Monday, July 16, 2018

(९९) चर्चाएं ...भाग - 18

(१) आध्यात्मिक गुरु ही यदि अध्यात्म पथ से भटक जाए, तो शिष्य कहाँ जाएँ...?? आज के आध्यात्मिक गुरुओं को देखकर कुछ समझ नहीं आ रहा, ....कुछ अनैतिक हो चले हैं और कुछ अपनी ही व्यक्तिगत परेशानियों के कारण आत्महत्या तक कर बैठते हैं!
बाइबिल में यीशु मसीह ने लोगों को संबोधित करते हुए कुछ बातें बहुत पते की बताई हैं- "झूठे पैगम्बरों (स्वयंभू सिद्ध व्यक्तियों) से सावधान रहो, जो बड़ी सीधी 'भेड़ों' के रूप में तुम्हारे सामने आते हैं, लेकिन असल में फाड़नेवाले 'भेड़िये' हैं. ....इसलिए वे तुमसे जो कुछ (सही बातें) कहें, वह करना, और मानना; परन्तु उनके से काम मत करना; क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं (आपको कुछ कहते हैं और उनके खुद के काम कुछ और होते हैं). ....कभी 'स्वामी' भी न कहलाना, क्योंकि सबका एक ही स्वामी है. ....जो कोई अपनेआप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो कोई अपनेआप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा. ....बहुत से झूठे सिद्ध उठ खड़े होंगे और बहुतों को भरमाएंगे. और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठंडा हो जाएगा. परन्तु जो अंत तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा. ....सावधान रहो! तुम मनुष्यों को दिखाने के लिए अपने धर्म के काम न करो, नहीं तो परमेश्वर से कुछ भी फल न पाओगे. ....और जब तुम प्रार्थना करो, तो कपटियों के समान न हो (लोगों को दिखाने के लिए सभाओं में और सड़क के मोड़ों पर खड़े होकर). ....द्वार बंद करके अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर; और तेरा पिता जो तुझे गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा." ...........आखिरकार हम देखा-देखी और व्यग्र हो कर सम्पूर्ण रूप से अंधे अनुयायी बनते ही क्यों हैं वह भी किसी मानव के???? क्यों हम किसी मनुष्य को इतनी आसानी से अवतार या भगवान् का दर्जा दे देते हैं????

(२) महाभारत में पांडव धर्म की तरफ और कौरव अधर्म की तरफ फिर भी सबसे बड़ा अधर्म पांडव अपनी आँखों के सामने देखते रहे (चीरहरण)! सब के सब पांडव महान योद्धा पर समय पर सब के सब चुप, यह क्या दर्शाता है? कहीं न कहीं धर्म कृष्ण के साथ होने की बात करता है और अध्यात्म खुद को कृष्ण बनाने की बात करता है, अगर एक भी पांडव अध्यात्म में लीन होता तो ये सब नहीं होता!?
महाभारत और रामायण आदि ऐसे महान पौराणिक दृष्टान्त हैं जो मानव जीवन के लगभग सभी अच्छे-बुरे पहलुओं को छूते हैं, टटोलते हैं, उनको सामने लाते हैं. सीखने की दृष्टि से ये लाजवाब हैं. ...और आलोचना से भला कौन बच पाया है?! हम हैं ही ऐसे कि बिना आगे-पीछे का संदर्भ या मंतव्य जाने बगैर सबसे बुरा छांटकर पहले उसे ही इंगित करते हैं! कृपया सकारात्मक भाव रखकर कुछ सीखने की दृष्टि से इनका 'सम्पूर्ण' पठन करें, अंत में निश्चित रूप से दिल और दिमाग खुलेगा, व्यापकता आएगी और इन ग्रंथों के प्रति कृतज्ञता व प्रशंसा के भाव उपजेंगे. वैसे इस चर्चा में आपकी बात के समर्थन में या विरोध में मैं भी अनेकों तर्क दे सकता हूँ, पर वह लेखन व बहस व्यर्थ के ही होंगे- बिल्कुल अप्रयोज्य!

(३) जीवन में इतना दुःख क्यों?
कुछ दुःख हमें अपने कर्मों के कारण होते हैं और कुछ दुःख दूसरों के कर्मों के द्वारा! समाज के विभिन्न घटकों अथवा स्वयं, के द्वारा विषाक्त सोच के साथ किये गए कर्मों के कारण ही तरह-तरह के दुखों की उत्पत्ति होती है. आदर्श सुखद स्थिति के लिए मेरे सहित मेरे आसपास के संघ की सोच में शुद्धता आना आवश्यक! ...केवल मेरे अथवा केवल बाकी के समाज के उत्थान से बात नहीं बनेगी! ..दोनों को समानांतर रूप से अपनी सोच में उत्कृष्टता लानी होगी. इसीलिए किसी बंद कमरे अथवा परिसर में नहीं, बल्कि व्यष्टि और समष्टि, दोनों को ध्यान में रखकर की जाने वाली साधना (प्रयास) ही खरी आध्यात्मिक साधना है.

(४) ज़िंदगी में बहुत ज्यादा तकलीफ है अब मैं क्या करूं परेशान हो गया हूँ!?
कोशिश, कोशिश, कोशिश, ....और अच्छी सोच से की गयी सिर्फ अनवरत कोशिश ही तकलीफ को दूर करने में मदद करेगी! मन में मजबूती के साथ धारण कर लें कि कोई भी समस्या मुश्किल, ...बहुत-बहुत मुश्किल हो सकती है पर असंभव नहीं! ..और यह भी, ...कि जरूरी नहीं कि हमारी नेक कोशिशों का प्रत्युत्तर तुरन्त ही मिले! न्यूटन जी की थ्योरी के अनुसार भी किसी क्रिया का जवाब आना निश्चित है पर यह जवाब या प्रतिक्रिया तुरंत भी आ सकता है और अनिश्चितकालीन देरी से भी!!! ..जवाब कुछ अलग स्वरूप में भी आ सकता है!!! ....लेकिन यह तो निश्चित है कि हमारी क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया कभी तो अवश्य आयेगी और वह प्रतिक्रिया हमारी क्रिया की गुणवत्ता व शुद्धता अथवा अशुद्धता के अनुसार / अनुरूप ही आयेगी! इसलिए ध्यान रहे कि हमारी कोशिशें नेक हों, अच्छी सोच के साथ की जायें. धैर्य रखें, ..परेशानियाँ अवश्य जायेंगी या इन प्रयासों से वे परेशानियाँ असह्य दुःख का कारण नहीं बनने पायेंगी.

(५) क्या हमारे अंदर ऐसी शक्ति मौजूद है कि हम हमारे मन की जो काम भावना है उसे शांत कर सके जिससे मनुष्य गलत कदम ना उठाये!?
यदि हमारे घर में प्रकाश का कोई स्रोत (मोमबत्ती, लालटेन, बिजली बल्ब) मौजूद है, तो साँझ ढलने पर हम उसे प्रज्जवलित करते हैं. हमारी इस क्रिया से घर में उजियारा बरकरार रहता है, अँधेरा अपने पांव नहीं पसारने पाता. ...इसी प्रकार यदि हम अपने मन में नेकनीयति, अच्छेपन, इंसानियत आदि (अर्थात् अच्छी सोच) का चिराग सतत जलाये रखते हैं तो अवांछित बुरे विचारों रूपी अँधेरे से हमेशा बचे रहते हैं. यही एक मात्र तरीका है मन से बुराई को दूर रखने का! ...अँधेरे का एक ही कारण है-- प्रकाशस्रोत का अभाव!!! नकारात्मक विचारों का भी एक ही कारण है-- मन में अच्छे विचारों का अभाव!!!

(६) माता पिता अपनी सन्तानों को जितनी मात्रा में प्रेम करती है, संतान माता पिता को उसी मात्रा में प्रेम क्यों नहीं कर पाते हैं?
जिन्दगी के सभी प्रसंगों का निर्माण 'क्रिया-प्रतिक्रिया' से होता है. ...हमेशा क्रिया पहले होती है और प्रतिक्रिया बाद में!! हमारे प्रेम में यदि अपेक्षा होगी तो हमारी संतान भी तो हमेशा अपेक्षा ही करेगी हमसे! ..संतान के लिए कुछ करते समय हमारे मन में यदि अहसान करने का भाव होगा, तो उसके मन में भी बाद में हमारे लिए यही भाव तो आएगा! हम ज्यादा गुणा-भाग करने वाले होंगे तो हमारी संतान हमसे भी शायद चार कदम आगे होगी!!! ..इसके अतिरिक्त बहुत से लोगों का मानना होता है कि पाश्चात्य संस्कृति के अन्धानुकरण से बच्चे बड़े होने पर अपने माँ-पिता को नहीं पूछते!!! मैं उनको इतना ही कहूँगा कि उनका यह कथन अपनी कमजोरियों और अकर्मण्यता पर पर्दा डालने के समान है! धिक्कार है हमें और अपनी संतानों को दिए गए संस्कारों को, यदि वे संतान को इतना बलिष्ठ ना बना पाए कि वह बाहर के किसी वैचारिक प्रदूषण का सामना कर पाए!!! यदि बड़े होकर संतान अच्छे-बुरे के ढेर में से अच्छा चुनने में असमर्थ है या हमारे प्रति उदासीन हो रही है तो दोष कहीं न कहीं हमारे वैचारिक वैक्सीनेशन में है; या कहीं न कहीं, कभी न कभी, हम स्वयं स्वार्थी रहे हैं.

(७) भले लोगों के साथ ही बुरा क्यों होता है?
मुझे तो लगता है कि अच्छा और बुरा दोनों लगभग सभी के साथ होता रहता है परन्तु अपेक्षाकृत अधिक संवदनशील होने के कारण भले लोगों को इसकी अनुभूति अधिक होती है! ठीक उसी प्रकार जैसे-- गन्दगी में आकंठ लिप्त जीव को गंदगी या बदबू से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता, कभी-कभी उसे इसका एहसास तक नहीं होता; जबकि किसी स्वच्छ संवेदनशील जीव को गंदगी या बदबू परेशान कर डालती है!

(८) अध्यात्म पैदाइशी होता है कि जीवन की मुश्किलें देखने के बाद पैदा होता है?
'अध्यात्म' अर्थात् 'आत्मा के विषय में'. 'आत्मा के विषय में' अर्थात् "स्वयं के मूल के विषय में". सरल शब्दों में कहें तो, खुद को और प्राकृतिक सिस्टम को भीतर से, जड़ से, भलीभांति समझना ही अध्यात्म है बस! ...यह विषय तो अनादिकाल से मौजूद है और आगे भी सदैव रहेगा- बिलकुल परिवर्तित!!! ...हाँ इसकी ओर हमारा ध्यान तब ही जाता है जब कभी हम अंतर्मुखता की ओर जाते हैं. जीवन की मुश्किलों अथवा दुःख से इसका कोई सम्बन्ध नहीं! ..सच तो यह है कि किसी दुःख या मुश्किल आने के बाद जो इसकी ओर मुड़ते हैं वे यथार्थ साधक ही नहीं; वे तो आर्त, परेशान, रोते हुए ही हैं; वे तो बस इसमें दुखों-परेशानियों का इलाज ढूंढ रहे होते हैं, अर्थात् स्वार्थ से आए हैं! वे जीवन भर कोरी बातों और शाब्दिक तत्त्वज्ञान में उलझकर अपनेआप को सांत्वना देते रहते हैं कि अब वे प्रसन्न हैं!!!! सच्चा साधक कभी भी आर्त, परेशान होकर साधक नहीं बनता बल्कि कौतूहल और जिज्ञासावश साधना आरंभ करता है. उसकी साधना शब्दों से कम, कर्मों से अधिक जुड़ी होती है. किसी के जीवन में जितनी जल्दी यह पल आ जाये उतना उत्तम.

(९) अध्यात्म मतलब स्वयं को जानना और स्वयं में ही उलझ जाना क्या इसका मतलब हम इतने मतलबी हो जाए कि इंसानियत भूल जाएं?
आध्यात्मिक साधना का मतलब केवल स्वयं के मूलभूत गुणों और प्राकृतिक दैवीय सिस्टम को जानना भर नहीं, केवल उसपर शास्त्रार्थ करना भर नहीं, मात्र शाब्दिक जाल में उलझना भर नहीं; अपितु जानकर, समझकर उनपर 'अमल' करना है. अध्यात्म केवल सुनने और कहने का शास्त्र नहीं अपितु करने का शास्त्र है. इसकी पूर्णता और सार्थकता रोजमर्रा की जिन्दगी में इसे लागू करने में निहित है.

(१०) हम हमेशा अपने आप को समाज के बंधनो में जकड़ा पाते हैं, कभी कभी हम खुद से रूबरू होते है, जैसे ही रूबरू होते हैं अपने को या अपनी ख्वाहिश जानते ही हम खुद को ही बहकाने लगते हैं, कभी धर्म के नाम पर कभी अध्यात्म के नाम पर, आपको ऐसा लगता है क्या? अगर लगता है तो हम ऐसा क्यों करते हैं!?
ऐसा वो लोग करते हैं जो 'शौकिया' ही या किसी 'भावुकता' के कारण अध्यात्म से जुड़े हैं. उनकी साधना, ज्ञान आदि में गहराई नहीं आ पाती. वे ऊपर ही तैरते रह जाते हैं और अध्यात्म को कुछ विशिष्ट रंगों, झंडों, प्रतीकों, परिधानों, धार्मिक क्रियाकलापों (अनुष्ठानों) आदि का खेल मात्र समझते हैं! जबकि असली अध्यात्म तो वर्ण, जाति, पंथ, समुदाय, संस्कृति, देश, काल आदि से बहुत परे है. यह सार्वभौमिक सिद्धांत स्वरूप है और सिद्धांत किसी की बपौती नहीं! उदाहरण के लिए गुरुत्वाकर्षण का नियम एक सार्वभौमिक सिद्धांत ही है; क्या किसी विशिष्ट जाति, पंथ, संस्कृति आदि से इसका कोई लेना-देना है? क्या आत्मा या दिखाई देने वाले मानवीय अंगों, रक्त की लालिमा, प्रकृति के नियमों आदि का किसी पंथ विशेष या समुदाय से कोई सम्बन्ध है?? ऐसे ही आध्यात्मिक नियम-सिद्धांत भी सार्वभौमिक एवं सर्वमान्य हैं, इन पर किसी धर्म-पंथ का ठप्पा लगाना बेवकूफी ही है! ये हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई अर्थात् किसी परिधि विशेष में बंधे हुए कैसे हो सकते हैं? हाँ, बहुत छूट देते हुए इन सब संस्कृतियों के अनुसार जीवनचर्या और धार्मिक क्रियाकलापों को इस (अध्यात्म) तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग घोषित किया जा सकता है! परन्तु ज्ञान के शिखर पर पहुँचने पर हमें इन सब को तिलांजलि देना अनिवार्य हो जाता है. इनसे अभी भी चिपके रहने का अर्थ यही होगा कि हम कहीं बीच के पड़ाव पर ही हैं. तब यह स्वीकार करने में शर्म कैसी कि हम अभी तक अपनेआप से पूर्णतया परिचित नहीं हुए, हमें सिद्धांतों के बारे में बहुत कुछ जानना अभी शेष है!

Tuesday, June 12, 2018

(९८) चर्चाएं ...भाग - 17

(१) असली पल क्या है, जिसको देखो यह कहता है यह पल ही जीवन है!?
कुछ दार्शनिक सा किन्तु बिल्कुल सत्य है यह वाक्य- "यह पल ही जीवन है, जी भर के इसे जी लो." ...'यह पल' यानी 'वर्तमान'! 'भूतकाल' में जो गुजर गया, उसने हमारे अनुभवों, परिपक्वता आदि में वृद्धि की; भूतकाल का महत्त्व बस इतना सा ही किन्तु उपरोक्त दृष्टिकोण से लाभदायक है! और वर्तमान में हम जो भी चिंतन-मनन और तदनुसार 'कर्म' करेंगे, उनसे हमें सबसे अधिक वर्तमान में और 'संभवतः' भविष्य में भी लाभ होगा! यहाँ 'संभवतः' इसलिए कि 'भविष्य' दूर है, और भविष्य के बारे में हम कुछ भी ठोस रूप से कहने और अपेक्षा रखने में असमर्थ हैं. अतः संदर्भित कथन (यह पल ही...) हमें वर्तमान पल का भरपूर, सम्पूर्ण और सबसे बढ़िया 'उपयोग' करने के लिए प्रेरित करता है. आज, ..इस पल हमारे समक्ष उपस्थित ढेरों विकल्पों में से किया गया सर्वोत्तम संभव कर्म का चुनाव ही 'इस पल को जीना' है! वह चुनाव भौतिक जगत से सम्बंधित भी हो सकता है, और आध्यात्मिक जगत से सम्बंधित भी! कोई भी फर्क नहीं पड़ता कि हम दोनों में से क्या चुनते हैं!!! बस शुभ और सार्थक, साथ ही अपने और संबद्ध व्यक्ति के मन-हृदय-आत्मा को आह्लादित करने वाला होना चाहिए. ऐसा चुनाव होगा तो वर्तमान तुरंत ही सुन्दर होगा और भविष्य में भी शुभ की आशा बनेगी! इन सब के अतिरिक्त इस 'वाक्य' के पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण सत्य छुपा है वह यह कि, यह भौतिक जीवन क्षणभंगुर है, कोई नहीं जानता कि इस जन्म का कितना समय शेष है. और यह वर्तमान जन्म और सम्बद्ध परिस्थितियां हमें अपने पूर्वकर्मों की बदौलत मिले हैं. यह जीवन अनमोल है क्योंकि यह सीमित है और इसका भरपूर सदुपयोग करने की ईश्वरीय अपेक्षा भी इसके पीछे निहित है; और यह जीवन कर्म-प्रधान ही है तो क्यों न हम इस जीवन के हर पल को संभावित आखिरी पल मानकर उसे भरपूर जियें!!! पुनः, ...वर्तमान में, ..आज, ..या इस पल, ...उपलब्ध विकल्पों में से यथासंभव सर्वश्रेष्ठ को चुनने के बाद, या संयोग से ही एकाएक समक्ष आए, प्रत्येक कार्य को कर्तव्य समझकर मन लगाकर, दिल लगाकर, पूरी तन्मयता, कुशलता और सम्पूर्णता से हंसी-खुशी उसे करना ही उस पल को भरपूर जीना है. चाहे वह कार्य पढाई-लिखाई से सम्बंधित हो, चाहे खेलने-कूदने से, चाहे नाचने-गाने से, चाहे गहन आध्यात्मिक साधना से, चाहे सच्चे प्रणय निवेदन से, चाहे संगीत साधना से, चाहे वह किसी से भी सम्बंधित हो! यही भौतिक उपासना है और यही आध्यात्मिक भी!!! "योगः कर्मसु कौशलं", ...इस अप्रत्याशित जीवन के इसी पल पूरी कुशलता के साथ किया कर्म ही योग (ईश्वर से जुड़ना) है!

(२) मृत्यु का भय क्यों होता है?
अध्यात्मशास्त्र का हिन्दू दर्शन कहता है कि, "शरीर की मृत्यु होती है, आत्मा की नहीं"; ईसाई और इससे मिलते-जुलते दर्शन के अनुसार, "मृत्यु के बाद भी योग्य व्यक्तियों का पुनरुत्थान होगा." ...फिर भी सामान्य व्यक्ति को मृत्यु का भय होता है क्योंकि उसने प्रत्यक्ष में ऐसा होते तो देखा नहीं और दूसरे अप्रत्यक्ष किन्तु कुछ ठोस सूक्ष्म ज्ञान-अनुभूतियों से भी वह वंचित है. ..थोड़ी बहुत सूक्ष्म समझ रखने वालों को भी मृत्यु का भय सताता है क्योंकि उनकी फिलोसोफी के अनुसार, "यह मानवजन्म प्रारब्ध भोगने व कर्म करके कुछ अच्छा संचित (पुनरुत्थान सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से भी) करने के निमित्त ही है", तो यह जीवन जितना अधिक लंबा हो जाये उतना ही बेहतर!! ...और उत्तम ज्ञानी व्यक्ति इस जीवन की भंगुरता को भी समझते हैं और कर्म की गुणवत्ता के महत्व को भी! वे जानते हैं कि इस जीवन के प्रत्येक पल को आखिरी जानकर अविलम्ब किये गए सर्वोत्तम शुभ-कर्म ही उसकी आत्मा के आगामी सुंदर सफर या पुनरुत्थान सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक साबित होंगे! वे जिंदगी के हरएक पल की अहमियत को समझकर उसे भरपूर सार्थकता के साथ हंसी-खुशी जीते हैं; वे लगभग भयमुक्त होते हैं!

(३) प्रतिदिन कुछ नया सीखना ज्ञान है , हरदिन कुछ नकरात्मकता दूर करना विवेक है और ज्ञान से विवेक की यात्रा ही सही मार्ग है...? दुनिया में ज्ञानी तो बहुत हैं किन्तु विवेकी शायद कोई विरला ही होगा ...क्यों?
दुनिया में ज्ञानी तो बहुत हैं, किन्तु विवेकी बहुत कम; आपके इस कथन से मैं भी सहमत हूँ. सही बात है कि हमारे देशवासियों के पास जितना ज्ञान का भंडार है उतना अन्यत्र शायद कहीं नहीं होगा, लेकिन उसका विवेकपूर्ण और सतत इम्प्लीमेंट विरले ही देखने को मिलता है. यहाँ तो अपेक्षाकृत कम पढ़ा-लिखा एक नाई, एक पान वाला, रिक्शावाला, रेहड़ी वाला तक परम ज्ञान रखते हैं; और पढ़े-लिखों की तो बात ही निराली है, वे तो अथाह ज्ञान के सागर हैं; यानी आध्यात्मिक समझ भरपूर है, लेकिन उनका विवेक इस ज्ञान को नहीं अपनाता! वह इस ज्ञान का व्यावहारिक समर्थन, अनुपालन या आचरण करता नहीं दिखता! असल में करना कुछ नहीं और मात्र ज्ञान के फुलाव को प्रदर्शित करना ही यहाँ लोगों के टाइम-पास का एक बढ़िया जरिया बन गया है! आज के स्टेटस सिंबल रूपी अधिकांश सत्संगों और आध्यात्मिक मंचों/केन्द्रों तक में इसकी बानगी दिखाई पड़ती है. इसीलिए तो नकारात्मकता कम होने का नाम नहीं ले रही, अपितु दिनोंदिन बढ़ ही रही है.

(४) सम भाव कैसे रखा जाये?
अपने सूक्ष्म और असल स्वरूप को पहचान कर यानी अपनी आत्मा के मूल गुणधर्म (प्रॉपर्टीज) को पहचान कर, उपरांत उसी के अनुसार रोजमर्रा की जिन्दगी में आचरण करने पर ही सम-भाव रख पाना संभव है. सूक्ष्म या आध्यात्मिक ज्ञान बहुत जरूरी, और उससे भी बहुत-बहुत जरूरी है- जीवन में उसे लागू करना! 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का भाव उसी के बाद ही जन्म ले सकता है!

(५) प्रायः सभी को एक शिकायत तो अक्सर रहती ही है - बुरा काम कोई नहीं किया, किसी को सताया या परेशान भी नहीं किया; फिर भी दूसरे लोग परेशान करते हैं,और जीवन में दुःख बना ही रहता है!?
अक्सर अपने अहंकार या इगो के कारण लोगों को अपनी गलतियाँ दिखाई नहीं पड़तीं या समझ में नहीं आतीं! ...या फिर उनके द्वारा हुई गलतियाँ (अयोग्य क्रियाएं) उनकी यादाश्त की सीमा से ही बाहर होती हैं! हमारे जीवन में होने वाली प्रत्येक घटना के पीछे कोई न कोई ठोस कारण अवश्य है, भले ही हम उसे ज्ञात न कर पाएं. ..यह ठोस कारण वे ज्ञात-अज्ञात क्रियाएं ही हैं जो हमने वर्तमान, निकट अतीत या बहुत पहले कभी कीं. प्रकृति का ताना-बाना केवल कुछ प्रतिशत ही बूझा है हमने! उदाहरण के लिए-- जब कोई मनुष्य किसी लालच में आकर किसी पहाड़ी क्षेत्र में पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करता है, पहाड़ों की चट्टानों, पत्थरों आदि को बांधे रखने वाले पेड़ों को अंधाधुंध काट डालता है तो उसके बाद जब कोई जियोलॉजिस्ट वहां का दौरा करता है तो वह अपने अर्जित ज्ञान के आधार पर भविष्य में भूस्खलन की प्रबल सम्भावना तो बता देता है, लेकिन यह पूछने पर कि तबाही कब आयेगी, वह कोई ठोस या बिलकुल सही-सही उत्तर नहीं दे पाता! एकदम सटीकता से "कब?" का उत्तर ना दे पाना यही दर्शाता है कि प्रकृति के ताने-बाने का बहुत कुछ हिस्सा हम अभी भी नहीं जानते! ..लेकिन यह जानते हैं कि क्रिया के फलस्वरूप उसी प्रकृति की कोई अन्य प्रतिक्रिया अवश्य आयेगी, पर किस रूप में और कब (???), इसका सटीक आंकलन करने में बड़े-बड़े मनीषी भी असमर्थ हैं! ...तो फिर से मुख्य विषय पर आते हुए, ...हमारे जीवन से जुड़ी प्रत्येक घटना हमारी अपनी ही नयी-पुरानी क्रियाओं की गूँज/प्रतिध्वनि है. आने वाले भविष्य की घटनाएं सुखद हों, इसके लिए बहुत आवश्यक है कि हम अपनी वर्तमान क्रियाओं को अच्छे से अच्छा करें. ..और यदि हम वर्तमान में वास्तव में भला काम ही कर रहे हैं तो निश्चिन्त रहें कि उसका प्रतिफल निकट भविष्य या कभी दूर भविष्य में अवश्य प्रकट होगा. ......कोई किसान जो घटिया बीज और घटिया खाद पिछली फसलों को बोते समय डाल चुका, उसका खामियाजा तो अभी वह भुगत ही रहा होगा; पर साथ ही अभी इस वक्त जब वह जाग्रत हो कर बढ़िया बीज और बढ़िया खाद डाल रहा है, तो इस क्रिया से उसकी आने वाली फसलों के अच्छे होने की सम्भावना अब प्रबल है!

(६) जीवन में मार्गदर्शन क्यों जरूरी है?
नित कुछ सीखने और सिखाने के लिए मार्गदर्शन लेना और देना, दोनों ही आवश्यक हैं. कहीं और कभी हम शिष्य या स्टूडेंट होते हैं तथा कहीं और कभी हम टीचर भी होते हैं! जीवन में समानांतर रूप से दोनों भूमिकाएं मिलती हैं हमें! जो दोनों का ही समान रूप से लाभ उठाये, वो शीघ्र उन्नति करता है तथा दूसरों को भी लाभ पहुंचाता है.

Thursday, June 7, 2018

(९७) चर्चाएं ...भाग - 16

(१) हम अपने भोजन का परिणाम हैं! जिस प्रकार का वह भोजन करेगा, वैसा ही उसका व्यक्तित्व निर्मित होगा!
कल व्हाट्सएप पर अंग्रेजी में एक शॉर्ट मैसेज मिला, जिसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है- "उन्नत या अच्छे होने का मतलब यह नहीं कि आप पीते नहीं, धूम्रपान नहीं करते, दावतों-पार्टियों में नहीं जाते, शाकाहार ही खाते हैं; बल्कि आपका उन्नत या अच्छा होना आपके हृदय में चल रही भावनाओं, शिष्टाचार और लोगों के प्रति आपके सम्मान व व्यवहार से जाहिर होता है." .....हाँ, यदि मैं आपके शब्दों के भाव को आगे दिए वाक्य अनुसार सकारात्मक रूप दे दूं तो आपका कथन सर्वथा सही हो जायेगा-- "जो जिस उपाय से भोजन (या अपनी कोई अन्य मूलभूत आवश्यकता / जीविका) अर्जित करता है (जुटाता है), उसी प्रकार से उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है." ....इस विषय पर आप मेरे विचारों को विस्तृत रूप से "(१९) खान-पान और धर्म" में पढ़ सकते हैं.

(२) भरोसा मजबूत होगा तो आप निडर होंगे! आज भरोसा की ही कमी है अतः कोई किसी का सम्मान भी नहीं करता!
सच है कि यदि हमें ईश्वर और खासतौर पर सार्वभौमिक ईश्वरीय सिद्धांतों पर पूरा भरोसा होगा तो हम निर्भय रहेंगे. यहाँ प्रचलित वर्तमान धारा के विपरीत भी सभी प्रकार के अच्छे और न्यायसंगत कार्य करने में हमें कोई संकोच, संशय अथवा भय नहीं होगा; भले ही कोई त्वरित एवं उचित प्रतिसाद (रेस्पोंस) न मिले तिसपर भी! व्यक्तियों के परिपेक्ष्य में यदि भरोसे की बात की जाये तो, एक-दूसरे पर विश्वास और एक-दूसरे के प्रति सद्भावना से ही परस्पर सम्मान दिया और लिया जा सकता है. क्रिया के अनुसार ही तो प्रतिक्रिया प्राप्त होती है!

(३) सामाजिक बुराइयों से क्या एक स्त्री अकेली लड़ सकती है...?
जी हाँ! ...वैसे घर वालों और समाज के जागरूक तबके का सहयोग मिले तो थोड़ी आसानी रहती है. पर बहुत से मामलों में हमें ये दोनों सहयोग भी नहीं मिल पाते! तब लड़ते-जूझते बारम्बार नाकामी भी मिलती है और इससे हौसला भी पस्त होता है, अनेकों बार मन में निराशा और हताशा आ जाती है. फिर भी कहूँगा कि एक स्त्री में एक पुरुष से अधिक साहस, धैर्य, व दृढ़ता जैसे गुण होते हैं. इसलिए किसी भी समस्या से जूझने की कालावधि एवं सामर्थ्य एक स्त्री में पुरुष से अधिक होते हैं. धैर्य का गुण होने से बहुत विषम परिस्थितियों में भी एक स्त्री अपने मस्तिष्क को ठंडा रखते हुए बखूबी बहुत सूझबूझ वाले निर्णय ले सकती है. अपनी इन विशेषताओं को पहचानकर और उनपर भरोसा कर अब वह समस्याओं से लड़ने के लिए अकेले ही ठन्डे दिमाग से सर्वोत्तम न्यासंगत प्रयास करे! कोई मानवीय साथ न मिलने की दशा में अपने प्रयासों की प्रक्रिया में यदि वह अपने आध्यात्मिक पक्ष को भी ठोस और मजबूत कर ले तो वह टूटेगी नहीं और अनेक विफलताओं के बावजूद बिना थके और बिना अवसादग्रस्त हुए उसके प्रयासों का सिलसिला अनवरत चलता रहेगा! क्योंकि प्रत्येक असफल प्रयास के बाद भी उसे 'भरोसा' है कि उसका यह प्रयास ईश्वरीय सिद्धांतों के अनुसार कहीं न कहीं दर्ज अवश्य हो रहा है और किसी योग्य समय पर उसे इन योग्य प्रयासों का प्रतिफल किसी न किसी अच्छे स्वरूप में अवश्य मिलेगा! यह भरोसा ही हमें भीतर से एक दिव्य मजबूती देता है! निःसंदेह पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में यह भरोसा बहुत अधिक होता है, यह बात कुदरती रूप से स्त्रियों के पक्ष में जाती है! जिसमें भरोसा अधिक, वह ही अधिक नैतिक!!! जो अधिक नैतिक, वह ही 'धर्म' (न्यायसंगतता) के पक्ष में!!! और जो न्यासंगत, उससे न्यायूर्ण ढंग से मिलने वाली सफलता या किसी अन्य प्रकार की ईश्वरीय अनुकंपा अधिक समय दूर नहीं रह सकती!!! इसीलिए तो मैंने अपने पूर्व आलेखों में भी अनेकों बार स्त्रियों को पुरुषो से कहीं अधिक श्रेष्ठ घोषित किया है. जागरूक स्त्रियों से मेरी विनम्र विनती है कि कृपया वे खुद को अबला, असहाय अथवा कमजोर समझकर पुरुषवर्ग की मानसिकता का अनुसरण करके उन जैसा बनने की चेष्टा न करें!!! आप पुरूषों से बहुत अलग और बहुत आगे हैं. अपना यह अनूठापन बनाये रखें. इस अनूठेपन के साथ कोई भी समस्या लम्बे समय तक आपको परेशान नहीं कर पायेगी. यह अनूठापन ही आपके स्वाभिमान को अक्षुण्ण रखेगा. पुरुषों के अनेकों पापों के बावजूद आपके इसी अनूठेपन ने अतीत में और वर्तमान में अनेकों बार अपने जीवनसाथी और सम्पूर्ण मानवजाति के पाप के घड़े को भरने से बचाया है, और फलस्वरूप इस धरा को सृष्टिकर्ता के कोप से बचाया है. कृपया अपनी विशिष्टता को गर्व के साथ सहेजें. ऐसी दिव्य शक्ति के शब्दकोष में 'मुश्किल' शब्द तो हो सकता है, किन्तु 'असंभव' शब्द तो कदापि नहीं!

(४) आज पाश्चात्य सभ्यता का हमारे नवयुवकों पर बढ़ता दुष्प्रभाव काफी घातक सिद्ध हो रहा है, ....क्या यह सही है? आज हमारे नवयुवक हर बात में पश्चिम को नक़ल कर अपनी संस्कृति के विरुद्ध जा कर परेशान हो रहे हैं ...जिसे आज अपनी शान समझ कर अपना रहे हैं, वही उनको तनाव दे कर बैचैन कर रहा है!
देखिये, इन्टरनेट के इस युग में और विभिन्न देशों के मध्य व्यापार सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय संधियों (आपसी लेनदेन) के इस युग में जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक ही दायरे में सिमट आया है, वहां अब यह पूरब और पश्चिम की सभ्यता की बात करना व्यर्थ ही है! विश्व भर की समस्त सूचनाएं, खोजें व आविष्कार, फैशन, उपभोक्ता सामान, आदि सबकुछ अब सबको सहज उपलब्ध हैं. सूचनाओं, सामग्री और सोच का ढेर लगा हुआ है, चुनने के लिए ढेरों विकल्प हैं. ..अब मुद्दे की बात यह है कि अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किसको चुनते हैं, किसको अपनाते हैं, बड़े हो रहे अपने छोटों को किस प्रकार की सलाह देते हैं, दिमाग को कितना खुला रखते हैं, खुद को कितना दूरदर्शी बनाते हैं और उस अनुभव से अपने छोटों को कितना दूरदर्शी बनाते हैं!!! आज जैसे हमारे पास ज्ञान और सामान का भंडार तथा उनमें से मनचाहा व श्रेष्ठ चुनने का विकल्प व स्वतंत्रता है, उसी प्रकार से यह सबकुछ लगभग सभी औसत रूप से समर्थ राष्ट्रों के नागरिकों के पास भी है. जिस राष्ट्र के शासक, अभिजातवर्ग, और नागरिक इन ढेरों विकल्पों के बीच जितना अच्छा चुनाव कर रहे हैं, वह राष्ट्र उतना ही समृद्ध व सुखी है; वहां की सामान्य सोच और जीवनशैली उत्तम है, कानून-व्यवस्था की स्थिति भी बहुत सराहनीय है! अब इन हालातों में यह पूरब और पश्चिम के भेद का फंडा अपनी समझ से तो परे है! .....सच तो यह है कि अपने संघ में फैली कुरीतियों, अव्यवस्था, बिगड़ी जीवनशैली, लुंजपुंज कानून व्यवस्था, नैतिक पतन आदि से दुखी और कुपित होकर खीजते हुए हम सारा दोष पश्चिमी सभ्यता के ऊपर मढ़ने की कोशिश करते हैं! देखिये गलत सोच और गलत चालचलन रूपी बैक्टीरिया-वायरस आदि विश्व में अब सभी जगह अपनी पहुँच रखते हैं, लेकिन कमजोर मनों-दिमागों-शरीरों में ही उनका प्रवेश या हमला संभव हो पाता है. क्या यह संभव नहीं कि हम मानसिक रूप से कमजोर या संकीर्ण थे/हैं?! जो संघ अपनी जीवनशैली, सोच, आचार-विचार आदि को सही और व्यावहारिक रखने में कामयाब है वह हमसे आगे है! हम यदि पीछे हैं तो अपने गलत चुनावों के कारण!!! जीर्णशीर्ण हो चुकी कुछ पुरानी मान्यताओं के प्रति अंधश्रद्धा भी उसका एक बहुत बड़ा कारण है, जितना बड़ा कारण आप पश्चिम के अन्धानुकरण को बताते हैं!!!! तमाम आधुनिकताओं और संसाधनों के बावजूद हम अभी भी जड़ बुद्धि हैं, हमारी अनेकों बेड़ियाँ और गलतियाँ हमें सही रूप से सक्रिय और उन्नत होने से रोक रही हैं! सिर्फ एक उदाहरण- आज का एक 'औसत' भारतीय युवा पढाई के क्षेत्र में किसी भी विषय की गहरी समझ बटोरने के बजाय उसका उथला अध्ययन करता है और शेष भगवान् के दरबार में हाजिरी लगाकर, प्रसाद चढ़ाकर प्राप्त कर लेना चाहता है! यह चीज उसने पश्चिम से नहीं बल्कि अपने बड़ों को ऐसा करते देखकर ही सीखी है!!! अनेकों अन्य उदाहरण हैं जिनके लिए शब्द कम पड़ जायेंगे, क्योंकि सामाजिक कमजोरियां हैं ही इतनी ज्यादा! आज के बिगड़े और तनाव लेने-देने वाले बच्चों के स्वभावदोषों के लिए जितना हम बच्चों या पश्चिमी सभ्यता को दोषी बताते हैं उससे अनेक गुना अधिक दोषी हम अभिभावक स्वयं हैं, जो बच्चों के समक्ष कोई भी अच्छा उदाहरण (अपने आचरण से) रखने में नाकाबिल सिद्ध हुए हैं. बच्चे तो कोरा कागज होते हैं, उनके मन-मस्तिष्क पर इबारत हम अभिभावक और आसपास का समाज ही लिखते हैं, उसी से उसका बुनियादी व्यक्तित्व बनता है. याद रखें- बुनियाद अच्छी तो इमारत अच्छी!

Saturday, June 2, 2018

(९६) चर्चाएं ...भाग - 15

(१) जीवन में योग का महत्व शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही है?
आजकल 'योगा' के नाम से मशहूर योग या योगाभ्यास मात्र शारीरिक व्यायाम ही है! कोई कितना भी कहे कि शरीर के साथ-साथ इससे आध्यात्मिक बलिष्ठता भी आती है, मगर ये सब कहने की बातें हैं. पहले के समय में शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों के विकास पर जोर दिया जाता था, बल्कि आध्यात्मिक (सद्गुणों के) विकास की पहले सोची जाती थी! आध्यात्मिक विकास पहले सुनिश्चित होते ही उसी आध्यात्मिक विकास के बल पर शारीरिक विकास को भी एक अतिरिक्त लाभ के रूप में अर्जित किया जाता था. लेकिन आजकल के 'योगा' में शारीरिक विकास के बल पर आध्यात्मिक पक्ष के विकास को एक अतिरिक्त लाभ के रूप में प्रचारित किया जाता है. ..यह बिलकुल असंभव और मिथ्या बात है!!! आपने भी आध्यात्मिक तेज के बल पर स्वस्थ शरीर का होना देखा होगा, किन्तु मात्र शरीर की स्वस्थता हेतु प्रयास करने वालों के आध्यात्मिक गुणों में वृद्धि होती क्या देखी है आपने??? ईमानदारी से विचार करें! ...यह सब मैं अपने अनुभवों से कह रहा हूँ, क्योंकि लखनऊ के अतिरिक्त मेरा एक अन्य दूसरा निवास एक योगकेंद्र परिसर में ही है. सत्य तो यह है कि केवल समुचित साथ ही व्यावहारिक आध्यात्मिक साधना और खरा साधकत्व ही व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति करता है, इसके पश्चात् वह शारीरिक योगसाधना भी बड़ी सरलता से कर सकता है; परन्तु केवल शारीरिक स्वास्थ्यलाभ के आकांक्षी व्यक्ति "योगा" (शारीरिक कसरत) करके अपने भीतर आध्यात्मिक साधकत्व को उत्पन्न नहीं कर सकते!

(२) आशा और विश्वास जीवन को सही दिशा दे कर जीवन जीने की राह प्रशस्त करते हैं, सो इन्हे खोने मत दो!! आधुनिक जीवन शायद कुछ अधिक जटिल होने से आज आत्महत्या के केस निरंतर बढ़ रहे हैं. ...अध्यात्म से जुड़ कर अपनी सोच को सकारात्मक बनाया जा सकता है!
हमारे समाज में आज जीवनशैली बदलने के साथ-साथ जीवन के मूल्य, नैतिक मूल्य, आचरण, स्वभाव आदि भी तेजी से बदल (नीचे की ओर जा) रहे हैं. जीवन के असली अर्थ, उद्देश्य आदि से लोग अपरिचित होते जा रहे हैं. एक अजीब सी आपाधापी चल रही है. व्यक्ति इससे अनभिज्ञ होता जा रहा है कि जिस भौतिक विलासिता, भौतिक सुखों और भौतिक भण्डारण के लिए वह दिन-रात एक किये दे रहा है वह तो जीवन का असल उद्देश्य है ही नहीं!!! प्रत्येक दिन के आखिर में शारीरिक और मानसिक रूप से अपने आपको बेतहाशा थकाकर वह जिस प्रकार यंत्रवत अपना जीवन चला रहा है वह उसे कुछ भौतिक प्रसन्नता तो अवश्य देता है पर उस प्रसन्नता की आयु लम्बी नहीं होती और ना ही वह स्थाई होती है. इससे खीजकर वह जटिलताओं, तनाव और अवसाद की ओर बढ़ता है, जिससे  आज हत्या और आत्महत्या दोनों के केस लगातार बढ़ ही रहे हैं. इसके अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक शोषण के मामलों में भी निरंतर वृद्धि हो रही है. सोच में विकृतियाँ लगातार बढती जा रही हैं. इन सब के पीछे का कारण बताना पिछली बातों को दोहराना ही होगा कि "हम तेजी से स्वयं यानी आत्मा यानी आत्मिक गुणों यानी परमात्मा से दूर जा रहे हैं." इसके भीतर जाना तो दूर की बात, इसकी चर्चा भी सामान्यतः लोगों को बोझिल सी लगती है! ...कुछ उस ओर जाना भी चाहते हैं तो वह भी किसी लालच से ही, जैसे शरीर को अधिक समय तक फिट (या जिन्दा!!!) रखने के लिए योगाभ्यास के रूप में कुछ शारीरिक व्यायाम करना और यह सोचना कि इससे हमारा आध्यात्मिक विकास भी हो ही जायेगा, हमारा मन आदि भी शांत रहेगा!!! पर यह भी केवल मनोवैज्ञानिक मिथ्याभ्रम मात्र ही है. सच तो यह है कि मन में साधकत्व आने से ही कुछ ठोस और टिकाऊ सध सकता है!

(३) खुशी का मूल स्रोत क्या है?
हमारे मूल में हमारी आत्मा है, और इस आत्मा के कुछ मूल गुणधर्म हैं, ये मूल गुणधर्म ही साक्षात् 'धर्म' अर्थात् "सदैव 'सर्वथा योग्य एवं न्यायपूर्ण' आचरण के निरंतर समर्थन की नैसर्गिक सूक्ष्मतम वृत्ति"! ....यह तो हो गया हमारा 'सूक्ष्म मूल' और उसका 'सूक्ष्म मूल स्वभाव'. ...जब मानव देहधारी आत्मा यानी मनुष्य, आत्मा के मूल स्वभाव के अनुसार / अनुकूल आचरण करता है तब उसे सर्वोच्च श्रेणी की खुशी अर्थात् 'आनंद' मिलता है. परन्तु सूक्ष्म देह में विद्यमान दुनियावी संस्कारों और उनसे निर्मित जड़ वृत्ति के कारण साधारण मनुष्य के लिए सर्वकाल आत्मा के निर्देशानुसार आचरण करना बहुत ही दुष्कर होता है. ..लेकिन फिर भी असंभव तो नहीं! ...कभीकभार ही  सही, पर जब कभी भी हम भीतर की दैवीय ध्वनि के निर्देशानुसार, हमारी स्थूल वृत्ति से हटकर कुछ अतियोग्य निर्णय लेकर तदनुसार आचरण करते हैं तो हमें अपार खुशी मिलती है. वह खुशी दिव्य होती है और हम उसे शब्दों में ठीक से बयान नहीं कर सकते! उस 'कभीकभार' को 'सदैव' की ओर ले जाना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए, यदि हमें हमेशा चिरस्थाई और गहरी खुशी चाहिए!

(४) आज सभी मानसिक तनाव से पीड़ित है!
यह बात सही है कि हमारे भूभाग में आज लगभग सभी मानसिक तनाव से ग्रस्त हैं, ..दुर्जन भी और सज्जन भी! ...दुर्जन अपने वर्तमान दुष्कर्मों के कारण या तो तनावग्रस्त हैं या अभी नहीं भी हैं तो भविष्य में अवश्य झेलेंगे. जबकि वर्तमान के सज्जन अपने पूर्वकर्मों के कारण वर्तमान में इन दुर्जनों के दुष्कर्मों से उत्पन्न पीड़ाओं को झेलने के लिए विवश हैं! देखा जाए तो दोनों के तनाव का कारण लोगों के वर्तमान या पिछले कर्म ही तो हैं! यदि किसी कर्म से स्थितियां बिगड़ी हैं तो किसी कर्म से ही स्थितियां सुधर सकती हैं! तो, सज्जनों को चाहिए कि वे अपनी वर्तमान सज्जनता को कायम सखते हुए दुर्जनों के भीतर भी सज्जनता उत्पन्न करने की चेष्टा करें; साथ ही दुर्जन भी अपनी सोच को बदलकर सकारात्मकता की ओर बढें. यही दोनों के वर्तमान और भविष्य के लिए तनाव-मुक्ति प्रदान करेगा. अच्छे विचारों की उत्पत्ति ही बुरे विचारों का नाश करेगी! जिस राष्ट्र में भी बहुतायत विशेषकर अग्रणी समाज में सकारात्मकता यानी अच्छाई है उस राष्ट्र में मानसिक तनाव उतना ही कम है और खुशहाली ज्यादा है.

(५) आज देश को धर्म और जाति के नाम से बांटने वालों को कैसे रोका जा सकता है...??
जागरूक होकर तत्पश्चात सोच को ऊपर उठाकर ही हम इस जहर को फैलने से रोक सकते हैं. हमारे वर्तमान बड़े आका (धार्मिक / आध्यात्मिक गुरुजन, राजनेता, उच्च पदों पर आसीत् अधिकारी) आदि तो कुछ करने से रहे. अब आम जनता को खुद ही उठना होगा, खुद से ही प्रेरित होना होगा और ऐसे भ्रष्ट व अवसरवादी तंत्र को उखाड़ फेंकना होगा. वैसे इस प्रकार के कृत्य को हमारे आका बगावत का नाम देंगे, पर वस्तुतः यह एक क्रांति होगी. बहुत बड़े आमूलचूल परिवर्तन किसी क्रांति से ही संभव होते हैं. फिर भी यह क्रांति इतनी सरल नहीं, क्योंकि यह क्रांति सर्वप्रथम अपनी खुद की मानसिकता बदलने के बाद ही संभव है. तो फिर प्रथम एक ही उपाय है कि सभी लोग अपने स्वार्थों से क्रमशः ऊपर उठते हुए खरे साधकत्व की ओर बढ़ें.

Monday, May 28, 2018

(९५) चर्चाएं ...भाग - 14

(१) मनुष्य आसान की तरफ नहीं आता है! कोई भी विचार कर्म करते है मेहनत करते है; जिस पर केंद्रित करते है दिमाग को फैलाता है! आप नकारात्मक सोच करते है तो सकारात्मक नहीं होता है!
यद्यपि आपकी चर्चा का विषय व आशय स्पष्टता से समझ नहीं पाया तद्यपि जो समझा तदनुसार उत्तर दे रहा हूँ. ...मानव, खासतौर पर हमारे भूभाग के व्यक्ति जीवन के विभिन्न क्रियाकलापों का जितना अधिक सरलीकरण करने की चेष्टा कर रहे हैं , वे उतना ही दुष्कर, उलझाव भरे और जटिल होते जा रहे हैं. पीछे का मूल कारण यह है कि कामों को करने का हमारा ढंग यथासंभव शॉर्टकट अपनाने वाला है और अपेक्षित सैद्धांतिक ज्ञान बहुत ही उथला है. उदाहरण के लिए इन्टरनेट से जुड़ी सुविधाओं / वेबसाइट्स / सॉफ्टवेयर्स / उनपर काम करने के ढंग आदि पर ही एक नजर डाल लीजिये, ये सब जितने अंश में हमारा जीवन आसान कर रहे हैं, समानांतर रूप से उससे अधिक अंश में ये हमारा समय, ऊर्जा और सुख-चैन लिए ले रहे हैं!!! हमारे यहाँ प्रयुक्त अधिकांश सॉफ्टवेयर / प्रोग्राम्स बहुत सी तकनीकी खामियां रखते हैं, उन्हें आधे-अधूरे ढंग से अकुशलता के साथ बनाया गया है. कोढ़ में खाज यह कि सॉफ्टवेयर बनने और इंस्टाल करने के बाद कार्य-स्थलियों पर बहुत से कार्य उनपर मैन्युअली (मनुष्य के हाथों द्वारा) किये जाते हैं; यहाँ बहुत सारी फीडिंग मिस्टेक्स (गलतियाँ) कर्मियों द्वारा होती हैं! ...और अंत में उनको ठीक करने / करवाने के लिए बहुत ज्यादा परेशानियाँ होती हैं, दिमाग फटने तक को होता है!!! कई-कई घंटों व दिनों तक महत्वपूर्ण सर्वर बंद रहते हैं या उनके बंद होने की फर्जी बात कही जाती है. इस प्रकार के अधकचरे सैद्धांतिक ज्ञान और अनमनी कार्य-संस्कृति से हमारी जिंदगी आसान हो रही है या जटिल??? सरलता की कोशिश में जटिलता की ओर जाने का यह तो मात्र एक उदाहरण था, सूक्ष्म विश्लेषण करें तो आसपास हजारों अन्य उदाहरण भी मिल जायेंगे! ...चर्चा के विषय के अंत में ऊपर आपने लिखा है कि "आप नकारात्मक सोचते हैं तो सकारात्मक नहीं होता है." इसके उत्तर में मैं यह कहूँगा कि वस्तुतः होता इसका उल्टा है! यानी, "जब हम सकारात्मक नहीं सोचते, सकारात्मक नहीं करते, तो नकारात्मकता हमें घेर लेती है. नकारात्मकता यानी अंधकार का अस्तित्व तभी संभव है जब वहां सकारात्मकता अर्थात् प्रकाश-स्रोत की अनुपथिति हो! घनघोर अंधरे में यदि हम एक दियासिलाई तीली जलाएं तो कुछ प्रकाश हो जाता है, उससे एक-एक करके जितनी मोमबत्तियां जलाते जाते हैं, प्रकाश फैलता जाता है और उसी अनुपात में अंधकार कम होता जाता है!"

(२) ईश्वर प्राप्ति का उपाय क्या है?
संक्षिप्त उत्तर-- "योगः कर्मसु कौशलं." ..चूंकि मानवजीवन कर्म-प्रधान है, अतः प्रत्येक कार्य को कर्तव्य समझकर उसे सम्पूर्ण निष्ठा, न्यायप्रियता, ईमानदारी, अर्थात् एक शब्द में कहें तो, 'कुशलता' से करके ही हम ईश्वर से जुड़ सकते हैं.

(३) कलियुग की वेदना क्या है? समय काल युग कभी दोषी नहीं होते कर्म ही अच्छे-बुरे होते हैं - जो युग का निर्माण करते हैं!
बहुत ही अच्छा कहा आपने कि, "समय, काल, युग कभी दोषी नहीं होते, कर्म ही अच्छे या बुरे होते हैं, जो 'युग' का निर्माण करते हैं." ...इस दृष्टि से आज भी कहीं सतयुग जैसा है, कहीं त्रेता वर्णित जैसा, कहीं द्वापर के माहौल सरीखा और कहीं घनघोर कलियुग! ...जिस भी संघ, प्रदेश या राष्ट्र में 'खरे धर्म' अर्थात् नेकनीयती, ईमानदारी, पारदर्शिता, न्यायप्रियता, सौहार्द आदि का अस्तित्व जितना अधिक है, वह उतना ही उन्नत और सही मायनों में सुखी संघ है अर्थात् वहां अपेक्षाकृत उन्नत युग (परिस्थितियां) है! भारत की बात करते समय भी क्या कभी हम विभिन्न प्रदेशों और वहां की संस्कृतियों का तुलनात्मक विश्लेषण नहीं करते!? ..जी हाँ, हम समझते हैं कि अपने भारत राष्ट्र में ही अलग-अलग स्थानों पर 'वास्तविक धर्म' की स्थिति व अन्य परिस्थितियां यानी युग की अनुभूति भिन्न-भिन्न है!!!

(४) कर्म करते वक़्त मनुष्य क्यों नहीं सोचता?
बंधुवर, कुछ भी करते समय मनुष्य थोड़ा-बहुत सोचता तो अवश्य है, परन्तु सोचने उपरांत विचार या विकल्प कहाँ से आ रहे हैं, उसके कर्म की प्रकृति उसी पर निर्भर करती है! साधारणतया हमारी कर्मेन्द्रियों को कोई भी क्रिया करने का निर्देश हमारे मन के संस्कारों द्वारा और हमारी वृत्ति के अनुमोदन के पश्चात् मिलता है! मन के संस्कारों का निर्माण देखने, सुनने और महसूस करने से होता है; पूर्व जन्मों के बने संस्कार भी इनमें जुड़ जाते हैं. सबके गठजोड़ पश्चात् जिस प्रकार के संस्कारों का वहां प्रभुत्व होता है, उसी प्रकार की हमारी वृत्ति हो जाती है. मन में उपस्थित किसी भी संस्कार से उठा क्रिया-विचार हमारी कर्मेन्द्रियों तक तब ही जा पाता है, जब वृत्ति की सहमति, अनुमोदन आदि भी उसमें जुड़ता है! ..अब यदि किसी के संस्कार, वृत्ति आदि जब उसे कुछ गलत काम करने को उकसाते हैं तो हम यही कहते हैं कि, 'करने से पहले उसने विचार नहीं किया!' यद्यपि उसने विचार किया होता है, पर संस्कार और वृत्ति आदि के दूषित होने के कारण उसकी बुद्धि गलत निर्णय ले बैठती है! क्योंकि बुद्धि भी वृत्ति के ऊपर निर्भर होती है. गलत निर्णय या गलत काम करने वाले को काम करने के पश्चात् कभी ग्लानि होती है और कभी नहीं! यदि ग्लानि होती है तो मन में कुछ योग्य संस्कार अवश्य हैं पर इतने बड़े नहीं कि वे वृत्ति को साध पाएं, और यदि ग्लानि नहीं होती तो इसका अर्थ है कि उसके मन में कोई योग्य संस्कार हैं ही नहीं!

(५) ईश्वर है या नहीं? ईश्वर को कैसे महसूस करें??? क्या सच में ईश्वर है या यह केवल हमारा भ्रम है?
कुछ लोग इसका उत्तर "हाँ" में देते हैं और कुछ "ना" में, ...और कुछ संशय में रहते हैं कि भगवान् 'हैं' या 'नहीं'! ...यद्यपि 'हाँ' कहने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है, और 'ना' कहने वालों की बहुत अल्प; तद्यपि 'हाँ' कहने वालों में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, 'हाँ' पर जिनकी निष्ठा व विश्वास डोलते रहते हैं! आराधनालयों में वे आस्तिक होते हैं परन्तु दुनियावी स्वार्थों की पूर्ति के समय अंदरूनी तौर पर वे घनघोर नास्तिक दिखते हैं. ...और केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने वालों के लिए एकदम ठोस प्रमाणिकता से यह कहना कि "भगवान् हैं" अथवा "भगवान् नहीं हैं", बहुत मुश्किल है. दोनों ही बातों का भौतिक या स्थूल प्रमाण देने का प्रयास व्यर्थ के वाद-विवाद को ही जन्म देता है. ..वैसे इस बारे में मेरा निजी मत आप मेरे ब्लॉग "चर्चाएं ...भाग - 1" के २०वें बिंदु में विस्तार से पढ़ सकते हैं.
मेरे आगे के ब्लॉगों में टुकड़ों-टुकड़ों में क्रमशः अनेक बातें हैं जो यदि समग्र रूप से लें तो भगवान् के अस्तित्व होने पर कोई संदेह नहीं रह जाता. हम सब भी अपूर्ण ही सही, फिर भी उसी के छोटे-छोटे सदेह अवतार ही तो हैं! आप जिज्ञासु हैं, अपनी जिज्ञासा को निरंतर बनाए रखिये, फिर आपके भीतर उपजे शुद्ध नैसर्गिक अनुभूतिजन्य ज्ञान को किसी अन्य के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी!
भगवान् के ऊपर 'विश्वास' या 'अविश्वास' से किसी का कुछ 'बनता' या 'बिगड़ता 'नहीं है! ...हाँ, 'सही' या 'गलत' करने से अवश्य ही हमारा कुछ 'बनता' या 'बिगड़ता' है (आधुनिक विज्ञान में क्रिया-प्रतिक्रिया सम्बन्धी न्यूटन का तृतीय नियम भी इसका अनुमोदन करता है)! 'विश्वास' होने से हमारे मन-मस्तिष्क पर कुछ लगाम लगी रहती है, हम 'गलत' करने से डरते हैं, ..जबकि 'अविश्वास' की दशा में हम 'निरंकुश' हो जाते हैं और योग्य कर्मों से विमुख हो जाते हैं.

Friday, May 18, 2018

(९४) चर्चाएं ...भाग - 13

(१) कौन सही है और कौन गलत? अगर एक लड़की को उसका पति शादी के बाद ना मन से ना धन से और ना तन से सुखी रख पता है और वही प्रेम कोई और उस लड़की को देता है एक सच्चे जीवनसाथी की तरह और वह लड़की अपने पति को छोड़कर उस इंसान से शादी कर सकती है जिसने उसका साथ दिया या यह कोई पाप है?
वैवाहिक जीवन में तन, मन और धन इन तीनों के सुख से भी बड़ी चीज है - "वफ़ादारी" अर्थात् "एक-दूसरे के प्रति पूर्ण निष्ठा"! ..इसके अतिरिक्त गहरी मित्रता, समर्पणभाव, एक-दूसरे की सम्पूर्ण केयरिंग आदि भी वैवाहिक जीवन को सुदृढ़ और सफल बनाते हैं. .....यदि ये सब गुण दोनों में हैं तो जीवनसाथी स्वतः ही तन, मन और धन से एक-दूसरे को सुखी रखने की सर्वोत्तम चेष्टा करेंगे ही! एक ही समय में एक से अधिक के प्रति जीवनसाथी समान सम्पूर्ण निष्ठा रखना वो भी बिना छुपाये (खुलेआम), साधारण मानव के लिए यह बिलकुल असंभव है. समाज या सामाजिक नियम भी इसकी स्वीकृति नहीं देते और ना ही हमारी अंतरात्मा ! हाँ, सुखी न रहने की दशा में समाज-सम्मत ढंग से सम्बन्ध विच्छेदन पश्चात् अन्य से विवाह संभव है. ..परन्तु यह गांठ बांध लें कि बिना विवाह किये वैवाहिक जीवन के सुख, निष्ठा आदि 'खुले तौर पर' और 'चिरकाल' के लिए पाना व देना बिल्कुल असंभव है (या दोनों में से कोई तो एक कभी भी सम्बन्ध तोड़ देगा, पलायन कर जायेगा). यदि हम फिर से कोई अन्य साथी ढूंढेंगे तो 'स्थायित्व' तो नहीं मिला न हमें! अतः विवाहेतर सम्बन्ध अथवा लिव-इन रिलेशन हमें "स्थायित्व और गरिमा" नहीं प्रदान कर सकते. ..खानाबदोशों सी जीवनशैली सदा के लिए स्वेच्छा से अपनाना भी कोई बुद्धिमानी नहीं है; और न ही इसमें चिरस्थाई सुख है. अतः एक असफल विवाह तोड़कर, पुनः सोचसमझकर किसी अन्य योग्य एवं सिंगल व्यक्ति से समाज-सम्मत ढंग से दूसरा विवाह करना कोई पाप नहीं वरन यह सभी तरह के सुखों को स्थाई आमंत्रण है.

(२) एक सच्चे जीवन साथी की पहचान कैसे करें क्योंकि इस दौर में सही इंसान की पहचान करना बहुत मुश्किल है!?
व्यक्ति को स्वयं की अंतःप्रेरणा से ही एक सच्चे जीवनसाथी की पहचान हो सकती है; और योग्य अंतःप्रेरणा जागृत होने के लिए व्यक्ति का मानसिक और आध्यात्मिक रूप से परिपक्व होना बेहद आवश्यक है! मानसिक और आध्यात्मिक परिपक्वता हमें अपने अनुभवों, स्वभावदोषों पर नियंत्रण और मन की शुचिता के प्रयासों से हासिल होती है. इसके लिए हमें निरंतर भौतिक जीवन एवं स्व से ऊपर उठकर अपनी सोच को व्यापक विस्तार देने की आवश्यकता होती है. जब ऐसा वास्तव में हो जाता है तो जीवन में योग्य प्रसंग कुछ कोशिश से और कुछ स्वतः ही घटित होने लगते हैं; ...योग्य समय पर योग्य जीवनसाथी का मिलना भी उनमें से एक होता है. वैसे ज्ञानियों के अनुभवों से एक बात तो सामने आई है कि व्यक्ति के जीवन में तीन घटनाएं प्रारब्धवश घटित होती हैं- जन्म, मृत्यु और विवाह! वैसे देखा जाये तो प्रारब्ध का निर्माण भी तो व्यक्ति के किसी काल के खुद के कर्मों से ही होता है!!!

(३) भगवद् गीता के ज्ञान को अधिकाँश लोग सही तरह समझने में समर्थ क्यों नहीं हो पाते...? गीता का ज्ञान वास्तव में ठीक प्रकार से समझने के लिए जीव को आत्मशुद्धि ज़रूरी है!
गीता का ज्ञान विशुद्ध आध्यात्मिक ज्ञान है, ..और आध्यात्मिक ज्ञान को समझ पाना उन्हीं के लिए संभव है जो सरल और सहज स्वभाव के होते हैं. स्वभाव में सरलता आना तभी संभव है जब व्यक्ति दुनियावी आसक्ति से कुछ परे हो. आसक्ति (सांसारिक दांवपेंच) और सरलता एक साथ तो होना संभव नहीं है ना! तो सांसारिक आसक्ति के साथ गीता में किसका मन रमेगा!? कोई यदि बलात् गीता को पढ़ ले, कंठस्थ भी कर ले, तब भी वह उसे भलीभांति समझ न पाएगा! यदि कोई समझने में सफल हो भी गया तो मानों उसने ५% प्राप्त कर लिया; शेष ९५% प्रतिशत वह तब हासिल करेगा जब वह उस पर रोजाना के जीवन में निरंतर अमल करेगा! बहुतायत के दुनियावी संस्कार और जीवात्मा पर पड़ा अविद्या का मोटा पर्दा उन्हें गीता को समझने या उसपर अमल करने से रोकते हैं. ...दुनियावी संस्कार और अविद्या के आवरण का नाश केवल यथोचित साधना द्वारा ही संभव है. स्वाध्याय, अच्छा साहित्य और अच्छे लोगों का 'निरंतर' संग, ये सब सम्मिलित रूप से करना एक प्रकार की साधना ही है. इससे हमारी सोच सरल और व्यापक होती है और हम उचित कर्मों की ओर अग्रसर होते हैं; और फिर गीता का ज्ञान अपनेआप उन कर्मों में प्रतिबिंबित होता है.

(४) नैतिकता के अभाव में आज जीवन किस तरह से प्रभावित हो रहा है...?? आज जीवन का हर क्षेत्र निजी से लेकर राजनीति तक बुरी तरह इस के शिकार हो चुके हैं.
हम सभी लोग जो इस प्रकार से प्रभावित हैं वो शायद अपने प्रारब्धवश ही नैतिकता के इस पतन को देखने और भोगने के लिए विश्व के इस भूभाग पर रहने के लिए बाध्य हुए हैं!!! चाहे हम लाख कहते रहें कि हमारी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान आदि विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं, परन्तु सत्य तो यही है कि ये सब अतीत की बातें हैं. वर्तमान में  तो विश्व के इस भूभाग पर अनैतिकता का दलदल विशाल होता जा रहा है जिसमें हम बुरी तरह फंसते जा रहे हैं, छटपटा रहे हैं! समाज, नौकरशाही और राजनीति के अलावा अपेक्षाकृत शुद्ध कहे जाने वाले धार्मिक / सामाजिक धर्मार्थ ट्रस्टों में भी अनाचार, भ्रष्टाचार और लोकेषणा के लोभ आदि की बेकाबू होती विकट परिस्थितियों के चलते आध्यात्मिक जगत के योग्य मार्गदर्शक भी मौन होकर एकांतवास में पलायन कर रहे हैं!

(५) बुरे समय में लोग ज्ञान को क्यों भूल जाते हैं?
क्योंकि उनका ज्ञान शायद उथला है या उन्हें उस ज्ञान पर विकल्प-रहित विश्वास नहीं! बहुधा लोगों का विश्वास अनुकूल परिस्थितियों में तो कायम रहता है, परन्तु जरा सी प्रतिकूलता आते ही छिन्न-भिन्न हो जाता है. क्योंकि कुछ तो उनके विश्वास में कमी है और कुछ उस ज्ञान में जो उन्हें कहीं से मिला है; ..या ज्ञान देने वाला शायद खुद उसपर अमल नहीं करता तब भी शिष्य (अनुयायी) के साथ ऐसा होता है!!! ..वैसे मेरा मानना है कि स्वयं के अनुभवों और अनुभूतियों से जो ज्ञान सूक्ष्म रूप से आता जाता है केवल वो ही चिरस्थाई होता है. लेकिन पुनः..., वो ज्ञान भीतर आना और उस ज्ञान का चिरस्थाई होना तब ही संभव है जब व्यक्ति अपने जीवन में आने वाले प्रसंगों, अनुभवों, और अनुभूतियों आदि से उत्पन्न ज्ञान को लेने की प्यास रखे और बड़े मनोयोग से उसे धारण करे! किताबी और सुने-सुनाए ज्ञान की आयु बहुत छोटी होती है, चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो!!! हाँ..., किताबी और सुना-सुनाया ज्ञान तब असरदार और स्थाई हो सकता है जब व्यक्ति उस पर निरंतर अमल करके कुछ सुखद अनुभूति ले. पुनः, यह सिद्ध हुआ कि अनुभूत करना तो अनिवार्य है!

Tuesday, March 27, 2018

(९३) चर्चाएं ...भाग - 12

(१) आज लोग अध्यात्म से जुड़ने का ढोंग तो खूब करते हैं किन्तु वास्तविकता कुछ और है, ....क्यों? आज जिसे देखो अध्यात्म की चर्चा करता दिखाई देता है किन्तु वास्तविकता में आज समाज का नैतिक पतन हो रहा है.
उथलापन इसका मुख्य कारण है! उदाहरण के लिए- (१) मनोरंजन और पिकनिक के तौर पर किसी वाटर-पार्क पहुंचे लोग और सागर के इर्दगिर्द या सागर में ही अधिकांश समय बिताने वाले मछुआरों के जल सम्बन्धी ज्ञान में बहुत अंतर होता है. (२) वर्चुअल गेम खेलने वाले और एक्चुअल गेम खेलने वाले स्पोर्ट्स-पर्सन के व्यक्तित्व में बड़ा अंतर होता है. (३) खाली अर्थात् कम भरा पात्र अधिक खड़कता है, जबकि भरा बर्तन वजनी और बहुधा शांत ही होता है. (४) बहुत से पहुंचे हुए व्यक्ति अर्थात् स्वामी-गुरु आदि अध्यात्म के पथ पर काफी अग्रसर हो जाने के पश्चात् अक्सर यह भूल जाते हैं कि उनकी आध्यात्मिक यात्रा का वास्तविक प्रयोजन आखिर क्या था!!! ..भौतिक चकाचौंध और धन-यश या मात्र यश की अभिलाषा ही उनका नैतिक पतन कर देती है (इसके अनेक प्रसंगों-अनुभवों का मैं स्वयं साक्षी हूँ). (५) किसी खेल या विधा जैसे तैराकी ही..., तैराकी के बारे में हम कितनी ही पुस्तकें पढ़ लें, रट लें; कितना भी ज्ञान अर्जित कर लें; ..हम उस पर बहुत बोल सकते हैं, भाषण दे सकते हैं, बहस कर सकते हैं, ....पर हम तैर नहीं सकते!!! ..सब जानते हैं कि तैरना सीखने के लिए क्या करना पड़ता है!

(२) परिवर्तन ही जीवन का नियम है तो अपनी सोच में परिवर्तन क्यों नहीं कर पाते सभी? यदि परिवर्तन सोच में भी हो तो क्या जीवन सरल नहीं हो जायेगा?
प्रत्येक व्यक्ति आज कुछ अपने कुछ विशिष्ट संस्कारों (इम्प्रेशंस) और धारणाओं के अधीन है. इनके चलते उसकी सोच इतनी दृढ़ सी हो गयी है कि अचानक किसी परिवर्तन की बात पर वह भड़कता है, आसानी से राजी नहीं होता, या चाह कर भी खुद को बदल नहीं पाता. मेरे विचार से किसी को 'परिवर्तित' होने के लिए कहना उसे उसकी पूर्वस्थापित सोच और अहं के विरुद्ध लगता है. ...'परिवर्तन' के स्थान पर यदि 'शोधन', 'परिष्करण', 'निखारना' (रिफाइनमेंट) आदि के लिए कहा जाये तो व्यक्ति के अहंकार पर कोई चोट नहीं होती! ..सत्य भी तो यही है कि हम यदि व्यक्तित्व और सोच आदि में 'निखार' लाने की कोशिश करें तो इस क्रम में जरूरी परिवर्तन भी अपनेआप हो ही जाते हैं! व्यक्ति, समाज या सोच की असली उन्नति के लिए 'परिवर्तन' की नहीं, बल्कि 'रिफाइनमेंट' या 'निखारने' की आवश्यकता है. 'परिवर्तन' शब्द में आलोचना का पुट है जबकि 'रिफाइनमेंट' या 'बेटरमेंट/इम्प्रूवमेंट' (और ज्यादा अच्छा बनो) शब्द जोश पैदा करते हैं. जरा सोचकर देखिये कि स्वयं की या अपने किसी करीबी की सोच को बदलने के लिए इनमें से कौन से शब्द मनोवैज्ञानिक तौर पर अधिक कारगर हैं?!

(३) जीवन क्या है! एक धोखा या एक कर्तव्य? मोह या समर्पण? मैंने जीवन को एक धोखे की तरह देखा है जो हम खुद को देते हैं जीवन भर, औरसमझते हैं हम जी रहे हैं, लेकिन हम तो उस भंवर में फंस रहे होते जिसका कोई किनारा नहीं, कोई मंजिल नहीं!
यदि जीवन के आध्यात्मिक पक्ष से अपरिचित ही रहें तो भौतिक जीवन सरासर 'मृगतृष्णा' समान ही प्रतीत होता है! कुछ भी स्थाई नहीं फिर भी इतने दंदफंद, चालाकियां, राग-द्वेष, ईर्ष्या, सबकुछ समेट लेने की होड़!!! ..अंततः इसकी समाप्ति खाली हाथ ही! ...इस भौतिक भंगुरता को देख-समझ कर तो इसके आध्यात्मिक पक्ष के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होनी ही चाहिए. जब हम आध्यात्मिक पक्ष को भौतिक पक्ष के ऊपर वरीयता देंगे तो समस्त नकारात्मकताएं समाप्त हो जायेंगी और फिर हमारा भौतिक जीवन भी लक्ष्यविहीन न रहेगा. तब हम इसे (भौतिक जीवन को) अपने समस्त आध्यात्मिक जीवन के बीच आए एक दिलचस्प पड़ाव की तरह देखेंगे, जहाँ हमें अपने आत्म-परिष्कार के भी असंख्य मौके मिलते हैं. यह भौतिक जीवन है ही आत्म-परिष्कार के लिए! यही इसका एक सबसे बड़ा उद्देश्य है.

(४) डिफरेंस बिटवीन धर्म एंड रिलिजन? धर्म वह जो हम पैदा होते ही धारण कर लेते हैं। यह ईश्वर प्रदत्त हमारी जीवन पद्धति है। परन्तु सम्प्रदाय हमने स्वयं उत्पन्न किए। पहले सम्प्रदाय माने लोगों, समाज़ को जोड़ने बाला। समता में स्थापित करने बाला। आज यह समाज़ को विघटित करने बाला बन गया है।
अंग्रेजी शब्दकोष में 'रिलिजन' शब्द का अर्थ मिलता है -- "विश्वास (आस्था) और पूजा का प्रचलित तरीका"! संभवतः अमुक रिलिजन किसी अमुक समुदाय, सम्प्रदाय या संघ के ईश्वरीय विश्वास, आस्था और पूजा के आन्तरिक व वाह्य (सूक्ष्म व स्थूल) आचारों-विचारों का सम्मिलित रूप है. अर्थात् उस समुदाय की विभिन्न सूक्ष्म-स्थूल उपासना पद्धतियाँ, ईश्वर के साकार-निराकार रूप एवं नाम, कर्मकाण्ड, तीज-त्यौहार व पारंपरिक उत्सव आदि उसमें शामिल हैं. यह सब समुदाय दर समुदाय भिन्न होता है. अतः यही कारण है कि विश्व भर में इसने सारे रिलिजन हैं. ..जबकि धर्म / धार्मिकता शब्द का अंग्रेजी भाषा में समानार्थी शब्द है -- 'राईटीयचनेस' ('राईट' यानी 'सही' से बना शब्द) अर्थात् सत्यनिष्ठा, योग्य एवं न्यायपूर्ण आचार व विचार. संभवतः हिन्दू शास्त्रों या तत्त्वज्ञान के अनुसार भी धर्म का कमोवेश यही अर्थ निकलता है. इसलिए हिंदी शब्द 'धर्म' का अंग्रेजी में अनुवाद 'रिलिजन' बिलकुल गलत है! जैसा कि आपने भी कहा कि 'धर्म' ईश्वर प्रदत्त हमारी जीवन-पद्धति है. अर्थात् 'आत्मानुभूति' ही 'धर्म' है. धर्म सदा-सदा से उसी में निहित है. ..तो धर्म तो प्रत्येक जगह एक ही है, अतः विभिन्न रिलिजनों में इसके भिन्न-भिन्न होने का प्रश्न ही नहीं उठता! जबकि अन्य सूक्ष्म-स्थूल सांप्रदायिक अनुष्ठानों को हम अंग्रेजी में 'रिलीजियस एक्टिविटीज' या 'रिलीजियस रिचुअल्स' कह सकते हैं. ...एक-दूसरे को अपनी बात संप्रेषित करने के लिए हमारे पास भाषा और शब्दों की सीमितता है, ..और जब विषय अनुभूति से सम्बंधित हो तो मुश्किल और भी बढ़ जाती है. ...वर्तमान हिंदी भाषा में 'रिलिजन' के समानार्थी कोई भी शब्द नहीं है! प्राचीन भारत में पहले 'धर्म' शब्द में सब निहित हो जाता था. अर्थात् पहले 'धर्म' शब्द का अर्थ 'रिलिजन' शब्द के बहुत निकट था. परन्तु कालांतर में, ज्ञान की अगली कक्षाओं या अवस्थाओं में पहुँचने पर पता चला कि 'आत्मानुभूति' ही सही मायनों में 'धर्म' है. यही 'राईटियचनेस' है, या 'राईटियचनेस' इसी में निहित है! हाँ, समस्त सामुदायिक वाह्य आचार-विचार हम 'रिलिजन' शब्द में स्थानांतरित कर सकते हैं. यदि हम जिद में आ जायें कि हम अभी भी 'धर्म' शब्द को उसी प्राचीन अर्थ में ही प्रयुक्त करेंगे, तो हम अपनी बात, खरे धर्म की बात, अन्यों को नहीं समझा पायेंगे. ध्यान रहे कि शब्दों और भाषा का महत्व मात्र भाव-भावनाएं समझने-समझाने के लिए है. वैश्वीकरण के इस दौर में अनेकों संस्कृतियों व भाषाओं के आपस में घुलमिल जाने से कई शब्दों के अर्थ बदल चुके हैं, और कईयों के बदल रहे हैं. ..ऐसे ही 'संस्कृति' या 'कल्चर' शब्द भी बहुत पुराना नहीं है. हमारे (या किसी सम्प्रदाय के) "समस्त वाह्य आचार", जैसे भाषा, रहन-सहन, वेशभूषा, तीज-त्यौहार, परंपराएं, रीति-रिवाज, आदि इस शब्द की परिधि में आ जाते हैं. एक तरह से 'रिलिजन' भी इसी में आ जाता है! 'रिलिजन' शब्द के लिए हम कदाचित् 'पंथ' शब्द प्रयुक्त कर सकते हैं! .....ऊपर हमने जो विश्लेषण किया वह कोई नया या अनोखा नहीं है! सभी समझदार (?) लोग जानते हैं. परन्तु फिर भी हममें व्यापकता का अभाव है. वह इसलिए कि कहीं हम अपनी व्यक्तिगत या सांप्रदायिक पहचान न खो दें! विज्ञान और अध्यात्म की दुनिया या शिक्षा के बीच यही बुनियादी अंतर है कि ज्ञान की सीमितता के बावजूद विज्ञानी व्यापक बने, जबकि असीमित ज्ञान भंडार की उपलब्धता के बावजूद तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्ति अपने 'खोलों' (शेल्स) में ही रह गए! आज हमसे सबसे बड़ी गलती यह हो रही है कि हम 'रिलिजन' ('संस्कृति') और 'धर्म' को एक ही मानते हैं अर्थात् संस्कृति को ही धर्म का दर्जा देते हैं. ...हमारे वाह्य आचार (बाहरी रहन-सहन या जीवन-पद्धति) हमारी 'वास्तविक' धार्मिकता को नहीं दर्शाते बल्कि दूसरों के प्रति हमारे दिल की गहराइयों में छुपी भावना व उसके निर्देशानुसार हमारे कर्म ही हमारी धार्मिकता को प्रकट करते हैं. और परमेश्वर केवल यही देखता है, हम असिद्ध इंसानों से उसे प्रथमतः यही अपेक्षित है. ध्यान रखें कि परमेश्वर की विभिन्न उपासना पद्धतियाँ भी लोगों की 'संस्कृति' का ही एक भाग है! वे माध्यम मात्र हैं उस तक, उसके गुणों तक पहुँचने का! ये संस्कृति का ही एक हिस्सा हैं इसलिए तो देश-काल-परिस्थिति अनुसार इनमें इतनी सारी भिन्नताएं हैं! यह जानते-बूझते हुए भी लोग अहंकारवश यही कहते हैं कि उनकी अपनी संस्कृति या रिलिजन ही सच्चा व सर्वश्रेष्ठ है और अन्य का दीन-हीन!!! ...फिर भी हम देखते हैं कि असंख्य वाह्य भिन्नताओं के बावजूद कुछ चीजें पूरे संसार में, सब पंथों में, समुदायों में एक सी पाई जाती हैं -- वह है एक सर्वोच्च अद्भुत शक्ति को मान्यता, जो अदृश्य व निराकार है परन्तु सर्वत्र विद्यमान है; यथासंभव विभिन्न चिरपरिचित नैतिक मूल्यों को स्वीकृति, उनका आग्रह, उनको अपनाना, आदि! ...तो फिर क्या यह नहीं माना जा सकता कि जो बात लगभग प्रत्येक सामुदायिक धर्मग्रन्थ एक सुर में बोलते हैं शायद वही यथार्थ धर्म है!!! यानी अंततोगत्वा 'राईटियचनेस' यानी सत्यनिष्ठा, योग्य एवं न्यायपूर्ण आचार-विचार ही ईश्वर को सर्वाधिक प्रिय है!!! तो वास्तविक अथवा खरा 'धर्म' तो यही हुआ! ...एक बात और.., कि बिना किसी लिखी, बोली गयी या सुनी गयी बात के प्रभाव में आए यानी सबको किनारे रखकर यदि हम अंतर्मुख होकर यह ध्यान करें कि अंततोगत्वा क्या चीज हमारे लिए सबसे अधिक महत्त्व रखती है तो भीतर से आवाज यही आयेगी कि, "'यथासंभव योग्य और न्यायपूर्ण आचरण"! पुनः विचार करने पर कि, "योग्य एवं न्यायपूर्ण आचरण" अर्थात् क्या??? ...सभी को समान जानकारी भीतर से मिलेगी!!!! समान तभी, जब हम पूर्णतयः तटस्थ हों!!!! वस्तुतः यही धर्म की आवाज है जो ईश्वर ने नैसर्गिक रूप से सबके भीतर, प्रत्येक आत्मा में पहले से डाली हुई है. ..वस्तुतः यही, आत्मा या हमारी आन्तरिक ऊर्जा का मूल गुणधर्म (प्रॉपर्टीज) है. ..अधिकांशतः हम वाह्य आचारों (रिलिजन, संस्कृति आदि) में ही उलझकर रह जाते हैं और भीतर (धर्म) तक पहुँच ही नहीं पाते.

Saturday, February 24, 2018

(९२) चर्चाएं ...भाग - 11

(१) संसार में हमें किस प्रकार रहना चाहिए?
चूंकि हमारा जीवन एवं उसका तानाबाना कर्मप्रधान या कर्म पर ही आश्रित है और जीवन में आने वाला प्रत्येक प्रसंग या परिस्थिति हमारे ही किसी कर्म के कर्मफल के कारण हमारे समक्ष है, अतः हमें चाहिए कि प्रत्येक पल मौजूदा 'परिस्थिति के अनुसार' योग्यतम कर्म करें! हाथ पर हाथ रखकर केवल ईश्वर-आश्रित होने से कुछ भी होने वाला नहीं! ईश्वर ने हमारी देह में पञ्च-कर्मेन्द्रियाँ इसीलिए दी हैं कि पञ्च-ज्ञानेन्द्रियों, मन, बुद्धि और विवेक की मदद से उनसे देश-काल-परिस्थिति अनुसार योग्यतम काम लें. समक्ष आए प्रत्येक कार्य को कर्तव्य समझकर पूरी दक्षता से उसे करना भी एक प्रकार से योग (ईश्वर से जुड़ना) ही है. ...और साथ ही अंतर्मुखता व किसी भी योग्य साधना की मदद से अपने मूल (आत्मा) एवं इसके गुणों को जानने-समझने का प्रयत्न भी समानांतर रूप से करते रहें, तो और भी अच्छा! मौजूदा परिस्थितियों में (जो कि काफी खराब हैं) असत्य एवं अन्याय अथवा जबरन थोपी गयी किसी गलत बात आदि को यूं ही सहना या उनके आगे घुटने टेक कर समर्पण कर देना भी अयोग्य कर्म की श्रेणी में ही आता है. बहुतायत यही करते हैं! ईश्वर (परमात्मा) एवं हमारा मूल (आत्मा) सत्य एवं न्यायप्रिय हैं, इस मूल-धारणा के अनुसार ही चलकर हम ईश्वर-प्रिय होकर उनके निकटतम होंगे. भौतिक शरीर में जीवित रहते हुए यही मोक्ष की अवस्था है.

(२) अध्यात्म की सही परिभाषा ...जीवन में प्रेम, शान्ति, दया, संतुलन और प्रसन्नता का विकास करना! अध्यात्म कोई विद्या या विज्ञान नहीं हैं, केवल आत्मिक गुणों का विकास करना है.
निःसंदेह... आत्मिक गुणों का विकास या यूं कहें कि आत्मिक गुणों का दैनंदिन जीवन में प्रकटीकरण ही सही अर्थों में व्यक्ति के आध्यात्म्मिक होने का परिचायक है. ..लेकिन बिना कारण जाने या बिना लाभ की आशा के किसी कार्य, वो भी इस घोर कलयुग (बुरे समय) में अच्छा बनने का प्रयास, को करना क्या सरल बात है??? जी हाँ, यह बात तो सत्य है कि अच्छा बनना ही आध्यात्मिक बनना है और अच्छा बनने के बहुत सारे लौकिक-पारलौकिक लाभ भी मिलते हैं, लेकिन आपको यह बात कैसे पता चलती है?? ..कुछ प्राकृतिक नियमों-सिद्धांतों के द्वारा ही तो! ..या अपने अथवा किसी अन्य के अनुभव या अनुभवों द्वारा निष्पादित व प्रतिपादित नियमों-सिद्धांतों द्वारा!!! इसी को विज्ञान कहते हैं. अनुभवों-अनुभूतियों से ही प्रकृति या परमेश्वर के नियम-सिद्धांत पता चलते हैं, हमारा ज्ञान बढ़ता है, और फिर ज्ञात नियमों-सिद्धांतों पर यकीन कर हम तदनुसार करने को प्रेरित होते हैं, और फिर करके ही हम तदनुसार फल प्राप्त करते हैं! यह चक्र प्रथमतः जिज्ञासा, तदोपरांत खोज से आरंभ होता है, ..फिर प्रयोग, फिर विश्वास, फिर अनवरत अपनाने (अमल में लाने) ही से हम आगे को बढ़ते हैं, हमारी उन्नति होती है! इस चक्र का घूमना ही हमारे मोटिवेशन का कारण होता है, अन्यथा हम यूं ही निष्क्रिय पड़े रहें और अपनेआप को अच्छा बनने के लिए प्रेरित न कर पाएं, कोई कारण ही न मिले हमें आध्यात्मिक दिशा में कोई पुरुषार्थ (यानी विपरीत परिस्थितियों में अच्छे बनने का प्रयास) करने का! ...ठोस प्रेरणा और पूर्ण आश्वासन हमें विज्ञान (अर्थात् कार्यकारण-भाव) समझने पर ही मिलता है. ...तो अध्यात्म एक प्रकार से शास्त्र (अर्थात् 'विज्ञान') ही हुआ; जो बेड़ियों, अंधविश्वासों, कट्टरता आदि से बहुत परे तथा विशुद्ध रूप से अनुभव-अनुभूति आधारित ज्ञान और उस ज्ञान से प्राप्त अकाट्य नियमों-सिद्धांतो पर आधारित है. उदाहरण के लिए-- "क्रिया-प्रतिक्रिया का सिद्धांत" उन नियमों-सिद्धांतों में से एक है. ...लेकिन फिर से आपकी बात का समर्थन कि नियमों-सिद्धांतों को हम फ्रेम करवा कर कमरे में टांग दें, उससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं! उनपर अमल करके ही हम आध्यात्मिक हो सकते हैं. यानी 'नियमों-सिद्धांतों' और 'अमलीकरण', दोनों ही की परम आवश्यकता! 'नियम सिद्धांत' यानी 'अध्यात्मशास्त्र' (जिज्ञासु बुद्धि से खोजा गया विज्ञान); ..और उनपर 'अमलीकरण' यानी 'आध्यात्मिक' (सही मायनों में अच्छा) बनने की प्रक्रिया.

(३) देश की आज वर्तमान हालत के लिए कौन ज़िम्मेदार है और क्यों...? क्या हम एक सफल गणतंत्र कभी बन पाएंगे??
हमारे देश का अभिजातवर्ग ! ...हममें से 99 प्रातिशत लोग अनुयाई होते हैं और वे अभिजात-वर्ग (मात्र 1 प्रतिशत) का अनुसरण करते हैं. अभिजात-वर्ग का सिरमौर देश का शासक होता है; उससे नीचे अन्य राजनेता, एवं उसके नीचे आध्यात्मिक गुरु, अभिनेता, खिलाड़ी, शासकीय अफसर, जज, डॉक्टर, वकील, अध्यापक आदि आते हैं. वर्तमान हालत के लिए आम जनता को गुनाहगार ठहराना सरासर बेवकूफी होगी. अभिजात्यों की गलती या गलत आचरण से आम जनता में भी वैसे ही संस्कार पनपते हैं, ..फिर ठगी भी वही जाती है, लांछन भी उसी पर लगता है, और कहर भी उसी पर टूटता है. आज (बल्कि पिछले अनेक वर्षों से) देश की क्रीमी लेयर जो कर रही है, वह देश के समस्त मूल्यों को नीचे गिरा रही है. आशावादी हूँ तो यह तो अवश्य कहूँगा कि कोई बड़ी क्रांति तो कहीं गहरे में अवश्य सुलग रही है.

(४) जब सारे रास्ते बंद हो रहे हों, तो इंसान को कौन सा मार्ग अपनाकर जीने की नयी राह मिलती है....?? कभी कभी साहस भी जवाब दे देता है...
सबसे पहले स्वयं पर ही दृष्टिपात करने की आवश्यकता है कि कहीं मेरे ही किसी स्वार्थ, आकांक्षा, या आचरण के कारण तो ऐसा नहीं हो रहा?! यदि अहंकार को एक किनारे रखकर सोचने पर हमें 'वास्तव में' खुद की क्लीन चिट मिल जाती है तो फिर दौर शुरू होना चाहिए पुरुषार्थ यानी योग्यतम कर्म या प्रयास का! यदि वर्तमान परिस्थितियां बहुत कठिन या विपरीत हैं और प्रयास (कर्म) करना दूभर है तो भी मन के स्तर पर कर्म होते रहना चाहिए. यानी मन में योग्य कर्म के लिए आग अवश्य जलती रहनी चाहिए. ऐसा अनवरत होता रहता है तो किसी उचित समय पर कोई न कोई मार्ग ईश्वर भी निकालते हैं. पर पुनः, ..इसके लिए आवश्यक है हमारा कर्मरत रहना या मन में यह तीव्र इच्छा रहना कि थोड़ा सा भी सहयोग या मौका मिलते ही मैं पूरी सक्रियता से क्रियाशील हो जाऊंगा! पुराने समय के समुद्री जहाज भी जब बंदरगाह पर बेड़ा (लंगर/एंकर) डालते थे तब महीनों खड़ा रहने पर भी उनके इंजन को आइडलिंग स्पीड पर लगातार चालू रखा जाता था. न्यूनतम लेकिन लगातार ईंधन सप्लाई से उसका इंजन अनवरत टुक-टुक करता चलता रहता था यानी 'ऑन' रहता था. फिर जैसे ही जहाज के कप्तान को आदेश मिलता था, वह जहाज तुरंत अगले गंतव्य को चल देता था. 'तुरंत' इसीलिए क्योंकि वह गर्म है, चलने को उद्यत (तत्पर) है, वह तो बस परिस्थितिवश यूं ही खड़ा हो गया था बंदरगाह पर! ..पर क्या उसको यह मालूम था कि परिस्थितियां आगे चलने के लिए कब अनुकूल होंगी, या चलने के लिए आदेश कब आएगा??? बिलकुल भी नहीं, ...लेकिन फिर भी उसकी तैयारी पूरी थी, कभी भी निकल पड़ने की! साधना हो या सामान्य जीवन, ...हमें खुद को उस जहाज के समान बनाना होगा- सम्पूर्ण रूप से तत्पर होकर सही मौके का इंतजार, फिर यात्रा शुरू. पुनः, ..लगातार गर्म (मानसिक रूप से तैयार) रहना अत्यावश्यक.

(५) सेल्फ-रियलाइज़ेशन के लिए क्या 'मैडिटेशन' ही एकमात्र मार्ग है? या किसी बिलकुल भिन्न रास्ते पर चलकर भी हम अपने सत्य तक पहुँच सकते हैं? चाहे लोग इसको महसूस न करें लेकिन व्यक्तियों सहित सभी चीजों का अपना एक स्थान और कार्यशैली है.
आनंद जी ने सेल्फ-रियलाइज़ेशन (आत्म-अनुभूति) के विषय में बहुत अच्छा बताया. अंततः उनके अनुसार 'मैडिटेशन' यानी 'योग' का दीर्घ अभ्यास ही सेल्फ-रियलाइज़ेशन की 'एकमात्र' सही विधि है! ..लेकिन 'मैडिटेशन' भी तो अनेक प्रकार का बताया जाता है!!! ...एक आम व्यक्ति को 'मैडिटेशन' शब्द बहुत भारी-भरकम सा महसूस होता है, जिसमें एक विशिष्ट आसन और मुद्रा में बैठकर, शायद साँस के ऊपर नियंत्रण या नजर रखकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का 'टू-वे' प्रयास किया जाता है!!! ..ऐसा तो शायद कुछ लोग पूजा, प्रार्थना और नामजप द्वारा भी संभव बताते हैं!! ..अपनी-अपनी अनुभूति और अनुभव हैं! ..मेरे विचार से प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में यूनिक अर्थात् विलक्षण है. यह तो सत्य है कि प्रत्येक की आत्मा (और परमात्मा) का मूल गुणधर्म (प्रॉपर्टीज) समान हैं, इसलिए वास्तविक आत्मानुभूति के पश्चात् अंतिम परिणाम (ज्ञान या निचोड़) सभी को एक सा प्राप्त होता है. परन्तु व्यक्तियों के अन्य भौतिक गुणधर्म अलग-अलग होने के कारण और देश-काल-परिस्थिति भी भिन्न-भिन्न होने के कारण मैं नहीं समझता कि 'आन्तरिक यात्रा' का मार्ग एक सा होना संभव है! यह असंभव है! ..बहुत से तथाकथित ज्ञानी जन लिखित अथवा उद्घोषित मार्गदर्शन में 'समस्त' जिज्ञासुओं को कोई एक 'विशिष्ट' समान मार्ग अपनाने को कहते हैं. यह वही मार्ग होता है जिस पर चलकर उस ज्ञानी को आत्मानुभूति हुई. ..वह यह क्यों नहीं समझता कि अन्य की राह कोई दूसरी भी हो सकती है!!! क्योंकि प्रत्येक की संस्कृति, भाषा, परिवेश आदि उसे काफी हद तक प्रभावित करते हैं. किसी भी साधना के आरंभ में ही अपने पूर्वस्थापित संस्कारों को तिलांजलि देना लगभग असंभव ही है! यही कारण है कि मैडिटेशन की कोशिश तो बहुत करते हैं परन्तु अंत में सफलता (आत्मानुभूति) बहुत कम को ही मिलती है. ..और यदि व्यक्ति के परिवेश आधारित संस्कारों को छेड़े बिना उसे किसी विशिष्ट मार्ग चुनने की बाध्यता से मुक्त कर दिया जाये, और उसे सिर्फ परिणाम (जोकि समान ही होता है) के बारे में बताकर मात्र उसके लिए प्रेरित किया जाये तो आत्मानुभूति होने की सम्भावना अधिक हो जाती है. ज्ञानी जनों को यह स्मरण रहना चाहिए कि वे किसी के लिए प्रेरक या उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं परन्तु मार्ग निर्धारित नहीं कर सकते! मैडिटेशन है क्या आखिर?? सरल भाषा में कहें तो मस्तिष्क का आत्मा से जुड़ाव, या आत्मा का मस्तिष्क से जुड़ाव! फिर आत्मा (सार्वभौमिक आत्मिक नैसर्गिक गुणों) का मानव-मस्तिष्क पर प्रभुत्व! यह हो गया तो आत्मानुभूति हो गयी समझिये. और जिसको वास्तविक आत्मानुभूति हो जाती है वह हर पल आत्मा (या परमात्मा) के सान्निध्य में है, यानी हर पल मैडिटेशन की अवस्था में है, बिना किसी विशिष्ट आसन या मुद्रा के! ..मैंने चंद शब्दों में मैडिटेशन या आत्मानुभूति की व्याख्या करने का दुस्साहस किया, वस्तुतः यह सब शब्दों के जंजाल से कोसों दूर है. सेल्फ-रियलाइज़ेशन हजारों-लाखों तरह से संभव है! हाँ रियलाइज़ेशन के पश्चात् ज्ञान रूपी परिणाम समान ही होता है और वह भी शब्दों में व्यक्त करना असंभव है.

Saturday, January 20, 2018

(९१) चर्चाएं ...भाग - 10

(१) अध्यात्म मार्ग पर चल कर व्यक्ति में क्या परिवर्तन आते हैं? आज अध्यात्म शब्द एक फैशन सा बनता जा रहा है ....किन्तु ऐसा देखने में आया है कि बहुत विरले लोगों में ही सुधार नज़र आता है ...क्यों?
अध्यात्म मार्ग पर चलकर (वास्तव में अमल करके) सर्वप्रथम व्यक्ति के प्रभामंडल में सकारात्मक परिवर्तन आता है, वह शीतल, सुखद और मन को भाने वाला हो जाता है; इसके अलावा स्नायुतंत्रों पर नियंत्रण होता है, इच्छाओं पर नियंत्रण होता है, राग-द्वेष कम होता है, सोच और कर्म न्यायोचित होते हैं, रवैया पक्षपात रहित होता है, मिजाज अच्छा और सकारात्मक हो जाता है. शेष आपके इस कथन से मैं सौ फीसदी सहमत हूँ कि आज 'अध्यात्म' शब्द एक फैशन सा बनता जा रहा है. भौतिक जीवनचर्या से हट कर केवल नाम भर के लिए किसी आध्यात्मिक गुरु अथवा संस्था से जुड़ना आज एक अतिरिक्त गतिविधि या स्टेटस सिम्बल के रूप में स्थापित होता जा रहा है! तो अध्यात्म से जुड़कर व्यक्ति की सोच और जीवनशैली में सही मायनों में जो परिवर्तन या सुधार आना चाहिए, वो विरले ही देखने में मिलता है. अधिकांशतः हमारी आध्यात्मिक गतिविधियाँ यंत्रवत या देखादेखी या केवल शौकिया ही होती हैं इसलिए उनमें उथलापन होता है.

(२) आज देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क्या है...? क्या देश में धर्म की लड़ाई सबसे बड़ी चुनौती नहीं है क्योंकि इससे देश की एकता को खतरा है!?
मेरे विचार से आज देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे देश की आम जनता को शिक्षित व परिपक्व किया जाये! निश्चित रूप से वर्तमान सरकार तो इस मामले में गंभीर नहीं है! क्योंकि देश की जनता शिक्षित माने परिपक्व सोच की हो जाती है तो धर्म-आधारित परस्पर लड़ाइयाँ समाप्त हो जायेंगी और इससे उनके वोट-बैंक को भारी खतरा हो जायेगा! तब आम जनता विकास सम्बन्धी असली मुद्दों पर ही विचार करके वोट देगी! ...'अशिक्षित और भोली' (अपरिपक्व) जनता के बीच फूट डालकर राज करना अत्यंत सरलता से संभव होता है यह बात कभी अंग्रेजों ने भी समझ ली थी और यहाँ एक लम्बे समय के लिए अपना राज स्थापित किया था! यह सिलसिला तब से अबतक अनवरत चलता आ रहा है! तब से अबतक अशिक्षा की भूमि पर सत्ता की फसलें उगाई जाती रही हैं और उर्वरक के तौर पर 'धर्म' को इस्तेमाल किया जाता रहा है! देश की हिन्दीभाषी बेल्ट में केवल 'दिल्ली' प्रदेश में ही यह सिलसिला टूटा है! आशा है कि अन्य जगहों पर भी शायद जनता के दिलोदिमाग में कुछ परिवर्तन आए, लेकिन मौजूदा राष्ट्रीय राजनीतिक दल पूरा जोर लगा रहे हैं कि जनता अशिक्षित, अपरिपक्व और धार्मिक वैमनस्य-झगड़ों आदि में ही उलझी रहे! ...इसके अतिरिक्त, नोटबंदी से लेकर अबतक जबरन डिजिटलीकरण, विभिन्न टैक्स और बेतरतीब लाइसेंस ढांचों आदि के द्वारा आम जनता को इस कदर भयभीत और व्यस्त कर दिया गया है कि वह बस बचने-बचाने में ही लगी है! सोचने-समझने और निज-विचार अभिव्यक्ति की गुंजाईश ही खत्म कर दी गयी है. इसके बाद जनता के पास थोड़ा-बहुत सोचने के लिए कुछ बचता है तो वह है 'धर्म'! ..और फिर उसकी धार्मिक भावनाओं को भड़का कर सम्मोहित अवस्था में ला कर मनचाहा धार्मिक द्वेष उत्पन्न किया जा रहा है, ..और इस प्रकार सत्ता को अक्षुण्ण रखने के प्रयास चल रहे हैं.

(३) देश में बैंकों में जमा धन को लेकर लोगों की चिंता कितनी सही है...? आज बैंकों में जमा धन को लेकर लोगों की बढ़ती चिंता के पीछे बैंकों के बढ़ते घाटे हैं जो गलत नीतियों के परिणाम हैं ...आज इस मुद्दे पर शुरू हुई बहस के पीछे वास्तविकता क्या है ....अपने विचार शेयर करें.
इस मुद्दे पर शुरू हुई किसी बहस के बारे में तो अभी मुझे कोई जानकारी नहीं, पर आप के द्वारा उठाये गए प्रश्न के अनुसार मेरा अनगढ़ उत्तर यह है-- ...मेरे विचार से बैंकों की स्थापना का मूल उद्देश्य लोगों के धन को सुरक्षित रखना, सहेजना ..और बिखरे हुए व निठल्ले धन को एकत्रित (केन्द्रित) करके देश के विकासकार्यों व उत्पादन आदि बढ़ाने में लगाना था. भारतीय बैंक भी यही करते रहे. लेकिन विगत कुछ वर्षों में सरकारी बैंकों के ऊपर एक संकट एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स अर्थात् गैर-निष्पादित राशि के रूप में आया. ये गैर-निष्पादित राशियाँ मूलतः या मुख्यतः बैंकों द्वारा दिए गए विभिन्न ऐसे कर्ज थे जिनको कर्जदारों द्वारा वापस चुकाया नहीं गया और न ही उनको वापस पाने की संभावनाएं ठोस रूप से दिख रही हैं! इसका मुख्य कारण यह है कि बहुत से कर्ज सरकारों द्वारा माफ़ कर दिए गए हैं और अनेक अन्य कर्जों के कर्जदार दिवालिया या भगौड़े हो गए हैं! वित्त मंत्रालय ने भी इन कर्जों को लेकर चिंता जताई है, लेकिन कर्ज-वसूली या भरपाई को लेकर कोई ठोस उपाय अभी तक सामने नहीं आया है. ...उधर बैंकों ने भी हुए नुकसान की भरपाई के लिए विभिन्न बैंकिंग सुविधाओं पर अनेकों शुल्क बढ़ा दिए हैं और कई नए भी लगा दिए हैं, जमा धन पर ब्याज दरों में भी काफी कटौती की है; सरकार ने भी नोटबंदी और जबरन डिजिटलीकरण आदि उपायों से दबाव बनाकर आम जनता का लगभग सारा धन बैंकों में एकत्रित कर लिया है! नोटबंदी के बाद से अबतक खाताधारकों के प्रति बैंक-कर्मियों के व्यवहार में भी बहुत गिरावट आई है; सरकार और बैंक-कर्मी आदि साधारण खाताधारक को संशय से देखते हैं और असभ्यता व रुखाई से पेश आते हैं! ..अब आमजन को यह चिंता होनी स्वाभाविक है कि एक तो वह अपने श्रम से कमाया हुआ समस्त पैसा बैंक में ही रखने को बाध्य है, उसे संदेह की दृष्टि से भी देखा जाता है, सरकार और आयकर विभाग भी अपनी धौंस जमाते रहते हैं, ...और दूसरी ओर उसी के जमा धन को सरकारी दबावों द्वारा ऐसे कर्जदारों में बाँट दिया जाता है जहाँ से सकुशल वापसी की उम्मीद बहुत ही कम होती है!!! ...और फिर जो घाटा होता है उसे भी आम खाताधारकों (आम जनता) से ही वसूला जाता है (विभिन्न शुल्कों और कम ब्याजदरों के रूप में)! इसके अलावा बैंकों से लीक या बर्बाद हुए पैसों की कुछ भरपाई यदि सरकार भी करती है तो वह भी आम जनता पर कई टैक्स थोप के, उससे अर्जित करके! यानी लांछन, संदेह, आर्थिक हानि, टैक्स-शुल्कों की मार, अपमानजनक व्यवहार.., सब तरह के डंडे आम जनता के सिर पर! ..फिर किसका मन करेगा कि सरकारी कानूनों के साथ सहयोग किया जाये!? सहयोग होगा भी तो बेमन से और मजबूरी में, राष्ट्रहित में तो शायद कतई नहीं!!! गलत सरकारी नीतियों से धन की बहुत बर्बादी हो रही है और सरकार वसूली कर रही है आम जनता से.., वह भी बलात्... और अपमानजनक ढंग से ताली बजा-बजा कर; ...तो जनता में देशप्रेम की, स्नेह की भावना कैसे बनी रहेगी? लोग भी फिर क्यों न स्वार्थ की ओर मुड़ेंगे??? सरकार और सरकारी बैंकों के इन सब आचरणों से समाज में नैतिकता फैल रही या अनैतिकता? विश्वास फैल रहा है या अविश्वास? सुरक्षा की भावना बढ़ रही है या असुरक्षा की भावना?? जरा सोचिए!

(४) हमें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त होती है? मेरे मन में ये सवाल बहुत दिनों से घूम रहा है!
किसी भी कार्य के दौरान सकारात्मक एवं उल्लासित मनोदशा से या/और किसी ठोस अचीवमेंट की दशा में! इसके विपरीत मनोदशा (यानी नकारात्मक व मन बुझा) रहने से हम स्वयं को ऊर्जा-विहीन महसूस करते हैं, भले ही हमने बहुत अच्छा खाया-पिया हो या कितना भी आराम कर रखा हो!

(५) परमेश्वर ने मुझसे कहा कि वह मुझे मार देगा! इसका अर्थ क्या हुआ, वह मुझे मारना क्यों चाहता है जबकि मै जीना चाहता हूं। और वह इस संसार के साथ मिल कर मुझे क्यों मार रहा है? (प्रश्नकर्ता- जीवीबी मास्टर ऑफ़ वेद मंत्र)
फिर आगे अपने ही मुद्दे के उत्तर-स्वरूप आपने पुनः अपनी बात (भ्रम) को आगे बढाया है कि "मेरा ज्यादा समय तक शरीर में रहना संभव नहीं है!" .....मुझे लगता है कि कदाचित् आप पाठकों के आध्यात्मिक ज्ञान की परीक्षा ले रहे हैं!!! ...जो उत्तर सत्य है और कुछ कटु भी, वह प्रस्तुत है--- 'मेरा' अर्थात् 'अहं '(यानी 'मैं' अर्थात् "जीवीबी मास्टर ऑफ़ वेद मंत्र" यह विशेषण-युक्त प्राणी) का अब इस शरीर में रहना मुश्किल है. जब "अहं" अर्थात् "मैं और परमेश्वर भिन्न" हट जायेगा तो मेरा नाम व उपनाम या विशेषण आदि संपूर्णतः हट कर अब 'मैं' केवल "आत्मा-स्वरूप" शेष रह जाऊंगा! अब 'मैं' यानी 'आत्मा' रहेगा तो इस ईश्वरीय उपहार स्वरूपी शरीर में ही (इस शरीर की प्राकृतिक एक्सपायरी डेट तक), लेकिन साथ ही इस शरीर को ही 'मैं' व 'स्थाई' मानकर नहीं! इससे मेरा मोह समाप्तप्राय हो जायेगा! इस स्थूल और भौतिक देह की हिफाजत और देखरेख में कोई कमी नहीं आयेगी क्योंकि यह ईश्वर-प्रदत्त है, इसका सम्मान पूर्ववत् ही होगा, पर इसका सदुपयोग अब ईश्वरीय अर्थात् श्रेष्ठ कार्यों हेतु, वह भी अकर्म-कर्म द्वारा ही सम्पादित होगा! संसार अब भी मुझे मेरे नाम, उपनाम या विशेषण द्वारा शायद जाने, पर मैं जानता हूँ कि मैं इन सबसे आगे प्रथमतः एक आत्मास्वरूप हूं, आत्मा ही हूँ! इस शरीर में मेरा प्रवास ईश्वरेच्छा से है और मैं (आत्मा) इस ईश्वर-इच्छा का सम्मान करता हूँ. मेरा नाम, उपनाम (विशेषण), गोत्र, जाति, आदि सब किसी जागतिक भौतिक सभ्यता के कारण या संस्कृति-वश ही हैं मात्र! ....इनमें से उपनाम (विशेषण) तो शायद मेरा अहंकार से ही उपजा है!!! जब अहं नहीं तो यह विशेषण भी नहीं!!! विनम्रता से त्यागता हूँ इसे!!!

(६) ऊपर के प्रश्नकर्ता "जीवीबी मास्टर ऑफ़ वेद मंत्र" जी का उत्तर-- इस सत्य से मेरा साक्षात्कार हो चुका है कि इस शरीर में दो है एक मैं स्वयं दूसरा जिसे मैं परमेश्वर समझता हूं वह मुझसे शक्तिशाली है उसने मुझसे जो कहा था उसी मार्ग का हमारी शरीर अनुसरण कर रही है। मै स्वंय को जानता हूं जो एक शरीर धारी है आत्मा है यहां बात शरीर की हो रही है। वह मुझ आत्मा को मारने में समर्थ हो सकता है क्योकि कि मुझ शरीर धारी आत्मा को मारने का चक्रव्युह रच दिया है जिसमें हमारी शरीर फंस चुकी है। जिसे हम आत्मा कहते हैं वास्तव में जब वही ज्ञानवान होता है तो परमात्मा जैसा हो जाता है।
कहते हैं कमी व अति हर चीज की बुरी. ..जीवीबी मास्टर ऑफ़ वेद मंत्र महोदय जी, आप आध्यात्मिक ज्ञानवर्धन के अतिरेक में बहकर अनेक 'भ्रमों' का शिकार हो रहे हैं!
एक और भाई ने प्रथमतः आपको बिलकुल सटीक जवाब दिया था कि, "भ्रम में ना रहें। परमेश्वर कभी किसी को नहीं मारता, अज्ञानी मनुष्य ही एक दूसरे को मारने का प्रयास मात्र करता है। परमेश्वर तो परमात्मा हैं, वे मनुष्य रूपी आत्मा को क्यों मारना चाहेगा ? क्या कभी सागर किसी बूंद को मारने का प्रयास कर सकता है?"
अंत में आपके उपरोक्त उत्तर की अंतिम पंक्ति, "जिसे हम आत्मा कहते हैं वास्तव में जब वही ज्ञानवान होता है तो परमात्मा जैसा हो जाता है.", के उत्तर में एक बात कहना चाहूंगा कि, "आत्मा तो परमात्मा का ही एक अंश है, और उसके गुणधर्म बिलकुल परमात्मा के गुणधर्मों के समान हैं. हाँ, उस पर विभिन्न सांसारिक संस्कारों, मानवीय बुद्धि और 'अहं' का आवरण चढ़ जाता है जिससे वह (आत्मा) अपने मूल स्वरूप में प्रकट नहीं हो पाती. आध्यात्मिक साधना, सत्संग और सत्सेवा आदि से धीरे-धीरे वह आवरण नष्ट होता है और आत्मा अपने मूल स्वरूप में प्रकट होती है. इसी को आत्मसाक्षात्कार भी कह सकते हैं. जब बुद्धि, संस्कार और अहं आदि का आवरण स्थाई रूप से पूर्णतया नष्ट हो जाता है तभी कह सकते हैं कि आत्मा अब परमात्मा तुल्य (के समान) हो गयी यानी उसका ज्ञान (जो उसमें पहले से ही विद्यमान था ही) आवरण नष्ट होने से अब प्रकट हो गया.

(७) फिल्मों के माध्यम से सामाजिक सन्देश देना कितना सफल है...??
सामाजिक सन्देश देने के लिए फिल्में एक बहुत सशक्त माध्यम हैं. आमिर खान सरीखे चुनिन्दा हिंदी फ़िल्मकार अपनी फिल्मों के माध्यम से समय समय पर अनेकों सार्थक सन्देश देते रहते हैं और दर्शकों को भी उनकी फिल्मों का इंतजार रहता है! इन फिल्मकारों की फिल्में कुछेक ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर भी दर्शकों को अनोखा, नवीन, स्वस्थ एवं तटस्थ दृष्टिकोण दे जाती हैं जिन मुद्दों पर कुछ बोलने में बड़े-बड़े कद्दावर नेता भी घबराते हैं. मैं और मेरे जैसे असंख्य दर्शकों को ऐसी फिल्मो का इंतजार बेसब्री से रहता है. ऐसी फिल्में हमारे सुप्तप्राय समाज में बड़ी क्रांति लाने में तो शायद अभी सक्षम नहीं, पर उसके बीज तो वो बो ही रही हैं!

(८) तथाकथित 'अच्छे' लोग ही क्यों अधिक झेलते हैं? एक ही कारण है कि तथाकथित अच्छे व्यक्तियों को भुगतना पड़ता है, क्योंकि ये कुछ कृत्यों को पाप सदृश्य मानते हैं। जो लोग खुद को "अच्छा" कहते हैं और इसमें गर्व करते हैं, वे "अच्छेपन के अहंकार" से ग्रस्त हैं... वे स्थिति की जरूरतों और मांगों के आधार पर कार्य नहीं करते हैं, बल्कि वे अच्छे दिखने के अहंकार से प्रेरित होते हैं। यह समझने पर कि कुछ कर्म पापपूर्ण हैं, उनके लिए अपराधबोध और शर्म आती है और इन भावनाओं के चलते उन्हें अधिक भुगतना पड़ता है. 'कर्म का विधान' केवल पिछले जन्मों के लेखानुसार ऋण उतारने की बात ही नहीं बल्कि बड़े अर्थों में यह आध्यात्मिक सबक सीखने के बारे में है. कर्म के विधान के उच्च पहलू में पाप के लिए कोई स्थान नहीं है। जिस क्षण हम पाप की अवधारणा को स्वीकार करते हैं, हमें और अधिक भुगतना पड़ता है।
आपका विश्लेषण काफी हद तक सही है श्रीमान् जी! जी हाँ, यह सच है कि अधिकांश तथाकथित 'अच्छे' व्यक्ति कुछएक कृत्यों को पाप की श्रेणी में रखकर, उनसे घृणा कर स्वयं को जबरन उनसे दूर रखकर, खुद को 'अच्छा' घोषित करते हैं; वे अवश्य ही 'अच्छेपन' के अहंकार से ग्रस्त हैं! वे पाप और पुण्य की एक सख्त सी धारणा रखते हैं, सिर्फ विचारों में ही नहीं बल्कि खानपान तक में! ...वो सोचते हैं कि उनके यह विचार सभी को हर हाल में 'स्वीकार्य' हो! उनकी यह तीव्र इच्छा उनके कर्मफलों में अनेकों जटिलताएं पैदा करती हैं! ...देखा जाये तो प्रत्येक व्यक्ति को देश-काल-परिस्थिति अनुसार अनेकों कृत्य करने होते हैं; लेकिन तथाकथित 'अच्छे' व्यक्ति जब उनमें से कुछ कृत्यों को करते समय अपने ही पूर्वाग्रह या विश्वास के कारण अपराधबोध या ग्लानि से ग्रस्त होते हैं तब उनको उन कृत्यों का दंड अधिक मात्रा में भोगना पड़ता है! ...क्योंकि यह एक परम एवं कटु सत्य है कि, जो कर्म विश्वास के साथ या विश्वास के अनुसार नहीं किया गया या जो कर्म आपने आपकी धारणा के विरुद्ध किया, वह आपके लिए निश्चित ही 'पाप' है! ...इसलिए मेरे विचार से, 'वास्तव में अच्छे' व्यक्ति सरल स्वभाव के होते हैं, वे पाप और पुण्य आदि की पूर्वस्थापित धारणाओं से दूर रहकर खुद को देश-काल-परिस्थिति अनुसार अच्छे से अच्छा करने को प्रेरित करते रहते हैं. हमें सदैव प्रथम सकारात्मकता के बारे में सोचना होगा, पहले से ही नकारात्मकता का विचार लाना व उससे बचने की सोचना मानों पाप को न्योता देने समान है! ..उदाहरण के लिए, यदि हम सत्य का ही विचार करेंगे और यथासंभव केवल सच ही बोलेंगे तो झूठ से तो अपनेआप ही पर्याप्त दूरी बन जाएगी! ..इसके विपरीत, यदि हम झूठ को पाप समझेंगे और बार-बार खुद को याद दिलाएंगे कि झूठ से दूर रहना है, उतनी ही बार हम झूठ को याद कर रहे होंगे; ..और फिर किन्हीं विषम परिथितियों में अच्छे के लिए ही जरा सा झूठ बोलते ही हम ग्लानि से भर जायेंगे और तीव्र नकारात्मक कर्मफल के भागी होंगे. ..जबकि बिना किसी जटिल व नकारात्मक पूर्वनिर्धारित सोच के हम अपेक्षाकृत बहुत सरल स्वभाव के होंगे और तब उस कर्म का तीव्र विपरीत असर हम पर नहीं होगा! जी हाँ, सरलता ही अपनेआप असली अच्छाई को जन्म देती है.

(९) फिल्म पद्मावत को लेकर मचे घमासान के पीछे क्या सत्य है...?? क्या यह एक गन्दी राजनीति है...?
हमारे यहाँ किसी भी समुदाय के लोग हों या फ़िल्मकार..., समझदारी, रचनात्मकता, बौद्धिक क्षमता आदि तो बढ़ी है, परन्तु उसमें गहराई व परिपक्वता नदारद है. बल्कि मैं तो यह कहूँगा कि नकारात्मक संवेदनशीलता क्रमशः बढ़ ही रही है! इसके बढ़ने के पीछे की बड़ी वजह प्रत्येक समुदाय के शीर्ष पर बैठे कुछ लोग हैं; राजनीतिज्ञ भी वोट-बैंक की खातिर इनकी जड़ता को बढ़ाने के लिए हवा दे ही रहे हैं. आज के फ़िल्मकार भी बोल्ड रचनात्मकता के नाम पर बिना इनकी परवाह किये तथाकथित संवेदनशील मुद्दों पर सीधे-सीधे फिल्में बनाना चाह रहे हैं. क्या किरदारों और स्थान आदि के काल्पनिक नाम रखकर किसी सत्यकथा पर आधारित फिल्में बनाना संभव नहीं है?? फिल्मों का निर्माण मनोरंजन, रचनात्मकता के प्रदर्शन, कोई सन्देश देने, पैसा कमाने आदि उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ही तो किया जाता है! ..फिर लोगों की वर्तमान अति संवेदनशील मानसिकता को छेड़ना क्या जरूरी है?? चाइनीस फ़ूड का बहिष्कार करने वाला कोई अतिसंवेदनशील व्यक्ति यदि चाउमीन खाने से बिदकता है तो उसका देसी संस्करण रामदेव जी का आटा नुडल्स तो वह खा ही लेता है!!! कहने का अर्थ यह कि जब तक लोगों का दिल विशाल न हो जाये, फिल्मकारों को भी सावधानी बरतनी चाहिए! ....फिल्म पद्मावत को लेकर घमासान इसलिए मचा हुआ है कि फ़िल्मकार और कतिपय समुदायों ने इस मुद्दे को अपनी आन, बान और शान का विषय बना लिया है! राजनेताओं की तो बल्ले-बल्ले है-- पाँचों उँगलियाँ घी में और सिर कड़ाही में (चित भी मेरी पट भी मेरी).... खूब मजा ले रहे हैं वो! सुप्रीम कोर्ट को ही देश की व्यवस्था सुनिश्चित करनी पड़ रही है, इससे अधिक विडम्बना की बात लोकतंत्र के लिए और क्या होगी भला! ...कभी-कभी मेरे दिल में यह ख्याल आता है कि इस देश में सुप्रीम कोर्ट न होती तो क्या होता!!? .. वैसे वहां भी दरारें पड़नी शुरू हो चुकी हैं! मैं तो सारा ठीकरा गन्दी राजनीति पर ही फोड़ना चाहूंगा; मूल में वही है जो अहंकार और नफरत को बढ़ाकर सामान्य मानसिकता को रसातल में ले जाना चाहती है! उदाहरण के लिए-- 'चाइनीस बहिष्कार' का विचार क्या एक आम आदमी या किसी फ़िल्मकार के दिमाग की उपज है???? जी नहीं, यह राजनेताओं के दिमाग की उपज है. नफरत या बहिष्कार से हम ऊपर को जाने वाले नहीं अपितु मेहनत और ईमानदारी से ही वस्तुतः हम ऊपर की सीढ़ियाँ चढ़ेंगे. राजनेता कभी भी यह नहीं सिखाते कि दूसरे का कद छोटा करने के लिए अपना कद बढ़ाने पर ही मात्र ध्यान दो. ...अपना कद बड़ा सिद्ध करने के लिए दूसरे का कद काटने की बात ही होती है यहाँ!!! बात कुछ कटु अवश्य हो गयी मेरी, पर दिल से निकली है, ...सो रोका नहीं!

Monday, December 4, 2017

(९०) चर्चाएं ...भाग - 9

(१) मुझे नहीं पता क्यों लेकिन मुझे बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है, छोटी छोटी बातों पर भी गुस्सा आता है। ऐसा क्यों है? मन हर समय परेशान रहता है, पुरानी बातें भूल नहीं पा रहा।
लगता है कि अतीत की कड़वी बातों या कुछ नकारात्मक प्रसंगों से प्रभावित होकर आपमें चिडचिडाहट आ गयी है! उसका दुष्प्रभाव तभी समाप्त होगा जब आप किसी नयी सकारात्मक दिशा में कुछ कदम उठायेंगे. यानी कुछ नया व कुछ सकारात्मक सोच या काम शुरू करेंगे, जिससे कुछ नए सकारात्मक (अच्छे) प्रसंग होने की सम्भावना बने. ...कड़वे के बाद कुछ मीठा खाना ही मुंह की जलन को दूर कर सकता है! अन्यथा कितना भी उछलते रहिये कड़वे का कष्ट कम होने वाला नहीं! ..तो बंधुवर, नवीन मीठे प्रसंगों को जन्म दीजिये, गुस्सा अपनेआप गायब हो जायेगा! ..यह सरासर आपके अपने हाथ में है, कोशिश तो करें!

(२) यह ज़िंदगी एक रंगमंच है, जहाँ हर एक को अपने दिए गए पात्र का अभिनय करना पड़ता है....
एक कुशल व ईमानदार कलाकार मात्र अभिनय नहीं करता, वरन वह भूमिका में डूबकर उसे जीवंतता की उंचाईयों पर पहुंचाता है. वह उस भूमिका को जीता है. यह सब उसे 'करना पड़ता है', यह बात नहीं! वह खुशी-खुशी स्वेच्छा से अपनी भूमिका को बड़े मनोयोग से निभाता है! इसलिए हे मानव, ..तुम जीवनरूपी इस रंगमंच पर अपनी उपस्थिति को मात्र एक मजबूरी न समझो! अपितु यह एक अवसर है कुशलता से अपनी भूमिका को निभाकर भविष्य में और भी अधिक महत्वपूर्ण भूमिकाएं पाने का! हमारा जीवन मूलतः कर्मप्रधान है; अतः कुशल व जीवंत कर्म से ही हम लौकिक भूमिका से अलौकिक की तरफ बढेंगे.

(३) जीवन में आज तनाव का मुख्य क्या कारण है..? आधुनिक जीवन में बढ़ते तनाव के अनेकों कारण हैं, उनमें प्रमुख कारण क्या है?
सबसे बड़ा कारण है- अपने आत्मिक स्वरूप को भुलाकर मात्र दैहिक स्वरूप को ही याद रखना! मैं अमुक नाम का व्यक्ति हूँ, मेरा ओहदा यह है, मेरा पैकेज इतना है, मेरा स्टेटस यह है, मेरा परिवार यह है, मैंने इनके लिए यह किया वो किया, मुझे अपने साथियों से आगे निकलना है, आज मैं औरों से बहुत आगे हूँ, मेरे इतने फ्लैट और जमीनें हैं, मेरा इतना बैंक-बैलेंस हो गया, मेरा रुतबा औरों से बहुत ऊपर है, मेरी बहुत जानपहचान है, मैं बहुत सुन्दर हूँ, .....ऐसे न जाने कितने ही सांसारिक विषयों और भौतिक जगत तक ही सीमित रहना और उनके पीछे अंधाधुंध दौड़ना ही आज तनाव का मुख्य कारण है. कितना भी पा लें वो भी कम ही लगता है, तो कुंठा और निराशा साथ नहीं छोडती; ..या ये दोनों नहीं तो और अधिक पाने के लिए लालच तो बना ही रहता है! घर की सुन्दरता, कपड़ों की सुन्दरता, केशसज्जा की सुन्दरता, तन की सुन्दरता आदि पर ही ध्यान बना रहता है बस, ...मन की सुन्दरता को नोटिस करने का ध्यान किसे और कितना है भई! आत्मिक स्वरूप से तो कोसों की दूरी है! फिर तनाव कैसे न हो?! भौतिक संपन्नता पाने के लिए सारी कसरत हो रही है, सब होड़ में हैं, प्रेशर में हैं; ..इंसान बनने की सुध ही किसे है?! एक अच्छा इंसान बनना-बनाना यदि हमारी वरीयता सूची में ही नहीं तो भला तनाव कैसे न हो?!

(४) समझने और समझाने में इतना अंतर क्यों होता है...? कोई बात समझ में मुश्किल से आती है किन्तु समझाना आसान क्यों होता है...?
पुरानी कहावत है कि, 'बोलना तो आसान है पर करना मुश्किल!' ..इसी प्रकार, 'समझाना तो आसान है पर खुद समझना मुश्किल!' ....यीशु मसीह के समय भी कितने ही दिखावटी उपदेशक बहुत सारे प्रवचन दिया करते थे, तब यीशु मसीह ने लोगों से कहा कि, "जो ये उपदेशक कहते हैं बेशक तुम वह सब किया करो, क्योंकि ये ठीक ही बोलते हैं; ..लेकिन वह बिलकुल भी मत करो जो ये करते हैं!" यानी उनकी (उपदेशकों की) कथनी और करनी में भेद था! अर्थात्, कुछ करने के लिए कुछ समझाना तो बहुत सरल है, पर खुद भी समझकर आत्मसात करना व अमल करना बहुत कठिन! बहुत से डॉक्टर भी अपने मरीजों को तम्बाकू, शराब आदि से परहेज रखने को कहते हैं परन्तु दूसरी ओर समानांतर रूप से उनमें से कुछ डॉक्टर शायद इन चीजों का सेवन कर रहे होते हैं! ऐसे ही आज वर्तमान में कितने ही पाखंडी साधू-संतों का भी पर्दाफाश हो रहा है जो समझाते तो बहुत बढ़िया थे, उनके प्रवचन अति सुंदर थे; ..पर खुद क्या वो वह सब समझते भी थे जो वो समझा रहे होते थे!? जी नहीं! समझते होते तो पतन के गड्ढे में न गिरे होते! अतः खुद समझना आसान बात नहीं! समझने की निशानी है- बात को आत्मसात करना; और आत्मसात करने की निशानी है- व्यवहार से प्रकटीकरण (अमल)! ..जबकि समझाना आसान इसलिए है क्योंकि आत्मसात करना और अमल करना तो सुनने वाले का काम है!!!

(५) जैसे जैसे संसार से विमुख हों, ईश्वर के सन्मुख होते जाएँ ...क्या यह कथन सही है? संसार की प्रत्येक वस्तु और संबंध बंधन का कारक हैं ...केवल इनसे विमुख होकर ही मुक्ति संभव है!?
मेरा विचार आपकी बात से थोड़ा विपरीत सा है! मेरे विचार से कुछ 'त्यागकर या छोड़कर' कुछ 'पाने' के जतन से श्रेयस्कर यह होगा कि कुछ ऐसा पाने का जतन किया जाये जिससे अवांछित स्वयं ही छूट जाये! उदाहरण के लिए, 'झूठ' छोड़ने से श्रेयस्कर होगा कि 'सच' को अपना लिया जाये; झूठ अपनेआप छूट जायेगा! ...ईश्वर को जानते और गहराई से समझते जायें (सन्मुख होते जायें) तो संसार से आसक्ति (मोह) अपनेआप कम होता जायेगा! देह और संसार में रहते हुए भी तब हम उसके बंधन से (आसक्ति या मोह) से सर्वथा परे रहेंगे ही! ...अतः पहले विमुखता जरूरी नहीं! ईश्वर से निकटता बढ़ाते जायें तो संसार से विमुखता (बल्कि उसे अनासक्ति कहें तो बेहतर) खुदबखुद हो जाएगी. संसार की कोई भी वस्तु या सम्बन्ध, बंधन का कारक नहीं बल्कि ईश्वरीय गुणों से हमारी दूरी ही विभिन्न सांसारिक आसक्तियों का कारण है!

(६) एक सच्चा देशभक्त कौन होता है...?
एक देश का निर्माण कैसे होता है? लगभग एक समान विचारधारा और मेल खाती संस्कृति के लोगों के गुटों/संघों से ही विभिन्न देशों का निर्माण हुआ. फिर रोजगार, व्यवसाय आदि की तलाश में भी बहुत से लोगों ने किसी न किसी देश की नागरिकता स्वीकार की. कोई भी देश अपने यहाँ रहने वाले अपने नागरिकों को व्यवस्था व सुरक्षा प्रदान करता है. व्यवस्था कायम रखने के निमित्त बनाये गए उसके नियम-कानून प्रत्येक नागरिक को मान्य होने ही चाहियें. व्यवस्था व सुरक्षा पाने की एवज में प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह राष्ट्रभक्त हो. 'राष्ट्रभक्त' यानी राष्ट्र का आदर करने वाला और राष्ट्र को आदर दिलाने वाला! जीवनशैली और विचारों में लगातार सुधार ला कर एक सामान्य नागरिक यह कर सकता है. अपने परिष्कार के अलावा यदि वो समाज रूपी खेत में उग आई फालतू की खरपतवार को भी काटता-छांटता रहे तो और भी उत्तम! चूंकि हमारा जीवन कर्मप्रधान है इसलिए कुछ विशिष्ट बोलना या दिखावटी कृत्य कारण ही वास्तविक देशभक्ति नहीं अपितु कुछ रचनात्मक और सकारात्मक कार्य करना ही वास्तविक देशभक्ति होगी. जो नागरिक कानून के दायरे में रहते हुए अपने देश में अच्छाई को जितना अधिक बढ़ाने में लगा है और बुराई का विरोध भी करता है, वह नागरिक उस देश की प्रगति में उतना ही अधिक योगदान कर रहा है, वह ही खरा देशभक्त है.

(७) धर्म को लेकर राजनीति में विवाद कितने तर्क संगत हैं...?? आज धर्म, राजनीति का अभिन्न अंग बन गया है और राजनीति का स्तर बहुत गिर गया है!
राजनीति में धर्म को कठपुतली समान नचाकर किसी पंथ विशेष को आकृष्ट करने से ओछा काम कोई दूसरा नहीं! वोटों को खींचने लिए धार्मिक भावनाएं भड़काना राष्ट्र को और पीछे लेकर जाता है. क्या यह राष्ट्रद्रोह समान नहीं? बड़े खेद की बात है कि इन्हीं कारणों से पता नहीं कितने ही वर्षों से हमारा देश एक 'विकासशील देश' है! कितने ही छोटे-बड़े राष्ट्र जो कभी हमसे काफी पीछे थे, आज 'विकसित' देशों की कतार में जा खड़े हुए हैं! क्योंकि हमारे आकाओं को अपनी कुर्सी से इतर कुछ दिखता ही कहाँ है! थोड़े बदलाव या आशा की किरण के रूप में मुझे अन्ना हजारे की कक्षा के निर्भीक छात्र अरविन्द केजरीवाल ही दिखते हैं जिन्होंने पारंपरिक भारतीय राजनीति में धारा से विपरीत एक बार नहीं बल्कि दो बार घुसने की और फिर तमाम झंझावातों के बीच डटे रहने की जबरदस्त हिम्मत की (केवल बोलने वाले तो बहुत लोग होते हैं). उनके इस प्रयास में राजधानी दिल्ली की प्रबुद्ध जनता ने उनपर तब ऐसा प्रचंड विश्वास तब दिखाया जब समस्त देश में भाजपा की आंधी चल रही थी! अब राजधानी दिल्ली की जनता को हम अनपढ़ या पिछड़ा हुआ तो नहीं कह सकते ना! तो फिर शायद शेष भारत में चेतना मृतप्रायः है! ये खडूस नेता धार्मिक विवादों को जीवित रखकर उस विकास की आधुनिक चेतना को क्या जागने ही नहीं देंगें कभी?

(८) सद् गुरु, स्वामी अग्निवेश, आचार्य प्रमोद कृष्णम् या इसी प्रकार के कुछ अन्य आध्यात्मिक गुरुओं के कम ही फॉलोवर्स हैं, क्यों?
इन तीनों और इसके सरीखे अनेक अन्य कुछ ज्ञानियों के अनुयायी इसलिए कम हैं क्योंकि ये ज्ञानीजन 'आईने' या 'दर्पण' समान हैं. ...दर्पण सच को सामने लाता है, और दागी व्यक्ति अपने दागों और ऐबों को छुपाता है, उनसे छुपता है; इसलिए वह आईने के सामने जाना अवॉयड करता है, टालता है, उससे बचता है! यह बिलकुल सच है कि हममें से अधिकांश तथाकथित धार्मिक या बुद्धिजीवी लोग परले दर्जे के स्वार्थी और मौकापरस्त हैं, ओछी मानसिकता के अनेकों दाग रखते हैं, ...इसलिए इन सरीखे ज्ञानियों से पर्याप्त दूरी बनाकर रखते हैं. ..बहुत त्रासद है यह कि, कई दूसरे धर्मगुरु जो केवल हमारी भावनाओं, लालसाओं आदि को तुष्ट करते हैं, हमें अनेकों सब्जबाग दिखाते हैं, हम सिर्फ उन्हीं को पसंद करते हैं!

(९) एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु की क्या पहचान है....?? आज बहुत सी संख्या में आचार्य और गुरु मिल जाते हैं किन्तु सच्चे निष्ठावान गुरु को कैसे पहचानें?
एक सच्चे आचार्य, आध्यात्मिक गुरु, या मार्गदर्शक का सर्वप्रथम 'संत' वृत्ति का होना परम आवश्यक है. स्वयंभू संत नहीं वरन सच्चा संत! एक सच्चा संत ही एक खरा आध्यात्मिक गुरु सिद्ध हो सकता है. वास्तविक संत की पहचान-- (१) संत ऊपर से दिखने पर साधारण मनुष्यों जैसे ही होते हैं, जल्दी पहचान में नहीं आते; वे केवल आनंद और संतोष की सुगंध से ही पहचाने जाते हैं. ..(२) संत का अस्तित्व उसकी भौतिक देह या वेशभूषा में न होकर केवल उसके वचनों में होता है. कैसी भी थैली में हीरा रखने पर थैली का महत्त्व नगण्य होकर केवल हीरे का महत्त्व रहता है. ..(३) खरे संत की पहचान उसके विशिष्ट वस्त्रों, केश-विन्यास, भावभंगिमाओं अथवा वाह्य श्रृंगार (मेकअप) से नहीं, वरन उसके नैसर्गिक प्रभामंडल से होती है. ..(४) संत का उद्देश्य अपने उपदेशों या वचनों द्वारा सुनने वालों को मात्र रिझाना नहीं होता, वरन उनके वास्तविक कल्याण की दृष्टि से वे उपदेश देते हैं. ..(५) जिसकी संगति में हमारे अंतर्मन में भगवत्-प्रेम प्रकट हो और विषयों के प्रति आसक्ति कम हो, उसे संत जानें. ..(६) संत के पास जाकर संतोष, शांति व आनंद आदि का वास्तविक अर्थ पता चलता है और इन्हें पाने की रूचि उत्पन्न होती है, ..(७) ईश्वर की सगुण अथवा निर्गुण भक्ति तथा ईश्वरीय गुणधर्मों से ओतप्रोत जीवन जीने के अतिरिक्त कोई भी बात संतों को रुचिकर नहीं लगती. ..(८) अपने व्याख्यानों में संतजन जिन सिद्धांतों की चर्चा करते हैं, उन्हें वे भलीभांति हृदयंगम कर चुके होते हैं और आचरण द्वारा सतत प्रकट करते हैं. ..(९) संतों के व्याख्यान उनके स्वयं के अनुभवों और अनुभूतियों पर आधारित होते हैं, वे व्यर्थ का ढोंग या दिखावा नहीं करते; उपदेश करना उनका व्यवसाय नहीं होता. ..(१०) संतों में भी षड्-विकार होते हैं परन्तु उनका रूपान्तरण भगवत्-भक्ति के साधन के रूप में हो जाता है; तब ये षड्-रिपु व्यष्टि और समष्टि साधना के लिए उपकरण समान बन जाते हैं. ..(११) संतों को भी पूर्वकर्मजन्य प्रारब्ध को भोगना पड़ता है, शारीरिक कष्ट भी होते हैं, परन्तु देहभान न होने के कारण उन्हें इसके कारण किसी सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता. ..(१२) संत हमारे जीवन में आने वाले कष्टों को दूर नहीं करते, वरन वे कष्टों के प्रति हमारे भय को समाप्त कर देते हैं. संकट से अधिक दुखदाई संकट का भय होता है! ..(१३) संत के संसर्ग से हम पापकर्म से दूर होते हैं तथा दुखों में आश्वासन, धैर्य व ढाढ़स प्राप्त करते हैं. ..(१४) संत की संगति से तर्क क्षीण होते हैं, वृत्ति बदलती है, अनुभव और अनुभूतियाँ बढ़ते हैं, अंततः ईश्वर के अस्तित्व की अनुभूति होती है; क्योंकि ईश्वर को तर्क से सिद्ध नहीं किया जा सकता! ..(१५) साधारण संत कहता है, "दुष्टों का नाश हो", जबकि खरा संत कहता है, "दुष्टता का नाश हो" अर्थात् दुष्ट व्यक्तियों की दुष्टता मिटे. ..(१६) खरे संत की सबसे बड़ी पहचान यह है कि आप किसी सांसारिक अभिलाषा की प्राप्ति के लिए उसके पास जायेंगे और अभिलाषा रहित होकर लौटेंगे; संत-संग का यह सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम है. ..(१७) खरा संत हमें कभी भी सांसारिक विषयों में उलझाएगा नहीं, न ही उन्हें एकदम से त्यागने के लिए कहेगा; बल्कि वह उन विषयों के प्रति हमारी आसक्ति को समाप्तप्राय कर देगा. ..(१८) खरा संत कभी भी अपने 'संत' होने का प्रचार-प्रसार नहीं करता और न ही किसी के द्वारा 'संत' कहने-कहलाने पर गदगद् (प्रसन्न) होता है. ..(१९) संत किसी प्रकार का चमत्कार नहीं करते, चमत्कार जैसा कुछ स्वयमेव हो जाता है! इसके लिए आवश्यकता है सतत संत-संगति की.