Monday, August 6, 2018

(१०२) चर्चाएं ...भाग - 21

(१) क्या मौज, शौक और घूमना-फिरना, धन खर्च करना ही सुख है? सुख क्या है?
भौतिक जीवन के सुचारू सञ्चालन के लिए आवश्यक भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाना, मौज-मस्ती, घूमना-फिरना, शौक पालना और उन्हें पूरा करना आदि कोई भी बात यदि व्यक्ति के भीतर विद्यमान आध्यात्मिकता को क्षति न पहुंचाए तो सब करना ठीक है, उत्तम है, सुख को आमंत्रण है! ...आध्यात्मिकता को क्षति न पहुँचाने से तात्पर्य है कि समानांतर रूप से हम अपने अच्छेपन (सामान्य नैतिक गुण), मन की शांति आदि को हमेशा बरकरार रख पाएं. ....यही संतुलन ही हमें सम्पूर्ण व 'स्थाई' सुख दे सकता है, ..हमारी स्वयं की और हमारे राष्ट्र की 'ठोस' भौतिक उन्नति करा सकता है! यह कोई कठिन काम तो नहीं?! इस आदर्श सुखावस्था में हमारी आध्यात्मिक प्रगति भी स्वतः ही निहित व निश्चित है, फिर उसके लिए अलग से कोई अनुष्ठान-साधना आदि करने की जरूरत नहीं! ...वस्तुतः "योगः कर्मसु कौशलम्" यही है. कुशलता एवं संतुलन के साथ किया गया 'प्रत्येक' कार्य हमारी सर्वांगीण प्रगति सुनिश्चित करता है, हमें सुखी, शांत और महान बनाकर स्वतः ही हमें ईश्वर से जोड़ता है!
वैसे तो सुख-दुःख की परिभाषा व्यक्तिगत है. व्यक्ति में इस क्षण उपस्थित ज्ञान-विवेक से ही उसकी परिभाषाएं बनती हैं. ज्ञान-विवेक आदि का कम होना कोई दुर्बलता नहीं, लेकिन एक लम्बे समय तक ठहराव यानी ज्ञान-यात्रा का रुके रहना यानी संतुलन का अभाव बने रहना, यह अवश्य ही दुर्बलता है!

(२) चुप्पी को कमजोरी क्यों माना जाता है?
मैं यह तो नहीं कहता कि व्यक्ति को सदैव वाचाल ही रहना चाहिए और किसी भी विषय या बेवकूफियों पर भी जवाब अवश्य देना चाहिए; परन्तु अनुभवों से यही जाना है कि 'बहुधा' चुप्पी, व्यक्ति की किसी न किसी अपनी कमजोरी के कारण ही जन्म लेती है! ..हीनभावना, दब्बूपन, निठल्लापन, अव्यवस्थित होना, अनियमितता, अनमयस्कता, अनमना स्वभाव (किसी कार्य, विषय या व्यक्ति के प्रति गंभीरता का अभाव), असुरक्षा की भावना, डर, अपराधबोध, पोलपट्टी खुल जाने का भय, आलस्य, ईर्ष्या, नफरत, अहंकार, सामने वाले को कुछ भी न समझना, और इन जैसे अनेकों स्वभावदोष हमारी चुप्पी का कारण हो सकते हैं.

(३) अहंकार को कैसे मिटाएं अपने अंदर से?
अक्सर अहंकारी व्यक्ति को यह मालुम ही नहीं होता कि उसके भीतर अहंकार है! लेकिन जब कोई ऐसा प्रश्न करे कि, "अहंकार को कैसे मिटाऊं", तो इसका अर्थ है कि व्यक्ति को अपने स्वभावदोष पता चलने शुरू हो गए हैं और वह उन्हें कम (या समाप्त) करना चाहता है. यानी उसमें अब परिष्कार की प्रक्रिया शुरू होने को है. स्वभावदोष का पता चलना (उसका एहसास होना) उसके निर्मूलन की पहली शर्त है, वह पूरी हुई तो क्रिया अपनेआप आगे चलेगी!

(४) भगवान के पास भूत (अतीत) जमा हो जाता है, भविष्य भगवान के पास है?!
हम कर्मयोद्धा बने रहें, इस निमित्त आपके शब्दों में मामूली फेरबदल-- जो हम 'अतीत' में कर चुके, वो हो चुका, और सृष्टि के खाते में दर्ज हो चुका (वो हमारे हाथ में 'था' कभी)! जो हम 'अब' कर रहे हैं या 'भविष्य' में करेंगे, वह भी हमारे हाथ में है; ..बल्कि 'अब केवल वह ही' हमारे हाथ में 'है'! ..और उसके (हमारे कर्म के) फलस्वरूप आगे सृष्टि के नियमानुसार जो भी घटित होगा, उसके उत्तरदाई या कारण 'हम ही' होंगे! वैज्ञानिकों द्वारा खोजे गए आज तक के ज्ञात सभी नियम-सिद्धांत सृष्टि अथवा प्रकृति के ही हैं (जैसे न्यूटन द्वारा प्रतिपादित नियम)! वैज्ञानिकों ने ये नियम-सिद्धांत बनाये नहीं हैं, अपितु खोजे हैं! ये नियम-सिद्धांत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नहीं तो कम से कम इस पृथ्वी की तो प्रत्येक जीव-निर्जीव वस्तु पर लागू होते हैं! ..तो हम खुद को इस नियम-सिद्धांतों की परिधि से बाहर कैसे रख सकते हैं?! हम कोई 'एलियन' तो नहीं!

(५) भगवान हमारी हर गलतियों को माफ कर भी दें लेकिन हमसे जो कर्म हो चुका है, उसका क्या?? उसे कौन बदल सकता है? उसका फल तो अवश्य मिलता है!
हम अतीत में जो भी कर चुके, वो हमारे वश में था, लेकिन वो हो चुका! अभी हमारे हाथ में वर्तमान और भविष्य में किये जाने वाले कर्म शेष हैं, और उन पर हमारा सरासर वश है! शायद उनसे हम पुरानी क्षति-पूर्ति कर सकते हैं! ..किसी को गाली दे चुके तो अभी दिखावटी नहीं वरन 'हृदय से' माफी मांग सकते हैं, गले लगा सकते हैं; ..अतीत में पेड़ काट डाले तो अभी जागरूक होकर दोगुना वृक्षारोपण कर सकते हैं! ...अब जागृत हो कर ऐसे अनेकों प्रायश्चित्त और आत्म-परिष्कार हमारे वश में हैं. इससे हमारी गलतियाँ भुला तो नहीं दी जायेंगी, परन्तु उनका दुष्प्रभाव तो कम हो ही जायेगा. जैसे अपनी गलतियों से खोया सम्मान या आत्मसम्मान हमें सजा और अवसाद के गड्ढे में तो डालता है, पर फिर उनसे तौबा कर जब नेक काम हम शुरू करते हैं तो धीरे-धीरे हम कभी न कभी उबर भी सकते हैं. किस्से-कहानियों में ही नहीं, बल्कि हमें अपने आसपास भी ऐसे उदाहरण देखने को मिल सकते हैं, यदि हम सूक्ष्मता से निरीक्षण-आंकलन कर पाएं तो!

Monday, July 30, 2018

(१०१) चर्चाएं ...भाग - 20

(१) गौ हत्या के नाम पर आज इंसानों को मारना कहाँ तक तर्क संगत है...?? धर्म की राजनीति इंसान को कहाँ तक गिरा सकती है...आज देश में हो रही घटनाओं का दृश्य अति चिंताजनक है....इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
यहाँ राजा और मंत्री अपनी प्रजा को भलीभांति सुशिक्षित और सभ्य बनाने के बजाय सामंतशाही कानूनों और भाषणों से उसे उन्मादी और असभ्य बना रहे हैं; और इन सब के पीछे सत्ता का लालच है. गाय कितनी भी पूजनीय क्यों न हो पर क्या वह एक इन्सान से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है??? गाय तो गाय, खुले में घूम रहे उनके वंश के उपद्रवी सांडों, और यहाँ तक कि आवारा कुत्तों (स्ट्रीट डॉग्स) को भी इंसानी जीवन से ऊपर का दर्जा दिया जा रहा है. उनकी जनसंख्या दिनोंदिन बढती जा रही है, रोज वे अनेक लोगों को दौड़ाते हैं, घायल करते हैं, काटते हैं, प्राणघातक हमला करते हैं. लखनऊ सहित सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में आवारा पशुओं का भीषण आतंक है. यहाँ तो रेलवे स्टेशन के भीड़भाड़ वाले प्लेटफ़ॉर्मों पर भी इनको आतंक फैलाते कभी भी देखा जा सकता है. लेकिन 'पशु संरक्षण' के नाम पर 'इंसानी संरक्षण' की उपेक्षा समझ से बिलकुल परे है!!! ...विचित्र नगरी और विचित्र राजा हैं यहाँ!!! लगता है सत्तालोलुप राजा और कुंद-दिमाग जनता भांग पीकर बस उन्माद में ही मस्त हैं! असली विकास कहीं बहुत पीछे छूट गया है. मेरे विचार से आज जो भी विकास दिखाई पड़ रहा है उसे हम आभासी विकास या विकास की सूजन मात्र कह सकते हैं.

(२) जीवन को आनंदमय कैसे बनाया जाये? क्या मन हमेशा पवित्र रखने से ही यह संभव है?
'आनंद', प्रसन्नता के चरम की एक दिव्य अनुभूति है. और सही कहा आपने कि मन को हमेशा पवित्र बनाये रखने से ही यह संभव है. मन पवित्र रहेगा तो विचार भी पवित्र होंगे; विचार पवित्र होंगे तो कर्म भी उसी के अनुरूप श्रेष्ठ गुणवत्ता के ही होंगे. ..और नेक व न्यायसंगत कर्म करने के पश्चात् ही खरे 'आनंद' की अनुभूति होती है. ...लेकिन हमारे संघ में व्याप्त वर्तमान प्रदूषित वैचारिक वातावरण के चलते आज के समाज में खरी आनंदानुभूति के दर्शन दुर्लभ ही हैं! ..आपके मूल प्रश्न, "जीवन को आनंदमय कैसे बनाया जाये?" का व्यावहारिक या प्रैक्टिकल जवाब यह होगा कि, "आज के राजा और मंत्रियों (सलाहकारों) यानी देश के वैचारिक और कर्म-सम्बन्धी नीति-नियंताओं को सर्वप्रथम अपने मन में पवित्रता का भाव लाना होगा. पहले वे नेक, न्यायसंगत बन जायें और नैतिक मूल्यों व पर्यावरण का ध्यान रखते हुए इंसानी हितों की रक्षा का बीड़ा उठाएं, स्वयं सुशिक्षित व सभ्य हों तथा प्रजा को भी इसके लिए प्रेरित करें; ..तो उनका और शेष प्रजा का जीवन अवश्य ही आनंदमय होगा. साथ ही धर्म से जुड़े महानुभाव भी यदि लोकेषणा, जागतिक मोह, रूढ़ियों आदि को त्यागकर अध्यात्म के क्षेत्र में स्वयं भी प्रगति करें और अपने अनुयायियों के विचारों को भी प्रगतिशील बनाएं तो प्रजा का जीवन और भी अधिक आनंदमय होगा.

(३) सात्विक विचार क्या सात्विक भोजन से ही आते हैं?
हमारे समाज में व्याप्त धारणाओं और मान्यताओं के अनुसार बोलूं तो सात्विक भोजन से तात्पर्य केवल शाकाहारी भोजन से ही होता है, तथा मांस-मछली, अंडा, प्याज, लहसुन, तम्बाकू (धूम्र), मदिरा आदि तामसिक (वर्ज्य) खाद्य माने गए हैं. ..और रूढ़िवादी प्रचलित धारणाओं के अनुसार इन वर्ज्य खाद्यों से परहेज रखने वाला ही सात्विक है और उसी के विचार सात्विक होते हैं!! ...कुछ ज्यादा नहीं हो गया यह!!! इस विषय पर इस मंच पर मैं पहले भी अनेक चर्चाओं में इस विषय पर अपना मत रख चुका हूँ, जोकि इन प्रचलित धारणाओं से काफी अलग हैं! ..लेकिन मेरे विचार से भोजन का महत्त्व मूलतः शरीर के पोषण हेतु ही है, तथा देश-काल-परिस्थिति-संस्कृति अनुसार भोज्य पदार्थों में भिन्नताएं होती हैं, आ सकती हैं; यह एक साधारण स्वाभाविक सी बात है. ..बड़ी बात यह है कि जो भी भोज्य पदार्थ हम ले रहे हैं, यदि वह हम पूरे विश्वास से ले रहे हैं, मन में कोई चोर नहीं है, भोजन चोरी या लूट का नहीं है, वह हमने गलत या भ्रष्टाचारी कमाई से नहीं खरीदा, उससे हम किसी अन्य व्यक्ति को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं; ...तो उसका सेवन हमारे लिए उपयुक्त और सात्विक है, वह नकारात्मक या तामसिक विचार कतई उत्पन्न नहीं कर सकता! ...यदि हम रूढ़िवादी प्रचलित धारणा के अनुसार ही चलते हैं तो हमें भारत के कुछ भूभाग या जनसंख्या को छोडकर लगभग शेष विश्व को अधर्मी घोषित करना पड़ेगा, और यदि हम ऐसा करते हैं तो हमसे अधिक पिछड़ा व अहंकारी और कोई न होगा! शेष विचार विस्तार से '(१९) खान-पान और धर्म', इस लेख में पढ़ें.

(४) एक व्यक्ति जन्म से पैसा वाला और सुखी होता है, और एक जन्म से दुखी गरीब और अनाथ होता है, क्यों?
अपने भाग्य (प्रारब्ध/अकाउंट बैलेंस) के कारण!!! ..और प्रारब्ध का निर्माण हमारे अपने कर्मों से ही होता है. जैसे बैंक में अकाउंट खोलने पर, लॉकर आदि लेने पर हम हमारी अर्जित धन-संपत्ति उसमें जमा करते हैं. हमारा कहीं बाहर ट्रांसफर हो जाने पर वह सब अकाउंट, धन आदि भी वहां ट्रांसफर हो जाता है. वक्त के साथ बैंक की बिल्डिंग, कर्मचारी आदि बदलते रहते हैं, गुणाभाग के तरीके बदलते रहते हैं पर हमारा जमा धन-संपत्ति हमारा ही कहलाता है और वह बरकरार रहता है! वह सब हमें ही मिलता है. वह हमें फायदा या नुकसान दोनों पहुंचा सकता है! नेकी का हुआ तो बल्ले-बल्ले, अन्यथा चोरी या भ्रष्टाचार का पाए जाने पर वह हमें सजा भी दिला सकता है! ...अब पते की बात यह कि, बैंक तो मानव निर्मित, मानव संचालित है फिर भी हिसाब-किताब, नफे-नुकसान में कोई गड़बड़ी नहीं! ..फिर कर्म का खाता तो ईश्वर अथवा सृष्टि या प्रकृति देखती है; क्या उनसे गड़बड़ी की गुंजाइश की कल्पना कोई कर सकता है?!
ऐसी प्रत्येक घटना जिसमें हमारा अभी का कोई कर्म सम्मिलित नहीं, निश्चित ही वह घटना हमारे किसी पूर्व कर्म के फलस्वरूप पैदा हुई है.

(५) मनुष्य जन्म के बाद के जन्म का निर्णय वह स्वयं करता है?! मनुष्य यहाँ से मुक्त भी हो सकता है, भक्त भी हो सकता है और चैरासी लाख योनियों में भी जा सकता है!
जी नहीं! मनुष्य के जीवन में उसके द्वारा संपादित कर्मों और मृत्यु के समय उसके अंतिम (शेष बचे) संस्कारों व सोच आदि के आधार पर, प्रकृति के नियमानुसार उसके सूक्ष्म देह की आगामी गति (नियति) स्वतः ही तय होती है. ये नियम ना तो कोई जान पाया है और ना ही किसी विधि-अनुष्ठान से कोई कभी जान पाएगा!!! प्रकृति के अनेक नियम अभी भी मानवीय बुद्धि से कोसों दूर हैं! विज्ञान व अध्यात्म, दोनों के नियमों-सिद्धांतों द्वारा पहुंचे हुए मनीषियों को भी बस इतना ही ज्ञान हो पाया है कि प्रकृति-सम्मत क्रियाएं (कर्म-संस्कार-सोच) कुछ अच्छा रंग लायेंगे, और शेष बुरा! कर्म के फलस्वरूप अगले जन्मों में अच्छा या बुरा कब और किसी रूप-अवस्था में आएगा, इसकी अटकलें मात्र ही लगाते हैं लोग! इस जन्म पश्चात् किसी अमुक के मुक्त होने की बात भी दृढ़ता से कहना मेरी समझ से दुस्साहस ही है! शब्दजाल के अधिक पचड़े में ना पड़ते हुए बेहतर तो यही होगा कि जितना हम जान पाए हैं, मात्र उसी के अनुसार खुद को सचेत रखकर उत्कृष्ट सोच बनाने और न्यायसंगत (प्रकृति-सम्मत) कर्म करने पर ही अपना ध्यान केन्द्रित किया जाये, ...फल अपनेआप उसी अनुसार उचित समय पर, उचित अवस्था में प्रकट हो जायेगा! घूमफिर कर 'गीता' का सन्देश भी तो यही कहता है!

(६) स्वभाव में सहजता कैसे आती है?
बहुधा भीतर की आवाज सुनकर ही कोई फैसला लेना (या कर्म करना), ज्यादा ऊहापोह में न पड़कर प्रकृति-सम्मत जीवनशैली अपनाना, प्रकृति या कुदरत के नियम-सिद्धांतों को समझना व उनका अनुपालन करना, दूसरों की भावनाओं का भी आदर करना, आदि जैसे कुछ गुण-आदतें यदि हम डाल लें तो स्वभाव में सहजता खुदबखुद ही आ जाएगी! यह सब होना इस बात का भी परिचायक है कि आप अध्यात्म से अपनेआप ही जुड़ चुके हैं. अध्यात्म कोई किताबी या प्रवचनी ज्ञान थोड़े ही है!

(७) धन्यवाद का भाव बहुत ही कम देखने को मिलता है!?
अहं (अहंकार) का तत्त्व बहुत अधिक होने के कारण इस काल में आदर, धन्यवाद, कृतज्ञता आदि का भाव बहुत कम हो गया है. अधिकांश लोग प्रकृति, प्रकृति के नियमों-सिद्धांतों, प्राकृतिक जीवनशैली आदि से बहुत दूरी बना चुके हैं, तो नैसर्गिक व श्रेष्ठ नैतिक गुणों से भी हीन होते जा रहे हैं. अध्यात्म से दूर होना इसी को कहते हैं!! केवल सत्संगों, प्रवचनों, आश्रमों-मठों आदि में जाना व वहां प्रवास करना तो अध्यात्म से जुड़ना नहीं है!

(८) अनुशासन कभी सिखाया नहीं जाता बल्कि अंदर से खुद होता है...आत्म अनुशासन से चरित्र सुदृढ़ बनता है...?? आज अनुशासनहीनता के बढ़ने का यही प्रमुख कारण है की बाहरी अनुशासन थोप कर हम सब को केवल गुलाम बना रहे हैं!
यह बात बिलकुल ठीक है कि अनुशासन भीतर से स्वमेव होता है! भले और बुरे के ज्ञान से उपजा कुदरती अनुशासन हम सबके भीतर विद्यमान है. यानी ज्ञान-ज्योति (ओरिजिनल सॉफ्टवेयर) सबके भीतर प्री-इनस्टॉल्ड है. लेकिन यह मत भूलिए कि प्रत्येक जन्मोपरांत निर्मित जागतिक संस्कार व उनसे उपजे विचार-केंद्र भी हमारे मन-मस्तिष्क पर कब्ज़ा किये हुए हैं! ये सांसारिक संस्कार हमारे ओरिजिनल सॉफ्टवेयर का हिस्सा कदापि नहीं हैं, ये तो आगंतुक व जबरन घुस आए तत्त्व हैं. इनके कारण हम मनुष्य अनुशासनहीन हो जाते हैं. और इस अनुशासनहीनता को रोकने के लिए ही विभिन्न सरकारें व न्यायपालिकाएं (ऊपर का बुद्धिमान वर्ग) कुछ नियम-कानून बनाकर उन्हें हम पर लागू करते हैं (आपके शब्दों में- 'थोपते हैं'). मैं भी मानता हूँ कि मनुष्य को नियंत्रित करने के लिए यह एक वैकल्पित व्यवस्था है. ...असली व्यवस्था तो भगवान् ने हमारे भीतर लिखी ही हुई है! पुनः, ...वह असली व्यवस्था, हमारे ऊलजलूल संस्कारों (अविद्या) के तले दबी हुई है, इसलिए वाह्य व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है. ...दरअसल 'अध्यात्म' विषय (यानी प्राकृतिक नियम-सिद्धांत) और 'आध्यात्मिक साधना' (प्राकृतिक नियम-सिद्धांतों का दैनंदिन जीवन में अनुपालन यानी रोजमर्रा के जीवन में लागू करना), ये हमारी जड़ीले संस्कारों का नाश करते हैं और प्राकृतिक व्यवस्था खुदबखुद प्रकट हो जाती है. हमारे समाज में बहुतायत की प्राकृतिक व्यवस्था दबी और निष्क्रिय होने के कारण बाहरी अनुशासन व्यवस्था लागू करना या थोपना कोई गलत बात नहीं! वह अनाचार को किसी सीमा तक तो रोक ही सकती है! ..परन्तु निश्चित रूप से स्थाई समाधान यही है कि अंदरूनी अनुशासन व्यवस्था को मुक्त कर ऊपर लाया जाये. यह केवल सिद्धांत आधारित विशुद्ध आध्यात्मिक साधना से ही सध सकता है, यह कोई अतिशयोक्तिपूर्ण वाक्य नहीं!

Monday, July 23, 2018

(१००) चर्चाएं ...भाग - 19

(१) समस्या का निदान सिर्फ साधना से ही होता है?
जी हाँ....! 'साधना' का अर्थ आखिर है क्या??? 'साधना' शब्द हमें बहुत सुनने में आता है, जैसे-- संगीत साधना, नृत्य साधना, कला साधना, योग साधना, आध्यात्मिक साधना, आदि आदि. ..तो 'साधना' शब्द से तात्पर्य निकला-- "अभ्यास", "प्रयास", "एकाग्र हो कर की गयी कोशिश"!!! ..किसी भी अभीष्ट को पाने के लिए तल्लीनता के साथ किया गया पुरुषार्थ 'साधना' ही तो हुआ! ..वह 'अभीष्ट' किसी समस्या का निदान भी तो हो सकता है. ..अर्थात् तल्लीनता एवं एकाग्रता से किये गए प्रासंगिक प्रयासों से हम किसी भी समस्या का निदान, हल आदि बखूबी कर सकते हैं. 'साधना' का अर्थ केवल नामजप, पूजा-पाठ, कर्मकांड आदि कदापि नहीं है. 'साधना' (प्रयास) जब धर्म या अध्यात्म के क्षेत्र में किया जाता है केवल तब उस क्रिया को हम धार्मिक या आध्यात्मिक साधना कह सकते हैं.

(२) धन्यवाद का भाव कितना जरूरी है?
धन्यवाद, कृतज्ञता आदि का भाव होना बहुत ही जरूरी है. यह व्यक्ति के अहंकार को बढ़ने नहीं देता (कम भी करता है) और उसकी नम्रता को दर्शाता है. अच्छेपन, जिज्ञासा और ज्ञानप्राप्ति की भूख को बनाये रखने के लिए भी प्रत्येक सार्थक प्रसंग के दौरान एवं पश्चात् मन में कृतज्ञता का भाव होना बहुत जरूरी है. इस मंच पर कुछ सार्थक प्रश्नों को उठाने और उनपर चर्चा करने के लिए मैं आपका अत्यंत आभारी हूँ.

(३) आज लोग आपसी संबंधों को लेकर संजीदा क्यों नहीं हैं?? आज स्वार्थवश हर व्यक्ति केवल अपने बारे में ही सोचता रहता है.
आपका विचार सर्वथा सही है. मनुष्य दिन-प्रतिदिन और अधिक स्वार्थी होता चला जा रहा है. इस क्रम में अब वह केवल मतलब (स्वार्थ) से सम्बन्ध जोड़ता और कायम रखता है. वह यह नहीं समझ रहा कि इस क्रम में वह आत्मीय संबंधों की दृष्टि से एकाकी (अकेला) होता चला जा रहा है! ...बुनियादी तौर पर मनुष्य एक सामजिक प्राणी है, उसे समाज से सरोकार होता है; समाज और व्यक्ति में एका ना हो तो व्यक्ति का अस्तित्व खतरे में पड़ता है! ..नागरिक-शास्त्र के इसी नियम के अनुसार, हमारे इर्दगिर्द के समाज के व्यक्तियों के स्वार्थ बढ़ने और एकाकी होते जाने के कारण समाज की जीवनशैली दिनोंदिन विकृत, अव्यवस्थित और भंगुर होती जा रही है. क्षति व टूटन साफ तौर पर जाहिर हो रही है. यह सब परस्पर निःस्वार्थ आत्मीय संबंधों के मरने से हो रहा है! क्या इस मंच के प्रबुद्ध लोग आपस में आत्मीय मेलजोल बढ़ाकर एक नया अध्याय आरंभ नहीं कर सकते? ...यदि हमारे पास इसको शुरू न कर पाने के अनेकों कारण (बहाने) हैं तो सोचिए सामान्य समाज की दशा कितनी शोचनीय होगी! इस सरीखे संवेदनशील मुद्दों पर सिर्फ बहस या चर्चा करके कुछ हासिल नहीं हो सकता. वास्तव में कुछ करने की भी आवश्यकता होती है. मत भूलें कि शुरुआत एक से ही होती है, फिर कड़ियाँ जुडती चली जाती हैं. लेकिन हम और हमारे समाज के व्यक्ति किसी भी सार्थक क्षेत्र में पहल करने के साहस से पीछे हटते हैं!

(४) मनुष्य आंतरिक कलह के कारण सदा दुःख भोगता रहता है ...क्या यह सत्य है? आज के मानव के दुःख का कारण है उसका चंचल मन जो उसे शान्ति से जीने नहीं दे रहा ...मन में निरंतर द्वंद्व से वह सदा परेशान ही रहता है!
अच्छी बात कही आपने. मैं भी इससे सहमत हूँ. ..एक बात और.., कि विभिन्न स्वार्थों, आकांक्षाओं के कारण लोगों के मन में जो चंचलता बढ़ गयी है, वह उनकी अशांति का कारण तो है ही; साथ में बाई-प्रोडक्ट के रूप में इस चंचलता (मन के भटकाव) के चलते विभिन्न कार्यक्षेत्रों में उनसे बहुत से चूकें (गलतियाँ) भी होती हैं, जिसका खामियाजा बहुत से कुछ अन्य लोगों को भी उठाना पड़ता है, उनके मन में भी अशांति उत्पन्न होती है, विभिन्न परेशानियों व दुःख का सामना करना पड़ता है!!! यानी संक्षेप में कि मन की आन्तरिक कलह के कारण न केवल वह व्यक्ति प्रभावित होता है अपितु उस द्वंद्व से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उससे या उसके द्वारा किये गए व्यवसायिक कार्य के संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति भी किसी न किसी प्रकार प्रभावित (दुखी) होता है.

(५) ईश्वर हमारे अंदर है तो हम उसे बाहर क्यों खोजते हैं?
निःसंदेह 'ईश्वर' यानी वह 'ऊर्जा' (जिसे आध्यात्मिक भाषा में 'आत्मा' या 'ईश्वरीय तत्त्व' कहा जाता है) और उस आत्मा के स्वाभाविक या नैसर्गिक गुणधर्म यानी प्रॉपर्टीज (जिन्हें आध्यात्मिक भाषा में 'ईश्वरीय गुण' कहा जाता है), हमारे भीतर ही विद्यमान हैं! ..यह हमारी बेवकूफी, नादानी, अज्ञान, या लगातार गलत संस्कार मिलने व दिए जाने का परिणाम ही है कि हम पागलों समान उसे बाहर दूंढ़ते फिरते हैं! प्रचुरता से फैली और फैलाई जा रही अनाप-शनाप भ्रांतियों के चलते ईश्वर सम्बन्धी हमारे संस्कार विकृत से हो गए हैं! हम उसे पता नहीं क्या-क्या समझने लग गए हैं?! ...और पता नहीं कैसे-कैसे उसे रिझाने और संतुष्ट करने में लगे रहते हैं?! ..उस अनदेखे-अनजाने ईश्वर को कोई बाहरी व्यक्ति या महादिव्य राजा या मोटी बुद्धि वाली महान शक्ति समझकर हम कभी मासूम, कभी अंध-भक्त, कभी गुलाम, कभी चापलूस, तो कभी चालाक बनकर उससे पता नहीं कैसे-कैसे और क्या-क्या मांगते रहते हैं?! ..और तो और, हमारे अनुसार वह ईश्वर तो भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के लिए भिन्न-भिन्न है; उसके नाम, रूप, शिक्षाएं, उसे रिझाने के तरीके (पूजन पद्धतियाँ/अनुष्ठान) भी भिन्न-भिन्न हैं!!! ऐसा भी नहीं कि हम यह समझते हों कि यह सब भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के चलते है; क्योंकि यदि हम ऐसा समझते होते तो सभी संस्कृतियों के तहत ईश्वर (!) व शिक्षाओं की विभिन्नताओं का सम्मान करते. ..ऐसा आज बिलकुल भी नहीं है! अपने-अपने ईश्वर, विश्वास व पद्धति को श्रेष्ठतम कहना और अन्य की आलोचना करना एक आम बात है आज! ...यानी एक तो करेला, ..ऊपर से नीम चढ़ा!!! ...ऐसे में भीतर की मिठास (नैसर्गिक ईश्वरत्व) देखने की फुर्सत ही किसे है!!! सब मनुष्यों के भीतर मौजूद सार्वभौमिक प्राकृतिक (अथवा ईश्वरीय) गुण, नैसर्गिक रूप से विद्यमान अच्छे-बुरे की पहचान की शक्ति, केवल सही और न्यायपूर्ण व्यवहार के लिए नैसर्गिक दिव्य प्रेरणा आदि ये सब विशेषताएं आज भी हैं, परन्तु उनके ऊपर व्याप्त गलत या विकृत धारणाओं और कुसंस्कारों का ढेर लग गया है, वे विशेषताएं उनके तले दब गई हैं. इसी कारण इतना पाप, अत्याचार और भ्रष्टाचार बढ़ गया है; धर्म एवं अध्यात्म के क्षेत्र में भी इसी कारण सब ऊपर-ऊपर ही तैर रहे हैं.

Monday, July 16, 2018

(९९) चर्चाएं ...भाग - 18

(१) आध्यात्मिक गुरु ही यदि अध्यात्म पथ से भटक जाए, तो शिष्य कहाँ जाएँ...?? आज के आध्यात्मिक गुरुओं को देखकर कुछ समझ नहीं आ रहा, ....कुछ अनैतिक हो चले हैं और कुछ अपनी ही व्यक्तिगत परेशानियों के कारण आत्महत्या तक कर बैठते हैं!
बाइबिल में यीशु मसीह ने लोगों को संबोधित करते हुए कुछ बातें बहुत पते की बताई हैं- "झूठे पैगम्बरों (स्वयंभू सिद्ध व्यक्तियों) से सावधान रहो, जो बड़ी सीधी 'भेड़ों' के रूप में तुम्हारे सामने आते हैं, लेकिन असल में फाड़नेवाले 'भेड़िये' हैं. ....इसलिए वे तुमसे जो कुछ (सही बातें) कहें, वह करना, और मानना; परन्तु उनके से काम मत करना; क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं (आपको कुछ कहते हैं और उनके खुद के काम कुछ और होते हैं). ....कभी 'स्वामी' भी न कहलाना, क्योंकि सबका एक ही स्वामी है. ....जो कोई अपनेआप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो कोई अपनेआप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा. ....बहुत से झूठे सिद्ध उठ खड़े होंगे और बहुतों को भरमाएंगे. और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठंडा हो जाएगा. परन्तु जो अंत तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा. ....सावधान रहो! तुम मनुष्यों को दिखाने के लिए अपने धर्म के काम न करो, नहीं तो परमेश्वर से कुछ भी फल न पाओगे. ....और जब तुम प्रार्थना करो, तो कपटियों के समान न हो (लोगों को दिखाने के लिए सभाओं में और सड़क के मोड़ों पर खड़े होकर). ....द्वार बंद करके अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर; और तेरा पिता जो तुझे गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा." ...........आखिरकार हम देखा-देखी और व्यग्र हो कर सम्पूर्ण रूप से अंधे अनुयायी बनते ही क्यों हैं वह भी किसी मानव के???? क्यों हम किसी मनुष्य को इतनी आसानी से अवतार या भगवान् का दर्जा दे देते हैं????

(२) महाभारत में पांडव धर्म की तरफ और कौरव अधर्म की तरफ फिर भी सबसे बड़ा अधर्म पांडव अपनी आँखों के सामने देखते रहे (चीरहरण)! सब के सब पांडव महान योद्धा पर समय पर सब के सब चुप, यह क्या दर्शाता है? कहीं न कहीं धर्म कृष्ण के साथ होने की बात करता है और अध्यात्म खुद को कृष्ण बनाने की बात करता है, अगर एक भी पांडव अध्यात्म में लीन होता तो ये सब नहीं होता!?
महाभारत और रामायण आदि ऐसे महान पौराणिक दृष्टान्त हैं जो मानव जीवन के लगभग सभी अच्छे-बुरे पहलुओं को छूते हैं, टटोलते हैं, उनको सामने लाते हैं. सीखने की दृष्टि से ये लाजवाब हैं. ...और आलोचना से भला कौन बच पाया है?! हम हैं ही ऐसे कि बिना आगे-पीछे का संदर्भ या मंतव्य जाने बगैर सबसे बुरा छांटकर पहले उसे ही इंगित करते हैं! कृपया सकारात्मक भाव रखकर कुछ सीखने की दृष्टि से इनका 'सम्पूर्ण' पठन करें, अंत में निश्चित रूप से दिल और दिमाग खुलेगा, व्यापकता आएगी और इन ग्रंथों के प्रति कृतज्ञता व प्रशंसा के भाव उपजेंगे. वैसे इस चर्चा में आपकी बात के समर्थन में या विरोध में मैं भी अनेकों तर्क दे सकता हूँ, पर वह लेखन व बहस व्यर्थ के ही होंगे- बिल्कुल अप्रयोज्य!

(३) जीवन में इतना दुःख क्यों?
कुछ दुःख हमें अपने कर्मों के कारण होते हैं और कुछ दुःख दूसरों के कर्मों के द्वारा! समाज के विभिन्न घटकों अथवा स्वयं, के द्वारा विषाक्त सोच के साथ किये गए कर्मों के कारण ही तरह-तरह के दुखों की उत्पत्ति होती है. आदर्श सुखद स्थिति के लिए मेरे सहित मेरे आसपास के संघ की सोच में शुद्धता आना आवश्यक! ...केवल मेरे अथवा केवल बाकी के समाज के उत्थान से बात नहीं बनेगी! ..दोनों को समानांतर रूप से अपनी सोच में उत्कृष्टता लानी होगी. इसीलिए किसी बंद कमरे अथवा परिसर में नहीं, बल्कि व्यष्टि और समष्टि, दोनों को ध्यान में रखकर की जाने वाली साधना (प्रयास) ही खरी आध्यात्मिक साधना है.

(४) ज़िंदगी में बहुत ज्यादा तकलीफ है अब मैं क्या करूं परेशान हो गया हूँ!?
कोशिश, कोशिश, कोशिश, ....और अच्छी सोच से की गयी सिर्फ अनवरत कोशिश ही तकलीफ को दूर करने में मदद करेगी! मन में मजबूती के साथ धारण कर लें कि कोई भी समस्या मुश्किल, ...बहुत-बहुत मुश्किल हो सकती है पर असंभव नहीं! ..और यह भी, ...कि जरूरी नहीं कि हमारी नेक कोशिशों का प्रत्युत्तर तुरन्त ही मिले! न्यूटन जी की थ्योरी के अनुसार भी किसी क्रिया का जवाब आना निश्चित है पर यह जवाब या प्रतिक्रिया तुरंत भी आ सकता है और अनिश्चितकालीन देरी से भी!!! ..जवाब कुछ अलग स्वरूप में भी आ सकता है!!! ....लेकिन यह तो निश्चित है कि हमारी क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया कभी तो अवश्य आयेगी और वह प्रतिक्रिया हमारी क्रिया की गुणवत्ता व शुद्धता अथवा अशुद्धता के अनुसार / अनुरूप ही आयेगी! इसलिए ध्यान रहे कि हमारी कोशिशें नेक हों, अच्छी सोच के साथ की जायें. धैर्य रखें, ..परेशानियाँ अवश्य जायेंगी या इन प्रयासों से वे परेशानियाँ असह्य दुःख का कारण नहीं बनने पायेंगी.

(५) क्या हमारे अंदर ऐसी शक्ति मौजूद है कि हम हमारे मन की जो काम भावना है उसे शांत कर सके जिससे मनुष्य गलत कदम ना उठाये!?
यदि हमारे घर में प्रकाश का कोई स्रोत (मोमबत्ती, लालटेन, बिजली बल्ब) मौजूद है, तो साँझ ढलने पर हम उसे प्रज्जवलित करते हैं. हमारी इस क्रिया से घर में उजियारा बरकरार रहता है, अँधेरा अपने पांव नहीं पसारने पाता. ...इसी प्रकार यदि हम अपने मन में नेकनीयति, अच्छेपन, इंसानियत आदि (अर्थात् अच्छी सोच) का चिराग सतत जलाये रखते हैं तो अवांछित बुरे विचारों रूपी अँधेरे से हमेशा बचे रहते हैं. यही एक मात्र तरीका है मन से बुराई को दूर रखने का! ...अँधेरे का एक ही कारण है-- प्रकाशस्रोत का अभाव!!! नकारात्मक विचारों का भी एक ही कारण है-- मन में अच्छे विचारों का अभाव!!!

(६) माता पिता अपनी सन्तानों को जितनी मात्रा में प्रेम करती है, संतान माता पिता को उसी मात्रा में प्रेम क्यों नहीं कर पाते हैं?
जिन्दगी के सभी प्रसंगों का निर्माण 'क्रिया-प्रतिक्रिया' से होता है. ...हमेशा क्रिया पहले होती है और प्रतिक्रिया बाद में!! हमारे प्रेम में यदि अपेक्षा होगी तो हमारी संतान भी तो हमेशा अपेक्षा ही करेगी हमसे! ..संतान के लिए कुछ करते समय हमारे मन में यदि अहसान करने का भाव होगा, तो उसके मन में भी बाद में हमारे लिए यही भाव तो आएगा! हम ज्यादा गुणा-भाग करने वाले होंगे तो हमारी संतान हमसे भी शायद चार कदम आगे होगी!!! ..इसके अतिरिक्त बहुत से लोगों का मानना होता है कि पाश्चात्य संस्कृति के अन्धानुकरण से बच्चे बड़े होने पर अपने माँ-पिता को नहीं पूछते!!! मैं उनको इतना ही कहूँगा कि उनका यह कथन अपनी कमजोरियों और अकर्मण्यता पर पर्दा डालने के समान है! धिक्कार है हमें और अपनी संतानों को दिए गए संस्कारों को, यदि वे संतान को इतना बलिष्ठ ना बना पाए कि वह बाहर के किसी वैचारिक प्रदूषण का सामना कर पाए!!! यदि बड़े होकर संतान अच्छे-बुरे के ढेर में से अच्छा चुनने में असमर्थ है या हमारे प्रति उदासीन हो रही है तो दोष कहीं न कहीं हमारे वैचारिक वैक्सीनेशन में है; या कहीं न कहीं, कभी न कभी, हम स्वयं स्वार्थी रहे हैं.

(७) भले लोगों के साथ ही बुरा क्यों होता है?
मुझे तो लगता है कि अच्छा और बुरा दोनों लगभग सभी के साथ होता रहता है परन्तु अपेक्षाकृत अधिक संवदनशील होने के कारण भले लोगों को इसकी अनुभूति अधिक होती है! ठीक उसी प्रकार जैसे-- गन्दगी में आकंठ लिप्त जीव को गंदगी या बदबू से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता, कभी-कभी उसे इसका एहसास तक नहीं होता; जबकि किसी स्वच्छ संवेदनशील जीव को गंदगी या बदबू परेशान कर डालती है!

(८) अध्यात्म पैदाइशी होता है कि जीवन की मुश्किलें देखने के बाद पैदा होता है?
'अध्यात्म' अर्थात् 'आत्मा के विषय में'. 'आत्मा के विषय में' अर्थात् "स्वयं के मूल के विषय में". सरल शब्दों में कहें तो, खुद को और प्राकृतिक सिस्टम को भीतर से, जड़ से, भलीभांति समझना ही अध्यात्म है बस! ...यह विषय तो अनादिकाल से मौजूद है और आगे भी सदैव रहेगा- बिलकुल परिवर्तित!!! ...हाँ इसकी ओर हमारा ध्यान तब ही जाता है जब कभी हम अंतर्मुखता की ओर जाते हैं. जीवन की मुश्किलों अथवा दुःख से इसका कोई सम्बन्ध नहीं! ..सच तो यह है कि किसी दुःख या मुश्किल आने के बाद जो इसकी ओर मुड़ते हैं वे यथार्थ साधक ही नहीं; वे तो आर्त, परेशान, रोते हुए ही हैं; वे तो बस इसमें दुखों-परेशानियों का इलाज ढूंढ रहे होते हैं, अर्थात् स्वार्थ से आए हैं! वे जीवन भर कोरी बातों और शाब्दिक तत्त्वज्ञान में उलझकर अपनेआप को सांत्वना देते रहते हैं कि अब वे प्रसन्न हैं!!!! सच्चा साधक कभी भी आर्त, परेशान होकर साधक नहीं बनता बल्कि कौतूहल और जिज्ञासावश साधना आरंभ करता है. उसकी साधना शब्दों से कम, कर्मों से अधिक जुड़ी होती है. किसी के जीवन में जितनी जल्दी यह पल आ जाये उतना उत्तम.

(९) अध्यात्म मतलब स्वयं को जानना और स्वयं में ही उलझ जाना क्या इसका मतलब हम इतने मतलबी हो जाए कि इंसानियत भूल जाएं?
आध्यात्मिक साधना का मतलब केवल स्वयं के मूलभूत गुणों और प्राकृतिक दैवीय सिस्टम को जानना भर नहीं, केवल उसपर शास्त्रार्थ करना भर नहीं, मात्र शाब्दिक जाल में उलझना भर नहीं; अपितु जानकर, समझकर उनपर 'अमल' करना है. अध्यात्म केवल सुनने और कहने का शास्त्र नहीं अपितु करने का शास्त्र है. इसकी पूर्णता और सार्थकता रोजमर्रा की जिन्दगी में इसे लागू करने में निहित है.

(१०) हम हमेशा अपने आप को समाज के बंधनो में जकड़ा पाते हैं, कभी कभी हम खुद से रूबरू होते है, जैसे ही रूबरू होते हैं अपने को या अपनी ख्वाहिश जानते ही हम खुद को ही बहकाने लगते हैं, कभी धर्म के नाम पर कभी अध्यात्म के नाम पर, आपको ऐसा लगता है क्या? अगर लगता है तो हम ऐसा क्यों करते हैं!?
ऐसा वो लोग करते हैं जो 'शौकिया' ही या किसी 'भावुकता' के कारण अध्यात्म से जुड़े हैं. उनकी साधना, ज्ञान आदि में गहराई नहीं आ पाती. वे ऊपर ही तैरते रह जाते हैं और अध्यात्म को कुछ विशिष्ट रंगों, झंडों, प्रतीकों, परिधानों, धार्मिक क्रियाकलापों (अनुष्ठानों) आदि का खेल मात्र समझते हैं! जबकि असली अध्यात्म तो वर्ण, जाति, पंथ, समुदाय, संस्कृति, देश, काल आदि से बहुत परे है. यह सार्वभौमिक सिद्धांत स्वरूप है और सिद्धांत किसी की बपौती नहीं! उदाहरण के लिए गुरुत्वाकर्षण का नियम एक सार्वभौमिक सिद्धांत ही है; क्या किसी विशिष्ट जाति, पंथ, संस्कृति आदि से इसका कोई लेना-देना है? क्या आत्मा या दिखाई देने वाले मानवीय अंगों, रक्त की लालिमा, प्रकृति के नियमों आदि का किसी पंथ विशेष या समुदाय से कोई सम्बन्ध है?? ऐसे ही आध्यात्मिक नियम-सिद्धांत भी सार्वभौमिक एवं सर्वमान्य हैं, इन पर किसी धर्म-पंथ का ठप्पा लगाना बेवकूफी ही है! ये हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई अर्थात् किसी परिधि विशेष में बंधे हुए कैसे हो सकते हैं? हाँ, बहुत छूट देते हुए इन सब संस्कृतियों के अनुसार जीवनचर्या और धार्मिक क्रियाकलापों को इस (अध्यात्म) तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग घोषित किया जा सकता है! परन्तु ज्ञान के शिखर पर पहुँचने पर हमें इन सब को तिलांजलि देना अनिवार्य हो जाता है. इनसे अभी भी चिपके रहने का अर्थ यही होगा कि हम कहीं बीच के पड़ाव पर ही हैं. तब यह स्वीकार करने में शर्म कैसी कि हम अभी तक अपनेआप से पूर्णतया परिचित नहीं हुए, हमें सिद्धांतों के बारे में बहुत कुछ जानना अभी शेष है!

Tuesday, June 12, 2018

(९८) चर्चाएं ...भाग - 17

(१) असली पल क्या है, जिसको देखो यह कहता है यह पल ही जीवन है!?
कुछ दार्शनिक सा किन्तु बिल्कुल सत्य है यह वाक्य- "यह पल ही जीवन है, जी भर के इसे जी लो." ...'यह पल' यानी 'वर्तमान'! 'भूतकाल' में जो गुजर गया, उसने हमारे अनुभवों, परिपक्वता आदि में वृद्धि की; भूतकाल का महत्त्व बस इतना सा ही किन्तु उपरोक्त दृष्टिकोण से लाभदायक है! और वर्तमान में हम जो भी चिंतन-मनन और तदनुसार 'कर्म' करेंगे, उनसे हमें सबसे अधिक वर्तमान में और 'संभवतः' भविष्य में भी लाभ होगा! यहाँ 'संभवतः' इसलिए कि 'भविष्य' दूर है, और भविष्य के बारे में हम कुछ भी ठोस रूप से कहने और अपेक्षा रखने में असमर्थ हैं. अतः संदर्भित कथन (यह पल ही...) हमें वर्तमान पल का भरपूर, सम्पूर्ण और सबसे बढ़िया 'उपयोग' करने के लिए प्रेरित करता है. आज, ..इस पल हमारे समक्ष उपस्थित ढेरों विकल्पों में से किया गया सर्वोत्तम संभव कर्म का चुनाव ही 'इस पल को जीना' है! वह चुनाव भौतिक जगत से सम्बंधित भी हो सकता है, और आध्यात्मिक जगत से सम्बंधित भी! कोई भी फर्क नहीं पड़ता कि हम दोनों में से क्या चुनते हैं!!! बस शुभ और सार्थक, साथ ही अपने और संबद्ध व्यक्ति के मन-हृदय-आत्मा को आह्लादित करने वाला होना चाहिए. ऐसा चुनाव होगा तो वर्तमान तुरंत ही सुन्दर होगा और भविष्य में भी शुभ की आशा बनेगी! इन सब के अतिरिक्त इस 'वाक्य' के पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण सत्य छुपा है वह यह कि, यह भौतिक जीवन क्षणभंगुर है, कोई नहीं जानता कि इस जन्म का कितना समय शेष है. और यह वर्तमान जन्म और सम्बद्ध परिस्थितियां हमें अपने पूर्वकर्मों की बदौलत मिले हैं. यह जीवन अनमोल है क्योंकि यह सीमित है और इसका भरपूर सदुपयोग करने की ईश्वरीय अपेक्षा भी इसके पीछे निहित है; और यह जीवन कर्म-प्रधान ही है तो क्यों न हम इस जीवन के हर पल को संभावित आखिरी पल मानकर उसे भरपूर जियें!!! पुनः, ...वर्तमान में, ..आज, ..या इस पल, ...उपलब्ध विकल्पों में से यथासंभव सर्वश्रेष्ठ को चुनने के बाद, या संयोग से ही एकाएक समक्ष आए, प्रत्येक कार्य को कर्तव्य समझकर मन लगाकर, दिल लगाकर, पूरी तन्मयता, कुशलता और सम्पूर्णता से हंसी-खुशी उसे करना ही उस पल को भरपूर जीना है. चाहे वह कार्य पढाई-लिखाई से सम्बंधित हो, चाहे खेलने-कूदने से, चाहे नाचने-गाने से, चाहे गहन आध्यात्मिक साधना से, चाहे सच्चे प्रणय निवेदन से, चाहे संगीत साधना से, चाहे वह किसी से भी सम्बंधित हो! यही भौतिक उपासना है और यही आध्यात्मिक भी!!! "योगः कर्मसु कौशलं", ...इस अप्रत्याशित जीवन के इसी पल पूरी कुशलता के साथ किया कर्म ही योग (ईश्वर से जुड़ना) है!

(२) मृत्यु का भय क्यों होता है?
अध्यात्मशास्त्र का हिन्दू दर्शन कहता है कि, "शरीर की मृत्यु होती है, आत्मा की नहीं"; ईसाई और इससे मिलते-जुलते दर्शन के अनुसार, "मृत्यु के बाद भी योग्य व्यक्तियों का पुनरुत्थान होगा." ...फिर भी सामान्य व्यक्ति को मृत्यु का भय होता है क्योंकि उसने प्रत्यक्ष में ऐसा होते तो देखा नहीं और दूसरे अप्रत्यक्ष किन्तु कुछ ठोस सूक्ष्म ज्ञान-अनुभूतियों से भी वह वंचित है. ..थोड़ी बहुत सूक्ष्म समझ रखने वालों को भी मृत्यु का भय सताता है क्योंकि उनकी फिलोसोफी के अनुसार, "यह मानवजन्म प्रारब्ध भोगने व कर्म करके कुछ अच्छा संचित (पुनरुत्थान सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से भी) करने के निमित्त ही है", तो यह जीवन जितना अधिक लंबा हो जाये उतना ही बेहतर!! ...और उत्तम ज्ञानी व्यक्ति इस जीवन की भंगुरता को भी समझते हैं और कर्म की गुणवत्ता के महत्व को भी! वे जानते हैं कि इस जीवन के प्रत्येक पल को आखिरी जानकर अविलम्ब किये गए सर्वोत्तम शुभ-कर्म ही उसकी आत्मा के आगामी सुंदर सफर या पुनरुत्थान सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक साबित होंगे! वे जिंदगी के हरएक पल की अहमियत को समझकर उसे भरपूर सार्थकता के साथ हंसी-खुशी जीते हैं; वे लगभग भयमुक्त होते हैं!

(३) प्रतिदिन कुछ नया सीखना ज्ञान है , हरदिन कुछ नकरात्मकता दूर करना विवेक है और ज्ञान से विवेक की यात्रा ही सही मार्ग है...? दुनिया में ज्ञानी तो बहुत हैं किन्तु विवेकी शायद कोई विरला ही होगा ...क्यों?
दुनिया में ज्ञानी तो बहुत हैं, किन्तु विवेकी बहुत कम; आपके इस कथन से मैं भी सहमत हूँ. सही बात है कि हमारे देशवासियों के पास जितना ज्ञान का भंडार है उतना अन्यत्र शायद कहीं नहीं होगा, लेकिन उसका विवेकपूर्ण और सतत इम्प्लीमेंट विरले ही देखने को मिलता है. यहाँ तो अपेक्षाकृत कम पढ़ा-लिखा एक नाई, एक पान वाला, रिक्शावाला, रेहड़ी वाला तक परम ज्ञान रखते हैं; और पढ़े-लिखों की तो बात ही निराली है, वे तो अथाह ज्ञान के सागर हैं; यानी आध्यात्मिक समझ भरपूर है, लेकिन उनका विवेक इस ज्ञान को नहीं अपनाता! वह इस ज्ञान का व्यावहारिक समर्थन, अनुपालन या आचरण करता नहीं दिखता! असल में करना कुछ नहीं और मात्र ज्ञान के फुलाव को प्रदर्शित करना ही यहाँ लोगों के टाइम-पास का एक बढ़िया जरिया बन गया है! आज के स्टेटस सिंबल रूपी अधिकांश सत्संगों और आध्यात्मिक मंचों/केन्द्रों तक में इसकी बानगी दिखाई पड़ती है. इसीलिए तो नकारात्मकता कम होने का नाम नहीं ले रही, अपितु दिनोंदिन बढ़ ही रही है.

(४) सम भाव कैसे रखा जाये?
अपने सूक्ष्म और असल स्वरूप को पहचान कर यानी अपनी आत्मा के मूल गुणधर्म (प्रॉपर्टीज) को पहचान कर, उपरांत उसी के अनुसार रोजमर्रा की जिन्दगी में आचरण करने पर ही सम-भाव रख पाना संभव है. सूक्ष्म या आध्यात्मिक ज्ञान बहुत जरूरी, और उससे भी बहुत-बहुत जरूरी है- जीवन में उसे लागू करना! 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का भाव उसी के बाद ही जन्म ले सकता है!

(५) प्रायः सभी को एक शिकायत तो अक्सर रहती ही है - बुरा काम कोई नहीं किया, किसी को सताया या परेशान भी नहीं किया; फिर भी दूसरे लोग परेशान करते हैं,और जीवन में दुःख बना ही रहता है!?
अक्सर अपने अहंकार या इगो के कारण लोगों को अपनी गलतियाँ दिखाई नहीं पड़तीं या समझ में नहीं आतीं! ...या फिर उनके द्वारा हुई गलतियाँ (अयोग्य क्रियाएं) उनकी यादाश्त की सीमा से ही बाहर होती हैं! हमारे जीवन में होने वाली प्रत्येक घटना के पीछे कोई न कोई ठोस कारण अवश्य है, भले ही हम उसे ज्ञात न कर पाएं. ..यह ठोस कारण वे ज्ञात-अज्ञात क्रियाएं ही हैं जो हमने वर्तमान, निकट अतीत या बहुत पहले कभी कीं. प्रकृति का ताना-बाना केवल कुछ प्रतिशत ही बूझा है हमने! उदाहरण के लिए-- जब कोई मनुष्य किसी लालच में आकर किसी पहाड़ी क्षेत्र में पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करता है, पहाड़ों की चट्टानों, पत्थरों आदि को बांधे रखने वाले पेड़ों को अंधाधुंध काट डालता है तो उसके बाद जब कोई जियोलॉजिस्ट वहां का दौरा करता है तो वह अपने अर्जित ज्ञान के आधार पर भविष्य में भूस्खलन की प्रबल सम्भावना तो बता देता है, लेकिन यह पूछने पर कि तबाही कब आयेगी, वह कोई ठोस या बिलकुल सही-सही उत्तर नहीं दे पाता! एकदम सटीकता से "कब?" का उत्तर ना दे पाना यही दर्शाता है कि प्रकृति के ताने-बाने का बहुत कुछ हिस्सा हम अभी भी नहीं जानते! ..लेकिन यह जानते हैं कि क्रिया के फलस्वरूप उसी प्रकृति की कोई अन्य प्रतिक्रिया अवश्य आयेगी, पर किस रूप में और कब (???), इसका सटीक आंकलन करने में बड़े-बड़े मनीषी भी असमर्थ हैं! ...तो फिर से मुख्य विषय पर आते हुए, ...हमारे जीवन से जुड़ी प्रत्येक घटना हमारी अपनी ही नयी-पुरानी क्रियाओं की गूँज/प्रतिध्वनि है. आने वाले भविष्य की घटनाएं सुखद हों, इसके लिए बहुत आवश्यक है कि हम अपनी वर्तमान क्रियाओं को अच्छे से अच्छा करें. ..और यदि हम वर्तमान में वास्तव में भला काम ही कर रहे हैं तो निश्चिन्त रहें कि उसका प्रतिफल निकट भविष्य या कभी दूर भविष्य में अवश्य प्रकट होगा. ......कोई किसान जो घटिया बीज और घटिया खाद पिछली फसलों को बोते समय डाल चुका, उसका खामियाजा तो अभी वह भुगत ही रहा होगा; पर साथ ही अभी इस वक्त जब वह जाग्रत हो कर बढ़िया बीज और बढ़िया खाद डाल रहा है, तो इस क्रिया से उसकी आने वाली फसलों के अच्छे होने की सम्भावना अब प्रबल है!

(६) जीवन में मार्गदर्शन क्यों जरूरी है?
नित कुछ सीखने और सिखाने के लिए मार्गदर्शन लेना और देना, दोनों ही आवश्यक हैं. कहीं और कभी हम शिष्य या स्टूडेंट होते हैं तथा कहीं और कभी हम टीचर भी होते हैं! जीवन में समानांतर रूप से दोनों भूमिकाएं मिलती हैं हमें! जो दोनों का ही समान रूप से लाभ उठाये, वो शीघ्र उन्नति करता है तथा दूसरों को भी लाभ पहुंचाता है.

Thursday, June 7, 2018

(९७) चर्चाएं ...भाग - 16

(१) हम अपने भोजन का परिणाम हैं! जिस प्रकार का वह भोजन करेगा, वैसा ही उसका व्यक्तित्व निर्मित होगा!
कल व्हाट्सएप पर अंग्रेजी में एक शॉर्ट मैसेज मिला, जिसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है- "उन्नत या अच्छे होने का मतलब यह नहीं कि आप पीते नहीं, धूम्रपान नहीं करते, दावतों-पार्टियों में नहीं जाते, शाकाहार ही खाते हैं; बल्कि आपका उन्नत या अच्छा होना आपके हृदय में चल रही भावनाओं, शिष्टाचार और लोगों के प्रति आपके सम्मान व व्यवहार से जाहिर होता है." .....हाँ, यदि मैं आपके शब्दों के भाव को आगे दिए वाक्य अनुसार सकारात्मक रूप दे दूं तो आपका कथन सर्वथा सही हो जायेगा-- "जो जिस उपाय से भोजन (या अपनी कोई अन्य मूलभूत आवश्यकता / जीविका) अर्जित करता है (जुटाता है), उसी प्रकार से उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है." ....इस विषय पर आप मेरे विचारों को विस्तृत रूप से "(१९) खान-पान और धर्म" में पढ़ सकते हैं.

(२) भरोसा मजबूत होगा तो आप निडर होंगे! आज भरोसा की ही कमी है अतः कोई किसी का सम्मान भी नहीं करता!
सच है कि यदि हमें ईश्वर और खासतौर पर सार्वभौमिक ईश्वरीय सिद्धांतों पर पूरा भरोसा होगा तो हम निर्भय रहेंगे. यहाँ प्रचलित वर्तमान धारा के विपरीत भी सभी प्रकार के अच्छे और न्यायसंगत कार्य करने में हमें कोई संकोच, संशय अथवा भय नहीं होगा; भले ही कोई त्वरित एवं उचित प्रतिसाद (रेस्पोंस) न मिले तिसपर भी! व्यक्तियों के परिपेक्ष्य में यदि भरोसे की बात की जाये तो, एक-दूसरे पर विश्वास और एक-दूसरे के प्रति सद्भावना से ही परस्पर सम्मान दिया और लिया जा सकता है. क्रिया के अनुसार ही तो प्रतिक्रिया प्राप्त होती है!

(३) सामाजिक बुराइयों से क्या एक स्त्री अकेली लड़ सकती है...?
जी हाँ! ...वैसे घर वालों और समाज के जागरूक तबके का सहयोग मिले तो थोड़ी आसानी रहती है. पर बहुत से मामलों में हमें ये दोनों सहयोग भी नहीं मिल पाते! तब लड़ते-जूझते बारम्बार नाकामी भी मिलती है और इससे हौसला भी पस्त होता है, अनेकों बार मन में निराशा और हताशा आ जाती है. फिर भी कहूँगा कि एक स्त्री में एक पुरुष से अधिक साहस, धैर्य, व दृढ़ता जैसे गुण होते हैं. इसलिए किसी भी समस्या से जूझने की कालावधि एवं सामर्थ्य एक स्त्री में पुरुष से अधिक होते हैं. धैर्य का गुण होने से बहुत विषम परिस्थितियों में भी एक स्त्री अपने मस्तिष्क को ठंडा रखते हुए बखूबी बहुत सूझबूझ वाले निर्णय ले सकती है. अपनी इन विशेषताओं को पहचानकर और उनपर भरोसा कर अब वह समस्याओं से लड़ने के लिए अकेले ही ठन्डे दिमाग से सर्वोत्तम न्यासंगत प्रयास करे! कोई मानवीय साथ न मिलने की दशा में अपने प्रयासों की प्रक्रिया में यदि वह अपने आध्यात्मिक पक्ष को भी ठोस और मजबूत कर ले तो वह टूटेगी नहीं और अनेक विफलताओं के बावजूद बिना थके और बिना अवसादग्रस्त हुए उसके प्रयासों का सिलसिला अनवरत चलता रहेगा! क्योंकि प्रत्येक असफल प्रयास के बाद भी उसे 'भरोसा' है कि उसका यह प्रयास ईश्वरीय सिद्धांतों के अनुसार कहीं न कहीं दर्ज अवश्य हो रहा है और किसी योग्य समय पर उसे इन योग्य प्रयासों का प्रतिफल किसी न किसी अच्छे स्वरूप में अवश्य मिलेगा! यह भरोसा ही हमें भीतर से एक दिव्य मजबूती देता है! निःसंदेह पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में यह भरोसा बहुत अधिक होता है, यह बात कुदरती रूप से स्त्रियों के पक्ष में जाती है! जिसमें भरोसा अधिक, वह ही अधिक नैतिक!!! जो अधिक नैतिक, वह ही 'धर्म' (न्यायसंगतता) के पक्ष में!!! और जो न्यासंगत, उससे न्यायूर्ण ढंग से मिलने वाली सफलता या किसी अन्य प्रकार की ईश्वरीय अनुकंपा अधिक समय दूर नहीं रह सकती!!! इसीलिए तो मैंने अपने पूर्व आलेखों में भी अनेकों बार स्त्रियों को पुरुषो से कहीं अधिक श्रेष्ठ घोषित किया है. जागरूक स्त्रियों से मेरी विनम्र विनती है कि कृपया वे खुद को अबला, असहाय अथवा कमजोर समझकर पुरुषवर्ग की मानसिकता का अनुसरण करके उन जैसा बनने की चेष्टा न करें!!! आप पुरूषों से बहुत अलग और बहुत आगे हैं. अपना यह अनूठापन बनाये रखें. इस अनूठेपन के साथ कोई भी समस्या लम्बे समय तक आपको परेशान नहीं कर पायेगी. यह अनूठापन ही आपके स्वाभिमान को अक्षुण्ण रखेगा. पुरुषों के अनेकों पापों के बावजूद आपके इसी अनूठेपन ने अतीत में और वर्तमान में अनेकों बार अपने जीवनसाथी और सम्पूर्ण मानवजाति के पाप के घड़े को भरने से बचाया है, और फलस्वरूप इस धरा को सृष्टिकर्ता के कोप से बचाया है. कृपया अपनी विशिष्टता को गर्व के साथ सहेजें. ऐसी दिव्य शक्ति के शब्दकोष में 'मुश्किल' शब्द तो हो सकता है, किन्तु 'असंभव' शब्द तो कदापि नहीं!

(४) आज पाश्चात्य सभ्यता का हमारे नवयुवकों पर बढ़ता दुष्प्रभाव काफी घातक सिद्ध हो रहा है, ....क्या यह सही है? आज हमारे नवयुवक हर बात में पश्चिम को नक़ल कर अपनी संस्कृति के विरुद्ध जा कर परेशान हो रहे हैं ...जिसे आज अपनी शान समझ कर अपना रहे हैं, वही उनको तनाव दे कर बैचैन कर रहा है!
देखिये, इन्टरनेट के इस युग में और विभिन्न देशों के मध्य व्यापार सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय संधियों (आपसी लेनदेन) के इस युग में जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक ही दायरे में सिमट आया है, वहां अब यह पूरब और पश्चिम की सभ्यता की बात करना व्यर्थ ही है! विश्व भर की समस्त सूचनाएं, खोजें व आविष्कार, फैशन, उपभोक्ता सामान, आदि सबकुछ अब सबको सहज उपलब्ध हैं. सूचनाओं, सामग्री और सोच का ढेर लगा हुआ है, चुनने के लिए ढेरों विकल्प हैं. ..अब मुद्दे की बात यह है कि अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किसको चुनते हैं, किसको अपनाते हैं, बड़े हो रहे अपने छोटों को किस प्रकार की सलाह देते हैं, दिमाग को कितना खुला रखते हैं, खुद को कितना दूरदर्शी बनाते हैं और उस अनुभव से अपने छोटों को कितना दूरदर्शी बनाते हैं!!! आज जैसे हमारे पास ज्ञान और सामान का भंडार तथा उनमें से मनचाहा व श्रेष्ठ चुनने का विकल्प व स्वतंत्रता है, उसी प्रकार से यह सबकुछ लगभग सभी औसत रूप से समर्थ राष्ट्रों के नागरिकों के पास भी है. जिस राष्ट्र के शासक, अभिजातवर्ग, और नागरिक इन ढेरों विकल्पों के बीच जितना अच्छा चुनाव कर रहे हैं, वह राष्ट्र उतना ही समृद्ध व सुखी है; वहां की सामान्य सोच और जीवनशैली उत्तम है, कानून-व्यवस्था की स्थिति भी बहुत सराहनीय है! अब इन हालातों में यह पूरब और पश्चिम के भेद का फंडा अपनी समझ से तो परे है! .....सच तो यह है कि अपने संघ में फैली कुरीतियों, अव्यवस्था, बिगड़ी जीवनशैली, लुंजपुंज कानून व्यवस्था, नैतिक पतन आदि से दुखी और कुपित होकर खीजते हुए हम सारा दोष पश्चिमी सभ्यता के ऊपर मढ़ने की कोशिश करते हैं! देखिये गलत सोच और गलत चालचलन रूपी बैक्टीरिया-वायरस आदि विश्व में अब सभी जगह अपनी पहुँच रखते हैं, लेकिन कमजोर मनों-दिमागों-शरीरों में ही उनका प्रवेश या हमला संभव हो पाता है. क्या यह संभव नहीं कि हम मानसिक रूप से कमजोर या संकीर्ण थे/हैं?! जो संघ अपनी जीवनशैली, सोच, आचार-विचार आदि को सही और व्यावहारिक रखने में कामयाब है वह हमसे आगे है! हम यदि पीछे हैं तो अपने गलत चुनावों के कारण!!! जीर्णशीर्ण हो चुकी कुछ पुरानी मान्यताओं के प्रति अंधश्रद्धा भी उसका एक बहुत बड़ा कारण है, जितना बड़ा कारण आप पश्चिम के अन्धानुकरण को बताते हैं!!!! तमाम आधुनिकताओं और संसाधनों के बावजूद हम अभी भी जड़ बुद्धि हैं, हमारी अनेकों बेड़ियाँ और गलतियाँ हमें सही रूप से सक्रिय और उन्नत होने से रोक रही हैं! सिर्फ एक उदाहरण- आज का एक 'औसत' भारतीय युवा पढाई के क्षेत्र में किसी भी विषय की गहरी समझ बटोरने के बजाय उसका उथला अध्ययन करता है और शेष भगवान् के दरबार में हाजिरी लगाकर, प्रसाद चढ़ाकर प्राप्त कर लेना चाहता है! यह चीज उसने पश्चिम से नहीं बल्कि अपने बड़ों को ऐसा करते देखकर ही सीखी है!!! अनेकों अन्य उदाहरण हैं जिनके लिए शब्द कम पड़ जायेंगे, क्योंकि सामाजिक कमजोरियां हैं ही इतनी ज्यादा! आज के बिगड़े और तनाव लेने-देने वाले बच्चों के स्वभावदोषों के लिए जितना हम बच्चों या पश्चिमी सभ्यता को दोषी बताते हैं उससे अनेक गुना अधिक दोषी हम अभिभावक स्वयं हैं, जो बच्चों के समक्ष कोई भी अच्छा उदाहरण (अपने आचरण से) रखने में नाकाबिल सिद्ध हुए हैं. बच्चे तो कोरा कागज होते हैं, उनके मन-मस्तिष्क पर इबारत हम अभिभावक और आसपास का समाज ही लिखते हैं, उसी से उसका बुनियादी व्यक्तित्व बनता है. याद रखें- बुनियाद अच्छी तो इमारत अच्छी!

Saturday, June 2, 2018

(९६) चर्चाएं ...भाग - 15

(१) जीवन में योग का महत्व शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही है?
आजकल 'योगा' के नाम से मशहूर योग या योगाभ्यास मात्र शारीरिक व्यायाम ही है! कोई कितना भी कहे कि शरीर के साथ-साथ इससे आध्यात्मिक बलिष्ठता भी आती है, मगर ये सब कहने की बातें हैं. पहले के समय में शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों के विकास पर जोर दिया जाता था, बल्कि आध्यात्मिक (सद्गुणों के) विकास की पहले सोची जाती थी! आध्यात्मिक विकास पहले सुनिश्चित होते ही उसी आध्यात्मिक विकास के बल पर शारीरिक विकास को भी एक अतिरिक्त लाभ के रूप में अर्जित किया जाता था. लेकिन आजकल के 'योगा' में शारीरिक विकास के बल पर आध्यात्मिक पक्ष के विकास को एक अतिरिक्त लाभ के रूप में प्रचारित किया जाता है. ..यह बिलकुल असंभव और मिथ्या बात है!!! आपने भी आध्यात्मिक तेज के बल पर स्वस्थ शरीर का होना देखा होगा, किन्तु मात्र शरीर की स्वस्थता हेतु प्रयास करने वालों के आध्यात्मिक गुणों में वृद्धि होती क्या देखी है आपने??? ईमानदारी से विचार करें! ...यह सब मैं अपने अनुभवों से कह रहा हूँ, क्योंकि लखनऊ के अतिरिक्त मेरा एक अन्य दूसरा निवास एक योगकेंद्र परिसर में ही है. सत्य तो यह है कि केवल समुचित साथ ही व्यावहारिक आध्यात्मिक साधना और खरा साधकत्व ही व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति करता है, इसके पश्चात् वह शारीरिक योगसाधना भी बड़ी सरलता से कर सकता है; परन्तु केवल शारीरिक स्वास्थ्यलाभ के आकांक्षी व्यक्ति "योगा" (शारीरिक कसरत) करके अपने भीतर आध्यात्मिक साधकत्व को उत्पन्न नहीं कर सकते!

(२) आशा और विश्वास जीवन को सही दिशा दे कर जीवन जीने की राह प्रशस्त करते हैं, सो इन्हे खोने मत दो!! आधुनिक जीवन शायद कुछ अधिक जटिल होने से आज आत्महत्या के केस निरंतर बढ़ रहे हैं. ...अध्यात्म से जुड़ कर अपनी सोच को सकारात्मक बनाया जा सकता है!
हमारे समाज में आज जीवनशैली बदलने के साथ-साथ जीवन के मूल्य, नैतिक मूल्य, आचरण, स्वभाव आदि भी तेजी से बदल (नीचे की ओर जा) रहे हैं. जीवन के असली अर्थ, उद्देश्य आदि से लोग अपरिचित होते जा रहे हैं. एक अजीब सी आपाधापी चल रही है. व्यक्ति इससे अनभिज्ञ होता जा रहा है कि जिस भौतिक विलासिता, भौतिक सुखों और भौतिक भण्डारण के लिए वह दिन-रात एक किये दे रहा है वह तो जीवन का असल उद्देश्य है ही नहीं!!! प्रत्येक दिन के आखिर में शारीरिक और मानसिक रूप से अपने आपको बेतहाशा थकाकर वह जिस प्रकार यंत्रवत अपना जीवन चला रहा है वह उसे कुछ भौतिक प्रसन्नता तो अवश्य देता है पर उस प्रसन्नता की आयु लम्बी नहीं होती और ना ही वह स्थाई होती है. इससे खीजकर वह जटिलताओं, तनाव और अवसाद की ओर बढ़ता है, जिससे  आज हत्या और आत्महत्या दोनों के केस लगातार बढ़ ही रहे हैं. इसके अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक शोषण के मामलों में भी निरंतर वृद्धि हो रही है. सोच में विकृतियाँ लगातार बढती जा रही हैं. इन सब के पीछे का कारण बताना पिछली बातों को दोहराना ही होगा कि "हम तेजी से स्वयं यानी आत्मा यानी आत्मिक गुणों यानी परमात्मा से दूर जा रहे हैं." इसके भीतर जाना तो दूर की बात, इसकी चर्चा भी सामान्यतः लोगों को बोझिल सी लगती है! ...कुछ उस ओर जाना भी चाहते हैं तो वह भी किसी लालच से ही, जैसे शरीर को अधिक समय तक फिट (या जिन्दा!!!) रखने के लिए योगाभ्यास के रूप में कुछ शारीरिक व्यायाम करना और यह सोचना कि इससे हमारा आध्यात्मिक विकास भी हो ही जायेगा, हमारा मन आदि भी शांत रहेगा!!! पर यह भी केवल मनोवैज्ञानिक मिथ्याभ्रम मात्र ही है. सच तो यह है कि मन में साधकत्व आने से ही कुछ ठोस और टिकाऊ सध सकता है!

(३) खुशी का मूल स्रोत क्या है?
हमारे मूल में हमारी आत्मा है, और इस आत्मा के कुछ मूल गुणधर्म हैं, ये मूल गुणधर्म ही साक्षात् 'धर्म' अर्थात् "सदैव 'सर्वथा योग्य एवं न्यायपूर्ण' आचरण के निरंतर समर्थन की नैसर्गिक सूक्ष्मतम वृत्ति"! ....यह तो हो गया हमारा 'सूक्ष्म मूल' और उसका 'सूक्ष्म मूल स्वभाव'. ...जब मानव देहधारी आत्मा यानी मनुष्य, आत्मा के मूल स्वभाव के अनुसार / अनुकूल आचरण करता है तब उसे सर्वोच्च श्रेणी की खुशी अर्थात् 'आनंद' मिलता है. परन्तु सूक्ष्म देह में विद्यमान दुनियावी संस्कारों और उनसे निर्मित जड़ वृत्ति के कारण साधारण मनुष्य के लिए सर्वकाल आत्मा के निर्देशानुसार आचरण करना बहुत ही दुष्कर होता है. ..लेकिन फिर भी असंभव तो नहीं! ...कभीकभार ही  सही, पर जब कभी भी हम भीतर की दैवीय ध्वनि के निर्देशानुसार, हमारी स्थूल वृत्ति से हटकर कुछ अतियोग्य निर्णय लेकर तदनुसार आचरण करते हैं तो हमें अपार खुशी मिलती है. वह खुशी दिव्य होती है और हम उसे शब्दों में ठीक से बयान नहीं कर सकते! उस 'कभीकभार' को 'सदैव' की ओर ले जाना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए, यदि हमें हमेशा चिरस्थाई और गहरी खुशी चाहिए!

(४) आज सभी मानसिक तनाव से पीड़ित है!
यह बात सही है कि हमारे भूभाग में आज लगभग सभी मानसिक तनाव से ग्रस्त हैं, ..दुर्जन भी और सज्जन भी! ...दुर्जन अपने वर्तमान दुष्कर्मों के कारण या तो तनावग्रस्त हैं या अभी नहीं भी हैं तो भविष्य में अवश्य झेलेंगे. जबकि वर्तमान के सज्जन अपने पूर्वकर्मों के कारण वर्तमान में इन दुर्जनों के दुष्कर्मों से उत्पन्न पीड़ाओं को झेलने के लिए विवश हैं! देखा जाए तो दोनों के तनाव का कारण लोगों के वर्तमान या पिछले कर्म ही तो हैं! यदि किसी कर्म से स्थितियां बिगड़ी हैं तो किसी कर्म से ही स्थितियां सुधर सकती हैं! तो, सज्जनों को चाहिए कि वे अपनी वर्तमान सज्जनता को कायम सखते हुए दुर्जनों के भीतर भी सज्जनता उत्पन्न करने की चेष्टा करें; साथ ही दुर्जन भी अपनी सोच को बदलकर सकारात्मकता की ओर बढें. यही दोनों के वर्तमान और भविष्य के लिए तनाव-मुक्ति प्रदान करेगा. अच्छे विचारों की उत्पत्ति ही बुरे विचारों का नाश करेगी! जिस राष्ट्र में भी बहुतायत विशेषकर अग्रणी समाज में सकारात्मकता यानी अच्छाई है उस राष्ट्र में मानसिक तनाव उतना ही कम है और खुशहाली ज्यादा है.

(५) आज देश को धर्म और जाति के नाम से बांटने वालों को कैसे रोका जा सकता है...??
जागरूक होकर तत्पश्चात सोच को ऊपर उठाकर ही हम इस जहर को फैलने से रोक सकते हैं. हमारे वर्तमान बड़े आका (धार्मिक / आध्यात्मिक गुरुजन, राजनेता, उच्च पदों पर आसीत् अधिकारी) आदि तो कुछ करने से रहे. अब आम जनता को खुद ही उठना होगा, खुद से ही प्रेरित होना होगा और ऐसे भ्रष्ट व अवसरवादी तंत्र को उखाड़ फेंकना होगा. वैसे इस प्रकार के कृत्य को हमारे आका बगावत का नाम देंगे, पर वस्तुतः यह एक क्रांति होगी. बहुत बड़े आमूलचूल परिवर्तन किसी क्रांति से ही संभव होते हैं. फिर भी यह क्रांति इतनी सरल नहीं, क्योंकि यह क्रांति सर्वप्रथम अपनी खुद की मानसिकता बदलने के बाद ही संभव है. तो फिर प्रथम एक ही उपाय है कि सभी लोग अपने स्वार्थों से क्रमशः ऊपर उठते हुए खरे साधकत्व की ओर बढ़ें.

Monday, May 28, 2018

(९५) चर्चाएं ...भाग - 14

(१) मनुष्य आसान की तरफ नहीं आता है! कोई भी विचार कर्म करते है मेहनत करते है; जिस पर केंद्रित करते है दिमाग को फैलाता है! आप नकारात्मक सोच करते है तो सकारात्मक नहीं होता है!
यद्यपि आपकी चर्चा का विषय व आशय स्पष्टता से समझ नहीं पाया तद्यपि जो समझा तदनुसार उत्तर दे रहा हूँ. ...मानव, खासतौर पर हमारे भूभाग के व्यक्ति जीवन के विभिन्न क्रियाकलापों का जितना अधिक सरलीकरण करने की चेष्टा कर रहे हैं , वे उतना ही दुष्कर, उलझाव भरे और जटिल होते जा रहे हैं. पीछे का मूल कारण यह है कि कामों को करने का हमारा ढंग यथासंभव शॉर्टकट अपनाने वाला है और अपेक्षित सैद्धांतिक ज्ञान बहुत ही उथला है. उदाहरण के लिए इन्टरनेट से जुड़ी सुविधाओं / वेबसाइट्स / सॉफ्टवेयर्स / उनपर काम करने के ढंग आदि पर ही एक नजर डाल लीजिये, ये सब जितने अंश में हमारा जीवन आसान कर रहे हैं, समानांतर रूप से उससे अधिक अंश में ये हमारा समय, ऊर्जा और सुख-चैन लिए ले रहे हैं!!! हमारे यहाँ प्रयुक्त अधिकांश सॉफ्टवेयर / प्रोग्राम्स बहुत सी तकनीकी खामियां रखते हैं, उन्हें आधे-अधूरे ढंग से अकुशलता के साथ बनाया गया है. कोढ़ में खाज यह कि सॉफ्टवेयर बनने और इंस्टाल करने के बाद कार्य-स्थलियों पर बहुत से कार्य उनपर मैन्युअली (मनुष्य के हाथों द्वारा) किये जाते हैं; यहाँ बहुत सारी फीडिंग मिस्टेक्स (गलतियाँ) कर्मियों द्वारा होती हैं! ...और अंत में उनको ठीक करने / करवाने के लिए बहुत ज्यादा परेशानियाँ होती हैं, दिमाग फटने तक को होता है!!! कई-कई घंटों व दिनों तक महत्वपूर्ण सर्वर बंद रहते हैं या उनके बंद होने की फर्जी बात कही जाती है. इस प्रकार के अधकचरे सैद्धांतिक ज्ञान और अनमनी कार्य-संस्कृति से हमारी जिंदगी आसान हो रही है या जटिल??? सरलता की कोशिश में जटिलता की ओर जाने का यह तो मात्र एक उदाहरण था, सूक्ष्म विश्लेषण करें तो आसपास हजारों अन्य उदाहरण भी मिल जायेंगे! ...चर्चा के विषय के अंत में ऊपर आपने लिखा है कि "आप नकारात्मक सोचते हैं तो सकारात्मक नहीं होता है." इसके उत्तर में मैं यह कहूँगा कि वस्तुतः होता इसका उल्टा है! यानी, "जब हम सकारात्मक नहीं सोचते, सकारात्मक नहीं करते, तो नकारात्मकता हमें घेर लेती है. नकारात्मकता यानी अंधकार का अस्तित्व तभी संभव है जब वहां सकारात्मकता अर्थात् प्रकाश-स्रोत की अनुपथिति हो! घनघोर अंधरे में यदि हम एक दियासिलाई तीली जलाएं तो कुछ प्रकाश हो जाता है, उससे एक-एक करके जितनी मोमबत्तियां जलाते जाते हैं, प्रकाश फैलता जाता है और उसी अनुपात में अंधकार कम होता जाता है!"

(२) ईश्वर प्राप्ति का उपाय क्या है?
संक्षिप्त उत्तर-- "योगः कर्मसु कौशलं." ..चूंकि मानवजीवन कर्म-प्रधान है, अतः प्रत्येक कार्य को कर्तव्य समझकर उसे सम्पूर्ण निष्ठा, न्यायप्रियता, ईमानदारी, अर्थात् एक शब्द में कहें तो, 'कुशलता' से करके ही हम ईश्वर से जुड़ सकते हैं.

(३) कलियुग की वेदना क्या है? समय काल युग कभी दोषी नहीं होते कर्म ही अच्छे-बुरे होते हैं - जो युग का निर्माण करते हैं!
बहुत ही अच्छा कहा आपने कि, "समय, काल, युग कभी दोषी नहीं होते, कर्म ही अच्छे या बुरे होते हैं, जो 'युग' का निर्माण करते हैं." ...इस दृष्टि से आज भी कहीं सतयुग जैसा है, कहीं त्रेता वर्णित जैसा, कहीं द्वापर के माहौल सरीखा और कहीं घनघोर कलियुग! ...जिस भी संघ, प्रदेश या राष्ट्र में 'खरे धर्म' अर्थात् नेकनीयती, ईमानदारी, पारदर्शिता, न्यायप्रियता, सौहार्द आदि का अस्तित्व जितना अधिक है, वह उतना ही उन्नत और सही मायनों में सुखी संघ है अर्थात् वहां अपेक्षाकृत उन्नत युग (परिस्थितियां) है! भारत की बात करते समय भी क्या कभी हम विभिन्न प्रदेशों और वहां की संस्कृतियों का तुलनात्मक विश्लेषण नहीं करते!? ..जी हाँ, हम समझते हैं कि अपने भारत राष्ट्र में ही अलग-अलग स्थानों पर 'वास्तविक धर्म' की स्थिति व अन्य परिस्थितियां यानी युग की अनुभूति भिन्न-भिन्न है!!!

(४) कर्म करते वक़्त मनुष्य क्यों नहीं सोचता?
बंधुवर, कुछ भी करते समय मनुष्य थोड़ा-बहुत सोचता तो अवश्य है, परन्तु सोचने उपरांत विचार या विकल्प कहाँ से आ रहे हैं, उसके कर्म की प्रकृति उसी पर निर्भर करती है! साधारणतया हमारी कर्मेन्द्रियों को कोई भी क्रिया करने का निर्देश हमारे मन के संस्कारों द्वारा और हमारी वृत्ति के अनुमोदन के पश्चात् मिलता है! मन के संस्कारों का निर्माण देखने, सुनने और महसूस करने से होता है; पूर्व जन्मों के बने संस्कार भी इनमें जुड़ जाते हैं. सबके गठजोड़ पश्चात् जिस प्रकार के संस्कारों का वहां प्रभुत्व होता है, उसी प्रकार की हमारी वृत्ति हो जाती है. मन में उपस्थित किसी भी संस्कार से उठा क्रिया-विचार हमारी कर्मेन्द्रियों तक तब ही जा पाता है, जब वृत्ति की सहमति, अनुमोदन आदि भी उसमें जुड़ता है! ..अब यदि किसी के संस्कार, वृत्ति आदि जब उसे कुछ गलत काम करने को उकसाते हैं तो हम यही कहते हैं कि, 'करने से पहले उसने विचार नहीं किया!' यद्यपि उसने विचार किया होता है, पर संस्कार और वृत्ति आदि के दूषित होने के कारण उसकी बुद्धि गलत निर्णय ले बैठती है! क्योंकि बुद्धि भी वृत्ति के ऊपर निर्भर होती है. गलत निर्णय या गलत काम करने वाले को काम करने के पश्चात् कभी ग्लानि होती है और कभी नहीं! यदि ग्लानि होती है तो मन में कुछ योग्य संस्कार अवश्य हैं पर इतने बड़े नहीं कि वे वृत्ति को साध पाएं, और यदि ग्लानि नहीं होती तो इसका अर्थ है कि उसके मन में कोई योग्य संस्कार हैं ही नहीं!

(५) ईश्वर है या नहीं? ईश्वर को कैसे महसूस करें??? क्या सच में ईश्वर है या यह केवल हमारा भ्रम है?
कुछ लोग इसका उत्तर "हाँ" में देते हैं और कुछ "ना" में, ...और कुछ संशय में रहते हैं कि भगवान् 'हैं' या 'नहीं'! ...यद्यपि 'हाँ' कहने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है, और 'ना' कहने वालों की बहुत अल्प; तद्यपि 'हाँ' कहने वालों में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, 'हाँ' पर जिनकी निष्ठा व विश्वास डोलते रहते हैं! आराधनालयों में वे आस्तिक होते हैं परन्तु दुनियावी स्वार्थों की पूर्ति के समय अंदरूनी तौर पर वे घनघोर नास्तिक दिखते हैं. ...और केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने वालों के लिए एकदम ठोस प्रमाणिकता से यह कहना कि "भगवान् हैं" अथवा "भगवान् नहीं हैं", बहुत मुश्किल है. दोनों ही बातों का भौतिक या स्थूल प्रमाण देने का प्रयास व्यर्थ के वाद-विवाद को ही जन्म देता है. ..वैसे इस बारे में मेरा निजी मत आप मेरे ब्लॉग "चर्चाएं ...भाग - 1" के २०वें बिंदु में विस्तार से पढ़ सकते हैं.
मेरे आगे के ब्लॉगों में टुकड़ों-टुकड़ों में क्रमशः अनेक बातें हैं जो यदि समग्र रूप से लें तो भगवान् के अस्तित्व होने पर कोई संदेह नहीं रह जाता. हम सब भी अपूर्ण ही सही, फिर भी उसी के छोटे-छोटे सदेह अवतार ही तो हैं! आप जिज्ञासु हैं, अपनी जिज्ञासा को निरंतर बनाए रखिये, फिर आपके भीतर उपजे शुद्ध नैसर्गिक अनुभूतिजन्य ज्ञान को किसी अन्य के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी!
भगवान् के ऊपर 'विश्वास' या 'अविश्वास' से किसी का कुछ 'बनता' या 'बिगड़ता 'नहीं है! ...हाँ, 'सही' या 'गलत' करने से अवश्य ही हमारा कुछ 'बनता' या 'बिगड़ता' है (आधुनिक विज्ञान में क्रिया-प्रतिक्रिया सम्बन्धी न्यूटन का तृतीय नियम भी इसका अनुमोदन करता है)! 'विश्वास' होने से हमारे मन-मस्तिष्क पर कुछ लगाम लगी रहती है, हम 'गलत' करने से डरते हैं, ..जबकि 'अविश्वास' की दशा में हम 'निरंकुश' हो जाते हैं और योग्य कर्मों से विमुख हो जाते हैं.

Friday, May 18, 2018

(९४) चर्चाएं ...भाग - 13

(१) कौन सही है और कौन गलत? अगर एक लड़की को उसका पति शादी के बाद ना मन से ना धन से और ना तन से सुखी रख पता है और वही प्रेम कोई और उस लड़की को देता है एक सच्चे जीवनसाथी की तरह और वह लड़की अपने पति को छोड़कर उस इंसान से शादी कर सकती है जिसने उसका साथ दिया या यह कोई पाप है?
वैवाहिक जीवन में तन, मन और धन इन तीनों के सुख से भी बड़ी चीज है - "वफ़ादारी" अर्थात् "एक-दूसरे के प्रति पूर्ण निष्ठा"! ..इसके अतिरिक्त गहरी मित्रता, समर्पणभाव, एक-दूसरे की सम्पूर्ण केयरिंग आदि भी वैवाहिक जीवन को सुदृढ़ और सफल बनाते हैं. .....यदि ये सब गुण दोनों में हैं तो जीवनसाथी स्वतः ही तन, मन और धन से एक-दूसरे को सुखी रखने की सर्वोत्तम चेष्टा करेंगे ही! एक ही समय में एक से अधिक के प्रति जीवनसाथी समान सम्पूर्ण निष्ठा रखना वो भी बिना छुपाये (खुलेआम), साधारण मानव के लिए यह बिलकुल असंभव है. समाज या सामाजिक नियम भी इसकी स्वीकृति नहीं देते और ना ही हमारी अंतरात्मा ! हाँ, सुखी न रहने की दशा में समाज-सम्मत ढंग से सम्बन्ध विच्छेदन पश्चात् अन्य से विवाह संभव है. ..परन्तु यह गांठ बांध लें कि बिना विवाह किये वैवाहिक जीवन के सुख, निष्ठा आदि 'खुले तौर पर' और 'चिरकाल' के लिए पाना व देना बिल्कुल असंभव है (या दोनों में से कोई तो एक कभी भी सम्बन्ध तोड़ देगा, पलायन कर जायेगा). यदि हम फिर से कोई अन्य साथी ढूंढेंगे तो 'स्थायित्व' तो नहीं मिला न हमें! अतः विवाहेतर सम्बन्ध अथवा लिव-इन रिलेशन हमें "स्थायित्व और गरिमा" नहीं प्रदान कर सकते. ..खानाबदोशों सी जीवनशैली सदा के लिए स्वेच्छा से अपनाना भी कोई बुद्धिमानी नहीं है; और न ही इसमें चिरस्थाई सुख है. अतः एक असफल विवाह तोड़कर, पुनः सोचसमझकर किसी अन्य योग्य एवं सिंगल व्यक्ति से समाज-सम्मत ढंग से दूसरा विवाह करना कोई पाप नहीं वरन यह सभी तरह के सुखों को स्थाई आमंत्रण है.

(२) एक सच्चे जीवन साथी की पहचान कैसे करें क्योंकि इस दौर में सही इंसान की पहचान करना बहुत मुश्किल है!?
व्यक्ति को स्वयं की अंतःप्रेरणा से ही एक सच्चे जीवनसाथी की पहचान हो सकती है; और योग्य अंतःप्रेरणा जागृत होने के लिए व्यक्ति का मानसिक और आध्यात्मिक रूप से परिपक्व होना बेहद आवश्यक है! मानसिक और आध्यात्मिक परिपक्वता हमें अपने अनुभवों, स्वभावदोषों पर नियंत्रण और मन की शुचिता के प्रयासों से हासिल होती है. इसके लिए हमें निरंतर भौतिक जीवन एवं स्व से ऊपर उठकर अपनी सोच को व्यापक विस्तार देने की आवश्यकता होती है. जब ऐसा वास्तव में हो जाता है तो जीवन में योग्य प्रसंग कुछ कोशिश से और कुछ स्वतः ही घटित होने लगते हैं; ...योग्य समय पर योग्य जीवनसाथी का मिलना भी उनमें से एक होता है. वैसे ज्ञानियों के अनुभवों से एक बात तो सामने आई है कि व्यक्ति के जीवन में तीन घटनाएं प्रारब्धवश घटित होती हैं- जन्म, मृत्यु और विवाह! वैसे देखा जाये तो प्रारब्ध का निर्माण भी तो व्यक्ति के किसी काल के खुद के कर्मों से ही होता है!!!

(३) भगवद् गीता के ज्ञान को अधिकाँश लोग सही तरह समझने में समर्थ क्यों नहीं हो पाते...? गीता का ज्ञान वास्तव में ठीक प्रकार से समझने के लिए जीव को आत्मशुद्धि ज़रूरी है!
गीता का ज्ञान विशुद्ध आध्यात्मिक ज्ञान है, ..और आध्यात्मिक ज्ञान को समझ पाना उन्हीं के लिए संभव है जो सरल और सहज स्वभाव के होते हैं. स्वभाव में सरलता आना तभी संभव है जब व्यक्ति दुनियावी आसक्ति से कुछ परे हो. आसक्ति (सांसारिक दांवपेंच) और सरलता एक साथ तो होना संभव नहीं है ना! तो सांसारिक आसक्ति के साथ गीता में किसका मन रमेगा!? कोई यदि बलात् गीता को पढ़ ले, कंठस्थ भी कर ले, तब भी वह उसे भलीभांति समझ न पाएगा! यदि कोई समझने में सफल हो भी गया तो मानों उसने ५% प्राप्त कर लिया; शेष ९५% प्रतिशत वह तब हासिल करेगा जब वह उस पर रोजाना के जीवन में निरंतर अमल करेगा! बहुतायत के दुनियावी संस्कार और जीवात्मा पर पड़ा अविद्या का मोटा पर्दा उन्हें गीता को समझने या उसपर अमल करने से रोकते हैं. ...दुनियावी संस्कार और अविद्या के आवरण का नाश केवल यथोचित साधना द्वारा ही संभव है. स्वाध्याय, अच्छा साहित्य और अच्छे लोगों का 'निरंतर' संग, ये सब सम्मिलित रूप से करना एक प्रकार की साधना ही है. इससे हमारी सोच सरल और व्यापक होती है और हम उचित कर्मों की ओर अग्रसर होते हैं; और फिर गीता का ज्ञान अपनेआप उन कर्मों में प्रतिबिंबित होता है.

(४) नैतिकता के अभाव में आज जीवन किस तरह से प्रभावित हो रहा है...?? आज जीवन का हर क्षेत्र निजी से लेकर राजनीति तक बुरी तरह इस के शिकार हो चुके हैं.
हम सभी लोग जो इस प्रकार से प्रभावित हैं वो शायद अपने प्रारब्धवश ही नैतिकता के इस पतन को देखने और भोगने के लिए विश्व के इस भूभाग पर रहने के लिए बाध्य हुए हैं!!! चाहे हम लाख कहते रहें कि हमारी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान आदि विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं, परन्तु सत्य तो यही है कि ये सब अतीत की बातें हैं. वर्तमान में  तो विश्व के इस भूभाग पर अनैतिकता का दलदल विशाल होता जा रहा है जिसमें हम बुरी तरह फंसते जा रहे हैं, छटपटा रहे हैं! समाज, नौकरशाही और राजनीति के अलावा अपेक्षाकृत शुद्ध कहे जाने वाले धार्मिक / सामाजिक धर्मार्थ ट्रस्टों में भी अनाचार, भ्रष्टाचार और लोकेषणा के लोभ आदि की बेकाबू होती विकट परिस्थितियों के चलते आध्यात्मिक जगत के योग्य मार्गदर्शक भी मौन होकर एकांतवास में पलायन कर रहे हैं!

(५) बुरे समय में लोग ज्ञान को क्यों भूल जाते हैं?
क्योंकि उनका ज्ञान शायद उथला है या उन्हें उस ज्ञान पर विकल्प-रहित विश्वास नहीं! बहुधा लोगों का विश्वास अनुकूल परिस्थितियों में तो कायम रहता है, परन्तु जरा सी प्रतिकूलता आते ही छिन्न-भिन्न हो जाता है. क्योंकि कुछ तो उनके विश्वास में कमी है और कुछ उस ज्ञान में जो उन्हें कहीं से मिला है; ..या ज्ञान देने वाला शायद खुद उसपर अमल नहीं करता तब भी शिष्य (अनुयायी) के साथ ऐसा होता है!!! ..वैसे मेरा मानना है कि स्वयं के अनुभवों और अनुभूतियों से जो ज्ञान सूक्ष्म रूप से आता जाता है केवल वो ही चिरस्थाई होता है. लेकिन पुनः..., वो ज्ञान भीतर आना और उस ज्ञान का चिरस्थाई होना तब ही संभव है जब व्यक्ति अपने जीवन में आने वाले प्रसंगों, अनुभवों, और अनुभूतियों आदि से उत्पन्न ज्ञान को लेने की प्यास रखे और बड़े मनोयोग से उसे धारण करे! किताबी और सुने-सुनाए ज्ञान की आयु बहुत छोटी होती है, चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो!!! हाँ..., किताबी और सुना-सुनाया ज्ञान तब असरदार और स्थाई हो सकता है जब व्यक्ति उस पर निरंतर अमल करके कुछ सुखद अनुभूति ले. पुनः, यह सिद्ध हुआ कि अनुभूत करना तो अनिवार्य है!

Tuesday, March 27, 2018

(९३) चर्चाएं ...भाग - 12

(१) आज लोग अध्यात्म से जुड़ने का ढोंग तो खूब करते हैं किन्तु वास्तविकता कुछ और है, ....क्यों? आज जिसे देखो अध्यात्म की चर्चा करता दिखाई देता है किन्तु वास्तविकता में आज समाज का नैतिक पतन हो रहा है.
उथलापन इसका मुख्य कारण है! उदाहरण के लिए- (१) मनोरंजन और पिकनिक के तौर पर किसी वाटर-पार्क पहुंचे लोग और सागर के इर्दगिर्द या सागर में ही अधिकांश समय बिताने वाले मछुआरों के जल सम्बन्धी ज्ञान में बहुत अंतर होता है. (२) वर्चुअल गेम खेलने वाले और एक्चुअल गेम खेलने वाले स्पोर्ट्स-पर्सन के व्यक्तित्व में बड़ा अंतर होता है. (३) खाली अर्थात् कम भरा पात्र अधिक खड़कता है, जबकि भरा बर्तन वजनी और बहुधा शांत ही होता है. (४) बहुत से पहुंचे हुए व्यक्ति अर्थात् स्वामी-गुरु आदि अध्यात्म के पथ पर काफी अग्रसर हो जाने के पश्चात् अक्सर यह भूल जाते हैं कि उनकी आध्यात्मिक यात्रा का वास्तविक प्रयोजन आखिर क्या था!!! ..भौतिक चकाचौंध और धन-यश या मात्र यश की अभिलाषा ही उनका नैतिक पतन कर देती है (इसके अनेक प्रसंगों-अनुभवों का मैं स्वयं साक्षी हूँ). (५) किसी खेल या विधा जैसे तैराकी ही..., तैराकी के बारे में हम कितनी ही पुस्तकें पढ़ लें, रट लें; कितना भी ज्ञान अर्जित कर लें; ..हम उस पर बहुत बोल सकते हैं, भाषण दे सकते हैं, बहस कर सकते हैं, ....पर हम तैर नहीं सकते!!! ..सब जानते हैं कि तैरना सीखने के लिए क्या करना पड़ता है!

(२) परिवर्तन ही जीवन का नियम है तो अपनी सोच में परिवर्तन क्यों नहीं कर पाते सभी? यदि परिवर्तन सोच में भी हो तो क्या जीवन सरल नहीं हो जायेगा?
प्रत्येक व्यक्ति आज कुछ अपने कुछ विशिष्ट संस्कारों (इम्प्रेशंस) और धारणाओं के अधीन है. इनके चलते उसकी सोच इतनी दृढ़ सी हो गयी है कि अचानक किसी परिवर्तन की बात पर वह भड़कता है, आसानी से राजी नहीं होता, या चाह कर भी खुद को बदल नहीं पाता. मेरे विचार से किसी को 'परिवर्तित' होने के लिए कहना उसे उसकी पूर्वस्थापित सोच और अहं के विरुद्ध लगता है. ...'परिवर्तन' के स्थान पर यदि 'शोधन', 'परिष्करण', 'निखारना' (रिफाइनमेंट) आदि के लिए कहा जाये तो व्यक्ति के अहंकार पर कोई चोट नहीं होती! ..सत्य भी तो यही है कि हम यदि व्यक्तित्व और सोच आदि में 'निखार' लाने की कोशिश करें तो इस क्रम में जरूरी परिवर्तन भी अपनेआप हो ही जाते हैं! व्यक्ति, समाज या सोच की असली उन्नति के लिए 'परिवर्तन' की नहीं, बल्कि 'रिफाइनमेंट' या 'निखारने' की आवश्यकता है. 'परिवर्तन' शब्द में आलोचना का पुट है जबकि 'रिफाइनमेंट' या 'बेटरमेंट/इम्प्रूवमेंट' (और ज्यादा अच्छा बनो) शब्द जोश पैदा करते हैं. जरा सोचकर देखिये कि स्वयं की या अपने किसी करीबी की सोच को बदलने के लिए इनमें से कौन से शब्द मनोवैज्ञानिक तौर पर अधिक कारगर हैं?!

(३) जीवन क्या है! एक धोखा या एक कर्तव्य? मोह या समर्पण? मैंने जीवन को एक धोखे की तरह देखा है जो हम खुद को देते हैं जीवन भर, औरसमझते हैं हम जी रहे हैं, लेकिन हम तो उस भंवर में फंस रहे होते जिसका कोई किनारा नहीं, कोई मंजिल नहीं!
यदि जीवन के आध्यात्मिक पक्ष से अपरिचित ही रहें तो भौतिक जीवन सरासर 'मृगतृष्णा' समान ही प्रतीत होता है! कुछ भी स्थाई नहीं फिर भी इतने दंदफंद, चालाकियां, राग-द्वेष, ईर्ष्या, सबकुछ समेट लेने की होड़!!! ..अंततः इसकी समाप्ति खाली हाथ ही! ...इस भौतिक भंगुरता को देख-समझ कर तो इसके आध्यात्मिक पक्ष के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होनी ही चाहिए. जब हम आध्यात्मिक पक्ष को भौतिक पक्ष के ऊपर वरीयता देंगे तो समस्त नकारात्मकताएं समाप्त हो जायेंगी और फिर हमारा भौतिक जीवन भी लक्ष्यविहीन न रहेगा. तब हम इसे (भौतिक जीवन को) अपने समस्त आध्यात्मिक जीवन के बीच आए एक दिलचस्प पड़ाव की तरह देखेंगे, जहाँ हमें अपने आत्म-परिष्कार के भी असंख्य मौके मिलते हैं. यह भौतिक जीवन है ही आत्म-परिष्कार के लिए! यही इसका एक सबसे बड़ा उद्देश्य है.

(४) डिफरेंस बिटवीन धर्म एंड रिलिजन? धर्म वह जो हम पैदा होते ही धारण कर लेते हैं। यह ईश्वर प्रदत्त हमारी जीवन पद्धति है। परन्तु सम्प्रदाय हमने स्वयं उत्पन्न किए। पहले सम्प्रदाय माने लोगों, समाज़ को जोड़ने बाला। समता में स्थापित करने बाला। आज यह समाज़ को विघटित करने बाला बन गया है।
अंग्रेजी शब्दकोष में 'रिलिजन' शब्द का अर्थ मिलता है -- "विश्वास (आस्था) और पूजा का प्रचलित तरीका"! संभवतः अमुक रिलिजन किसी अमुक समुदाय, सम्प्रदाय या संघ के ईश्वरीय विश्वास, आस्था और पूजा के आन्तरिक व वाह्य (सूक्ष्म व स्थूल) आचारों-विचारों का सम्मिलित रूप है. अर्थात् उस समुदाय की विभिन्न सूक्ष्म-स्थूल उपासना पद्धतियाँ, ईश्वर के साकार-निराकार रूप एवं नाम, कर्मकाण्ड, तीज-त्यौहार व पारंपरिक उत्सव आदि उसमें शामिल हैं. यह सब समुदाय दर समुदाय भिन्न होता है. अतः यही कारण है कि विश्व भर में इसने सारे रिलिजन हैं. ..जबकि धर्म / धार्मिकता शब्द का अंग्रेजी भाषा में समानार्थी शब्द है -- 'राईटीयचनेस' ('राईट' यानी 'सही' से बना शब्द) अर्थात् सत्यनिष्ठा, योग्य एवं न्यायपूर्ण आचार व विचार. संभवतः हिन्दू शास्त्रों या तत्त्वज्ञान के अनुसार भी धर्म का कमोवेश यही अर्थ निकलता है. इसलिए हिंदी शब्द 'धर्म' का अंग्रेजी में अनुवाद 'रिलिजन' बिलकुल गलत है! जैसा कि आपने भी कहा कि 'धर्म' ईश्वर प्रदत्त हमारी जीवन-पद्धति है. अर्थात् 'आत्मानुभूति' ही 'धर्म' है. धर्म सदा-सदा से उसी में निहित है. ..तो धर्म तो प्रत्येक जगह एक ही है, अतः विभिन्न रिलिजनों में इसके भिन्न-भिन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता! जबकि अन्य सूक्ष्म-स्थूल सांप्रदायिक अनुष्ठानों को हम अंग्रेजी में 'रिलीजियस एक्टिविटीज' या 'रिलीजियस रिचुअल्स' कह सकते हैं. ...एक-दूसरे को अपनी बात संप्रेषित करने के लिए हमारे पास भाषा और शब्दों की सीमितता है, ..और जब विषय अनुभूति से सम्बंधित हो तो मुश्किल और भी बढ़ जाती है. ...वर्तमान हिंदी भाषा में 'रिलिजन' के समानार्थी कोई भी शब्द नहीं है! प्राचीन भारत में पहले 'धर्म' शब्द में सब निहित हो जाता था. अर्थात् पहले 'धर्म' शब्द का अर्थ 'रिलिजन' शब्द के बहुत निकट था. परन्तु कालांतर में, ज्ञान की अगली कक्षाओं या अवस्थाओं में पहुँचने पर पता चला कि 'आत्मानुभूति' ही सही मायनों में 'धर्म' है. यही 'राईटियचनेस' है, या 'राईटियचनेस' इसी में निहित है! हाँ, समस्त सामुदायिक वाह्य आचार-विचार हम 'रिलिजन' शब्द में स्थानांतरित कर सकते हैं. यदि हम जिद में आ जायें कि हम अभी भी 'धर्म' शब्द को उसी प्राचीन अर्थ में ही प्रयुक्त करेंगे, तो हम अपनी बात, खरे धर्म की बात, अन्यों को नहीं समझा पायेंगे. ध्यान रहे कि शब्दों और भाषा का महत्व मात्र भाव-भावनाएं समझने-समझाने के लिए है. वैश्वीकरण के इस दौर में अनेकों संस्कृतियों व भाषाओं के आपस में घुलमिल जाने से कई शब्दों के अर्थ बदल चुके हैं, और कईयों के बदल रहे हैं. ..ऐसे ही 'संस्कृति' या 'कल्चर' शब्द भी बहुत पुराना नहीं है. हमारे (या किसी सम्प्रदाय के) "समस्त वाह्य आचार", जैसे भाषा, रहन-सहन, वेशभूषा, तीज-त्यौहार, परंपराएं, रीति-रिवाज, आदि इस शब्द की परिधि में आ जाते हैं. एक तरह से 'रिलिजन' भी इसी में आ जाता है! 'रिलिजन' शब्द के लिए हम कदाचित् 'पंथ' शब्द प्रयुक्त कर सकते हैं! .....ऊपर हमने जो विश्लेषण किया वह कोई नया या अनोखा नहीं है! सभी समझदार (?) लोग जानते हैं. परन्तु फिर भी हममें व्यापकता का अभाव है. वह इसलिए कि कहीं हम अपनी व्यक्तिगत या सांप्रदायिक पहचान न खो दें! विज्ञान और अध्यात्म की दुनिया या शिक्षा के बीच यही बुनियादी अंतर है कि ज्ञान की सीमितता के बावजूद विज्ञानी व्यापक बने, जबकि असीमित ज्ञान भंडार की उपलब्धता के बावजूद तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्ति अपने 'खोलों' (शेल्स) में ही रह गए! आज हमसे सबसे बड़ी गलती यह हो रही है कि हम 'रिलिजन' ('संस्कृति') और 'धर्म' को एक ही मानते हैं अर्थात् संस्कृति को ही धर्म का दर्जा देते हैं. ...हमारे वाह्य आचार (बाहरी रहन-सहन या जीवन-पद्धति) हमारी 'वास्तविक' धार्मिकता को नहीं दर्शाते बल्कि दूसरों के प्रति हमारे दिल की गहराइयों में छुपी भावना व उसके निर्देशानुसार हमारे कर्म ही हमारी धार्मिकता को प्रकट करते हैं. और परमेश्वर केवल यही देखता है, हम असिद्ध इंसानों से उसे प्रथमतः यही अपेक्षित है. ध्यान रखें कि परमेश्वर की विभिन्न उपासना पद्धतियाँ भी लोगों की 'संस्कृति' का ही एक भाग है! वे माध्यम मात्र हैं उस तक, उसके गुणों तक पहुँचने का! ये संस्कृति का ही एक हिस्सा हैं इसलिए तो देश-काल-परिस्थिति अनुसार इनमें इतनी सारी भिन्नताएं हैं! यह जानते-बूझते हुए भी लोग अहंकारवश यही कहते हैं कि उनकी अपनी संस्कृति या रिलिजन ही सच्चा व सर्वश्रेष्ठ है और अन्य का दीन-हीन!!! ...फिर भी हम देखते हैं कि असंख्य वाह्य भिन्नताओं के बावजूद कुछ चीजें पूरे संसार में, सब पंथों में, समुदायों में एक सी पाई जाती हैं -- वह है एक सर्वोच्च अद्भुत शक्ति को मान्यता, जो अदृश्य व निराकार है परन्तु सर्वत्र विद्यमान है; यथासंभव विभिन्न चिरपरिचित नैतिक मूल्यों को स्वीकृति, उनका आग्रह, उनको अपनाना, आदि! ...तो फिर क्या यह नहीं माना जा सकता कि जो बात लगभग प्रत्येक सामुदायिक धर्मग्रन्थ एक सुर में बोलते हैं शायद वही यथार्थ धर्म है!!! यानी अंततोगत्वा 'राईटियचनेस' यानी सत्यनिष्ठा, योग्य एवं न्यायपूर्ण आचार-विचार ही ईश्वर को सर्वाधिक प्रिय है!!! तो वास्तविक अथवा खरा 'धर्म' तो यही हुआ! ...एक बात और.., कि बिना किसी लिखी, बोली गयी या सुनी गयी बात के प्रभाव में आए यानी सबको किनारे रखकर यदि हम अंतर्मुख होकर यह ध्यान करें कि अंततोगत्वा क्या चीज हमारे लिए सबसे अधिक महत्त्व रखती है तो भीतर से आवाज यही आयेगी कि, "'यथासंभव योग्य और न्यायपूर्ण आचरण"! पुनः विचार करने पर कि, "योग्य एवं न्यायपूर्ण आचरण" अर्थात् क्या??? ...सभी को समान जानकारी भीतर से मिलेगी!!!! समान तभी, जब हम पूर्णतयः तटस्थ हों!!!! वस्तुतः यही धर्म की आवाज है जो ईश्वर ने नैसर्गिक रूप से सबके भीतर, प्रत्येक आत्मा में पहले से डाली हुई है. ..वस्तुतः यही, आत्मा या हमारी आन्तरिक ऊर्जा का मूल गुणधर्म (प्रॉपर्टीज) है. ..अधिकांशतः हम वाह्य आचारों (रिलिजन, संस्कृति आदि) में ही उलझकर रह जाते हैं और भीतर (धर्म) तक पहुँच ही नहीं पाते.