Friday, April 17, 2009

(१४) अभिजात वर्ग

हम लोग अपने यहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार, अनैतिकता आदि के विषय में काफी चर्चा करते हैं। बार-बार मनन करने पर एक ही निष्कर्ष सामने आता है कि इसकी जड़ हमारी असंतुलित मानसिकता व आध्यात्मिकता में ही है। हम भौतिकता के पीछे इतना व्यग्र व आसक्त हो गए हैं कि हमने नैसर्गिक आध्यात्मिकता, श्रेष्ठ मान्यताओं व नैतिक मूल्यों को विस्मृत कर दिया है। यदि हमें विकसित देशों का पिछलग्गू बनना ही है, तो हमें उन देशों के बहुमुखी भौतिक विकास, खुशहाली आदि पर बिलकुल तटस्थ व गंभीर दृष्टि डालनी चाहिए। हम पायेंगे कि उनकी सफलता व उस सफलता के स्थायित्व का राज उनके कर्तव्यबोध में, कर्तव्यपरायणता में, कठिन शारीरिक श्रम में, स्वस्थ मानसिकता में व उत्कृष्ट आध्यात्मिकता में छुपा है। शरीर तो सभी का एक जैसा ही होता है पर विकास एवं खुशहाली के पीछे असली चीजें यही होती हैं जो ऊपर बताई गयी हैं। यह बात उन्होंने देशाटन के दौरान शायद हमारे ही देश के तत्त्ववेत्ताओं व पूर्वजों से सीखी, भली भांति अपनाई, अपने आचार में शामिल की व बहुमुखी विकास एवं खुशहाली को प्राप्त किया। पर हम भारतवासियों को बाद में उनकी भौतिक तरक्की व विकास ही दिखाई दिया, उसके पीछे का मूल कारण नहीं। और फिर हम भी शीघ्र भौतिक विकास की राह पर चल दिए विभिन्न 'शॉर्टकटों' के माध्यम से। इस प्रक्रिया में हम मानसिक रूप से दिवालिया व आध्यात्मिक रूप से खोखले होते जा रहे हैं। उपरोक्त लेखन या समीक्षा को आप नकारात्मक सोच बिलकुल भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि यदि हमें वास्तव में सुधरना है तो हमें केवल 'अपनी' कमियों पर ध्यान देना होगा और 'अन्यों' की सिर्फ अच्छाइयों पर ही। 'अपनी' कमी अर्थात् मेरे सहित मेरे आस-पास के समाज / संघ की कमी।

ध्यान दें कि अधिसंख्य समाज (लगभग ९८%) मात्र अनुगामी होता है, वह अभिजात वर्ग (लगभग २%) का मात्र अनुसरण करता है। तो फिर तार्किक दृष्टि से तो यह अभिजात वर्ग ही वर्तमान स्थिति के लिए मुख्यतः जिम्मेदार है। २% अभिजात वर्ग के लोग अर्थात् समाज के महत्त्वपूर्ण लोग, जैसे -- नेता, अभिनेता, पत्रकार, वकील, न्यायाधीश, उद्योगपति, व्यापारी, अधिकारी, पुलिस, प्रशासक, शासक, चिकित्सक, अध्यापक, गुरु आदि। लगभग ९८% लोगों के लिए इनमें से एक या अधिक आदर्श स्वरूप होते हैं। वे उन्हीं का अनुसरण करते हैं।

तर्क करने वाले अब यह कहेंगे कि यदि ऐसा ही है तो फिर विश्व में विभिन्न क्रांतियाँ कैसे संभव हुयीं?? ये क्रांतियाँ तो आम लोगों द्वारा ही संचालित हुयीं। यदि अभिजात वर्ग के अनुसरण वाला सिद्धांत ठीक है तो ऐसा हो पाना तो लगभग असंभव ही था! फिर भी ऐसा क्यों हुआ??

देखा जाये तो तर्क के इस प्रश्न में ही इसका उत्तर छुपा हुआ है -- पहली बात तो क्रांति रोज-रोज नहीं होती। दूसरी बात यह कि क्रांति का मुख्य कारण आम नागरिकों में उपजा भारी असंतोष होता है। समाज का माहौल पहले बड़े-बड़े लोगों के गलत व्यवहार के कारण ख़राब होता है; कोई संदेह नहीं कि इसके लिए आम नागरिक भी जिम्मेदार होते हैं क्योंकि वे भी बड़े लोगों का अनुसरण कर रहे होते हैं। सभी के स्वेच्छाचार से माहौल धीरे-धीरे ख़राब होते-होते उस अवस्था तक जा पहुँचता है कि आम आदमी को अब उस माहौल में बेचैनी व घुटन महसूस होने लगती है। कह सकते हैं कि अति की स्थिति आ जाती है। इस स्थिति में ही आम आदमी जागता है। और आम आदमी के जागने पर ही क्रांति संभव होती है। हाँ, उनको जगाने के लिए कुछ समाज सुधारक क्रांतिकारी नेताओं का प्रयास अवश्य कार्य करता है, परन्तु फिर भी क्रांति का मुख्य कारण बुरी स्थितियों का 'संतृप्त अवस्था' तक पहुंचना ही होता है।

प्रारंभ में जब अभिजात वर्ग भ्रष्टाचार में लिप्त होता है तो उनको ऐसा करता देख अनुगामी वर्ग उन्हीं के कृत्यों को उचित जान वैसा ही अनुसरण करता है। पर स्थिति ख़राब होते-होते एक दिन ऐसा आता है कि जब उनको यह अहसास होता है कि उनका यह वर्तमान आचरण (अनुसरण) ही तो इस दम-घोंटू वातावरण के लिए जिम्मेदार है। और तब सारी भड़ास उच्च पदों पर आसीत् लोगों के विरुद्ध ही निकलती है, क्योंकि निश्चित रूप से वे सब ही समाज की इस अधोगति के लिए मूलतः जिम्मेदार होते हैं।

तो यह सब जानने के बाद भी क्या हम अतीत से सबक नहीं ले सकते? जैसे हर काल में समाज में उतार-चढाव आते रहे, क्रांतियाँ होती रहीं, वैसा ही क्या इस काल में भी होता रहेगा? क्या ज्वार-भाटे ही हम भारतीयों की नियति बन चुके हैं? क्या हमारा जीवन एक शांत नदी की भांति नहीं चल सकता? .... यह सब ठीक हो सकता है, यदि हमारे अनुकरणीय, हमारे अगुआ अर्थात् अभिजात वर्ग अपने-आप को परिवर्तित करे, संतुलित करे।

इधर मेरा पंजाब व हिमाचल जाने का कुछ कार्यक्रम बन रहा था, सो पर्यटन सम्बन्धी कुछ किताबें उलट-पुलट रहा था। इन्हीं में जानकारी मिली कि - "कालका-शिमला रेल पथ लगभग १०० वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह दुर्गम पहाड़ियों पर स्थित है। राह में लगभग १०२ सुरंगों में से व ८६९ पुलों पर से रेलगाड़ी गुजरती है। सबसे लम्बी सुरंग ३,७५२ फुट लम्बी है। इस मार्ग में पड़ने वाले पुलों व सुरंगों को देख कर तत्कालीन इंजीनियरों और कारीगरों के श्रम व कुशलता की दाद दी जा सकती है। ८६९ पुलों में से केवल एक पुल लोहे से निर्मित है, जबकि शेष पुल पत्थर से बने हैं, इनमें से एक पुल तो चार-मंजिला है।" ... कुछ इसी प्रकार की प्रशंसा हम प्राचीन इमारतों के विषय में भी सुनते हैं। ... पर समानान्तर रूप से पिछले दिनों समाचारपत्र में यह भी पढ़ने को मिला कि 'लखनऊ मेडिकल कॉलेज के एक नव-निर्मित भवन की तीसरी मंजिल से पत्थर की दीवार-टाइलें निकल कर डॉक्टरों के ऊपर गिरीं, वे बाल-बाल बचे!' ... वैसे सुनते हैं कि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में बड़ी तरक्की हो गयी है!

सत्य ही है कि तकनीकी क्षेत्र में अब अनेक क्रांतिकारी खोजें हो चुकीं हैं व उपकरण आदि बन चुके हैं, परन्तु साथ ही यह भी सत्य है कि जब तक हमारी ईमानदारी व कर्मठता इन अत्याधुनिक खोजों के साथ नहीं जुड़ती, तब तक इन सब आविष्कारों का कोई लाभ नहीं। जिन देशों ने ईमानदारी व कर्मठता अपना ली, वे आज मजबूती के साथ (बिना खोखलेपन के) शीर्ष पर हैं। हम भारतीय इतनी अधिक प्रतिभा रखते हैं, पूरा विश्व कायल है हमारा, तदपि ईमानदारी व कर्मठता के अभाव के कारण हमारे यहाँ के उत्पादों में वह गुणवत्ता, मजबूती, सफाई और सबसे बढ़कर निरंतरता नजर नहीं आती। प्रतिभा भरपूर है, लेकिन भ्रष्टाचार भी सर चढ़कर बोल रहा है। कोई अतिरिक्त स्वार्थ सिद्ध हो रहा हो, केवल तब ही विश्वस्तरीय गुणवत्ता दिखाई देती है, पर साधारणतः एक आम भारतीय कामचलाऊ कार्य करता ही नजर आता है, क्योंकि उसके अधिकांश आदर्श भी आज यही कर रहे हैं। यह एक कटु सत्य है। उद्योगपति हो या व्यापारी, इंजीनियर हो या डॉक्टर, नेता हो या प्रशासकीय अधिकारी, पुलिस हो या वकील; अधिकतर सभी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं या फिर कम से कम अवसरवादी तो हैं ही। आज भारत के अधिसंख्य भाग में यह काम या होड़ जोरों पर है कि कौन किसको अधिक से अधिक 'चूना' लगा सकता है, अर्थात् बेवकूफ बना कर ठग सकता है। व्यापारी, उद्योगपति, अधिकारी, इंजीनियर, नेता, वकील, डॉक्टर, दवा कम्पनियाँ, रोग-जाँच केंद्र (diagnostic centre), निजी वित्त (ऋण प्रदाता) कम्पनियाँ, निजी बीमा कम्पनियाँ, निजी दूर-संचार कम्पनियाँ, निजी शिक्षण संस्थान, अधिकांश धार्मिक संस्थाएं व अन्य बहुत से निजी संस्थान आदि आज जो भी सेवाएं दे रहे हैं, उनमें लोक-हित की भावना बहुत कम व निज-स्वार्थसिद्धि की भावना अधिक है। सभी इसी फिराक (खोज) में हैं कि कैसे दो पैसे और बन जायें - येन केन प्रकारेण। नैतिकता जाये भाड़ में! भौतिक जीवन की नश्वरता को भी भुला दिया है जैसे ...!

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी क्यों पीछे रहेंगी? जिस मूल देश से वे सम्बन्ध रखती हैं वहां तो उनका कार्य साफ-सुथरा है, पर भारत में चूँकि भ्रष्टाचार खूब है, अतः यहाँ वे भी चाँदी काट रहीं हैं। बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं। समाचार माध्यम -- प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जिनके ऊपर कभी बड़ा सामाजिक दायित्व माना जाता था, आज ये दोनों माध्यम पैसे व यश की होड़ में बिक चुके हैं। कर्तव्यबोध को तो एक तरफ जाने दीजिये, आज टी.आर.पी. की प्रतिस्पर्धा में समाचार माध्यम जो खेल खेल रहे हैं, उनसे कौन परिचित नहीं है! साधारण ख़बरों को नमक-मिर्च लगा कर असाधारण रूप देना, भ्रमित करने वाले कार्यक्रम गढ़ना, उत्तेजक व आक्रामक भाषा शैली का प्रयोग करना, यह सब आम बातें हैं भारतीय समाचार चैनलों पर। समाचारों को चटपटी चाट बना कर रख दिया है; गंभीरता, नम्रता, सौम्यता, सब नदारद हैं। हर चीज को बेचने में लगे हैं। कमोवेश प्रिंट मीडिया भी इसी राह पर चल रहा है, पर यहाँ लोक-लाज अभी थोड़ी-बहुत बाकी है।

एक और क्षेत्र, जो पत्रकारिता से पवित्र माना जाता था, वह था - धर्म का क्षेत्र। इस क्षेत्र में पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ही ले लें तो पायेंगे कि २४ घंटे चलने वाले हमारे ५-६ भक्ति चैनल दुनिया में निराले ही हैं। इनमें जो धार्मिक कार्यक्रम आते हैं, वे अधिकतर विज्ञापन ही प्रतीत होते हैं; और जो बीच-बीच में छोटे-बड़े विज्ञापन आते हैं, उनकी तो बात ही अनोखी है। इनको तटस्थ दृष्टि से देखिये तो पायेंगे कि ये सब भौंडी होड़ करते हुए, लोगों को भ्रम में डालते हुए, बस पैसा बटोरने में लगे हैं। इन धार्मिक चैनलों ने तो लोगों की रुचि बदल कर रख दी है, जनमानस को सस्तेपन की ओर ढकेल दिया है।

उधर मोबाइल कम्पनियों की भी होड़, आक्रामक विज्ञापन, अन्य निरुपयोगी सुविधाओं की आदत डलवाना, छुपे खर्च, कामचलाऊ गुणवत्ता, आदि किसी से छुपे नहीं हैं। इनके इन्हीं सब प्रयासों के चलते आज भारत की शहरी युवा पीढी के पास बिना किसी विशेष आवश्यकता के दो-तीन मोबाइल फोन या दो-तीन 'सिम कार्ड' होना अवश्यम्भावी है। घर में, बाहर, बस में, ट्रेन में, मोटरसाइकिल पर, कार में, ये इससे चिपके ही रहते हैं। कई युवा तो इन्हें अपने अभिभावकों से छुपा कर भी रखते हैं। ... गर्व कीजिए कि हमारा देश विकसित हो गया है! टेलीविजन पर आने वाले विभिन्न प्रतियोगी कार्यक्रमों में आजकल बहुत आम हो चले S.M.S. के खेल में इन दूर-संचार कम्पनियों की सहभागिता से भी बुद्धिजीवी वर्ग परिचित ही होगा!

बेवकूफ बना कर पैसा बटोरने का खेल चल ही रहा है, तो चिकित्सक वर्ग भी क्यों पीछे रहेगा? जो जागरूक लोग हैं, वे अवश्य यह जानते होंगे कि डॉक्टरों, दवा कम्पनियों व निजी रोग-जाँच केन्द्रों के बीच क्या सांठ-गांठ चलती है! धन अर्जित करने के लिए ये एक-दूसरे पर आश्रित हैं इसमें कोई संदेह नहीं, पर यहाँ तो इससे आगे भी बहुत कुछ होता है, और कारण है - अत्यधिक धन-लिप्सा।

राज नेताओं व पुलिस विभाग की बात करना यहाँ उचित नहीं होगा, कई पृष्ठ भर जायेंगे, फिर भी संभवतः बात पूरी न हो। मध्य, पूर्वी और उत्तर भारत में तो स्थिति बहुत विकट है तथा इससे सब परिचित हैं। ... आगे बढ़ते हैं।

वर्तमान में शासन-प्रशासन भी स्वायत्तता के नाम पर इन सब भ्रष्टाचारियों पर रोक लगा पाने में लगभग निष्फल ही है। ... पर एक कार्य प्रशासन अवश्य कर रहा है कि वह आम जनता को सचेत कर रहा है -- "भ्रष्टाचारियों से बच कर रहो, भ्रमित मत होओ, जागो और सतर्क रहो; 'ऐड्स' भी खूब फ़ैल रहा है, इसलिए बचाव हेतु वाह्य सुरक्षा उपाय अपनाओ, आदि-आदि।" अर्थात् साफ़ दिखाई पड़ रहा है कि भ्रष्टाचार और अनैतिकता की रोकथाम हेतु सरकार कुछ भी अधिक करने में अक्षम है, पर जनता को परामर्श दे रही है कि उनके विषैले परिणामों से खुद को बचा लो। ... यह तो वही बात हो गयी कि - "शहर में मच्छर बहुत हैं पर हम तो अहिंसावादी हैं, अतः मच्छरों को नष्ट नहीं कर सकते; हम समाजवादी व समवादी भी हैं, अतः उनको भगा व समझा भी नहीं सकते, वे कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं, अतः प्रिय नागरिकों, बेहतर हो कि आप ही सदैव मच्छरदानी में रहें। हाँ, जनता में से कोई यह भी कह रहा था कि रासायनिक प्रदूषण बहुत बढ़ गया है; तो हम क्या करें, सरकार इसमें कुछ नहीं कर सकती, बेहतर हो कि आप ऑक्सीजन-मास्क लगा कर चलें। स्वतंत्र देश में सब स्वतंत्र हैं।"

हमारे देश के कर्णधार, आदर्श व अभिजात वर्ग के लोग आखिर क्यों ऐसा कर रहे हैं? हम जैसे लोगों के पास मुख है, जीभ है, कलम है, पर कुछ करने का अधिकार नहीं है। संभवतः अपने पूर्वकर्मों के कारण हम अति-सीमित हैं, हम अभिजात वर्ग के भी नहीं हैं कि आम-जन हमारी सुने या हमारे कृत्यों पर ध्यान दे। तो फिर एक और क्रांति की प्रतीक्षा करना या किसी नए ईश्वरीय अवतार की बाट जोहना ही हमारी वर्तमान नियति है या फिर हमारे आदर्श, हमारे अगुआ, हमारे रोल-मॉडल, हमारे देश के बड़े व महत्त्वपूर्ण लोग, अर्थात् हमारा अभिजात वर्ग क्या स्वयं से कोई प्रथमोद्योग (पहल) करेगा? इन बड़े लोगों जैसे - नेता, अभिनेता, धर्मगुरु, खिलाड़ियों आदि व अभिजात वर्ग से सम्बंधित अन्य लोगों का यह अच्छा भाग्य है कि वे आज इन उच्च पदों पर आसीत् हैं, उनके पास सामर्थ्य है, शक्ति है, अधिकार हैं; लोग उनकी बात सुनते हैं, उनके अनुयायी हैं। वे चाहें तो मात्र स्वयं को बदल कर समाज को बदल सकते हैं। सस्ती लोकप्रियता व ढेर सारे धन का मोह त्याग कर वे मात्र संतुलित व आडम्बर-रहित जीवन जियें, उपदेश आदि न भी दें, तो केवल उनकी यह संतुलित और ठोस जीवन-शैली ही समष्टि (सर्व समाज) के लिए प्रेरणादायी होगी और एक बेहतर समाज का निर्माण होने में मदद मिलेगी। इति।

Wednesday, April 15, 2009

(१३) अध्यात्मप्रसार व प्रसारक का दृष्टिकोण

अध्यात्मप्रसार की व्यापकता इसमें निहित होगी कि सभी साधक प्रसार में भाग लें। अर्थात् प्रत्येक सीखने वाला साधक अन्य लोगों को (नए साधकों को) जितना शीघ्र हो सके, सिखाना आरंभ कर दे। अर्थात् प्रत्येक साधक तात्त्विक एवं प्रायोगिक शास्त्र के अध्यापन में शीघ्र हिस्सा ले, यह विचार मन में रख कर कि उन्नति हेतु प्रत्येक व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान की त्वरित आवश्यकता है। मेरे ऐसा कहने का तात्पर्य यह कतई नहीं है कि प्रत्येक साधक कोरा पाण्डित्य झाड़े और अहं का शिकार हो जाये। यहाँ सिखाने / पढ़ाने का उद्देश्य यह भी है कि सिखाने / पढ़ाने वाला साधक इससे स्वयं की भी शीघ्र प्रगति करेगा। वह कैसे? एक उदाहरण से स्पष्ट होगा --

एक प्रौढ़ व्यक्ति है, बीवी-बच्चे वाला है, नौकरी आदि करता है। अपने बचपन व जवानी में वह एक साधारण विद्यार्थी रहा था। किसी भी विषय की बहुत गहराई से पढ़ाई नहीं की थी। और अब तो अनेक वर्ष बीत चुके हैं पढ़े हुए, सो अब तो सब धूमिल हो चुका है। कमोवेश उसका यही हाल नैतिक मूल्यों व धार्मिकता के विषय में भी है। अर्थात् कुल मिला कर वह एक औसत व्यावहारिक व औसत आध्यात्मिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति है। उसका एक बच्चा है जो अभी छोटा सा ही ५-६ वर्ष का है। वह व्यक्ति चाहता है कि उसका बच्चा पढ़ाई में अच्छा रहे व नैतिक गुणों का भी धनी हो। यानी किताबी पढ़ाई, व्यवहार, व नैतिकता, तीनों में वह बच्चे को निपुण करना चाहता है। तो वह अपने बच्चे को कक्षा दर कक्षा स्वयं अध्ययन करके रोजाना पढ़ाता है। सत्संग आदि में जाकर या किन्हीं अन्य स्रोतों से वह आध्यात्मिक ज्ञान भी जुटाता है और अपने बच्चे को सिखाता है। यानी जितनी मेहनत उस व्यक्ति ने स्वयं अपने लिए नहीं की थी, उससे अधिक वह अपने बच्चे के लिए करता है, क्योंकि उसकी हार्दिक इच्छा है कि उसका बच्चा परिपूर्ण बने।

.... तो हम देखते हैं कि अपने बच्चे को अच्छा व परिपूर्ण बनाने की धुन में वह व्यक्ति स्वयं भी परिपूर्णता को प्राप्त करता जा रहा है। वह स्वयं भी नित कुछ सीख रहा है और इस तरह से सीखा हुआ टिकाऊ व आत्मसंतोष देने वाला होता है। इस उदाहरण से स्पष्ट हो गया होगा कि साधकों से किस प्रकार की अपील की जा रही है। उपरोक्त उदाहरण के अनुसार अध्यापन करने से किसी प्रकार के पाण्डित्य का अहंभाव जन्म नहीं लेता क्योंकि नितांत स्वयं का कोई स्वार्थ नहीं होता। मात्र एक लक्ष्य होता है कि दूसरे की ठीक-ठीक व शीघ्र प्रगति कैसे संभव हो सके। इस प्रकार के अध्यापन से साधक (अध्यापक) की स्वयं की भी निरंतर और टिकाऊ प्रगति होती रहती है। अर्थात् इस प्रकार का दृष्टिकोण रखने पर दोहरा व दोगुना लाभ मिलता है तथा सबसे बढ़कर यह होता है कि अनोखे आत्मसंतोष व आनंद की अनुभूति होती है, हल्कापन महसूस होता है। इति।

Tuesday, April 14, 2009

(१२) कर्म - शक्ति - धर्म - सुख

ईश्वर द्वारा निर्मित प्रत्येक वस्तु, यहाँ तक कि स्वयं ईश्वर की या प्रकृति की समस्त शक्तियां भी प्रत्येक जीव के लिए सहजता से उपलब्ध हैं। इनको प्राप्त करने हेतु मात्र पुरुषार्थ (परिश्रम / योग्य कर्म) की आवश्यकता होती है। सुपात्र या कुपात्र जैसी कोई शर्त नहीं होती। जैसे पेड़ की छाँव, सूर्य का प्रकाश, वर्षा का जल और अग्नि की ऊष्मा सज्जन एवं दुर्जन को समान रूप से प्राप्त होते हैं। तभी तो असुरों (दुर्जनों) को भी तपस्या आदि से ईश्वरीय शक्ति (या शस्त्र आदि) मिलने के दृष्टांत हम पौराणिक कथाओं में देखते हैं। ईश्वर भी एक तत्त्व है और इसके अनेक गुणधर्म हैं। सभी गुणधर्मों को एकत्रित रूप से हम 'धर्म' कहते हैं। यदि एक भी गुणधर्म छूट जाये या रह जाये तो 'धर्म' का स्वरूप 'अधर्म' में बदलने में देर नहीं लगती। 'धर्म' का मार्ग शांति की ओर ले जाता है जबकि 'अधर्म' की परिणति अंततः अशांति, दुःख आदि में होती है। उदाहरणार्थ - कर्ण, रावण आदि। ... दूसरे शब्दों में हम ऐसे कह सकते हैं कि शक्ति, सामर्थ्य आदि (सभी प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कार व उन पर आधारित उत्पाद) हम निज क्रियमाण से प्राप्त तो कर सकते हैं, पर यदि हम उनका प्रयोग ईश्वरीय गुणों के विपरीत करते हैं तो अवश्य ही हम दुःख व अशांति को प्राप्त करते हैं। उनका उपयोग ईश्वरीय गुणों के अनुरूप करने से हमें सुख व शांति का अनुभव होता है। ईश्वरीय गुणों के अनुरूप से तात्पर्य है -- सहज रूप से, प्रकृति के अनुरूप, लोक-हितार्थ, योग्य एवं न्यायपूर्ण। इति।

Monday, April 13, 2009

(११) परिश्रम (साधना)

हम सत्संग जाते हैं, महापुरुषों-संतों आदि के प्रवचन सुनते हैं व उनके पौराणिक ग्रंथों को पढ़ते हैं, .. पर वह नहीं करते, जो उन लोगों ने किया। अर्थात् परिश्रम व साधना नहीं करते। तभी तो हम उनकी बातों का महत्त्व जान कर भी नहीं जान पाते, उनकी बातों को अपनी दिनचर्या, आचरण आदि में शामिल नहीं कर पाते। उन महापुरुषों जैसा बनने के लिए हमें परिश्रम व साधना की आवश्यकता है। वास्तव में स्वयं साधना करके ही हम सत्य को खोज सकते हैं। बिना गहराई से जानने की उत्कंठा के, बिना तड़प व उद्विग्नता के केवल ऊपरी तौर पर ही किसी बात को ज्यों का त्यों मान लेना अनुभूति-रहित साधना ही है और वह निर्जीव है। ऐसी साधना अन्धविश्वास को जन्म देती है, बढ़ावा देती है। वास्तविक धर्म, ज्ञान, विद्या आदि की खोज दूसरे के पैरों से नहीं हो सकती। हाँ, संतों, महापुरुषों व गुरुओं द्वारा संचित व संकलित ज्ञान तथा उनके दिशा-निर्देशों से हमारी राह कुछ आसान अवश्य हो सकती है, पर चलना हमें अपने पैरों पर ही होगा। जैसे - तैराकी सीखने के लिए हम इससे सम्बंधित कुछ किताबें पढ़ सकते हैं - ये हमें तैराकी नहीं सिखातीं, पर इस विधा पर थोड़ा-बहुत शाब्दिक मार्गदर्शन देती हैं। इसके अलावा हम तैराकी के किसी प्रशिक्षक की मदद ले सकते हैं - वह हमें और अच्छे से मार्गदर्शन दे सकता है। ... पर फिर भी इन सब के बावजूद हमारे स्वयं के प्रयास व परिश्रम ही हमें तैराकी सिखाते हैं व इसमें निपुण करते हैं। व्यायाम-शाला में भी गुरु हमारे लिए दंड-बैठक नहीं लगा सकते। अपने शरीर-सौष्ठव हेतु हमें स्वयं ही व्यायाम करना पड़ता है। गुरु की भूमिका दिशा-निर्देशक की है, महत्त्वपूर्ण है, पर फिर भी सीमित है। ऐसे ही, आध्यात्मिक प्रगति हेतु भी श्रेष्ठ संतों के वचन हमारी सोई जिज्ञासा व उत्कंठा को झिंझोड़ कर जगाने का कार्य करते हैं। वे हमें परम-सत्य को जानने व उसको पाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। मात्र इतना ही कार्य है विभिन्न मार्गदर्शनों का; शेष साधक को स्वयं निज-क्रियमाण से ही करना पड़ता है। ऐसा करने पर ही साधना में स्थायित्व आता है, वह अटूट होती है व साधक अवश्य लक्ष्य को पाता है। इस स्थिति में आने पर वह दूसरों की जिज्ञासा व उत्कंठा जागृत करने का प्रयास आरम्भ कर देता है अर्थात् व्यष्टि उपरांत समष्टि साधना आरम्भ कर देता है। पर परम-सत्य इतना विशाल है कि उसे शब्दों में बांध लेना संभव नहीं। यह अनुभूति का विषय ही है। ठीक-ठीक अनुभूति हो जाये तो यह (परम-सत्य) बहुत छोटा व बहुत सरल है। अतएव सभी पंथिक ग्रन्थ या अन्य मार्गदर्शन भी उस परम-सत्य की मर्यादित व्याख्या ही कर सकते हैं। वर्तमान साधक इन सभी साधनों से अपनी प्रकृति अनुसार मर्यादित मार्गदर्शन ही ग्रहण कर सकता है व शेष अन्वेषण उसे स्वयं करना पड़ता है और उसकी कोई थाह नहीं। इसीलिए अध्यात्मशास्त्रीय साधना का मूलभूत सिद्धांत यही बताया गया है - जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियाँ, व उतने ही साधनामार्ग। एक जगह पढ़ा था - "तुममें से कोई भी यदि सत्य को समझने का प्रयत्न कर रहा हो, तो तुम जब भी उसके सम्पर्क में आओ तो सद्व्यवहार का परिचय दो; सत्य-अन्वेषण में उसकी मदद करो; और स्वयं को उस सत्य-अन्वेषक से उच्च अथवा अधिक प्रतिभासंपन्न न समझो।" साधना के आरंभ में जिज्ञासा व उत्कंठा जागृत होने का कारण उस व्यक्ति का प्रारब्ध या अन्य किसी व्यक्ति (गुरु) की खरी समष्टिगत साधना है, तदुपरांत आगे के चरणों में उस व्यक्ति (साधक) का सपरिश्रम क्रियमाण। यही सपरिश्रम क्रियमाण ही 'साधना' है। इसी से अंततः हमें सत्य की अनुभूति होती है। इति।

Saturday, April 11, 2009

(१०) सार संकलन

-->> हम सभी को एक संतुलन की आवश्यकता होती है - भौतिकता व आध्यात्मिकता के बीच।

-->> 'विश्व स्वास्थ संगठन' ने भी एक 'आदर्श स्वस्थ व्यक्ति' की जो परिभाषा बताई है, उसके अनुसार व्यक्ति को चार प्रकार से स्वस्थ होना चाहिए - शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, व आध्यात्मिक रूप से।

-->> स्वस्थ मानसिकता व आध्यात्मिकता हेतु हमें 'धर्म' की शरण में जाना आवश्यक होता है। 'धर्म' अर्थात् 'आत्मानुभूति' - आत्मा को अनुभूत करना - आत्मा के गुणधर्मों को अनुभूत करना। ईश्वर व आत्मा के गुणधर्म में कोई अंतर नहीं, मूलतः वे सच्चिदानंद ही हैं, अर्थात् पूर्णतयः शुद्ध, स्वस्थ, चैतन्यमय, चिरस्थायी व आनंदमय। ये गुणधर्म (properties) हैं, गुण-दोष (nature) नहीं। जैसे शक्कर का मूल गुणधर्म 'मिठास' होता है। परमात्मा या आत्मा के गुणधर्म तो हैं, पर ये (परमात्मा व आत्मा) गुण-दोष रहित हैं। आत्मा की अनुभूति अर्थात् इसके गुणधर्मों की अनुभूति अर्थात् धर्म (righteousness) की अनुभूति। शक्कर की मिठास भी शाब्दिक व्याख्या से परे है, खासतौर पर उसके लिए, जो उससे अनभिज्ञ हो। 'मिठास' को ठीक-ठीक जानने हेतु शक्कर को जीभ पर रखकर उसके स्वाद (गुणधर्म) को अनुभूत करना ही एकमात्र विकल्प है। ऐसे ही 'धर्म' भी आत्मा के गुणधर्म की अनुभूति ही है।

-->> आज यदि हम अपनेआप को सहज महसूस नहीं करते हैं, तो अवश्य ही संतुलन में कुछ गड़बड़ी है। क्योंकि हम स्वस्थ मानसिकता व आध्यात्मिकता के प्रति जागरूक व आस्थावान नहीं हैं। वास्तव में आज अधिसंख्य का झुकाव भौतिकता की तरफ अधिक है; मूल्यांकन व समीक्षा करने वालों का भी। निश्चित तौर पर हम नैसर्गिक आध्यात्मिकता की या 'धर्म' की अनदेखी करते हैं, या शायद हम 'धर्म' से अनभिज्ञ ही हैं।

-->> प्रत्येक व्यक्ति के कार्यों में धार्मिकता या अधार्मिकता का कम-ज्यादा प्रमाण, उस व्यक्ति की लिंगदेह (आंतरिक देह) में विद्यमान अविद्या व उसके घटकों (मन, बुद्धि, संस्कारों आदि) के प्रमाण (मात्रा) पर निर्भर है, क्योंकि अविद्या के ये घटक ही 'धर्म' की वास्तविक अनुभूति में बाधक हैं।

-->> चूँकि आत्मा का मूल गुणधर्म 'धर्म' है, अतः आत्मा से आने वाला प्रत्येक स्पंदन या निर्देश, 'धर्म' का ही निर्देश है। या वह साक्षात् 'धर्म' ही है। पर अविद्या के आवरण के कारण वे निर्देश हमारी ज्ञानेन्द्रियों या कर्मेन्द्रियों तक नहीं या कम पहुँचते हैं। इस स्थिति में हमारे अधिकतर कार्य अविद्या के घटकों (मन, संस्कार, बुद्धि, अहं आदि) द्वारा ही संपन्न होते हैं, तभी तो वे दोषपूर्ण (अधार्मिक) हो सकते हैं अथवा होते हैं, क्योंकि अविद्या के घटकों व वृत्ति का झुकाव सदैव सत्य की ओर हो यह आवश्यक नहीं। सारांश में 'आत्मा' अर्थात् जलता हुआ बल्ब (प्रकाश-स्रोत), तथा 'अविद्या' अर्थात् बल्ब पर ढका मोटा काला कपड़ा।

-->> अब जो भी विधि या साधन इस 'अविद्या' का नाश कर पाए, उस विधि या साधन का क्रियान्वयन ही 'साधना' कहलायेगा।

-->> चूँकि यह विषय 'आत्मा' से सम्बन्ध रखता है, अतः इसे 'अध्यात्म' (अधि+आत्मन) कहते हैं। विभिन्न सिद्धांतों व कृत्यों के समावेश उपरांत यह 'अध्यात्मशास्त्र' कहलाता है।

-->> अतः 'अध्यात्मशास्त्र' वह शास्त्र हुआ, जो व्यक्ति को उसके वास्तविक रूप से तथा वास्तविक (मूल) गुणधर्म से परिचित करवा सके।

-->> मूल रूप व मूल गुणधर्म (धर्म) से परिचित होने में बाधा हैं -- अविद्या के विभिन्न घटक। इनकी जानकारी अध्यात्मशास्त्र द्वारा पहले शब्दों, तदुपरांत अनुभूतियों द्वारा होती है व यथोचित साधना करने पर अविद्या के घटकों का नाश प्रारंभ होता है।

-->> विभिन्न आध्यात्मिक साधनायें हमें धर्म नहीं सिखातीं, वरन वे हमारे अज्ञान (अविद्या) के आवरण को नष्ट करतीं हैं मात्र। आवरण नष्ट होने या क्षतिग्रस्त होने पर हमें वास्तविक धर्म का पता स्वतः ही चलता है। जैसे - जलते हुए बल्ब के ऊपर ढका मोटा कपड़ा क्षतिग्रस्त होने या हटने के पश्चात् प्रकाश स्वतः ही प्राप्त होता है -- क्षतिग्रस्त होने पर थोड़ा-बहुत व हटने पर भरपूर।

-->> चूँकि 'धर्म' परमात्मा का गुणधर्म है और परमात्मा सर्वव्यापी है, अतः धर्म की उपलब्धता सर्वत्र व सर्वकाल है। यह हमें सहज ही व नैसर्गिक तथा सूक्ष्म रूप से सदैव प्राप्य है। जब भी आवश्यकता पड़ने पर हम इसे परमात्मा से प्राप्त करते हैं या दूसरे शब्दों में - सीखते हैं, तो उस समय हम परमात्मा को या उसके मार्गदर्शन स्पंदनों को 'गुरुतत्त्व' की संज्ञा देते हैं। अतः कह सकते हैं कि 'गुरु' एक ईश्वरीय तत्त्व है, जो प्राकृतिक रूप से सदैव कार्यरत है। देह के माध्यम से जो कार्य करता है, वह उसी तत्त्व का सगुण रूप है।

-->> आध्यात्मिक साधना हेतु परम आवश्यक है - साधना के प्रति श्रद्धा की, ईश्वर के प्रति श्रद्धा की, व सबसे बढ़कर तीव्र उत्कंठा या तड़प की। जितनी तीव्र उत्कंठा, उतनी ही तेज गति से आध्यात्मिक प्रगति।

-->> चूँकि आज अविद्या के घटक अधिक सक्रिय हैं अतः व्यक्ति मन के संस्कारों व वृत्ति के अधीन है, फलस्वरूप आरम्भ में या बाद में भी व्यक्तियों के साधना-मार्ग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं / होते हैं। पर यदि व्यक्ति एक बार दृढ़ता से संकल्प ले ले कि स्वयं के मूल को जानना व पाना है, तो आगे का मार्ग सरल हो जाता है, भले ही साधना-मार्ग भिन्न-भिन्न क्यों न हों। एक बार उत्कंठा जाग गयी तो समझिये लक्ष्य का पता चल गया, तदुपरांत साधना-पद्धति व साधन गौण हो जाते हैं। तीव्र उत्कंठा के साथ जब व्यक्ति साध्य की ओर गंभीरता से अग्रसर होगा, तो कहीं न कहीं से प्रेरक मार्गदर्शन अवश्य मिलेगा - सगुण या निर्गुण रूप में।

-->> एक बार जब विषय ठीक से समझ में आ जाये, साध्य के प्रति तड़प जाग जाये, तो व्यक्ति का कर्तव्य हो जाता है कि वह अन्यों को भी इस विषय के बारे में बताये, व आगे जाने हेतु प्रेरित करे। वह इसलिए क्योंकि भौतिक रूप से व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है व उसे समूह में या एकत्रित (संघ में) रहना आवश्यक होता है। व्यक्ति व संघ में एकता न हो तो उस व्यक्ति का अस्तित्व खतरे में होता है। अतः जब अधिसंख्य समाज धार्मिकता को जानेगा, धर्माचरण करेगा, तभी धार्मिक व्यक्ति उस संघ के साथ भली-भांति रह पायेगा। संघ में रहना ही माया है और यह ईश्वर द्वारा ही निर्मित है।

-->> परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना व जीवित रहना तो एक आम बात है; पर महत्त्वपूर्ण है - परिस्थितियों को अनुकूल बनाना, जीवित रहने योग्य बनाना। अनैतिकता व भ्रष्टाचार (अधार्मिकता) से समझौता कर जीवित रहने का प्रयास भले ही व्यावहारिक प्रतीत हो, पर है तो वास्तव में कायरतापूर्ण ही। सच्चा धार्मिक ही व्यष्टि (स्वयं की) व समष्टि (समाज की) साधना, विशेष रूप से समष्टि साधना के माध्यम से माहौल को धर्मानुकूल बनाने का साहस कर सकता है। वर्तमान में प्रचलित व्यावहारिकता यदि किसी गलत कृत्य (अराजकता, भ्रष्टाचार आदि यानी अधार्मिकता) का विरोध नहीं करती, तो वह (तथाकथित व्यावहारिकता) नपुंसकता ही है।

-->> आज दो ही उपाय हैं - पहला यह कि समाज को धर्म व अध्यात्मशास्त्र के विषय में बताना तथा गंभीर व परिणामकारक साधना के लिए प्रेरित करना, जिससे माहौल सत्य के अनुकूल बन सके; और दूसरा यह कि समुचित मार्गदर्शन एवं सुधरने के मौके मिलने के उपरांत भी न सुधरने वाले दुष्टों को दण्डित करना।

उपसंहार -- महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि लेखन किसका है, शब्द किसके हैं, विचार किसके हैं; बल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि उस लेखन, शब्दों या विचारों को कितना मथा जाता है, चिंतन किया जाता है। मंथन से ही सार निकलता है। सार से विषय समझ में आता है। विषय समझ में आने से व्यक्ति में उत्कंठा व तड़प जागती है, साध्य पता चलता है। फिर वह व्यक्ति लग जाता है व्यष्टि व समष्टि साधना में - अविद्या के ही घटकों की सहायता से! अविद्या जब पूरी तरह से हट जाती है तो उस व्यक्ति का अलग से कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। इस अवस्था को विरले ही प्राप्त करते हैं, पर सब प्राप्त कर सकने में सक्षम हैं। साधकों के लिए समष्टि साधना का महत्त्व, व्यष्टि साधना से जरा सा भी कम नहीं होना चाहिए, क्योंकि धर्मी (साधकों) का अस्तित्व धर्मीजनों के बीच ही संभव है। ... कभी-कभी तो समष्टि का विचार, व्यष्टि से भी अधिक श्रेयस्कर लगता है। इस माया में हमें सांघिक ढांचे में रहना ही है, तो क्यों न सभी की आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करते-करते सभी के साथ चला जाये प्रगति के पथ पर! इति।

Wednesday, April 8, 2009

(९) व्यवहार व अध्यात्म

जब एक साथ कुछ लोग बैठते हैं, तो परस्पर रचनात्मक व सकारात्मक विचारों का भी आदान-प्रदान होता है। और इसी माध्यम से हम एक-दूसरे से प्रेरित होकर कुछ न कुछ सीखते हैं। .... मेरे एक मित्र कुछ समय पहले कनाडा और अमेरिका की यात्रा पर गए थे। लौट कर आये तो ऐसी ही एक बैठक में पुनः उनसे भेंट हुई। विदेश का हाल पूछने पर वह बोले कि "कनाडा, अमेरिका में उपभोक्तावाद का बहुत जोर है। बड़े-बड़े विशालकाय स्टोर्स, दुकानें, मॉल आदि जगह-जगह खुले हुए हैं। बहुत अधिक चकाचौंध, तड़क-भड़क व भव्यता है। सभी तरह के उपभोक्ता सामान की खरीदारी पर लोगों का बहुत अधिक जोर है। पर वहां आम लोगों की आध्यात्मिक गतिविधियाँ लगभग शून्य हैं। चर्च वगैरह भी शायद कभी-कभार ही जाते होंगे।" तब मेरे मित्र से एक प्रश्न किया गया कि "यह तो वहां का एक पहलू हो गया। अब यह बताएं कि वहां नैतिकता का प्रतिशत कितना है? यानी ईमानदारी, कर्तव्यपालन, कानून व न्याय व्यवस्था, राजकीय गतिविधियाँ, प्रशासन, आदि के विषय में भी कुछ बताएं।" ... मेरे वह मित्र कुछ देर खामोश रहे, फिर बोले कि "यह सब तो बहुत ही अच्छा है। ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता और अनुशासन-बद्धता, प्रशंसायोग्य है वहां की। कोई दुर्घटना वगैरह हो जाये तो कुछ ही क्षणों में पुलिस व एंबुलेंस आदि पहुँच जातीं हैं। शीघ्र चिकित्सालय पहुँचाया जाता है। जीवन की रक्षा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है। इसके अलावा विभिन्न कार्यालयों आदि में भी समय-पालन, कर्तव्य-पालन आदि के विषय में सभी लोग स्वयं ही बहुत जागरुक रहते हैं। जो भी नागरिक वहां के बने कानूनों के अंतर्गत रहता है, वह लगभग पूरी तरह से सुरक्षित है; उसको कोई भी परेशानी हो, ऐसा लगभग असंभव ही है। व्यक्तिगत रूप से एक-दूसरे से मिलने में वहां के लोग थोड़े औपचारिक हैं, पर सामान्यतः शांत, हंसमुख व एक-दूसरे का ध्यान रखने वाले हैं। काम-काज में उत्साही हैं और इसमें किसी प्रकार की हिचक या हीन-भावना नहीं रखते हैं। चोरी, डकैती या लूट-पाट, भ्रष्टाचार आदि लगभग नहीं के बराबर हैं। लोगों के पास सब सुख-सुविधाएं हैं, पर वे उनको संतुलित ढंग से प्रयोग करते हैं, उनसे चिपकना अर्थात् तीव्र-आसक्ति नहीं है, जैसी अपने यहाँ कम्प्यूटर, मोबाइल-फोन, बाईक, अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स, आदि के प्रति है। हर चीज को उतना ही महत्त्व दिया जाता है जितने के योग्य वह वास्तव में है। इसीलिए वहां खोखली भागम-भाग नहीं है। कार्यालय आदि का फोन अलग है और काम के समय के अतिरिक्त यानी छुट्टियों आदि में वह लगभग बंद रहता है। अवकाश में खूब जिंदादिली के साथ लोग परिवार सहित मजा करते हैं या किसी मित्र-रिश्तेदार आदि से मिलने जाते हैं। यानी काम के समय डट कर काम व उसके अतिरिक्त शेष समय में जीवन को खुशनुमा ढंग से जीना। सत्य व न्याय-प्रियता (righteousness) तथा देश-प्रेम कूट-कूट कर भरा है। पर मानवता (righteousness) थोड़ी सी ऊपर है। उसको चोट लगते देख वे राष्ट्रपति तक की खिंचाई करने से बाज नहीं आते। वैसे नेता, सरकार आदि सब अच्छे हैं।"

मेरे मित्र का यह वक्तव्य सुन कर आप बखूबी समझ गए होंगे कि यथार्थ आध्यात्मिकता कहाँ छुपी है! दिखाई देने वाले कर्म-कांडों व उपासना-पद्धतियों में नहीं, वरन असली आध्यात्मिकता हमारे रोजमर्रा के कार्यों में झलकती है, यदि वह वहां हो तो। मेरा अनुमान ही है कि अमेरिका के लोग भले ही दिखावी उपासना नहीं करते हैं, पर वे ईश्वर से हम भारतीयों की अपेक्षा अधिक डरते हैं, नम्रता से ईश्वर का दिल ही दिल में सम्मान करते हैं। ईश्वर के प्रति यथार्थ प्रार्थना व कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतिशत भी हम लोगों से अधिक है। हम लोग ऊपर से पाखण्ड अधिक करते हैं पर भीतर से खोखले होते जा रहे हैं। यह हमारे व्यावहारिक कृत्यों व मानसिकता से सबको विदित है ही, चाहे हम अहंवश इसे स्वीकार न करें। हमारे यहाँ के आश्रम, मठ आदि भी इससे अछूते नहीं हैं। ऊपर से तो सब वैराग्य का, सादगी का नारा लगाते हैं, पर बात जब स्वयं पर आती है तो सबको मालूम ही है कि हमारे धार्मिक गढ़ कितने वैभवशाली हैं। कहाँ हैं आज चाणक्य या समर्थ गुरु रामदास जैसे निकट इतिहास के ही संत महापुरुष, जिनको सत्ता, धन, सांसारिक यश आदि एक इशारे पर ही मिल सकता था या यह सब उनके क़दमों के नीचे था ही, पर वे इन सब से वास्तव में मुक्त रहे और सदैव मात्र मार्गदर्शक की ही भूमिका में रहे। इनके अतिरिक्त भी निकट इतिहास में ऐसे बहुत से संत हुए, जिन पर दिखावा या सांसारिकता अपना कोई असर नहीं छोड़ पायी थी, जिनमें से कुछ हैं - श्री रामकृष्ण परमहंस, संत तुकाराम, गुरुनानक देव, महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी, आदि। प्राचीनकाल में तो खरे संतों की बात ही कुछ और थी। बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा भी उनके आने पर राज-गद्दी तुंरत छोड़ देते थे, पर उन संतों ने कभी भी राज-महल का सुख नहीं लिया। अल्प-काल का आतिथ्य स्वीकार कर व राजा का मार्ग-दर्शन कर, पुनः वे अपनी साधारण कुटिया में लौट जाते थे। धन आदि व अन्य चल-अचल सम्पत्ति के संग्रह से वे कोसों दूर रहते थे। पर आज के समय में .....!! फिर भी एक आम भारतीय यही कहता है कि मेरा भारत महान है। महान है नहीं, महान था कभी।

हमें वर्तमान में जीना होगा। हमारी वर्तमान श्रेष्ठता केवल हमारी वर्तमान मनोदशा व वर्तमान आध्यात्मिक स्तर पर निर्भर करती है, न कि हमारे सुनहरे अतीत पर। यदि हमें कुछ सीखना है, उन्नत होना है, तो हमें धरातल पर (down to the earth) आना पड़ेगा। यदि हम स्वयं को जबरदस्ती श्रेष्ठ घोषित करने की चेष्टा करते हैं तो हमें पहले अपना आंकलन स्वयं ही करना होगा, स्वयं की तुलना अपने से उन्नत राष्ट्रों के साधारण नागरिकों से ही करनी होगी। मात्र अपनी व्यावहारिकता की ही तुलना विकसित राष्ट्रों के नागरिकों की व्यावहारिकता से कर के देख लें तो हम जमीन-आसमान का अंतर पायेंगे। यहाँ एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा -- हमारे भारत में विशेष तौर पर उत्तरी, मध्य, व पूर्वी भारत में जो व्यक्ति कानून का शत-प्रतिशत पालन करता है, वही सबसे अधिक भुक्तभोगी (sufferer) है; और किसी भी विकसित देश में जो व्यक्ति कानून का शत-प्रतिशत पालन करता है, वह सबसे अधिक सुरक्षित व सुख से है। ... जो व्यवहार में साफ-सुथरा है, जिसकी मानसिकता स्वस्थ है, वह निश्चित रूप से आध्यात्मिक रूप से भी काफी हद तक स्वस्थ होगा। क्योंकि आध्यात्मिकता प्रत्यक्ष रूप से हमारे योग्य व्यवहार व स्वस्थ मानसिकता में ही प्रतिबिंबित होती है। कह सकते हैं कि व्यवहार, आध्यात्मिक-स्तर का दर्पण है। एक अटल सिद्धांत है कि जब सीखने वाले की भूमिका में हों तो हम केवल अपनी बुराइयाँ देखें व दूसरों की केवल अच्छाइयाँ। और जब सिखाने वाले की भूमिका में हों तो सीखने वाले की बुराइयाँ उसे अवश्य बताएं। इसी में सर्व-हित है। तो हम तो परिपूर्णता से अभी कोसों दूर हैं, अतः हम सब अधिकांश भारतीय अभी सीखने की ही प्रक्रिया में हैं। इति।

Monday, April 6, 2009

(८) यह मैंने किया है ...!

कुछ समय (लगभग दो वर्ष) पहले मैं एक विद्वान व ज्ञानी व्यक्ति से मिला। समाज के अभिजात्य वर्ग में से एक हैं, सरकार में कर्मठ प्रशासनिक अधिकारी हैं। पिछले लगभग २० वर्षों से अध्यात्म में भी उनकी गहरी रुचि है और समाज की उन्नति के विषय में गहरा चिंतन भी करते हैं। इस विषय पर उनकी लगभग ३० किताबें व अन्य लघु साहित्य प्रकाशित हो चुके हैं। उनके मत के अनुसार व्यक्ति की आध्यात्मिक पूंजी ही सर्वाधिक महत्त्व रखती है, अन्य कुछ नहीं। उनका यह कथन शत-प्रतिशत ठीक है। ... चूँकि मेरा रुझान भी अध्यात्म की तरफ पिछले कुछ वर्षों से है, और इस अवधि में थोड़ा-बहुत लेखन कार्य भी अन्तःस्फूर्ति से हुआ। शुरुआती दिनों में मुझे अपने ऊपर बहुत गर्व होता था कि मेरी मानसिक व बौद्धिक क्षमता एकाएक बहुत बढ़ गयी है, मैं विलक्षणों की श्रेणी में आ गया हूँ, और यह सब लेखन कार्य मैं ही कर रहा हूँ। पर समय बीतने के साथ-साथ बहुत ही जल्दी मुझे यह अहसास तीव्रता से हुआ कि अध्यात्म-विषयक जो भी विचार मेरे मन में आ रहे हैं हैं, वे सब गुरु अथवा ईश्वर अथवा प्रकृति द्वारा प्रेषित हैं, .. मेरी बुद्धि का इसमें तनिक भी योगदान नहीं है। या बुद्धि का योगदान मात्र शब्द-विन्यास तक ही सीमित हो सकता है। .. पूर्व में मैंने इस विषय पर अन्य लेखकों या विचारकों को कभी नहीं पढ़ा-सुना था, इसलिए दिग्भ्रमित था; बाद में सबसे पहले डॉक्टर जयंत आठवले जी, तदुपरांत गांधीजी, विवेकानंद जी आदि को पढ़ा, तो अनेक स्थानों पर मेरे द्वारा लिखित विचारों व इन सब के विचारों में, कुछ विरोधाभासों के बावजूद अद्भुत समानता व सामंजस्य दिखाई पड़ा। कई स्थानों पर तो शब्द-विन्यास भी बहुत मिलता-जुलता था। मैं अवाक् रह गया।

... तब मुझे वस्तुस्थिति का भान हुआ कि अन्तःस्फूर्ति से बहुत गहराई से आने वाले निश्च्छल, निर्विकार व व्यापकता लिए हुए विचार, जो केवल मानव हित हेतु ही होते हैं, वे केवल और केवल ईश्वर या प्रकृति द्वारा ही संप्रेषित होते हैं। चिड़िया, कौए आदि पक्षी चौपाये जानवरों (जैसे गाय) की पीठ पर बैठ जाते हैं, उनसे अठखेलियाँ करते हैं, .. पर मनुष्य के साथ वे ऐसा नहीं करते। शायद उन्हें यह प्रकृति ही सिखाती है कि उनके लिए क्या उचित है। ऐसे अनेक कई और भी उदाहरण इस प्रकृति में दिखाई पड़ सकते हैं यदि हम सूक्ष्मता से निरीक्षण कर पायें। शायद हम इसे जीव-जंतुओं की सहज बुद्धि भी कह सकते हैं ..। पर ध्यान से देखें तो एक जंगली कुत्ते, गली के एक आवारा कुत्ते व एक पालतू कुत्ते की बुद्धि में बहुत अधिक अंतर होता है। आवश्यकतानुसार या परिस्थिति अनुसार शायद प्रकृति उनकी सहज बुद्धि में कुछ परिवर्तन करती है। कुएं के मेंढक व सागर के मेंढक की बुद्धि में भी शायद इसी लिए बहुत अंतर होता है ..। .. पर प्रत्येक जीव की सहज बुद्धि के उन्नत होने की एक सीमा है शायद ..। .. और हम मनुष्य भी एक जीव ही हैं, और शायद हमारी जानकारी के अनुसार हम इस संसार के श्रेष्ठतम जीव हैं जिसकी बुद्धि या ज्ञान के विकसित होने की कोई सीमा नहीं है, वह संभवतः अनंत है। गिरते-पड़ते हम लगातार उन्नत हो रहे हैं - कभी भौतिकी के क्षेत्र में तो कभी अध्यात्म के क्षेत्र में। दोनों ही इसी ब्रह्मांडीय ज्ञान का ही हिस्सा हैं। हम कुछ अन्तःस्फूर्ति से और कुछ अन्यों की बुद्धि से सीखते हैं। पर हमारे ज्ञान के अनुसार ही, अन्य भी तो इसी प्रकृति का एक हिस्सा ही तो हैं - हमारी तरह परमात्मा का ही एक अंश। तो हमारी अन्तःप्रेरणा और अन्यों की अन्तःप्रेरणा में अंतर हम क्यों महसूस करें? .. विषय कुछ दुरूह हो रहा है। इसको यहीं छोड़ कर हम वापस वहीं आते हैं।

... बहुधा हमारे मन पर अंकित पूर्व-संस्कारों, बुद्धि व अहम् के कारण हमको यही प्रतीत होता है कि ये विचार, यह लेखन सब मेरा ही किया-धरा है, मैं कमाल का हूँ, और जो कुछ भी मैंने लिखा है, वह मेरी 'बौद्धिक सम्पदा' है। इस प्रकार का विचार आधुनिक युग के मानवों में बहुत अधिक पाया जाता है। जबकि हम देखते हैं कि प्राचीन साहित्य या ज्ञान, जैसे वेद, उपनिषद आदि के रचियता अज्ञात ही हैं। या ऐसा माना जाता है कि वे ईश्वरीय प्रेरणा से सृजित हुए। महात्मा गाँधी जी ने भी अपने लेखन में इस बात को स्वीकार किया किया है - "जो मेरे विचार हैं, वे मेरे ही हैं ऐसा नहीं है, पर वे मेरी आत्मा में गड़े-जड़े हुए जैसे हैं। वे मेरे नहीं हैं, क्योंकि सिर्फ मैंने ही उन्हें सोचा हो सो बात नहीं। कुछ अन्तःस्फूर्ति से और कुछ किताबें पढ़ने के बाद बने हैं। दिल में भीतर ही भीतर जो मैं महसूस करता था, उनका इन किताबों ने समर्थन किया। उद्देश्य सिर्फ देश (संघ) की सेवा करने का, सत्य की खोज करने का, और उसके मुताबिक बरतने का है।"

इसी प्रकार प्रत्येक जन जब शुद्ध मन-बुद्धि से, तटस्थता से, स्वतंत्र चिंतन करता है तो उसे भी अपने भीतर इसी प्रकार से वचन सुने देते हैं जो लोकहित हेतु, सत्य व धर्म हेतु होते हैं। अनेक अन्य लेखनों में उसे इन वचनों का समर्थन व समानताएं भी दीखती हैं। तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अध्यात्म-विषयक विचार किसी भी व्यक्ति की निजी पूंजी या बौद्धिक सम्पदा नहीं होते। ... वास्तव में ये सब विचार टुकड़ों-टुकड़ों में धर्म (righteousness) की व्याख्या कर सकने में एक मर्यादा तक समर्थ हैं, लोकहित हेतु हैं। ये ईश्वर द्वारा संप्रेषित परन्तु अपरिपूर्ण मानव द्वारा अपूर्ण शब्द-भाषा में व्यक्त हैं, अतः सुधार की सम्भावना सदैव बनी रहेगी। इतना सब जानने के पश्चात् भी अहं के कारण व्यक्ति स्वयं को ही विचारों का सृजनकर्ता समझता है व तीव्र आसक्तिवश उस विचार / लेखन को निजी संपत्ति मान कर परेशान हो जाता है कि कहीं और कोई व्यक्ति इसे चुरा न ले। वह उसे कानूनी रूप से सुरक्षित करने का प्रयास करता है। और इतना ही नहीं, वह उसे बेचता भी है। इसके लिए वह विभिन्न तर्क भी देता है, पर सब खोखले हैं ....। .. ज्ञान, ईश्वरीय ज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान अमूल्य है, पर उसका रुपये में कोई मूल्य नहीं हो सकता। हाँ, गीता प्रेस की भांति बिना किसी अतिरिक्त मुनाफे के, न्यूनतम निर्माण मूल्य पर विक्रय अवश्य हो सकता है, इसमें किसी स्वार्थ की गंध-दुर्गंध नहीं। पर अन्य तरीकों से, शब्दजालों से, तर्कों से, विभिन्न स्पष्टीकरण देकर उस लेखन का बौद्धिक सम्पदा के रूप में संरक्षण करवाना व उसे मुनाफे पर विक्रय करना मात्र अहं का पोषण तथा स्वार्थ-सिद्धि है और कुछ नहीं। मेरा यह अनुभव है कि हमारे स्वार्थ-रहित कार्यों का उचित फल ईश्वर या प्रकृति द्वारा उचित समय पर अवश्य मिलता है, बिना हमारे प्रयास के, स्वतः ही। यह फल धन के रूप में भी हो सकता है, यश के रूप में भी, या अनोखे संतोष के रूप में भी। इस फल की कामना हम अपनी सीमित बुद्धि द्वारा भी कर सकते हैं, या इसे असीमित बुद्धि वाले ईश्वर की इच्छा पर भी छोड़ सकते हैं।

उपरोक्त यह सब समझने व लिखने की प्रेरणा मुझे उन विद्वान प्रशासनिक अधिकारी व चिन्तक द्वारा मुझे मुफ्त में भेंट की गयी कुछ किताबों को पढ़ने से मिली। प्रारंभ में ही सर्वाधिकार सम्बन्धी वैधानिक चेतावनी के दर्शन हुए। भीतर का भाग यानी कि लेखों को पढ़ा, तो उनके गहरे चिंतन, मनन आदि के दर्शन हुए; शब्द-विन्यास आदि भी बहुत ही अच्छा था। .. पर दृढ़ता के साथ महसूस हुआ कि इस लेखन की 'आत्मा' से मैं पूर्वपरिचित हूँ। इसके मूल भावों को मैं पूर्व में बहुत से अन्य लेखनों में भी महसूस कर चुका था। .. भौतिक विषयों से या विज्ञान से सम्बंधित शोध कार्यों को तो हम केवल मानसिक या बौद्धिक स्तर पर करते हैं, तो अज्ञानवश या मानसिक / बौद्धिक स्तर पर ही होने के कारण हम उन शोधों का श्रेय कदाचित् स्वयं को दे सकते हैं, उस शोध को अपनी बौद्धिक सम्पदा मान सकते हैं। पर जब हम एक स्तर और ऊपर उठ कर आध्यात्मिक स्तर पर पहुँचते हैं तो सर्वविषयों का आध्यात्मीकरण कर देते हैं। तब हम कर्ता नहीं रहते, केवल माध्यम ही रह जाते हैं। इस बात के ठोस प्रमाण मिलते हैं कि विज्ञान की अधिकांश बड़ी खोजें या शोध अचानक और / या बड़े विचित्र ढंग से हुए। खोज या शोध के दौरान खोजकर्ता प्रचलित व्याख्या या परिभाषा के अनुसार आदर्श मानसिक स्थिति में नहीं थे। संभवतः उस समय वे आत्मिक स्थिति में थे। कारण यह कि भौतिक जगत् भी तो ईश्वर द्वारा ही निर्मित है। हमारे वर्तमान संसाधनों का प्रत्येक कच्चा पदार्थ भी इस प्रकृति की ही देन है, कुछ भी ऐसा नहीं जो हमने निर्माण किया हो। पर वास्तव में हमने उनको व्यवस्थित ढंग से समझने व जोड़ने का कार्य किया है और वह भी आत्मिक स्तर पर पहुँचने पर ही संभव हो पाया है। तभी तो हम अक्सर सुनते हैं कि बड़े-बड़े वैज्ञानिक आधे पागल होते हैं, जाने कहाँ खो जाते हैं। ... वे खो नहीं जाते, वे तो मानसिक अवस्था से आध्यात्मिक अवस्था में पहुँच जाते हैं।

पुनः आगे होता यह है कि स्वार्थी संस्थाएं, सरकारें आदि उस वैज्ञानिक की विलक्षण खोज का दोहन करती हैं। गंभीरता से चिंतन करें तो पायेंगे कि प्रत्येक वैज्ञानिक खोज मूलतः लोक-हितार्थ ही होती है। पर बाद में वह मन, बुद्धि, अंहकार, और लालसाओं के चलते कोई और ही रूप ले लेती है। उदाहरण - परमाणु-शक्ति की खोज।

तो हमने देखा कि पूर्वकाल में भौतिक विषयों पर भी शोध / खोज कार्य करने वाले, उस खोज का श्रेय स्वयं नहीं लेना चाहते थे, वरन मात्र लोकहित ही उनका उद्देश्य रहता था। यह बात अलग है कि दुनिया वालों या सरकार के अनुग्रह पर वे निज सम्मान को शालीनता से स्वीकारते थे, शायद थोड़ा सा अंहकार भी पैदा हो जाता हो इस स्थिति में। फिर भी साधारणतः वे स्वयं को गर्वित ही महसूस करते थे, इससे अधिक नहीं। उनकी खोज जब लोक-हितार्थ प्रयोग होती थी, तो वे आत्मिक रूप से संतोष प्राप्त करते थे। और जब-जब उनकी खोज लोक-विध्वंस हेतु प्रयुक्त हुई, तब-तब वे दुःखी हुए।

हम देखते हैं कि भौतिक जगत् में तो शोध हेतु प्रचुर सामग्री व असीम संभावनाएं हैं, पर आध्यात्मिक साधना तो अतिसीमित है। परमात्मा, प्रकृति या निर्माण-कर्ता को, उसकी इच्छाओं, नियमों आदि को जानना; स्वयं को व इसके भीतर की विलक्षण ऊर्जा को जानना, अर्थात् आत्मा व परमात्मा का सम्बन्ध, उनके गुणधर्म, नियम, सिद्धांत आदि अन्तःस्फूर्ति या स्थूल गुरु के माध्यम से समझना तथा उनको अपने आचार से प्रकट करना ही अध्यात्म का एकमेव शाश्वत ध्येय है। यह सब असीमित ज्ञान है, पर अति सीमित भी। शब्दजाल फैलाने वाले तथाकथित गुरुओं तथा जिज्ञासा-रहित लोगों के लिए यह अत्यंत दुरूह; पर खरे जिज्ञासु तथा खरे गुरु के लिए अति सरल, अति सीमित है। तो इस असीमित परन्तु सीमित विषय की बारम्बार अलग-अलग खोज व व्याख्या कैसे संभव हो सकती है? बिलकुल मिथ्या है तथाकथित धर्मगुरुओं या विद्वानों का यह दावा कि सच्चा ईश्वरीय ज्ञान सिर्फ और सिर्फ उन्हीं के पास है और यह ज्ञान उनकी स्वयं की बौद्धिक या आध्यात्मिक सम्पदा है; खबरदार जो किसी और ने इसे चुराने या किसी और को देने की हिम्मत की!! ... अरे थोड़ा सा ही तो है ईश्वरीय ज्ञान, जो ईश्वर स्वयं अपने अंशों को (हम सब को) उनकी सर्वांगीण प्रगति हेतु प्रदत्त करते रहते हैं। इसीलिए तो प्रत्येक काल में संस्कृति, भाषा व स्थानानुसार उनमें ढेर सारी समानताएं भी दृष्टिगोचर होतीं हैं, जो हमारे चिंतन को बल भी देतीं हैं निरंतर। पर फिर भी हम मूर्खों समान समझते हैं कि इस ज्ञान पर मात्र मेरा ही अधिकार है। कितने संकुचित हो गए हम, और कितना संकुचित है हमारा दृष्टिकोण कि सरलतम विषय पर अपना अधिकार ज़माने चले हैं। .. माना कि बहुतों की पहुँच से यह वक्ती तौर पर दूर है, पर ऐसा विषय की गूढ़ता के कारण है - यह बात नहीं है। यह स्थिति मात्र अज्ञानता के कारण या जिज्ञासा के अभाव के कारण है। जब-जब किसी में जिज्ञासा उत्पन्न होती है, तो ईश्वर उसे ज्ञान देते हैं - सगुण या निर्गुण रूप में। ज्ञान पाने के बाद हमारा कर्तव्य यही है कि हम अन्यों में भी जिज्ञासा जगाने का प्रयास करें। क्योंकि हमारे ही ज्ञानानुसार विश्व के सभी व्यक्ति हमारे बन्धु ही नहीं, बल्कि अभिन्न अंग हैं। नियमानुसार, हम सबको समाज में या संघ-स्वरुप रहना है तो क्यों न सभी की आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करते-करते सभी के साथ चला जाये प्रगति के पथ पर। धर्म से परिचित होना व अन्यों को भी कराना, यह प्रत्येक का प्रथम कर्तव्य है। सर्वहित इसी में निहित है।

इसी विषय पर डॉक्टर जयंत आठवले जी की बात मुझे बहुत जंची। उनके द्वारा अध्यात्म पर बहुत सा लेखन हो चुका है। इस पर उनका कहना है कि --

"हम स्वयं को लेखक नहीं मानते, इसके कारण यहाँ दे रहे हैं --
(अ) 'व्यासोच्छिष्टं जगत् सर्वम्।' अर्थात् महर्षि व्यास जी ने लेखन के लिए कोई विषय शेष नहीं रखा, इसलिए लेखकों के लिए नया कुछ भी लिखना संभव नहीं है। अतः हमने सभी ग्रंथों पर 'लेखक' न लिखते हुए, 'संकलक' ही लिखा है।
(आ) संत ज्ञानेश्वर जैसे सर्वोच्च स्तर के संत जहाँ अपना उल्लेख नम्रतापूर्वक 'भाष्यकारों का सेवक' बतौर करते हैं, वहां लेखक छापने की हिम्मत हम नहीं कर सकते।
(इ) कई जानकारियाँ विभिन्न ग्रंथों व ज्ञानियों से मिलीं हैं। इसके अतिरिक्त, अन्तःस्फूर्ति से जो कुछ ज्ञात हुआ है, वह भी तो श्रीगुरु (ईश्वर) ने ही सुझाया है, इसलिए उसका कर्तापन और लेखकत्व अपनी ओर से नहीं लिया जा सकता।"

कितना विनम्र संबोधन है यह, और कितनी सच्चाई है इसमें। बस आवश्यकता है इस भाव को सदा-सदा के लिए अक्षुण्ण रखने की, सुरक्षित रखने की। इति।

Saturday, April 4, 2009

(७) सच्चे धार्मिक व अंधश्रद्ध कट्टर व्यक्ति में अंतर

सच्चे धार्मिक की सोच -- (संकेत चिन्ह -- +++)
अंधश्रद्ध कट्टर की सोच -- (संकेत चिन्ह -- ###)

(१)
+++ ईश्वर एक ही है, वह, जिसकी वह आराधना करता है व अन्य जातियों के ग्रंथों में दिए गए ईश्वर के अन्य रूप भी। सब एक ही हैं, मात्र नाम भिन्न हैं, शब्द भिन्न हैं।
### ईश्वर एक ही है और वह केवल वही है जिसका नाम उसकी जाति के ग्रन्थ-विशेष में लिखा है, जिसकी वह उपासना करता है। शेष जातियों के आराध्य झूठे हैं।

(२)
+++ अपने ज्ञान को कभी पूर्ण नहीं मानता, इसलिए अन्य ग्रंथों के प्रति भी जिज्ञासु रहता है।
### अपने ज्ञान को ही पूर्ण मानता है, इसलिए अन्य जातियों के ग्रंथों में कोई रूचि नहीं रखता।

(३)
+++ अपनी पद्धति से साधना करता है, पर दूसरे की साधना को निम्नकोटि का नहीं समझता।
### केवल अपनी पद्धति से साधना करता है और अन्य को शंका की दृष्टि देखता है व निम्न या झूठा समझता है।

(४)
+++ दूसरे को समझने व उससे सीखने की वृत्ति रखता है।
### मेरी उपासना-पद्धति ही सत्य है शेष सब मिथ्या, ऐसा विचार।

(५)
+++ अपने ज्ञान का प्रसार करता है।
### अपने ज्ञान का प्रचार करता है।

(६)
+++ दूसरे के ज्ञान का भी आदर करता है व उसके प्रति सदैव जिज्ञासु वृत्ति दिखाता है।
### दूसरे के ज्ञान को सदैव असत्य व झूठा कहता है, तो जिज्ञासा का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

(७)
+++ अपने ज्ञान में वृद्धि करने हेतु दूसरे समुदायों की धार्मिक सभाओं में भी सम्मिलित होता है।
### अपने समुदाय की धार्मिक सभा के अतिरिक्त अन्य कहीं भी जाना नहीं पसंद करता।

(८)
+++ दूसरे समुदायों की धार्मिक सभा में जब सम्मिलित होता है तो यथासंभव उन्हीं के तौर-तरीके प्रयोग करने का प्रयास करता है जिससे परस्पर प्रेम का निर्माण हो सके।
### दूसरों की धार्मिक सभा में जाता ही नहीं तो फिर शेष कृत्यों का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। हाँ प्रेम तभी दिखाता है जब कोई उसकी सभा में आये या उनके कहे अनुसार चले।

(९)
+++ लचीलापन रखता है। दूसरों से भी सीखने की वृत्ति।
### लचीलापन नहीं रखता। अतः दूसरों से सीखने की वृत्ति का अभाव।

(१०)
+++ अन्य जन-जातियों के साथ नम्रता निरपेक्ष होती है, प्रेम निरपेक्ष होता है।
### अन्यों के साथ नम्रता और प्रेम सापेक्ष (अपेक्षा पर आधारित) होता है।

(११)
+++ अन्यों की आलोचना कर सकता है, पर घृणा व द्वेष नहीं रखता। स्वयं में कट्टर हो सकता है पर अन्यों का विरोधी नहीं।
### अन्यों की आलोचना के साथ ही उनको निम्न भी समझता है, जिससे घृणा व द्वेष पनपता है। सदैव विरोधी वृत्ति रहती है।

(१२)
+++ अन्य जन-जातियों को कभी भी शंका की दृष्टि से नहीं देखता।
### अन्य जन-जातियों के प्रति सदैव शंकालु रहता है। काफी समय बाद शंका या शक कम होते हैं पर जाते नहीं जड़ से।

(१३)
+++ चूँकि दूसरी जातियों के साथ प्रेम निरपेक्ष होता है अतः वह प्रेम बहुत टिकाऊ होता है।
### अन्यों के साथ प्रेम सापेक्ष होता है अतः वह प्रेम टिकाऊ नहीं होता, मामूली प्रसंग से ही वह कम या समाप्त हो सकता है।

(१४)
+++ अधिकांश अंधविश्वासों को जानता व समझता है तथा उनसे चिढ़ता भी है, ... पर मात्र अंधविश्वासों से, अंधविश्वासियों से नहीं।
### स्वयं के कुछ अंधविश्वासों को भी विश्वास समझता है तथा अन्यों के कृत्यों को अन्धविश्वास घोषित करता है। समझे बिना बस घृणा करना ही जानता है।

(१५)
+++ अन्यों के अंधविश्वासों को विज्ञान, अध्यात्म व अन्य ठोस तर्कों से, व्यावहारिकता आदि से तोड़ने / हटाने का प्रयास करता है। आशय केवल यही होता है कि सभी बन्धु यथासंभव वास्तविकता में जिएं। इसके लिए वह 'विभिन्न' धार्मिक ग्रंथों की बातों का उल्लेख करता है यानी व्यापकता को अपनाता है।
### अन्यों के अंधविश्वासों को केवल अपने धार्मिक ग्रन्थ के सिद्धांतों के अनुसार तोड़ने / हटाने का प्रयास करता है। आशय होता है कि उसके ग्रन्थ से सभी परिचित हों व केवल उसी को मानें। यानी एक ज्ञान-विशेष को ही अपनाने का आग्रह होता है अर्थात् व्यापकता का बिल्कुल अभाव रहता है।

(१६)
+++ व्यापकता अपनाने से दूसरों में जल्दी घुल-मिल जाता है।
### व्यापकता का अभाव होने के कारण केवल अपने ही संप्रदाय तक सीमित रहता है।

(१७)
+++ व्यापकता अपनाने से सोच व खोज की सम्भावना असीमित होती है।
### व्यापकता के अभाव के कारण सोच व खोज बहुत सीमित रहती है।

(१८)
+++ व्यापकता के कारण हर प्रकार के ज्ञान में भी निरंतर वृद्धि होती है।
### व्यापकता का अभाव ज्ञान-प्राप्ति की प्रक्रिया को सीमित करता है।

(१९)
+++ ज्ञान के और व्यापकता के निरंतर विकसित होने से स्वयं में भी सरलता, हल्कापन और चैतन्य रहता है तथा दूसरों को भी उसकी संगति से अच्छे स्पंदन मिलते हैं।
### ज्ञान व व्यापकता की कमी के कारण स्वयं भी सहज नहीं रहता, भारीपन लिए रहता है, तथा दूसरों को भी उसकी संगति से विशेष अच्छे स्पंदन नहीं मिलते।

(२०)
+++ निज-स्वार्थ रहित परेच्छा से वर्तन करने की सदैव वृत्ति रखता है। अन्यों के विचारों का हृदय से आदर करता है व प्रत्येक से कुछ न कुछ सीखने का, ज्ञान पाने का अनवरत प्रयास करता रहता है।
### किसी भी दशा में परेच्छा से वर्तन नहीं करता। दूसरों का केवल बनावटी आदर करता है और सीखने से तो कोसों दूर रहता है क्योकि संकीर्णतावश अन्य सभी में उसे दुष्ट आत्माएं ही नज़र आती हैं।

.... इति।

Friday, April 3, 2009

(६) सर्व साधकों को चाहिए कि ... (भाग १)


(१) सभी साधक एक-दूसरे के साथ ऐसे मिलजुल कर रहें, जैसे कि एक 'आदर्श परिवार' के सदस्य आपस में रहते हैं।

(२) प्रत्येक साधक को दूसरे साधकों के साथ सदैव वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा कि वह स्वयं के लिए दूसरों से अपेक्षा करता है। यह बात लिखनी, पढ़नी व समझनी सरल है, पर लागू करनी थोड़ी कठिन; परन्तु हमारे लिए इसका निरंतर अभ्यास अति आवश्यक है।

(३) जब सभी साधक एक-दूसरे को अपने परिवार के सदस्य के समान ही मानेंगे, तो परस्पर भावना बढ़ेगी, एक-दूसरे की सहायता करने की तत्परता बढ़ेगी। ठीक वैसे, जैसे परिवार के सब कार्य हमें अपने ही तो लगते हैं।

(४) किसी साधक की कठिनाई के समय में, चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक, सर्व साधकों को उसकी सहायता के लिए उसी प्रकार तत्पर होना चाहिए जैसे अपने पुत्र-पुत्री, भाई-बहन अथवा माता-पिता के लिए होते हैं।

(५) उपरोक्त प्रकार की स्थिति बनाने के लिए सभी साधकों में आपस में खुलापन होना चाहिए व सभी साधकों में पारिवारिक सदस्यों की भाँति आपसी स्नेह (प्रीति) होना चाहिए।

(६) चूँकि हम सभी साधक हैं और परिपूर्णता के लिए प्रयासरत हैं, ... ईश्वरीय गुणों को अपने आचरण से प्रकट करने हेतु प्रयासरत हैं; अतः स्वयं के एवं अपने प्रत्येक साधक भाई-बहन के संस्कारों पर भी नियंत्रण पाना व संस्कारों को एक-एक करके समाप्त करना परम आवश्यक है। यही हमारा प्रथम लक्ष्य होना चाहिए, क्योंकि यही तो हमारी साधना का मुख्य भाग है।

(७) अपने अवगुणों और गलतियों को कम करने के साथ-साथ प्रत्येक साधक को, अन्य साधकों के लिए भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनकी भी प्रगति निरंतर होती रहे। इसके लिए प्रत्येक उस साधक को (जो गलतियाँ कर रहा हो या जिसमें कोई अवगुण हो) उसी प्रकार समझाना चाहिए जैसे अपने किसी परम-निकट या परम-प्रिय सम्बन्धी को समझा रहे हों। इस प्रकार का भाव रखने पर किसी के मन में भी गलत विचार नहीं आएंगे।

(८) जैसे पुत्र या पुत्री अथवा भाई-बहन, माता-पिता आदि से कोई गलती यदि हो जाती है, तो हम उसे धिक्कारते नहीं और न ही अपने परिवार से अलग करने का निर्णय लेते हैं; वरन उसे प्यार और सौहार्दपूर्ण ढंग से समझाते हैं और उसकी आदतों को ठीक करने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हैं। हाँ कभी-कभार थोड़ा-बहुत डाँटते भी हैं, सजा भी देते हैं, पर यह सब ऊपरी तौर पर ही। हमारे भीतर उसके प्रति स्नेह पूर्ववत् बना रहता है। डाँटते या सजा देते समय हमारी स्थिति नारियल के समान होनी चाहिए यानी बाहर से तो कठोर पर भीतर से नरम। यदि घर के सभी सदस्य किसी एक सदस्य को ठीक करने या संतुलित करने की ठान लेते हैं, तो गंभीरता और ईमानदारी से एकत्रित प्रयास कर हम उसे सही राह पर ला पाते हैं अन्यथा परिवार बिखर सकता है। पर सम्पूर्ण व एकत्रित, गंभीर एवं ईमानदार प्रयत्नों से भी जब वह सदस्य नहीं सुधरता, तो उसे उसके हाल पर छोड़ना ही पड़ता है। पर फिर भी उसके उज्जवल भविष्य के लिए हम अपने मन में सकारात्मक विचार रखते हैं, जैसे - उसका सदैव भला हो, वह सही मार्ग पर आ जाये और पुनः घर लौट आये, आदि-आदि। ठीक ऐसा ही दृष्टिकोण हमें अपने प्रत्येक साधक भाई-बहन के प्रति रखना होगा। हमें एक सूत्र में बंधे रहना होगा व एकत्रित होना नहीं छोड़ना होगा। तथा शीघ्र दूसरे अनजान जनों को भी साधक बनने के लिए प्रेरित करना होगा। इससे हमारा सुन्दर परिवार बढ़ेगा और यही एकत्रित संयुक्त परिवार ही तो हमारी शक्ति होगा, जहाँ केवल प्रेम, नम्रता, भाई-चारे, परस्पर भावना और तत्परता का बोल-बाला होगा। वस्तुतः ऐसा परिवार पूरा विश्व हो, यही तो परमेश्वर चाहता है। अतः हमारे ऊपर ही यह दायित्व है कि हम सभी साधक आपस में एक सूत्र में बंध कर ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करें कि दूसरे स्वयं ही प्रेरित हों इस परिवार का सदस्य बनने के लिए। मेरे सहित मेरे परिवार के सभी सदस्यों के स्वभावदोष कम हों, गलतियाँ कम हों, प्रेम अधिक हो, ... ऐसा दृष्टिकोण प्रत्येक साधक का होना चाहिए।

(९) भौतिक वस्तुओं व संसाधनों की चर्चा व चिंता सिर्फ उतनी ही करनी होगी, जितनी हमारे जीवन के निर्बाध रूप से चलने के लिए आवश्यक है। यदि किसी साधक के अतिआवश्यक भौतिक क्रिया-कलाप किसी कारण से बाधित हो रहे हों, तो उस साधक की सहायता करना अन्य साधकों का कर्तव्य होना चाहिए, ठीक वैसे ही, जैसे वह आपके परिवार का ही अभिन्न अंग हो।

(१०) अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पहचानना व उन्हें सीमित रखना प्रत्येक साधक का कर्त्तव्य है, यह हमारे नियोजन, मितव्ययता व अनुशासन के गुण को प्रकट करता है। भौतिक सुविधाओं और सुख-सामग्रियों के बीच रहने की आदतों से यथासंभव प्रत्येक को परे रहना चाहिए क्योंकि उनकी आदत पड़ जाने से, भविष्य में उनके अभाव से हमें बैचेनी हो सकती है।

(११) किसी भी साधक में स्वयं की भौतिक संपन्नता अथवा विपन्नता को लेकर कोई भी उच्च अथवा हीन भावना नहीं होनी चाहिए।

(१२) साधना के तौर पर सर्वप्रथम साधकों को मूलभूत ईश्वरीय गुण अपनाने व अपने आचारों के माध्यम से उन गुणों को प्रकट करने की आवश्यकता है। ईश्वरीय मूलभूत गुण तो अनंत हैं पर इनमें से प्रमुख हैं -- नम्रता, ईमानदारी, प्रीति, अनुशासन, नियोजन, दृढ़ता, समर्पण, समभाव, तत्परता आदि।

(१३) इन सभी गुणों के प्रकटीकरण के लिए आवश्यक है - ईश्वर के प्रति भाव; भाव अर्थात् विकल्परहित विश्वास, बल्कि इससे भी बढ़ कर। भाव का एक और अर्थ है, वह है - चित्त की संतुलित अवस्था। यह अवस्था हमें साधना के द्वारा तब ही प्राप्त होती है जब हम कर्म तो करते हैं और यथासम्भव ईश्वरीय गुणों के अनुसार ही करने का भरपूर प्रयत्न करते हैं, पर कर्तापन स्वयं नहीं रखते तथा फल भी ईश्वर-इच्छा पर छोड़ देते हैं। ऐसा जब हम सदैव करते हैं तो यही चित्त की संतुलित अवस्था है। यही सम्पूर्ण भाव है ईश्वर के प्रति, सम्पूर्ण निष्ठा है ईश्वरीय गुणों के प्रति।

Wednesday, April 1, 2009

(५) रिलीजन, धर्म, संस्कृति ...


(रिलीजन, धर्म, संस्कृति ...) पृष्ठ-१

अंग्रेजी शब्दकोष में रिलीजन (religion) शब्द का अर्थ मिलता है - prevailing system of faith in and worship of. अर्थात् विश्वास (आस्था) और पूजा का प्रचलित तरीका। संभवतः अमुक रिलीजन, किसी अमुक समुदाय या संघ के ईश्वरीय विश्वास, आस्था और पूजा के आंतरिक व वाह्य (सूक्ष्म व स्थूल) आचारों-विचारों का सम्मिलित रूप है। अर्थात् उस समुदाय की विभिन्न स्थूल-सूक्ष्म उपासना पद्धतियाँ, ईश्वर के साकार-निराकार नाम एवं रूप, कर्म-काण्ड, तीज-त्यौहार व पारंपरिक उत्सव आदि उसमें शामिल हैं। यह सब समुदाय दर समुदाय भिन्न-भिन्न होता है, अतः यही कारण है कि विश्व भर में इतने सारे रिलीजन हैं। जबकि धर्म / धार्मिकता शब्द का अंग्रेजी भाषा में समानार्थी शब्द है - righteousness. अर्थात् सत्यनिष्ठा, योग्य एवं न्यायपूर्ण आचार-विचार। संभवतः हिन्दू शास्त्रों या तत्त्वज्ञान के अनुसार भी धर्म का कमोवेश यही अर्थ निकलता है, इसलिए हिंदी शब्द 'धर्म' का अंग्रेजी में अनुवाद रिलीजन (religion) बिलकुल गलत है। हमारे पहले के अध्ययन से भी यही निष्कर्ष निकला था कि आत्मानुभूति ही धर्म है। धर्म तो प्रत्येक जगह पर एक ही है। अतः विभिन्न रिलीजनों में इसके भिन्न-भिन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता। जबकि अन्य स्थूल-सूक्ष्म अनुष्ठानों को हम अंग्रेजी में 'religious activities' या 'religious rituals' कह सकते हैं। .... एक दूसरे को अपनी बात संप्रेषित करने के लिए हमारे पास भाषा व शब्दों की सीमितता है, और जब विषय अनुभूति से सम्बंधित हो तो मुश्किल और भी बढ़ जाती है। अतः इस विषय को हम आगे धीरे-धीरे असहाय शब्दों के माध्यम से जारी रखेंगे।

वर्तमान में हिंदी भाषा में 'रिलीजन' के समानार्थी कोई शब्द नहीं है। प्राचीन भारत में पहले 'धर्म' शब्द में सब निहित हो जाता था। अर्थात् पहले 'धर्म' शब्द का अर्थ 'रिलीजन' शब्द के बहुत निकट था। पर कालांतर में, ज्ञान की अगली कक्षाओं या अवस्थाओं में पहुँचने पर पता चला कि आत्मानुभूति ही सही मायनों में धर्म है, यही righteousness है। आज धर्म या righteousness शब्द से तो सभी परिचित हैं परन्तु आत्मानुभूति से नहीं, जो धर्म या righteousness तक पहुँचने का मूल कारण है। चूँकि इतना वृहद सूक्ष्म आध्यात्मिक ज्ञान सहज ही हम भारतीयों को विरासत में मिला है आत्मानुभूति के ज्ञान के रूप में; अतः इस बदलते दौर में हम इसको मात्र आधुनिक शब्द 'रिलीजन' के दायरे में नहीं जाने दे सकते। यदि कोई नया शब्द 'रिलीजन' सृजित हुआ है तो प्राचीन 'धर्म' की केवल वही बातें 'रिलीजन' शब्द के अंतर्गत जायेंगी, जो उस शब्द के भावात्मक अर्थ की परिधि में आतीं हों। अर्थात् समस्त वाह्य आचार-विचार हम 'रिलीजन' शब्द में स्थानांतरित कर सकते हैं। ध्यान रहे कि शब्दों का, भाषा का महत्त्व मात्र भाव-भावनाएं समझने-समझाने के लिए है, अतः उनसे मोह उचित नहीं। वैश्वीकरण के इस दौर में विभिन्न संस्कृतियों व भाषाओँ के आपस में घुल-मिल जाने से कई शब्दों के अर्थ बदल चुके हैं व कई के बदल रहे हैं। हमें भी वैश्वीकरण के इस दौर में अपने को लगातार 'अपडेट' रखने की आवश्यकता है। यदि हम जिद में आ जाएँ कि हम तो अभी भी अपने 'धर्म' शब्द को उसी 'प्राचीन अर्थ' में ही प्रयुक्त करेंगे, तो हम अपनी बात, खरे धर्म की बात, अन्यों को नहीं समझा पायेंगे। 'यह विश्व ही मेरा घर है' के अनुसार हमें लचीलापन लाना ही पड़ेगा। मत भूलिए कि शब्द, भाषा आदि मात्र माध्यम हैं अपने विचार संप्रेषित करने हेतु। बाद में तो सब बंधुओं को आत्मिक स्तर पर आना ही है, तब भाषा की कोई समस्या नहीं रहेगी।

ऐसे ही 'संस्कृति' या culture शब्द भी बहुत पुराना नहीं है। हमारे "समस्त वाह्य आचार" जैसे - भाषा, रहन-सहन, वेशभूषा, तीज-त्यौहार, रीति-रिवाज आदि इस शब्द की परिधि में आ जाते हैं। एक तरह से 'रिलीजन' भी इसी में आ जाता है। 'रिलीजन' के लिए हम 'पंथ' शब्द प्रयुक्त कर सकते हैं।

(रिलीजन, धर्म, संस्कृति ...) पृष्ठ-२

ऊपर हमने जो विश्लेषण किया, वह कोई नया नहीं है। सभी समझदार (?) लोग जानते हैं। परन्तु फिर भी हममें व्यापकता का अभाव है। हम सब कुएं के मेंढक हैं, अधिक से अधिक तालाब के मेंढक बन जायेंगे, पर समुद्र में जाने से हमें भय लगता है। भय इस बात का, कि हम अपनी व्यक्तिगत पहचान खो देंगे। विज्ञान और अध्यात्म की दुनिया या शिक्षा का यही बुनियादी फर्क है कि विज्ञानी व्यापक बने, पर तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्ति अपने खोलों (shells) में ही रह गए। कारण हैं - ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ व इन सब से बढ़ कर अहंकार। कई प्राचीन ग्रन्थ भी नियम, उपदेशों व आलोचनाओं का संमिश्रण हैं। कहीं वे सदाचार, आपसी प्रेम, सौहार्द और प्रीति के लिए प्रेरित करते हैं और कहीं घृणा, द्वेष, जलन, वैमनस्य फैलाते दीखते हैं। मेरे विचार से घृणा, द्वेष, जलन, वैमनस्य आदि गुणधर्म परमेश्वर के नहीं हो सकते। परमेश्वरीय शब्दकोष में इनका कोई स्थान नहीं। अतः यदि किसी ग्रन्थ में ऐसे शब्दों का उल्लेख या इस प्रकार के अवगुण दीखते हों, तो निश्चित ही वह ग्रन्थ परमेश्वर की प्रेरणा द्वारा रचित नहीं हो सकता।

क्योंकि यह एक शाश्वत सत्य है कि कोई भी अपनी स्वयं की श्रेष्ठता दूसरे की आलोचना या बुराई करने से नहीं सिद्ध कर सकता। अपनी अच्छाई या श्रेष्ठता हम केवल स्वयं के कार्यों के द्वारा ही प्रस्तुत कर सकते हैं। तो फिर असली परमेश्वर आलोचना या बुराई करने वाला हो ही नहीं सकता। यदि किसी ग्रन्थ में अन्य पंथों की व उनके इष्टों की द्वेषपूर्ण आलोचना दिखाई पड़ती है, तो निश्चित ही वह ग्रन्थ किसी अपरिपूर्ण मनुष्य ने ही लिखा है।

पर देखा जाये तो यह सब महत्त्वपूर्ण नहीं कि कौन सा पंथ या उसका ग्रन्थ मौलिक है और कौन सा नहीं। इससे तो व्यर्थ की बहस ही बढ़ेगी। फिर भी देखने में आता है कि धर्म (रिलीजन) या ग्रंथों की मौलिकताओं के लिए बहस और झगड़े होते रहते हैं, क्योंकि लगभग प्रत्येक मानव अहं का शिकार है। हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि हम ईमानदारी से स्वयं के चैतन्य को जागृत करें, तो हमें स्वयं ही पता चलेगा कि परमेश्वर को सबसे पहले हमसे क्या अपेक्षित है?

लगभग सभी धर्मी लोगों को भीतर से, अपने चैतन्य से यही जवाब आएगा कि अच्छे कर्म, उदारता, सत्य-निष्ठा, नम्रता व अन्य सभी नैतिक गुण; पहले पायदान पर परमेश्वर हमसे इन्हीं सब की मांग करता है। वर्तमानकाल में हम परमेश्वर की इस प्रथम अपेक्षा पर तो खरे उतरते नहीं, और अन्य आचरणों जैसे - मूर्तिपूजा, ग्रन्थ-विश्वसनीयता, इतिहास आदि पर पहले बहस करने लगते हैं। यह सब हमारे खोखले अहं का द्योतक है। वैचारिक प्रौढ़ता का अभाव दर्शाता है यह सब। अधिकांश धार्मिक पंथ या समुदाय आज अपनी-अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए आपस में तर्कों की लड़ाई लड़ रहे हैं। शायद कोई पंथ इन तर्कों की लड़ाई जीत भी जाये, क्योंकि जब भी इस प्रकार की बहस या तर्क-वितर्क होते हैं, तो अंततः कोई एक पक्ष कमजोर पड़ता ही है तर्कों की कसौटी पर। इस प्रकार तर्कों की लड़ाई जीत कर क्या हम धार्मिक हो जाते हैं? ... सत्य तो यह है कि इस प्रकार के झगड़ों-झमेलों से हम आध्यात्मिक रूप से और अधिक कमजोर व खोखले होते जाते हैं। दूसरों को नीचा या गलत दिखाने की प्रवृत्ति हमारे अहंकार को और अधिक बढ़ायेगी ही।

हमारी सबसे बड़ी गलती यह है कि हम 'संस्कृति' और 'धर्म' को एक ही मानते हैं, अर्थात् संस्कृति को ही धर्म का दर्जा देते हैं। जबकि वास्तव में हमारी भाषा, हमारा रहन-सहन, हमारी वेश-भूषा, हमारे त्यौहार, हमारे रीति-रिवाज यानी एक शब्द में कहें तो हमारे समस्त 'वाह्य-आचार' हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं, धर्म से इनका कोई लेना देना नहीं।

वास्तविक 'धर्म' तो दूसरों के प्रति हमारी सोच, हमारी भावनाओं और हमारे भावों से प्रकट होता है। तो संस्कृति और धर्म को अलग-अलग परिभाषाओं व पहचान के अनुसार जानने के बाद भी क्या यह उचित होगा कि हम किसी व्यक्ति की धार्मिकता का अंदाजा उसकी संस्कृति से लगायें?? या क्या यह उचित होगा कि किसी व्यक्ति से हम इसलिए घृणा करें, क्योंकि उसकी संस्कृति हमसे अलग है?? विश्व में सबसे अधिक प्रकाशित हुए ग्रन्थ 'बाइबल' के 'नये नियम' में भी परमेश्वर द्वारा सभी जातियों, धर्मों (पंथों) के लोगों के पुनरुत्थान की बात कही गयी है, सभी धर्मी लोगों को अनंत जीवन वचन भी दिया है। तो जब परमेश्वर विभिन्न जातियों, भाषाओँ, संस्कृतियों, पंथों, समुदायों, रीति-रिवाजों आदि में भेद नहीं रखता, तो हम भेद-भाव को बढ़ावा देने वाले कौन होते हैं? परमेश्वर तो केवल लोगों के दिलों की गहराई से जाँच करता है, क्योंकि सच्ची धार्मिकता केवल उसी में वास करती है। ... लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि 'पुराने नियम' में बहुत सारी ऐसी बातें हैं, जो संभवतः 'नये नियम' से मेल नहीं खातीं। परन्तु 'नया नियम' अपेक्षाकृत काफी बदलाव, नम्रता व लचीलापन लिए है। क्या यह अंतर समय के साथ आयी आध्यात्मिक परिपक्वता (प्रौढ़ता) को नहीं दर्शाता? अनेक हिन्दू ग्रंथों में भी विधि-निषेधों में बहुत से विरोधाभास दिखाई देते हैं। शायद ये विरोधाभास या अंतर कालानुसार नीति-परिवर्तन ही हैं।

(रिलीजन, धर्म, संस्कृति ...) पृष्ठ-३

अतः स्पष्ट हो जाता है कि हमारे वाह्य आचार (बाहरी रहन सहन या जीवन पद्धति) हमारी वास्तविक धार्मिकता को नहीं दर्शाते, बल्कि दूसरों के प्रति हमारे दिल की गहराइयों में छुपी भावना व उसके निर्देशानुसार हमारे कर्म ही हमारी धार्मिकता को प्रकट करते हैं। और सच्चा परमेश्वर केवल यही देखता है। हम असिद्ध इंसानों से उसे प्रथम यही धार्मिकता अपेक्षित है।

एक बात और ... कि परमेश्वर की विभिन्न उपासना पद्धतियाँ भी लोगों की संस्कृति का ही एक भाग हैं। चूँकि परमेश्वर यानी ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च सत्ता निर्गुण, निराकार, अदृश्य है, अतः विभिन्न उपासना-पद्धतियाँ केवल माध्यम ही हैं, उस तक पहुँचने के लिए। अतः हमने देखा कि विभिन्न धार्मिक कृत्य तथा कर्मकांड आदि लोगों की संस्कृति का ही एक हिस्सा हैं, तभी तो ये स्थानानुसार व जाति-अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। ...... बस एक ही चीज पूरे संसार में, सब लोगों में, सब पंथों में, समुदायों में एक सी ही पायी जाती है, वह है एक सर्वोच्च अद्भुत शक्ति को मान्यता, जो अदृश्य व निराकार है, पर सर्वत्र विद्यमान है। ईश्वर या परमेश्वर की इस प्रकार की मान्यता लगभग हर स्थान पर है। ...... एक और चीज पूरे संसार में, सब लोगों में, पंथों में एक सी ही पायी जाती है, वह है यथासंभव विभिन्न नैतिक मूल्यों को अपनाना। ईमानदारी, नम्रता, प्रीति, प्रार्थना, कृतज्ञता आदि गुण हर जगह के मानव को 'नैसर्गिक रूप से' प्रिय हैं, ... यह अलग बात है कि वह इनमें से कितने गुणों को अपनाता है। ...... तथा एक चीज अस्थाई है और सब जगह अलग-अलग पायी जाती है, वह है - ईश्वर के विभिन्न नाम, रूप, उपासना पद्धतियाँ यानी अलग-अलग संस्कृतियाँ।

अतः ईश्वर व धर्म स्थाई व सर्वत्र है तथा सूक्ष्म रूप में एक सा है, पर वाह्य आचार यानी संस्कृतियाँ भिन्न-भिन्न हैं, तथा ये कालानुसार, स्थानानुसार, समुदायानुसार परिवर्तनशील हैं, अस्थाई हैं।

इसी प्रकार से दुनिया में विद्यमान प्रत्येक समुदाय का धार्मिक ग्रन्थ, उस समुदाय विशेष की संस्कृति को चिन्हित करता है मात्र। प्रत्येक समुदाय के धार्मिक ग्रन्थ में उपासना पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं, ईश्वर के नाम, रूप, रंग भिन्न हो सकते हैं, साकार या निराकार अर्थात् सगुण या निर्गुण की भिन्न अवधारणा हो सकती हैं। ..... पर मूल तत्त्व, मूल सन्देश एक सा है। वह है - साकार या निराकार परमेश्वर को सर्वगुण सम्पन्न, परिपूर्ण व सर्वाधिक सामर्थ्यवान मानना तथा भक्तजनों के लिए भी एक ही सन्देश, कि सबसे पहले धार्मिकता यानी अच्छे, योग्य व न्यायप्रिय आचरण का निर्वाह करने हेतु आह्वान।

(रिलीजन, धर्म, संस्कृति ...) पृष्ठ-४

हाँ लोगों में धार्मिकता को बढ़ाने हेतु विभिन्न समुदायों में विभिन्न कालों में अनेकों उपासना पद्धतियाँ, व्रत-कथा, त्यौहार आदि सृजित हुए, जो तत्कालीन ज्ञानी परन्तु अपरिपूर्ण (क्योंकि परिपूर्ण केवल परमेश्वर ही है) जनों द्वारा आरंभ किये गए। पर वस्तुतः ये सब क्रिया-कलाप, ईश्वरीय गुणों को जानने व आत्मसात् करने हेतु माध्यम या साधन ही थे / हैं, परन्तु ये साध्य नहीं हैं। ये सब कालानुसार, समुदायानुसार भिन्नता लिए हुए थे। धीरे-धीरे ये सब उन समुदाय-विशेष की पहचान या संस्कृति बनते गए। कालांतर में संचार एवं आवागमन साधनों के विकसित होने पर जब विभिन्न क्षेत्रों के लोग एक-दूसरे के संपर्क में आये, तो सभी को इतने पंथों व संस्कृतियों के बारे में पता चला। ... और तब यह स्थिति आ गयी कि अपने पास उपलब्ध ज्ञान को ही प्रत्येक मनुष्य या पंथ सही साबित करने में लग गया और अन्य को झूठा या निम्न। अहं के कारण मनुष्य में लचीलेपन का अभाव हो गया। कट्टरपन के कारण दूसरों से कुछ सीखने की लालसा तो जैसे समाप्त ही हो गयी, बल्कि अपने आप को अधिक बेहतर साबित करने की चाह में अन्यों के प्रति घृणा व वैमनस्य को अधिक बढ़ा लिया। प्रेम व शांति खोती चली गयी।

वास्तव में दूसरे के ज्ञान की भरपूर आलोचना व उसकी अच्छाइयों को सिरे से नकारना ही हमारी सबसे बड़ी गलती है। यदि कोई वास्तव में गलत हो भी, तो बजाए उसको धिक्कारने के क्या यह उचित नहीं कि हम सही (?) बात उसके सामने रखें? धिक्कारने से, घृणा करने से तो वह हतोत्साहित होकर हमसे और अधिक दूर ही जायेगा (क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपनेआप को ही सही मानता है )। पर यदि हम बिना धिक्कारे, बिना घृणा किये उससे अपनत्व दिखायेंगे, और अपनी सही (?) बात उससे कहेंगे तो शायद वह तटस्थ भाव से दोनों (स्वयं व दूसरे) के विचारों को तौले और शायद फिर वह दूसरे की विवेकपूर्ण बात मान ले। अनेक समुदायों के वर्तमान साहित्य में मैंने ऐसी ही धिक्कारने वाली व घृणा करने वाली बातों का उल्लेख देखा है। इस प्रकार की बातों का उल्लेख किसी को भी हतोत्साहित कर सकता है नयी मित्रता बनाने के लिए, नयी बातें (ज्ञान) जानने के लिए। ... घृणा परमेश्वर का गुण नहीं हो सकता। परमेश्वर तो अत्यंत व्यापक व नम्र है।

अब हम थोड़ी सी चर्चा विभिन्न संस्कृतियों के अंतर्गत होने वाले कर्मकांडों, त्यौहारों और उत्सवों के विषय में भी कर लेते हैं। ... ये सभी या अधिकांश विभिन्न कालखंडों में तत्कालीन ज्ञानी (परन्तु अपरिपूर्ण) व्यक्तियों द्वारा बनाये गए थे, लोगों को धार्मिकता के लिए उन्मुख करने हेतु। अतः वर्तमानकाल में ये सब अत्यधिक सांसारिक बदलावों के साथ हमारे समक्ष और अधिक अपरिपूर्ण (जीर्ण-शीर्ण) अवस्था में हैं। आज मानव भौतिक रूप से अत्यधिक विकसित हो गया है व और अधिक हो भी रहा है। पर इस भौतिक दौड़ में वह आध्यात्मिक रूप से कमजोर होता जा रहा है। पहली बात तो यह कि उसे अपने आध्यात्मिक विकास की चिंता ही नहीं है, समय ही नहीं है और दूसरी बात यह कि अध्यात्म के क्षेत्र में उसे केवल अपनी ही शेखी बघारने वाले लोग मिलते हैं, सही ज्ञान कोई नहीं देता। वर्तमान में वह अपने पुराने तीज-त्यौहारों को (जिनका स्वरूप वह स्वयं ही बिगाड़ चुका है) ईश्वर की भक्ति या उपासना के तौर पर बस किसी तरह आधे-अधूरे मन से मना रहा है। ... तो उसे तो यही लगता है कि प्राचीन साँस्कृतिक विरासत के रूप में बस यही शेष है उसके पास। अतः इन तीज-त्यौहारों से उसका ऊपरी मोह साधारण मानवीय गुण के अनुरूप ही है। जब अन्य समुदाय उससे यह कहते हैं कि ये तीज-त्यौहार, रीति-रिवाज झूठे धर्मों की उपज हैं, तो उसको यह वाक्य तिरस्कारपूर्ण, घृणापूर्ण लगता है। और यह वाक्य वास्तव में है भी ऐसा ही। किसी के लिए भी उसके पूर्वसंस्कार समाप्त करना, सांस्कृतिक विरासत को तिलांजलि देना इतना सरल नहीं। वास्तव में सही और नेक प्रयास यही होना चाहिए कि कोई भी पंथ या समुदाय अन्य पंथ या समुदायों के मध्य परमेश्वर की प्राथमिक अपेक्षा अर्थात् धार्मिकता (righteousness) का 'प्रसार' करे, निज संस्कृति का 'प्रचार' नहीं। जब कोई व्यक्ति परमेश्वर तक पहुँचने का यह प्रथम लक्ष्य साध्य कर लेगा, तो उसकी अन्य वास्तव में गलत गतिविधियाँ स्वयं बंद हो जायेंगी।

अतः ऊपर हमने जो विभिन्न पंथिक धार्मिक-कृत्यों (साधनों) की बात की थी, तो यह उनकी व्यष्टि साधना का मुद्दा है, इसमें अधिक हस्तक्षेप उचित नहीं। प्रत्येक की कक्षा व स्तर भिन्न होता है। प्राथमिक या बीच की अवस्थाओं में साधना संस्कार-जनित ही होती है, और अधिकांश जन इन दोनों अवस्थाओं में ही होते हैं। इन अवस्थाओं में कृत्यों में परिपूर्णता या यथार्थ-बोध लगभग असंभव है। हाँ, उनको यह भान अवश्य होना चाहिए कि एक कक्षा से अगली कक्षा में जाना आवश्यक होता है। उन्हें यह भान हम मित्रवत् करा सकते हैं। पर फिर भी सही और नेक प्रयास यही होना चाहिए कि हम परमेश्वर की प्राथमिक अपेक्षा यानी धार्मिकता (righteousness) का प्रसार करें। सबके लिए धर्म जानना सहज हो, इसके लिए चैतन्यपूर्ण सरल आध्यात्मिक साधना के लिए प्रेरित करें। नम्रतापूर्वक यह प्रयास करने पर जब उनको थोड़ी-बहुत आत्मानुभूति होनी शुरू होगी, तो उनके अन्य वास्तव में गलत कृत्य स्वयं ही बंद हो जायेंगे। अतः लोगों के गलत या सही धार्मिक कृत्यों (संस्कृति) को धिक्कारना या उनसे घृणा करना विवेकपूर्ण नहीं।

वास्तव में कोई भी संस्कृति अधर्म के लिए उत्तरदायी नहीं, बल्कि उसके कुछ-एक दोष उत्तरदायी हैं, जो समयानुसार आगे की कक्षा में न जाने के कारण उत्पन्न हुए। संस्कृतियों के यह दोष हम तभी दूर कर पायेंगे जब हम प्रेम को बढावा देंगे, घृणा को नहीं। संस्कृतियों के दोष हम धार्मिकता और अध्यात्म का शुद्ध 'प्रसार' करके ही दूर कर सकते हैं, किसी अन्य संस्कृति का 'प्रचार' करके नहीं।

(रिलीजन, धर्म, संस्कृति ...) पृष्ठ-५

विषय को पुनः धर्म और संस्कृति की ओर मोड़ते हैं। 'धर्म' मूलभूत सिद्धांत हैं तथा संस्कृति उनका वाह्य आचार। मूलभूत सिद्धांत सदैव एक थे, एक हैं और एक रहेंगे; परन्तु कृत्य (वाह्य स्वरूप / आचार) सदैव परिवर्तनशील होते हैं। समस्या तब आ जाती है जब हम वाह्य आचारों / कृत्यों को ही धर्म समझने लगते हैं और उन्हें सर्वकाल वैसा का वैसा अपनाने पर जोर देते हैं। हमारी इस प्रकार की सोच हमें रूखा व कठोर बनाती है, हममें लचीलेपन का अभाव हो जाता है। लचीलेपन का यह अभाव हमारे आध्यात्मिक उत्थान को रोकता है तथा आध्यात्मिक उन्नति में बाधक बन जाता है।

इसे और अधिक समझने के लिए हम धर्म की तुलना विज्ञान से करते हैं। संसार में मूलतः दो तत्व हैं जिन्हें हम मुख्यतः अपनाते हैं या जिनका हम प्रयोग करते हैं या जिनके बारे में हम जानते हैं / विचार करते हैं। वे हैं - विज्ञान व अध्यात्म। विज्ञान हमें भौतिक जगत से परिचित कराता है व अध्यात्म हमें 'धर्म' से परिचित कराता है। धर्म के सिद्धांत अटल व अडिग हैं और बहुत से ज्ञानियों को पहले से ज्ञात होते हैं, या वे विभिन्न आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा धर्म को जानने का प्रयास करते रहते हैं। पर धर्म के विषय में अंततः उन सब को वही मूलभूत सिद्धांत व तत्त्व पुनः-पुनः पता चलते हैं, जो सैकड़ों साल पहले कुछ अन्यों को भी पता चले थे। 'धर्म' तो निश्चित, कसाव लिए हुए (सुगठित, compact), अटल, अति विशाल, पर बहुत सरल है। प्रत्येक मानव में यह जन्म से विद्यमान रहता है, भले ही वह सुप्तावस्था में या अविद्या के विभिन्न आवरणों में लिपटा हुआ क्यों न हो। जब-जब हम लचीले होकर अविद्या का आवरण हटाने का प्रयास करते हैं, तब-तब हमें अपने ही भीतर विद्यमान धर्म के स्वरूप के दर्शन होते हैं। लचीलेपन का अभाव या अहं ही हमें धर्म का दर्शन नहीं होने देता। स्मरण रहे कि विभिन्न आध्यात्मिक साधनायें भी हमें धर्म नहीं सिखातीं, वरन वे हमारे अविद्या के आवरण को नष्ट करती हैं। आवरण नष्ट होने या क्षतिग्रस्त होने से ही हमें वास्तविक धर्म का पता स्वयं ही चलता है। हमारे समस्त धार्मिक वाह्य आचार हमारी धार्मिक संस्कृति है। यह भिन्न-भिन्न, सही व गलत हो सकती है। यानी सिद्धांत तो अटल हैं पर वाह्य आचार भिन्न-भिन्न।

विज्ञान के सिद्धांतों की चर्चा करें तो परमेश्वर ने आरम्भ से ही इसकी कोई शिक्षा हमें नहीं दी और हमें स्वतंत्र छोड़ दिया कि हम स्वयं ही भौतिक शरीर व इसके कलपुर्जों की मदद से आवश्यकतानुसार भौतिक जगत् की खोज करें। खोज की इस प्रक्रिया में हम लचीला रवैया अपनाते हैं। इस लचीले दृष्टिकोण की वजह से ही विज्ञान के जो भी सिद्धांत पता चलते जाते हैं, वे सब हम विश्व स्तर पर मान्य करते हैं। अर्थात् अन्यों द्वारा प्रतिपादित किये गए सिद्धांतों को भी मानते हैं। विज्ञान में अनुसंधान, शोधन एवं संशोधन कार्य अनवरत चलता ही रहता है। कई पुराने सिद्धांत टूटते हैं, नए सिद्धांतों का सृजन होता है; यह सब हम साक्षी भाव से स्वीकार करते हैं।

अर्थात् हम विज्ञान की विभिन्न खोजों और सिद्धांतों को 'वैश्विक स्तर' पर मान्यता देते हैं, स्वीकार करते हैं। यह हो गया विज्ञान रूपी धर्म का स्वरूप। अब बात आती है संस्कृति की। संस्कृति यानी वाह्य आचार। विज्ञान की खोजों को, सिद्धांतों को अपने-अपने ढंग से निज-जीवन के विभिन्न कार्य-कलापों में अपनाने का तरीका हमारी वैज्ञानिक संस्कृति है। जैसे कपड़ा एक वैज्ञानिक खोज है; हमने इसे माना तो यह सिद्ध हुआ कि हमने विज्ञान धर्म को माना। इसके बाद कोई उस कपड़े की जींस / पेंट बनाता है तो कोई साड़ी या अन्य परिधान। तो प्रयोग करने के ये विभिन्न ढंग वैज्ञानिक संस्कृति हुए। ऐसे ही परमाणु शक्ति के सम्बन्ध में भी ...। ऐसे ही टेलीविजन, मोबाइलफोन, कम्प्यूटर आदि के विषय में भी, कि खोज तो एक पर प्रयोग अनेक। धर्म तो एक पर संस्कृतियाँ अनेक।

तो कहीं भी कोई दोष या विकृति उत्पन्न होती है, तो वह हमारे गलत प्रयोग द्वारा ही होती है। अर्थात् बुराई वाह्य आचारों में हो सकती है , मूलभूत सिद्धांतों में नहीं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि हम वैज्ञानिक खोजों या सिद्धांतों को (वैज्ञानिक धर्म को) वैश्विक स्तर पर मान्य करते हैं और कोई कार्य संबंधी गलती हो जाने पर दोष स्वयं के अपनाने के ढंग को ही देते हैं या दोष वैज्ञानिक संस्कृति को ही देते हैं, खोज या सिद्धान्त (अर्थात् वैज्ञानिक धर्म) को नहीं कोसते हम। यानी हम वैज्ञानिक धर्म और वैज्ञानिक संस्कृति में अंतर जानते हैं।

(रिलीजन, धर्म, संस्कृति ...) पृष्ठ-६

'धर्म' के क्षेत्र में भी, अज्ञानवश जब कोई किसी की संस्कृति को धर्म, या धर्म (सिद्धांत) को संस्कृति समझने लगता है तो एक-दूसरे के लिए गलतफहमियों का अम्बार लग जाता है। चूँकि हममें से अधिकांश अज्ञानी हैं, अतः हम सबको किसी दूसरे की त्वरित आलोचना करने से यथासंभव बचना चाहिए। हमें पहले अन्य या दूसरे व्यक्ति को, उसके कृत्यों को, उसके मंतव्य को गहराई से समझना चाहिए, उसके सिद्धांतों की भी परख करनी चाहिए; तब धर्म व संस्कृति को अलग-अलग जानकर उसी के अनुसार आलोचना या भर्त्सना करने का साहस करना चाहिए।

हमने पहले मनन किया था कि 'धर्म' अर्थात् 'योग्य एवं न्यायपूर्ण आचरण'। पर बाद में हमने पाया कि वस्तुतः योग्य व न्यायपूर्ण आचरण भी तो हमारे वाह्य आचार का ही एक हिस्सा है। तो फिर 'धर्म' का एक और संशोधित अर्थ उभर कर आता है अगले स्तर पर, कि 'धर्म' अर्थात् हमारी ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों तक आने वाला दिव्य निर्देश। इस दिव्य निर्देश या ज्ञान-ज्योति का मुख्य स्रोत है - हमारी सच्चिदानंद आत्मा। पर अज्ञान व अविद्या के घने आवरण के कारण हमारी आत्मा का प्रकाश तो हमारी कर्मेन्द्रियों तक पहुँच ही नहीं पाता। अतः ज्ञानी पुरुषों द्वारा आत्मिक प्रेरणा से रचित, लेकिन अविद्या पर अवलंबित साहित्य / ग्रन्थ हमारा मार्गदर्शन करने हेतु एक कामचलाऊ व्यवस्था है। क्योंकि शब्द स्थाई नहीं और न ही परिपूर्ण, संस्कार भी स्थाई नहीं, मन एवं बुद्धि भी स्थाई नहीं; सभी कमोवेश परिवर्तनशील हैं। मात्र आत्मा एवं परमात्मा ही अपरिवर्तनशील हैं, उनसे आने वाला प्रकाश ही अपरिवर्तनशील है। परिपूर्णता हेतु इस प्रकाश का अन्य कोई विकल्प नहीं। अतः सच्चे धर्म (ज्ञान प्रकाश) की प्राप्ति हेतु चैतन्यमय आत्मा के चारों ओर का अविद्या का घना आवरण हटाना ही अनिवार्य है।

तो प्रश्न यह उठता है कि आत्मा के चारों ओर का घना आवरण हटे कैसे? हमने पूर्व में भी चर्चा की थी कि परमेश्वर ने पहले मनुष्य की भौतिक देह को सृजा, फिर उसमें जीव की लिंगदेह (अविद्या के घटक एवं आत्मा) प्रत्यारोपित की अर्थात् मन, बुद्धि एवं इन्द्रियां देकर जीव को कर्मों के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया। भौतिक शरीर के साथ-साथ ज्ञानेन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि भी एक प्रकार से वाह्य ही हैं, केवल छठी इन्द्रिय अथवा जीवात्मा ही आन्तरिक है। वास्तविक ज्ञान इसी आत्मा में निहित है। पर मन में उपस्थित विभिन्न संस्कारों के कारण हमारे अधिकांश कार्य इन संस्कारों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। जब हम एकाग्रावस्था में या ध्यानावस्था में होते हैं तो मन के संस्कारों का घना आवरण बीच-बीच में टूटता है व हमें हमारी छठी इन्द्रिय का सन्देश या निर्देश प्राप्त होता है। हमें सर्वदा यही अपेक्षित है। अतः हमें सर्वप्रथम मन को ही नियंत्रित या निर्देशित करने की आवश्यकता है कि वह भीतर के प्रकाश को बाहर आने दे। ज्ञान-ज्योति का प्रकाश तो भीतर विद्यमान है, आवश्यकता है तो बस खिड़की-दरवाजे खोलने की, परदे हटाने की। विभिन्न आध्यात्मिक साधनाओं के द्वारा हम मन को समझाने, नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं - प्रार्थना से, ध्यान से, ज्ञान से, भक्ति से, विभिन्न कर्मकांडों से, नामजप से आदि-आदि। तो उपरोक्त ये सब साधनायें एक प्रकार से साधन ही हैं और साध्य है - आत्मिक / परमात्मिक ज्ञान प्रकाश। उपरोक्त 'साध्य' के अतिरिक्त शेष सब (साधनायें आदि) महत्त्वपूर्ण होते हुए भी परिवर्तनशील व अस्थाई हैं।

(रिलीजन, धर्म, संस्कृति ...) पृष्ठ-७

हममें से अधिकांश अपने मन के अधीन हैं, साथ ही कुछ सलाह अन्यों से भी लेते हैं। तो पहले मनानुसार, संस्कारानुसार या किसी योग्य (? ) व्यक्ति की सलाह से ही कोई साधना शुरू करें, पर लक्ष्य एक ही होना चाहिए - वह है - आत्मिक प्रकाश को पाना। सम्पूर्ण एकाग्रता व प्रयास इसी बात के होने चाहियें कि हमें उस साधना के द्वारा उच्च नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारते हुए धीरे-धीरे भीतरी ध्वनि को सुनने-समझने की कोशिश करते रहना है। बाद में कई उतार-चढ़ाव आयेंगे, पर धैर्य न छोड़िये। लचीलापन लाते हुए आवश्यकतानुसार निज विवेक एवं अन्य किसी ज्ञानी की सलाह से साधनों में उचित बदलाव लाइये, पर ढीले नहीं पड़िये, लगे रहिये साध्य के पीछे। अनवरत प्रयासों के बाद धीरे-धीरे आत्मिक प्रकाश का मिलना आरंभ होगा। आगे के स्तर पर यही मंद आत्मिक प्रकाश आपका मार्गदर्शन करेगा। पुनः शायद कुछ कृत्य (साधना पद्धतियाँ) बदलें, पर विचलित न हों, उस प्रकाश स्रोत के मद्धम प्रकाश में आगे को बढ़ते चलें। अंततः निश्चित ही आप लक्ष्य तक पहुँचेंगे, जहाँ पर प्रकाश ही प्रकाश होगा। उस अवस्था में पहुँच कर आपको पूरी तरह से यह अहसास होगा कि साधन महत्त्वपूर्ण नहीं थे बल्कि साध्य ही महत्त्वपूर्ण था। लक्ष्य एक ही होता है, पर उस तक पहुँचने के मार्ग कई होते हैं। कोई मार्ग छोटा, तो कोई लम्बा; कोई सरल, तो कोई कठिन। कोई मार्ग भटकाने वाला भी होता है, जो कहीं ओर ही जाता है। तो साधन का सही होना प्रथम आपके मन एवं बुद्धि द्वारा किये गए चयन पर करता है, और फिर बाद का सफ़र इस पर निर्भर करता है कि आप कितने धैर्यवान व कर्मशील हैं। प्रारब्ध की सहभागिता भी इसमें रहती ही है, पर वह हमें पता नहीं होती।

साध्य को पाने के लिए एक चीज बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, वह है - जिज्ञासा, तीव्र इच्छा, उत्कंठा, मुमुक्षुत्व ओर तड़प। कमोवेश ये सब एक ही हैं, मात्र शब्द भिन्न-भिन्न हैं। इसके अलावा धैर्य, दृढ़ता, नियोजन, अनुशासन, नम्रता व सम्पूर्ण समर्पण भाव भी आवश्यक तत्व हैं साधना हेतु।

(रिलीजन, धर्म, संस्कृति ...) पृष्ठ-८

समष्टि अर्थात् समाज यानी पूरे विश्व के लोग सच्ची धार्मिकता की ओर मुड़ें, धर्मी बनें; तो वस्तुतः यही परमेश्वर के राज्य की शुरुआत होगी, बुनियाद होगी। सभी लोगों को धार्मिकता की ओर मोड़ने लिए यदि हम सिर्फ एक ग्रन्थ या पंथ का सहारा लेंगे, तो शायद आशा के अनुरूप सफलता न मिल सके, क्योंकि आज विश्व के प्रत्येक हिस्से में लोग अलग-अलग प्रकार की रिलीजियस (सांस्कृतिक) मान्यतायें रखते हैं। यानी सभी की उपासना पद्धतियाँ (साँस्कृतिक ढांचा व साधन) भिन्न-भिन्न हैं। यह एक शाश्वत सत्य है कि वस्तुतः परमेश्वर बहुत अधिक व्यापक है। हम यदि परमेश्वर को किसी एक नाम (यह आग्रह कि केवल वही सच्चा ईश्वर है, जिसे मैं पूजता हूँ) के दायरे में रखते हैं तो यह हमारी संकुचितता का द्योतक होगा। किसी एक नाम व एक साकार रूप तक सीमित रख हम उसके अनंत गुणों एवं विशेषताओं को मर्यादित करने का दुस्साहस नहीं कर सकते। इसका प्रमुख कारण यह है कि अनादि एवं सनातन परमेश्वर ही है, तदुपरांत यह सृष्टि एवं मानव, और उसके बाद वाणी, शब्द, भाषाएँ आदि ...। भाषायें, शब्द, लिपियाँ यानी परस्पर संवाद के सभी साधन बाद में मानव ने ही सृजित किये। सभी मानव सीमित बुद्धि तथा सीमित सामर्थ्य वाले हैं और परमेश्वर से बहुत पीछे। अतः मानव निर्मित भाषाएँ, लिपियाँ, शब्द आदि असमर्थ हैं शब्दातीत परमेश्वर की सम्पूर्ण व्याख्या करने के लिए। और दूसरी बात यह कि विकास के विभिन्न चरणों में अपरिपूर्ण मानवों ने ज्ञान प्राप्त करने लिए या अपने आध्यात्मिक उत्थान हेतु विभिन्न मार्गदर्शनों, साधनाओं का सहारा लिया और आज भी ले रहे हैं। ये सब हमारी संस्कृति व संस्कारों का हिस्सा ही हैं। हम इनको शायद एकाएक समाप्त करने में असमर्थ हैं। प्राचीन व दृढ़ संस्कारों को समाप्त करना इतना सरल नहीं, साधनों का नवीनीकरण साधारण मानव के लिए अत्यंत दुरूह होगा। तो फिर हल क्या है? शायद यही कि सभी नामों को एक कर दें यानी ईश्वर के सभी नाम एक ही ईश्वर के हैं। हम सभी परिपक्व बनें और मात्र अपने द्वारा पूजित किसी एक नाम, रूप व ग्रन्थ के ही सच्चे होने का राग अलापना छोड़ दें। हम सभी सच्चे मन से, भाव से यह स्वीकारें कि सभी नाम, रूप व धर्मग्रंथ अपनी-अपनी जगह श्रेष्ठ हैं। हम न भूलें कि ईश्वर के विभिन्न नाम, सभी मार्गदर्शक ग्रन्थ व सभी उपासना पद्धतियाँ केवल साधन मात्र हैं। साध्य है ईश्वर या ईश्वरीय गुण। सभी लोग आज ईश्वर के जिन भिन्न-भिन्न नामों, रूपों और साधनों की सहायता ले रहे हैं, वे सब जब उन्हीं के अनुसार ही दृढ़ता, लगन, तड़प व समर्पण भाव से साधना करेंगे तो ज्ञान के अगले चरणों पर उन्हें स्वयं ही पता चलेगा कि सर्वशक्तिशाली व सार्वभौमिक परमेश्वर इन सब नामों, शब्दों, रूपों व साधनों से कहीं आगे व कहीं व्यापक है। तब वे सभी मनुष्य स्वयं ही अपना-अपना अहम् त्याग देंगे। यह राग अलापना भी छोड़ देंगे कि उस सच्चे परमेश्वर का केवल वही नाम है जिसे वे जानते थे। तब सभी नाम उन्हें समान रूप से प्रिय लगेंगे। ईश्वरप्राप्ति के पश्चात् ऐसी अनुभूति होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि ईश्वर हैं ही शब्दों से परे। इति।