Saturday, November 27, 2010

(४२) सर्व साधकों को चाहिए कि ... (भाग २)

प्रथम भाग से आगे --

(१) साधकों को सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि उनकी आत्मशक्ति भी विश्व के महानतम महापुरुषों के समतुल्य ही है। दृढ़ निश्चय, अनुशासन, उत्साह और समर्पणभाव से साधना करने पर अंतर्मन साफ़ होता जायेगा और आत्मिक शक्ति प्रकट होती जायेगी।

(२) साधक का प्रमुख लक्ष्य 'योग' है, 'योग' अर्थात् ईश्वर के साथ बिलकुल जुड जाना, एक हो जाना, आत्मा के सच्चे स्वरूप को पा लेना, आत्मस्थ हो जाना। इसके लिए हमारे प्रयत्न जिस क्रिया के साथ जुड़ते हैं, वही योग बन जाता है। उदाहरणार्थ- कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग, सांख्ययोग, राजयोग, मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग आदि। हमारे पूर्व व वर्तमान संस्कारवश जिसमें हमारी रुचि हो, प्रथमतः उसी को ईश्वरप्राप्ति का मार्ग मानकर सादर ग्रहण करना चाहिए।

(३) आगे ध्यान देने की बात यह है कि उपरोक्त योगमार्गों में भक्तियोग, ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोग को छोड़कर अन्य योगमार्गों में शारीरिक क्रियाओं अथवा मन्त्र-तन्त्रादि का अत्यधिक समावेश है। इनमें बहुत से विधि-निषेध लागू होते हैं और ये योगक्रियाएं बिना योग्य मार्गदर्शन के करना खतरे से खाली नहीं, लाभ के बजाय हानि संभव है। अर्थात् इनके लिए योग्य सगुण गुरु की आवश्यकता होती है, और इनका आज कितना अभाव है यह सब जानते ही हैं। अतः भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग जैसे अपेक्षाकृत सरल योगमार्ग चुनना अधिक श्रेयस्कर रहेगा।

(४) वैसे तो भक्तियोग, ज्ञानयोग तथा कर्मयोग आदि मार्गों में भी पथप्रदर्शकों की आवश्यकता रहती ही है, परन्तु फिर भी इन मार्गों में इतनी तो सरलता है ही कि आजकल के पाखंडी और दिखावटी गुरुओं की शरण में जाये बिना 'गीताप्रेस' सरीखे प्रकाशनों के निर्मल साहित्य को पढ़कर, उनसे प्रेरित होकर, अपने शुद्ध मनन, दृढ़ निश्चय, श्रद्धा, भक्ति, शरणागति, सदाचरण आदि के योग द्वारा मजबूत क़दमों से आगे बढ़ा जा सकता है। किसी ढोंगी स्वयंभू गुरु की शरण लेना या सच्चे गुरु से मिलन की प्रतीक्षा में यूँ ही बैठे रहना ठीक नहीं।

(५) साधकों को विभिन्न योगमार्गों पर चलने से मिलने वाली तथाकथित सिद्धियों के प्रलोभन में कतई नहीं पड़ना है। सबसे सच्ची सिद्धि तो अंतःकरण की वह शुद्ध स्थिति है, जिसमें भगवान के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं रह जाता। यह अत्यंत दुःखद है कि आज अधिकांश गुरु और उनके अनुयायी रिद्धि-सिद्धि या सांसारिक अभिलाषाओं के निमित्त ही एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, यह सब जानते हैं। साधक इनसे बचें।

(६) जबकि हमको पता है कि सभी साधनों अर्थात् योगमार्गों का लक्ष्य मोक्ष (सर्वोच्च आनंद की सतत अनुभूति) है और योग्य मार्गदर्शक की अनुपस्थिति में रुकने, फिसलने या गिरने का भय है, तो फिर बिलकुल निरापद स्थिति यह होगी कि हम तत्त्व या सिद्धांत के प्रति अपनी शरणागति बढ़ाएं। तत्त्व या सिद्धांत के प्रति अपनी शरणागति बढ़ाना अर्थात् वेदान्त, गीता आदि में प्रतिपादित अकाट्य आध्यात्मिकी सिद्धांतों पर पूर्ण निष्ठा।

(७) जब हम अक्षुण्ण आत्मा-परमात्मा, पुनर्जन्म, कर्मफल, प्रारब्ध आदि आध्यात्मिकी सिद्धांतों पर इनसे मिलते-जुलते भौतिकी सिद्धांतों जैसे ऊर्जा की अक्षुण्णता, ऊर्जा का किसी अन्य रूप में रूपान्तरण, क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया आदि की भांति ही अनन्य विश्वास करते हैं, और इन्हें जीवनचक्र से पूरी तरह जोड़कर अनुभूत करते हैं तो हम देखते हैं कि जीवन की अनेकों गुत्थियां सुलझने लगती हैं।

(८) उपरोक्त सिस्टम पर अर्थात् सृष्टि सम्बन्धी अकाट्य सिद्धांतों पर पूर्ण आस्था का भाव स्थापित होते ही हम स्वतः सही मायनों में 'धार्मिक' (righteous) हो जाते हैं, स्वतः ही योग्य पथ पर चलते हैं, उचित निर्णय लेते हैं, हममें निर्भयता आ जाती है और निराशा का हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं रहता। हमारा पूरा नजरिया ही बदल जाता है। रोजमर्रा के काम से विरक्त हुए बिना, सब कुछ करते हुए भी हममें आश्चर्यजनक संतुलन आ जाता है। अनुकूलता में हम अतिउत्साहित नहीं होते और प्रतिकूलता में हताश नहीं होते।

(९) उपरोक्त कथित संतुलन ही हमें मानव देह में रहते हुए मोक्ष को प्राप्त कराता है। मोक्ष अर्थात् सतत रहने वाली सर्वोच्च आनंदानुभूति अर्थात् आत्मानुभूति ही।

(१०) फिर से कहूँगा कि इस स्थिति के निर्माण के लिए साधकों को स्थूल-निष्ठा त्यागकर तत्त्व-निष्ठावान बनना होगा। तत्त्व सूक्ष्म है और तत्त्व ही यथार्थ है। स्थूल में विकार आ सकते हैं, सूक्ष्म में नहीं। सिद्धांत बताने वाले में विकार संभव है, सिद्धांत में नहीं। अतः सिद्धांत को समझकर उसके प्रति पूर्ण विश्वास उपजाने की साधना सर्वप्रथम करें, फिर सबकुछ स्वयं होता चला जायेगा। सांसारिक धन, यश या सम्मान के अभिलाषी दम्भी गुरुओं से दूर रहकर भी यथार्थ धर्म (righteousness) और उसपर आधारित अर्थ, काम, मोक्ष आदि को पाना सभी के लिए संभव है।
(क्रमशः)

Thursday, November 25, 2010

(४१) अवसाद (डिप्रेशन)

आज अवसाद (डिप्रेशन) शब्द से लगभग सभी लोग परिचित हैं, और साथ ही एक बड़ी संख्या में लोग इसका शिकार भी हैं। अवसाद, हताशा, उदासी, गहरी निराशा और इनसे सम्बंधित रोग चिकित्सीय जगत में मेजर डिप्रेशन (Major depression), डिस्थाइमिया (Dysthymia), बायपोलर डिसऑर्डर या मेनिक डिप्रेशन (Bipolar disorder or manic depression), पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum depression), सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर (Seasonal affective disorder), आदि नामों से जाने जाते हैं। वैसे हर किसी के जीवन में ऐसे पल आते हैं, जब उसका मन बहुत उदास होता है। इसलिए शायद हर एक को लगता है कि हम गहरी निराशा के विषय में सब कुछ जानते हैं। परन्तु ऐसा नहीं है। कुछ के लिए तो यह निराशावादी स्थिति एक लंबे समय के लिए बनी रहती है; जिंदगी में अचानक, बिना किसी विशेष कारण के निराशा के काले बादल छा जाते हैं और लाख प्रयासों के बाद भी वे बादल छंटने का नाम नहीं लेते। अंततः हिम्मत जवाब दे जाती है और बिलकुल समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों हो रहा है। इन परिस्थितियों में जीवन बोझ समान लगने लगता है और निराशा की भावना से पूरा शरीर दर्द से कराह उठता है। कुछ का तो बाद में बिस्तर से उठ पाना भी लगभग असंभव सा हो जाता है। इसलिए प्रारंभिक अवस्था में ही इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह व्यक्ति हद से ज्यादा उदासी में न डूब जाये। समय रहते लक्षणों को पहचान कर किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से तुरंत परामर्श लेना चाहिए व तदनुसार इलाज करवाना चाहिए। डिप्रेशन के प्रकारानुसार एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली में अवसादरोधी दवाओं (Antidepressant medications), साइकोथेरेपी (Psychotherapies), विद्युत-आक्षेपी थेरेपी (Electroconvulsive therapy) आदि माध्यमों से चिकित्सा की जाती है। डॉक्टर के परामर्श के अनुसार दवा लेने, दिनचर्या में बदलाव लाने, खानपान में फेरबदल करने तथा व्यायाम आदि से अच्छे परिणाम मिलते हैं। ध्यान रहे, डॉक्टर से बिना पूछे दवाइयाँ बंद करने के बुरे परिणाम हो सकते हैं तथा व्यक्ति की बीमारी और अधिक गंभीर हो सकती है।

यह तो थी चर्चा निराशा, अवसाद, डिप्रेशन आदि के लक्षणों एवं उनके चिकित्सीय निदान की। यद्यपि अध्यात्मशास्त्र शारीरिक चिकित्सा का शास्त्र नहीं है, तदपि देखा गया है कि अध्यात्मशास्त्रज्ञों एवं साधक वर्ग में मनोदैहिक (Psychosomatic) और मानसिक (Psychic) रोगों की मात्रा लगभग नगण्य होती है। अधिकांश मनोदैहिक एवं मानसिक रोग मन से सम्बंधित विकारों तथा कुछ अन्य आध्यात्मिक कारणों से होते हैं; गंभीर मानसिक रोग तो बहुधा आध्यात्मिक कारणों से ही होते हैं। परन्तु उचित साधना से उपजी संतुलित मनःस्थिति एवं आध्यात्मिक बलिष्ठता के कारण साधक वर्ग इन सब से बचा रहता है। साधक वर्ग से तात्पर्य यहाँ ऐसे वर्ग से है जो वेदान्त व भगवत्गीता आदि में उल्लेखित तथा स्वामी विवेकानंद, श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार और पं. श्रीराम शर्मा आचार्य सरीखे वर्तमानकाल के विद्वानों द्वारा बताई गयी आत्मा, परमात्मा, कर्म, कर्मफल, पुनर्जन्म, संचित, प्रारब्ध, मोक्ष जैसे शब्दों की व्याख्या पर पूर्ण विश्वास करता है एवं पूर्ण आस्था के साथ जीवन के प्रत्येक प्रसंग को इन सिद्धांतों के साथ जोड़कर देखता व करता है।

यद्यपि अध्यात्म व इसके सिद्धांतों को तर्क से सिद्ध करने का प्रयास एक निम्न श्रेणी की धृष्टता ही है, फिर भी कहूँगा कि सच्चे आध्यात्मिक सिद्धांतों में कुछ भी ऐसा दुविधापूर्ण नहीं जो वर्तमान विज्ञान की कसौटी पर खरा न उतरता हो, सब कुछ स्पष्ट एवं तर्कपूर्ण है। जैसे ऊर्जा की अक्षुण्णता का सिद्धांत और किसी क्रिया के फलस्वरूप तदनुसार प्रतिक्रिया का सिद्धांत, ये दो वैज्ञानिक सिद्धांत ही आत्मा के अमरत्व सम्बन्धी तथा कर्मफल एवं प्रारब्ध के निर्माण सम्बन्धी आध्यात्मिक सिद्धांतों की पुष्टि हेतु पर्याप्त हैं। इन्हीं दो सिद्धांतों को भली-भांति आत्मसात् कर साधक वर्ग शुद्ध मानसिकता व कर्मों के प्रति सदैव एवं स्वतः सचेत रहता है, यथार्थ में रहता है। उसे यह अच्छी तरह से ज्ञात होता है कि प्रारब्ध कोई शून्य से टपकी वस्तु नहीं, अपितु उसी के द्वारा किये गए कर्मों (क्रिया) के फलस्वरूप उपजा प्रतिक्रियात्मक कोष है, अतः उसका रुझान अनवरत योग्य कर्म के प्रति ही रहता है। कर्म करते हुए शारीरिक रूप से थक जाने पर या असफलता के क्षणों में भी निराशा उस पर हावी नहीं होती। उसे आत्मा रूपी अक्षुण्ण ऊर्जा का भी ठीक से ज्ञान होता है और इससे सम्बंधित भौतिक तत्वों का भी। इस ब्लॉग के अन्य लेखों में इस सम्बन्ध में विस्तार से खोजा जा सकता है। उपरोक्त सभी कारणों से साधक वर्ग प्रत्येक स्थिति में शांत, आनंदित एवं संतोषी रहता है और अवसाद या डिप्रेशन जैसी मानसिक व्याधि का शिकार नहीं बनता।

आत्मा-परमात्मा की सत्ता पर तथा कर्मानुसार संचित एवं प्रारब्ध के निर्माण पर अगाध विश्वास करने से न केवल हमारे कर्मों और मानसिकता की गुणवत्ता में सुधार होता है, बल्कि साथ ही जीवन के असंख्य अनसुलझे, अबूझे प्रसंगों की पहेलियाँ भी सुलझती हैं। इससे न केवल हम मनोदैहिक व मानसिक रोगों से बचे रहते हैं बल्कि व्यर्थ की उद्विग्नता से परे एक शांत व संतोषी जीवन व्यतीत करते हैं। हमारे न मानने या न स्वीकार करने से इन सिद्धांतों का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। हाँ, इनके सीधे लाभ से हम वंचित रह जाते हैं। विज्ञान समर्थित इन अकाट्य आध्यात्मिक सिद्धांतों को स्वीकार करने व इन पर चलने से शुभ-कर्म होंगे, पाप-कर्म से दूर रहेंगे। आत्मा, परमात्मा, कर्मफल आदि की सत्ता यदि न भी हो तो भी हम सांसारिक सुख्याति व प्रतिष्ठा तो प्राप्त करेंगे ही, हमें लाभ ही होगा। परन्तु इन सिद्धांतों को न मानने पर और इन पर न चलने से हम स्वेच्छाचारी बनकर दुष्कर्मों में प्रवृत्त होंगे, फलतः कुख्याति को प्राप्त करेंगे; और यदि इन सिद्धांतों का अस्तित्व हुआ तो दुष्कर्मों (क्रिया) के फलस्वरूप ऋणात्मक प्रतिक्रिया संचित कर हम अपना प्रारब्ध बिगाड़ लेंगे, हमारी बहुत हानि होगी। इति।

Thursday, September 23, 2010

(४०) वास्तविक संत

  • संत ऊपर से दिखने पर साधारण मनुष्यों जैसे ही होते हैं, जल्दी पहचान में नहीं आते; वे केवल आनंद और संतोष की सुगंध से ही पहचाने जाते हैं।
  • संत का अस्तित्व उसकी भौतिक देह या वेशभूषा में न होकर केवल उसके वचनों में होता है। कैसी भी थैली में हीरा रखने पर थैली का महत्त्व नगण्य होकर केवल हीरे का महत्त्व रहता है।
  • खरे संत की पहचान उसके विशिष्ट वस्त्रों, केश-विन्यास, भाव-भंगिमाओं अथवा वाह्य श्रृंगार (make-up) से नहीं, वरन उसके नैसर्गिक प्रभामंडल से होती है।
  • संतों का उद्देश्य अपने उपदेशों या वचनों द्वारा सुनने वालों को मात्र रिझाना नहीं होता, वरन उनके वास्तविक कल्याण की दृष्टि से वे उपदेश देते हैं।
  • जिसकी संगति से हमारे अंतर्मन में भगवत्-प्रेम प्रकट हो और विषयों के प्रति आसक्ति घटे, उसे संत जानें।
  • संत के पास जाकर संतोष, शांति व आनंद आदि का वास्तविक अर्थ पता चलता है और इन्हें पाने की रुचि उत्पन्न होती है।
  • ईश्वर की सगुण अथवा निर्गुण भक्ति तथा ईश्वरीय गुणधर्मों से ओतप्रोत जीवन जीने के अतिरिक्त कोई भी बात संतों को रुचिकर नहीं लगती।
  • अपने व्याख्यानों में जिन सिद्धांतों की संत चर्चा करते हैं, उन्हें वे भली-भांति हृदयंगम कर चुके होते हैं और आचरण द्वारा सतत प्रकट करते हैं।
  • संतों के व्याख्यान उनके स्वयं के अनुभवों तथा अनुभूतियों पर आधारित होते हैं, वे व्यर्थ का ढोंग या दिखावा नहीं करते; उपदेश करना उनका व्यवसाय नहीं होता।
  • संतों में भी षड्-विकार होते हैं परन्तु उनका रूपांतरण भगवत्-भक्ति के साधन के रूप में हो जाता है; तब ये षड्-रिपु व्यष्टि और समष्टि साधना के लिए उपकरण समान बन जाते हैं।
  • संतों को भी पूर्वकर्मजन्य प्रारब्ध को भोगना पड़ता है, शारीरिक कष्ट भी होते हैं, परन्तु देहभान न होने के कारण उन्हें इसके कारण किसी सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता।
  • संत हमारे जीवन में आने वाले कष्टों को दूर नहीं करते, वरन वे कष्टों के प्रति हमारे भय को समाप्त कर देते हैं। संकट से अधिक दुःखदाई संकट का भय होता है!
  • संत के संसर्ग से नास्तिक भी ईश्वरभक्ति की ओर मुड़ते हैं, फलतः वे पापकर्म से दूर होते हैं तथा दुःखों में आश्वासन, धैर्य और ढाढ़स प्राप्त करते हैं।
  • संत की संगति से तर्क क्षीण होते हैं, वृत्ति बदलती है, अनुभव और अनुभूतियाँ बढ़ते हैं, अंततः ईश्वर के अस्तित्व की अनुभूति होती है; क्योंकि ईश्वर को तर्क से सिद्ध नहीं किया जा सकता।
  • साधारण संत कहता है, "दुष्टों का नाश हो", जबकि खरा संत कहता है, "दुष्टता का नाश हो" अर्थात् दुष्ट व्यक्तियों की दुष्टता मिटे।
  • खरे संत की सबसे बड़ी पहचान यह है कि आप किसी सांसारिक अभिलाषा की प्राप्ति के लिए उसके पास जाएंगे और अभिलाषा-रहित होकर लौटेंगे; संत-संग का यह सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम है।
  • खरा संत हमें कभी भी सांसारिक विषयों में उलझाएगा नहीं, न ही उन्हें एकदम से त्यागने के लिए कहेगा; बल्कि वह उन विषयों के प्रति हमारी आसक्ति समाप्तप्राय कर देगा।
  • खरा संत कभी भी अपने 'संत' होने का प्रचार-प्रसार नहीं करता और न ही किसी के द्वारा 'संत' कहने पर गदगद् होता है।
  • संत किसी प्रकार का चमत्कार नहीं करते, चमत्कार जैसा कुछ स्वयमेव हो जाता है! इसके लिए आवश्यकता है सतत संत-संगति की।

Saturday, September 18, 2010

(३९) प्रतिक्रिया - उचित या अनुचित ?

हमारे भारत में एक बहुत बड़ी विडम्बना है कि हम भारतवासी भावुक कुछ अधिक ही हैं और भावुकतावश किसी व्यावहारिक प्रश्न का हल ढूंढते समय जैसा गुरु बता देता है उसी नियम को एकमात्र व अंतिम (ultimate) मानकर बिलकुल नाक की सीध में चल देते हैं, अपने विवेक-बुद्धि या आत्मिक ज्ञान का प्रयोग करने की चेष्टा बिलकुल भी नहीं करते, क्योंकि हमें मनोलय और बुद्धिलय की जबरदस्त घुट्टी जो पिलाई जाती है। हमारी मानसिकता संकीर्ण हो जाती है और विवेक कुंद! तब हम केवल एक ही दिशा में सोच पाते हैं, लचीलेपन का अभाव हो जाता है। उदाहरण के लिए - आजकल भारत में यह वाक्य हर कहीं देखने, पढ़ने और सुनने में आ रहा है कि "केवल अपने आप को सुधारो, दूसरों पर ध्यान न दो, दूसरों के प्रति कोई प्रतिक्रिया न दो; हम स्वयं सुधर जाएं इतना ही पर्याप्त होगा, अन्य स्वयमेव सुधर जाएंगे।" बड़े-बड़े ज्ञानियों, प्रवचनकर्ताओं, गुरुओं, मठाधीशों का आज यही प्रिय एवं मुख्य सन्देश है।

इस वाक्य ने तो वर्तमान अनैतिकता के विरुद्ध वैयक्तिक विरोधों, उपभोक्ता-फोरमों, कानून एवं न्याय व्यवस्था आदि पर तो प्रश्नचिन्ह लगाया ही है, साथ ही पूर्वकाल में देवी-देवताओं, महान हस्तियों और आम जनता द्वारा असत्य व अन्याय के विरुद्ध किए गए प्रयासों के औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है! और तो और क्या इस वाक्य ने वर्तमान में तथाकथित गुरुओं द्वारा किए जा रहे सुधारक प्रयासों, प्रवचनों आदि के औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगा दिया है? दूसरों को कहते हैं कि "तुम अन्यों को सुधारने का प्रयत्न मत करो, स्वयं ही सुधरो, शेष सब नियति व प्रारब्ध का खेल है"; तो फिर कोई उनसे यह पूछे कि "बाबा जी, आप पंडाल लगाकर इतनी भीड़ जुटाकर दूसरों को सुधारने में क्यों लगे हो? क्या आपको ही ईश्वर ने विशेषाधिकार-पत्र सौंपा है? क्या धर्म (righteousness) का ठेका कुछ ही लोगों ने उठा रखा है?" इन प्रश्नों का उत्तर भी वे बड़ी निर्लज्जता से देते हैं कि "हाँ, हमारा आध्यात्मिक स्तर बहुत ऊँचा है, तुम्हारा स्तर ही अभी क्या है, इसीलिए हम ही इसके अधिकारी हैं"!

उनका कथन भी काफी हद तक ठीक है कि बिना ज्ञानी हुए ज्ञान बघारना कोई अच्छी बात नहीं! लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रत्येक मनुष्य अपूर्ण है। सभी लोग ज्ञान के अलग-अलग स्तर पर हैं। कोई भी मनुष्य अपने से नीचे के स्तर वाले व्यक्ति के लिए प्रेरक या अध्यापक हो सकता है और अपने से ऊंचे स्तर वाले व्यक्ति के लिए अनुगामी या शिष्य। और व्यवहार में इतने विषयों के होते हुए कोई व्यक्ति किसी विधा में किसी से आगे हो सकता है तो किसी दूसरी विधा में उससे पीछे। यानी कहीं वह शिष्य की (सीखने वाले की) भूमिका में होता है तो कहीं सिखाने वाले की भूमिका में। तो जहाँ व्यवहार सम्बन्धी बातों का प्रश्न आता है वहाँ ऊपर दिया विवादास्पद नियम वृथा (fail) हो जाता है कि "केवल अपने आप को सुधारो, दूसरों पर ध्यान न दो, दूसरों के प्रति कोई प्रतिक्रिया न दो; हम स्वयं सुधर जाएं इतना ही पर्याप्त होगा, अन्य स्वयमेव सुधर जाएंगे।" व्यवहार व अध्यात्म सम्बन्धी अनेक बातों में हमसे अपरिपक्व कई लोग होते हैं, जैसे हमारी स्वयं की कच्ची उम्र की संतानें; क्या उन जैसों को कोई शिक्षा देना या सुधारने का प्रयत्न करना अयोग्य होगा?? बड़े भाई-बहन अपने से छोटों को सुधारने, सिखाने का प्रयत्न करते रहते हैं, क्या यह गलत है?? कई बार संतानें भी बड़ी होकर, परिपक्व होकर अपने बुजुर्गों की कमियों को सुधारने का प्रयत्न करती हैं, क्या यह गलत है?? एक शराबी पीकर दंगा-फसाद कर रहा है, यदि हमारे समझाने पर वह मान सकता है तो क्या उसे समझाना गलत है?? एक पुलिस वाला मोटरसाइकिल से हमारा पीछा करता है और हमपर बिना हेलमेट चलने के अपराध का दण्ड लगाता है और स्वयं भी वह हेलमेट नहीं लगाये है तो दण्ड भरने के साथ क्या हम उससे यह प्रश्न भी नहीं कर सकते कि वह स्वयं ऐसा क्यों कर रहा है?? एक मोटरकार वाला गलत दिशा से आकर हमें ठोकर मार देता है तो क्या हमारा विरोध दर्ज करना गलत होगा?? कोई घूस माँग कर हमारा कार्य करता है तो उसे घूस दे दी जाए या फिर ऐसे ही बिना काम किए लौट आया जाए!

उपरोक्त विवादास्पद नियम के अनुसार तो ऐसा होना हमारा प्रारब्ध ही है, वह हमें भोगना ही है!! क्रियमाण कर्म का बिलकुल मजाक बनाकर रख दिया है इस नियम ने! मैं मीठा बोलूँ, लेकिन मेरी संतान कटु बोलती है, अपशब्द बोलती है, तो उसे मना न करूँ, योग्य शिक्षा न दूँ; इन सबका कारण मैं अपने और संतान के प्रारब्ध को ही समझूँ, मौन रहकर प्रारब्ध को भोग लूँ! कुछ पलायनवादी विचार नहीं लगते ये आपको? मतलब यह कि कुछ गलत घटित हो रहा है तो या तो मेरे कर्म उसके लिए जिम्मेदार हैं या फिर मेरा प्रारब्ध, जो मेरे ही पूर्व कर्मों से निर्मित है; दूसरों की कोई गलती नहीं! दूसरे भी अपना-अपना प्रारब्ध भोग रहे हैं और उनके अधिकांश कर्म व परिस्थितियां भी उनके प्रारब्ध पर ही निर्भर हैं! यदि ये वाक्य सही हैं तो क्या कोई यह बताएगा कि प्रारब्ध आया कहाँ से?? बहुत बड़ा प्रश्न है यह!! ... वस्तुतः प्रारब्ध कोई ऊपर से टपकी वस्तु नहीं है, बल्कि यह हमारे ही क्रियमाण कर्मों द्वारा निर्मित हुआ कोष है। और यदि कुछ क्रियमाण कर्म करके स्वयं और समष्टि के कर्मों में कुछ सुधार आ सकता है तो फिर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर मौन क्यों साधा जाए?? इसमें आज के तथाकथित ज्ञानी महापुरुषों को आपत्ति कैसी?? वे समष्टि के प्रति मूक रहने या तटस्थता का भाव रखने को क्यों कहते हैं? उदाहरण के लिए - मैंने एक कपड़ा ख़रीदा, वह दोषयुक्त या कटा-फटा निकल आया तो माना जा सकता है कि मेरी गलती मैं देखकर नहीं लाया; फिर एक सही कपड़ा मैं सिलने के लिए दर्जी को देता हूँ और वह उसको दोषयुक्त सिल देता है, तो भी मैं उससे कुछ न कहूँ, भविष्य में अच्छा सिलने के लिए नसीहत भी न दूँ, क्योंकि कपड़ा खराब सिला गया यह मेरा प्रारब्ध था!? किसी विभाग से कोई गलत बिल आता है तो चुपचाप भुगतान कर दूँ! यदि मैं जिम्मेदार अधिकारी अथवा अध्यापक हूँ तो अधीनस्थ कर्मचारी अथवा विद्यार्थी से कोई जवाब तलब न करूँ! देख कर भी किसी अन्य को गड्ढे में जाने दूँ, हस्तक्षेप न करूँ!

.... यह हमारे क्रियमाण कर्म की महत्ता का तिरस्कार है। मनुष्य एक आत्मिक तत्पश्चात् सामाजिक प्राणी है और यदि उससे जुड़े समाज के विभिन्न घटकों में अनैतिकता रहे तो फिर उस व्यक्ति का वहाँ गुजारा कठिन होता है। अतः अपने वर्तुल में नैतिकता को सुदृढ़ करने हेतु गलत कृत्यों के विरुद्ध योग्य प्रतिक्रिया देना गलत न होगा। .... मैं मानता हूँ कि पर्याप्त योग्यता न होने पर भी हर जगह दबंगई दिखाना मूर्खता है परन्तु हमारे विनम्र, न्यायसंगत व दृढ़ प्रयासों से स्थितियां यदि सुधर सकती हैं तो प्रयास अवश्य करना चाहिए। शालीनता और सुसभ्यता से उचित समय पर योग्य प्रतिक्रिया देना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि मूक रहने के कारण बाद में कोई बड़ी दुर्घटना हो जाने पर हमें पछताना पड़ सकता है। जो हमें सुन सकता है, जिसके ऊपर हमारा कुछ अधिकार है वहाँ हमें अवश्य योग्य प्रतिक्रिया देनी चाहिए। पुनः, कर्म का फल और फल का समय हमें नहीं पता। बीजारोपण हमारे वश में होता है, खाद-पानी देना हमारे वश में है, परन्तु आगे के विकासक्रम के बारे में हम अनभिज्ञ होते हैं। इससे हमारे बीजारोपण या खाद-पानी देने का महत्त्व कम नहीं हो जाता। यह प्रयास कभी भी फलीभूत हो सकता है और सबको लाभ मिल सकता है। इति।

Monday, September 13, 2010

(३८) खुशियाँ मनाना

प्रायः हम लोग खुशियाँ मनाने के लिए कोई न कोई कारण, बहाना अथवा विशेष अवसर खोजते हैं, जैसे - त्यौहार, जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ आदि। लोग ऐसे विशेष अवसरों पर अन्यों को न्योता देते हैं एवं स्वयं भी दूसरों के यहाँ जाते हैं अथवा पारिवारिक सदस्यों के साथ ही वह विशेष अवसर मनाते हैं। इसमें तीज-त्यौहारों का औचित्य तो ठीक से समझ में आता है कि समाज के सभी लोग इनके बहाने कम से कम परिवार के स्तर पर इकट्ठा होकर उत्सव मनाते हैं, खुशियाँ बांटते हैं और पूरा समाज रोजमर्रा की जिंदगी से हट कर हर्ष व उत्साह से सराबोर हो जाता है। इन धार्मिक उत्सवों के पीछे निहित पवित्र सन्देश एवं शिक्षा का लाभ भी जाने-अनजाने हमें मिलता ही है। इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि रुपए-पैसे या भेंट आदि का लेनदेन न के बराबर ही होता है। वैसे कुछ लोगों ने तीज-त्यौहारों में भी व्यर्थ के दिखावों और लेनदेन की परम्परा डाल दी है परन्तु भारत में त्यौहारों की कुल संख्या को देखते हुए इनका प्रतिशत फ़िलहाल नगण्य ही है। .... लेकिन जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ समारोह आदि जैसे कुछ आयोजन ऐसे हैं जो वर्तमान समय में आपसी प्रेम के स्थान पर औपचारिकताओं को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन आज भारतीय समाज में लोगों को एक-दूसरे से मिलने और खुशियाँ मनाने का कोई दूसरा रास्ता सूझता ही नहीं है। उदाहरण के लिए -- मेरे एक मित्र से मेरी भेंट अक्सर (लगभग हर २०-२५ दिन में) सब्जीमंडी में हो जाती है; सब्जी खरीदते हुए ही हम आपस में कुछ मिनट बात करते हैं और फिर चल देते हैं। चूँकि मेरा घर सब्जीमंडी से बिलकुल समीप ही है अतएव अनेक बार उनसे अनुरोध किया कि 'कभी कुछ समय निकालें, घर पर बैठ कर आराम से कुछ बातें की जाएं, इस बहाने परिवार के अन्य सदस्यों से मिलना भी हो जाएगा'; इस पर उनका जवाब होता है कि 'आप कुछ करिये तो आएं' अर्थात् 'कुछ समारोह जैसा आयोजित कीजिए तो सपरिवार आएं'। .... ऐसा नहीं है कि उनके पास समय का अभाव है या हम दोनों के विचार मेल नहीं खाते। हम दोनों की पटती भी है फिर भी ...., शायद आजकल हर चीज का 'ट्रेंड' बदल गया है; हम लोग संकुचित और औपचारिक होते जा रहे हैं!

पहले जब लोग खाली होते थे अर्थात् काम के समय से निवृत्त होकर जब समय पाते थे तो एक-दूसरे के घर यूँ ही मिलने चले जाया करते थे; फिर तब यदि नाश्ते का समय होता तो नाश्ता आदि कर लेते थे, भोजन का समय होता तो भोजन आदि कर लेते थे, और कुछ नहीं तो ठंडा पानी या चाय आदि ही पी लेते थे और संतुष्ट हो जाते थे। खाली समय की इन बैठकों में खाने-पीने की अपेक्षा प्रमुख लक्ष्य होता था - आपसी आमोद-प्रमोद, ढेर सारी बातें और परस्पर वैचारिक आदान-प्रदान। आपसी प्रेमभाव बढ़ाने के अतिरिक्त ये बैठकें हमारे सामान्य ज्ञान की वृद्धि में भी बहुत सहायक सिद्ध होती थीं। इस प्रकार की गतिविधि से व्यक्ति सामाजिक रूप से एक-दूसरे के निकट आता था, एक-दूसरे को समझ पाता था, बिना कारण या अवलम्ब के खुशियाँ मना पाता था, स्वस्थ हास-परिहास होता था, मन हल्का और प्रसन्न हो जाता था; क्योंकि रोजमर्रा की व्यावसायिक मशीनी जिंदगी से हटकर ये गतिविधियां पैसा कमाने के उद्देश्य से नहीं वरन जिंदगी को हल्का-फुल्का और खुशनुमा बनाने के लिए होती थीं। जबकि दूसरी ओर हम अन्य औपचारिक समारोहों को देखें तो पाएंगे कि उनको मनाने का कुछ कारण है, वे किसी बात पर अवलम्बित हैं, वे नियत दिनांक पर ही मनाये जा सकते हैं और उनमें औपचारिकताएं भी बहुत सी आ गई हैं तथा नित नवीन औपचारिकताएं बढ़ती ही जा रही हैं। इस प्रकार के आयोजन चाहे पारिवारिक स्तर पर हों अथवा सामाजिक स्तर पर, दोनों ही मामलों में रुपए-पैसे के ऊपर निर्भरता आ ही जाती है, भेंट आदि लेना-देना आवश्यक सा होता है और वह भी अधिकाधिक दिखावे के साथ! भेंट-उपहारों को प्रेम से अधिक कीमत की कसौटी पर कसा जाता है, आपसी लगाव के आंकलन का तरीका बदलता जा रहा है! यदि कोई इससे इन्कार भी करे तो भी इतना तो स्वीकार करेगा ही कि मेहमानों को मेजबान से अधिकतम की अपेक्षा होती है और मेजबान को मेहमान से! समारोह के दौरान या बाद में कभी न कभी मेजबान या मेहमान के आर्थिक स्तर की चर्चा होती अवश्य है और अन्य समारोहों के साथ तुलना भी की जाती है। चर्चाओं में अक्सर इस तरह के वाक्य सुनाई पड़ते हैं - "मैंने तो उनके यहाँ इतना दिया था, उन्होंने तो उसकी तुलना में बहुत कम दिया; मेरा उपहार महंगा था, उन्होंने तो सस्ता सा पकड़ा दिया; वे कंजूसी कर गए; वे मतलबी हैं; लगता है कहीं और से मिला उपहार मुझे पकड़ा गए; अरे हमारा उपहार उनकी औकात के हिसाब से बहुत है!" .... यानी खुशियाँ मनाने से अधिक ध्यान विभिन्न आंकलनों पर रहता है और इस पर भी कि दिखावा कैसे अधिक से अधिक हो!

जबकि वैयक्तिक रूप से बिना वजह यूँ ही एक-दूसरे से मिलते-जुलते और खुशियाँ मनाते समय इन सब बातों का कोई महत्त्व नहीं रहता तथा रूपए-पैसे के दिखावे और उपहार-भेंट आदि की औपचारिकताओं से दूर ही रहते हैं। इस प्रकार के बैठकें या पार्टियां किसी कारण विशेष पर आश्रित नहीं होतीं और ये हमें आपसी भाईचारा बढ़ाने के लिए उकसाती हैं, प्रेरित करती हैं। ये किसी भी खाली समय या छुट्टी के दिन संभव हैं, इनमें स्वार्थ या अपेक्षा जैसा कुछ नहीं होता, ये कार्य-दिवसों में आए तनाव को कम करने में भी विशेष सहायक सिद्ध होती हैं। इस तरह के आयोजन या मिलना-जुलना पूरी तरह से हमारे हाथ में है और इन पर दिनांक या दिवस विशेष का कोई बंधन लागू नहीं होता। .... बिलकुल निराकार साधना जैसी है यह! निराकार उपासना में विधि-निषेध बंधन नहीं है और यह सप्ताह में चौबीस घंटे और सातों दिन संभव है; जबकि साकार उपासना बहुत सी बातों पर आश्रित होती है, कम अवधि के लिए हो पाती है। .... देखा जाए तो हमारे लिए हर दिवस एक उत्सव की तरह होना चाहिए और हममें यह कला होनी चाहिए कि हम हर दिन कहीं न कहीं से, किसी न किसी रूप में अपने दैनिक कार्यों में ही खुशियाँ तलाश लें। यह प्रक्रिया हमें निरंतर उत्साहित रखती है और जीवन्तता बनी रहती है। हम उत्साहित होने, प्रसन्न होने, खुशियाँ मनाने आदि में किसी दिन विशेष पर आश्रित न रहें बल्कि सर्वप्रथम अपने कर्तव्य रूपी कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए, उपरांत खाली होते ही आपसी सामाजिक मनोरंजन को पर्याप्त समय दें; जीवन्तता निरंतरता के साथ बनी रहे इसके लिए यह अत्यंत आवश्यक है। इति।

Sunday, September 12, 2010

(३७) पुरुषोचित आचरण

पिछले लेख में पुरुषों, विशेषकर भारतीय पुरुषों की वर्तमान मनःस्थिति पर कुछ तीखे ही प्रहार हो गए। आलोचना के साथ यह परम आवश्यक है कि समस्या के कारण जानने एवं निदान ढूंढने के प्रयत्न भी समानान्तर रूप से किए जाएं। यहाँ यह जानना भी आवश्यक हो जाता है कि आखिर पुरुषोचित आचरण कैसा होना चाहिए, और हमारी सोच में क्या कमियां हैं जिनके कारण हमें आखें झुकानी पड़ जाती हैं! इस लेख में इन्हीं सब बिदुओं पर मनन करने का प्रयास किया गया है।

किसी भी संघ की तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक एवं धार्मिक परिस्थितियों का जबरदस्त प्रभाव उस काल के लोगों के आचरण पर पड़ता है। यद्यपि ऊपर उल्लेखित सभी कारणों का मिलाजुला प्रभाव पड़ता है तद्यपि अच्छे एवं योग्य आचरण को अक्षुण्ण बनाए रखने में सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परिस्थितियों की भूमिका अग्रणी रहती है। यदि इन तीनों के स्तर में कोई गिरावट आती है तो मूल्यों का गिरना भी निश्चित होता है। ... और पुनः इन तीनों में भी यदि तुलना करें तो धार्मिक परिस्थिति की भूमिका सर्वोच्च है; सामाजिक मूल्यों के अधःपतन की दशा में सांस्कृतिक मजबूती उसे संभाल सकती है और सांस्कृतिक दोष आने पर धार्मिक सुदृढता उसे थाम लेती है। धर्म से तात्पर्य यहाँ विभिन्न धार्मिक कृत्यों से उपजे खरे अध्यात्मविषयक ज्ञान से है, सूक्ष्म के ज्ञान से है; ... और इस ज्ञान को अपने भौतिक जीवन के दैनंदिन क्रियाकलापों एवं आचरण में शामिल करना अर्थात् धर्म का निर्वाह करना। धर्म का यथार्थ निर्वाहन सभी प्रकार की बाधाओं-कठिनाइयों को पराजित करने में पूरी तरह से सक्षम है। जब-जब मनुष्य ने धर्म का आश्रय छोड़ा है, तब-तब तनावों एवं विषम परिस्थितियों ने उसे आ घेरा है और वह असंतुलित हो निरंतर नीचे की ओर गया है।

भारत में भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ। हमारा इतिहास एवं हमारी पौराणिक कथाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उनके अध्ययन से हमें साफ़ तौर पर जानने को मिलता है कि युग दर युग हमारे समाज की मानसिकता, तदनुसार आचरण, आदि में क्या-क्या बदलाव आए। सत्ययुग सर्वश्रेष्ठ था तो त्रेता उससे कुछ निम्न, द्वापर उससे निम्नतर, तथा कलियुग निम्नतम। तुलना सर्वथा तत्कालीन लोगों की मनःस्थिति एवं आचरण पर आधारित थी/है, और पुनः, किसी काल में लोगों की मानसिकता व आचरण तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक ढांचे पर निर्भर हैं। वैसे मेरा वैयक्तिक मत यह है कि वर्तमानकाल में प्रत्येक राष्ट्र या संघ उपरोक्त परिस्थितियों के वर्तमान तत्स्थानिक परिमाण के अनुसार अलग-अलग युग को अनुभव कर रहा है। इस धरा पर कदाचित सत्ययुग कहीं पर है यह तो संदेह की बात हो सकती है परन्तु त्रेता, द्वापर जैसी स्थितियां कई जगह देखने को मिल जाती हैं। हमारे देश के वर्तमान समष्टिगत मानसिक ढांचे एवं आचरण सम्बन्धी पक्षों को देखते हुए जब हम अपनी तुलना कुछ अन्य विकसित देशों से करते हैं तो स्वतः ही हमें इस सच्चाई के दर्शन होते हैं, भले ही हम प्रत्यक्षतः इसे स्वीकार न करें! विशेषकर हमारे यहाँ के पुरुषों के आचरण में समय के साथ बहुत अधिक नैतिक गिरावट आई है।

सब जानते हैं कि भारत का अतीत बहुत उज्ज्वल रहा था, सभी दृष्टियों से हम उत्कृष्ट थे। पर समय ने करवट ली, दुनिया में अनेकों बदलाव हुए; जो पीछे थे उन्होंने भी प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाये। भौतिक जगत सतत परिवर्तनशील होता है परन्तु हम भारतीय यह तथ्य भुलाकर आत्मश्लाघा एवं आत्मस्तुति के भंवर में फंस कर एक स्थान पर ही रुक गए, स्थिर हो गए, जड़ हो गए! उस समय हमारे यहाँ के जगत-विख्यात सांस्कृतिक और धार्मिक ढांचे ने भी हमारी कोई मदद नहीं की, क्योंकि उस समय उसका भी वही हाल था जो हमारी साधारण मानसिकता का था! यहीं से हमारे पतन और पराभव के दिन शुरू हुए। .... धीरे-धीरे हमारा राष्ट्र दासता की बेड़ियों में जकड़ गया, जिसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार थे। बाद में कुछ महत्त्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन हुए और हमारे सुप्तप्रायः राष्ट्र में कुछ चेतना का संचार हुआ, फलस्वरूप हम पुनः स्वतंत्र हुए। परन्तु यह यह प्रक्रिया भी इतनी लंबी, अनियोजित और सुस्त थी कि हमारे युवा पुरुषवर्ग को कोई योग्य दिशा देने में असफल रही। परतंत्रता से पूर्व ही हमारे यहाँ की धार्मिक शिक्षाओं के स्तर में गिरावट आ चुकी थी, परतंत्रता के दौरान स्थितियां और अधिक विकट रहीं तथा रही-सही कसर संचार माध्यमों के एकदम से विकसित हो जाने के फलस्वरूप आए वैश्वीकरण ने पूरी कर दी। .... कई दिनों से भूखे को अचानक ढेर सारा खाना मिल गया और वह पशुओं की भांति उस पर टूट पड़ा। पशु तो फिर भी एक सीमा तक विचार कर सकते हैं और शीघ्र तृप्त हो जाते हैं; परन्तु मनुष्य के पास तो मन, बुद्धि, विवेक आदि पशुओं की तुलना में बहुत अधिक है, सो हमने एकदम से ढेर सारा खाने के अतिरिक्त अनाप-शनाप संग्रह करना भी आरंभ कर दिया। इन सब जतनों, क्रियाकलापों में हमारा पुरुषवर्ग नैतिक रूप से भी निरंतर गिरता चला गया। हमारा आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक ढांचा वैसे ही जर्जर था, ऊपर से धार्मिक ढांचा तो और भी क्षतिग्रस्त, बिलकुल दिशाविहीन! परिस्थितियां बिलकुल विपरीत थीं/हैं, इसीलिए हम निरंतर और गिरते ही जा रहे हैं। आज जो माध्यम (जैसे- मीडिया, सिनेमा, राजनेता, धर्मगुरु) सशक्त हैं, मजबूत हैं, सामर्थ्यवान हैं, अधिकार रखते हैं, लोग जिनकी सुनते हैं, ... क्या वे माध्यम अपनी कुशलता, योग्यता व सामर्थ्य का ईमानदारी से सदुपयोग कर रहे हैं? बिलकुल नहीं ....; वे भी संग्रह, आत्मस्तुति एवं आत्मश्लाघा बढ़ाने में ही दिन-रात व्यस्त हैं। ऐसे में हमारे समाज के आधार-स्तंभ पुरुषवर्ग का अधःपतन होना निश्चित ही है।

यह बात सही है कि कोई भी अपनी माता के गर्भ से सब कुछ सीख कर जन्म नहीं लेता। प्रथमतः वह कोरे कागज की भांति ही होता है; वह यहीं इसी धरा पर, अपने परिवार, समाज आदि से सब कुछ सीखता है। यहीं उसके चारों ओर उपस्थित वातावरण के अनुरूप ही उसके संस्कार बनते हैं; पिछले जन्मों के संस्कारों में से भी केवल वही संस्कार जागते हैं जिनको स्थानीय वातावरण के अनुसार पोषण मिलता है, शेष सुप्त ही रहते हैं। और सत्य यही है कि हमारे संघ का दूषित वातावरण ही हमारे वर्तमान पुरुषवर्ग के अनैतिक आचरण के लिए दोषी है। स्त्रियों का स्तर अपेक्षाकृत ऊंचा होता है, इसके कारणों पर हमने पिछले लेख में देखा था। कुल मिलाकर वर्तमान भारत के बाहुबली पुरुषवर्ग की दुर्बलताओं के पीछे का मूल कारण मानसिक और आध्यात्मिक रूप से असंतुलित होना है और इस असुंतलन के लिए अभिजात सामाजिक घटक, मीडिया और सरकार जैसे सशक्त माध्यम तथा समाज के धार्मिक मार्गदर्शक प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं। इन सब का आचरण नैतिकता के मापदंडों की कसौटी पर अत्यंत निम्नकोटि का था/है, तभी तो आम प्रजा, विशेषकर पुरुषों में इस प्रकार के संस्कार उपजे! .... बचपन से किसी ने कुछ अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया नहीं; झूठ, फरेब, प्रतिद्वंदिता, कपट, लालच, ईर्ष्या और नाना प्रकार के अन्य दंद-फंद अपने आसपास घटित होते देखते व सुनते रहे; तो उन्हीं सब के अनुरूप संस्कार दृढ़ होते चले गए। बचपन में अभिभावकों ने भी सत्संग और पौराणिक कथा साहित्य आदि से दूर ही रखा कि यह सब तो बुढ़ापे के खाली समय के काम हैं और फिर इस क्षेत्र में भी धोखाधड़ी इतनी बढ़ गई है कि किसी पर विश्वास ही नहीं जमता! जवानी या अधेड़ावस्था में जाकर स्वयं से ही कुछ को एहसास हुआ कि कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है, सत्य से सामना हुआ; पर तब यह लगा कि अकेला चना कहाँ भाड़ फोड़ पाएगा, सो मन मसोस कर चुप रह गए। ... कुछ-कुछ ऐसा ही चल रहा है हमारे समाज में।

विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, भाषाओं या संघों से जुड़ा व्यक्ति अपने से सम्बंधित प्रचलित जीवन-प्रणाली से चलते हुए क्रमशः विकसित और परिष्कृत होने का प्रयास करता रहता है। परन्तु यदि कोई जीवन-पद्धति व्यक्ति को सुसंस्कृत, सभ्य, विनम्र एवं भद्र होने में मदद नहीं कर रही तो समझा जाना चाहिए कि निश्चित रूप से उस पद्धति में दोष आ चुके हैं और उस पद्धति के पुनरावलोकन एवं परिष्कार की आवश्यकता है। फसल से अधिकाधिक फल निष्पत्ति सुनिश्चित करने हेतु समय-समय पर फालतू में उग आई झाड़ियाँ और घासफूस साफ करने ही पड़ते हैं। हमारी वर्तमान जीवन पद्धति में भी बहुत अधिक व्यर्थ की झाड़ियाँ उग आई हैं। परन्तु हम सफाई करने से कतरा रहे हैं। जिनको सत्य का पता चला चुका है, कायरतावश वे सत्य का प्रयोग उन पर भी नहीं करते जिन पर उनका वश है, जो उनकी बात मान सकते हैं, जैसे उनकी स्वयं की संतानें। हमारे पूर्वजों ने गलत काम कम किए थे, हम उनसे आगे रहे, और हमारे वंशज गलत आचरण में हमसे भी आगे जा रहे हैं; यह देखते हुए भी हममें जागृति नहीं आती! जहाँ मूक रहना चाहिए वहाँ बहुत बोलते हैं और जहाँ बोलना चाहिए वहाँ मूक रहते हैं!

पहले हम परतंत्र थे, दबे हुए थे; फिर किसी तरह स्वतंत्र हो गए, तो मनमानी और बढ़ गई; उस पर वैश्वीकरण के चलते जब हम समस्त विश्व के बिलकुल निकट आ गए तो हम पहले से भी अधिक पिछलग्गू बन गए। पश्चिम के लोगों का हमने अनुकरण तो किया, पर आधा-अधूरा! हमारे युवाओं ने उनकी सभ्यता के नकारात्मक पक्षों को ही अपनाया और अनेकों सकारात्मक पक्ष अनदेखे कर दिए। हमने उनकी विलासिता तो ग्रहण कर ली, परन्तु उच्च आदर्श ग्रहण नहीं किए। हमने उनके चाय, कॉफी को तो ग्रहण कर लिया परन्तु अपनी मदद स्वयं करने का गुण नहीं अपनाया; सफर के दौरान थोड़ा सा सामान भी स्वयं उठाना हमें कठिन या फिर लज्जाजनक प्रतीत होता है; घर की सफाई आदि स्वयं करना भी अप्रतिष्ठा का विषय लगता है, तीर्थ यात्रा तक भी हम अपने पैरों से नहीं कर पाते हैं! पाश्चात्य दिन में कई बार खाते हैं, परन्तु वे शारीरिक श्रम भी लगनपूर्वक करते हैं, यह हमें दिखाई नहीं पड़ता! हम इतना नाजुक बनते हैं कि थोड़ा सा बीमार पड़ते ही सगे-सम्बन्धियों, मित्रों आदि को तुरंत सूचित करते हैं और अपेक्षा रखते हैं कि हमारा हालचाल पूछने हर कोई पहुंचे; वहीं दूसरी ओर पाश्चात्य युवक रफ-टफ और मजबूत हैं, जरा-जरा सी बात का रोना नहीं रोते! विदेशी पर्यटकों को देखकर हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि वे किस कदर मेहनती एवं ऊर्जावान होते हैं; अपने घरों में विलासितापूर्ण माहौल में रहने के बावजूद भारत की विषम परिस्थितियों में वे प्रसन्नचित्त भ्रमण करते रहते हैं, स्वावलम्बिता उनका विशिष्ट गुण है। परन्तु हम हैं कि उनकी विलासी वृत्ति को तो अपनाते हैं परन्तु स्थिति-अनुरूप विलासिता को तिलांजलि देने की चेष्टा में उनसे बहुत पीछे रहते हैं। हमारे आधुनिक युवाओं के पास जितने अत्याधुनिक गैजेट्स का भंडार है, हो सकता है पाश्चात्य युवाओं के पास उससे और अधिक हो; परन्तु वे उन गैजेट्स का सदुपयोग करते हैं, उनके गुलाम नहीं हैं, व्यर्थ का दिखावा-प्रदर्शन नहीं करते! ट्रेन या बस में चलते समय गैजेट्स का जोर-शोर से इस्तेमाल नहीं करते और न ही बवाल आदि करते हैं। पाश्चात्य लोग वृद्धजनों, बच्चों एवं स्त्रियों के प्रति विशेष सुहृदय रहते हैं और उनके लिए सीट आदि भी खाली कर देते हैं। स्त्रियों से व्यवहार करते समय वे अत्यधिक संयमित, संकोची एवं शिष्टाचारी रहते हैं एवं उनके संरक्षण के दायित्व का भाव रहता है, परन्तु हम ....? उनकी देखा-देखी हम भी अनेक 'स्त्री मित्र' बनाने में लगे रहते हैं, परन्तु हमारे संबंधों में गहराई, सुहृदयता एवं संरक्षण के दायित्व के भाव आदि के दर्शन नहीं होते; अभी भी हममें से अधिकांश पुरुष स्त्री को भोग्या ही समझते हैं। हम उनके देशों में बनी हुई अश्लील फिल्मों को तो देखते हैं, परन्तु अपेक्षाकृत अधिक संख्या में बनी प्रेरणादायी एवं साफ-सुथरी फिल्में देखने में पीछे रहते हैं। हमारे यहाँ की बहुत बड़े बजट की फिल्म भी अतिनाटकीयता एवं असंख्य तकनीकी दोषों से युक्त रहती है तथा अस्वाभाविक जान पड़ती है, जबकि उनके यहाँ की साधारण व काल्पनिक विषय पर बनी हुई फिल्म भी चुस्त कथानक, कुशल सम्पादन एवं तकनीकी श्रेष्ठता के कारण वास्तविक प्रतीत होती है। हमारे पास संसाधन कम नहीं हैं, हर आधुनिक तकनीकी उपकरण हम खरीद सकते हैं, परन्तु उनको चलाते तो हम ही हैं न; तो फिर अपनी उथली सोच के कारण हम फिल्म में वह गहराई व वास्तविकता पैदा नहीं कर पाते जो वे कर पाते हैं! इसके अतिरिक्त व्यापार आदि में जितने सुस्पष्ट और पारदर्शी नियमों से वे चलते हैं, हमारे व्यापार में उतनी ही मिलावट रहती है; बहुत सी बातें छिपी हुई होती हैं! कुल मिलाकर हमारे प्रत्येक कृत्य में चालाकियां व स्वार्थ छिपा होता है जबकि वे अधिकांशतः सरल-हृदयी होते हैं। वे चालाक और धूर्त भी होते हैं, परन्तु मात्र चालाक एवं धूर्त लोगों के लिए; क्योंकि वे 'जैसे को तैसा' की नीति पर चलते हैं और हम 'सबकी ऐसी की तैसी', इस नियम पर चलते हैं! अधिकांशतः उनका एक ही धार्मिक ग्रन्थ है जैसे - बाइबल, जबकि हमारे पास अनेकों मार्गदर्शक ग्रन्थ हैं; वे एक से ही बहुत कुछ ले लेते हैं और हम अनेकों से कुछ नहीं ले पाते!? वे करते अधिक हैं, बोलते कम हैं; जबकि हम इसकी उलट पद्धति पर चलते हैं! वहाँ कारखानों एवं अन्य उत्पादन इकाइयों में 'बढ़िया' नहीं वरन 'सर्वोत्तम' पर जोर दिया जाता है, जबकि हमारे कामगार एवं मालिक दोनों ही 'चलता है' की नीति एवं वृत्ति से काम करते हैं!

अब हमें सचेत होना ही होगा यदि हम वास्तव में ठोस प्रगति करना चाहते हैं। हमें अपने चिंतन में मानव जीवन के उद्देश्य को समझने का बिंदु सर्वोच्च स्थान पर रखना होगा। यदि हम मानव जीवन का उद्देश्य भली-भांति समझ सके और उसे हृदयंगम करते हुए अपने कार्यों और आचरण के माध्यम से उसे प्रकट कर सके तब ही हम पौरुष दिखाने में सफल हुए, ऐसा मानिये। हमारा गौरव एवं गरिमा किन बातों में है, इस सम्बन्ध में हमारी धारणा सुस्पष्ट होनी चाहिए। हमें हमारे लक्ष्य साफ तौर पर पता होने चाहिएं और उन्हें पाने के लिए योग्य (righteous) मार्ग भी। असली चैन, सुकून, शांति, आनंद आदि हमें 'योग्य एवं न्यायप्रिय' मार्ग पर चल कर ही प्राप्त हो सकते हैं। इसके लिए हमें अपनी मानसिकता का परिष्कार कर उसका स्तर ऊपर उठाना होगा और कर्मों की गुणवत्ता बढ़ानी होगी। मानसिक उत्कृष्टता एवं प्रत्येक कर्म की पराकाष्ठा तक पहुंचना कठिन तो हो सकता है परन्तु असाध्य नहीं। आगे के चरण में हमें उत्कृष्ट मानसिक स्तर से और ऊपर उठकर आत्मिक स्तर तक पहुंचना होगा, वहाँ तक पहुंचकर ही हम मानव जीवन के उद्देश्य को यथार्थतः समझ पायेंगे। फिर 'योग्य एवं न्यायप्रिय' (righteous) पथ पर चलते हुए यदि हम भौतिक रूप से कुछ अभाव या कठिनाई का सामना भी करते हैं, तो विश्वास कीजिए उस स्थिति में भी हम आनंदित ही रहेंगे; यह प्रयोग करने की तत्पश्चात् अनुभूत करने की बात है। .... इसके अतिरिक्त अभी और कुछ कहना मात्र शब्दों का दोहराव होगा। इतना पढ़कर ही जागरूक पाठक यह समझ सकते हैं कि हमारे देश के युवा पुरुषवर्ग को किस प्रकार के यत्नों एवं आचरण की आवश्यकता है, जिनसे उनका पौरुष यथार्थ में प्रकट हो और वे उस पर गर्व कर सकें। इति।

Wednesday, September 1, 2010

(३६) पुरुष मित्र

भारत की प्राचीन संस्कृति एवं समाज-व्यवस्था के अनुसार पहले परिवार के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने का कार्य मुख्यतः पुरुषों के कंधों पर ही होता था, अतः उनके शैक्षिक विकास पर अधिक जोर दिया जाता था; महिलाओं को मुख्यतः घरेलू कार्यों तक सीमित रखा जाता था। ... तो कार्यों के अनुसार ही उनका लालन-पोषण होता था। चूँकि एक लंबे समय से अनेक कारणों से हमारा देश गरीब था और विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार हमारे समाज में व्याप्त थे, अतः पुरुष-वर्ग में तदनुसार चालाकी अधिक थी; चलन के अनुसार दंद-फंद में भी वे लगे ही रहते थे। वहीं दूसरी ओर स्त्रियों को अपेक्षाकृत बहुत अच्छे संस्कार प्राप्त होते थे, क्योंकि वे आर्थिक और व्यापारिक मामलों से परे साफ-सुथरे धार्मिक माहौल में रह कर विकसित होती थीं। व्यस्क होने पर उनका विवाह कर दिया जाता था, और संस्कारवान होने के कारण विवाह पश्चात् वे सही मायनों में पतिव्रता, ससुराल-पक्ष के प्रति निष्ठावान और बच्चों की अच्छी परवरिश के प्रति निरंतर सचेत रहती थी। यद्यपि उनके पतियों में ऐसे गुण पर्याप्त मात्रा में नहीं होते थे, तदपि स्त्रियों के तेज के बल पर स्थितियां काफी हद तक संतुलित हो जाती थीं। बहुत से विद्वानों का भी यह प्रबल मत है कि अपने यहाँ की स्त्रियों के सतीत्व एवं तेज के कारण ही इतने भ्रष्टाचारी झंझावातों के बावजूद भारत का अस्तित्व बना हुआ है।

पहले भारत में लड़के और लड़कियों की अलग-अलग शिक्षा का प्रावधान या चलन था, सह-शिक्षा का चलन नहीं था। परन्तु धीरे-धीरे स्थितियों में परिवर्तन हुआ और स्त्रियों की सहभागिता क्रमशः पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों में बढ़ी। लड़कियों और लड़कों में सामाजिक भेद-भाव कम होता गया और पश्चिम की भांति भारत में भी सह-शिक्षा आरंभ हो गयी। भौतिक विकास एवं प्रगति की दृष्टि से यह बहुत उत्तम था। प्राचीन भारतीय इतिहास में भी अनेकों उदाहरण मिलते हैं जब पुरुषों के कमजोर या कम पड़ने पर उनकी स्त्रियों ने उनके कंधे के साथ कंधा मिलाकर परिस्थितियों का सामना किया और उन पर विजय प्राप्त की; हमारी धार्मिक संस्कृति में तो स्त्री को शक्ति-स्वरूप माना ही गया है। तो फिर यह बात तो मान्य करने योग्य है कि देश को बहुमुखी विकास के लिए स्त्री-शक्ति की आवश्यकता थी, और समय ने स्त्रियों को यह अवसर प्रदान किया।

परन्तु वर्तमान भारतीय परिस्थितियों में इस पद्धति के कारण सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की अनेक क्षतियाँ भी दृष्टिगोचर हो रही हैं। संभवतः वे इसलिए हैं क्योंकि हमारा देश मानसिक रूप से अभी भी परिपक्व एवं संतुलित नहीं है, बल्कि असंतुलन पहले की अपेक्षा बढ़ गया प्रतीत होता है। विकसित देशों ने अपने कठोर परिश्रम से जो कुछ धीरे-धीरे कई वर्षों में प्राप्त किया, वह हमें वैश्वीकरण के कारण एकाएक प्राप्त हो गया। हमारा देश विश्व के व्यापार-जगत के लिए एक बड़ी मंडी बन गया। चूँकि भारत में अनेक कारणों से भ्रष्टाचार पहले से ही बहुत अधिक था, अतः अब इस अचानक आयी विकास की आँधी में दुनिया भर का कूड़ा-करकट हमारे यहाँ बिकने व खपने लगा, उपभोक्ता वस्तुओं में नित नए-नए ऊटपटांग वैशिष्ट्यों (features) की मांग हमारे यहाँ ही सर्वाधिक है। हमारे देश में व्याप्त गरीबी, अपेक्षाकृत सस्ती दर पर उपलब्ध कर्मचारी, भ्रष्टाचार, चालाकी आदि का लाभ अनेक कंपनियों ने अपना व्यापार बढ़ाने के लिए लिया। इन्हीं सब कारणों से हमारे देश का युवा-वर्ग पिछले कुछ वर्षों में और अधिक दिग्भ्रमित व भ्रष्ट हुआ है, खासतौर पर पुरुष युवा-वर्ग! इसी को हम मानसिक असंतुलन कह सकते हैं। विडम्बना एवं दुर्भाग्य की बात है कि भारत में स्त्री-जाति में भी कुछ ने भी पुरुषों में व्याप्त अनैतिक मूल्यों का अनुसरण करना आरंभ कर दिया है; यह भारत की वर्तमान तस्वीर का सबसे नकारात्मक पहलू है।

आत्मा तो सबमें एक समान है, परन्तु हममें से अधिकांश अभी तक आत्मिक स्तर तक नहीं पहुंचे हैं, शारीरिक व मानसिक स्तर पर ही हैं; अतः उसी के अनुसार देखें तो ईश्वर या प्रकृति ने स्त्री व पुरुष देह को शारीरिक व मानसिक भिन्नताएं प्रदान की हैं। इनमें से अधिकांश भिन्नताओं से हम परिचित हैं, कुछ की हमने ऊपर चर्चा भी की है। मानसिक व आध्यात्मिक रूप से अधिक सुदृढ़ होने के अतिरिक्त स्त्री में एक अन्य विलक्षण योग्यता गर्भ-धारण की है। यद्यपि पुरुष की भूमिका भी उसमें रहती है, परन्तु नवजीवन का संवर्धन नारी-देह में ही संभव है और इस प्रक्रिया का भार एवं कष्ट उठाना उसी के बस का है। शारीरिक सम्बन्ध स्थापित होने पर पुरुष-देह में न कोई परिवर्तन होता है और न ही उसे कोई कष्ट होता है, इसी बात का लाभ भ्रष्ट मनःस्थिति में पहुंचा पुरुष कभी भी उठा सकता है। प्राचीनकाल में जब समय अपेक्षाकृत बेहतर था तो भी स्त्रियों को विवाह से पूर्व अपने कौमार्य को सहेज कर रखने की शिक्षा दी जाती थी, इसके परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जो अनेकों लाभ होते थे उनसे सभी परिचित एवं सहमत होंगे; परन्तु आज अपरिपक्व मानसिक व शारीरिक अवस्था ही में सह-शिक्षा आरंभ हो जाने से स्त्री-पुरुष मित्रता कब दिग्भ्रमित हो जाये इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता और वह भी तब जब नैतिक मूल्य इतने निम्न स्तर पर पहुँच चुके हों। गिरे हुए नैतिक माहौल और मानसिक अपरिपक्वता के चलते अधिकांशतः युवा-वर्ग स्वच्छ व स्वस्थ मित्रता को अधिक समय तक अक्षुण्ण नहीं बनाए रख पाता और विशेषकर पुरुष युवा में कभी भी नैतिक गिरावट आ सकती है। इस नैतिक पतन से पुरुष की तो कुछ खास क्षति नहीं होती, परन्तु स्त्री को अत्यधिक शारीरिक या/और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है। नैतिक मूल्यों की रक्षा के मामले में स्वाभाविक रूप से समाज की अपेक्षाएं भी स्त्रियों से ही अधिक होती हैं, क्योंकि परोक्ष पशुवत-वृत्ति के कारण पुरुष-जाति से तो पहले से ही कोई अच्छी उम्मीद नहीं होती; ... वैसे अपवाद कहीं भी संभव हैं!

अतः मित्रता विशेषकर युवा-वर्ग की मित्रता के मामले में स्त्री को बहुत ही सतर्क रहने की आवश्यकता है। युवावस्था में वैसे ही मन-मस्तिष्क अपरिपक्व होता है, ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि इस समय सामाजिक नैतिक स्तर भी न्यूनतम गहराइयों को छू रहा है और युवा पुरुष के मन में बैठा शैतान कब जाग जाये, कोई भरोसा नहीं! आजकल तो कितने पवित्र रिश्ते भी पतित होने के समाचार नित मिल रहे हैं। इस प्रकार गर्त में चले जाने से पुरुषों को तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता, परन्तु स्त्रियों पर उनकी शारीरिक संरचना, कोमल मानसिकता, अच्छे संस्कारों एवं समाज की अपेक्षाओं के कारण बहुत अधिक दबाव पड़ता है और वे अवसाद की स्थिति में जा सकती हैं। यह भयावह स्थिति है और निःसंदेह हमारे रोगग्रस्त पुरुष-प्रधान समाज की देन है। इस कठिन समय की माँग यही है कि स्त्रियां स्वयं ही सचेत रहें, विशेषकर युवावस्था में बहुत ही सचेत रहने की आवश्यकता है; पुरुष मित्र कितना ही भला क्यों न लगे, उससे एक सीमा तक ही सम्बन्ध रखने चाहियें। आज का मन का अच्छा भाव सदा बने रहने में भी संदेह है। अतः संवेदनशीलता तो रहे, परन्तु 'कोरी भावुकता' से परे रहने में ही भलाई है (स्त्रियां मूलतः बहुत नम्र व सरल स्वभाव की होती हैं, एक बार उनका विश्वास जीतकर उनकी कोमल भावनाओं से खेलना बहुत आसान होता है)। फोन नंबर और ईमेल पता देने तथा फोन, SMS एवं ईमेल आदि करने में पीछे ही रहें; एक तो इन सब में उलझने से समय बहुत नष्ट होता है साथ ही दूसरे द्वारा इनके गलत प्रयोग की संभावनाएं प्रबल रहती हैं, दुधारी तलवार के समान हैं ये - लाभ भी पहुंचाते हैं और हानि भी! अतः आधुनिक गैजेट्स का प्रयोग बहुत सोच-समझकर करें। एकांत में मिलने से परहेज करें, तथाकथित गुरुपद के पुरुषों तक का ईमान भी एकांत में डोल जाता है। व्यर्थ के दिखावों और भेड़चाल में कदापि न फंसें; अपनी मूलभूत आवश्यकताओं, अधिकारों एवं लक्ष्यों को भली-भांति पहचानें और उन्हें सर्वप्रथम प्राथमिकता देकर एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर पाने का प्रयास करें। अतः पुरुष-वर्ग की कमियों को ध्यान में रखते हुए उससे 'निरंतर' सतर्क रहने में ही समझदारी है, भले ही आपको लगता हो कि समाज में अपवाद भी मौजूद हैं और आपके पुरुष मित्र उनमें से एक हैं! बाद में जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, जागरूक स्त्रियों के व्यवहार में परिपक्वता स्वयं ही आती जाती है। बस केवल कुछ वर्षों के ही संयमित अभ्यास की आवश्यकता होती है फिर स्थाई मानसिक मजबूती आ जाती है, तब हम शारीरिक स्तर से ऊपर उठकर क्रमशः मानसिक व आत्मिक स्तर तक पहुँच जाते हैं। यह परिपक्वता सभी भयों को समाप्त कर देती है। इति।

Saturday, August 28, 2010

(३५) प्रगति की दौड़

आज सांसारिक प्रगति का रथ पूरी रफ़्तार से भागता दीख रहा है। नित्य नवीन अन्वेषण किये जा रहे हैं, खोजें की जा रहीं हैं। प्रतिदिन हम अनेकों नए उपभोक्ता सामानों के विषय में पढ़ते, सुनते और देखते हैं। पहले से उपलब्ध उपभोक्ता वस्तुओं में भी नित नए-नए सुधार कर उनमें और अधिक वैशिष्ट्‍य (features) डालने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है। आज विभिन्न सेवा-प्रदाताओं (service providers) और उनके प्रबंधकों का एक ही नारा है कि - "नित नवीन परिवर्तन करो, अन्यथा मिट जाओगे"; अर्थात् आज सभी कम्पनियाँ अपने उत्पादों में रोज ही कुछ न कुछ परिवर्तन करने हेतु प्रयासरत हैं और उनको लगता है कि यदि वे कुछ नया नहीं देंगे तो उनकी प्रतिद्वन्दी कम्पनी उनसे बाजी मार ले जायेगी। सभी उत्पादकों एवं सेवा-प्रदाताओं को प्रतिद्वंदिता का भय निरंतर सताता रहता है, इसीलिए वे अपने उत्पादों या सेवाओं में नित नए बदलाव करते रहते हैं।

अर्थात् नित नवीन परिवर्तन का कारण समाज-सहाय्य नहीं वरन निज-सहाय्य है, उत्पादकों एवं सेवा-प्रदाताओं का अपना ही स्वार्थ छुपा है रोजाना के बदलावों के पीछे। इसके लिए वे व्यवसाय-प्रबंधन एवं कंप्यूटर-सॉफ्टवेयर से सम्बंधित प्रतिभाओं की मदद लेते हैं। इसीलिए MBA और CS के कोर्स की आज बड़ी धूम है! इनसे जुड़ी प्रतिभाएं अपनी नियोक्ता कम्पनियों के लिए यह सुनिश्चित करती हैं कि कम समय में अधिक मुनाफा हो! हाँ, यह बात अलग है कि इस प्रतिस्पर्धी दौड़ में कभी-कभी उपभोक्ताओं का फायदा भी हो जाता है। समझने के लिए एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा - वह है मोबाइल फोन का! इस क्षेत्र में चाहे आप मोबाइल सेट की बात करें या फिर इससे जुडी सेवाओं की, दोनों ही मामलों में रोजाना नयी-नयी बातें जानने को मिलती हैं; नित्यप्रति मोबाइल-सेट में कोई न कोई विशिष्टता जुड़ जाती है या फिर किसी सेवा-प्रदाता द्वारा किसी नयी योजना की घोषणा की जाती है। यह अलग बात है कि इन घोषणाओं के पीछे कुछ न कुछ शर्तें भी छुपी होती हैं, और ये इतनी अधिक छुपी होती हैं कि आप उन्हें ठीक से देख, पढ़ या सुन नहीं सकते! रोज के सब्जबाग देखकर आप खुश हो जाते हैं और उन योजनाओं में फंस जाते हैं; इतना अधिक फंस जाते हैं कि आपको उनमें उलझकर मजा आने लगता है; यह ठीक वैसा ही कुछ है कि जैसे दाद को खुजलाने में तो मजा आता है पर साथ ही दाद भी निरंतर बढ़ता जाता है। यह तो मात्र एक उदाहरण था, बारीकी से देखें तो आपको अनेकों ऐसे प्रसंग अपने आसपास ही दिखाई पड़ेंगे। सभी कम्पनियों का आज एक ही लक्ष्य है कि व्यापार में मुनाफा शीघ्रतम व अधिकतम होना चाहिए, भले ही कितने दंद-फंद क्यों न अपनाने पड़ें! वैसे अधिकारिक तौर पर इन सबके पीछे यही घोषणाएं की जाती हैं कि "यह सब लोक-हितार्थ और सबके सुख के लिए किया जा रहा है और न जाने कितने नौजवानों को इससे रोजगार भी मिल रहा है"; सरकार का अनुमोदन भी इस प्रकार के वक्तव्यों को रहता ही है! ... इस प्रकार के प्रयत्नों और व्यापारों से आज लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी है; इसलिए जनता भी मस्त, सरकार भी मस्त!

अतः आज भौतिक प्रगति या बारम्बार त्वरित परिवर्तन के पीछे यही तर्क दिया जाता है कि यह सब लोगों के सुखों में बढ़ोत्तरी करने के लिए किया जा रहा है और इसी से हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं। यद्यपि इसमें कोई भी संदेह नहीं कि बहुत सी खोजों, अन्वेषणों एवं परिवर्तनों ने मानव जीवन को बहुत आराम और सुविधाएं प्रदान की हैं; परन्तु साथ ही मेरा यह भी मानना है कि प्रत्येक भौतिक वस्तु के विकास, खपत, प्रयोग एवं उपयोगिता का एक संतृप्ति बिंदु (saturation point) होता है। उस बिंदु पर पहुँचने के पश्चात् या तो ठहराव आ जाता है या फिर विकास की गति बहुत मंथर हो जाती है। किसी वस्तु के विकासक्रम में कभी न कभी हम उस बिंदु तक पहुँच जाते हैं। उस स्थिति तक पहुँचने के बाद भी यदि हम स्वार्थवश एवं लाभ कमाने हेतु जबरदस्ती उसमें और अधिक परिवर्तन कर उसे 'दोहते' रहते हैं तो बजाय सुख देने के वह वस्तु दुःखों का कारण बन जाती है; परन्तु हम तो मार्केटिंग के उस्ताद हैं, इसलिए न यह सत्य मानते हैं और न मानने देते हैं! बहुत सी उपभोक्ता वस्तुओं के मामलों में हम देख सकते हैं कि बहुत समय से उनमें कोई भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ, या कभी कुछ परिवर्तन किये भी गए तो भी अंततः हमें पुराने ढर्रे पर लौटना पड़ा; अर्थात् शायद वे वस्तुएं अपने विकासक्रम में संतृप्ति बिंदु को छू चुकी थीं! इनके उदाहरणों में प्रमुख हैं- ब्लेड, चाकू, कैंची, आलपिन, सेफ्टीपिन, टिच-बटन, नेल-कटर, पेपर-क्लिप, पेंसिल, पेन, स्याही, कंघा, ट्यूबलाइट, माचिस, जूता, चप्पल, घरेलू हाथ के औजार, धागा, छाता, टेबललेम्प, पंखा, साबुन, और इनके अलावा भी न जाने कितने! इनमें से कई सामानों पर कम्पनियाँ हर कुछ माह के बाद 'नया' या 'NEW' लिख कर पेश तो अवश्य करती हैं, पर ध्यान से देखें तो वस्तुतः यह परिवर्तन नहीं बल्कि दोहराव ही होता है।

यदि किसी वस्तु में कुछ सुधार या परिवर्तन करने पर वास्तव में उस वस्तु का परिष्कार होता हो और उसके जरिये मानव को वास्तव में पहले से अधिक सुविधा-सहायता मिलती हो, उसकी ऊर्जा वास्तव में बचती हो, तो उन परिवर्तनों एवं सुधारों का स्वागत होना चाहिए; परन्तु परिवर्तन के पश्चात् यदि एक सुख देकर वह वस्तु दो दुःख बढ़ा रही हो या ऊर्जा व समय की खपत बढ़ा रही हो तो ऐसे परिवर्तन से तो बचना ही बेहतर! ... परन्तु आज हम इतना तेज भाग रहे हैं कि नकारात्मक पक्षों को बहुधा अनदेखा कर जाते हैं, और परिवर्तन को ही उत्तरजीविता (survival) का 'एकमात्र' आधार मानते हैं; जबकि हम देखते हैं कि समय के साथ प्राकृतिक वस्तुओं में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है और यदि कोई आया भी है तो नकारात्मक दिशा में ही, वह भी जबरन मानवीय हस्तक्षेप के कारण! .... यदि हम एक कुशल चित्रकार हैं तो किसी चित्र को बनाकर उसमें एक हद तक ही सुधार करते हैं अन्यथा बजाय सुधरने के वह बिगड़ सकता है! बारम्बार सुधारों के बजाय हम नित नए-नए चित्र तैयार करते हैं। हमारी हर रचना अपने आप में अनूठी होती है।

आजकल अधिक माल खपाने की वृत्ति भी व्यापार-जगत में खूब है। विडम्बना ही है कि किसी राष्ट्र की उन्नति या विकसित होने का पैमाना (मापदंड) भी आज यही है कि उस देश में कितना अधिक सामान उपभोग किया जाता है। अरे, ... कोई एक सीमा तक ही अपने मनपसंद लड्डू खा सकता है, या एक हद तक ही पानी पी सकता है; सीमा से परे उपभोग करने से अस्वस्थ होना निश्चित ही होता है। परन्तु फिर भी .... हम हैं कि बस लगे ही हुए हैं!! अंधानुकरण जोरों पर है!

आज जिन मनोरथों या कार्यों के द्वारा मनुष्य स्वयं को या अपने संघ को सुखी करना चाहता है, उसके द्वारा सुख तो नहीं प्राप्त होगा, दुःख ही बढ़ेगा! आज मनुष्य भ्रमवश सेवा और विकास के नाम पर विनाश की ओर जा रहा है, धोखेबाजी और स्वार्थसिद्धि का बोलबाला तेजी से बढ़ता जा रहा है; और सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि इसी प्रकार की परिपाटी या चलन को लोग सही व प्रासंगिक मान रहे हैं, फलतः खुलेआम भ्रष्टाचार हो रहा है। इन्हीं सब को जीवन का कर्तव्य मानकर लोग उत्साहपूर्वक इसी में जुट रहे हैं। गलत कामों को सही समझने पर तो व्यक्ति में बुराई बढ़ती ही जाएगी। इस प्रकार की मानसिकता विकसित हो जाने से इस मानव-जीवन के अमूल्य क्षण व्यर्थ बल्कि अनर्थ में बीत रहे हैं। सच्चा सुख तो शांति में है, और अनर्गल उपभोक्तावाद व भ्रष्टाचार शांति नहीं अशांति का जनक है। अग्नि से शीतलता नहीं प्राप्त हो सकती, आग तो जलाएगी ही; उसी प्रकार ऊटपटांग भोगवृत्ति और आसक्ति भी अशांति ही पैदा करेंगे।

वास्तव में भोग भी उतने बुरे नहीं हैं, जितनी बुरी भोगों के प्रति आसक्ति है। भौतिक रूप से साधन-संपन्न होते हुए भी, भोग करते हुए भी, उनके प्रति अनासक्त रहा जा सकता है; इसके विषय में चर्चा हम पूर्व के कुछ लेखों में कर ही चुके हैं। आज भोगों के प्रति तीव्र आसक्ति ही हमें मानवता और उसमें छुपी ईश्वरता से परे ले जा रही है, आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा पतन होता जा रहा है। .... बात घूमफिर कर फिर से वहीं पर आ जाती है कि परिवर्तन और प्रगति की आपाधापी में हम संतुलन खोते जा रहे हैं। प्रवृत्ति और निवृत्ति जैसे शब्दों और उनके अर्थों को भुला बैठे हैं; सहज उपलब्ध गीता-ज्ञान से परे चले गए हैं, भगवत्भक्ति से दूर चले गए हैं, अपने-आप से अपरिचित होते जा रहे हैं! दुनिया को भौतिकता व आध्यात्मिकता के बीच संतुलन का पाठ पढ़ाने वाले भारतवासी आज स्वयं ही असंतुलित होते जा रहे हैं, और तिस पर भी विडम्बना यह कि इस असंतुलन की अवस्था को ही आज संतुलन एवं स्वस्थता का परिचायक माना जा रहा है। ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता, सत्य जैसे नैतिक मूल्य विकास की बलिवेदी पर आहूत किये जा चुके हैं। आत्मा के मूलभूत गुणों एवं आत्मिक ध्वनि को आज अप्रासंगिक घोषित कर दिया गया है। तो क्या यह सत्य नहीं कि अनर्गल विकास और प्रगति की दौड़ ने हमें क्रमशः आत्मिक प्राणी से शारीरिक प्राणी और फिर शारीरिक प्राणी से संवेदनहीन मशीन में परिवर्तित कर दिया! देखा जाये तो यह भी एक प्रकार का परिवर्तन ही है, और लोग तर्क देते हुए यह चिरपरिचित पंक्ति पुनः कहेंगे कि 'परिवर्तन ही शाश्वत सत्य है'!! इति।

Thursday, August 19, 2010

(३४) वर्तमान भारत

स्वतंत्रता के 63 वर्ष बाद भारत की वर्तमान अवस्था का यदि अवलोकन किया जाये, तो अधिकांश चिंतकों, अर्थशास्त्रियों एवं अन्य मूल्यांकन करने वालों के यही वक्तव्य प्रकाश में आते हैं कि भारत की प्रगति की गति बहुत अच्छी है। अधिकतर विद्वान प्रगति का मापदंड तय करने के लिए भारत की तुलना पाकिस्तान से करते हैं; क्योंकि उनके अनुसार भारत व पाकिस्तान एक ही समय स्वतंत्र हुए और दोनों की भौगोलिक स्थितियां लगभग समान थीं/हैं; और पाकिस्तान की तुलना में इस समय भारत आर्थिक, सामरिक व औद्योगिक दृष्टि से बहुत आगे है। जब हमारे अगुआ विद्वानों का यह विचार बनता है तो फिर देश का आम नागरिक भी यही सोचने लगता है और सभी का सीना गर्व से थोड़ा और चौड़ा हो जाता है। होना भी चाहिए!

पाकिस्तान ने अनेक बार भारत पर टेढ़ी नजर की और हर बार हमने उसे मुंहतोड़ जवाब दिया, कई युद्धों में अनेक अवसरों पर हमारे मुट्ठी भर जवानों ने बड़ी पाक सेना के छक्के छुड़ा दिए, जब-जब हम पर आतंकवादी हमले हुए हमने उन्हें कुचल दिया, अमरीका से भी अनेक बार पाकिस्तान को डांट पड़वा कर हमने उसके खिलाफ अपना राजनीतिक दबदबा भी कायम किया; ... यह अलग बात है कि अधिकतर अवसरों पर हमें पाकिस्तानी मंसूबों की भनक तक नहीं लगी, ... कारगिल और मुंबई जैसी घटनाएं कोई रोज-रोज थोड़े ही होती हैं!! एकदम से कोई हमारे घर में घुस आए तो निपटने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है! अब हमारे सोने के समय कोई चुपके से घुस आए तो क्या किया जा सकता है?? खैर अंततः हमने उन्हें मार तो गिराया। एक को तो जिंदा भी पकड़ लिया! कारगिल और मुंबई की घटनाओं में हमारा जो नुकसान हुआ, उसकी बात करना फिजूल है, प्यार और जंग में सब जायज़ है, और फिर वह तो एक्सीडेंटल था। अंत भला तो सब भला! भई हमारा मीडिया भी कितना तरक्की कर गया है, पाकिस्तान तो मुकाबले में कहीं नहीं ठहरता!! मुंबई में तो मीडिया ने कमाल ही कर दिया। पल-पल की लाइव खबरें मिलना वास्तव में रोमांचकारी था। और कमाल की बात देखिये कि भले ही हमारे जवानों की अत्याधुनिक, स्वचालित, टेलीस्कोपिक बंदूकों की गोलियाँ आतंकवादियों तक देर में पहुंची मगर मीडिया के कैमरों की पहुँच में वे लगातार बने रहे!! वैसे देखा गया है कि अधिकतर नागरिक (civic) मामलों में मीडिया के कैमरों की नज़र सुरक्षा/जाँच विभाग की नज़रों से तेज होती है। शाबास मेरे देश के वीर मीडिया-कर्मियों!!

युद्ध, लड़ाई, आतंकवाद आदि की बात छोड़ जरा खेलों की दुनिया में आइये। भारत ने कितनी बड़ी-बड़ी खेल स्पर्धाएं पिछले कुछ वर्षों में आयोजित कीं, पाकिस्तान तो हमसे बहुत पीछे है! अभी ताजा खबर तो पूरे विश्व को पता ही होगी कि भारत में राष्ट्रकुल/राष्ट्रमंडल/कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन हो रहा है; तैयारियां अंतिम चरण में हैं। हम यह करवा रहे हैं, पर पाकिस्तान तो फिसड्डी है; पदक वगैरह भी पाकिस्तान से अधिक हमें ही मिलते हैं। यह बात अलग है कि इतने बड़े आयोजन में कुछ गड़बड़ियां तो होती ही हैं! क्या कहा? ...आपको गड़बड़ियां-घोटाले कुछ अधिक ही लग रहे हैं?? अजी, मीडिया वाले तो कुछ भी उल्टा-सीधा बकते रहते हैं!! इसी की तो रोटी खा रहे हैं वे!! एक समाचारपत्र छापता है कि चीन ने इतने बड़े ओलम्पिक का आयोजन इतनी सफलतापूर्वक कर दिखाया कि सारा विश्व हैरान रह गया, कोई गड़बड़ी नहीं, कोई घोटाला नहीं , किसी स्टेडियम की छत टपक नहीं रही थी, कहीं ट्रैफिक-जाम नहीं, सब व्यवस्था चाक-चौबंद, बिलकुल फिट!! अजी सब बकवास है .... दूसरे की बीवी हमेशा अपनी से अच्छी लगती है, ... ऐसे ही सब तारीफ करते रहते हैं चीन की!! अरे, अगर उसने वास्तव में इतना सफल आयोजन कर भी लिया तो इसमें हैरत की बात क्या है भाई!? ... उसकी जनसँख्या देखो, क्षेत्रफल देखो; सब हमसे अधिक है तो फिर हैरानी की बात क्या?! मीडिया वाले तो कुछ समझते ही नहीं हैं! ... हमारा देश गरीब देश है, रोज ऐसे आयोजन थोड़े ही होते हैं, कभी-कभी तो होते हैं; और कभी-कभी तो मौका मिलता है कि दो पैसे अतिरिक्त कमा लिए जायें! इसमें बुरा क्या है? ... जो छत टपक रही थी स्टेडियम की, वह ठीक तो गयी न अंत में; कुर्सियां जो घटिया थीं वे बदलवा दी जायेंगी! जो कुछ कमी रह गयी है, भागते-दौड़ते वह भी आखिर तक पूरी हो ही जायेगी, फिर इतना चीखना-चिल्लाना किसलिए भाई?? ... अब बस करो!! इतना बड़ा देश, इतनी समस्याएं, धरना-प्रदर्शन; सबसे निपटना है हमें, और मीडिया वाले हैं कि बस शोर मचा रखा है! उफ्फ्फ !!

यह थी एक बानगी हमारे देश के आकाओं की, नीति-निर्माताओं की। ..... इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारा देश प्रगति के पथ पर है, भले ही रफ़्तार बहुत कम हो या खोखलापन हो! विकास-गति का कम होना या खोखलापन होना इसलिए क्योंकि देश के अधिकांश चिन्तक व नेता यह मूलभूत सूत्र भुला बैठे हैं कि जब हम सीखने की या आगे बढ़ने की प्रक्रिया में होते हैं तो हमें स्वयं की तुलना सदैव अपने से उच्च अर्थात् उन्नत व श्रेष्ठ लोगों से करनी चाहिए, निचली अवस्था के लोगों से नहीं! हम बारम्बार अपनी तुलना पाकिस्तान जैसे छोटे, कमजोर व अपरिपक्व देश से करते रहते हैं एवं खुश होते रहते हैं। परन्तु जहाँ चीन जैसे विकसित या अपेक्षाकृत उन्नत विकासशील देशों से तुलना की बात होती है, वहाँ हम उनकी समृद्धि के अनेकों कारण गिना देते हैं, जैसे वहाँ की भौगोलिक स्थिति हमसे बेहतर है, जनसँख्या कम है, भूमि अधिक है, भूमि उर्वरक है, बहुत पहले से आजाद हैं, आदि-आदि। ये सब बहाने हैं अपनी कमजोरियों को छुपाने के! सत्य यही है कि कोई भी देश हर बात में परिपूर्ण नहीं है, किसी को प्रकृति ने कुछ प्रदान किया है तो किसी को कुछ और!! शेष सब हमारे क्रियमाण (वर्तमान ऐच्छिक कर्म) पर निर्भर करता है कि हम उसके बल पर शेष कमियों की कैसे भरपाई कर पाते हैं! और आज यदि हम मंथर हैं, धीमे हैं तो इसका कारण हमारा कमजोर क्रियमाण है। हमारे प्रयास कमजोर हैं केवल इसी कारण हम पीछे हैं और बहाना करते हैं अपने कमजोर शरीर-सौष्ठव का यानी प्राकृतिक संसाधनों की कमी का। चीन से तुलना होते समय बहुधा हमारे चिन्तक यही बात करते हैं। .... परन्तु मनःस्थिति के विषय में कोई विरला ही बात करता होगा। मैंने पहले के कुछ लेखों में भी इस बात को उठाया है कि उन्नति या अवनति के पीछे असली चीज मनःस्थिति ही होती है। जिसमें जितना जोश है, जिसका दिल जितना साफ है, वही वास्तव में आगे बढ़ सकता है। मनःस्थिति की भिन्नता के कारण ही आज पाकिस्तान हमसे पीछे है और चीन हमसे बहुत आगे है। इस सन्दर्भ में जापान और दक्षिण कोरिया जैसे छोटे देशों का उदाहरण भी हमारे समक्ष है। मैं यह नहीं कहता कि ये सब राष्ट्र परिपूर्ण हैं , पर यह तो सत्य है कि ये हमसे बहुत आगे हैं।

अर्थात् जिसमें कर्मठता है ईमानदारी के साथ, वह ही वह ठोस उन्नति कर सकता है। वैसे भी देखिये जब हम रेस में दौड़ रहे होते हैं तो हम केवल अपने से आगे के लोगों को देखते हैं पीछे के नहीं; हम पूरी लगन और ईमानदारी से दौड़ लगाते हैं , रेफरी की निगाह भी हम पर होती है, कोई बेईमानी नहीं चल सकती; हम नियमों से बद्ध होकर दौड़ते हैं अन्यथा हम दौड़ से बाहर हो सकते हैं। ईमानदारी से पूरा जोर लगाने पर जिस नंबर पर हम आते हैं उस समय उसी से संतोष करते हैं, पीछे रह जाने वालों को दिलासा देते हैं और आगे निकल जाने वालों को सराहते हैं, ... यही खेल-भावना होती है। सब एक से सामर्थ्यवान नहीं होते फिर भी अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार सभी प्रतिभागी अधिकतम एवं ईमानदार क्रियमाण करते हैं और जो फल मिलता है उससे संतुष्ट होते हैं। लेकिन जरा उस प्रतिभागी के बारे में विचार कीजिये, जो ठीक से मेहनत नहीं करता, बेईमानी से जीतने की सोचता है, वह भी अपने प्रयास में कभी-कभी सफल हो जाता है; परन्तु उसकी सफलता प्रायः अस्थाई होती है। किसी न किसी प्रकार वह पकड़ा ही जाता है और उसका जीता हुआ पदक उससे छीन लिया जाता है; और यदि वह इस बार पकड़ा न भी जाये तो अगले खेलों में वह अपना यह कारनामा फिर से दोहरा नहीं पाता है। अतः हमने देखा कि इस प्रकार की सफलता प्रायः अस्थाई ही होती है। हो सकता है कि वह सबको चकमा देने में हर बार सफल हो जाये, परन्तु अपने आप के आगे तो वह बारम्बार बेनकाब होता ही रहता है और कभी न कभी अपराध-बोध से ग्रस्त हो व्यथित व प्रताड़ित हो सकता है।

दुःख की बात है कि हमारे भारत में आज लगभग प्रत्येक क्षेत्र के अगुआओं की यही दशा है - न्यूनतम प्रयास कर येनकेन-प्रकारेण अधिकतम प्राप्त करने की वृत्ति! जब अगुआ ऐसे तो फिर अनुगामी तो तदनुसार होंगे ही! जबकि हमारे ही विश्लेषणों से हम यह जानते हैं कि इस प्रकार प्राप्त की गयी सफलता या तो अस्थाई होती है या फिर बिलकुल खोखली। कागजों पर, आंकड़ों में निश्चित रूप से हम अपने राष्ट्र को काफी आगे दिखाने में सफल हो गए हैं परन्तु अपने सामने हम अनावृत हैं। जब-जब आत्मा रूपी आईने का सामना होता है, तब-तब हम अपने नेत्र बंद कर लेते हैं। आँखें बंद कर लेने से सच्चाई नहीं बदल जाती! हमारे राष्ट्र का आध्यात्मिक अतीत इतना सुन्दर रहा कभी, परन्तु अब वह अतीत ही है। कभी किसी समय चरणबद्ध ढंग से मूर्तिपूजा आदि को लांघते हुए वेदांत ज्ञान तक जा पहुँचने वाले भारतवासी वर्तमान में इतने अधोगामी हो गए हैं कि वे कहीं भी यहाँ तक कि प्रार्थनालय (मंदिर आदि) में भी भ्रष्टाचार करने में संकोच नहीं करते। लेकिन ईश्वर रूपी रेफरी सब देख रहा है, पदक भी वापस छीने जा रहे हैं; किस रूप में यह कोई नहीं जानता ठीक से, और जो कोई जानता भी है वह मानता नहीं। क्रिया के फलस्वरूप एवं तदनुरूप प्रतिक्रिया निश्चित है। आखिर कब तक हम सत्य से भागते रहेंगे? इति।

Saturday, May 22, 2010

(३३) धनी और निर्धन

  • जिसकी जितनी अधिक आवश्यकताएं शेष हैं, वह उतना ही अभावग्रस्त है, और उतना ही गरीब भी।
  • अभावों की निरंतर अनुभूति ही घोर निर्धनता का लक्षण है। यदाकदा अभाव महसूस करना मध्यम स्थिति है। और कामनारहित व्यक्ति या स्वयं को वास्तव में अभावहीन समझने वाला व्यक्ति धनी है, भले ही उसके पास फूटी कौड़ी भी न हो!
  • जो मन से धनी है अर्थात् संतोषी है, वह सुखी है, क्योंकि उसका मन शांत है। और मानसिक रूप से निर्धन अर्थात् अशांत तथा स्वयं को सदैव अभावग्रस्त समझने वाला व्यक्ति बहुधा दुःखी ही रहता है।
  • नित नवीन भोगों को प्राप्त करने की इच्छा, विलासिता के संसाधनों को जुटाने की अभिलाषा एवं येनकेनप्रकारेण संग्रह की वृत्ति वास्तव में मन की गरीबी ही है।
  • कामनापूर्ति से संभवतः सुख की प्राप्ति संभव नहीं क्योंकि कामनाओं का तो अंत नहीं। किसी एक बिंदु पर यथार्थतः संतोष कर लेने पर ही सुख का अनुभव होना आरंभ होता है।
  • जिसको अपनी वर्तमान स्थिति पर संतोष है, जिसकी अभिलाषाएं अनासक्त हैं, जो अन्यों के ऐश्वर्य की उन्नति के प्रति ईर्ष्यालु नहीं; वह सदैव शांत व सुखी रहता है।
  • जो व्यक्ति चकाचौंध, तड़क-भड़क, अनाप-शनाप अधिकाधिक खर्च और ऊपरी दिखावे को ही परम-आवश्यक, गौरवशाली व सुख का कारण मानता है, वह इन सब कृत्यों से कभी भी खरा सुख नहीं पा सकता।
  • जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को मानसिक स्तर पर भी न्यूनतम कर लेता है, व्यथित नहीं होता; वह ही सुख को समीप से अनुभूत कर पाता है।
  • संतोष सुख का जनक है और सुखी व्यक्ति ही धनी है। असंतोष तो दुःख को ही जन्म देता है, और दुःखी व्यक्ति अर्थात् निर्धन ही! जो सही मायनों में संतोषी है, उसको किसी भी वस्तु का अभाव कभी क्षुब्ध नहीं कर सकता; सामान्य सांसारिक दृष्टि से कदाचित निर्धन व अभावग्रस्त दिखने के बावजूद वह परम शक्ति, शांति एवं सुख का निरंतरता से अनुभव करता है।
  • मानसिक व आध्यात्मिक रूप से धनी व्यक्ति में ही मानवता पायी जाती है। मानवीयता का प्रकाश व्यक्ति को त्याग, कर्तव्यनिष्ठा व कर्तव्यपालन आदि के लिए उकसाता है, तब वह सांसारिक धन और अधिकार के प्रति आसक्ति को छोड़ त्याग एवं कर्तव्यपालन हेतु उद्यत होता है।
  • त्याग का अर्थ यह नहीं कि किसी वस्तु का एकदम से त्याग कर दिया जाये, वरन ऐसा हो जाये कि किसी प्रकार से उस वस्तु के प्रति हमारी आसक्ति शून्य हो जाये। वस्तु या उसके प्रति आसक्ति के त्याग के पश्चात् हमारे मन में यह कदापि न रहे कि हमने कोई बड़ा महान कार्य किया है! यदि ऐसी धारणा रहती है तो त्याग तो हुआ ही नहीं!
  • आसक्ति के त्याग और आवश्यकताओं के न्यूनतम होते ही अमीरी आ जाती है; परन्तु जिसकी आवश्यकताएं व आकांक्षाएं अनंत हैं उसकी गरीबी कभी नहीं मिटती, चाहे उसकी भौतिक स्थिति कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाये! और जब तक गरीबी है, दुःख बना ही रहेगा!