Saturday, November 21, 2009

(२३) हमारा उत्तर भारत

१८ नवम्बर २००९ के दैनिक 'हिन्दुस्तान' में पढ़ा कि गत १५ नवम्बर २००९ को दिल्ली के इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर एक पाकिस्तानी गुप्तचर सैयद आमिर अली गिरफ्तार हुआ। इस पाकिस्तानी गुप्तचर का लखनऊ में न केवल पासपोर्ट बन गया, बल्कि यहाँ के प्रशासनिक ढांचे ने उसके पूरे परिवार का राशन कार्ड भी बना दिया। उसे यहाँ हाई स्कूल की मार्कशीट, पैन कार्ड, बैंक खाते और ड्राइविंग लाइसेंस तक उपलब्ध करा दिए गए। यही नहीं, स्वयं को भारतीय नागरिक सिद्ध करने हेतु उसने तीन वर्ष तक बाकायदा आयकर रिटर्न भी फाइल किया। आमिर का पासपोर्ट बनवाने और उसे संरक्षण देने के आरोप में गिरफ्तार दो व्यक्तियों से पूछताछ के दौरान जो भेद खुले, उनसे यह पता चलता है कि उत्तर प्रदेश की पूरी व्यवस्था में किस प्रकार से घुन लग गया है। दलालों की मेहरबानी और भ्रष्ट सरकारी तंत्र के चलते उसने जो दस्तावेज बनवाए, उनमें से अधिकांश असली पाए गए। पूरी रिपोर्ट आप १८ और १९ नवम्बर, २००९ के समाचार पत्र में पढ़ सकते हैं।

यह मात्र एक बानगी है हमारे सोते हुए उत्तर भारत की! इसी प्रकार के कुछ अन्य भ्रष्टाचारों के विषय में मैं पहले के लेखों में भी चर्चा कर चुका हूँ। मैंने पिछले एक लेख 'व्यवहार व अध्यात्म' के अंतिम परिच्छेद में इंगित किया था कि उत्तर भारत में जो व्यक्ति क़ानून के दायरे में रह कर चलता है, वही सबसे बड़ा 'भुक्तभोगी' (sufferer) है। और जो गलत तरीके अपना सकता है, उसके लिए यहाँ कुछ भी पाना सरलता से संभव है! कितनी अजीब सी विडम्बना है यह! एक धार्मिक (righteous) व्यक्ति के लिए तो यह बहुत त्रासद है!

अपने विषय में ही कहूं, तो जन्म से लखनऊ में रहा रहा हूँ और मेरे पास मेरी फोटो सहित एक भी परिचय पत्र ऐसा नहीं है, जो पूरी तरह से त्रुटिहीन हो! घिसा-पिटा कारण वही है कि यहाँ नियम से कार्य करने व नियमानुसार काम चाहने वाले व्यक्ति का कार्य अक्सर बिगड़ा ही करता है। हम तो आवेदन फॉर्म या प्रार्थना पत्र में सब कुछ ठीक-ठीक भर के देते हैं, परन्तु कंप्यूटर या रजिस्टर में फीड करने वाले कर्मचारी बहुधा गलती कर देते हैं। और एक बार कुछ गलत बन गया तो उसको सही करवाना तो नए बनवाने से भी अधिक कष्टदायी है। विशेषकर सरकारी क्षेत्र के विभागों में बिना सिफारिश या बिना 'सुविधा शुल्क' (रिश्वत का सभ्य पर्यायवाची) के कोई नया काम करवाना ही बहुत दुरूह है, और बाद में रिपेयरिंग अर्थात् संशोधन करवाना तो और भी टेढ़ी खीर! आए दिन हम इन्हीं समस्याओं से जूझते रहते हैं। कभी टेलीफोन का बिल तो कभी बिजली का बिल, कभी पानी का बिल तो कभी गृहकर, कभी आर.टी.ओ. सम्बन्धी तो कभी बैंक या बीमा सम्बन्धी!

कहने को तो हम बहुत उन्नत हो गए हैं। हर स्थान पर, हर सेवा में कंप्यूटरीकरण हो गया है, परन्तु कंप्यूटर को संचालित करने वाले हाथ हमारे ही हैं, और उन हाथों को संचालित व नियंत्रित करने वाला तो हमारा मस्तिष्क ही है, तथा मस्तिष्क का रुझान मन पर, मन के संस्कारों पर निर्भर करता है। हम उत्तर भारतीयों की मानसिक स्थिति तो रसातल में पहुँच चुकी है। मानसिकता को नियंत्रित व निर्देशित करने वाली आध्यात्मिकता से तो जैसे अधिकांश का सरोकार ही नहीं रह गया है! तभी तो सब विभागों में बेमन से कार्य होता है, यंत्रवत सा! जब सम्बंधित कर्मचारी को कोई अतिरिक्त निज स्वार्थपूर्ति होती नहीं दिखती, तब कहीं-कहीं कार्य होता ही नहीं है और कहीं त्रुटियों का अम्बार लग जाता है।

ऐसा नहीं कि सबके कार्य गड़बड़ हो जाते हों, पर इतना अवश्य कहूँगा कि वे मात्र भाग्यशाली होते हैं जिनके कार्य सही-सही हो जाते हैं। यह मेरा निजी एवं पक्का अनुभव है। परन्तु इसके विपरीत आप अपने कार्य करवाने के लिए थोड़ा टेढ़ा, थोड़ा अधार्मिक, थोड़ा भ्रष्ट तरीका अपनाते हैं तो न केवल आपके कार्य सरलता से हो जाते हैं, बल्कि कुछ असंभव से दिखने वाले कार्य भी संभव हो जाते हैं, जैसा पाकिस्तानी गुप्तचर सैयद आमिर अली के प्रकरण में हुआ। पाकिस्तानी नागरिक होते हुए भी उसके सब दस्तावेज लगभग ठीक-ठीक बन गए बिलकुल आसानी से! एक-दो दस्तावेजों को छोड़ कर उसके शेष सभी दस्तावेज असली पाए गए। किसी में कोई गलत पता यदि पाया गया तो वह इसलिए क्योंकि वह गुप्तचर ऐसा ही चाहता था। समाचारपत्र के सूत्रों के अनुसार पासपोर्ट कार्यालय व डाक विभाग में ऐसा कोई समझौता है कि पासपोर्ट स्पीड-पोस्ट द्वारा भेजा जाएगा और डाकिया पासपोर्ट का लिफाफा केवल सम्बंधित व्यक्ति को ही सौंपेगा, परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि गलत पता लिखा होने के बावजूद पासपोर्ट उस गुप्तचर तक पहुँच गया! पता गलत होने के बावजूद भी पुलिस वेरीफिकेशन हो गया! बाद में उस गुप्तचर ने उसी पासपोर्ट के आधार पर ड्राइविंग लाइसेंस भी बनवा लिया।

सच में हमारे समूचे तंत्र में घुन लग गया है। सरकार केवल भौतिक प्रगति के रथ दौड़ाने में लगी है! सुलझी मानसिकता, कर्त्तव्यपरायणता, ईमानदारी, पारदर्शकता दुर्लभ हो गए हैं। मानवीय मूल्यों के उत्थान की छोड़िए, उनके संरक्षण या उनको यथावत बनाए रखने तक का बोध नहीं है! येनकेन-प्रकारेण सब चल रहा है, बल्कि भाग रहा है! सारथी के योग्य या अयोग्य होने पर तो प्रश्न तब उठे जब कोई सारथी रथ पर हो! धार्मिक (righteous) लोग किसी तरह यहाँ जीवन की लड़ाई लड़ रहे हैं और निज कर्म जनित प्रारब्ध को यहाँ भोग रहे हैं।

मुस्कुराइए कि आप उत्तर भारत की राजधानी में हैं! ..... इति।

पुनश्चः -- हाँ, एक काम यहाँ बहुत बढ़िया हो रहा है कि घर-घर पोलियो ड्रॉप पिलाने वाली टीम नियमित रूप से अपना कार्य मुस्तैदी से कर रही है। उनके सदस्य लगभग हर द्वार पर समय से पहुंचते हैं। किसी कारणवश घर पर बच्चे के उस समय न मिल पाने पर वे आपके सुझाए समय पर दोबारा आपके घर आते हैं। उनके पीछे-पीछे एक दूसरी टीम उनकी जांच करती चलती है। मैं सोचता हूँ कि यहाँ घर-घर जा कर मतदाता पहचान पत्र बनाने का या बिल आदि समय से वितरित करने का या अन्य किसी जाँच का अतिरिक्त कार्य भी इसी टीम को सौंप दिया जाए। मेरा दावा है कि इन कार्यों पर इस समय हो रहे खर्च से कहीं कम पर ये सभी कार्य कुशलता से व त्रुटि-रहित संपन्न हो जाएंगे। इस टीम का प्रबंधन वास्तव में प्रशंसा के योग्य है।

Friday, October 2, 2009

(२२) मोहनदास करमचंद गाँधी

आज गाँधी जयंती है। सुबह उठते ही समाचारपत्र में गाँधी जी से सम्बंधित अनेक लेखों के दर्शन हुए। कल गाँधी जी से सम्बंधित कुछ पुस्तकें भी फिर से पढ़ रहा था। सो मन में विचार आया कि आज उन्हीं सब में से कुछ संकलित कर लिखूं। सबसे पहले मैं गाँधी जी से सम्बंधित वह बात लिखना चाहूँगा जिससे मिलता-जुलता उल्लेख मैंने अपने पिछले लेख 'मार्गदर्शकों का आचरण' में भी किया था।

व्यक्ति-पूजा के तीव्र विरोधी

महात्मा गाँधी व्यक्ति-पूजा के तीव्र विरोधी थे और बहुत सजग रहते थे कि कहीं लोग उन्हें भी भगवान की तरह न पूजने लगें। अहमदाबाद में साबरमती आश्रम एवं गाँधी स्मारक संग्रहालय की देखरेख कर रहे श्री अमृत मोदी जी ने बताया कि कुछ लोगों द्वारा १९२७-२८ में तत्कालीन मद्रास व सौराष्ट्र में गाँधी जी की पूजा के लिए दो मंदिर बनाये गए। लेकिन गाँधी जी ने कड़ा विरोध कर अपने सामने उन मंदिरों को तुड़वा दिया। इसी प्रकार एक बार कस्तूरबा ने गाँधी जी के प्रवास के दौरान उनकी मंगलकामना के लिए उनके चित्र के सामने दीपक जला कर प्रार्थना कर ली। जब गाँधी जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने कस्तूरबा को डांटा-डपटा और उन्हें आगे से ऐसा कोई कार्य नहीं करने का कड़ा निर्देश दिया जिससे व्यक्ति-पूजा को बढ़ावा मिलता हो।

श्री मोदी ने आगे कहा कि महात्मा गाँधी इस बात से भली-भांति परिचित थे कि भारत की जनता व्यक्ति-पूजा की आदी है और अपने जीवन में कोई न कोई आदर्श ढूंढती रहती है। वह बहुत सरलता से किसी को अपना नायक बना कर भावनावश उसकी पूजा आरंभ कर देती है।

महात्मा गाँधी संभवतः देश के एकमात्र ऐसे नेता थे जिनके पास अपने नाम पर कोई संपत्ति नहीं थी। वह सही अर्थों में अपरिग्रह के सिद्धांत का पालन करते थे। इस सिद्धांत का पालन करने में वह किस सीमा तक जा सकते थे इसका एक दृष्टान्त है कि जब ब्रिटिश सरकार ने डांडी यात्रा के बाद स्वतंत्रता सेनानियों की संपत्ति जब्त करनी आरंभ कर दी तो उन्होंने सरकार से कहा कि वह साबरमती आश्रम भी जब्त कर ले, परन्तु ब्रिटिश सरकार ऐसा करने का साहस नहीं जुटा सकी। बाद में गाँधी जी ने स्वयं आश्रम बंद करने का निर्णय लिया और इसे हरिजन सेवक संघ को सौंप दिया।

गाँधीवादी सच्चाई की ओर सबको लौटना ही होगा

गाँधीवादी विचारक चुनी भाई वैद्य के अनुसार महात्मा गाँधी के विचार पत्थर की लकीर जैसे हैं। कोई कुछ भी कह ले, उन्हें गालियाँ देने में अपनी शान समझे या देश की बर्बादी के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने का अनुचित दुस्साहस करे, पर सत्य यही है कि आज पहले से भी कहीं अधिक दुनिया को बापू के सिद्धांतों पर अमल करना आवश्यक लगने लगा है। यदि सही अर्थ में विश्व में सुख-शांति की आवश्यकता है तो गाँधीवादी सच्चाई की ओर सबको लौटना ही होगा। आतंकवाद का सामना व समाप्ति हेतु शांति, प्रेम और अहिंसा की नींव दृढ करनी ही होगी। यदि आज आतंकवाद व साम्प्रदायिकता जैसी समस्याएं सर उठा रही हैं तो उसके मूल में यही है कि गाँधीवादी शक्तियां दुर्बल पड़ गयीं हैं।

खेद की बात है कि आज बापू का नाम लेने वाले और उनकी पूजा करने वाले लोग तो बहुत दृष्टिगत हो रहे हैं परन्तु उनकी नीतियों व शिक्षाओं का वास्तविक अनुसरण करने वाले घटते चले जा रहे हैं। गाँधी के कार्य को आगे बढाने हेतु खादी और चरखा ही पर्याप्त नहीं है वरन इस मूल भावना से जुड़ना होगा कि प्रत्येक समस्या का समाधान गाँधीवादी सिद्धांतों के आधार पर संभव है।

सत्य एवं अहिंसा का मार्ग अपनाना आवश्यक

८५ वर्षीय श्री नारायण देसाई जो लगभग २३ वर्षों तक बापू के सान्निध्य में रहे, कहते हैं कि आतंकवाद और भष्टाचार के इस दौर में गाँधी जी के बताये सत्य और अहिंसा के मार्ग को गंभीरता से समझने व अपनाने की सबसे अधिक आवश्यकता है। आज भी सत्य, अहिंसा और प्रेम प्रासंगिक हैं। इनसे ही सुखद और विकसित भविष्य की आशा की जा सकती है। लोगों को बापू के बताये इन रास्तों पर चलना अत्यधिक कठिन व चुनौती भरा लग सकता है, पर जो इस मार्ग पर चलते हैं उन्हें कोई भय नहीं सताता और वे हर प्रकार के तनावों व बीमारियों से मुक्त रहते हैं। सादा जीवन उच्च विचार रखने से झूठे लालच आपको जीवन में गिरने, झुकने या कमजोर नहीं पड़ने देते। यह भौतिक सुख-साधनों से अधिक संतोष प्रदान करने वाली जीवन पद्धति है। अपनाकर तो देखिये।

ईमानदारी और सच्चाई से ही मिलती है संतुष्टि

श्री तुषार गाँधी के शब्दों का सार कुछ इस प्रकार है कि - जीवन प्रासंगिक है तो बापू अप्रासंगिक नहीं हो सकते। यदि आज सत्य व अहिंसा की आवश्यकता है तो बापू आज भी प्रासंगिक हैं। आज की परिस्थितियों में बापू को याद करना ही पर्याप्त नहीं बल्कि उनके बताये रास्तों पर चलना भी आवश्यक है। हिंसा और आतंक निरंतर बढ़ रहे हैं। परिवार, समाज, गाँव, शहर, राज्य और देश में एकता का अभाव है। रोजगार कम व मंहगाई अधिक है। भाषावाद और प्रांतवाद को लेकर झगडे हो रहे हैं। प्रकृति का शोषण हो रहा है। अमीरी-गरीबी का फासला बढ़ रहा है। गाँवों का वास्तविक विकास थमा हुआ है। ऐसे में आवश्यकता है कि हम बापू के विचारों के अनुसार चलें, तभी हमारे देश का भी विकास होगा।

हर किसी का लक्ष्य संतुष्टि है। ईमानदारी व सच्चाई के साथ काम किया जाये तो संतुष्टि मिलती है। जीवन में हार-जीत तो होती ही रहती है। ऐसा नहीं है कि मात्र लक्ष्य को प्राप्त करना ही महत्त्वपूर्ण है, बल्कि महत्त्व इसका है कि बापू के श्रेष्ठ विचारों व शिक्षाओं के अनुरूप कितना चलते हैं। उनके विचारों के साथ चलने में कष्ट नहीं है, बल्कि एक अलग आनंद व संतुष्टि की अनुभूति मिलती है।

उपरोक्त सर्व उद्धरणों का आधार लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र 'हिंदुस्तान' का ०२ अक्टूबर २००९ का अंक था। उनके प्रति आभार!

.... अब मैं कुछ वैयक्तिक विचार प्रस्तुत करने का साहस कर रहा हूँ, जो मैं समझता हूँ कि अधिकांश जनों के भीतरी विचार होने चाहियें। ऐसा नहीं है कि मैं पूर्णतया अहिंसावादी व पाक-साफ़ हूँ। मेरे को भी बहुत क्रोध आता था, जब कुछ गलत होते देखता था। अति होने पर मन में कभी-कभी यह भी विचार आता था कि अमुक किसी प्रकार से मर जाये या मारा जाये या उसका कोई बड़ा नुकसान हो जाये अर्थात् दुष्ट को उसके किये की सजा मिल जाये। पर विचार कीजिये कि यदि वह कोई अपना निकट होता है, परिवार का सदस्य होता है तो हम उसके विषय में इतना कड़ाई से नहीं सोचते। तब हम मुलायम रास्ता खोजते हैं। पहले उसे हर प्रकार से बचाते हैं, उसके दोष को छुपाते हैं; फिर अगले चरण में हम अथक प्रयास कर उसे समझाते हैं कि वह दुष्टता को छोड़ दे। उसे यह ढाढ़स देते हैं कि भूतकाल को वह भूल जाये व नए सिरे से एक नया अध्याय आरंभ करे। हो सकता है कि वह हमारी बात न माने और हमारे प्रयासों के प्रत्युत्तर में हमें ही घात करे, क्षति पहुंचाए। तब पर भी हम एक सीमा तक उसका प्रतिघात सहते हैं और उसे प्रेमपूर्वक मनाते रहते हैं। अंत में या तो वह सुधर जाता है या फिर अपने कुकर्मों का फल भोगता है जैसे प्राचीनकाल में भी अतिवादियों ने भोगे थे।

आप यह भली-भांति समझ ही गए होंगे कि हम बहुत कष्ट सह कर भी उस व्यक्ति को बचाने व सुधारने का अथक प्रयास क्यों करते रहे? क्योंकि वह 'अपनों' की श्रेणी में आता था। हमारा 'अपनों' का दायरा कितना बड़ा है? यह बहुत छोटा सा ही है। क्यों? क्योंकि हम व्यापक नहीं हैं! हम व्यापक क्यों नहीं हैं? क्योंकि हम अपने आप को दूसरों के कारण असुरक्षित महसूस करते हैं। हमें लगता है कि हर वह व्यक्ति जो 'अपनों' की श्रेणी में नहीं है, स्वार्थी हो सकता है और हमें क्षति पहुंचा सकता है। यह स्वार्थ क्या है और यह कहाँ से आया? स्वार्थ यानी केवल अपने या 'अपनों' के विषय में ही विचार करना, अन्यों की परवाह न करना व उनके प्रति सशंकित रहना। यह अस्तित्व में आया है हमारी संग्रह करने एवं बेतहाशा भोग करने की वृत्ति से। हमारा संग्रह व भोग 'अपनों' तक ही सीमित होता है। 'पैसा' या 'धन' रूपी शक्ति भी एक बड़ा कारक है स्वार्थ के अस्तित्व व पोषण हेतु।

आज हम प्राकृतिक संसाधनों का जम कर दोहन कर रहे हैं। हमारा लोभ बहुत बढ़ गया है। हमारी अधिकांश गतिविधियों का केंद्र 'धन' की 'खेती' करना ही होता है। कोई भी काम करवाते या करते समय हम सतत यह विचार करते रहते हैं कि हमें कोई बेवकूफ न बनाने पाए, हमारा हर काम सस्ते में हो जाये पर हमें हमारे काम का अधिक से अधिक मूल्य मिले, मेरा माल महंगे से महंगा बिक जाये किसी प्रकार! अर्थात् अन्यों को निर्धन व स्वयं को धनी बनाने की वृत्ति बहुत बढ़ गयी है। इसीसे अमीरी और गरीबी के बीच की खाई बढती जा रही है। या कम से कम परस्पर कटुता व प्रतिस्पर्धा तो बढती ही जा रही है। अपना माल अधिक मुनाफे पर बेचने के लिए व्यापारी अब कहाँ-कहाँ नहीं चला जाता। आधुनिक यातायात संसाधनों व अन्य संचार माध्यमों ने इस वृत्ति की बड़ी मदद की है!

गाँधी जी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' पढिये। १९०९ में लिखी थी शायद उन्होंने, पर आज भी प्रासंगिक है। क्या गलत कहा था उन्होंने जो लोग भड़कते हैं। यथार्थ तो यह है कि आज कोई बेनकाब नहीं होना चाहता। सत्य का सामना करने से बड़ी तकलीफ होती है। ग्रंथों में पढेंगे, भाषण देंगे कि - सम्पूर्ण विश्व मेरा घर है, पर यथार्थ में होंगे अति सीमित। हमारा 'अपनों' का दायरा बहुत छोटा सा है, गाँधी जी का बहुत बड़ा था। गाँधी जी ने अहिंसा व प्रेम के माध्यम से इसी बात को कृत्य के स्तर पर लागू किया अर्थात् व्यापकत्व को चरितार्थ किया, तो सब लोग उन्हें अप्रासंगिक ठहराते हैं।

हम जानते हैं और हमारे वैज्ञानिक भी बराबर चेताते रहते हैं कि प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, फिर भी हम उन संसाधनों का आवश्यकता से कहीं अधिक उपभोग कर रहे हैं। यहाँ तक कि अब किसी देश के विकसित होने का प्रमाण व पैमाना वहां पर हो रहे सामग्री-उपभोग पर आधारित है। कितनी हास्यास्पद बात है! सब जानते हैं; पर वही बात सत्यता व शुद्धता से गाँधी जी ने कही कि - प्रकृति के पास सब की आवश्यकताओं के लिए तो भरपूर है पर लोभ के लिए नहीं, तो सब लोग उन्हें अप्रासंगिक ठहराते हैं! रेलों, डॉक्टरों, वकीलों, मशीनों आदि को यदि बापू ने कोसा, तो उसके पीछे ठोस आध्यात्मिक कारण थे। क्योंकि तब भारतीय इतने परिपक्व नहीं थे कि इन सब विधाओं और शक्तियों का उपयोग सर्वहित में कर सकें। सच तो यह है कि तब से आज तक भारत में नैतिकता की स्थिति पहले की अपेक्षा बदतर ही हुयी है। परोक्ष-अपरोक्ष रूप से इसका कारण धन व यश की पिपासा ही है। आज विशिष्ट योग्यता, सामर्थ्य व बल का प्रयोग मात्र इसी उद्देश्य से ही होता दीख रहा है।

उपरोक्त-वर्णित यह सब कार्य मनुष्य की प्राकृतिक जीवन शैली के बिलकुल विपरीत है। तभी गाँधी जी स्वराज्य पर बल देते थे। स्वराज्य माने स्व का, आत्मा का; आत्मिक राज्य, नैसर्गिक कानूनों व सिद्धांतों पर आधारित राज्य। यह बात समझनी थोडी कठिन है, परन्तु इस ब्लॉग के अन्य लेख पढ़ कर आप इसे कुछ-कुछ समझ सकते हैं। गाँधी जी ने भी प्राकृतिक रूप से जीवन जीने पर जोर दिया, यह अलग बात है कि लोग उनके मंतव्य व व्यापकत्व को ठीक से समझ नहीं पाए। आज जो समझते हैं, वे उनको योग्य सम्मान देते हैं, उन्हें सराहते हैं, उनके आदर्शों पर चलने का प्रयास करते हैं। विदेशों में उनके प्रशंसकों की संख्या बहुत बढ़ रही है। क्योंकि जो धीरे-धीरे सही अर्थों में विकसित हो रहे हैं, वे सत्य से नहीं भागते, ... और गाँधी जी के विचार कालजयी हैं और सर्वकाल उपयोगी हैं, अतः सत्य का सामना व समर्थन करने वालों को उनका दृष्टिकोण मान्य होगा ही।

एक बात और कि गाँधी जी ने स्वयं को कभी भी संत या महापुरुष घोषित नहीं किया और न ही मेरा भी ऐसा कोई आग्रह है। कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो, गलतियाँ तो होती ही हैं। फिर जब हम सीखने वाले के स्थान पर होते हैं तो हमें शुद्ध मन से केवल सत्त्व को ग्रहण करना आना चाहिए। और व्यक्ति के देह त्याग के पश्चात् उसके कुछ गलत कृत्यों को कोसते रहना मूर्खता ही है, उससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं। संभवतः उन्होंने कई वैयक्तिक गलतियाँ की हों पर उन्होंने कोई गलत शिक्षा कभी भी नहीं दी। उनके समस्त कृत्यों पर यदि हम दृष्टिपात करें तो संभवतः अयोग्य कृत्यों का प्रतिशत योग्य की तुलना में बहुत ही कम होगा। ... ऐसे ही पूरा विश्व उनका प्रशंसक नहीं है! यदि हम सकारात्मक दृष्टिकोण रख कर निहारें तो निश्चित रूप से यह पायेंगे कि उनकी तथाकथित गलतियाँ भी उनके व्यापकत्व एवं निरपेक्ष प्रेम के गुण को ही दर्शाती हैं। इति।

Saturday, September 26, 2009

(२१) मार्गदर्शकों का आचरण

  • आज गुरु-शिष्य संबंधों पर आधारित एक आध्यात्मिक लेख पढ़ रहा था। उसमें दिया था कि "शिष्य बनने का अर्थ यह नहीं है कि गुरु के सभी कृत्यों का अन्धानुकरण किया जाये। बल्कि शिष्य द्वारा केवल वह किया जाना चाहिए, जिसको करने का उपदेश गुरु दे रहे हों। गुरु तो पूर्णतया सिद्ध होते हैं, परम-ज्ञानी होते हैं, अतः उनपर कोई बंधन लागू नहीं होता है। परन्तु शिष्य को पूर्णत्व या परिपक्वता प्राप्त कर लेने से पूर्व कुछ मर्यादाओं, बंधनों या निश्चित सीमा के अंतर्गत रहना आवश्यक होता है। अतः शिष्य को गुरु द्वारा बताया गया मर्यादित आचरण ही करना कल्याणकारी सिद्ध होगा। उदाहरण के लिए -- ज्ञान की प्रारंभिक अवस्थाओं में जब शिष्य गुरु-आज्ञानुसार मर्यादापुरुषोत्तम 'राम' की भांति आचरण करेगा, तभी वह ज्ञान के चरमोत्कर्ष पर पहुँचने पर मर्यादा से परे गए 'कृष्ण' की लीला समझ सकेगा।"

  • 'पवित्र बाइबल' में एक स्थान पर लिखे उपदेश का आशय कुछ इस प्रकार से है "स्वयंभू ज्ञानी, गुरु एवं उपदेशक जो कुछ बोलते हैं उसको सुनो, समझो व यथाशक्ति करो, पर वह बिलकुल न करो जो आचरण वे स्वयं करते हैं! उनकी कथनी और करनी में भेद रहता है, अंतर रहता है!"

  • राम, युधिष्ठिर, गांधी आदि कट्टर सत्यवादी थे, मर्यादा में रहते थे; परन्तु इनके विपरीत कृष्ण ने सत्य व मर्यादा का समर्थन तो किया, परन्तु आवश्यकतानुसार इनको तिलांजलि भी दी!

  • दो दिन पूर्व 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी का जीवन-चरित्र पढ़ रहा था। उसमें उनके मानसिक व आध्यात्मिक बल के साथ-साथ उनकी विनम्रता व परिपक्वता के दर्शन हुए। उन्होंने 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' की स्थापना के कुछ समय बाद जब गुरुपूर्णिमा के अवसर पर 'संघ' में गुरु-पूजन व गुरु-दक्षिणा की परम्परा आरम्भ की, तो 'संघ' के सर्वेसर्वा होने के बावजूद उन्होंने 'भगवा ध्वज' को प्रतीक-स्वरूप 'गुरु' का स्थान दिया। इसके समर्थन में उन्होंने बहुत सुन्दर कारण बताया, जिसका आशय इस प्रकार था कि "सभी व्यक्ति अपूर्ण हैं (कम-ज्यादा हो सकते हैं), व्यक्ति के स्वभाव में कभी भी परिवर्तन आ सकता है, उसमें अहम् आ सकता है, धन-पद-यश आदि की अभिलाषा जाग सकती है, राग-द्वेष में पड़ सकता है अर्थात वह या भविष्य के उसके उत्तराधिकारियों में से कोई कभी भी पतनोन्मुख हो सकता है; परन्तु अपना 'भगवा ध्वज' इन सब से परे है तथा तेज एवं सात्त्विकता का प्रतीक है। अतः 'संघ' में 'व्यक्ति-निष्ठा' न होकर केवल विशुद्ध 'तत्त्व-निष्ठा' ही रहेगी तथा इसके प्रतीक-स्वरूप गुरु-स्थान पर केवल 'ध्वज-पूजन' होगा।"

  • कुछ वर्षों से एक आध्यात्मिक संस्था से जुड़ा हुआ हूँ, बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि उस संस्था के एक साधक के अपेक्षारहित अथक नम्र प्रयासों व अपने प्रारब्ध के योग से अल्पकाल में मैं कुछ परिपक्वता को प्राप्त हुआ। उसी संस्था के संस्थापक का सभी साधकों को यह स्पष्ट निर्देश था कि "उनका चित्र पूजाघर में न रखकर अन्यत्र रखा जाये व उसकी पूजा आदि न की जाये। पारंपरिक ईश्वरीय अवतारों के चित्रों के साथ संस्थापक के दिवंगत गुरु जी का चित्र पूजाघर में रखा जा सकता है।" ... परन्तु मैंने उसी काल में यह देखा कि संस्था के केन्द्रों व साधकों के घर पर संस्थापक जी का चित्र पूजाघर में उपस्थित था और उनकी विधिवत पूजा भी होती थी, अब तो यह और भी बढ गयी है! संस्थापक जी को यह सब पता न हो ऐसा नहीं है, बल्कि यहाँ कुछ ऐसा ही हो रहा है, जिसकी डॉ. हेडगेवार जी को आशंका थी!

..... ऊपर दिए गए विचार-बिन्दुओं से हमारे समक्ष कुछ असमंजस की स्थिति आ जाती है कि वास्तव में क्या योग्य है या होना चाहिए? वैसे एक बात तो सबको निर्विवादित रूप से मान्य होगी कि किसी भी महापुरुष, मार्गदर्शक या अवतारी पुरुष ने कभी भी अपने महान होने का दावा स्वयं नहीं किया और न ही अपने जीते जी अपनी पूजा करवाने की चेष्टा या आग्रह किया। ऐसा आग्रह जिसने भी किया, वह अंततः गुमनामी के अंधकार में खो गया, क्योंकि वैयक्तिक अहम्, पाखण्ड व अन्य अनुचित रीतियों से उपजी प्रतिष्ठा खोखली होती है तथा उसकी आयु बहुत कम होती है। गीता प्रेस से सम्बंधित अनेक गुरु-पद योग्य व्यक्तियों, 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' के द्वितीय सरसंघचालक श्री गोलवरकर जी तथा अन्य कई ज्ञात-अज्ञात महापुरुषों ने अपना अंतिम संस्कार भी बड़ी सादगी से करने व उनकी याद में किसी प्रकार का स्मारक आदि न बनवाने की वसीयत की थी। यह अलग बात है कि बाद में लोग उनके त्याग व विनम्रता से अभिभूत हो उन्हें आदर्श रूप में स्वीकार कर उनके अनुयायी हो गए। पर उन महापुरुषों ने अपने जीते जी किसी को अपनी पूजा नहीं करने दी। सदैव स्वयं को आम जनसाधारण के तुल्य रखा, सबको सहज उपलब्ध होते थे, स्वयं सबकी सेवा-सत्कार आदि करते थे, उदाहरणार्थ -- साईं बाबा, यीशु मसीह, हनुमानप्रसाद पोद्दार।

जिन महापुरुषों या अवतार तुल्य महान व्यक्तियों का जन्म राजसिक परिवारों में हुआ, उनमें भी विनम्रता कूट-कूट कर भरी थी, अहम् छू तक नहीं गया था। सबको सहज उपलब्ध रहते थे, व्यर्थ के आडम्बरों से दूर रहते हुए अपने जीवनकाल में निज पूजा करवाने में कभी रुचि नहीं दिखाई, बल्कि ऐसा पता चलने पर वे लोगों पर बिगड़े भी।

देखा जाये तो उन महान विभूतियों के जीवनकाल में यदि जन-साधारण ने उनकी थोड़ी-बहुत पूजा-उपासना की भी, तो वह केवल उनके आचरण से अभिभूत होकर, स्वेच्छा से, बिना किसी दबाव या बहकावे के, बिना उनके संज्ञान में लाये! मरणोपरांत उनकी ख्याति और अधिक फैली, जनसाधारण को उनके कृत्य अब और अधिक अच्छी तरह से समझ में आये, असंदिग्ध व निर्विवादित रूप से श्रेष्ठता की कसौटी पर वे खरे उतरे, फलस्वरूप बाद में उनको आदर्श व आराध्य रूप में पूजा जाने लगा। प्रेरित होने के उद्देश्य से इस प्रकार की पूजा में कोई दोष नहीं, पर फिर भी अपने आराध्य के आचरण की गरिमा को ध्यान में रखते हुए व्यर्थ के दिखावों से परे रहने में ही बुद्धिमानी है।

अब बात आती है उनके आचरण की, तो यह बात निःसंदेह रूप मान्य है कि आम जन को महापुरुषों का आचरण कभी-कभी अटपटा या धर्म-विपरीत भी प्रतीत हो सकता है, क्योंकि एक आम व्यक्ति का मानसिक व आध्यात्मिक स्तर इतना ऊंचा नहीं होता कि वह मार्गदर्शक स्तर के व्यक्ति का असली मंतव्य या हेतु समझ पाए। पर फिर भी मैं यह अवश्य कहूँगा कि मार्गदर्शक की कथनी व करनी में भेद नहीं होना चाहिए। यथासंभव उसका यह प्रयास होना चाहिए कि शिष्य या अनुयायी को भ्रम की स्थिति का सामना न करना पड़े। क्योंकि भ्रम की स्थिति आने पर विश्वास या आस्था का पक्ष कमजोर पड़ता है, फलस्वरूप ज्ञान प्राप्ति या उन्नति के मार्ग में अवरोध उत्पन्न होता है। शिष्य या अनुयायी अपूर्ण ही होता है, तभी तो वह शिष्य या अनुयायी के रूप में होता है और यह एक शाश्वत सत्य है कि आचरण के माध्यम से ही शिक्षा प्रभावी रूप से संचारित होती है, केवल कथनी से नहीं ।

हम अपने बच्चों को भी कई बातें सिखाते हैं। माना कि हम परिपक्व हैं , अच्छा-बुरा समझते हैं, नीतिशास्त्र का बढ़िया ज्ञान है, धर्म का योग्य अर्थ भी समझते हैं, श्री कृष्ण कि भांति आपद्-धर्म की भी गहरी समझ है यानी योग्य (धर्मानुकूल) परिणाम प्राप्त करने हेतु हम अस्थाई रूप से परोक्षतः अधर्म का अवलम्ब ले सकते हैं / लेते हैं, विधि-निषेधों से ऊपर उठ चुके हैं; .... तब भी अपने बच्चों को सिखाते समय हम उनकी बाल्यावस्था व अबोधता को ध्यान में रखते हुए आरम्भ में उनको मर्यादा का पाठ ही पढ़ते हैं, सचेत रहते हैं कि उनके कोमल मन-मस्तिष्क पर कोई अयोग्य संस्कार न अंकित हो जाये। इसके लिए यदि हम अपरोक्ष रूप से कोई अयोग्य कृत्य कर रहे होते हैं तो उसे बच्चे से दूर ही रखने का प्रयास करते हैं। दूसरे शब्दों में हम अपनी गलत गतिविधियाँ बच्चे से छुपाते हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि वे गलत हैं व बच्चे के लिए घातक हो सकतीं हैं। पर सोचिये कि बच्चे के अपरिपक्वकाल में ही हमसे चूक हो गयी और हमारी वह अयोग्य गतिविधि बच्चे को पता चल गयी, तो किसी भी यत्न से हम उसे यह नहीं समझा सकते कि परिस्थिति-अनुसार संभवतः यह कृत्य योग्य हो सकता है! क्यों? क्योंकि वह बच्चा अभी अपरिपक्व है, मर्यादा का पाठ पढ़ रहा है, कोमल व स्वच्छ हृदय है, अतः मर्यादा विरुद्ध बात उसे गलत ही लगेगी। चरण दर चरण जब वह बड़ा और कुछ परिपक्व होने लगता है तो तदनुसार उसको आगे के स्तर का व्यापक ज्ञान देते हैं।

पर हमारा यह समझना या मानना गलत है कि अयोग्य दीखने वाले कृत्य बच्चे के सामने ही करते रहो उसकी अपरिपक्व अवस्था में भी, .. समय आने पर वह स्वयं जान जायेगा कि योग्य माने क्या?! मेरे विचार से तो वह बालक इन कृत्यों से नकारात्मक ही ग्रहण करेगा और भविष्य में जब कभी वह परिपक्व होगा तो पश्चात्ताप करेगा कि अनावश्यक ही वह इतने अयोग्य कृत्य गलत मार्गदर्शन के फलस्वरूप करता रहा। अब आप कहेंगे कि मैंने तो उसे ऐसा करने के लिए नहीं कहा था, बल्कि मैं तो उसे मर्यादा व धर्म का पाठ ही पढ़ाता रहा। पर तनिक यह विचार कीजिये कि हमारे दृश्य कर्म या कृत्य ही उसके लिए प्रेरणा बन गए, क्योंकि हम उसके लिए आदर्श-स्वरूप थे। यह तो गलत हो गया न! मैं यह कदापि नहीं मान सकता कि हम अपरिपक्व बच्चों को मर्यादा का पाठ पढाएं एवं स्वयं अमर्यादित कृत्य भी उनके समक्ष करें और वे केवल पढाया गया पाठ ही सीखेंगे, प्रत्यक्ष किया गया नहीं! आध्यात्मिक गुरुओं व अपरिपक्व साधकों के बीच भी कुछ ऐसा ही घटित होने की सम्भावना बनी रहती है। अतः सिखाने वाले की भूमिका में व्यक्ति को यथासाध्य सचेत व अधिकतम मर्यादित रहने की आवश्यकता होती है। गुरु की कथनी और करनी में भेद या किसी भी कारण से किया गया विषम आचरण अबोध अनुयायियों के लिए अति घातक सिद्ध हो सकता है।

आप अब शायद यह कहें कि श्री कृष्ण ने भी गलत नीतियों का सहारा अनेक बार लिया था। तो इसके उत्तर में मैं यही कहूँगा कि उनमें अनंत गुण थे, जो औरों के लिए प्रेरणादायी थे / हैं। कतिपय परिस्थितियों में उन्होंने धर्म की रक्षा हेतु आपद्-धर्म अंतर्गत अस्थाई रूप से कुछ गलत दिखने वाली नीतियों का अवलम्ब यदा-कदा अवश्य लिया; पर सम्बंधित व्यक्तियों / मित्रों का यथायोग्य मार्गदर्शन करते हुए। मर्यादा की रक्षा हेतु उन्होंने मर्यादा का प्रबल समर्थन ही अधिकांशतः किया, पर दुष्टों को उन्हीं की भाषा में उत्तर देने में वह कभी कम भी नहीं पड़े! यह बात किसी के लिए भी प्रेरणादायी हो सकती है, बच्चों के लिए भी। क्योंकि उनके कृत्य अपने निजी हित के लिए न होकर व्यापक हित हेतु थे, निःस्वार्थ थे। क्या आपद्-धर्म के नाम पर हमारे अधिकतर कृत्य परहित, जनहित हेतु ही निःस्वार्थ भाव से होते हैं?? या मात्र वैयक्तिक हित ही निहित होता है उनमें?? इति।

Saturday, August 29, 2009

(२०) 'सांसारिक मनोकामनाएं/बाधाएं' बनाम 'कर्मकाण्ड'

आजकल बहुत से धार्मिक संगठन व सम्बद्ध मार्गदर्शक वैयक्तिक सांसारिक कामनाओं की पूर्ति या बाधाओं के निवारण हेतु विभिन्न कर्मकाण्ड बताते हैं, विशेषकर भारत व कुछ अन्य विकासशील या अविकसित देशों में।

मैंने पहले के अनेक लेखों में भी कहा था, वही बात फिर से दोहरा रहा हूँ कि, पूर्वकाल में आम जन को वास्तव में धार्मिक (righteous) बनाने व ईश्वर के गुणों के समीप लाने हेतु तत्कालीन ज्ञानी व्यक्तियों ने अनेक शिक्षाओं को कुछ वाह्य धार्मिक स्थूल कृत्यों से जोड़ा। फलस्वरूप समाज-अनुरूप नाना प्रकार के कर्मकांडों को जन्म दिया। आशय या मंतव्य केवल यही था कि उन स्थूल कृत्यों में ही किसी प्रकार से लोगों का मन रम जाये, जिससे व्यक्ति का रुझान अधर्म से हट कर धर्म (righteousness) की ओर उन्मुख हो जाये, सत्त्व का पलड़ा भारी रहे, समाज का संतुलन बना रहे। सांसारिक लोभ व यश को महत्त्वहीन बताते व सिखाते हुए यह प्रक्रिया त्याग व निरपेक्ष प्रेम की शिक्षा के ऊपर आधारित थी। सरलता व सहजता हेतु सगुण भक्ति का सुन्दर आलंबन था इस प्रक्रिया में। लेकिन मात्र ज्ञान की प्रारंभिक अवस्थाओं हेतु ही। आगे की अवस्थाओं में आवश्यकतानुसार और अधिक परिपक्व ज्ञान भी मार्गदर्शक सर्वसाधारण को देते थे।

जब तक धार्मिक या श्रेष्ठ मार्गदर्शकों में धन या सांसारिक यश का लोभ नहीं उपजा था, तब तक इसी पद्धति से लोगों या समाज का संतुलन ठीक रखने में सफलता मिलती रही। 'जहां भाव वहां देव' के सिद्धांत के ऊपर ही आधारित थी यह प्रक्रिया।

परन्तु बाद में तथाकथित ज्ञानी मार्गदर्शकों का अपना ही स्वरूप बदलता गया। वे निरंतर नीचे की ओर जाने लगे, धन व यश के लोभ ने उन्हें आ घेरा। वे स्वयं तो पतित हुए ही, उन्होंने अन्यों को (अनुयायियों को) भी भ्रमित करना प्रारंभ कर दिया। तदुपरांत यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है। वर्तमान में कुछ मार्गदर्शक लोभवश और कुछएक भ्रष्ट गुरु की शिक्षा से उपजी अज्ञानतावश यह बात प्रचारित कर रहे हैं कि विभिन्न कर्मकांडों से, लॉकेटों, तावीजों, पत्थरों आदि को धारण करने से सभी सांसारिक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं व जीवन में आने वाले कष्ट-बाधाएं आदि दूर भाग जाते हैं!

आजकल टेलिविज़न के धार्मिक चैनलों पर ऐसे भ्रामक कार्यक्रमों व विज्ञापनों की बाढ़ से सभी जागरूक जन परिचित ही होंगे। हम सभी ईमानदारी से विचार करने पर यह तो मानेंगे ही कि हमारा वर्तमान भारत भौतिक व आध्यात्मिक रूप से बहुत अधिक विकसित नहीं है। अनेक राष्ट्र हमसे बहुत-बहुत आगे हैं, लगभग हर क्षेत्र में। हम विकासशील देशों की श्रेणी में ही हैं और बहुत से कई अन्य राष्ट्र हमारे सामने ही सही मायनों में विकसित हुए हैं, अर्थात् वहां भौतिकता के अतिरिक्त नैतिक गुण भी हमारे यहाँ से बहुत बेहतर हैं। ... और नैतिक रूप से श्रेष्ठ होने का सीधा सा अर्थ है कि वे सही मायनों में धार्मिक (righteous) हैं। क्या वे विभिन्न स्थूल धार्मिक कर्मकांडों का अवलंबन लेकर अभ्युदय अर्थात् चतुर्मुखी विकास या उत्तरोत्तर समृद्धि को प्राप्त हुए??

यह प्रश्न या कोई अन्य मत जब उन तथाकथित धार्मिक मार्गदर्शकों के समक्ष उठाया जाता है, तो अधिकांशतः वे खामोश ही रहते हैं, कोई संतोषजनक ठोस उत्तर नहीं होता है उनके पास। फिर भी कुछ ज्ञानी (?) साहस करते हैं सुन्दर तर्क देने का! वे कहते हैं कि "जीवन में सांसारिक इच्छापूर्ति के लिए प्रयत्न करते समय मनुष्य किसी को दुःख पहुंचाता है, कई बार किसी को लूटता है, अनुचित विकारों व इच्छाओं का शिकार बनता है, तो कई बार अपने लिए शत्रु निर्माण करता है। इससे सत्त्व की हानि होती है। परन्तु आधिदैविक उपायों अर्थात् विभिन्न कर्मकांडों या अनुष्ठानों आदि से इन बाधाओं से बचते हुए सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति संभव है।"

कोई मुझे बता सकता है कि क्या तथाकथित अनुष्ठानों से यदि यह सब संभव होता तो बिना प्रयास के ही हमारा भारत आज शीर्ष पर होता, क्योंकि निःसंदेह भारत के पास आज इन उपायों की कोई कमी नहीं है। ज्ञान व उपाय का सामान ऑनलाइन मौजूद है चौबीसों घंटे व सातों दिन! व्यर्थ में ही हम इतना श्रम कर रहे हैं या इसके लिए नियोजन कर रहे हैं!

हम जानते हैं कि हमारे आज के जीवन-संघर्ष का मुख्य कारण इनमें से ही है -- नैतिकता का पतन, राग-द्वेष, लोभ, अंहकार, आलस्य, अज्ञान, अनुशासनहीनता, स्वार्थ, प्रारब्ध, आदि-आदि। इनमें से सभी हमारे कर्म पर ही निर्भर हैं, प्रारब्ध भी पूर्वकर्मों पर ही निर्भर होता है। नैसर्गिक रूप से प्राप्त शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक शक्ति का सदुपयोग ही हमें यथार्थ सुख व समृद्धि प्रदान कर सकता है न कि विभिन्न कर्मकांडों से प्राप्त रिद्धि-सिद्धि! प्रथमतः रिद्धि-सिद्धि के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह है! क्योंकि पहली बात तो यह कि इसका कोई ठोस स्थूल प्रमाण आज तक देखने में नहीं आया, अधिकतर सब सुनी-सुनाई बातें ही हैं; और दूसरी यह कि रिद्धि-सिद्धि में यदि इतना बल है, तो भारत इस विधा में इतना पारंगत होते हुए भी आज लगभग सभी क्षेत्रों में इतना पिछडा हुआ क्यों है?!

सभी जागरूक लोग इस बात से सहमत होंगे कि भारत का विकास ठोस नहीं हो रहा है, सूजन ही अधिक है!! और ये अंधविश्वासी कृत्य अर्थात् रिद्धि-सिद्धि प्राप्ति (shortcut) का लॉलीपॉप हमें और अधिक अकर्मण्य बनाएगा। आज इन कर्मकांडों की ओर अधिक जन-झुकाव के दो मुख्य कारण हैं -- पहला यह कि, साधारणतया लोग सरलता अर्थात् किसी शार्टकट के माध्यम से अपनी इच्छापूर्ति करना चाहते हैं; और दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक है कि, व्यक्ति को अपने प्रत्येक कृत्य का परिणाम ज्ञात नहीं होता है, सफलता भी मिलती है व असफलता भी। जब व्यक्ति इन रिद्धि-सिद्धि प्राप्ति के अनुष्ठानों के चक्कर में फंस जाता है, तो सफलताओं का श्रेय वह इन अनुष्ठानों को देता है, निहाल हो जाता है तथा असफलता के लिए उसे समझाया जाता है कि अनिष्ट शक्तियों के बहुत प्रभावी (भारी) होने के कारण ऐसा हुआ! ... व्यक्ति संतुष्ट हो जाता है, ... मार्गदर्शकों की रोटियां सिकती रहती हैं।

आज के विकसित देश इस विधा के बिना ही बहुत सी ठोस उपलब्धियों को प्राप्त कर गए, जिन पर वे गर्व कर सकते हैं, प्रसन्न हो सकते हैं। उनके नागरिक समृद्ध हैं, साथ ही शांत भी। बहुत से अन्य कमजोर, अविकसित या विकासशील राष्ट्रों को यह बात नहीं जमती, ईर्ष्या होती है, तभी तो वे इन कुछेक अच्छे राष्ट्रों की टांग खींचते ही रहते हैं। अरे! वे उन्नति को प्राप्त हुए अपने वर्तमान श्रम व पूर्व कर्मफल अर्थात् प्रारब्ध से, इस बात से तो हम ज्ञानी भारतीय कभी इनकार नहीं कर सकते, तो फिर हम क्यों कुढ़ें? ... और यदि हमें अपनी इस आधिभौतिक उपायों की विधा पर पूर्ण विश्वास है, तो तनिक यह विचार करें कि यह इतनी प्रभावहीन क्यों है? यदि प्रभावहीन नहीं, तो ठोस व स्थायी परिणाम निरंतरता से क्यों नहीं दृष्टिगोचर होते??

हमें ठोस व टिकाऊ भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति हेतु सचेत होना ही पड़ेगा, वास्तव में अच्छा बनना ही पड़ेगा, योग्य साधन-साधना अपनाने ही पडेंगे। इसका अन्य कोई सरल विकल्प नहीं। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि योग्य, अधिकारी व समर्थ जन इसके लिए गंभीर एवं ईमानदार प्रयत्न निरंतरता से करते रहें। इति।

Thursday, July 30, 2009

(१९) खान-पान और धर्म

मैं कई धार्मिक मार्गदर्शकों से अक्सर मिला करता हूँ, विभिन्न सत्संगों में भी जाता रहता हूँ। वर्तमानकाल में भारत में मैंने लगभग सब धार्मिक दर्शनों (विचारों) में एक समान बात देखी है कि आज किसी व्यक्ति में धार्मिकता विद्यमान होने का पैमाना या मापदण्ड सर्वप्रथम उस व्यक्ति का खान-पान आदि ही माना जाता है। लोग इसी प्रकार से बात करते हैं कि अमुक व्यक्ति बहुत अच्छा व धार्मिक वृत्ति का है, क्योंकि वह तम्बाकू, मद्यपान व सामिष भोजन आदि से बिलकुल परहेज रखता है! धार्मिकता के मापदण्ड की सामान्यतः जब ऐसी सोच समाज में विकसित हो जाती है या हो ही गयी है, तो इन वस्तुओं का यदा-कदा सामयिक सेवन करने वाला व्यक्ति यह विचार करने को बाध्य हो जाता है कि या तो तथाकथित धार्मिक मापदण्ड गलत हैं और सम्बंधित व्यक्ति ढोंगी है, या मैं ही अत्यंत मैला हूँ। तात्पर्य यह कि उसमें खीज, क्रोध या हीन भावना का अंकुरण हो सकता है। होता तो बहुधा यही है कि वह किसी भी तथाकथित धार्मिक सम्प्रदाय या समाज से भलीभांति घुलमिल नहीं पाता। जग-निन्दा से बचने या सामाजिक निर्बन्धों के चलते वह विभिन्न सत्संगों या धार्मिक कृत्यों में सहभागी तो होता है, पर ऊपरी तौर पर ही। मानसिक विरोध या हीन भावना से वह परे नहीं रह पाता। कितनी घोर विडम्बना है कि आज किसी व्यक्ति में धार्मिकता का अनुमान मात्र उसके खान-पान से लगाया जाता है, उसके अन्य अच्छे कृत्यों पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है, उसके हृदय की गहराइयों में नहीं झाँका जाता है! उस व्यक्ति के मन में अन्यों के प्रति कैसे विचार चलते हैं, अन्यों के प्रति उसका आचरण कैसा है, वह सत्य और न्याय के पथ पर चलता है कि नहीं, नैतिक गुणों का कितना धनी है अर्थात् यथार्थ सदाचार उसके कृत्यों से परिलक्षित होता है अथवा नहीं, इन सब बातों पर कोई धार्मिक सौदागर गौर नहीं करता है।

जब धर्म के क्षेत्र में तथाकथित मूल्यांकन करने वालों द्वारा सदाचार के उपरोक्त पहलुओं पर ध्यान न देकर केवल खान-पान जैसे सामान्य कृत्यों पर ही प्रथम विचार किया जाता है तो अधिकतर व्यक्ति उनके संसर्ग में आने से पहले ही वाह्य धर्म कृत्यों से किनारा कर लेते हैं। कुछ केवल ऊपरी तौर पर धार्मिक कृत्यों में सहभागी होते हैं व छद्म रूप से स्वयं को परहेजी बताते हैं। और कुछ ऐसे भी होते हैं जो वर्ज्य (?) खान-पान को त्याग कर इन धार्मिक लोगों की संगत ग्रहण करते हैं। पर बहुत शीघ्र ही उनका मोह भंग हो जाता है, जब उनको यह पता चलता है कि ऊपर से कुछ वाह्य कृत्यों से वर्जन रखने वाले ये तथाकथित धार्मिक भीतर से या अन्य कृत्यों की दृष्टि से कितने खोखले व मैले हैं। ... और तब व्यक्ति न केवल उस छद्म सत्संग का परित्याग कर देता है, वरन प्रचलित धर्म के प्रति उसमें निराशा व क्षोभ उत्पन्न हो जाता है, फलस्वरूप वह अन्यों को भी उनके विरुद्ध करने हेतु प्रेरित करता रहता है। ... उधर वे तथाकथित धार्मिक भी उस व्यक्ति के विरुद्ध कुछ ऐसा ही अभियान सर्वदा चलाते रहते हैं, उसकी खान-पान पद्धति को कोस कर, निम्न व हेय ठहरा कर, उसको पापी-दुराचारी सिद्ध करने में लगे रहते हैं।

मेरे विचार से यदि हम धर्म के लक्षणों में व्यक्ति या समाज की खान-पान संस्कृति को सर्वप्रथम रखते हैं, तो हमें भारत के कुछ भूभाग या जनसंख्या को छोड़ कर लगभग शेष विश्व को अधर्मी घोषित करना पड़ेगा, और यदि हम ऐसा करते हैं तो हमसे बड़ा मूर्ख व अहंकारी और कोई नहीं होगा! लगभग सभी विकसित देशों व उनके भले नागरिकों को केवल खान-पान के आधार पर अधार्मिक घोषित कर हम केवल अपने अहम् का ही पोषण करेंगे, इससे यथार्थ नहीं बदल जायेगा। मेरा दृढ़ता से यह मानना है कि खान-पान सम्बन्धी वाह्य कृत्य मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करते हैं -- (१) जलवायु, (२) कार्य की परिस्थितियां, (३) संस्कृति व धार्मिक विश्वास।

(१) जलवायु और खान-पान पद्धति का परस्पर बहुत गहरा सम्बन्ध है। बहुत से देशों में तापमान बहुत कम (अधिकांशतः ५ डिग्री सेल्सियस से भी कम) और कभी शून्य से भी कम रहता है, बहुत से स्थानों पर वनस्पतियों आदि का उत्पादन अधिक नहीं हो पाता है, वहां के निवासियों के लिए उदर-पूर्ति हेतु सामिष भोजन व शरीर को गर्म रखने हेतु मद्य (liquor, wine, alcohol) का दवा के रूप में नियंत्रित व सुसभ्य सेवन अनिवार्य सा हो जाता है, अन्य सस्ते विकल्प के रूप में कुछ लोग नियंत्रित धूम्रपान भी करते हैं। यह सब उनके जीवित, स्वस्थ व सामान्य रहने के लिए आवश्यक सा होता है। कुछ गर्म परन्तु तटीय क्षेत्रों में, मरुस्थलों में, बंजर भूभागों में व पर्वतीय क्षेत्रों आदि में खेती बहुत दुरूह या असंभव होती है, अतः वहां के निवासियों को अनाज, दालें, खाद्य वनस्पतियाँ सरलता से उपलब्ध नहीं होतीं और वे अधिकतर सामिष भोजन पर ही निर्भर रहते हैं। वैसे यह सब जो मैं लिख रहा हूँ, उन तथ्यों से अधिकांश लोग भली-भांति परिचित ही होंगे, अतः विचार के अगले बिन्दु पर चलते हैं।

(२) कार्य की परिस्थितियां भी खान-पान पर बड़ा असर डालती हैं। जैसे - जो सात्त्विक माहौल में रहते हैं, ब्राह्मण वर्ण का कार्य करते हैं, धर्म-शिक्षण या विद्यादान आदि की सेवा करते हैं, उन्हें शारीरिक श्रम अधिक नहीं करना पड़ता, अतः वे सामान्य निरामिष भोजन पर आश्रित रह अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। सामिष भोजन व तम्बाकू, मद्य आदि रज-तमात्मक हैं। संभवतः इसीलिए संस्कृति व धर्मानुसार भी ब्राह्मण वर्ण में सामिष भोजन व धूम्र / मद्यपान आदि वर्जित माना गया है! पर जिन लोगों को लगातार रज और तम की परिस्थितियों में रहकर कठोर श्रम करना पड़ता है, उन्हें रज व तम के प्रभाव से जूझने हेतु रज-तमात्मक भोजन की आवश्यकता पड़ती है। पुरानी कहावत है - लोहे को लोहा ही काट सकता है! बहुत अधिक शारीरिक श्रम एवं कठोर व विषम कार्य परिस्थितियों के बीच कार्य करने वाले व्यक्तियों को तुंरत व अधिक बल-उर्जा आदि हेतु सामिष भोजन व अन्य मद्य, तम्बाकू जैसे उत्तेजक पदार्थों का सीमित सेवन करना कभी-कभी अपरिहार्य हो जाता है। पर जागरूक, सुसंस्कृत व सचेत रहने वाले इन पदार्थों के अनिष्टकारी पहलुओं से यथासंभव बचे रहते हैं। इन परिस्थितियों में कार्य करने वालों के उदाहरण के रूप में हम मुख्यतः सैनिकों व अन्य क्षात्र वर्ग तथा कुछ हद तक वैश्य व शूद्र-वर्ग को भी ले सकते हैं।

भारत में रज-तमात्मक परिस्थितियों में कार्य करने वालों में मुख्यतः या केवल भारतीय सेना के लोग ही स्थिति-अनुरूप आवश्यक रज-तमात्मक वस्तुओं का नियमित सेवन करने के बावजूद सुसभ्य व जागरूक हैं; अन्य क्षात्र वर्ग, वैश्य वर्ग या शूद्र वर्ग में सेवन के मामले में अनुशासनहीनता व अति दिखाई पड़ती है। संभवतः यह हमारी संस्कृति की ही कमी है या हम परिपक्व नहीं हैं।

(३) किसी समाज की खान-पान पद्धति पर उस भूभाग की संस्कृति व धार्मिक विश्वास भी बहुत प्रभाव डालते हैं। संस्कृति को ही ले लें तो कहीं खुशियों या कुछ विशेष अवसरों पर मद्य का संतुलित सेवन शुभ व अनिवार्य माना जाता है, तो कहीं पर अन्य कृत्य किये जाते हैं। ऐसे ही संस्कृति दर संस्कृति बहुत से अन्य कृत्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं। कोई कृत्य एक स्थान पर सभ्यता की निशानी माना जाता है, तो किसी अन्य स्थान पर वह असभ्यता का सूचक होता है। पर फिर भी सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उस कृत्य या किसी भी कृत्य को करते समय हमारे दिल की भावनाएं कैसी हैं, वे स्वच्छ हैं या नहीं स्वयं या अन्यों के प्रति?? कुछ भी करते समय यदि हममें मानसिक व आत्मिक स्वच्छता कायम रहती है, अपने व दूसरों के स्थूल देह को कोई क्षति नहीं पहुंचा रहे होते, यहाँ तक कि भावनाएं भी आहत न हों इस बात का भी पूरा ध्यान रखते हैं, तो माना जा सकता है कि उस समय हम अधार्मिक नहीं हैं; वह तो बस संस्कृति-अंतर्गत शारीरिक व मानसिक प्रसन्नता हेतु कृत्य कर रहे होते हैं।

भारत में पहले धर्म और संस्कृति एक ही थे। पूर्वकाल में लोग बहुत धर्मभीरु थे, धर्म के नाम पर कुछ भी करने को तत्पर रहते थे। अतः उस काल में तत्कालीन प्रबुद्धों व ज्ञानियों को सर्वहित में जो उचित जान पड़ता था, उसे वे धर्म के साथ जोड़ देते थे। इस प्रकार लोग अनुशासित रहते थे, साथ ही सदाचारी रहते थे। पर कालांतर में सर्वसाधारण की मन, बुद्धि आदि का बहुत विकास हो जाने से लोग निरंकुश हो गए व मनमाना आचरण करने लगे। समयानुसार व परिस्थिति-अनुसार योग्य मार्गदर्शन के अभाव में उन्हें लगने लगा कि धर्म के साथ खान-पान का कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि हमारे ही धार्मिक ग्रंथों में व विचारकों के वक्तव्यों में कहीं-कहीं बहुत विरोधाभास था। वैज्ञानिक शिक्षा कुछ और ही कहती थी।

पाश्चात्यों और विकसित देशों ने वैज्ञानिक मतानुसार अपनी जीवन-शैली व खान-पान में उचित परिवर्तन किये। अनुचित पर वे विविध प्रतिबन्ध भी लगाते रहते हैं, जैसे सार्वजनिक स्थानों पर धूम्र व मद्यपान पर प्रतिबन्ध; इसके अतिरिक्त फास्ट फ़ूड व कोल्ड-ड्रिंक आदि के सेवन को हतोत्साहित करना, खाद्य-पदार्थों के उच्च-मानक तय करना आदि।

हम भारत के पुरातन धर्मग्रंथों का सूक्ष्म अवलोकन करें तो पायेंगे कि कालानुसार, परिस्थिति-अनुसार हमारे तत्कालीन धर्माप्रमुखों की सोच धीरे-धीरे बदली, फलस्वरूप नए सम्प्रदायों व नए धर्मग्रंथों का सृजन हुआ, क्योंकि उसी सम्प्रदाय में रहते हुए परिवर्तन करना बहुत दुष्कर होता है। भारत में पाए जाने वाले परस्पर विरोधी विभिन्न धार्मिक दर्शन, काल-परिवर्तन की ही उपज हैं। पर फिर बीच में जड़ता का एक बहुत बड़ा काल आ गया; बस वहीं से हम पिछड़ गए, हमारी सोच पिछड़ गयी। पिछड़ने के कारण अब हम बस अन्धानुकरण ही करते हैं, कृत्य के साथ संलग्न अनुशासन व सभ्यता का ध्यान कतई नहीं रखते हैं।

इतने परिवर्तनों के बाद भी भारत में वर्तमान धार्मिक सम्प्रदाय या धर्म-मार्गदर्शक अभी भी खान-पान सम्बन्धी कुछ जड़ मान्यताओं पर ही विश्वास करते-कराते हैं और उन्हें ही धार्मिकता का सबसे बड़ा पैमाना मानते हैं। यह हमारी जड़ता का द्योतक है। यह बात ठीक है कि यदि हमें विश्वास है कि निज-धर्मानुसार सामिष वर्ज्य है, तो उससे परहेज करना चाहिए, पर अन्य कोई अपने वैयक्तिक विश्वास के चलते यदि सामिष ग्रहण कर रहा हो, तो हमें उसके विश्वास को कमजोर या हेय नहीं समझना चाहिए। वाह्य धर्म-कृत्य व विश्वास समुदाय दर समुदाय भिन्नता लिए होते हैं।

बाइबल में इस विषय पर बहुत सुन्दर लिखा है -- "मत्ती" के अध्याय-१५ के वचन संख्या १७ से १९ -- "१७ क्या नहीं समझते, कि जो कुछ मुंह में जाता है, वह पेट में पड़ता है, और सण्डास में निकल जाता है? १८ पर जो कुछ मुंह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। १९ क्योंकि कुचिन्ता, हत्या, परस्त्रीगमन, व्याभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा मन से ही निकलती है।" .... इसके अतिरिक्त "रोमियों" के अध्याय-१४ के वचन संख्या -- १ से ३, ६, १४, १५, १९ से २३ में लिखा है -- "१ जो विश्वास में निर्बल है, उसे अपनी संगति में ले लो; परन्तु उसकी शंकाओं पर विवाद करने के लिए नहीं। २ क्योंकि एक को विश्वास है कि सब कुछ खाना उचित है, परन्तु जो विश्वास में निर्बल है, वह साग-पात ही खाता है। ३ और खाने वाला न-खाने वाले को तुच्छ न जाने, और न-खाने वाला खाने वाले पर दोष न लगाये; क्योंकि परमेश्वर ने उसे ग्रहण किया है। ६ जो किसी दिन को मानता है, वह प्रभु के लिए मानता है; जो खाता है, वह प्रभु के लिए खाता है, क्योंकि वह परमेश्वर का धन्यवाद करता है, और जो नहीं खाता, वह प्रभु के लिए नहीं खाता, और परमेश्वर का धन्यवाद करता है। १४ मैं जानता हूँ, और प्रभु यीशु से मुझे निश्चय हुआ है कि कोई वस्तु अपने आप से अशुद्ध नहीं, परन्तु जो उसे अशुद्ध समझता है, उसके लिए अशुद्ध है। १५ यदि तेरा भाई तेरे भोजन के कारण उदास होता है, तो फिर तू प्रेम की रीति से नहीं चलता : जिसके लिए मसीह मरा उसको अपने भोजन के द्वारा नाश न कर। १९ इसलिए हम उन बातों का प्रयत्न करें, जिनसे मेल-मिलाप और एक-दूसरे का सुधार हो। २० भोजन के लिए परमेश्वर का काम न बिगाड़ : सब कुछ शुद्ध तो है, परन्तु उस मनुष्य के लिए बुरा है, जिसको उसके भोजन करने से ठोकर लगती है। २१ भला तो यह है, कि तू मांस न खाए और न दाख-रस पिए, न और कुछ ऐसा करे, जिससे तेरा भाई ठोकर खाए। २२ तेरा जो विश्वास हो, उसे परमेश्वर के सामने अपने ही मन में रख; धन्य है वह, जो उस बात में, जिसे वह ठीक समझता है, अपने आप को दोषी नहीं ठहराता। २३ परन्तु जो सन्देह करके खाता है, वह दण्ड के योग्य ठहर चुका : क्योंकि वह निश्चित धारणा से नहीं खाता और जो कुछ विश्वास (निश्चय) से नहीं, वह पाप है।।"

अंत में निष्कर्ष यही निकलता है कि आधुनिक विज्ञान व धार्मिक विश्वास दोनों में सामंजस्य बैठाते हुए हमारी जो निश्चित या योग्य धारणा (निश्चय) बने, विश्वास बने, उसी के अनुरूप हमें अपनी खान-पान पद्धति विकसित करनी चाहिए। ... और इस प्रकार विश्वासानुसार बरतते हुए अपने कृत्य को कमजोर या हेय नहीं समझना चाहिए, जग-निन्दा के भय से उसे छुपाना नहीं चाहिए, यह गलत होगा। इसके अतिरिक्त अन्यों के विश्वास को भी कमजोर न समझते हुए हमें उनका उचित आदर करना चाहिए। नम्रता का गुण दिखाते हुए, परेच्छा का ध्यान रखते हुए यदि हम अपना कोई कृत्य अस्थाई रूप से स्थगित कर सकते हैं तो अवश्य करना चाहिए। मैं परेच्छानुसार वर्तन में अन्यों के विश्वासानुसार निज खान-पान में कुछ जोड़ने की बात नहीं कर रहा हूँ, वरन अस्थायी तौर पर कुछ त्यागने की बात कर रहा हूँ। संभवतः यह सबके लिए सरल व अनापत्तिजनक रहेगा। नम्रता के अतिरिक्त यह कृत्य हमारे लचीलेपन व व्यापकता के गुण को प्रकट करेगा।

हाँ, ऊपर एक स्थान पर, मेरे विचार से प्रारम्भ में ही कहीं, मैंने प्रसंगवश रज-तमात्मक परिस्थिति को रज-तम से, या लोहे को लोहे से काटने की बात लिखी है। इसे व्यापक रूप से इस प्रकार समझने का प्रयत्न करें -- शारीरिक, मानसिक या जलवायु-सम्बन्धी कठिन / विषम परिस्थितियां माने रज-तम अर्थात् लोहा; और वह लोहा लकड़ी के एक मेज पर रखा है। लकड़ी का मेज माने हमारे सत्त्व गुण। लोहे (रज-तम) को हम एक और लोहे (रज-तमात्मक पदार्थ जैसे - सामिष भोजन व मद्य आदि) से काटते हैं अर्थात् दूर करते हैं। पर हमें यह अवश्य ध्यान रखना होगा कि काटने वाले लोहे की आरी आवश्यकता से अधिक न चल जाये, अन्यथा लकड़ी की मेज भी कट जायेगी अर्थात् हमारे सत्त्व गुण क्षतिग्रस्त हो जायेंगे। अतः रज-तम को काटने के लिए सन्तुलित रज-तम का ही प्रयोग करना चहिये, अन्यथा सत्त्व को हानि पहुँच सकती है। हमें सत्त्व को हर हाल में बचा कर रखना है। परिस्थिति-अनुसार सब कुछ उचित हो सकता है, पर समतौल के साथ, संतुलन के साथ। ... और जैसे ही हमें यह भान हो कि अमुक वस्तु हमारे स्वयं या अन्यों के लिए अब घातक सिद्ध हो रही है, तुंरत उसका परित्याग कर देना चाहिए। वैसे हमारे वैज्ञानिक और उन्नत देशों की सरकारें इस प्रकार की सोच के लिए अब निरन्तर जागरूक रहते हैं। समय-समय पर वे लोकहित हेतु खान-पान की नयी नीतियाँ प्रतिपादित करते रहते हैं। हमें चाहिए कि हम उनकी सिफारिशों, सलाहों व अनुमोदनों के प्रति सचेत रहे व समय रहते उन्हें अपने व्यवहार में शामिल करें।

... पर पुनः यह अच्छे से ध्यान में रखें कि खरा धर्म हमारे खान-पान से नहीं, वरन दूसरों के प्रति हमारी सोच व हमारे व्यवहार / आचरण आदि से परिलक्षित होता है। इस विषय में संक्षिप्त सारगर्भित विचार आप पहले भी एक लेख 'आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ अर्थात्' में पढ़ चुके हैं। इति।

Friday, July 24, 2009

(१८) हमारी जड़ता के कारण

हमने पिछले कई लेखों में भारतीयों, विशेषकर उत्तर भारत की अवनति के विषय में काफी चर्चा की। अब हम भारत की इस वर्तमान दुःखद परिस्थिति को कुछ अन्य बिन्दुओं या कोणों से समझने का प्रयत्न करते हैं।

जैसा कि सर्वविदित है कि हमारा राष्ट्र बहुत वर्षों तक परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। परतंत्रता के कारणों में भी झांकें तो हम पायेंगे कि हमारी परतंत्रता का मुख्य कारण हमारी ही बहुत सी कमजोरियां थीं। इंग्लैंड से ईस्ट इंडिया कम्पनी अपना व्यापार बढ़ाने ही तो सर्वप्रथम भारत में आयी थी। उनका मुख्य लक्ष्य तब मात्र व्यापार ही था और 'व्यापार' कभी भी दांव-पेंच रहित नहीं होता, यह तत्कालीन भारतीय भी अच्छी तरह से जानते ही होंगे। हमने ही उन्हें आश्रय दिया। उनकी धन-संपदा से, व्यापार करने के ढंग से हम शीघ्र मोहित हो गए। शीघ्र धनी हो जाने के लालच में हमने ही उनकी मदद की, हमने ही उनका माल बेचा। व्यापार करते-करते अंग्रेज हमारी तमाम कमजोरियों से परिचित होते गए। उस समय हम एक नहीं थे, हमारा शासक-वर्ग सत्ता-लोलुपता व विलासिता में डूबा था, पड़ोसी राज्यों में आपस में बनती नहीं थी, सभी निज राज्य-विस्तार के विषय में ही सोचा करते थे, अनेक राजाओं के चारित्रिक रूप से कमजोर होने के कारण राज्य की सेनाओं में भी एकता व स्वामिभक्ति की कमी थी, मंत्रियों या परिवारजनों द्वारा विद्रोह आदि आम बात थे। अंग्रेजों से पहले भी कई बार विदेशी आक्रमणों से आहत भारत की निज-संस्कृति का स्वरूप भी बिगड़ चुका था। विभिन्न जन-जातियों के बीच फूट पड़ी हुई थी, यहाँ तक कि हिन्दू भी एक नहीं थे, वर्णभेद, अस्पृश्यता व तदनुरूप राग-द्वेष अपने चरम पर था। हमारे अगुआ लगातार श्रेष्ठ नीतियों से परे जा रहे थे और फिर विभिन्न आपदाओं से घिर जाने के बाद कठिनाई से उबरने हेतु अंग्रेजों से ही मदद मांगते थे। अक्सर आपसी अनबन व फूट के मामलों में भी हम अंग्रेजी कम्पनी से सहायता माँगा करते थे। फिर अंग्रेज कूटनीति के माध्यम से हमारी समस्याओं को सुलझाते थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी व सम्बंधित अंग्रेजों ने हमारी इन्हीं सब कमजोरियों का लाभ उठा कर अपने व्यापार की जड़ें मजबूती से फैलाने के अतिरिक्त धीरे-धीरे हमारे राज्यों पर कब्जा किया, हमें गुलाम बना हमारे शासक बन बैठे।

कुल मिला कर हमने ही ऐसे संयोग उत्पन्न किये कि अंग्रेज व्यापारियों को भारत पर आधिपत्य ज़माने का अवसर प्राप्त हुआ। वे संख्या में हमसे बहुत कम थे पर सुसंगठित थे और हम संख्या में उनसे कई गुना अधिक होने पर भी असंगठित थे, राग-द्वेष में डूबे थे, अशिक्षा व अविद्या की बेड़ियों में जकड़े थे। राम और कृष्ण की धरती के लोग उनके ही उपदेश भूल गए थे। आध्यात्मिक ज्ञान तो बहुत था, पर मात्र शब्दों या यंत्रवत कर्मकांडों तक ही सीमित था। गीता का ज्ञान तो बहुत बघारते थे, कंठस्थ भी थी, पर श्री कृष्ण के प्रवृत्ति व निवृत्ति के उपदेश व्यवहार में न लाते थे। यदि ऐसा होता तो हमारी भौतिक व आध्यात्मिक प्रगति इतने लम्बे समय थमी न रहती। अध्यात्म के क्षेत्र में विपुल वाद-विवाद व मंत्रणायें होते रहने के बावजूद हम अध्यात्म का व्यावहारीकरण करने में अक्षम सिद्ध हुए। इन्हीं सब कमजोरियों के कारण पिछले काफी वर्षों से न तो हमने अपने भौतिक विकास पर ध्यान दिया था और न ही आध्यात्मिक विकास पर। हम जड़ व स्थिर थे। ... बहुत दिनों से एक स्थान पर रुका हुआ स्वच्छ पानी भी सड़ने लगता है, बदबू मारने लगता है। पर हम उस सड़न, उस बदबू से अनभिज्ञ बने बैठे बस अपने सुनहरे व सुगन्धित अतीत पर ही मुग्ध थे। मुख्यतः यही सब भारतीयों के पराभव के मूल कारण थे।

फिर भी अपनी वर्षों की दासता के लिए हम बारम्बार अंग्रेजों को ही कोसते रहते हैं, अपनी तत्कालीन कमजोरियों को विस्मृत कर देते हैं। ... भले ही अंग्रेजों ने हमें वर्षों गुलाम बनाये रखा, तब भी कुछ मायनों में हमें उनके प्रति आभारी भी होना पड़ेगा, क्योंकि उनके कारण ही हमारी व हमारे देश की भौतिक जड़ता कुछ हद तक समाप्त हुयी। परिवर्तन की दृष्टि से देखें तो उन्होंने ही हमारे देश में वैज्ञानिक युग का पुनः सूत्रपात किया। भौतिक शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में उन्होंने हमारी बहुत मदद की। आधुनिक भारत का निर्माण उसी काल में आरम्भ हुआ। हमारे देश में मैदानी व विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में रास्तों व सड़कों का निर्माण, रेलपथ का निर्माण, विभिन्न कल-कारखानों का निर्माण उन्हीं के काल में व उन्हीं के सौजन्य से सम्भव हो पाया। आज भी हम उस काल में संपन्न हुए जटिल उपयोगी कार्यों को अपने समक्ष पाते हैं, उनकी उपयोगिता गुणवत्ता के साथ आज भी हमारे सामने है, जैसे कालका-शिमला पहाड़ी रेलपथ। देखा जाये तो स्वतंत्रता के वर्षों बाद भी इतनी वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद हम उस स्तर की 'गुणवत्ता' व उपयोगिता के अन्य कार्य करने में अत्यंत मंद रहे हैं। यहाँ तक कि कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल के उपयोगी कार्य या निर्माण के रख-रखाव में भी हम अक्षम सिद्ध हो रहे हैं। हम कुछ भी कहें पर इतना तो मानेंगे ही कि लाख बुराइयों के बाद भी अंग्रेज मेहनती व अनुशासित थे। उन्होंने अपने ये गुण हमें देने की भरपूर कोशिश की, परन्तु हमने उनके कुछ और बुरे गुण तो अपना लिए पर मेहनत व अनुशासन से अभी भी मुँह चुराते हैं।

हम अपने समाज की नैतिक अवनति व भौतिक अपरिपक्वता के कारणों पर पुनः दृष्टिपात करें तो यह पाते हैं कि -- अंग्रेजों के भारत आने से पूर्व हमारा भौतिक विकास लगभग थमा हुआ था। शारीरिक रूप से हम आलसी व सुस्त थे, बस विभिन्न धार्मिक विचार-विमर्शों तक ही सीमित थे। जबकि उस समय अन्य विकासशील व विकसित देश निरन्तर चलायमान थे, वे समय के साथ-साथ क्रमबद्ध भौतिक प्रगति व परिवर्तनों के प्रति जागरूक थे। भारत में जब अंग्रेजों का आधिपत्य हो रहा था, उसी समय यहाँ पर भी भौतिक परिवर्तन का दौर आरम्भ हुआ। पहले बाहर के देशों के उत्पाद यहाँ आने शुरू हुए, तदुपरांत अपने यहाँ भी आधुनिक कल-कारखाने लगने शुरू हुए। हम उन उत्पादों से पहले से अधिक परिचित नहीं थे या परिचित संभवतः हों भी पर प्रयोग करने के अभ्यस्त नहीं थे। अचानक ही इतनी सुख-सुविधाओं के सामान आ गए कि हम उनकी चकाचौंध में खो से गए। अन्य राष्ट्रों ने तो अपना भौतिक विकास कई वर्षों में धीरे-धीरे निज श्रम से किया था; प्रगति, अनुसंधानों, खोजों व उत्पादों के सम्पर्क में धीरे-धीरे आये थे, अतः वे तो संतुलित थे। परन्तु हमें वह सब अनायास ही बिना किसी विशेष श्रम के एकदम से यूं ही मिल रहा था। हम मदमस्त हो गए। ठीक वैसे ही जैसे कई दिन के भूखे को अचानक ही खाद्य-सामग्री बहुतायत से उपलब्ध हो जाये तो उसको यह होश नहीं रहता कि कितना उसके लिए पर्याप्त व उचित रहेगा, ... बस खाने में जुट जाता है जंगलियों की भांति। ... कमोवेश आज भी हमारी वही दशा है। आज भी हमारा वही असंतुलन जारी है, हम प्रवृत्तियों में ही, भोगने में ही डूबे हैं। आज भी अनेकों भौतिक उपलब्धियाँ हमें अपने सामर्थ्य से नहीं वरन अन्य राष्ट्रों की कृपा से प्राप्त हो रही हैं। उदाहरण के तौर पर मोबाइल फोन, विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, स्वास्थ्य से सम्बंधित नवीनतम उपकरणों आदि को ही देख लें तो अत्यधिक उच्च गुणवत्ता का सामान आज भी विदेशों से ही आता है या उनकी तकनीक बाहर से आती है, बस उत्पादन ही यहाँ होता है और उस पर भी यह संशय बना रहता है कि उत्पाद पूरी तरह से मानकों के अनुरूप है अथवा नहीं। आज हमारा लक्ष्य बेहतर गुणवत्ता का सामान बनाना नहीं वरन केवल मुनाफा देने वाला सामान बनाना है। जैसे निर्माण करने में, वैसे ही प्रयोग करने में भी हम नीतिहीन ही हैं। अन्य विकसित राष्ट्रों के वर्तमान स्थिर संतुलन और हमारे असंतुलन का ठोस कारण हम फिर से वही पाते हैं कि उन्होंने भौतिक प्रगति को अपने प्रयासों व मेहनत से चरण दर चरण पाया और हमें वह सब एक झटके में ही मिल गया बिना किसी विशेष प्रयास के। हमने अधिक मेहनत तो की नहीं तो फिर हम उसका मूल्य क्या जानें। साधारण सी बात है जो सब जानते ही हैं कि परिश्रम से बनायी हुई या मेहनत की कमाई से लायी हुई वस्तु की कदर लोग बहुत करते हैं, दुरुपयोग नहीं करते। वही वस्तु यदि किसी को यूं ही मिल जाये बिना परिश्रम के, तो व्यक्ति उस वस्तु का अनियंत्रित उपयोग करता है, उसके दुरुपयोग की संभावनाएं बहुत प्रबल हो जाती हैं। भारत में आजादी के कुछ समय पहले से लेकर आज की दिनांक तक यही हो रहा है अर्थात् संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है।

चूँकि पूर्व में हमने कोई खास मेहनत नहीं की थी, अतः पहली बात तो यह कि हम विज्ञान के विभिन्न पहलुओं की जड़ों से अनभिज्ञ हैं या बहुत कम जानते हैं। अधिकांशतः हमारा ज्ञान सतही है। विदेशियों के सौजन्य से हमारा थोड़ा-बहुत वैज्ञानिक व भौतिक विकास तब शुरू हुआ था जब शेष विश्व अनुसंधानों के कई चरणों को पार कर चुका था। अतः हमें नक़ल का अवसर ही प्राप्त हुआ, सो विषयों को जड़ से जानने की हमारी जिज्ञासा ही लगभग समाप्त हो गयी या आज भी आलसी वृत्ति के होने के कारण हम उनको ठीक से समझना ही नहीं चाहते हैं। संचार माध्यमों का आज बहुत विस्तार हो जाने से सम्पूर्ण विश्व एक गाँव के समान ही हो गया है, हम निरन्तर एक-दूसरे के सम्पर्क में बने रहते हैं, अन्य देशों में हो रहे अन्वेषणों व आविष्कारों से निरन्तर परिचित रहते हैं, फिर भी आज भी हम चेत नहीं रहे हैं। आज भी हम अनियंत्रित ढंग से अंधों की भांति केवल भोगने में ही व्यस्त हैं। प्रवृत्ति में इतना डूब गए हैं कि निवृत्ति का ध्यान ही नहीं है। जबकि अन्य उन्नत राष्ट्र उनके सीमित धर्मग्रंथों में दी गयी नीतियों व स्वयं की सहज बुद्धि से से बहुत कुछ सीख चुके हैं। हमारे यहाँ तो इतना सुघड़ आध्यात्मिक ज्ञान सहजता से उपलब्ध है फिर भी निज-स्वार्थ में डूबे हुए हमारे वर्तमान धर्मगुरु उन्हें दूसरों को देने व दूसरों से उन पर अमल करवा पाने में अक्षम सिद्ध हो रहे हैं। यहाँ तक कि वे अन्यों को प्रेरित करने में भी असफल सिद्ध हुए हैं। हाँ अंधविश्वासों को बढ़ाने व निज-पूजा करवाने में वे अवश्य सफल रहे हैं। इस विषय पर विस्तार से चर्चा इससे पहले के अनेक लेखों में हम कर ही चुके हैं। अंग्रेजी सभ्यता लालच की थी पर उन्होंने अपने आप को परिष्कृत व परिमार्जित कर नीतिमान व धर्मभीरु बना लिया। उनकी सोच व कार्यों की गुणवत्ता पहले की तुलना में और अधिक श्रेष्ठ हो चुकी है। मात्र पैसा ही अब उनका उद्देश्य नहीं है, .. पर हमारा उद्देश्य?? हमारे यहाँ तो आज नैतिक मूल्य इतने रसातल में जा चुके हैं कि उनकी खुल कर व्याख्या करने में भी लज्जा का अनुभव होता है। कहने में संकोच होता है पर सच तो यही है कि न तो हम शिक्षित हैं और न ही सुसंस्कृत। हमारे अभिजात वर्ग के विषय में आप इसी ब्लॉग के एक अन्य लेख 'अभिजात वर्ग' में पढ़ ही चुके होंगे। इसके अतिरिक्त आज के विद्यालयों, अस्पतालों, परिवारों और कार्यालयों में भी नैतिकता के बहुत क्षीण चिन्ह दिखाई पड़ते हैं। भारत के कुछ प्रदेशों में आज की युवा पीढ़ी निरंकुश व दिग्भ्रमित है। उनके अभिभावक स्वयं इतनी आसक्ति व धन-यश आदि के मद में चूर हैं कि उन्हें स्थिति की गम्भीरता का भान ही नहीं है। बच्चों को बिना शिक्षित किये, बिना नैतिक गुण सिखाये वे उनको आज का हर वैभव, हर सुख, हर भौतिक शक्ति को दे देना चाहते हैं। अशिक्षित अर्थात् अपरिपक्व बच्चों को जब मल्टीमीडिया मोबाइल फोन, मल्टीमीडिया कंप्यूटर, इन्टरनेट, मोटरसाइकिल, स्कूटी व अन्य शक्तिशाली गैजेट्स मिल जायेंगे, तो उनका दुरुपयोग होना अवश्यम्भावी है। आज अभिभावकों ने सभी उच्च भौतिक संसाधन जुटा तो लिए हैं येनकेनप्रकारेण, और बस इसी में इतिश्री समझ ली है। अपने बच्चों को भी वे सब भौतिक सुख-सुविधाएं प्रदान तो कर रहे हैं पर बिना किसी मार्गदर्शन, बिना किसी सुसंस्कार के। ... बच्चों के लिए तो सर्वप्रथम अपने अभिभावक ही आदर्श होते हैं, उन्हीं को देख कर, उन्हीं से सीख कर वे बड़े होते हैं। और यहाँ के अभिभावक हैं कि वे स्वयं ही परिपक्व नहीं होना चाहते हैं तो फिर अपने बच्चों को इसके लिए प्रेरित करने में वे भला कहाँ समर्थ हो सकते हैं?? ... यह एक पुरातन व शाश्वत सत्य है कि निज क्रियमाण से या प्रारब्धवश शक्ति कोई भी प्राप्त कर सकता है, पर धर्म (righteousness) और शक्ति जब साथ में होंगे तभी शक्ति का सदुपयोग संभव है, अन्यथा रावण या अन्य शक्तिसम्पन्न आततायियों की कथाओं जैसा ही घटित होगा। रावण को धर्म, नीति आदि का शाब्दिक ज्ञान तो बहुत था पर व्यवहार में न लाता था, अमल नहीं करता था; उसके पास शक्तियां भी बहुत सी थीं पर अधर्मी होने के कारण वह शक्तियों का दुरुपयोग ही करता रहा, सदुपयोग का कभी विचार तक नहीं किया। यह ठीक है कि अंततोगत्वा उसका विनाश हुआ, पर विनाश से पूर्व उसने भूलोक व देवलोक को व्यथित करके रख दिया, भारी अव्यवस्था फैला दी। ... हमें सचेत होना होगा और देखना होगा कि कहीं हमारी अगली पीढी या स्वयं हम जाने-अनजाने रावण की नीतियों का अनुसरण तो नहीं कर रहे हैं!

आज के तथाकथित विकसित राष्ट्र भी कभी अपरिपक्व थे, उन्होंने आरम्भ में अपनी शक्तियों का दुरुपयोग भी किया, पर बहुत शीघ्र उनको यह एहसास हो गया कि उनका यह कदम आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। अनुभवों, पुराने श्रेष्ठ संस्कारों व उनके धार्मिक ग्रन्थ में दी गयी नैतिक शिक्षाओं ने उनके नेत्र समय से खोल दिए। अब वे शक्तिसम्पन्न राष्ट्र स्वयं चिंतित हैं कि उनके द्वारा अन्वेषित खोजें व शक्तियां गलत हाथों में न पड़ें व उनका दुरुपयोग न हो। सम्पूर्ण विश्व में विकसित व परिपक्व राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्ष आज इसी बात के लिए प्रयासरत हैं कि अन्वेषित शक्तियों का अच्छे कार्यों एवं लोकहित में ही प्रयोग हो। उदाहरण के लिए - परमाणु शक्ति। परिपक्व व सुलझे हुए देश इसका प्रयोग अब लोक हित में नाना प्रकार से कर सकते हैं या करते ही हैं, परन्तु यही शक्ति जब किसी अपरिपक्व हाथों में पहुँच जाये तो इसकी भयावहता की कल्पना सहज ही की जा सकती है। बुराई शक्ति में कतई नहीं होती, बुराई प्रयोग करने वाले में हो सकती है यदि वह अपरिपक्व व अधार्मिक हो तो। ... परिपक्वता प्राप्त करने हेतु हमें नीतिमान होना आवश्यक है। ... दृढ़ता से नीतिमान बनने के लिए हमें धार्मिक (righteous) बनना होगा। ... और धार्मिक बनने के लिए हमें अपने सहज स्वरूप को जानना अत्यंत आवश्यक है। स्वयं के सहज व खरे स्वरूप को जानने हेतु हम भारतवासियों के पास आध्यात्मिक ज्ञान का भण्डार पहले से ही है। आवश्यकता है तो बस उससे प्रेरित होने की, दैनंदिन जीवन में अमल में लाने की। ... और यह कार्य हमारे गुरुओं, हमारे अगुआओं व स्वयं हमारे लिए कोई मुश्किल नहीं, यदि हममें पर्याप्त इच्छाशक्ति पैदा हो जाये। इति।

Thursday, July 23, 2009

(१७) चरण-स्पर्श में भी आडम्बर !

भारतीय परम्परानुसार हम प्रायः आयु में अपने से अधिक बड़े लोगों, साधु-सन्यासियों, संतों, गुरुपद पर आसीत जनों के चरणों की वन्दना (चरण-स्पर्श) करते हैं और बदले में वे हमें आशीर्वाद देते हैं। चरण-स्पर्श करने वाले व्यक्ति में पैर छूते समय यह भाव होना चाहिए कि "मैं आपसे छोटा हूँ, सभी प्रकार से कनिष्ठ हूँ; अतएव स्वयं का अहम् कम करने हेतु तथा आगे की बहुमुखी प्रगति प्राप्त करने हेतु आशीर्वाद चाहता हूँ।" उत्तर में ज्येष्ठ व्यक्ति यही कहता है "कल्याण हो।" अर्थात् चरण-स्पर्श करने वाले व्यक्ति में तुलनात्मक रूप से वास्तव में कनिष्ठता का भाव, कोमलता, नम्रता एवं समर्पणभाव होना चाहिए। स्वयं का अहंभाव कम करने हेतु गम्भीरता होनी चाहिए, एक याचक का भाव होना चाहिए। ऐसे भाव जब होंगे, तब ही ज्येष्ठ व्यक्ति का आशीर्वाद फलीभूत होगा अन्यथा सम्पूर्ण क्रिया मात्र एक दिखावा बन कर रह जायेगी, किसी फल की प्राप्ति नहीं होगी।

श्रेष्ठ या खरे संत किसी साधक के चरण-स्पर्श करने मात्र की क्रिया से अधिक प्रसन्न नहीं होते, बल्कि वे वास्तव में साधक से प्रसन्न तब होते हैं जब वह 'धर्ममार्ग' पर चलता है, धर्माचरण करता है। गुरु की असली ख़ुशी शिष्य या सम्बंधित व्यक्ति के धर्ममार्ग पर चलने में ही निहित है। ऐसे ही ईश्वर को भी मात्र अपने यंत्रवत नामस्मरण, पूजा-पाठ व सम्बंधित विविध कर्मकाण्डों से उतनी प्रसन्नता नहीं मिलती, जितनी तब मिलती है जब उसका भक्त वास्तव में धर्माचरण करता है अर्थात् उसके दैनंदिन क्रियाकलापों में धार्मिकता (righteousness) झलकती है। अतः व्यावहारिक धर्माचरण ही सच्ची आराधना है गुरु अथवा ईश्वर की। फिर भी हम देखते हैं कि गुरु सदैव सभी को यह आशीर्वाद देते हैं कि "कल्याण हो।" यहाँ "कल्याण हो" का तात्पर्य यह है कि "हे याचक, तुम धर्ममार्ग पर चलो।" जब याचक धर्ममार्ग पर चल पड़ेगा तो उसका कल्याण तो सुनिश्चित हो ही जायेगा। अर्थात् खरे गुरु व संत सभी को धर्ममार्ग पर अग्रसर होने का खरा आशीर्वाद सदैव ही देते हैं।

अब कुछ चर्चा विपरीत स्थितियों पर भी ...। समाज में बहुत से अपरिपक्व, अपूर्ण, मायासक्त व ढोंगी साधु-संत भी हैं तथा बहुत से इसी प्रकार के याचक, शिष्य आदि भी। ऐसी अवस्था वाले साधु-संतों का स्वयं का अहं चरण-स्पर्श करवाने व छद्म आशीर्वाद देने से बढ़ता है, ऋणात्मक संचित होता है। अहंभाव के अतिरिक्त उनके इस कृत्य के पीछे अर्थ व यश का लोभ एवं आडम्बर भी छुपा होता है। इसी प्रकार से ढोंगी या स्वार्थी याचकों को भी संतों की चरण-वंदना करने से कोई लाभ नहीं मिलता, भले ही आशीर्वाद देने वाले संत खरे ही क्यों न हों। ऐसे याचकों का भी ऋणात्मक संचित बढ़ता है, वे अधोगति को प्राप्त होते हैं। याचना व आशीर्वाद में किसी प्रकार का ढोंग, स्वार्थ या अहं के जुड़े होने पर सम्बंधित ढोंगी व्यक्ति अंततः अधोगति को ही प्राप्त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। परन्तु दोनों व्यक्तियों (दाता या याचक) में से कोई एक सही है, खरा है, तो वह सही व्यक्ति अवश्य लाभान्वित होकर स्वच्छ अभीष्ट को प्राप्त करेगा।

अतः चरण-स्पर्श करने वाले व्यक्ति को सदैव याचक की भूमिका में होना चाहिए व उसमें अपने अहं का परित्याग करने की गम्भीरता होनी चाहिए तथा आशीर्वाद देने वाले में भी यही भाव होना चाहिए कि याचक का वास्तविक कल्याण हो, वह धर्ममार्ग पर चल कर अभ्युदय साध्य कर सके। सम्पूर्ण कृत्य में अहं व आडम्बर का किसी भी प्रकार से पोषण नहीं होना चाहिए।

वर्तमान में ऐसे खरे गुरु या खरे शिष्य बहुत ही कम संख्या में हैं, जो वैयक्तिक स्वार्थ, अहं व आडम्बरों से परे हों, तभी तो गुरु-शिष्य परम्परा की गौरवपूर्ण संस्कृति वाले भारत की यह दशा है। संख्या-वृद्धि का एक ही उपाय है -- शेष बचे-खुचे खरे संतों व शिष्यों द्वारा क्रियमाण कर्म का शत-प्रतिशत उपयोग व साथ ही शिक्षा व साधना हेतु समय का भी शत-प्रतिशत उपयोग। इसी प्रकार का गम्भीर व ईश्वर को समर्पित प्रयास ही ईश्वरीय-राज्य की पुनर्स्थापना का आधार होगा। इति।

Friday, July 17, 2009

(१६) भारत के वर्तमान धार्मिक संगठन व धर्म-शिक्षक

हमारे अब तक के मनन से हमें यह पता चलता है कि वास्तविक धर्म मूलतः आत्मानुभूति ही है। आत्मानुभूति अर्थात् आत्मा के गुणधर्मों की अनुभूति। विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार भी ऊर्जा अक्षुण्ण है, उसका स्वरूप बदलता रहता है और यह आवश्यक नहीं कि ऊर्जा के प्रत्येक स्वरूप की या ऊर्जा के स्वरूप-परिवर्तन के प्रत्येक चरण की सम्पूर्णता के साथ शाब्दिक व्याख्या की जा सके। जैसे परमाणु ऊर्जा के या परमाणु की संरचना के सम्बन्ध में समझने-समझाने हेतु विज्ञान अनेकों काल्पनिक अवधारणाओं का या चित्रों का अवलम्ब लेता है। भौतिक जगत् से सम्बंधित अन्य अनेक रहस्यों की व्याख्या हेतु भी विज्ञान अनेकों ऐसी गणनाओं का आलंबन लेता है जिनका औचित्य वह पूरी तरह से सिद्ध नहीं कर सकता, परन्तु उनकी सहायता से सम्बंधित रहस्य अंततः काफी हद तक खुल जाता है और हम उस ऊर्जा को नाना प्रकार से उपयोग करने में काफी हद तक सक्षम हो जाते हैं। यह अलग बात है कि हमारा वह ज्ञान कभी परिपूर्ण नहीं होता व शोधन-संशोधन कार्य अनवरत चलता रहता है।

... ऊर्जा के अनेक रूपों की भाँति आत्मा भी एक प्रकार की अक्षुण्ण ऊर्जा है। इसके विषय में अध्ययन को ही हम अध्यात्मशास्त्र कहते हैं और आत्मा के अति सूक्ष्म होने के कारण या अदृश्य होने के कारण शब्दों में उसकी व्याख्या बहुत दुरूह है। शब्दों में हम इसको समझने-समझाने का प्रयास तो करते हैं, अनेकों कल्पनाओं-संकल्पनाओं आदि का सहारा भी लेते हैं, पर अंततः हम इसे अनुभूतियों द्वारा ही लगभग ठीक-ठीक (?) समझ पाते हैं। पुनः हमें अपनी अनुभूतियाँ किसी अन्य को समझा पाना अत्यन्त दुरूह होता है। यहाँ तक कि अपनी अनुभूतियों का औचित्य भी बहुधा हम ठीक से नहीं सिद्ध कर पाते हैं। ... फिर भी हमने शब्दों के माध्यम से पिछले १५ लेखों में इसी समझने-समझाने का प्रयास करने का साहस किया है और यथासंभव हमारा दृष्टिकोण विज्ञान पर आधारित रहा है, ठोस तथ्यों पर आधारित रहा है। उदाहरणार्थ - क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया का सिद्धांत। यहाँ और अधिक आत्म-स्तुति न करते हुए हम मूल विषय पर आते हैं।

चूँकि आत्मा व धर्म आदि केवल अनुभूतियों से समझ में आने वाले हैं, ... इस बात का गलत लाभ उठा कर वर्तमान में अधिकाँश धार्मिक संगठन, संस्थाएं आदि बहुत से अंधविश्वासों को बढ़ावा देते दीख रहे हैं। पिछले कई वर्षों से भारत में नैतिक मूल्यों का बहुत अधिक पतन हुआ है। धार्मिक संगठन व संस्थाएं भी इससे अछूते नहीं रहे हैं, बल्कि इनमें इस पतन का प्रभाव और अधिक तीव्रता से दिखलाई पड़ रहा है। मेरा मानना है कि धर्मोपदेशक या धर्म-शिक्षक का कार्य बहुत ऊंचे दर्जे का है, विशिष्ट कार्य है, व समाज भी इनके प्रति विशिष्ट आदर-भाव रखता है, थोड़ा लोभ और भय मिश्रित ही सही। तो इन धर्मोपदेशकों का मूल उद्देश्य यही होना चाहिए और यही होता भी था प्राचीन काल में कि सामान्य लोगों को लोभ व भय से परे ले जाकर, दण्ड-परितोष की भावना से मुक्त करा कर, संघ में सच्चे धर्म की स्थापना करना तथा उसकी खराई को अक्षुण्ण रखना; स्वयं के एवं अन्यों के ईश्वर व आत्मा सम्बन्धी ज्ञान अर्थात् अध्यात्मशास्त्रीय ज्ञान में लगातार वृद्धि कर निरंतर ईश्वर या प्रकृति के नियमों के और अधिक समीप पहुँचते जाना; धर्म के वाह्य स्वरूप के अवांछित तत्वों व भय-मिश्रित अंधविश्वासों की बेड़ियों को लगातार काटना, आदि-आदि। सारांश में यह कि ज्ञान की अगली अवस्थाओं या कक्षाओं में अनवरत अग्रसर होते / करते जाना।

परन्तु आज ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा है। विभिन्न धार्मिक संगठन अध्यात्मशास्त्र को और अधिक जटिल बनाने व दुरूह साबित करने में लगे हैं। बजाय अंधविश्वासों को दूर करने के, वे और अधिक अंधविश्वास बढ़ाने में लगे हैं। कारण स्पष्ट है कि आम लोगों को जब धर्म बहुत जटिल व साथ ही भौतिक लाभ पहुंचाने वाला लगेगा तब वे लोभवश इसकी ओर सहज ही आकृष्ट होंगे तथा दुरुहता जान पड़ने के कारण माध्यम बनेंगे आज के तथाकथित धार्मिक संगठन व उनसे सम्बद्ध व्यवसायिक धर्मगुरु। सच में आज धार्मिक संगठनों व धर्मगुरुओं ने धर्म की ही कुछ विशिष्टताओं (जैसे - धर्म का अनुभूतिजन्य होना) का लाभ उठा कर स्वयं को बहुत अधिक उन्नत यहाँ तक कि साक्षात् ईश्वर प्रचारित करना आरम्भ कर दिया है। आम लोगों को भौतिक व मानसिक लाभ का लालच देकर मन्त्र, दीक्षा व अनेक प्रकार की सामग्रियाँ जैसे - तेल, साबुन, शैंपू, मंजन; गृह-शांति व धन-वृद्धि हेतु अत्यधिक मंहगे तावीज, पत्थर, कवच आदि विक्रय करना आरम्भ कर दिए हैं। किस प्रकार पूरी तरह से व्यवसायिकता पर उतर आये हैं ये तथाकथित धर्मगुरु, यह सब लोग जानते हैं, पर निज लोभवश व सामाजिक लोक-लाज के भयवश लोग अज्ञान के पाश में जकड़े हैं, सम्मोहन की अवस्था में हैं। और तथाकथित धर्मगुरु उनकी इसी अवस्था का लाभ उठा कर स्वयं व अपने संगठन को मालामाल कर रहे हैं। सम्मानीय व्यापार का माध्यम बन गया है धर्म। कदाचित् धर्म व ईश्वर की इससे बड़ी विडम्बना नहीं हो सकती।

वैसे अपवाद तो सदैव होते हैं, पर सामान्यतः पूर्वकाल में धर्मगुरु व्यावसायिक दृष्टिकोण वाले नहीं होते थे। बहुत अधिक अतीत में न जाकर कुछ पीछे ही देखें तो हमें समर्थ रामदास, स्वामी रामकृष्ण, व आर्य चाणक्य जैसे श्रेष्ठ गुरु दीखते हैं, जिन्हें स्वार्थ, धन-लोलुपता व सांसारिक यश का लोभ छू तक नहीं गया था। इनमें से दो गुरुओं के शिष्य तो महान राजा हुए और वे अपना सर्वस्व अपने गुरु पर न्योछावर करने को सदैव तत्पर थे, परन्तु उनके गुरुओं ने कभी भी भौतिक लोभ को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और राजसी सुख की उपलब्धता होते हुए भी अतिसाधारण जीवन व्यतीत कर श्रेष्ठ गुरु का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया। सच्चा धर्मोपदेशक या गुरु पद का व्यक्ति वास्तव में सभी प्रकार के भौतिक वैभव से सर्वथा परे होता है या किसी सहज वैभव को अपनाते हुए भी वह अन्य आकांक्षाओं, लोलुपताओं आदि से स्वयं व निज संगठन को परे रखता है तथा सुख-सामग्रियों के अभाव से कभी भी तनिक सा भी परेशान नहीं होता है।

परन्तु आज के धर्मगुरुओं को देखिये -- पूरी तरह से व्यावसायिक हो गए हैं। टेलीविजन के कम से कम सात-आठ चैनलों पर २४ घंटे लगातार होने वाला प्रसारण इन्हीं की कृपा से संभव हो पा रहा है। वातानुकूलित स्टूडियो में, सज-धज कर, डिजाइनर परिधान धारण कर, बढ़िया से आसन पर विराजित हो, फूल-माला लगे माइक्रोफोन पर जब ये लच्छेदार भाषा में अपना सम्मोहित कर देने वाला प्रवचन देते हैं तो देखते ही बनता है। मानों देवता पुष्प-वर्षा कर रहे हों। भौतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है, वातानुकूलित गाड़ियाँ हैं, वैभवशाली मठ हैं, आश्रम हैं, अधिकांशतः हवाई यात्रा करते हैं। बहुत सी भौतिक वस्तुओं का उत्पादन भी करते हैं या बाहर किसी से बनवाकर अपना ठप्पा लगा कर विक्रय करते हैं, वह भी बिना किसी उत्पादन-कर के, क्योंकि उत्पाद तो साधकों हेतु ही बनाए जाते हैं, विक्रय हेतु नहीं (?), ऊपर से जो चढ़ावा आता है सो अलग। कुम्भ या अन्य किसी अवसर पर जब प्रयाग, काशी या हरिद्वार में अस्थायी रूप से निवास करना पड़ता है तो इन तथाकथित धर्मगुरुओं के लिए अस्थाई मगर पक्की 'अटैच लैट्रिन-बाथरूम के साथ टाईल युक्त वातानुकूलित कुटियाएँ' बनाई जाती हैं। मात्र कुछ दिन के प्रवास हेतु लाखों रुपया फूंक दिया जाता है। रहन-सहन की प्रणाली में परिवर्तन व साफ़-सफाई से रहना कोई गलत बात नहीं, यह ठीक है, पर इन सब के प्रति आसक्ति भाव के कारण अनावश्यक व्यय व दिखावा निंदनीय है।

यहाँ एक बात मैं अच्छे से स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं मात्र इन सब कृत्यों के विरोध में यह सब नहीं लिख रहा हूँ वरन इन कृत्यों के पीछे का मंतव्य ही विरोध-केंद्र है मेरा। ... और वर्तमान धर्मगुरुओं के असली मंतव्य से आप सब भली-भांति परिचित हैं पर लोभवश, भयवश उसे मानना नहीं चाहते। आपकी इसी मानसिक दुर्बलता व विकलांगिता का लाभ ही वे उठा रहे हैं। विज्ञान व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास का धर्म के क्षेत्र में आज जम कर दुरुपयोग हो रहा है। उथली (सतही) सकाम-भक्तियुक्त भक्तों (तीव्र-आसक्त भक्तों ) की भीड़ से धार्मिकता की सूजन निरंतर बढ़ती जा रही है। ... कारण हैं - तीव्र आसक्तियुक्त आज के अधिकाँश धर्मगुरु। .. मेरे विचार से धर्म बिकाऊ नहीं होता। धर्म-शिक्षा में दिया ही जाता है, लिया नहीं जाता। खरा गुरु जीवन-यापन हेतु धर्म का व्यापार नहीं करता। जीवनयापन हेतु न्यूनतम आवश्यक वस्तुएं स्वतः ही बिना किसी विशेष प्रयास के प्राप्त हो जाती हैं, यदि ऐसा नहीं भी होता है तो खरा धर्म-शिक्षक कबीर की भांति जुलाहे का, ईसा मसीह की भांति बढ़ई का, जैसे कार्य करने में कोई संकोच नहीं करेगा। जन कल्याण हेतु धर्म-शिक्षा अर्थात् 'धर्म' हेतु ही धर्म-शिक्षा तथा भौतिक शरीर की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किसी व्यवसाय / नौकरी आदि के बीच किसी प्रकार का कोई टकराव नहीं होता। हाँ इतना निश्चित है कि सच्चा धर्म-शिक्षक सांसारिक यश व धन का भूखा नहीं होता और अनावश्यक संग्रह व खर्च में उसकी कोई रुचि नहीं होती। उसकी आवश्यकताएं सीमित होती हैं और वह दिखावों से बिलकुल परे रहता है।

क्या वर्तमान में ऐसा कोई प्रसिद्ध गुरु या धर्म-शिक्षक आपकी दृष्टि में है जो इन सब गुणों से संपन्न हो। संभवतः नहीं। क्योंकि आज के धर्म-शिक्षक धर्मशिक्षा को व्यापार व यश का माध्यम या कम से कम वैयक्तिक यश का साधन तो मानते ही हैं। तो सम्बंधित आसक्तिवश वे निज स्वार्थपूर्ति में लिप्त हैं। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं कि उनके कृत्यों से धर्म व स्वयं उनके आध्यात्मिक संचित की कितनी हानि हो रही है। उन्हीं के कृत्यों के कारण आज आम लोग धर्म के खरे स्वरूप से परे जाते जा रहे हैं व धर्म के अन्य छद्म रूपों की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। यथार्थ तो यही है कि वर्तमान धर्मगुरुओं के पूर्वकर्मों का यह सुन्दर फल है कि आज उन्हें धर्म-शिक्षक जैसा उच्च पद प्राप्त हुआ है, इतने लोग उनको सुनते हैं, उनके अनुयायी हैं। विरलों को यह सौभाग्य प्राप्त होता है। ... परन्तु कदाचित् उनके वर्तमान कर्म उस सुन्दर फल में वृद्धि करने वाले प्रतीत नहीं हो रहे हैं। ईश्वर उनको सद्-बुद्धि प्रदान करे जिससे वे स्वयं के वर्तमान क्रियमाण को शोधित-संशोधित व परिष्कृत कर वास्तव में ईश्वर के कार्य में सहभागी बनें। उनके श्रेष्ठ संवाहक बनने पर ही हमारे संघ की शीघ्र उन्नति सम्भव होगी व नैतिक मूल्यों का पुनः उत्थान होगा। उदाहरण के लिए ऊपर उल्लेखित तीन खरे गुरुओं के मात्र एक-एक शिष्य (शिवाजी, विवेकानंद व चन्द्रगुप्त) समाज हित में बड़ा कार्य करने में समर्थ हुए थे। उन शिष्यों ने व उनसे भी बढ़कर उनके गुरुओं ने स्वयं को छोटा (नम्र व अनासक्त) बनाये रखा, तब ही ईश्वर ने उनको बड़ा किया अर्थात् उनके माध्यम से बड़ा कार्य करवाया। इति।

Sunday, May 10, 2009

(१५) मन

हमारे पूर्व अध्ययन के अनुसार हमें ज्ञात हुआ था कि अविनाशी आत्मा न केवल हमारा ऊर्जा-स्रोत है, वरन हमारा सच्चा ज्ञान-स्रोत भी है। फिर भी हमें इस आत्मा से ज्ञान-प्रकाश नहीं मिल पाता है, क्योंकि इस आत्मा के प्रकाश-पुंज के चारों ओर "अविद्या" का आवरण है। "अविद्या" के प्रमुख घटक हैं -- मन (वाह्यमन), चित्त (अंतर्मन), विभिन्न संस्कार (विचार-केन्द्र), वृत्ति, बुद्धि, व अहं।

साधारण भाषा में जिसे हम 'मन' कहते हैं, वह दो भागों में बँटा है - (१) वाह्यमन, (२) अंतर्मन या चित्त। वाह्यमन का आकार छोटा व अंतर्मन (चित्त) का आकार अपेक्षाकृत काफी बड़ा होता है। वर्तमान काल में सामान्य व्यक्ति की कर्मेन्द्रियों द्वारा किये जाने वाले अधिकांश कार्य अविद्या के घटक 'मन' के निर्देशानुसार ही होते हैं। अविद्या के घने आवरण के कारण आत्मा से निर्देश-स्पंदन कर्मेन्द्रियों तक जा ही नहीं पाते। तो फिर मन से हमारी कर्मेन्द्रियों को कार्य करने का निर्देश कैसे जाता है?, वह इस प्रकार -

क्रिया का स्वरूप --
(१) बाहर से स्पंदन ज्ञानेन्द्रियों (आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा) के माध्यम से अंतर्मन में जाते हैं (वाह्यमन से होते हुए)। इन्हें सूचना स्पंदन कह सकते हैं।
(२) स्पंदन भीतर पहुँचने पर तदनुसार अंतर्मन में "संस्कार" (impression) बनता है (संस्कार पहले से भी हो सकता है)।
(३) अंतर्मन में बने संस्कार से पुनः स्पंदन (विचार) वाह्यमन में जाते हैं। इन्हें क्रिया-विचार स्पंदन कह सकते हैं।
(४) क्रिया-विचारों के वाह्यमन में पहुँचने के बाद, तदनुसार यहाँ से कर्मेन्द्रियों को कार्य हेतु निर्णायक निर्देश जाता है। और फिर उन्हीं निर्देशों के अनुसार कार्य होता है।

हमारे अंतर्मन में अनेक छोटे-बड़े संस्कार हैं, लगातार कुछ नए भी बनते रहते हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी कार्य के लिए जिम्मेदार संस्कार, उस कार्य के समाप्त होने के बाद नष्ट नहीं होता; तथा बाद में जब-जब उस संस्कारानुरूप स्पंदनों का आदान-प्रदान पुनः होता है, तो वह संस्कार और भी अधिक बड़ा हो जाता है।

अंतर्मन में जिन संस्कारों का प्रभुत्व (अधिकता) होता है, उनके गठजोड़ को ही हम "वृत्ति" कहते हैं या हम यह कह सकते हैं कि 'वृत्ति' बड़े संस्कारों पर निर्भर करती है। अब यदि बड़ा संस्कार ईश्वरीय (सात्त्विक) होगा तो तदनुसार वृत्ति भी सात्त्विक होगी। अर्थात् वृत्ति, हमारे अंतर्मन के बड़े संस्कारों से ही बनती है।

"चित्त" (अंतर्मन) का कार्य है - नए "संस्कार" बनाना या/और संस्कारों में से अनेक विकल्प (options) खोजना/सुझाना, और "बुद्धि" का कार्य है - योग्य निर्णय लेना अर्थात् उन विकल्पों में से किसी एक को चुनना, तदुपरांत उस चुने हुए विकल्प को "वृत्ति" की सहमति से 'वाह्यमन' में भेजना। बुद्धि, 'वृत्ति' के ऊपर निर्भर करती है। अंततः "वाह्यमन" से कर्मेन्द्रियों को कृत्य हेतु निर्णायक निर्देश जाता है।

अब हम यह सोचेंगे कि यदि हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों से काम लेना बंद कर दें यानी आँख, कान, नाक आदि बंद कर लें, तो क्या किसी कार्य के लिए विचार नहीं आयेंगे? ... विचार तो अब भी आयेंगे, क्योंकि अब वे अंतर्मन में विद्यमान संस्कारों (impressions) से आ रहे हैं। उपरोक्त घटकों के कारण अविद्या का अंतिम महत्त्वपूर्ण घटक "अहं" बना, अर्थात् इन उपर्लिखित घटकों को ही सर्वस्व व अपना मानना और इनके कारण ही स्वयं को परमात्मा से भिन्न मानना।

तो उपरोक्त अध्ययन से हमारी समझ में एक नयी बात यह आयी कि किसी भी कृत्य के लिए अंतर्मन से वाह्यमन में जाने वाले निर्देशों पर 'वृत्ति' का नियंत्रण होता है; वृत्ति द्वारा नियंत्रण यानी बड़े संस्कार का प्रभाव। अतः हमने यह पाया कि अंतर्मन में विद्यमान बड़े संस्कारों का प्रभाव 'वृत्ति' पर, तदनुसार हमारी प्रत्येक क्रिया पर पड़ता है। अब यदि वह बड़ा संस्कार ईश्वरीय गुणों का होगा तो हमारे कार्य स्वतः अच्छे ही होंगे। अब तक के विश्लेषणों से, अब मन की गतिविधियों व हमारे कृत्यों के क्रमबद्ध कारण व चरण निम्नलिखित हैं --

(१) बाहर से सूचना-स्पंदन ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से वाह्यमन में से होते हुए अंतर्मन में जाते हैं।
(२) स्पंदन भीतर पहुँचने पर तदनुसार अंतर्मन में "संस्कार" (impression) बनता है, यदि वह संस्कार पहले से है तो वह संस्कार कुछ और बड़ा होता है।
(३) अंतर्मन में बने संस्कार से या अन्य संस्कारों से क्रिया-विचार स्पंदन निर्माण होते हैं। बुद्धि इनमें से एक या अधिक विकल्प चुनती है, तदुपरांत चुने हुए विचार निर्णायक अनुमोदन हेतु 'वृत्ति' के पास जाते हैं। यदि ये वृत्ति के अनुरूप हुए, तो पुनः ये स्पंदन (विचार) 'वाह्यमन' में जायेंगे अन्यथा वहीं नष्ट हो जायेंगे।
(४) क्रिया-विचारों के वाह्यमन में पहुँचने के बाद, तदनुसार वहां से कर्मेन्द्रियों को कार्य हेतु निर्णायक निर्देश जाता है। और फिर उन्हीं निर्देशों के अनुसार कर्मेन्द्रियों के माध्यम से कार्य होता है।

अर्थात् हमारे समस्त कृत्य अंतर्मन से आने वाले विचारों तदनुसार वाह्यमन में निर्मित निर्णायक निर्देशों के अनुसार ही होते हैं। अर्थात् कोई भी कार्य हम अंतर्मन की सहमति के बिना, अपितु वृत्ति की सहमति के बिना नहीं कर सकते।

नयी वृत्ति कैसे बनती है या वृत्ति कैसे बदलती है?
त्रिगुणों में से जिस गुण के संस्कार व्यक्ति के मन में सबसे अधिक होंगे, व्यक्ति की वृत्ति वैसी ही होगी या त्रिगुणों में जिस गुण के अनुरूप संस्कार सबसे बड़ा होगा, उसी संस्कार का मन पर आधिपत्य होगा। कर्मेन्द्रियाँ, यहाँ तक कि ज्ञानेन्द्रियाँ भी यथासाध्य उसी के अनुसार ही कृत्य करेंगी। इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ लगभग पूरी तरह से वृत्ति पर, या कृत्य वृत्ति पर निर्भर है। परन्तु ज्ञानेन्द्रियाँ फिर भी पूरी तरह से मन के अधीन नहीं हैं, यदि हैं भी तो एक सीमा तक ही (आँख, नाक, कान आदि कब तक बंद रखे जा सकते हैं?)। अतः ज्ञानेन्द्रियाँ वाह्य स्पंदनों को अंतर्मन तक पहुंचाती अवश्य हैं; पहुंचेंगे तो नया संस्कार बनेगा ही, या यदि पहले से है तो थोड़ा सा और बड़ा होगा। पर अभी यह नया संस्कार इतना बड़ा नहीं हो पाया है कि इस संस्कारानुसार कृत्य संभव हो सके। पर धीरे-धीरे वह प्रसंग बार-बार सामने आने पर ज्ञानेन्द्रियाँ उस प्रसंग के स्पंदन बार-बार अंतर्मन तक पहुंचाती रहती हैं और प्रत्येक बार सम्बंधित स्पंदन अंतर्मन तक पहुँचने पर वह नया संस्कार बड़ा होता जाता है। एक दिन वह इतना बड़ा हो जाता है कि वह पुराने बड़े संस्कार से भी बड़ा हो जाता है। ऐसा हो जाने पर व्यक्ति की वृत्ति उस नए व सबसे बड़े संस्कार के अनुरूप हो जाती है। तदुपरांत व्यक्ति की कर्मेन्द्रियों को नयी वृत्ति के अनुरूप ही निर्देश जाते हैं और तदनुसार व्यक्ति के कृत्य भी बदल जाते हैं। कुछ इसी प्रकार से ही सत्संग या योग्य मार्गदर्शन द्वारा हमारे मन में नामजप या ईश्वरीय गुणों का संस्कार बनता है, बढ़ता है, और एक दिन इतना बड़ा हो जाता है कि पूरे मन पर आधिपत्य कर लेता है। तब मनानुसार ही सही, पर कम से कम हमारे अधिकांश कार्य यथासंभव अच्छी प्रकृति के तो होने ही लगते हैं।

आगे का स्तर
यथोचित साधना से जब एक बड़ा सा ईश्वरीय संस्कार हमारे अंतर्मन में बन जाता है तो आगे के स्तर पर अन्य सभी संस्कार एक-एक करके नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार अंतर्मन में केवल ईश्वरीय गुणों का संस्कार ही शेष रह जाता है। साधना और बढ़ने पर यह संस्कार इतना बलिष्ठ हो जाता है कि ज्ञानेन्द्रियों से आने वाले अन्य स्पंदन (ईश्वरीय गुणों के विपरीत स्पंदन) वाह्यमन तक पहुँचते तो अवश्य हैं, परन्तु वहीं पर नष्ट हो जाते हैं; वे अंतर्मन में प्रविष्ट हो ही नहीं पाते। वाह्यमन और अंतर्मन के बीच की दीवार (परत) गर्म तवे के समान हो जाती है, उस पर पड़ते ही या छूते ही अवांछित स्पंदन तुरन्त वाष्पित हो जाते हैं। तो स्थिति अब यह हो गयी कि, ज्ञानेन्द्रियाँ अब भी स्वतंत्र हैं स्पंदन ग्रहण करने के लिए, मन तक भेजने के लिए; परन्तु अंतर्मन तक अब केवल योग्य स्पंदन ही जा पा रहे हैं। कर्मेन्द्रियाँ तो पहले भी और अब भी अंतर्मन या वृत्ति के अधीन ही हैं और वृत्ति तो अब अति सात्त्विक है, तो स्पष्ट हो जाता है कि कर्मेन्द्रियों द्वारा अब केवल अच्छे कार्य ही संपादित होंगे। ईश्वर का संस्कार मनुष्य की वृत्ति, विचार और कृत्य ऐसे ही बदलता है।

पुनरवलोकन
हममें से कुछ लोग जब बुद्धि का प्रयोग कर मनन करेंगे व निष्कर्ष निकालेंगे तो वे यह कह सकते हैं कि नया (ईश्वरीय) संस्कार बनने के लिए बार-बार नामजप करना या सत्संग में जाना या धार्मिक पुस्तकें पढ़ना आदि, ये सब भी तो कृत्य ही हैं, और पहले के अध्ययन / मनन के अनुसार सभी कृत्य तो 'वृत्ति' के अधीन हैं; तो फिर नया संस्कार बनने के लिए आवश्यक ये कृत्य हो पाना कैसे सम्भव होगा? ... इसका उत्तर यह है कि, जिसकी वृत्ति बिलकुल ही आसुरी (तामसिक) होगी, उसके लिए उपरोक्त कृत्यों के लिए तैयार हो पाना लगभग असम्भव ही या अत्यंत दुरूह होगा, परन्तु बहुधा यह पाया जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति की वृत्ति में कुछ न कुछ सात्त्विक गुण तो पहले से विद्यमान रहते ही हैं, भले ही वे सुप्तावस्था में क्यों न हों! गुरु या मार्गदर्शक मानव के उन सुप्त सात्त्विक गुणों को संकल्प, सम्पर्क या सत्संग द्वारा जगाते हैं। वृत्ति का यह कोमल कोना (soft corner) तब कर्मेन्द्रियों को इतनी छूट दे देता है कि हमारा नामजप, सत्संग आदि यंत्रवत ही आरम्भ हो जाता है, यदाकदा ही सही। तो इस क्रिया से अंतर्मन में एक नया संस्कार (ईश्वर का) बन ही जाता है। परन्तु वृत्ति तो इसके विपरीत है; वह इस संस्कार को कोई स्पंदन पुनः अंतर्मन से वाह्यमन में नहीं भेजने देती अर्थात् प्रारंभ में अन्य सात्त्विक कृत्य हम नहीं कर पाते। पर संतोष की बात यही है कि वृत्ति हमें कर्मेन्द्रियों से कार्य करने की "कुछ छूट" तो कम से कम दे ही रही है। फिर वही, पहले बताये क्रम के अनुसार ही सब कुछ होता है। सत्संग, नामजप आदि यंत्रवत, यदाकदा करने से ही उनका संस्कार अंतर्मन में बनता है; फिर धीरे-धीरे वह बड़ा हो जाता है, और एक दिन इतना बड़ा हो जाता है कि अन्य सभी संस्कार उसके सामने छोटे (गौण) हो जाते हैं। तब यह संस्कार ही हमारी वृत्ति बन जाता है। इस प्रकार वृत्ति में परिवर्तन होता है।

वृत्ति बदलने के अन्य उपाय
अन्य उपायों में सबसे प्रमुख व अलग सा उपाय है - "हठयोग" द्वारा। ... प्रत्येक व्यक्ति में सत्त्व, रज, तम तीनों गुण होते ही हैं, परन्तु इनका प्रतिशत प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न-भिन्न होता है। तीनों में जिस गुण का प्रभाव जिस क्षण सबसे अधिक होता है, हमारी वृत्ति, तदनुसार कृत्य, वैसा ही होता है। वृत्ति के मूल गुणों के विपरीत कुछ कार्य करना ही "हठयोग" है। आगे हम देखेंगे कि वृत्ति के विपरीत क्रिया करने (हठयोग) से वृत्ति में बदलाव कैसे आता है --

मान लीजिये कि हमारे भीतर बहुत सारे दोष हैं और हम उनको एक-एक करके दूर करना चाहते हैं। हमारे भीतर साधना का एक भी संस्कार नहीं है; वह हम बनाना चाहते हैं। परन्तु हमारी वृत्ति तो ऐसी है कि वह हमसे बुरे कार्य ही करवा रही है और साधना भी नहीं करने देती। तो बदलाव की क्रिया कैसे आरम्भ होती है? वह ऐसे --

यदि हमें अपने दोषों के बारे में पहले से पता है और हम इनको गलत समझते ही हैं तथा साधना करने के भी इच्छुक हैं, तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि हमारे भीतर अच्छाई का व साधना का तत्व या संस्कार पहले से ही विद्यमान है। क्योंकि इस प्रकार का कोई विचार मन में आने का मतलब ही यही हुआ कि उपरोक्त दोनों अच्छे संस्कार पहले से हैं ही। यदि उपरोक्त विचार (बुराइयाँ त्यागने के व साधना करने के) किसी सात्त्विक व्यक्तित्व से मिलने के पश्चात् या सत्संग आदि में जाने के बाद मन में आये, तो भी समझिये कि इनका छोटा सा संस्कार मन में बन ही गया। अब आवश्यकता है इसको बड़ा करने की, जिससे उपरोक्त दोनों कृत्य संभव हो सकें (व्यसन त्याग व साधना )। अगला चरण -- यह कि हम 'हठयोग' द्वारा वृत्ति के विपरीत जा कर उपरोक्त दोनों क्रियाएं करना आरम्भ कर देते हैं, तो धीरे-धीरे अच्छाइयों का (अर्थात् बुराई त्यागने का) व साधना का, दोनों संस्कार बढ़ने लगते हैं और एक दिन इतने बड़े हो जाते हैं कि बुरे संस्कार उनके सामने गौण हो जाते हैं। इस प्रकार वृत्ति बदलती है और बुद्धि भी सात्त्विक हो जाती है।

परन्तु अब प्रश्न यह उठता है कि हठयोग की क्रिया या हठयोग द्वारा वृत्ति के विपरीत क्रिया सम्भव कैसे हुयी? क्योंकि पहले के विश्लेषणों से तो यह पता चलता है कि प्रत्येक कृत्य के पीछे वृत्ति है। तो इस "वृत्ति विपरीत कृत्य" के सम्भव हो पाने का कारण और प्रक्रिया इस प्रकार से है --

यदि हममें पहले से ही साधना करने की चाह है या किसी के मार्गदर्शन के फलस्वरूप यह चाह उत्पन्न हुयी, तथा व्यसन त्यागने की भी चाह है - अर्थात् अपनी बुराइयों का भान हुआ है, तो इन सब बातों का यह अर्थ हुआ कि हमारी आत्मा पर पड़ा हुआ अविद्या और माया का जाल कहीं से तो टूट गया है या उसमें कोई छिद्र हो गया है। इस घोर कलियुग में इस प्रकार का विचार (बुराई त्यागने का व साधना करने का) मन में आना अर्थात् प्राथमिक स्तर की अनुभूति। अनुभूति आत्मिक ही होती है। इस प्रकार के विचार या अनुभूति से आत्मा की शक्ति अर्थात् आत्मबल बढ़ा। इस बढ़े हुए आत्मबल ने वृत्ति में विद्यमान सत्त्व अंश व अंतर्मन में विद्यमान अन्य छोटे-छोटे सात्त्विक संस्कारों का एकत्रीकरण किया और वृत्ति के मूल गुण के विपरीत क्रिया करने का निर्देश वाह्यमन में भेजना आरम्भ किया। इस क्रिया में मन में अत्यधिक अंतर्द्वंद होता है; अंततः शक्तिशाली की जीत होती है, परन्तु यह जीत टिकाऊ (स्थाई) नहीं होती। अतः हठयोग द्वारा हम बुरे व्यसन छोड़ते हैं व साधना भी करते हैं; परन्तु कम समय के लिए। जब-जब आत्मिक बल पराजित होता है, बुरी वृत्ति हावी होती है; तब-तब साधना छूटती है व पुनः बुराइयों में फंसते हैं। परन्तु कभी-कभी आत्मिक बल जीतता भी है। तो इस प्रकार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में व्यसन त्याग व साधना के कृत्य होते रहते हैं। हठयोग द्वारा बारम्बार ऐसा होते रहने से धीरे-धीरे ईश्वरीय संस्कारों का आकार बढ़ने लगता है और अंततः एक दिन हमारी वृत्ति ईश्वरीय गुणों के अनुरूप हो जाती है। यद्यपि हठयोग से फल की प्राप्ति (वृत्ति परिवर्तन) सम्भव हो सकती है, फिर भी कदाचित् यह सबके लिए सम्भव नहीं है। साधारण मनुष्य अधिक मानसिक द्वंद नहीं झेल सकता। अतः वृत्ति बदलने के लिए पहले वाला तरीका अर्थात् नियमित रूप से सत्संग में रहना अर्थात् आध्यात्मिक लोगों से मित्रता बढ़ाना, उनकी संगति में अधिकाधिक रहना, आध्यात्मिक ग्रंथों को पढ़ना आदि ये सब कृत्य करना सर्वप्रथम आवश्यक है और वृत्ति इसके लिए छूट भी दे रही है। इसके साथ ही यदि 'हठयोग' द्वारा भी ये सब कृत्य किये जायें, तो यह अतिरिक्त प्रयास हुआ; इससे ईश्वरीय गुणों का संस्कार शीघ्र उन्नत होगा, फलस्वरूप वृत्ति में परिवर्तन शीघ्र आयेगा, हमारी आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र होगी। इस प्रकार अपने सामर्थ्य के अनुसार 'हठयोग' द्वारा किया गया अतिरिक्त प्रयास (अधिक क्रियमाण) हमारी शीघ्र प्रगति होने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

साधना के अगले चरणों में माया (अविद्या) का आवरण झीना व पारदर्शी होता जायेगा, फलतः हमें आत्मिक प्रकाश की अधिकाधिक प्राप्ति होती जायेगी। आज के समय में यदि व्यावहारिकता एवं आध्यात्मिकता में सामंजस्य बैठाना हो तो आवश्यकता है कि साधना द्वारा किसी प्रकार से वृत्ति का नाश करके (विचारों या विचार-केन्द्रों का नहीं) उसका स्थान आत्मा (धर्म) ले ले। तब मन के प्रत्येक विचार के अनुरूप कृत्य के संपादन से पूर्व आत्मा से अनुमति लेना आवश्यक होगा और आत्मा तो सदैव धर्मानुकूल कृत्य हेतु ही अनुमति देगी। इति।