लोग इस बात से सहमत होंगे कि भारत का विकास ठोस रूप से नहीं हो रहा है, इसमें भी सूजन ही अधिक है!! और ये अंधविश्वासी कृत्य अर्थात् रिद्धि-सिद्धि प्राप्ति (shortcut) का लॉलीपॉप हमें और अधिक अकर्मण्य बनाएगा। आज इन कर्मकांडों की ओर अधिक जन-झुकाव के दो मुख्य कारण हैं-- पहला यह कि, साधारणतया लोग सरलता अर्थात् किसी शार्टकट के माध्यम से अपनी इच्छापूर्ति करना चाहते हैं; और दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक है कि, व्यक्ति को अपने प्रत्येक कृत्य का परिणाम ज्ञात नहीं होता है, सफलता भी मिलती है व असफलता भी। जब व्यक्ति इन रिद्धि-सिद्धि प्राप्ति के अनुष्ठानों के चक्कर में फंस जाता है, तो सफलताओं का श्रेय वह इन अनुष्ठानों को देता है, निहाल हो जाता है तथा असफलता के लिए उसे समझाया जाता है कि अनिष्ट शक्तियों के बहुत प्रभावी (भारी) होने के कारण ऐसा हुआ! ...व्यक्ति संतुष्ट हो जाता है, ...मार्गदर्शकों की रोटियां सिकती रहती हैं।

यद्यपि विभिन्न मनोवैज्ञानिक एवं मानसिक कारणों से आज समाज में धार्मिकता की सूजन बहुत बढ़ी हुई दिखती है पर समानान्तर रूप से यह भी कटु सत्य है कि कर्मकाण्डों के प्रति लोगों की आस्था कम हुई है या कम से कम अनिश्चय की स्थिति तो निरंतर बढ़ ही रही है। 'धार्मिकता की सूजन' कहा, इसी से यह स्पष्ट हो जाता है कि धार्मिक कृत्य तो अब बहुत हैं पर वे प्राणहीन हैं।

हमें यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि ईश्वर हमसे केवल अपने नामस्मरण या पूजा-अर्चना की चाहत नहीं रखता, वह केवल अच्छे विचारों व कार्यों की अपेक्षा रखता है। पूजा-अर्चना तो हम अपना भाव-निर्माण करने व मानसिक रूप से मजबूत बनने के लिए करते हैं। वस्तुतः ईश्वर कोई तानाशाह, अहंकारी, और अपनी ही प्रशंसा या गुणगान सुनने का आदी राजा नहीं है। वह तो कोमल हृदय, निष्पक्ष राजा है, जो अपनी प्रजा को भी ऐसा ही देखना चाहता है। अतः साधना में नामजप या पूजा-अर्चना का प्रयोजन केवल ईश्वर को प्रसन्न करना नहीं, वरन भाव-निर्माण, भाव-वृद्धि, इच्छा-शक्ति एवं मानसिक बलिष्ठता बढ़ाने हेतु है। प्राप्त बलिष्ठता से ही हम ईश्वर के गुणधर्मों (properties) को आत्मसात् कर पायेंगे, आचरण से प्रकट कर पायेंगे। ईश्वरीय गुण अर्थात् सर्वमान्य नैतिक गुण! जब ऐसे गुण होंगे तो साधना सफल हुई, ऐसा समझ सकते हैं! तब हमारी क्रियाएं (कृत्य) उच्चकोटि की होंगी, फलतः मिलने वाली प्रतिक्रियाएं (फल) भी उच्चकोटि की होंगी, स्वतः ही!

वेदान्त एवं अन्य कुछ उच्च प्राचीन साहित्यों में उल्लेखित ब्रह्मांड एवं ईश्वर के 'विज्ञानसम्मत' नियमों-सिद्धांतों की ओर से नेत्रों को मूंद लेने से सच्चाई नहीं बदल जाएगी। आज आवश्यकता है कि अध्यात्म पर से जो विश्वास मर गया है या विकृत हो गया है, उसे जिज्ञासापूर्ण वैज्ञानिक दृष्टि से देखकर तत्पश्चात् अनुभूत कर पुनः जीवित अथवा स्वस्थ किया जाए। ...जैसे विद्यालय में हम उत्तरोत्तर आगे की कक्षाओं में जाते रहते हैं, एक ही कक्षा में रुकना या पीछे की कक्षा में लौटना किसी को नहीं भाता है। ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान व साधना के क्षेत्र में भी हमें निरन्तर आगे की ओर जाने की आवश्यकता है। आइये... झूठे दिखावे, फरेब और दंभ को तिलांजलि देकर, बेड़ियों को काट कर, हम अपने अंतर्मन में झांकें। दिल तक.., आत्मा तक.. जाएं। उससे पूछें, मार्गदर्शन लें और स्वयं को परिष्कृत एवं परिमार्जित करें, वहां से ज्ञान का प्रकाश लेकर निरन्तर आगे की कक्षाओं में जाएं, तथा अन्यों को भी इसी के लिए प्रेरित करें। आज यही प्रासंगिक होगा। इति।

Monday, November 30, 2015

(५५) फिल्में, फिल्मकार और उनकी भूमिका

हिंदी और अन्य भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं की फीचर फिल्मों में आज जिस तरह से फूहड़ संवादों, देहप्रदर्शन, चुम्बन एवं अन्तरंग दृश्यों की भरमार है, उसके विषय में यदि फिल्म-निर्माताओं से बातचीत की जाए तो आज के अग्रणी फिल्मकार यही कहते हैं कि "वे फिल्मों में वही दिखा रहे हैं जो आजकल समाज में घटित हो रहा है, या वो दिखा रहे हैं जो आम दर्शक देखना पसंद करते हैं; इसके अलावा फिल्म बनाना उनका पेशा है, व्यवसाय है, वे केवल मुनाफे के लिए फिल्म बनाते हैं, दिवालिया होने के लिए नहीं!

अर्थात् आज के अधिकांश फिल्मकार यह समझते हैं कि फिल्म बनाना मात्र एक व्यवसाय है और समाज के उत्थान की यानी जनसामान्य की सोच को ऊंचा करने की जिम्मेदारी उनकी कतई नहीं है! मैं यह बात मानता हूँ कि परिपक्व मनों पर इन फिल्मों की अश्लीलता या अभद्र भाषा का कोई असर नहीं पड़ेगा, परन्तु ये फिल्मकार यह विचार बिलकुल भी नहीं करते हैं कि उपरोक्त-कथित फूहड़ता से उन मन-मस्तिष्कों पर क्या विपरीत असर पड़ रहा होगा जो अभी तक कोमल, सरल, स्वच्छ और अपरिपक्व हैं। क्या कोमलता, सरलता और स्वच्छता को नष्ट करके मनों को परिपक्व करने का प्रयास उचित है? क्या एक सुन्दर समाज के निर्माण में फिल्मकारों की कोई भूमिका नहीं है? क्या फिल्में समाज पर कोई भी असर नहीं डाल सकतीं?

यदि हम ऐसा मानते हैं कि फिल्में समाज की मानसिकता पर उल्लेखनीय असर डाल सकती हैं तो इतना तो पक्का है कि आज की अधिकांश फिल्में समाज को हिंसक रूप से कामुक, अश्लील और फूहड़ बनने के लिए उकसाती प्रतीत हो रही हैं। बलात्कार की बढ़ती घटनाएं और भाषाई रूप से भी हमारा फूहड़ता की ओर जाना क्या इस बात का संकेत नहीं है कि हम पुनः जंगली हो रहे हैं? मैं मानता हूँ कि सेक्स भी मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू है, परन्तु आज फिल्मों में सेक्स का फूहड़ एवं अति कामुक भावभंगिमा के साथ खुला प्रदर्शन उसकी असली गरिमा और सुखद पक्ष को नष्ट-भ्रष्ट कर रहा है।

सेक्स इन्सान की एक जरुरत है परन्तु एक निश्चित समय पर और गरिमामय ढंग से, ..शारीरिक व मानसिक परिपक्वता हासिल करने के बाद। ...सभी फीचर फिल्म निर्माताओं को भी भीतर से पता होगा कि वह व्यवहार क्या है या क्या होना चाहिए, जिससे हमें व हमसे जुड़े व्यक्ति को सुखद अनुभूति हो। परन्तु हमारे फिल्म निर्माता कुछ नया दिखाने तथा अधिक मुनाफा कमाने की चाह में भाषा और सेक्स सम्बन्धी बातों की नित नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं! जबरदस्ती ठूंसी हुई गालियाँ, अभद्र भाषा, उत्तेजक आइटम सॉंग्स, बेवजह लम्बे चुम्बन दृश्य, जायज व नाजायज अन्तरंग दृश्यों का खुला प्रदर्शन और वह भी सनी लियोन जैसी पोर्न-स्टार्स के माध्यम से, ..यह सब क्या है? इन सबकी पब्लिक डिमांड थी या जबरन क्रिएट की गयी?

अंग्रेजों ने आरंभ में हमें फ्री की चाय पिलाई और धीरे-धीरे हम चाय के आदी हो गए। ...यह पक्का है कि केवल मुनाफे, प्रसिद्धि और कुछ अलग दिखने व दिखाने की होड़ में फिल्मकार यह सब कर रहे हैं।

हम बच्चे को अच्छा पाठ पढ़ाएंगे तो वह अच्छाई की ओर जाएगा, बुरा पढ़ाएंगे तो बुराई की तरफ जाएगा ही, वैसे अपवाद कभी भी कहीं भी हो सकते हैं, पर न भूलिए कि अपवाद बहुत कम होते हैं! इस बात पर शायद फिल्मकार हंसकर कहेंगे कि "पब्लिक क्या बच्चा है?" इसका जवाब यह कि "भारत एक विकासशील देश है, एक आम भारतीय व्यक्ति पूर्ण रूप से विकसित या परिपक्व नहीं, वह नित कुछ न कुछ देख रहा है, सुन रहा है और उनसे प्रभावित होकर सीख रहा है। बुद्धिजीवी, फिल्मकार, नेता, अभिनेता, प्रसिद्ध खिलाड़ी यानी अभिजात्य वर्ग को ही हम तुलनात्मक रूप से परिपक्व कह सकते हैं, शेष अविकसित, अशिक्षित या अपरिपक्व ही हैं, तभी तो वे अनुगामी (followers) हैं।"

तो फिर क्या फिल्मकारों का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वे अपनी फिल्मों में वह दिखाएं जिसकी आज हमें सही मायनों में आवश्यकता है! फिल्मकार वह अवश्य दिखाएं जो आज वास्तव में गलत घटित हो रहा है, परन्तु उसे गलत ठहराएं भी; और जो वास्तव में होना चाहिए, उसे अवश्य सुझाएं; तथा प्रत्येक त्याज्य एवं अपनाने योग्य सोच का औचित्य सिद्ध भी करें। अवश्य ही एक दिन लोग इस तरह की फिल्मों की ओर केवल आकृष्ट ही नहीं होंगे वरन उनसे बहुत-कुछ ग्रहण भी करेंगे। फिल्मकारों को आर्थिक लाभ भी होगा, अवार्ड्स भी मिलेंगे और सबसे बढ़कर यह कि उनको स्वयं से एवं अपनी कृति से एक सुखद अनुभूति होगी। इति।

Sunday, November 29, 2015

(५४) दोहरे मापदंड

यद्यपि एक आम आदमी भारत के कानूनों की बारीक़ जानकारी नहीं रखता फिर भी वह कदम-कदम पर दोहरे मापदंडों को अपनाए जाने का अनुभव करता है! उदाहरणार्थ--

वैसे तो समाचारपत्र एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभिन्न मुद्दों पर पोल खोल अभियान या स्टिंग ऑपरेशन चलाता रहता है फिर भी उसी अखबार या चैनल पर उन्हीं विषयों से सम्बंधित विज्ञापन या कार्यक्रम आदि रोज आते रहते हैं और 'उनकी' तह तक जाने या पोल खोलने के लिए अक्सर कोई प्रयास नहीं होता है! कुछ उदाहरण, जैसे- निर्मल बाबा / आशु भाई सरीखे बाबाओं के कार्यक्रम, या रत्न-कवच-लॉकेट से सम्बंधित विभिन्न अन्धविश्वासी विज्ञापन, अख़बारों में 'दोस्त' बनाने और 'मसाज पार्लरों' के भड़कीले विज्ञापन!

अश्लील (पोर्न) फिल्में बनाने और उनकी डीवीडी बेचने वालों के खिलाफ अक्सर छापे मारे जाते हैं, उनकी पोल खोली जाती है, उन्हें बंदी बनाया जाता है, उनके मुंह पर कालिख तक पोती जाती है; परन्तु वही सामग्री इन्टरनेट पर सरलता से उपलब्ध है! और उस पर तुर्रा यह कि उन पोर्न फिल्मों की एक्ट्रेस को यहाँ सम्मानित किया जाता है, उसे आम फिल्मों में भी काम मिलता है, एक 'सेलेब्रिटी' के तौर पर उसकी फोटो छपतीं हैं, उस पर लेख छपते हैं, उसकी प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित होती हैं, उसके इन्टरव्यू आते हैं!

..समझने के लिए उपरोक्त दो उदाहरण ही पर्याप्त हैं, इनको नजर में रखते हुए आप बीसियों अन्य उदाहरण ढूंढ सकते हैं! सोचिए, ऐसा क्यों है अपने यहाँ? क्या यह सही? कानून क्या सिर्फ आम आदमी के लिए ही बना है? नैतिकता की अपेक्षा सिर्फ साधारण जन से ही क्यों? टैक्स हो या किसी सरकारी बिल का भुगतान, मात्र ईमानदार आदमी ही भुक्तभोगी क्यों? आज महंगाई, सरकारी घाटे आदि का मूल क्या एक साधारण आम आदमी, ..या कुछ भ्रष्टों या बड़ों द्वारा हर कदम पर की जा रही चोरियां (चूसना)?

लगभग हर क्षेत्र में 'कानून' केवल कुछ लोगों का गुलाम बन कर रह गया है! एक साधारण व्यक्ति के लिए वह 'धमकी' (threat) है और तिकड़मी या बड़े के लिए वह एक 'अनोखा अभयदान'! एक ही तरह अपराध पर प्रतिक्रिया के अलग-अलग मापदंड स्पष्ट दिखाई देते हैं!

आज हमारे 'अभिजात्यों' की नैतिकता भी केवल वैयक्तिक लोभ, प्रसिद्धि अथवा किसी दबाव में ही जागती है और मीडिया, अखबार, पुलिस, न्यायपालिका, राजनेता, फिल्म निर्माता, आदि भी इसी वर्ग में आते हैं! इति।

Friday, November 27, 2015

(५३) व्याप्त भ्रष्टाचार के बीच राहुल की मेहनत और बेचारगी

कुछ समय पूर्व एक ब्लॉगर ने राहुल गाँधी के लिए बहुत सही फ़रमाया था कि, "वह दिन-रात कांग्रेस की गाडी को पटरी पर लाने के लिए और रिफोर्म के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं और दूसरी ओर वरिष्ठ कहे जाने वाले कांग्रेसी नेता कांग्रेस के लिए कब्र खोदने पर आमादा हैं।" इसके अतिरिक्त यह भी लिखा था कि, "कुछ साल पहले....शरद पंवार ने एक बयान दिया कि इस बार गन्ने की पैदावार कम हुई है, इसलिए शक्कर के दाम बढ सकते हैं। और उसी रात शक्कर व्यापारियों ने, जमाखोरों ने शक्कर के दाम बढा दिए। ...इस प्रकार बढती महंगाई का विपक्ष को फायदा मिलता है। ...68 सालों में गैर कांग्रेसी राज भी रहा है, भाजपा भी केन्द्रीय सत्ता में रह चुकी है, केंद्र और अनेक राज्यों में तो अभी भी है, लेकिन मंहगाई और भ्रष्टाचार रोकने के लिए किसने क्या किया है? ...दोनों ही केवल मुखौटे हैं या एक ही थैली के चट्टे-बट्टे, असल में सरकार चला रहे हैं अंबानी जैसे औद्योगिक लुटेरे ही।"

...इन्हीं या इनसे मिलते-जुलते मुद्दों पर मेरी सोच यह है कि, ..निश्चित रूप से राहुल गाँधी को हम 'अपरिपक्व बच्चा' कहकर नकार नहीं सकते! मुझे लगता है कि वह एक ऐसा नवयुवक है जो नई व ताजी सोच का है, सुधार की इच्छा रखता है, समझदार भी है, और पर्याप्त रूप से परिपक्व भी हो चुका है। ..परन्तु विडम्बना यह है कि उसे एक ऐसा परिवार, माता-पिता, मंच, साथी (पार्टी), आदि विरासत में मिले हैं जो वर्षों से लोगों की आस, साथ ही विवाद का केंद्र रहे हैं! सुर्ख़ियों में रहे परिवार व माहौल में जन्म लेकर किसी के लिए अपनी एक अलग पहचान बनाना इतना सरल नहीं होता है! ..और जानकार यह जानते ही होंगे कि सोनिया जी के दो बच्चों में से प्रियंका की तुलना में राहुल बचपन व किशोरावस्था में अनेक मायनों में कम परिपक्व थे! ..फिर भी राहुल ने मेहनत करके अपने मानसिक व बौद्धिक स्तर को सराहनीय रूप से ऊपर उठाया, अपनी सोच की स्वस्थता व सपनों की गुणवत्ता को संतुलित रूप से ढालने का लगातार प्रयत्न किया। ये बातें उनके आज के भाषणों व विचारों में परिलक्षित होती ही हैं। ..वो तो हमारी श्रद्धा किसी एक ही (अन्य) पार्टी की ओर होने के कारण हमें यह सब दिखाई नहीं देता, और अन्य दल का होने के नाते हम राहुल को केवल एक विपक्षी या प्रतिपक्षी समझकर मात्र उसकी अंधी आलोचना में लगे रहते हैं! ..जबकि हकीकत यह है कि राहुल ऐसा साहसी बेचारा है जो केवल संयोगवश या भाग्यवश मिली अपनी विवादास्पद विरासती जायदाद की मरम्मत में जोश से लगा हुआ है- पूरी आशा व ऊर्जा से। हम केवल इसलिए उसे नहीं नकार सकते कि वह एक विदेशी महिला का पुत्र है, बल्कि उसकी माँ को भी नकारना या भारतीय सांचे में ढलने के उसके प्रयासों को अनदेखा कर केवल उसे कोसना हमारी सोच की संकीर्णता को ही प्रदर्शित करता है! विपक्षी होने के नाते कभी-कभी हम अंधे होकर सामान्य मानवीयता को भी ताक पर रख देते हैं! हमें व्यक्ति, उसके कुटुंब, विरासत या संस्कृति की आलोचना न कर केवल उसके वर्तमान गलत  आचरण, कार्यों एवं दूषित सोच की आलोचना करनी चाहिए, वह भी अपने गिरहबान में झांकते हुए!

बुरी तरह से व्याप्त भ्रष्टाचार इस समय सबसे बड़ा मुद्दा है और राहुल का वैयक्तिक ध्यान इस ओर बखूबी है, इससे शायद किसी को इंकार न होगा यदि ईमानदारी से सोचना संभव हो सके तब! ...हाँ, इस बात से कतई इनकार नहीं कि कांग्रेस के अधिकांश नेता बुरी, बीमार और भ्रष्ट सोच के शिकार हैं! कमोवेश भाजपा का भी यही हाल है! ..और मीडिया भी इससे अछूता नहीं! महंगाई बढ़ाने में भ्रष्ट नेताओं के अतिरिक्त मीडिया का भी बहुत बड़ा हाथ है! शरद पंवार जी तो एक उदाहरण मात्र हैं, ..यहाँ अधिकांश सत्ताधारियों का यही हाल है चाहे वे किसी भी दल या विधानसभा आदि के हों! मुनाफाखोर व जमाखोर तो अब जैसे तैयार बैठे रहते हैं ..और किसी नेता या फिर मीडिया अथवा समाचारपत्र में किसी संवाददाता की रिपोर्ट आते ही खट से महंगाई बढ़ जाती है! बयानों व खबर मात्र से ही महंगाई बढ़ जाने की परंपरा इधर ४-५ वर्षों से ही देखने में आ रही है! ...व्यापारीवर्ग बहुत चतुर, मौकापरस्त व भ्रष्ट हो गया है अब! उदाहरण के लिए-- डीजल के दाम २ रुपए बढ़ने की संभावना होते ही पेपर में आशंकित व भयभीत करने वाली खबरें छपने लगती हैं और डीजल के दाम बढ़ने से पहले ही चीजें रातोंरात महंगी हो जाती हैं, वह भी बढ़ने वाले भाड़े की तुलना में कई गुना अधिक! ..थोड़ा सा सूखा पड़ते ही या थोड़ी अधिक बारिश होते ही या थोड़ी गर्मी या सर्दी अधिक होते ही आशंकित व भयभीत कर देने वाली मसालेदार खबरें छपने लगती हैं, ..और व्यापारीवर्ग की ओर से जनता पर महंगाई की एक और किश्त फिर से लाद जाती है! अनेक बार बेवजह (?) खबर छपती है कि टमाटर या प्याज का दाम फलानी-फलानी वजह से बढ़ने वाला है, और वो सब्जीवाला जिसने कम दाम पर ही माल उठाया है, अखबार पढ़कर तुरंत सब्जी का दाम बढ़ा देता है; आवश्यकता की चीज है तो लोग बढ़े दामों पर भी खरीदते ही रहते हैं, तो फिर थोक मंडी में भी रेट बढ़ जाता है! बिचौलिए, व्यापारी सब मालामाल हो जाते हैं और पिसती है तो बेचारी आम जनता! बाढ़ आना या सूखा पड़ना पहले भी होता था पर पर्याप्त जमा स्टॉक होने के कारण दामों में चमत्कारी रूप से परिवर्तन नहीं होता था पहले! ..अभी तो भण्डारण अत्याधुनिक हो चुका है फिर एकाएक ऐसा होना समझ में नहीं आता! समझ में अब केवल एक ही बात आती है कि स्वार्थ, मुनाफाखोरी, लालच आदि बढ़ गए हैं और निश्चित रूप से इस अनैतिक लाभ का हिस्सा प्रत्येक वह शख्स खाना चाहता है जो पैनिक फैलाता है! ..निश्चित रूप से उनमें उपरोक्त कथित सफ़ेदपोश हैं ही!

...अंत में थोड़ी सी बात और कर लेते हैं राहुल व राजनीति के बारे में! ..कांग्रेस में राहुल के अलावा नई व साहसी सोच रखने वाले साथी शायद दस से भी कम हैं इसीलिए राहुल को बहुत मेहनत करनी पड़ रही है और इसीलिए नतीजे उस मेहनत की तुलना में बहुत कम आ रहे हैं! ..भाजपा का भी यही हाल है। कांग्रेस की तुलना में वह सत्तासुख कम भोग पाई है इसलिए बहुत भूखे से हैं उसके अधिकांश शूरवीर! दोनों पार्टियों में भ्रष्टाचार सिर चढ़कर बोल रहा है! अधिकांशतः कांग्रेस सत्ता में रही इसलिए वहां भ्रष्टाचार स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है परन्तु भाजपा को अभी ही अधिकार मिला है, फिर भी मानसिकता से सब जाहिर है! आम आदमी पार्टी अभी कुछ अलग सी लग रही है, सबकी तुलना में अधिक स्वस्थ; ..आगे रामजाने!

अफलातूनी सोच ही लगती है पर क्या ऐसा संभव नहीं हो सकता कि राहुल गाँधी और कुछ अन्य समर्पित कांग्रेसी नेता, नरेन्द्र मोदी एवं कुछ अन्य दमदार व नेक भाजपाई नेता, केजरीवाल और परिपक्व सोच वाले उनके कुछ अन्य साथी, .. एवं ऐसे ही कुछ और लोग इस देश की बेहतरी के लिए अपना निजी अहं, स्वार्थ एवं महत्वाकांक्षा त्यागकर एक साथ एक मंच पर आएं और ....!! इति।

(५२) कलियुग का चरम अभी बाकी है?

हर साल, हर महीने, हर दिन, बल्कि हर घड़ी भारत में ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं जिनको देखकर उस पल यह लगता है कि 'बस अब कलियुग (भ्रष्ट समय) ने अपने चरम को छू लिया!' लेकिन फिर कुछ ऐसा प्रसंग घटित हो जाता है जो पहले वाले से भी अधिक भयावह प्रतीत होता है! भारतीय राजनीति के आंगन में ऐसा नित हो रहा है! चाहे वह कतिपय बड़े उद्योगपतियों को दिया गया वरदहस्त हो, या लम्बे समय से लटके फांसी के मामले, या राजनेताओं द्वारा कानून की कमजोरियों का लाभ उठाकर लिए गए हैरतअंगेज निर्णय, या विधानसभाओं या लोकसभा में नेताओं का पशुवत व नंगा व्यवहार!! ...शब्द कम पड़ जाते हैं!

कुछ समय पहले तक इन बातों का रोजाना उठना या इन पर खुल कर चर्चा करना तक असभ्यता का सूचक माना जाता था! लोग शर्म से गड़ जाते थे! पर अब तो हमारे जन प्रतिनिधि ही जब इतने एडवांस हो गए हैं तो मीडिया या जनसाधारण का क्या होगा? सोचकर सिहरन सी होती है। हमारे ही अभिजातवर्ग द्वारा भ्रष्टाचार व नंगई के नित नए कीर्तिमान स्थापित किये जा रहे हैं। रोजाना बुरी चीजों का पिछला रिकॉर्ड ध्वस्त हो रहा है। हमारे सरपरस्त बेशर्मी से हंस कर कहते हैं, 'चलो किसी फील्ड में तो हम तेजी से फर्स्ट रैंकिंग की ओर जा रहे हैं!

पहले चर्चा करने में भी झिझक होती थी अब तो पूरी फिल्में रोज देखने को मिल रही हैं! कहाँ जा रही है हमारी राजनीति? देश तो खोखला हो ही रहा है, डरता हूँ कि देखा-देखी कहीं आमजन की मानसिकता भी पूरी तरह से खोखली न हो जाए!? वैसे काफी अंतर तो आ ही चुका है उसमें! मानसिकता व भाषा के साथ ही हमारी शारीरिक भाषा भी रुग्ण होती जा रही है! फालतू का डर नहीं है यह, ..उत्तर प्रदेश की ही किसी ट्रेन के जनरल डिब्बे में, पान की दुकान पर, सरकारी कॉलेज के परिसर में, खाने के ढाबे पर, क्षेत्रीय लोकल ट्रेन / बस आदि में साधारण लोगों से बात करके देखिये या गौर से उनके परस्पर वार्तालाप को सुनिए, विश्वास हो जाएगा। यह सब हमारे बड़ों, हमारे अगुवों, हमारे आकाओं की ही देन है! इति।

Monday, November 23, 2015

(५१) बेचारी 'हिंदी', ..या बेचारे 'हम'!

बड़ी विडम्बना की बात है कि क्षेत्रीय भाषा, मातृभाषा या राष्ट्रभाषा आदि किसी भी रूप में हिंदी आज बुरी तरह से तिरस्कृत है।

सर्वप्रथम यदि हम हिंदी को एक क्षेत्रीय भाषा के रूप में लें और इसकी तुलना अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से करें तो हम पाते हैं कि बंगाल, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल एवं अन्य राज्यों में वहां की कुछ न कुछ क्षेत्रीय भाषाएं (मातृभाषाएं) हैं और वहां के मूल निवासी 'आपसी' सामान्य व्यवहार में उन भाषाओँ को 'अधिकारपूर्वक' एवं 'गर्व' से बोलते हैं, 'बिना किसी तुच्छ भाव के'; जबकि 'मूलतः हिंदी भाषी' राज्यों में हिंदी के साथ आज ऐसा व्यवहार नहीं होता है!

अन्य राज्यों के लोग भी आज विभिन्न प्रकार की उच्च शिक्षाएं प्राप्त कर रहे हैं और सरकारी व गैरसरकारी आंकड़ों के अनुसार आज वे हिन्दीभाषी राज्यों की तुलना में कुछ 'अधिक' शिक्षित हैं। सब जानते हैं कि भारत में बारहवीं कक्षा के बाद शिक्षा का माध्यम अधिकांशतः 'अंग्रेजी' ही होता है। इसका अर्थ है कि वे (विशेषकर दक्षिण भारतीय) अंग्रेजी में भी निपुण होते हैं यह भी सब जानते हैं। इसके बावजूद बोलने-लिखने में अपनी 'मातृभाषा' पर उनका 'अधिकार' क्या कुछ कमतर है? या उसके प्रति 'सम्मान' कुछ कम है क्या? क्या वे उसे 'दोयम दर्जे' का समझते हैं? क्या वे उसका 'उपहास' उड़ाते हैं? क्या 'हीन' समझकर वे उसे 'तिरस्कृत' करते हैं? ...बिलकुल भी नहीं।

लेकिन 'हिन्दीभाषी राज्यों' में 'हिंदी' आज किस हालत तक 'तिरस्कृत' है यह सब जानते हैं, वैसे बात को गलत ठहराने के लिए तर्कों का कोई अंत नहीं होता! वर्तमान पीढ़ी में अधिकांश को उर्दू मिश्रित आसान हिंदी की भी आज कुछ ख़ास समझ नहीं है, क्लिष्ट हिंदी की बात तो जाने दीजिए!

अंग्रेजी जानने व अपनाने के विरुद्ध नहीं हूँ मैं, परन्तु उस प्रक्रिया में अपनी क्षेत्रीय भाषा (हिंदी) के प्रति उनका ऐसा रवैया मेरी तो समझ से परे है! किसी (अंग्रेजी) को सम्मान देने के लिए किसी (हिंदी) को तिरस्कृत व अपमानित करना बुद्धिमत्ता नहीं! यदि हम ऐसा करते हैं तो अवश्य ही हमारी मानसिकता 'गुलामी' की ही कही जाएगी! या हमें निर्लज्ज, पिछड़ा हुआ, संकुचित, संकीर्ण, अहंकारी आदि समझा जाना चाहिए! ...और वास्तव में समझदारों की दृष्टि में आज हम ऐसे ही हैं!

मातृभाषा के रूप में भी हिंदी की अवहेलना व तिरस्कार अपनी माता के अनादर समान ही है! यह एक कड़वी वास्तविकता है कि हिंदी भाषी राज्यों के चुनिन्दा लोग ही वास्तव में अंग्रेजी का गहरा ज्ञान रखते हैं और अंग्रेजी भाषा में सहजता के साथ 'पूरे' अधिकार से लिख-पढ़ सकते हैं, शेष अंग्रेजी-परस्त हैं मात्र! यद्यपि हिंदी को वे आसानी से भली-भांति सीख सकते थे/हैं, परन्तु व्याप्त अंग्रेजी-परस्त मानसिकता के कारण उन्हें समाज से, यहाँ तक कि अपने अभिभावकों से भी इसके लिए कोई प्रेरणा नहीं मिली/मिलती!

तो 'मूलतः हिन्दीभाषी होने के कारण' अपने प्रति विभिन्न 'हीन' भावनाएं रखने, हिंदी के प्रति तिरस्कारपूर्ण रवैया अपनाने और फालतू में ही अंग्रेजी के पीछे लग जाने से हिंदी लोगों की स्थिति आज त्रिशंकु समान हो गई है! न घर के रहे, न घाट के! 'सहज उपलब्ध' मातृभाषा हिंदी ठीक से सीखी नहीं, और अंग्रेजी ठीक से सीख न पाए! गुलाम मानसिकता व हीन भावना के कारण बौद्धिक क्षमता व इच्छाशक्ति कमजोर होती ही है! ...सो इन कारणों से 'हिंगलिश' का उदय हुआ! इसके साथ हम हिंदी लोग कितना खुश हैं आज! कहते हैं कि संवाद का 'नया' माध्यम ढूंढ निकाला!

वास्तव में यह 'नया' माध्यम हमारी 'कमजोरियों' के फलस्वरूप ही निकला है; और हम लगभग यह स्वीकार कर चुके हैं कि हम अब बलिष्ठ होने से रहे! सो इस 'नाकामी' को एक 'उपलब्धि' के रूप में बता कर फूले नहीं समा रहे हैं!

अब बात आती है राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के स्वरूप की। तो यहाँ भी हिंदी का हाल कुछ अलग नहीं! वैसे तो हम अपने ज्ञान में बढ़ोत्तरी करने हेतु अन्य देशों की राष्ट्रभाषाएं जानने-सीखने आदि का 'गंभीर' प्रयत्न करते रहते हैं, परन्तु घर की मुर्गी दाल बराबर! यदि हम किसी अन्य देश के नागरिक को गर्व से कहें कि हमें उसकी राष्ट्रभाषा का भी ज्ञान है, हम उससे उसकी भाषा में बात करें, और अचानक वह हमसे पूछ ले कि हम अपनी राष्ट्रभाषा का कितना ज्ञान रखते हैं? तो उस समय अवश्य ही हमारी आंखें शर्म से झुक जायेंगी! ...क्या आप चाहते हैं कि ऐसा हो, या अपरोक्ष अथवा परोक्ष रूप से उस तक ऐसा सन्देश जाए?

हमें अपने स्वाभिमान की चिंता बिलकुल भी नहीं! मात्र कहने को पिछले ६७ वर्षों से हम स्वतंत्र हैं मगर हमारी मानसिकता आज भी गुलाम है! क्या है हमारे पास हमारा कुछ 'मौलिक', जिसपर हम 'गर्व' कर सकें, जिसे लेकर हममें 'हीन भावना' न हो? अपने देश के प्रत्येक नागरिक तक अपनी बात पहुँचाने के लिए एक माध्यम रूपी हमारी राष्ट्रभाषा तक तो हमारी अपनी नहीं, हमारा उसपर अधिकार नहीं, हमें उसका ज्ञान नहीं, ..तो अन्य किसी ठोस उपलब्धि की बात हम कैसे कर सकते हैं?

वर्षों से, वर्षों तक, हम अपने 'मालिकों' पर निर्भर रहे, आज भी हैं और पता नहीं कब तक रहेंगे? 'केवल' राष्ट्रीय स्तर पर अपनी संप्रेषित करने हेतु आज हम एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा पर निर्भर हैं और विडम्बना यह कि वो भाषा भी देश के अधिकांश जनसाधारण को ठीक से समझ में नहीं आती! कहने का अर्थ यह कि आज भी एक राष्ट्र के रूप में हम सब एक नहीं, और यह इसलिए कि हम अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति आदरभाव न जुटा सके! इति।