Tuesday, April 26, 2011

(४५) साधना की वर्तमान दशा

उपरोक्त विषय पर इस ब्लॉग के अनेक लेखों में पहले ही पर्याप्त विवेचन हो चुका है। तद्यपि चूँकि यह हमारे ब्लॉग का प्रमुख विषय है, अतः वर्तमान परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में एक बार पुनः इस पर दृष्टिपात कर लेते हैं।

आजकल साधना के नाम पर विभिन्न कर्मकाण्डों, व्रत, पूजापाठ, मंत्रजप, नामजप आदि को करना; नियमित या किसी दिन-विशेष आराधनालय जाना, सत्संग या प्रवचन में जाना, खानपान में अनेकों विधि-निषेध अपनाना, किसी सम्प्रदाय या संस्था-विशेष का सदस्य बनना जैसे कृत्य आम प्रचलन में हैं। सम्बंधित लोगों से यदि ये सब कृत्य करने का 'वास्तविक' कारण जाना जाए तो यह तथ्य प्रकाश में आता है कि अधिकतर मामलों में लोग ये सब कृत्य किसी न किसी सांसारिक अभिलाषा की पूर्ति हेतु ही करते हैं। कुछ लोग इन कृत्यों के माध्यम से ईश्वर से अपने पापों के लिए क्षमायाचना करते हैं। वास्तव में उनका असली मंतव्य यही होता है कि ईश्वर उनके पापों को अनदेखा कर दें। पिछले पापों को धोने के लिए गंगा में डुबकी लगाना या तीर्थयात्रा करना तो आम प्रचलन में है ही, यह सब जानते हैं। हाँ, कुछ मामलों में मोक्ष अर्थात् जन्म-मृत्यु के फेरों से मुक्ति हेतु विभिन्न धार्मिक कृत्य किये जाते हैं। ... तो देखने में यही आता है कि विभिन्न धार्मिक कृत्यों के पीछे कुछ न कुछ स्वार्थ छिपा रहता है। भौतिक सुख-संपत्ति और सांसारिक अभिलाषाएं ही आज साधना का प्रमुख लक्ष्य हैं। ... यह भी देखने में आता है कि जब दो राष्ट्रों का परस्पर युद्ध होता है, तो उनके देश के धर्मगुरु ईश्वर से अपने-अपने देश की विजय हेतु कामना-प्रार्थना करते हैं। अब ईश्वर किसे सही मानेगा?

यह प्रचलन भी आम है कि लोग संतान, व्यापार, नौकरी, धन, अधिक मुनाफे, सुख-सम्पदा और विलासिता की चाहत में ईश्वर के मानव-निर्मित छद्म दरबारों में हाजिरी देते हैं, पागलों समान पूजा-अर्चना करते-करवाते हैं। स्पष्ट है कि आज लोगों ने ईश्वर को एक भ्रष्ट और चापलूसी पसंद करने वाला राजा मान लिया है तथा साधना रूपी कृत्यों को रिश्वत में दी जाने वाली भेंट समझ लिया है। साधना करने का मूल उद्देश्य ही पलट गया है। ईश्वर व साधना की इससे बड़ी विडम्बना कदाचित् संभव नहीं। जब धार्मिक कृत्यों को करने-करवाने का उद्देश्य बिलकुल पलट चुका है तो फिर लोगों के अन्य कृत्यों का उद्देश्य पलट जाना तो स्वाभाविक ही है। विरला ही कोई मिलता है जो मात्र भजन के लिए ही भजन कर रहा हो अर्थात् ईश्वर-प्राप्ति हेतु अर्थात् सच्चे ईश्वरीय गुणों को अपने आचरण में आत्मसात् करने हेतु साधना कर रहा हो।

आजकल तो साधना खिलवाड़ सी बन कर रह गई है। कर ली तो ठीक, न करी तो ठीक। बीच में कोई आ गया तो उससे भी मिल लिया, कोई फोन आ गया तो उस पर भी कुछ देर चोंच लड़ा ली। पंडित या पुरोहित का ध्यान इस पर अधिक रहता है कि यजमान किससे-कैसे खुश होगा, और यजमान उसके कृत्य को एक अजब तमाशे के रूप में लेता है! कुछ धार्मिक कृत्य किसी चमत्कार होने की लालसा से किये जाते हैं, परन्तु प्रारब्ध व कर्म की कमी के चलते अभीष्ट सिद्ध न हो पाने के कारण लोगों का वह कच्चा विश्वास भी टूट जाता है। फिर भी कुछ लोग एक लती जुआरी की भांति बारम्बार 'चांस' लेते रहते हैं! जुए में अनेकों बार तुक्के सही भी बैठते हैं! ... ईश्वर के प्रति खरी श्रद्धा या विश्वास कहीं खो गया है, और उसका स्थान एक निम्नस्तरीय नाटक ने ले लिया है। आज की पीढ़ी पुरातन जीर्णशीर्ण परिपाटियों को जैसेतैसे अपने-अपने ढंग से एक नौटंकी के रूप में निभा रही है और ऊपर से तुर्रा यह कि ऐसा न करने वालों की भर्त्सना की जाती है व उन्हें नास्तिक या धर्मविरोधी घोषित किया जाता है, उन्हें समाज से बहिष्कृत तक कर दिया जाता है।

सर्वत्र झूठ व दिखावा देखने को मिल रहा है। आडम्बर का बोलबाला है। पाखंडी लोग, धर्मगुरु आदि खूब लाभ में हैं। कदाचित् धन की अभिलाषा एक बार को न भी हो, तदपि जागतिक यश की अभिलाषा कमोवेश सभी वर्तमान धर्मगुरुओं में कूट-कूट कर भरी है। प्रवचन देते समय या भक्तों से मिलते समय उनके नेत्रों, भावभंगिमाओं और शारीरिक भाषा से इसका पूरा-पूरा भान होता है। अधिकांश मार्गदर्शकों में यथार्थ सहिष्णुता का पुट नहीं मिलता। लोगों, अनुयायियों आदि के खोखले विश्वास को और अधिक खोखलेपन के साथ सुदृढ़ करने हेतु उनके सम्प्रदाय के धर्मगुरु उनके मन में अन्य सम्प्रदायों के प्रति नफरत, द्वेष आदि की भावना भरते हैं। अन्य पंथों की सोच या सिद्धांतों को यदि वे धर्मगुरु किसी कारणवश समर्थन भी देते हैं तो स्पष्ट रूप से वह झूठा व बनावटी प्रतीत होता है। परिणामतः आज प्रत्येक समूह यही जानता और मानता है कि केवल उसी का समूह व उसकी पूजा पद्धति तथा उसके देवता सर्वश्रेष्ठ हैं, अन्यों के निकृष्ट!

व्यर्थ के दिखावों और व्यर्थ की मूर्तिपूजा के घनघोर आलोचक तथा जीवनपर्यंत सादगी से रहने वाले अनेक महानुभावों के आज विशाल मंदिर बन गए हैं। बड़े दिखावे के साथ उनकी प्रतिमाओं की भव्य पूजा-अर्चना होती है। चढ़ावे का कोई अंत नहीं! यह देख आत्मा विलाप करती होगी उन महापुरुषों की! ... अहिंसा के घनघोर समर्थक एक प्राचीन मुनि के वर्तमान धर्मगुरु अनेक बंदूकधारी अंगरक्षकों से घिरे हुए प्रवचन देते देखे जाते हैं। बड़ा हास्यास्पद लगता है यह! कोई उनसे यह पूछे कि अहिंसा के पुजारी के इर्दगिर्द इन बंदूकों का क्या काम? परन्तु आज यह पूछने का साहस किसी में नहीं और न ही समझने का!

आज कोई सम्प्रदाय कुछ बता रहा है तो कोई कुछ और! सब बहलाने-फुसलाने और विभिन्न स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं। अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग! बस एक ही समानता है सबमें कि भव्यता और दिखावा आदि चरम पर हैं। अंधविश्वास बढ़ाने की तो कोई थाह ही नहीं! समय के साथ सिद्धांत और मूल्य बदल चुके हैं। ढोंगियों का राज है। धन और सांसारिक यश उन पर बरस रहा है। पाँचों अंगुलियाँ घी में... और सर कड़ाही में है! यह सब भी प्रारब्ध का खेल है! अध्यात्म के अन्तरंग में उतरने व उतारने वाले धार्मिक गुरुओं का मिलना आज अति दुष्कर है। आज प्रवचन देने वालों के आंतरिक जीवन में यदि झाँका जाए तो वहां सुनने वालों से भी अधिक गंदगी पाई जाती है। परन्तु लोग यह सब देखकर, जानकर भी आंखें मूंदे हुए हैं। भेड़चाल चल रही है। कारण है -- लोभ, अभिलाषा, लालसा तथा त्वरित सांसारिक लाभ की आकांक्षा। आज के कर्म की कल क्या प्रतिक्रिया आने वाली है इससे अनभिज्ञ भारत की आबादी का एक बड़ा प्रतिशत आज फंतासी अर्थात् कल्पना लोक में मग्न है। विज्ञानवादी भी आज अपना ही 'क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया' का सिद्धांत भुला बैठे हैं।

वेदान्त एवं अन्य कुछ उच्च प्राचीन साहित्यों में उल्लेखित ब्रह्मांड एवं ईश्वर के विज्ञानसम्मत नियमों-सिद्धांतों की ओर से नेत्रों को मूंद लेने से सच्चाई नहीं बदल जाएगी। आज आवश्यकता है कि अध्यात्म पर से जो विश्वास मर गया है या विकृत हो गया है, उसे जिज्ञासापूर्ण वैज्ञानिक दृष्टि से देखकर तत्पश्चात् अनुभूत कर पुनः जीवित अथवा स्वस्थ किया जाए। ... जैसे विद्यालय में हम उत्तरोत्तर आगे की कक्षाओं में जाते रहते हैं, एक ही कक्षा में रुकना या पीछे की कक्षा में लौटना किसी को नहीं भाता है। ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान व साधना के क्षेत्र में भी हमें निरन्तर आगे की ओर जाने की आवश्यकता है। आइये... झूठे दिखावे, फरेब और दंभ को तिलांजलि देकर, बेड़ियों को काट कर, हम अपने अंतर्मन में झांकें। दिल तक.., आत्मा तक.. जाएं। उससे पूछें, मार्गदर्शन लें और स्वयं को परिष्कृत एवं परिमार्जित करें, वहां से ज्ञान का प्रकाश लेकर निरन्तर आगे की कक्षाओं में जाएं, तथा अन्यों को भी इसी के लिए प्रेरित करें। आज यही प्रासंगिक होगा। इति।

Wednesday, April 20, 2011

(४४) ढाढस

कभी-कभी कुछ लोग मुझसे और कभी-कभी मैं खुद भी स्वयं से यह प्रश्न कर बैठता हूँ कि इस ब्लॉग के लेखों को तो बहुत ही कम व्यक्ति पढते होंगे और पढ़ने वालों में से भी बहुत कम ही इनसे कुछ ग्रहण करने की चेष्टा करते होंगे। इसी प्रकार 'सचेतक' केन्द्र पर आने वालों व सही मायनों में लाभ उठाने वालों की संख्या भी बहुत कम ही है। तो फिर मैं इस सीमित आयुष्य की जो इतनी ऊर्जा खर्च कर रहा हूँ क्या उसका सदुपयोग हो रहा है? या ऐसा करना क्या प्रासंगिक है? या इतनी कम फल-निष्पत्ति होते हुए भी इतनी ऊर्जा व समय खर्च करना क्या न्यायसंगत है? ... मेरी इस संभ्रमित सोच को आज कुछ ढाढस मिला जब मैंने इन्टरनेट पर एक लघु कथा पढ़ी। संक्षेप में यह कुछ इस प्रकार से थी-

सागर की वापस जाती हुई लहरें किनारे पर बहुत सी मछलियों को छोड़कर जा रहीं थीं। सूरज भी ढलने वाला था। वहीं एक व्यक्ति एक-एक मछली को उठाकर वापस सागर के पानी में डाल रहा था। यह दृश्य देख रहे एक अन्य व्यक्ति ने उससे कहा, "यहां हजारों मछलियाँ किनारे पर मरणासन्न पड़ीं हैं और फिर सूर्यास्त भी निकट है, कुछ ही देर में अँधेरा छा जायेगा, तब तक तुम केवल कुछ ही मछलियाँ वापस जल में छोड़ पाओगे, तुम्हारे इस परिश्रम से कुछ बहुत लाभ होने वाला नहीं।" इस पर पहला व्यक्ति एक मछली को वापस जल में छोड़ता हुआ बोला, "देखो, कम से कम इस मछली की जिंदगी तो मेरे कर्म (क्रियमाण) से बदल ही गई न! अतः जब तक संभव होगा तब तक जो भी योग्य क्रियमाण मेरे वश में है, कर्तव्य समझकर करता रहूँगा।"

आगे का विश्लेषण यह कि वह व्यक्ति इस पर अधिक विचार नहीं करेगा कि बहुत सी मछलियाँ फिर भी तड़प-तड़प कर मर गयीं, क्योंकि वह जानता है कि ऐसा होना उन मछलियों के प्रारब्ध एवं उनकी सहायता करने में सक्षम कुछ सामर्थ्यवानों की अकर्मण्यता के संयोग (गुणनफल) का परिणाम है (प्रारब्धXकर्म = फल)। अतः वह केवल इस पर ध्यान देगा कि उसका कर्म कितनी मछलियों के प्रारब्ध के साथ मिलकर फलीभूत हो पाता है। वैसे तो वांछित फलप्राप्ति अधिकांशतः स्वयं किये जाने वाले क्रियमाण पर आधारित है, फिर भी किसी-किसी अवसर पर कोई व्यक्ति किनारे पर पड़ी मछली की भांति बेबस हो जाता है, तब किसी अन्य द्वारा किया गया क्रियमाण उस व्यक्ति के प्रारब्ध के साथ मिलकर फल प्रदान करता है। ... समाज के विभिन्न घटक अर्थात् समष्टि। मत भूलें कि हम एक सामाजिक प्राणी हैं और एक-दूसरे पर निर्भर हैं। ... और मात्र क्रियमाण कर्म ही हमारे वश में है। तो मिलकर प्रयास करें कि वह कर्म योग्य व न्यायप्रिय हो और हम उससे विमुख न हों। इति।

Thursday, April 7, 2011

(४३) एक आध्यात्मिक केन्द्र के दौरे का ताजा संस्मरण

जिस आध्यात्मिक केन्द्र के दौरे और वहां लगभग साढ़े तीन दिन के प्रवास के दौरान हुए अनुभवों का वर्णन करने जा रहा हूँ, उससे मैं पिछले आठ वर्षों से थोडा-बहुत जुड़ा हुआ हूँ। वह इसलिए कि मेरी आध्यात्मिक यात्रा का आरंभ इसी संस्था के एक साधक के निःस्वार्थ एवं समर्पित प्रयास द्वारा संभव हुआ था। संभवतः इसीलिए इस संस्था के बहुत से कृत्यों से सहमत न होते हुए भी मेरा इस केन्द्र से भावनात्मक लगाव अवश्य है। वैसे यह संस्था अपने कार्यकर्ताओं/साधकों के अनुशासन, समर्पणभाव और कर्तव्यनिष्ठा इत्यादि के लिए जानी जाती है। इसके संस्थापक डॉ. ******** जी के लिए कहा जाता है कि वह सांसारिक यश, धन, प्रतिष्ठा आदि के मोह-जंजाल से कोसों दूर हैं और सर्व जिज्ञासु आगंतुकों को सहज उपलब्ध रहते हैं। ... परन्तु भूतकाल में मुझे इस संस्था, इसके साधकों, मार्गदर्शकों एवं संस्थापक जी के विषय में अनेकों ऐसे खट्टे अनुभव हुए थे, जो इस केन्द्र व इससे जुड़े लोगों की तथाकथित विशेषताओं से बिलकुल विपरीत थे। मेरे विचार से प्रारब्धवश इस संस्था को उच्च स्तर के संसाधन और साधक प्राप्त हुए हैं, इसकी भूमिकारूप-व्यवस्था बेजोड़ है। क्वचित्‌ ही ऐसा होता है। अतः मैं हृदय से चाहता था और चाहता हूँ भी, कि यह केन्द्र केवल प्रारब्ध पर ही निर्भर न रहकर अब अपने क्रियमाण के बल पर भी उत्तरोत्तर प्रगति करे। मैं बहुत ही आशावान रहता था कि एक दिन सब कुछ ठीक हो जायेगा। .... अब तक मैं इस संस्था के मुख्य केन्द्र में कभी भी नहीं गया था, मेरा समस्त विश्लेषण एवं आंकलन मात्र कुछ अनुभवों और चिंतन रूपी सूक्ष्म निरीक्षण पर ही आधारित था। इस कारण कभी-कभी मुझे यह लगता था कि कहीं मैं स्वयं ही कुछ निरर्थक आशंकाओं से ग्रस्त तो नहीं हूँ! मेरी धारणाएं भी मिथ्या, निर्मूल या गलत हो सकती हैं। सो संस्था के प्रति मेरे और मेरे प्रति संस्था के सम्भ्रम के निवारण और स्थिति को सुस्पष्ट करने हेतु तथा सीमित आयुष्य के शेष बचे समय के अधिकतम सुव्यवस्थित उपयोग के लिए ठोस नियोजन हेतु मैंने संस्था के मुख्यालय का दौरा करने का निश्चय किया। यह इतना सरल न था, अनुमति मिलना बहुत कठिन था। इसका अनुभव मुझे पूर्व में भी दिसम्बर २००४ में हो चुका था। तब एक बार बिलकुल समीप के नगर में होते हुए भी मुझे केन्द्र के दौरे की अनुमति नहीं मिल पायी थी। खैर ..... इस बार ऐसा नहीं हुआ। मैंने दौरे के लगभग दो माह पूर्व ०२ फरवरी २०११ को अनुमति मांगी और वह मुझे सरलता से मिल गई।

केन्द्र में प्रवास की अवधि २८ मार्च की दोपहर से ३१ मार्च की अर्धरात्रि तक की थी; ०१ अप्रैल को प्रातः ०३.४० की गाड़ी से मुझे वापस आना था। मैंने यात्रा का विस्तृत विवरण फरवरी में ही ईमेल द्वारा भेज दिया था, और यात्रा से लगभग एक सप्ताह पूर्व मुख्यालय को इस सम्बन्ध में ईमेल द्वारा पुनः सूचित किया; गाड़ी संख्या, डिब्बा क्रमांक इत्यादि विस्तार से लिखा, जिससे सबकुछ सुव्यवस्थित रहे। ईमेल की प्राप्ति-सूचना भी आ गई। अब मैं निश्चिंत था।

ढेर सारी आशाओं के साथ अपने गृहनगर से लगभग २५०० किमी० की यात्रा कर पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमानुसार मैं रेलगाड़ी द्वारा २८ मार्च की दोपहर लगभग १.३० बजे संस्था के मुख्य केन्द्र के नगर के बिलकुल समीप पहुँच चुका था। तब मैंने मुख्यालय के कार्यालय में यह जानने के लिए फोन किया कि मैं रेलवे स्टेशन से केन्द्र तक कैसे पहुंचूंगा, क्योंकि मैं नगर के भूगोल और वहां की स्थानीय यातायात व्यवस्था से सर्वथा अनभिज्ञ था। मेरी फोनकॉल को एक वरिष्ठ मार्गदर्शक डॉ. कु. **** ***** जी के पास स्थानांतरित किया गया; उन्होंने बताया कि आपको लेने स्टेशन पर साधक गए हैं, वे आपको वहां पर मिलेंगे। तब मैंने उनको अपना डिब्बा क्रमांक आदि एक बार पुनः स्मरण कराए और बिलकुल निश्चिन्त हो गया। लगभग १.५५ बजे गाड़ी स्टेशन पर पहुँच गई। मैं डिब्बे की उस खिड़की के पास सरक गया जोकि प्लेटफॉर्म की तरफ थी। गाड़ी वहां पर १० मिनट रुकती थी। लगभग छः-सात मिनट की प्रतीक्षा के उपरांत मैं डिब्बे से बाहर आकर वहीँ प्लेटफॉर्म पर खड़ा हो गया। तभी फोन की घंटी बजी। केन्द्र से किसी साधक का फोन था। उन्होंने कहा कि आपको लेने कोई साधक आ रहे हैं, कृपया आप निकास द्वार से निकलकर बाहर खड़े हों, बाहर वे आपको मिल जायेंगे। हम एक-दूसरे को कैसे पहचानेंगे इस पर कोई बात नहीं और फोन कट गया। रेलगाड़ी भी जा चुकी थी। मैं स्टेशन से बाहर आ गया। तभी पुनः घंटी बजी। अब यह फोन मुझे लेने आने वाले साधक का था। उन्होंने बताया कि वह अबसे लगभग १० मिनट में स्टेशन पहुँच रहे हैं, उन्होंने अपनी गाड़ी की पहचान एवं नंबर आदि बताया। और कुछ समय उपरांत लगभग २.३० पर वह साधक स्टेशन पहुँच गए। औपचारिक अभिवादन आदि के बाद उन्होंने बताया कि उनको अभी कुछ समय पूर्व ही यह सूचना मिली थी कि स्टेशन पर किसी को लेने जाना है, अतः कुछ विलम्ब हो गया। हम गाड़ी में बैठ गए और केन्द्र की ओर चल दिए। मार्ग में उन्होंने मुझसे भोजन करने के सम्बन्ध में पूछा। मेरे स्वीकृति देने पर उन्होंने केन्द्र पर फोन करके इस सम्बन्ध में सूचित किया। कुछ समय में ही हम केन्द्र के मुद्रणालय भवन पहुँच गए। वहां मैंने भोजन आदि कर मुद्रणालय देखा। तदोपरांत कुछ समय पश्चात् हम मुख्य केन्द्र की ओर चल दिए। यहाँ मैं यह बता देना उचित समझता हूँ कि इतनी सुस्पष्ट दो-तीन सूचनाओं के बावजूद भी मेरे आने की सूचना व्यवस्थापन भुला बैठा था , यह ऊपर दिए विवरण से आपको स्पष्ट हो गया होगा। स्टेशन पर लेने आने का नियोजन मेरी १.३० पर की गई फोनकॉल के पश्चात् आननफानन में किया गया और भोजन आदि का नियोजन मेरे गाड़ी में बैठने के बाद किया गया; जबकि इस प्रकार के नियोजन इस संस्था में समय से काफी पहले ही हो जाते हैं, ऐसा कहा जाता है। यद्यपि यह कोई बहुत गम्भीर प्रसंग या प्रकरण नहीं था, फिर भी इससे केन्द्र की अनुशासन और नियोजन के सम्बन्ध में दुर्बलता प्रतिबिंबित होती है।

मुद्रणालय से चलकर हम कुछ ही मिनटों में सायंकाल लगभग ५ बजे मुख्य केन्द्र पहुँच गए। वहां मुझे पहले अतिथि-कक्ष में ले जाया गया और फिर तुरंत ही मुझे केन्द्र के भवन के तृतीय तल पर स्थित एक कक्ष में ले जाया गया। यहां मुझे प्रवास की कालावधि तक निवास करना था। अतिथि-कक्ष से तृतीय तल तक जाते समय मार्ग में पहले से भली-भांति परिचित एक-दो साधक-साधिका मिले, परन्तु उनसे मात्र औपचारिक अभिवादन ही हो पाया। उन्होंने अचानक मुझे वहां देख न तो कोई कौतुहल प्रकट किया और न ही अपनत्व प्रकट किया। मैं अपने कक्ष में पहुंचा दिया गया। वहां पहले से ही एक साधक उपस्थित थे, जो उस कक्ष के ही स्थाई वासी थे। औपचारिक अभिवादन के आदान-प्रदान के पश्चात् उन्होंने बताया कि उनके अतिरिक्त इस कक्ष में तीन स्थाई निवासी साधक और भी हैं जो अभी विभिन्न सेवाओं में व्यस्त हैं। कुछ क्षणों में वह साधक भी चले गए। मैंने स्नान आदि किया और तरोताजा हो गया। मैं कक्ष के फर्श पर बैठकर ध्यानादि का प्रयास करने लगा। उसी बीच कक्ष के कुछ अन्य वासी साधक भी वहां आए, वह सायंकाल की चाय-अल्पाहार आदि का समय था शायद! उनसे भी औपचारिकता का आदान-प्रदान हुआ बस! और कुछ क्षणों में वे चले गए। मैं फिर से कक्ष में अकेला था। मुझे कुछ भी नहीं बताया गया था कि मुझे क्या, कब और कैसे करना है! अर्थात् मेरे लिए किये गए नियोजन से मैं सर्वथा अनभिज्ञ था या फिर अभी नियोजन किया ही नहीं गया था! खाली बैठे-बैठे रात्रि के ८.३० बज गए। मैं स्वयं ही साहस कर अपने कक्ष से बाहर निकला और द्वितीय तल पर स्थित भोजन-कक्ष की ओर बढ़ चला।

भोजन-कक्ष में काफी चहल-पहल थी। मैं वहां प्रविष्ट हुआ और एक प्लेट उठा कर उसमें कुछ भोजन लिया और एक स्थान पर बैठ कर खाने लगा। मैं वहां स्वयं को नितांत अपरिचित महसूस कर रहा था। तभी वहां एक पहले से परिचित साधक दिखाई दिए। वह मेरे पास आ गए और आत्मीयता से कुशलक्षेम पूछी। अब मुझे कुछ अच्छा लगा। तभी वहां लगभग २०-२२ वर्षीय एक अपरिचित साधक मेरे पास आए और बोले कि 'कृपया भोजन कर ९ बजे आप भोजन-कक्ष के बाहर रखी बेंच पर बैठ जाएं, वहां से आपको कुछ अभ्यास और प्रयोग आदि के लिए ले जाया जायेगा।' वह बिसाल भैया थे। मैंने शीघ्रता से भोजन समाप्त किया और बाहर पहुँच गया, परन्तु वहां पर कोई भी न था। इधर-उधर पूछने पर पता चला कि मुझे ध्यान-कक्ष में जाना चाहिए। मैं शीघ्रता से ध्यान-कक्ष पहुंचा।

ध्यान-कक्ष में पहले से ही संभवतः मेरे जैसे ही कुछ अन्य लोग भी बैठे थे और शायद नामजप कर रहे थे। मुझे कुछ भी बताया नहीं गया कि आपको क्या करना है और क्या होगा! मैं मन ही मन नामजप करते हुए स्थिति का आंकलन करने लगा। कुछ-कुछ क्षणों के बाद बारम्बार कक्ष का द्वार खुलता था, कभी बिसाल भैया और कभी लगभग उन्हीं की आयु की एक साधिका द्वार से भीतर आते और किसी-किसी साधक को बुला कर अन्यत्र कहीं ले जाते। अंततः मेरे सहित कक्ष में बचे तीन लोगों को भी इशारे से बुलाया गया और एक अन्य कक्ष में ले जाया गया। ध्यान-कक्ष में से पहले ले जाये गए अन्य लोग वहां पर उपस्थित थे। आश्चर्यचकित सा मैं वहां बैठ गया। मुझे कुछ नहीं पता था कि मुझे क्या करना है और यहां क्या होना है! कई साधक-साधिकाएं रहस्यमय ढंग से कक्ष में आ-जा रहे थे। तभी एक साधिका ने एक कुर्सी लाकर उस कक्ष में रखी और कई निर्देश दिए। उन निर्देशों में एक यह था कि कोई परमपूज्य गुरुदेव के जाने के पश्चात् उस कुर्सी को भावनावश छुएगा नहीं। इस निर्देश से मुझे पता चला कि वहां संस्था के संस्थापक प.पू. डॉ. ******** जी आने वाले हैं। फिर एक साधिका ने सभी आगंतुकों को अपना परिचय देने के लिए कहा। सभी की भांति मैंने भी सारांश में अपना परिचय दिया। मेरे परिचय देते ही बिसाल भैया की सह-साधिका ने मुझे इशारे से बुलाया और कहा कि मैं आज गुरुदेव से नहीं मिल सकता, क्योंकि मैं हिंदी भाषी हूँ; आज मात्र मराठी भाषियों के लिए बैठक होगी। यद्यपि परिचय-सत्र के दौरान मुझे यह ज्ञात हुआ था कि मेरे अतिरिक्त कम से कम दो आगंतुक और भी ऐसे हैं जो मराठी नहीं जानते हैं, तदपि मात्र मुझे ही कक्ष से बाहर का रास्ता दिखाया गया! प.पू. गुरुदेव से भेंट के अगले समय के विषय में मेरे प्रश्न करने पर मुझे बताया गया कि देखेंगे! मुझे बड़ा अटपटा सा लगा। ... मैं अकेला ही भारी क़दमों से अपने कक्ष की ओर बढ़ चला और कुछ देर बाद निद्रा में लीन हो गया।

अगले दिन २९ मार्च को सुबह का अल्पाहार भी अकेले ही लिया। उसके बाद बिसाल भैया मेरे पास आए और एक अन्य कक्ष में ले गए। यहां उन्होंने मुझे एक वीडियो सी डी लगा दी और उसके बाद देखने के लिए चार अन्य सी डी भी वहां पर रख दीं तथा ये सब सी डी देखने के लिए कहा। ये सी डी संस्था के ६०% से ऊपर के आध्यात्मिक स्तर के साधकों के साक्षात्कार की थीं। ये सी डी हिंदी भाषा में थीं। २९ मार्च को भोजनावकाश के अतिरिक्त शेष पूरे समय मैं अकेला ये सब सी डी देखता रहा। हाँ, इस बीच सायंकाल कुछ समय के लिए बिसाल भैया मुझे लेकर केन्द्र के हिंदी विभाग गए। वहां मात्र कुछ मिनट की सेवा के बाद छुट्टी! मैं फिर से खाली और अकेला! हिंदी विभाग से पूछने पर बताया गया कि मेरे जैसे आगंतुकों के लिए नियोजन व्यवस्थापन विभाग करता है, वे अर्थात् हिंदी विभाग नहीं! मैं अपने कक्ष में लौट आया और सो गया।

अगले दिन ३० मार्च को सुबह के अल्पाहार के समय बिसाल भैया पुनः भोजन-कक्ष में मिले और उन्होंने पुनः सी डी वाले कक्ष में आने को कहा। उन्होंने मुझे फिर से एक सी डी लगा कर दी और उसके बाद देखने के लिए दो-तीन अन्य सी डी भी वहां रख दी। ये सी डी भी हिंदी भाषा में थीं। आज वहां मेरे अतिरिक्त दो नवागंतुक और भी थे। ये कर्नाटक राज्य से आयीं दो साधिकाएं थीं। इनमें से एक को हिंदी का थोडा सा भी ज्ञान नहीं था और कुछ भी समझ में न आने के कारण वह उंघा रही थीं। अब तक मैं यह समझ चुका था कि नवागंतुकों की देखभाल के लिए व्यवस्थापन ने बिसाल भैया को नियुक्त किया है। सो उस कन्नड़ दीदी की मदद हेतु मैं बिसाल भैया को ढूँढते हुए हिंदी विभाग तक पहुंचा। हिंदी विभाग ने बिसाल भैया से मेरी भेंट होने में सहायता की। तब मैंने उनसे कोई कन्नड़ सी डी लगाने का आग्रह किया और बताया कि मैं तो कल से अनवरत हिंदी सी डी देख रहा हूँ और अब उन कन्नड़ दीदी को उनकी क्षेत्रीय भाषा की सी डी की आवश्यकता है। इस पर वह बोले कि उनके पास कोई भी कन्नड़ सी डी नहीं है।

तब तक दोपहर के भोजन का समय हो चला था, सो मैं भोजन कक्ष की ओर चल दिया। भोजन के पश्चात् मैंने पुनः बिसाल भैया को खोजा और थोड़े कटु स्वर में उनसे कहा कि 'आखिर मेरे लिए क्या नियोजन है; मैं यहां लगभग साढ़े तीन दिन के लिए आया था जिनमें से लगभग दो दिन निकल चुके हैं और मैंने मात्र कुछ सी डी ही देखीं हैं; न तो मेरी भेंट प.पू. गुरुदेव से हुई और न ही उसका कोई नियोजन मुझे बताया जा रहा है; न तो किसी संकलनकर्ता आदि से मेरी भेंट कराई गई और न ही किसी का सत्संग आदि ही मुझे अब तक प्राप्त हुआ है; टी.बी. के रोगी की भांति अलग-थलग पड़ा हूँ, कोई कार्यसेवा भी नहीं कर रहा हूँ, कोई निरीक्षण भी नहीं कर रहा हूँ, और मेरा समय एवं ऊर्जा ऐसे ही बेकार जा रहे हैं; मेरी भेंट प.पू. गुरुदेव से कब होगी?' इस पर बिसाल भैया कुछ सक्रिय हुए और उन्होंने तुरंत इधर-उधर कई फोन किये। अंततः मुझे बताया कि मैं फिलहाल हिंदी विभाग में कुछ सेवाकार्य करूँगा, तत्पश्चात मुझे केन्द्र के भवन का भ्रमण कराया जायेगा; और कल अर्थात् मेरे प्रवास के अंतिम दिन ३१ मार्च को प्रातःकाल भवन से लगी भूमि पर की जा रही खेती का निरीक्षण कराया जायेगा तथा दोपहर पश्चात् कुछ समय के लिए नगर के भ्रमण को ले जाया जायेगा। प.पू. गुरुदेव से भेंट के विषय में पुनः पूछने पर बताया कि वह व्यवस्थापन से पूछकर बतायेंगे। इस पर मैंने कहा कि क्या मैं स्वयं व्यवस्थापन से बात कर सकता हूँ, तो वह बोले कि नहीं, इस विषय में हम ही उनसे बात कर आपको सूचित करेंगे। परन्तु अंत समय तक इस सम्बन्ध में कोई भी सूचना उनके पास देने को न थी!

... इसी प्रकार मात्र औपचारिकताओं को निभाते हुए, किसी प्रकार खानापूरी करते हुए संस्था के मुख्य केन्द्र ने मेरे प्रवास का अगला और अंतिम दिन अर्थात् ३१ मार्च भी येन-केन-प्रकारेण व्यतीत करा दिया, और १ अप्रैल २०११ को भोर होने से पूर्व ही मैं लगभग खाली हाथ वापस लखनऊ को चल दिया। इति।

Saturday, November 27, 2010

(४२) सर्व साधकों को चाहिए कि ... (भाग २)

प्रथम भाग से आगे --

(१) साधकों को सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि उनकी आत्मशक्ति भी विश्व के महानतम महापुरुषों के समतुल्य ही है। दृढ़ निश्चय, अनुशासन, उत्साह और समर्पणभाव से साधना करने पर अंतर्मन साफ़ होता जायेगा और आत्मिक शक्ति प्रकट होती जायेगी।

(२) साधक का प्रमुख लक्ष्य 'योग' है, 'योग' अर्थात् ईश्वर के साथ बिलकुल जुड जाना, एक हो जाना, आत्मा के सच्चे स्वरूप को पा लेना, आत्मस्थ हो जाना। इसके लिए हमारे प्रयत्न जिस क्रिया के साथ जुड़ते हैं, वही योग बन जाता है। उदाहरणार्थ- कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग, सांख्ययोग, राजयोग, मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग आदि। हमारे पूर्व व वर्तमान संस्कारवश जिसमें हमारी रुचि हो, प्रथमतः उसी को ईश्वरप्राप्ति का मार्ग मानकर सादर ग्रहण करना चाहिए।

(३) आगे ध्यान देने की बात यह है कि उपरोक्त योगमार्गों में भक्तियोग, ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोग को छोड़कर अन्य योगमार्गों में शारीरिक क्रियाओं अथवा मन्त्र-तन्त्रादि का अत्यधिक समावेश है। इनमें बहुत से विधि-निषेध लागू होते हैं और ये योगक्रियाएं बिना योग्य मार्गदर्शन के करना खतरे से खाली नहीं, लाभ के बजाय हानि संभव है। अर्थात् इनके लिए योग्य सगुण गुरु की आवश्यकता होती है, और इनका आज कितना अभाव है यह सब जानते ही हैं। अतः भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग जैसे अपेक्षाकृत सरल योगमार्ग चुनना अधिक श्रेयस्कर रहेगा।

(४) वैसे तो भक्तियोग, ज्ञानयोग तथा कर्मयोग आदि मार्गों में भी पथप्रदर्शकों की आवश्यकता रहती ही है, परन्तु फिर भी इन मार्गों में इतनी तो सरलता है ही कि आजकल के पाखंडी और दिखावटी गुरुओं की शरण में जाये बिना 'गीताप्रेस' सरीखे प्रकाशनों के निर्मल साहित्य को पढ़कर, उनसे प्रेरित होकर, अपने शुद्ध मनन, दृढ़ निश्चय, श्रद्धा, भक्ति, शरणागति, सदाचरण आदि के योग द्वारा मजबूत क़दमों से आगे बढ़ा जा सकता है। किसी ढोंगी स्वयंभू गुरु की शरण लेना या सच्चे गुरु से मिलन की प्रतीक्षा में यूँ ही बैठे रहना ठीक नहीं।

(५) साधकों को विभिन्न योगमार्गों पर चलने से मिलने वाली तथाकथित सिद्धियों के प्रलोभन में कतई नहीं पड़ना है। सबसे सच्ची सिद्धि तो अंतःकरण की वह शुद्ध स्थिति है, जिसमें भगवान के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं रह जाता। यह अत्यंत दुःखद है कि आज अधिकांश गुरु और उनके अनुयायी रिद्धि-सिद्धि या सांसारिक अभिलाषाओं के निमित्त ही एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, यह सब जानते हैं। साधक इनसे बचें।

(६) जबकि हमको पता है कि सभी साधनों अर्थात् योगमार्गों का लक्ष्य मोक्ष (सर्वोच्च आनंद की सतत अनुभूति) है और योग्य मार्गदर्शक की अनुपस्थिति में रुकने, फिसलने या गिरने का भय है, तो फिर बिलकुल निरापद स्थिति यह होगी कि हम तत्त्व या सिद्धांत के प्रति अपनी शरणागति बढ़ाएं। तत्त्व या सिद्धांत के प्रति अपनी शरणागति बढ़ाना अर्थात् वेदान्त, गीता आदि में प्रतिपादित अकाट्य आध्यात्मिकी सिद्धांतों पर पूर्ण निष्ठा।

(७) जब हम अक्षुण्ण आत्मा-परमात्मा, पुनर्जन्म, कर्मफल, प्रारब्ध आदि आध्यात्मिकी सिद्धांतों पर इनसे मिलते-जुलते भौतिकी सिद्धांतों जैसे ऊर्जा की अक्षुण्णता, ऊर्जा का किसी अन्य रूप में रूपान्तरण, क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया आदि की भांति ही अनन्य विश्वास करते हैं, और इन्हें जीवनचक्र से पूरी तरह जोड़कर अनुभूत करते हैं तो हम देखते हैं कि जीवन की अनेकों गुत्थियां सुलझने लगती हैं।

(८) उपरोक्त सिस्टम पर अर्थात् सृष्टि सम्बन्धी अकाट्य सिद्धांतों पर पूर्ण आस्था का भाव स्थापित होते ही हम स्वतः सही मायनों में 'धार्मिक' (righteous) हो जाते हैं, स्वतः ही योग्य पथ पर चलते हैं, उचित निर्णय लेते हैं, हममें निर्भयता आ जाती है और निराशा का हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं रहता। हमारा पूरा नजरिया ही बदल जाता है। रोजमर्रा के काम से विरक्त हुए बिना, सब कुछ करते हुए भी हममें आश्चर्यजनक संतुलन आ जाता है। अनुकूलता में हम अतिउत्साहित नहीं होते और प्रतिकूलता में हताश नहीं होते।

(९) उपरोक्त कथित संतुलन ही हमें मानव देह में रहते हुए मोक्ष को प्राप्त कराता है। मोक्ष अर्थात् सतत रहने वाली सर्वोच्च आनंदानुभूति अर्थात् आत्मानुभूति ही।

(१०) फिर से कहूँगा कि इस स्थिति के निर्माण के लिए साधकों को स्थूल-निष्ठा त्यागकर तत्त्व-निष्ठावान बनना होगा। तत्त्व सूक्ष्म है और तत्त्व ही यथार्थ है। स्थूल में विकार आ सकते हैं, सूक्ष्म में नहीं। सिद्धांत बताने वाले में विकार संभव है, सिद्धांत में नहीं। अतः सिद्धांत को समझकर उसके प्रति पूर्ण विश्वास उपजाने की साधना सर्वप्रथम करें, फिर सबकुछ स्वयं होता चला जायेगा। सांसारिक धन, यश या सम्मान के अभिलाषी दम्भी गुरुओं से दूर रहकर भी यथार्थ धर्म (righteousness) और उसपर आधारित अर्थ, काम, मोक्ष आदि को पाना सभी के लिए संभव है।
(क्रमशः)

Thursday, November 25, 2010

(४१) अवसाद (डिप्रेशन)

आज अवसाद (डिप्रेशन) शब्द से लगभग सभी लोग परिचित हैं, और साथ ही एक बड़ी संख्या में लोग इसका शिकार भी हैं। अवसाद, हताशा, उदासी, गहरी निराशा और इनसे सम्बंधित रोग चिकित्सीय जगत में मेजर डिप्रेशन (Major depression), डिस्थाइमिया (Dysthymia), बायपोलर डिसऑर्डर या मेनिक डिप्रेशन (Bipolar disorder or manic depression), पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum depression), सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर (Seasonal affective disorder), आदि नामों से जाने जाते हैं। वैसे हर किसी के जीवन में ऐसे पल आते हैं, जब उसका मन बहुत उदास होता है। इसलिए शायद हर एक को लगता है कि हम गहरी निराशा के विषय में सब कुछ जानते हैं। परन्तु ऐसा नहीं है। कुछ के लिए तो यह निराशावादी स्थिति एक लंबे समय के लिए बनी रहती है; जिंदगी में अचानक, बिना किसी विशेष कारण के निराशा के काले बादल छा जाते हैं और लाख प्रयासों के बाद भी वे बादल छंटने का नाम नहीं लेते। अंततः हिम्मत जवाब दे जाती है और बिलकुल समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों हो रहा है। इन परिस्थितियों में जीवन बोझ समान लगने लगता है और निराशा की भावना से पूरा शरीर दर्द से कराह उठता है। कुछ का तो बाद में बिस्तर से उठ पाना भी लगभग असंभव सा हो जाता है। इसलिए प्रारंभिक अवस्था में ही इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह व्यक्ति हद से ज्यादा उदासी में न डूब जाये। समय रहते लक्षणों को पहचान कर किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से तुरंत परामर्श लेना चाहिए व तदनुसार इलाज करवाना चाहिए। डिप्रेशन के प्रकारानुसार एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली में अवसादरोधी दवाओं (Antidepressant medications), साइकोथेरेपी (Psychotherapies), विद्युत-आक्षेपी थेरेपी (Electroconvulsive therapy) आदि माध्यमों से चिकित्सा की जाती है। डॉक्टर के परामर्श के अनुसार दवा लेने, दिनचर्या में बदलाव लाने, खानपान में फेरबदल करने तथा व्यायाम आदि से अच्छे परिणाम मिलते हैं। ध्यान रहे, डॉक्टर से बिना पूछे दवाइयाँ बंद करने के बुरे परिणाम हो सकते हैं तथा व्यक्ति की बीमारी और अधिक गंभीर हो सकती है।

यह तो थी चर्चा निराशा, अवसाद, डिप्रेशन आदि के लक्षणों एवं उनके चिकित्सीय निदान की। यद्यपि अध्यात्मशास्त्र शारीरिक चिकित्सा का शास्त्र नहीं है, तदपि देखा गया है कि अध्यात्मशास्त्रज्ञों एवं साधक वर्ग में मनोदैहिक (Psychosomatic) और मानसिक (Psychic) रोगों की मात्रा लगभग नगण्य होती है। अधिकांश मनोदैहिक एवं मानसिक रोग मन से सम्बंधित विकारों तथा कुछ अन्य आध्यात्मिक कारणों से होते हैं; गंभीर मानसिक रोग तो बहुधा आध्यात्मिक कारणों से ही होते हैं। परन्तु उचित साधना से उपजी संतुलित मनःस्थिति एवं आध्यात्मिक बलिष्ठता के कारण साधक वर्ग इन सब से बचा रहता है। साधक वर्ग से तात्पर्य यहाँ ऐसे वर्ग से है जो वेदान्त व भगवत्गीता आदि में उल्लेखित तथा स्वामी विवेकानंद, श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार और पं. श्रीराम शर्मा आचार्य सरीखे वर्तमानकाल के विद्वानों द्वारा बताई गयी आत्मा, परमात्मा, कर्म, कर्मफल, पुनर्जन्म, संचित, प्रारब्ध, मोक्ष जैसे शब्दों की व्याख्या पर पूर्ण विश्वास करता है एवं पूर्ण आस्था के साथ जीवन के प्रत्येक प्रसंग को इन सिद्धांतों के साथ जोड़कर देखता व करता है।

यद्यपि अध्यात्म व इसके सिद्धांतों को तर्क से सिद्ध करने का प्रयास एक निम्न श्रेणी की धृष्टता ही है, फिर भी कहूँगा कि सच्चे आध्यात्मिक सिद्धांतों में कुछ भी ऐसा दुविधापूर्ण नहीं जो वर्तमान विज्ञान की कसौटी पर खरा न उतरता हो, सब कुछ स्पष्ट एवं तर्कपूर्ण है। जैसे ऊर्जा की अक्षुण्णता का सिद्धांत और किसी क्रिया के फलस्वरूप तदनुसार प्रतिक्रिया का सिद्धांत, ये दो वैज्ञानिक सिद्धांत ही आत्मा के अमरत्व सम्बन्धी तथा कर्मफल एवं प्रारब्ध के निर्माण सम्बन्धी आध्यात्मिक सिद्धांतों की पुष्टि हेतु पर्याप्त हैं। इन्हीं दो सिद्धांतों को भली-भांति आत्मसात् कर साधक वर्ग शुद्ध मानसिकता व कर्मों के प्रति सदैव एवं स्वतः सचेत रहता है, यथार्थ में रहता है। उसे यह अच्छी तरह से ज्ञात होता है कि प्रारब्ध कोई शून्य से टपकी वस्तु नहीं, अपितु उसी के द्वारा किये गए कर्मों (क्रिया) के फलस्वरूप उपजा प्रतिक्रियात्मक कोष है, अतः उसका रुझान अनवरत योग्य कर्म के प्रति ही रहता है। कर्म करते हुए शारीरिक रूप से थक जाने पर या असफलता के क्षणों में भी निराशा उस पर हावी नहीं होती। उसे आत्मा रूपी अक्षुण्ण ऊर्जा का भी ठीक से ज्ञान होता है और इससे सम्बंधित भौतिक तत्वों का भी। इस ब्लॉग के अन्य लेखों में इस सम्बन्ध में विस्तार से खोजा जा सकता है। उपरोक्त सभी कारणों से साधक वर्ग प्रत्येक स्थिति में शांत, आनंदित एवं संतोषी रहता है और अवसाद या डिप्रेशन जैसी मानसिक व्याधि का शिकार नहीं बनता।

आत्मा-परमात्मा की सत्ता पर तथा कर्मानुसार संचित एवं प्रारब्ध के निर्माण पर अगाध विश्वास करने से न केवल हमारे कर्मों और मानसिकता की गुणवत्ता में सुधार होता है, बल्कि साथ ही जीवन के असंख्य अनसुलझे, अबूझे प्रसंगों की पहेलियाँ भी सुलझती हैं। इससे न केवल हम मनोदैहिक व मानसिक रोगों से बचे रहते हैं बल्कि व्यर्थ की उद्विग्नता से परे एक शांत व संतोषी जीवन व्यतीत करते हैं। हमारे न मानने या न स्वीकार करने से इन सिद्धांतों का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। हाँ, इनके सीधे लाभ से हम वंचित रह जाते हैं। विज्ञान समर्थित इन अकाट्य आध्यात्मिक सिद्धांतों को स्वीकार करने व इन पर चलने से शुभ-कर्म होंगे, पाप-कर्म से दूर रहेंगे। आत्मा, परमात्मा, कर्मफल आदि की सत्ता यदि न भी हो तो भी हम सांसारिक सुख्याति व प्रतिष्ठा तो प्राप्त करेंगे ही, हमें लाभ ही होगा। परन्तु इन सिद्धांतों को न मानने पर और इन पर न चलने से हम स्वेच्छाचारी बनकर दुष्कर्मों में प्रवृत्त होंगे, फलतः कुख्याति को प्राप्त करेंगे; और यदि इन सिद्धांतों का अस्तित्व हुआ तो दुष्कर्मों (क्रिया) के फलस्वरूप ऋणात्मक प्रतिक्रिया संचित कर हम अपना प्रारब्ध बिगाड़ लेंगे, हमारी बहुत हानि होगी। इति।

Thursday, September 23, 2010

(४०) वास्तविक संत

  • संत ऊपर से दिखने पर साधारण मनुष्यों जैसे ही होते हैं, जल्दी पहचान में नहीं आते; वे केवल आनंद और संतोष की सुगंध से ही पहचाने जाते हैं।
  • संत का अस्तित्व उसकी भौतिक देह या वेशभूषा में न होकर केवल उसके वचनों में होता है। कैसी भी थैली में हीरा रखने पर थैली का महत्त्व नगण्य होकर केवल हीरे का महत्त्व रहता है।
  • खरे संत की पहचान उसके विशिष्ट वस्त्रों, केश-विन्यास, भाव-भंगिमाओं अथवा वाह्य श्रृंगार (make-up) से नहीं, वरन उसके नैसर्गिक प्रभामंडल से होती है।
  • संतों का उद्देश्य अपने उपदेशों या वचनों द्वारा सुनने वालों को मात्र रिझाना नहीं होता, वरन उनके वास्तविक कल्याण की दृष्टि से वे उपदेश देते हैं।
  • जिसकी संगति से हमारे अंतर्मन में भगवत्-प्रेम प्रकट हो और विषयों के प्रति आसक्ति घटे, उसे संत जानें।
  • संत के पास जाकर संतोष, शांति व आनंद आदि का वास्तविक अर्थ पता चलता है और इन्हें पाने की रुचि उत्पन्न होती है।
  • ईश्वर की सगुण अथवा निर्गुण भक्ति तथा ईश्वरीय गुणधर्मों से ओतप्रोत जीवन जीने के अतिरिक्त कोई भी बात संतों को रुचिकर नहीं लगती।
  • अपने व्याख्यानों में जिन सिद्धांतों की संत चर्चा करते हैं, उन्हें वे भली-भांति हृदयंगम कर चुके होते हैं और आचरण द्वारा सतत प्रकट करते हैं।
  • संतों के व्याख्यान उनके स्वयं के अनुभवों तथा अनुभूतियों पर आधारित होते हैं, वे व्यर्थ का ढोंग या दिखावा नहीं करते; उपदेश करना उनका व्यवसाय नहीं होता।
  • संतों में भी षड्-विकार होते हैं परन्तु उनका रूपांतरण भगवत्-भक्ति के साधन के रूप में हो जाता है; तब ये षड्-रिपु व्यष्टि और समष्टि साधना के लिए उपकरण समान बन जाते हैं।
  • संतों को भी पूर्वकर्मजन्य प्रारब्ध को भोगना पड़ता है, शारीरिक कष्ट भी होते हैं, परन्तु देहभान न होने के कारण उन्हें इसके कारण किसी सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता।
  • संत हमारे जीवन में आने वाले कष्टों को दूर नहीं करते, वरन वे कष्टों के प्रति हमारे भय को समाप्त कर देते हैं। संकट से अधिक दुःखदाई संकट का भय होता है!
  • संत के संसर्ग से नास्तिक भी ईश्वरभक्ति की ओर मुड़ते हैं, फलतः वे पापकर्म से दूर होते हैं तथा दुःखों में आश्वासन, धैर्य और ढाढ़स प्राप्त करते हैं।
  • संत की संगति से तर्क क्षीण होते हैं, वृत्ति बदलती है, अनुभव और अनुभूतियाँ बढ़ते हैं, अंततः ईश्वर के अस्तित्व की अनुभूति होती है; क्योंकि ईश्वर को तर्क से सिद्ध नहीं किया जा सकता।
  • साधारण संत कहता है, "दुष्टों का नाश हो", जबकि खरा संत कहता है, "दुष्टता का नाश हो" अर्थात् दुष्ट व्यक्तियों की दुष्टता मिटे।
  • खरे संत की सबसे बड़ी पहचान यह है कि आप किसी सांसारिक अभिलाषा की प्राप्ति के लिए उसके पास जाएंगे और अभिलाषा-रहित होकर लौटेंगे; संत-संग का यह सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम है।
  • खरा संत हमें कभी भी सांसारिक विषयों में उलझाएगा नहीं, न ही उन्हें एकदम से त्यागने के लिए कहेगा; बल्कि वह उन विषयों के प्रति हमारी आसक्ति समाप्तप्राय कर देगा।
  • खरा संत कभी भी अपने 'संत' होने का प्रचार-प्रसार नहीं करता और न ही किसी के द्वारा 'संत' कहने पर गदगद् होता है।
  • संत किसी प्रकार का चमत्कार नहीं करते, चमत्कार जैसा कुछ स्वयमेव हो जाता है! इसके लिए आवश्यकता है सतत संत-संगति की।

Saturday, September 18, 2010

(३९) प्रतिक्रिया - उचित या अनुचित ?

हमारे भारत में एक बहुत बड़ी विडम्बना है कि हम भारतवासी भावुक कुछ अधिक ही हैं और भावुकतावश किसी व्यावहारिक प्रश्न का हल ढूंढते समय जैसा गुरु बता देता है उसी नियम को एकमात्र व अंतिम (ultimate) मानकर बिलकुल नाक की सीध में चल देते हैं, अपने विवेक-बुद्धि या आत्मिक ज्ञान का प्रयोग करने की चेष्टा बिलकुल भी नहीं करते, क्योंकि हमें मनोलय और बुद्धिलय की जबरदस्त घुट्टी जो पिलाई जाती है। हमारी मानसिकता संकीर्ण हो जाती है और विवेक कुंद! तब हम केवल एक ही दिशा में सोच पाते हैं, लचीलेपन का अभाव हो जाता है। उदाहरण के लिए - आजकल भारत में यह वाक्य हर कहीं देखने, पढ़ने और सुनने में आ रहा है कि "केवल अपने आप को सुधारो, दूसरों पर ध्यान न दो, दूसरों के प्रति कोई प्रतिक्रिया न दो; हम स्वयं सुधर जाएं इतना ही पर्याप्त होगा, अन्य स्वयमेव सुधर जाएंगे।" बड़े-बड़े ज्ञानियों, प्रवचनकर्ताओं, गुरुओं, मठाधीशों का आज यही प्रिय एवं मुख्य सन्देश है।

इस वाक्य ने तो वर्तमान अनैतिकता के विरुद्ध वैयक्तिक विरोधों, उपभोक्ता-फोरमों, कानून एवं न्याय व्यवस्था आदि पर तो प्रश्नचिन्ह लगाया ही है, साथ ही पूर्वकाल में देवी-देवताओं, महान हस्तियों और आम जनता द्वारा असत्य व अन्याय के विरुद्ध किए गए प्रयासों के औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है! और तो और क्या इस वाक्य ने वर्तमान में तथाकथित गुरुओं द्वारा किए जा रहे सुधारक प्रयासों, प्रवचनों आदि के औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगा दिया है? दूसरों को कहते हैं कि "तुम अन्यों को सुधारने का प्रयत्न मत करो, स्वयं ही सुधरो, शेष सब नियति व प्रारब्ध का खेल है"; तो फिर कोई उनसे यह पूछे कि "बाबा जी, आप पंडाल लगाकर इतनी भीड़ जुटाकर दूसरों को सुधारने में क्यों लगे हो? क्या आपको ही ईश्वर ने विशेषाधिकार-पत्र सौंपा है? क्या धर्म (righteousness) का ठेका कुछ ही लोगों ने उठा रखा है?" इन प्रश्नों का उत्तर भी वे बड़ी निर्लज्जता से देते हैं कि "हाँ, हमारा आध्यात्मिक स्तर बहुत ऊँचा है, तुम्हारा स्तर ही अभी क्या है, इसीलिए हम ही इसके अधिकारी हैं"!

उनका कथन भी काफी हद तक ठीक है कि बिना ज्ञानी हुए ज्ञान बघारना कोई अच्छी बात नहीं! लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रत्येक मनुष्य अपूर्ण है। सभी लोग ज्ञान के अलग-अलग स्तर पर हैं। कोई भी मनुष्य अपने से नीचे के स्तर वाले व्यक्ति के लिए प्रेरक या अध्यापक हो सकता है और अपने से ऊंचे स्तर वाले व्यक्ति के लिए अनुगामी या शिष्य। और व्यवहार में इतने विषयों के होते हुए कोई व्यक्ति किसी विधा में किसी से आगे हो सकता है तो किसी दूसरी विधा में उससे पीछे। यानी कहीं वह शिष्य की (सीखने वाले की) भूमिका में होता है तो कहीं सिखाने वाले की भूमिका में। तो जहाँ व्यवहार सम्बन्धी बातों का प्रश्न आता है वहाँ ऊपर दिया विवादास्पद नियम वृथा (fail) हो जाता है कि "केवल अपने आप को सुधारो, दूसरों पर ध्यान न दो, दूसरों के प्रति कोई प्रतिक्रिया न दो; हम स्वयं सुधर जाएं इतना ही पर्याप्त होगा, अन्य स्वयमेव सुधर जाएंगे।" व्यवहार व अध्यात्म सम्बन्धी अनेक बातों में हमसे अपरिपक्व कई लोग होते हैं, जैसे हमारी स्वयं की कच्ची उम्र की संतानें; क्या उन जैसों को कोई शिक्षा देना या सुधारने का प्रयत्न करना अयोग्य होगा?? बड़े भाई-बहन अपने से छोटों को सुधारने, सिखाने का प्रयत्न करते रहते हैं, क्या यह गलत है?? कई बार संतानें भी बड़ी होकर, परिपक्व होकर अपने बुजुर्गों की कमियों को सुधारने का प्रयत्न करती हैं, क्या यह गलत है?? एक शराबी पीकर दंगा-फसाद कर रहा है, यदि हमारे समझाने पर वह मान सकता है तो क्या उसे समझाना गलत है?? एक पुलिस वाला मोटरसाइकिल से हमारा पीछा करता है और हमपर बिना हेलमेट चलने के अपराध का दण्ड लगाता है और स्वयं भी वह हेलमेट नहीं लगाये है तो दण्ड भरने के साथ क्या हम उससे यह प्रश्न भी नहीं कर सकते कि वह स्वयं ऐसा क्यों कर रहा है?? एक मोटरकार वाला गलत दिशा से आकर हमें ठोकर मार देता है तो क्या हमारा विरोध दर्ज करना गलत होगा?? कोई घूस माँग कर हमारा कार्य करता है तो उसे घूस दे दी जाए या फिर ऐसे ही बिना काम किए लौट आया जाए!

उपरोक्त विवादास्पद नियम के अनुसार तो ऐसा होना हमारा प्रारब्ध ही है, वह हमें भोगना ही है!! क्रियमाण कर्म का बिलकुल मजाक बनाकर रख दिया है इस नियम ने! मैं मीठा बोलूँ, लेकिन मेरी संतान कटु बोलती है, अपशब्द बोलती है, तो उसे मना न करूँ, योग्य शिक्षा न दूँ; इन सबका कारण मैं अपने और संतान के प्रारब्ध को ही समझूँ, मौन रहकर प्रारब्ध को भोग लूँ! कुछ पलायनवादी विचार नहीं लगते ये आपको? मतलब यह कि कुछ गलत घटित हो रहा है तो या तो मेरे कर्म उसके लिए जिम्मेदार हैं या फिर मेरा प्रारब्ध, जो मेरे ही पूर्व कर्मों से निर्मित है; दूसरों की कोई गलती नहीं! दूसरे भी अपना-अपना प्रारब्ध भोग रहे हैं और उनके अधिकांश कर्म व परिस्थितियां भी उनके प्रारब्ध पर ही निर्भर हैं! यदि ये वाक्य सही हैं तो क्या कोई यह बताएगा कि प्रारब्ध आया कहाँ से?? बहुत बड़ा प्रश्न है यह!! ... वस्तुतः प्रारब्ध कोई ऊपर से टपकी वस्तु नहीं है, बल्कि यह हमारे ही क्रियमाण कर्मों द्वारा निर्मित हुआ कोष है। और यदि कुछ क्रियमाण कर्म करके स्वयं और समष्टि के कर्मों में कुछ सुधार आ सकता है तो फिर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर मौन क्यों साधा जाए?? इसमें आज के तथाकथित ज्ञानी महापुरुषों को आपत्ति कैसी?? वे समष्टि के प्रति मूक रहने या तटस्थता का भाव रखने को क्यों कहते हैं? उदाहरण के लिए - मैंने एक कपड़ा ख़रीदा, वह दोषयुक्त या कटा-फटा निकल आया तो माना जा सकता है कि मेरी गलती मैं देखकर नहीं लाया; फिर एक सही कपड़ा मैं सिलने के लिए दर्जी को देता हूँ और वह उसको दोषयुक्त सिल देता है, तो भी मैं उससे कुछ न कहूँ, भविष्य में अच्छा सिलने के लिए नसीहत भी न दूँ, क्योंकि कपड़ा खराब सिला गया यह मेरा प्रारब्ध था!? किसी विभाग से कोई गलत बिल आता है तो चुपचाप भुगतान कर दूँ! यदि मैं जिम्मेदार अधिकारी अथवा अध्यापक हूँ तो अधीनस्थ कर्मचारी अथवा विद्यार्थी से कोई जवाब तलब न करूँ! देख कर भी किसी अन्य को गड्ढे में जाने दूँ, हस्तक्षेप न करूँ!

.... यह हमारे क्रियमाण कर्म की महत्ता का तिरस्कार है। मनुष्य एक आत्मिक तत्पश्चात् सामाजिक प्राणी है और यदि उससे जुड़े समाज के विभिन्न घटकों में अनैतिकता रहे तो फिर उस व्यक्ति का वहाँ गुजारा कठिन होता है। अतः अपने वर्तुल में नैतिकता को सुदृढ़ करने हेतु गलत कृत्यों के विरुद्ध योग्य प्रतिक्रिया देना गलत न होगा। .... मैं मानता हूँ कि पर्याप्त योग्यता न होने पर भी हर जगह दबंगई दिखाना मूर्खता है परन्तु हमारे विनम्र, न्यायसंगत व दृढ़ प्रयासों से स्थितियां यदि सुधर सकती हैं तो प्रयास अवश्य करना चाहिए। शालीनता और सुसभ्यता से उचित समय पर योग्य प्रतिक्रिया देना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि मूक रहने के कारण बाद में कोई बड़ी दुर्घटना हो जाने पर हमें पछताना पड़ सकता है। जो हमें सुन सकता है, जिसके ऊपर हमारा कुछ अधिकार है वहाँ हमें अवश्य योग्य प्रतिक्रिया देनी चाहिए। पुनः, कर्म का फल और फल का समय हमें नहीं पता। बीजारोपण हमारे वश में होता है, खाद-पानी देना हमारे वश में है, परन्तु आगे के विकासक्रम के बारे में हम अनभिज्ञ होते हैं। इससे हमारे बीजारोपण या खाद-पानी देने का महत्त्व कम नहीं हो जाता। यह प्रयास कभी भी फलीभूत हो सकता है और सबको लाभ मिल सकता है। इति।

Monday, September 13, 2010

(३८) खुशियाँ मनाना

प्रायः हम लोग खुशियाँ मनाने के लिए कोई न कोई कारण, बहाना अथवा विशेष अवसर खोजते हैं, जैसे - त्यौहार, जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ आदि। लोग ऐसे विशेष अवसरों पर अन्यों को न्योता देते हैं एवं स्वयं भी दूसरों के यहाँ जाते हैं अथवा पारिवारिक सदस्यों के साथ ही वह विशेष अवसर मनाते हैं। इसमें तीज-त्यौहारों का औचित्य तो ठीक से समझ में आता है कि समाज के सभी लोग इनके बहाने कम से कम परिवार के स्तर पर इकट्ठा होकर उत्सव मनाते हैं, खुशियाँ बांटते हैं और पूरा समाज रोजमर्रा की जिंदगी से हट कर हर्ष व उत्साह से सराबोर हो जाता है। इन धार्मिक उत्सवों के पीछे निहित पवित्र सन्देश एवं शिक्षा का लाभ भी जाने-अनजाने हमें मिलता ही है। इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि रुपए-पैसे या भेंट आदि का लेनदेन न के बराबर ही होता है। वैसे कुछ लोगों ने तीज-त्यौहारों में भी व्यर्थ के दिखावों और लेनदेन की परम्परा डाल दी है परन्तु भारत में त्यौहारों की कुल संख्या को देखते हुए इनका प्रतिशत फ़िलहाल नगण्य ही है। .... लेकिन जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ समारोह आदि जैसे कुछ आयोजन ऐसे हैं जो वर्तमान समय में आपसी प्रेम के स्थान पर औपचारिकताओं को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन आज भारतीय समाज में लोगों को एक-दूसरे से मिलने और खुशियाँ मनाने का कोई दूसरा रास्ता सूझता ही नहीं है। उदाहरण के लिए -- मेरे एक मित्र से मेरी भेंट अक्सर (लगभग हर २०-२५ दिन में) सब्जीमंडी में हो जाती है; सब्जी खरीदते हुए ही हम आपस में कुछ मिनट बात करते हैं और फिर चल देते हैं। चूँकि मेरा घर सब्जीमंडी से बिलकुल समीप ही है अतएव अनेक बार उनसे अनुरोध किया कि 'कभी कुछ समय निकालें, घर पर बैठ कर आराम से कुछ बातें की जाएं, इस बहाने परिवार के अन्य सदस्यों से मिलना भी हो जाएगा'; इस पर उनका जवाब होता है कि 'आप कुछ करिये तो आएं' अर्थात् 'कुछ समारोह जैसा आयोजित कीजिए तो सपरिवार आएं'। .... ऐसा नहीं है कि उनके पास समय का अभाव है या हम दोनों के विचार मेल नहीं खाते। हम दोनों की पटती भी है फिर भी ...., शायद आजकल हर चीज का 'ट्रेंड' बदल गया है; हम लोग संकुचित और औपचारिक होते जा रहे हैं!

पहले जब लोग खाली होते थे अर्थात् काम के समय से निवृत्त होकर जब समय पाते थे तो एक-दूसरे के घर यूँ ही मिलने चले जाया करते थे; फिर तब यदि नाश्ते का समय होता तो नाश्ता आदि कर लेते थे, भोजन का समय होता तो भोजन आदि कर लेते थे, और कुछ नहीं तो ठंडा पानी या चाय आदि ही पी लेते थे और संतुष्ट हो जाते थे। खाली समय की इन बैठकों में खाने-पीने की अपेक्षा प्रमुख लक्ष्य होता था - आपसी आमोद-प्रमोद, ढेर सारी बातें और परस्पर वैचारिक आदान-प्रदान। आपसी प्रेमभाव बढ़ाने के अतिरिक्त ये बैठकें हमारे सामान्य ज्ञान की वृद्धि में भी बहुत सहायक सिद्ध होती थीं। इस प्रकार की गतिविधि से व्यक्ति सामाजिक रूप से एक-दूसरे के निकट आता था, एक-दूसरे को समझ पाता था, बिना कारण या अवलम्ब के खुशियाँ मना पाता था, स्वस्थ हास-परिहास होता था, मन हल्का और प्रसन्न हो जाता था; क्योंकि रोजमर्रा की व्यावसायिक मशीनी जिंदगी से हटकर ये गतिविधियां पैसा कमाने के उद्देश्य से नहीं वरन जिंदगी को हल्का-फुल्का और खुशनुमा बनाने के लिए होती थीं। जबकि दूसरी ओर हम अन्य औपचारिक समारोहों को देखें तो पाएंगे कि उनको मनाने का कुछ कारण है, वे किसी बात पर अवलम्बित हैं, वे नियत दिनांक पर ही मनाये जा सकते हैं और उनमें औपचारिकताएं भी बहुत सी आ गई हैं तथा नित नवीन औपचारिकताएं बढ़ती ही जा रही हैं। इस प्रकार के आयोजन चाहे पारिवारिक स्तर पर हों अथवा सामाजिक स्तर पर, दोनों ही मामलों में रुपए-पैसे के ऊपर निर्भरता आ ही जाती है, भेंट आदि लेना-देना आवश्यक सा होता है और वह भी अधिकाधिक दिखावे के साथ! भेंट-उपहारों को प्रेम से अधिक कीमत की कसौटी पर कसा जाता है, आपसी लगाव के आंकलन का तरीका बदलता जा रहा है! यदि कोई इससे इन्कार भी करे तो भी इतना तो स्वीकार करेगा ही कि मेहमानों को मेजबान से अधिकतम की अपेक्षा होती है और मेजबान को मेहमान से! समारोह के दौरान या बाद में कभी न कभी मेजबान या मेहमान के आर्थिक स्तर की चर्चा होती अवश्य है और अन्य समारोहों के साथ तुलना भी की जाती है। चर्चाओं में अक्सर इस तरह के वाक्य सुनाई पड़ते हैं - "मैंने तो उनके यहाँ इतना दिया था, उन्होंने तो उसकी तुलना में बहुत कम दिया; मेरा उपहार महंगा था, उन्होंने तो सस्ता सा पकड़ा दिया; वे कंजूसी कर गए; वे मतलबी हैं; लगता है कहीं और से मिला उपहार मुझे पकड़ा गए; अरे हमारा उपहार उनकी औकात के हिसाब से बहुत है!" .... यानी खुशियाँ मनाने से अधिक ध्यान विभिन्न आंकलनों पर रहता है और इस पर भी कि दिखावा कैसे अधिक से अधिक हो!

जबकि वैयक्तिक रूप से बिना वजह यूँ ही एक-दूसरे से मिलते-जुलते और खुशियाँ मनाते समय इन सब बातों का कोई महत्त्व नहीं रहता तथा रूपए-पैसे के दिखावे और उपहार-भेंट आदि की औपचारिकताओं से दूर ही रहते हैं। इस प्रकार के बैठकें या पार्टियां किसी कारण विशेष पर आश्रित नहीं होतीं और ये हमें आपसी भाईचारा बढ़ाने के लिए उकसाती हैं, प्रेरित करती हैं। ये किसी भी खाली समय या छुट्टी के दिन संभव हैं, इनमें स्वार्थ या अपेक्षा जैसा कुछ नहीं होता, ये कार्य-दिवसों में आए तनाव को कम करने में भी विशेष सहायक सिद्ध होती हैं। इस तरह के आयोजन या मिलना-जुलना पूरी तरह से हमारे हाथ में है और इन पर दिनांक या दिवस विशेष का कोई बंधन लागू नहीं होता। .... बिलकुल निराकार साधना जैसी है यह! निराकार उपासना में विधि-निषेध बंधन नहीं है और यह सप्ताह में चौबीस घंटे और सातों दिन संभव है; जबकि साकार उपासना बहुत सी बातों पर आश्रित होती है, कम अवधि के लिए हो पाती है। .... देखा जाए तो हमारे लिए हर दिवस एक उत्सव की तरह होना चाहिए और हममें यह कला होनी चाहिए कि हम हर दिन कहीं न कहीं से, किसी न किसी रूप में अपने दैनिक कार्यों में ही खुशियाँ तलाश लें। यह प्रक्रिया हमें निरंतर उत्साहित रखती है और जीवन्तता बनी रहती है। हम उत्साहित होने, प्रसन्न होने, खुशियाँ मनाने आदि में किसी दिन विशेष पर आश्रित न रहें बल्कि सर्वप्रथम अपने कर्तव्य रूपी कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए, उपरांत खाली होते ही आपसी सामाजिक मनोरंजन को पर्याप्त समय दें; जीवन्तता निरंतरता के साथ बनी रहे इसके लिए यह अत्यंत आवश्यक है। इति।

Sunday, September 12, 2010

(३७) पुरुषोचित आचरण

पिछले लेख में पुरुषों, विशेषकर भारतीय पुरुषों की वर्तमान मनःस्थिति पर कुछ तीखे ही प्रहार हो गए। आलोचना के साथ यह परम आवश्यक है कि समस्या के कारण जानने एवं निदान ढूंढने के प्रयत्न भी समानान्तर रूप से किए जाएं। यहाँ यह जानना भी आवश्यक हो जाता है कि आखिर पुरुषोचित आचरण कैसा होना चाहिए, और हमारी सोच में क्या कमियां हैं जिनके कारण हमें आखें झुकानी पड़ जाती हैं! इस लेख में इन्हीं सब बिदुओं पर मनन करने का प्रयास किया गया है।

किसी भी संघ की तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक एवं धार्मिक परिस्थितियों का जबरदस्त प्रभाव उस काल के लोगों के आचरण पर पड़ता है। यद्यपि ऊपर उल्लेखित सभी कारणों का मिलाजुला प्रभाव पड़ता है तद्यपि अच्छे एवं योग्य आचरण को अक्षुण्ण बनाए रखने में सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परिस्थितियों की भूमिका अग्रणी रहती है। यदि इन तीनों के स्तर में कोई गिरावट आती है तो मूल्यों का गिरना भी निश्चित होता है। ... और पुनः इन तीनों में भी यदि तुलना करें तो धार्मिक परिस्थिति की भूमिका सर्वोच्च है; सामाजिक मूल्यों के अधःपतन की दशा में सांस्कृतिक मजबूती उसे संभाल सकती है और सांस्कृतिक दोष आने पर धार्मिक सुदृढता उसे थाम लेती है। धर्म से तात्पर्य यहाँ विभिन्न धार्मिक कृत्यों से उपजे खरे अध्यात्मविषयक ज्ञान से है, सूक्ष्म के ज्ञान से है; ... और इस ज्ञान को अपने भौतिक जीवन के दैनंदिन क्रियाकलापों एवं आचरण में शामिल करना अर्थात् धर्म का निर्वाह करना। धर्म का यथार्थ निर्वाहन सभी प्रकार की बाधाओं-कठिनाइयों को पराजित करने में पूरी तरह से सक्षम है। जब-जब मनुष्य ने धर्म का आश्रय छोड़ा है, तब-तब तनावों एवं विषम परिस्थितियों ने उसे आ घेरा है और वह असंतुलित हो निरंतर नीचे की ओर गया है।

भारत में भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ। हमारा इतिहास एवं हमारी पौराणिक कथाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उनके अध्ययन से हमें साफ़ तौर पर जानने को मिलता है कि युग दर युग हमारे समाज की मानसिकता, तदनुसार आचरण, आदि में क्या-क्या बदलाव आए। सत्ययुग सर्वश्रेष्ठ था तो त्रेता उससे कुछ निम्न, द्वापर उससे निम्नतर, तथा कलियुग निम्नतम। तुलना सर्वथा तत्कालीन लोगों की मनःस्थिति एवं आचरण पर आधारित थी/है, और पुनः, किसी काल में लोगों की मानसिकता व आचरण तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक ढांचे पर निर्भर हैं। वैसे मेरा वैयक्तिक मत यह है कि वर्तमानकाल में प्रत्येक राष्ट्र या संघ उपरोक्त परिस्थितियों के वर्तमान तत्स्थानिक परिमाण के अनुसार अलग-अलग युग को अनुभव कर रहा है। इस धरा पर कदाचित सत्ययुग कहीं पर है यह तो संदेह की बात हो सकती है परन्तु त्रेता, द्वापर जैसी स्थितियां कई जगह देखने को मिल जाती हैं। हमारे देश के वर्तमान समष्टिगत मानसिक ढांचे एवं आचरण सम्बन्धी पक्षों को देखते हुए जब हम अपनी तुलना कुछ अन्य विकसित देशों से करते हैं तो स्वतः ही हमें इस सच्चाई के दर्शन होते हैं, भले ही हम प्रत्यक्षतः इसे स्वीकार न करें! विशेषकर हमारे यहाँ के पुरुषों के आचरण में समय के साथ बहुत अधिक नैतिक गिरावट आई है।

सब जानते हैं कि भारत का अतीत बहुत उज्ज्वल रहा था, सभी दृष्टियों से हम उत्कृष्ट थे। पर समय ने करवट ली, दुनिया में अनेकों बदलाव हुए; जो पीछे थे उन्होंने भी प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाये। भौतिक जगत सतत परिवर्तनशील होता है परन्तु हम भारतीय यह तथ्य भुलाकर आत्मश्लाघा एवं आत्मस्तुति के भंवर में फंस कर एक स्थान पर ही रुक गए, स्थिर हो गए, जड़ हो गए! उस समय हमारे यहाँ के जगत-विख्यात सांस्कृतिक और धार्मिक ढांचे ने भी हमारी कोई मदद नहीं की, क्योंकि उस समय उसका भी वही हाल था जो हमारी साधारण मानसिकता का था! यहीं से हमारे पतन और पराभव के दिन शुरू हुए। .... धीरे-धीरे हमारा राष्ट्र दासता की बेड़ियों में जकड़ गया, जिसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार थे। बाद में कुछ महत्त्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन हुए और हमारे सुप्तप्रायः राष्ट्र में कुछ चेतना का संचार हुआ, फलस्वरूप हम पुनः स्वतंत्र हुए। परन्तु यह यह प्रक्रिया भी इतनी लंबी, अनियोजित और सुस्त थी कि हमारे युवा पुरुषवर्ग को कोई योग्य दिशा देने में असफल रही। परतंत्रता से पूर्व ही हमारे यहाँ की धार्मिक शिक्षाओं के स्तर में गिरावट आ चुकी थी, परतंत्रता के दौरान स्थितियां और अधिक विकट रहीं तथा रही-सही कसर संचार माध्यमों के एकदम से विकसित हो जाने के फलस्वरूप आए वैश्वीकरण ने पूरी कर दी। .... कई दिनों से भूखे को अचानक ढेर सारा खाना मिल गया और वह पशुओं की भांति उस पर टूट पड़ा। पशु तो फिर भी एक सीमा तक विचार कर सकते हैं और शीघ्र तृप्त हो जाते हैं; परन्तु मनुष्य के पास तो मन, बुद्धि, विवेक आदि पशुओं की तुलना में बहुत अधिक है, सो हमने एकदम से ढेर सारा खाने के अतिरिक्त अनाप-शनाप संग्रह करना भी आरंभ कर दिया। इन सब जतनों, क्रियाकलापों में हमारा पुरुषवर्ग नैतिक रूप से भी निरंतर गिरता चला गया। हमारा आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक ढांचा वैसे ही जर्जर था, ऊपर से धार्मिक ढांचा तो और भी क्षतिग्रस्त, बिलकुल दिशाविहीन! परिस्थितियां बिलकुल विपरीत थीं/हैं, इसीलिए हम निरंतर और गिरते ही जा रहे हैं। आज जो माध्यम (जैसे- मीडिया, सिनेमा, राजनेता, धर्मगुरु) सशक्त हैं, मजबूत हैं, सामर्थ्यवान हैं, अधिकार रखते हैं, लोग जिनकी सुनते हैं, ... क्या वे माध्यम अपनी कुशलता, योग्यता व सामर्थ्य का ईमानदारी से सदुपयोग कर रहे हैं? बिलकुल नहीं ....; वे भी संग्रह, आत्मस्तुति एवं आत्मश्लाघा बढ़ाने में ही दिन-रात व्यस्त हैं। ऐसे में हमारे समाज के आधार-स्तंभ पुरुषवर्ग का अधःपतन होना निश्चित ही है।

यह बात सही है कि कोई भी अपनी माता के गर्भ से सब कुछ सीख कर जन्म नहीं लेता। प्रथमतः वह कोरे कागज की भांति ही होता है; वह यहीं इसी धरा पर, अपने परिवार, समाज आदि से सब कुछ सीखता है। यहीं उसके चारों ओर उपस्थित वातावरण के अनुरूप ही उसके संस्कार बनते हैं; पिछले जन्मों के संस्कारों में से भी केवल वही संस्कार जागते हैं जिनको स्थानीय वातावरण के अनुसार पोषण मिलता है, शेष सुप्त ही रहते हैं। और सत्य यही है कि हमारे संघ का दूषित वातावरण ही हमारे वर्तमान पुरुषवर्ग के अनैतिक आचरण के लिए दोषी है। स्त्रियों का स्तर अपेक्षाकृत ऊंचा होता है, इसके कारणों पर हमने पिछले लेख में देखा था। कुल मिलाकर वर्तमान भारत के बाहुबली पुरुषवर्ग की दुर्बलताओं के पीछे का मूल कारण मानसिक और आध्यात्मिक रूप से असंतुलित होना है और इस असुंतलन के लिए अभिजात सामाजिक घटक, मीडिया और सरकार जैसे सशक्त माध्यम तथा समाज के धार्मिक मार्गदर्शक प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं। इन सब का आचरण नैतिकता के मापदंडों की कसौटी पर अत्यंत निम्नकोटि का था/है, तभी तो आम प्रजा, विशेषकर पुरुषों में इस प्रकार के संस्कार उपजे! .... बचपन से किसी ने कुछ अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया नहीं; झूठ, फरेब, प्रतिद्वंदिता, कपट, लालच, ईर्ष्या और नाना प्रकार के अन्य दंद-फंद अपने आसपास घटित होते देखते व सुनते रहे; तो उन्हीं सब के अनुरूप संस्कार दृढ़ होते चले गए। बचपन में अभिभावकों ने भी सत्संग और पौराणिक कथा साहित्य आदि से दूर ही रखा कि यह सब तो बुढ़ापे के खाली समय के काम हैं और फिर इस क्षेत्र में भी धोखाधड़ी इतनी बढ़ गई है कि किसी पर विश्वास ही नहीं जमता! जवानी या अधेड़ावस्था में जाकर स्वयं से ही कुछ को एहसास हुआ कि कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है, सत्य से सामना हुआ; पर तब यह लगा कि अकेला चना कहाँ भाड़ फोड़ पाएगा, सो मन मसोस कर चुप रह गए। ... कुछ-कुछ ऐसा ही चल रहा है हमारे समाज में।

विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, भाषाओं या संघों से जुड़ा व्यक्ति अपने से सम्बंधित प्रचलित जीवन-प्रणाली से चलते हुए क्रमशः विकसित और परिष्कृत होने का प्रयास करता रहता है। परन्तु यदि कोई जीवन-पद्धति व्यक्ति को सुसंस्कृत, सभ्य, विनम्र एवं भद्र होने में मदद नहीं कर रही तो समझा जाना चाहिए कि निश्चित रूप से उस पद्धति में दोष आ चुके हैं और उस पद्धति के पुनरावलोकन एवं परिष्कार की आवश्यकता है। फसल से अधिकाधिक फल निष्पत्ति सुनिश्चित करने हेतु समय-समय पर फालतू में उग आई झाड़ियाँ और घासफूस साफ करने ही पड़ते हैं। हमारी वर्तमान जीवन पद्धति में भी बहुत अधिक व्यर्थ की झाड़ियाँ उग आई हैं। परन्तु हम सफाई करने से कतरा रहे हैं। जिनको सत्य का पता चला चुका है, कायरतावश वे सत्य का प्रयोग उन पर भी नहीं करते जिन पर उनका वश है, जो उनकी बात मान सकते हैं, जैसे उनकी स्वयं की संतानें। हमारे पूर्वजों ने गलत काम कम किए थे, हम उनसे आगे रहे, और हमारे वंशज गलत आचरण में हमसे भी आगे जा रहे हैं; यह देखते हुए भी हममें जागृति नहीं आती! जहाँ मूक रहना चाहिए वहाँ बहुत बोलते हैं और जहाँ बोलना चाहिए वहाँ मूक रहते हैं!

पहले हम परतंत्र थे, दबे हुए थे; फिर किसी तरह स्वतंत्र हो गए, तो मनमानी और बढ़ गई; उस पर वैश्वीकरण के चलते जब हम समस्त विश्व के बिलकुल निकट आ गए तो हम पहले से भी अधिक पिछलग्गू बन गए। पश्चिम के लोगों का हमने अनुकरण तो किया, पर आधा-अधूरा! हमारे युवाओं ने उनकी सभ्यता के नकारात्मक पक्षों को ही अपनाया और अनेकों सकारात्मक पक्ष अनदेखे कर दिए। हमने उनकी विलासिता तो ग्रहण कर ली, परन्तु उच्च आदर्श ग्रहण नहीं किए। हमने उनके चाय, कॉफी को तो ग्रहण कर लिया परन्तु अपनी मदद स्वयं करने का गुण नहीं अपनाया; सफर के दौरान थोड़ा सा सामान भी स्वयं उठाना हमें कठिन या फिर लज्जाजनक प्रतीत होता है; घर की सफाई आदि स्वयं करना भी अप्रतिष्ठा का विषय लगता है, तीर्थ यात्रा तक भी हम अपने पैरों से नहीं कर पाते हैं! पाश्चात्य दिन में कई बार खाते हैं, परन्तु वे शारीरिक श्रम भी लगनपूर्वक करते हैं, यह हमें दिखाई नहीं पड़ता! हम इतना नाजुक बनते हैं कि थोड़ा सा बीमार पड़ते ही सगे-सम्बन्धियों, मित्रों आदि को तुरंत सूचित करते हैं और अपेक्षा रखते हैं कि हमारा हालचाल पूछने हर कोई पहुंचे; वहीं दूसरी ओर पाश्चात्य युवक रफ-टफ और मजबूत हैं, जरा-जरा सी बात का रोना नहीं रोते! विदेशी पर्यटकों को देखकर हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि वे किस कदर मेहनती एवं ऊर्जावान होते हैं; अपने घरों में विलासितापूर्ण माहौल में रहने के बावजूद भारत की विषम परिस्थितियों में वे प्रसन्नचित्त भ्रमण करते रहते हैं, स्वावलम्बिता उनका विशिष्ट गुण है। परन्तु हम हैं कि उनकी विलासी वृत्ति को तो अपनाते हैं परन्तु स्थिति-अनुरूप विलासिता को तिलांजलि देने की चेष्टा में उनसे बहुत पीछे रहते हैं। हमारे आधुनिक युवाओं के पास जितने अत्याधुनिक गैजेट्स का भंडार है, हो सकता है पाश्चात्य युवाओं के पास उससे और अधिक हो; परन्तु वे उन गैजेट्स का सदुपयोग करते हैं, उनके गुलाम नहीं हैं, व्यर्थ का दिखावा-प्रदर्शन नहीं करते! ट्रेन या बस में चलते समय गैजेट्स का जोर-शोर से इस्तेमाल नहीं करते और न ही बवाल आदि करते हैं। पाश्चात्य लोग वृद्धजनों, बच्चों एवं स्त्रियों के प्रति विशेष सुहृदय रहते हैं और उनके लिए सीट आदि भी खाली कर देते हैं। स्त्रियों से व्यवहार करते समय वे अत्यधिक संयमित, संकोची एवं शिष्टाचारी रहते हैं एवं उनके संरक्षण के दायित्व का भाव रहता है, परन्तु हम ....? उनकी देखा-देखी हम भी अनेक 'स्त्री मित्र' बनाने में लगे रहते हैं, परन्तु हमारे संबंधों में गहराई, सुहृदयता एवं संरक्षण के दायित्व के भाव आदि के दर्शन नहीं होते; अभी भी हममें से अधिकांश पुरुष स्त्री को भोग्या ही समझते हैं। हम उनके देशों में बनी हुई अश्लील फिल्मों को तो देखते हैं, परन्तु अपेक्षाकृत अधिक संख्या में बनी प्रेरणादायी एवं साफ-सुथरी फिल्में देखने में पीछे रहते हैं। हमारे यहाँ की बहुत बड़े बजट की फिल्म भी अतिनाटकीयता एवं असंख्य तकनीकी दोषों से युक्त रहती है तथा अस्वाभाविक जान पड़ती है, जबकि उनके यहाँ की साधारण व काल्पनिक विषय पर बनी हुई फिल्म भी चुस्त कथानक, कुशल सम्पादन एवं तकनीकी श्रेष्ठता के कारण वास्तविक प्रतीत होती है। हमारे पास संसाधन कम नहीं हैं, हर आधुनिक तकनीकी उपकरण हम खरीद सकते हैं, परन्तु उनको चलाते तो हम ही हैं न; तो फिर अपनी उथली सोच के कारण हम फिल्म में वह गहराई व वास्तविकता पैदा नहीं कर पाते जो वे कर पाते हैं! इसके अतिरिक्त व्यापार आदि में जितने सुस्पष्ट और पारदर्शी नियमों से वे चलते हैं, हमारे व्यापार में उतनी ही मिलावट रहती है; बहुत सी बातें छिपी हुई होती हैं! कुल मिलाकर हमारे प्रत्येक कृत्य में चालाकियां व स्वार्थ छिपा होता है जबकि वे अधिकांशतः सरल-हृदयी होते हैं। वे चालाक और धूर्त भी होते हैं, परन्तु मात्र चालाक एवं धूर्त लोगों के लिए; क्योंकि वे 'जैसे को तैसा' की नीति पर चलते हैं और हम 'सबकी ऐसी की तैसी', इस नियम पर चलते हैं! अधिकांशतः उनका एक ही धार्मिक ग्रन्थ है जैसे - बाइबल, जबकि हमारे पास अनेकों मार्गदर्शक ग्रन्थ हैं; वे एक से ही बहुत कुछ ले लेते हैं और हम अनेकों से कुछ नहीं ले पाते!? वे करते अधिक हैं, बोलते कम हैं; जबकि हम इसकी उलट पद्धति पर चलते हैं! वहाँ कारखानों एवं अन्य उत्पादन इकाइयों में 'बढ़िया' नहीं वरन 'सर्वोत्तम' पर जोर दिया जाता है, जबकि हमारे कामगार एवं मालिक दोनों ही 'चलता है' की नीति एवं वृत्ति से काम करते हैं!

अब हमें सचेत होना ही होगा यदि हम वास्तव में ठोस प्रगति करना चाहते हैं। हमें अपने चिंतन में मानव जीवन के उद्देश्य को समझने का बिंदु सर्वोच्च स्थान पर रखना होगा। यदि हम मानव जीवन का उद्देश्य भली-भांति समझ सके और उसे हृदयंगम करते हुए अपने कार्यों और आचरण के माध्यम से उसे प्रकट कर सके तब ही हम पौरुष दिखाने में सफल हुए, ऐसा मानिये। हमारा गौरव एवं गरिमा किन बातों में है, इस सम्बन्ध में हमारी धारणा सुस्पष्ट होनी चाहिए। हमें हमारे लक्ष्य साफ तौर पर पता होने चाहिएं और उन्हें पाने के लिए योग्य (righteous) मार्ग भी। असली चैन, सुकून, शांति, आनंद आदि हमें 'योग्य एवं न्यायप्रिय' मार्ग पर चल कर ही प्राप्त हो सकते हैं। इसके लिए हमें अपनी मानसिकता का परिष्कार कर उसका स्तर ऊपर उठाना होगा और कर्मों की गुणवत्ता बढ़ानी होगी। मानसिक उत्कृष्टता एवं प्रत्येक कर्म की पराकाष्ठा तक पहुंचना कठिन तो हो सकता है परन्तु असाध्य नहीं। आगे के चरण में हमें उत्कृष्ट मानसिक स्तर से और ऊपर उठकर आत्मिक स्तर तक पहुंचना होगा, वहाँ तक पहुंचकर ही हम मानव जीवन के उद्देश्य को यथार्थतः समझ पायेंगे। फिर 'योग्य एवं न्यायप्रिय' (righteous) पथ पर चलते हुए यदि हम भौतिक रूप से कुछ अभाव या कठिनाई का सामना भी करते हैं, तो विश्वास कीजिए उस स्थिति में भी हम आनंदित ही रहेंगे; यह प्रयोग करने की तत्पश्चात् अनुभूत करने की बात है। .... इसके अतिरिक्त अभी और कुछ कहना मात्र शब्दों का दोहराव होगा। इतना पढ़कर ही जागरूक पाठक यह समझ सकते हैं कि हमारे देश के युवा पुरुषवर्ग को किस प्रकार के यत्नों एवं आचरण की आवश्यकता है, जिनसे उनका पौरुष यथार्थ में प्रकट हो और वे उस पर गर्व कर सकें। इति।

Wednesday, September 1, 2010

(३६) पुरुष मित्र

भारत की प्राचीन संस्कृति एवं समाज-व्यवस्था के अनुसार पहले परिवार के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने का कार्य मुख्यतः पुरुषों के कंधों पर ही होता था, अतः उनके शैक्षिक विकास पर अधिक जोर दिया जाता था; महिलाओं को मुख्यतः घरेलू कार्यों तक सीमित रखा जाता था। ... तो कार्यों के अनुसार ही उनका लालन-पोषण होता था। चूँकि एक लंबे समय से अनेक कारणों से हमारा देश गरीब था और विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार हमारे समाज में व्याप्त थे, अतः पुरुष-वर्ग में तदनुसार चालाकी अधिक थी; चलन के अनुसार दंद-फंद में भी वे लगे ही रहते थे। वहीं दूसरी ओर स्त्रियों को अपेक्षाकृत बहुत अच्छे संस्कार प्राप्त होते थे, क्योंकि वे आर्थिक और व्यापारिक मामलों से परे साफ-सुथरे धार्मिक माहौल में रह कर विकसित होती थीं। व्यस्क होने पर उनका विवाह कर दिया जाता था, और संस्कारवान होने के कारण विवाह पश्चात् वे सही मायनों में पतिव्रता, ससुराल-पक्ष के प्रति निष्ठावान और बच्चों की अच्छी परवरिश के प्रति निरंतर सचेत रहती थी। यद्यपि उनके पतियों में ऐसे गुण पर्याप्त मात्रा में नहीं होते थे, तदपि स्त्रियों के तेज के बल पर स्थितियां काफी हद तक संतुलित हो जाती थीं। बहुत से विद्वानों का भी यह प्रबल मत है कि अपने यहाँ की स्त्रियों के सतीत्व एवं तेज के कारण ही इतने भ्रष्टाचारी झंझावातों के बावजूद भारत का अस्तित्व बना हुआ है।

पहले भारत में लड़के और लड़कियों की अलग-अलग शिक्षा का प्रावधान या चलन था, सह-शिक्षा का चलन नहीं था। परन्तु धीरे-धीरे स्थितियों में परिवर्तन हुआ और स्त्रियों की सहभागिता क्रमशः पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों में बढ़ी। लड़कियों और लड़कों में सामाजिक भेद-भाव कम होता गया और पश्चिम की भांति भारत में भी सह-शिक्षा आरंभ हो गयी। भौतिक विकास एवं प्रगति की दृष्टि से यह बहुत उत्तम था। प्राचीन भारतीय इतिहास में भी अनेकों उदाहरण मिलते हैं जब पुरुषों के कमजोर या कम पड़ने पर उनकी स्त्रियों ने उनके कंधे के साथ कंधा मिलाकर परिस्थितियों का सामना किया और उन पर विजय प्राप्त की; हमारी धार्मिक संस्कृति में तो स्त्री को शक्ति-स्वरूप माना ही गया है। तो फिर यह बात तो मान्य करने योग्य है कि देश को बहुमुखी विकास के लिए स्त्री-शक्ति की आवश्यकता थी, और समय ने स्त्रियों को यह अवसर प्रदान किया।

परन्तु वर्तमान भारतीय परिस्थितियों में इस पद्धति के कारण सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की अनेक क्षतियाँ भी दृष्टिगोचर हो रही हैं। संभवतः वे इसलिए हैं क्योंकि हमारा देश मानसिक रूप से अभी भी परिपक्व एवं संतुलित नहीं है, बल्कि असंतुलन पहले की अपेक्षा बढ़ गया प्रतीत होता है। विकसित देशों ने अपने कठोर परिश्रम से जो कुछ धीरे-धीरे कई वर्षों में प्राप्त किया, वह हमें वैश्वीकरण के कारण एकाएक प्राप्त हो गया। हमारा देश विश्व के व्यापार-जगत के लिए एक बड़ी मंडी बन गया। चूँकि भारत में अनेक कारणों से भ्रष्टाचार पहले से ही बहुत अधिक था, अतः अब इस अचानक आयी विकास की आँधी में दुनिया भर का कूड़ा-करकट हमारे यहाँ बिकने व खपने लगा, उपभोक्ता वस्तुओं में नित नए-नए ऊटपटांग वैशिष्ट्यों (features) की मांग हमारे यहाँ ही सर्वाधिक है। हमारे देश में व्याप्त गरीबी, अपेक्षाकृत सस्ती दर पर उपलब्ध कर्मचारी, भ्रष्टाचार, चालाकी आदि का लाभ अनेक कंपनियों ने अपना व्यापार बढ़ाने के लिए लिया। इन्हीं सब कारणों से हमारे देश का युवा-वर्ग पिछले कुछ वर्षों में और अधिक दिग्भ्रमित व भ्रष्ट हुआ है, खासतौर पर पुरुष युवा-वर्ग! इसी को हम मानसिक असंतुलन कह सकते हैं। विडम्बना एवं दुर्भाग्य की बात है कि भारत में स्त्री-जाति में भी कुछ ने भी पुरुषों में व्याप्त अनैतिक मूल्यों का अनुसरण करना आरंभ कर दिया है; यह भारत की वर्तमान तस्वीर का सबसे नकारात्मक पहलू है।

आत्मा तो सबमें एक समान है, परन्तु हममें से अधिकांश अभी तक आत्मिक स्तर तक नहीं पहुंचे हैं, शारीरिक व मानसिक स्तर पर ही हैं; अतः उसी के अनुसार देखें तो ईश्वर या प्रकृति ने स्त्री व पुरुष देह को शारीरिक व मानसिक भिन्नताएं प्रदान की हैं। इनमें से अधिकांश भिन्नताओं से हम परिचित हैं, कुछ की हमने ऊपर चर्चा भी की है। मानसिक व आध्यात्मिक रूप से अधिक सुदृढ़ होने के अतिरिक्त स्त्री में एक अन्य विलक्षण योग्यता गर्भ-धारण की है। यद्यपि पुरुष की भूमिका भी उसमें रहती है, परन्तु नवजीवन का संवर्धन नारी-देह में ही संभव है और इस प्रक्रिया का भार एवं कष्ट उठाना उसी के बस का है। शारीरिक सम्बन्ध स्थापित होने पर पुरुष-देह में न कोई परिवर्तन होता है और न ही उसे कोई कष्ट होता है, इसी बात का लाभ भ्रष्ट मनःस्थिति में पहुंचा पुरुष कभी भी उठा सकता है। प्राचीनकाल में जब समय अपेक्षाकृत बेहतर था तो भी स्त्रियों को विवाह से पूर्व अपने कौमार्य को सहेज कर रखने की शिक्षा दी जाती थी, इसके परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जो अनेकों लाभ होते थे उनसे सभी परिचित एवं सहमत होंगे; परन्तु आज अपरिपक्व मानसिक व शारीरिक अवस्था ही में सह-शिक्षा आरंभ हो जाने से स्त्री-पुरुष मित्रता कब दिग्भ्रमित हो जाये इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता और वह भी तब जब नैतिक मूल्य इतने निम्न स्तर पर पहुँच चुके हों। गिरे हुए नैतिक माहौल और मानसिक अपरिपक्वता के चलते अधिकांशतः युवा-वर्ग स्वच्छ व स्वस्थ मित्रता को अधिक समय तक अक्षुण्ण नहीं बनाए रख पाता और विशेषकर पुरुष युवा में कभी भी नैतिक गिरावट आ सकती है। इस नैतिक पतन से पुरुष की तो कुछ खास क्षति नहीं होती, परन्तु स्त्री को अत्यधिक शारीरिक या/और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है। नैतिक मूल्यों की रक्षा के मामले में स्वाभाविक रूप से समाज की अपेक्षाएं भी स्त्रियों से ही अधिक होती हैं, क्योंकि परोक्ष पशुवत-वृत्ति के कारण पुरुष-जाति से तो पहले से ही कोई अच्छी उम्मीद नहीं होती; ... वैसे अपवाद कहीं भी संभव हैं!

अतः मित्रता विशेषकर युवा-वर्ग की मित्रता के मामले में स्त्री को बहुत ही सतर्क रहने की आवश्यकता है। युवावस्था में वैसे ही मन-मस्तिष्क अपरिपक्व होता है, ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि इस समय सामाजिक नैतिक स्तर भी न्यूनतम गहराइयों को छू रहा है और युवा पुरुष के मन में बैठा शैतान कब जाग जाये, कोई भरोसा नहीं! आजकल तो कितने पवित्र रिश्ते भी पतित होने के समाचार नित मिल रहे हैं। इस प्रकार गर्त में चले जाने से पुरुषों को तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता, परन्तु स्त्रियों पर उनकी शारीरिक संरचना, कोमल मानसिकता, अच्छे संस्कारों एवं समाज की अपेक्षाओं के कारण बहुत अधिक दबाव पड़ता है और वे अवसाद की स्थिति में जा सकती हैं। यह भयावह स्थिति है और निःसंदेह हमारे रोगग्रस्त पुरुष-प्रधान समाज की देन है। इस कठिन समय की माँग यही है कि स्त्रियां स्वयं ही सचेत रहें, विशेषकर युवावस्था में बहुत ही सचेत रहने की आवश्यकता है; पुरुष मित्र कितना ही भला क्यों न लगे, उससे एक सीमा तक ही सम्बन्ध रखने चाहियें। आज का मन का अच्छा भाव सदा बने रहने में भी संदेह है। अतः संवेदनशीलता तो रहे, परन्तु 'कोरी भावुकता' से परे रहने में ही भलाई है (स्त्रियां मूलतः बहुत नम्र व सरल स्वभाव की होती हैं, एक बार उनका विश्वास जीतकर उनकी कोमल भावनाओं से खेलना बहुत आसान होता है)। फोन नंबर और ईमेल पता देने तथा फोन, SMS एवं ईमेल आदि करने में पीछे ही रहें; एक तो इन सब में उलझने से समय बहुत नष्ट होता है साथ ही दूसरे द्वारा इनके गलत प्रयोग की संभावनाएं प्रबल रहती हैं, दुधारी तलवार के समान हैं ये - लाभ भी पहुंचाते हैं और हानि भी! अतः आधुनिक गैजेट्स का प्रयोग बहुत सोच-समझकर करें। एकांत में मिलने से परहेज करें, तथाकथित गुरुपद के पुरुषों तक का ईमान भी एकांत में डोल जाता है। व्यर्थ के दिखावों और भेड़चाल में कदापि न फंसें; अपनी मूलभूत आवश्यकताओं, अधिकारों एवं लक्ष्यों को भली-भांति पहचानें और उन्हें सर्वप्रथम प्राथमिकता देकर एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर पाने का प्रयास करें। अतः पुरुष-वर्ग की कमियों को ध्यान में रखते हुए उससे 'निरंतर' सतर्क रहने में ही समझदारी है, भले ही आपको लगता हो कि समाज में अपवाद भी मौजूद हैं और आपके पुरुष मित्र उनमें से एक हैं! बाद में जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, जागरूक स्त्रियों के व्यवहार में परिपक्वता स्वयं ही आती जाती है। बस केवल कुछ वर्षों के ही संयमित अभ्यास की आवश्यकता होती है फिर स्थाई मानसिक मजबूती आ जाती है, तब हम शारीरिक स्तर से ऊपर उठकर क्रमशः मानसिक व आत्मिक स्तर तक पहुँच जाते हैं। यह परिपक्वता सभी भयों को समाप्त कर देती है। इति।