Monday, October 16, 2017

(८६) चर्चाएं ...भाग - 5

(१) क्या आत्मा मरती है? नहीं.. तो कहां जाती है? सभी कहते हैं आत्मा मरती नहीं, क्या यह दुबारा जन्म लेती है? अगर हाँ तो हमें याद क्यों नहीं होता कि हम पहले क्या थे?
आत्मा एक प्रकार की ऊर्जा है. एक ऐसा ऊर्जा रूपी सॉफ्टवेयर जो किसी देह रूपी हार्डवेयर को चलाने या ऑपरेट करने में सक्षम है. विज्ञान के अनुसार भी किसी भी ऊर्जा का अपना कोई रूप-रंग-आकार आदि नहीं होता; ऊर्जा अक्षुण्ण होती है अर्थात् कभी नष्ट नहीं होती; ऊर्जा की कोई यादाश्त भी नहीं होती. ...विभिन्न अन्य ऊर्जाएं जैसे न दिखते हुए भी वातावरण में कहीं न कहीं तो अवश्य होती हैं वैसे ही आत्मा भी होती हैं. गर्भ या बीज के माध्यम से किसी नवीन देह में प्रत्यारोपित होते ही उसके हार्डवेयर से जुड़कर ही वह सक्रिय (एक्टिवेट) होती है और उसे भी सक्रिय करती है. जैसे बहुत सी प्राकृतिक पेचीदगियों की गांठ विज्ञान अभी तक नहीं खोल पाया है, आत्मा भी उनमें से एक है. ...वैसे यह उत्तर अति संक्षिप्त और प्राथमिक स्तर का ही है.

(२) भारतीय संस्कृति में व्रत और पूजा विधानों का क्या महत्त्व है...? क्या आज भी व्रत विधानों का कोई औचित्य है...?
किसी विश्वास के रहते मन की पवित्रता और मानसिक बल प्राप्त करने हेतु व्रत एवं अनुष्ठान आदि करना सर्वथा उचित है. लेकिन अन्य किसी प्रयोजन से इन्हें करना अब प्रासंगिक एवं उचित नहीं! किसी भी पूजा-आराधना का उद्देश्य यदि ईश्वर के गुणधर्म को आत्मसात करना ही हो तो ही उत्तम. यदि कोई भी पूजा-अनुष्ठान हमारे भीतर दैवीय गुणों में वृद्धि कर हमें और बेहतर इंसान बना पा रहा हो तो उसका सहर्ष स्वागत. ...अन्यथा सब मिथ्या है, त्याज्य है.
इस विषय पर चर्चा में अनेक वाद-विवाद पढ़े. देखिये, यदि विश्वास और भाव के बिना कोई व्रत आदि रखा जाये तो उसका कोई भी औचित्य नहीं, वह बेकार की एक्सरसाइज होगी....लेकिन विश्वास सहित भावपूर्ण कृत्य के लाभ अवश्य होते हैं. अपने अनुभवों से मेरा यह मानना है कि करवाचौथ जैसे कठिन व्रत यदि "भावपूर्ण" किये जायें तो 'संभावित' लाभ ये हैं-- ...(१) स्त्री के मन में अपने पति के लिए आदर और केयरिंग का भाव बढ़ता है और फलस्वरूप पति के मन में भी ऐसा ही भाव बढ़ता है. तब आपसी सम्बन्ध और अधिक प्रगाढ़ होते हैं. ...(२) व्रत के दिन पत्नी के मन में यदि श्रद्धाभाव और अनन्य विश्वास है तो उसका मानसिक बल एवं पवित्रता बहुत बढ़ जाते हैं. इसके कारण बहुत सी विपत्तियाँ टल सकती हैं, ..हो सकता है पति अब पत्नी की नेक सलाहों पर अधिक ध्यान दे इसलिए ही! ..क्योंकि यह एक स्थापित सत्य है कि नैसर्गिक रूप से पुरुष मन की अपेक्षा एक स्त्री मन अधिक नैतिक एवं शुद्ध (माने अधिक अच्छा) होता है. ...(३) अधिकांश भारतीय भावपूर्ण आस्तिक दंपत्तियों को व्रत के दिन हुए ये उपरोक्त लाभ व्रत के बाद भी कायम रहते हैं और प्रत्येक वर्ष इनके पुनः पुनः होने पर ये लाभ गहराते जाते हैं. .....निचोड़ यह कि भावना नेक व भाव सच्चा हो तो ही ईश्वरीय मदद मिलती है अन्यथा ईश्वर कोई रिश्वतखोर राजा नहीं! भावपूर्ण उपासना होने पर भी ईश्वर कोई चमत्कार जैसा नहीं करते अपितु वह बुद्धि और विवेक को शुद्ध करके आपसी समझ व प्यार को विकसित करते हैं; जब ऐसा होता है तो हमारी निर्णय क्षमता बेहतर होती है और फलतः संकट टलते हैं. ..जिस व्रत से परस्पर प्यार व सम्मान बढ़े, मानसिक बल बढ़े, बुद्धि और विवेक शुद्ध होते हों, ..और फिर इन सब से संकट टलते हों, ऐसा व्रत आलोचना का पात्र कैसे हो सकता है!? हाँ जिनको विश्वास नहीं उनको दिखावे के लिए व्रत रखने-रखवाने की कोई भी आवश्यकता नहीं, उसका कोई भी लाभ होने वाला नहीं! धर्म के क्षेत्र में कुछ भी जबरन करना या करवाना गलत है, हाँ कुछ वास्तव में गलत होने पर उसका विरोध जायज है- जैसे स्वार्थपूर्ति के लिए अंधश्रद्धा गलत है. उदाहरण के लिए- कुछ लोगों में विश्वास, श्रद्धा, भाव वगैरह ना होते हुए भी मात्र स्वार्थपूर्ति के लिए वे विभिन्न अनुष्ठान करते-करवाते हैं, या मात्र भौतिक स्वार्थ साधने के लिए ही विश्वास, श्रद्धा व भाव को बढ़ाने का प्रयास करते हैं, ...इन्हीं के कारण अंधश्रद्धा बढ़ती है और समाज का खरा भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास रुक जाता है.
धर्म के क्षेत्र में इस समय बहुत कुछ गलत है लेकिन सब कुछ गलत घोषित कर देना अतिरेक होगा. किसी दुर्लभ सी अपवाद वाली घटना से हमें एकदम से गलत अर्थ नहीं निकालने चाहियें. अपवाद कहाँ नहीं होते??? अध्यात्म की जड़ में घुसकर ही हम इसे भलीभांति जान सकते हैं, फिर इसमें व्याप्त अच्छाईयाँ व बुराईयाँ हमें स्पष्ट हो जाती हैं, हम उन्हें फ़िल्टर कर सकते हैं. याद रखिये कि अध्यात्म केवल निरंतर अभ्यास (इम्प्लेमेंट) एवं अनुभूति का शास्त्र है! .....अति प्राचीन व्रत एवं उनके आशय गलत थे नहीं, हमने ही उनका स्वरूप बिगाड़ दिया है! ...और अनेक व्रत विधान आदि बाद के लोभी पंडितों ने नए भी पैदा कर दिए, ...या फिर उन्होंने भी प्राचीन का स्वरूप बिगाड़ कर रख दिया. ...लेकिन मेरा यह मजबूती से मानना है कि किसी व्यक्ति का जब विश्वास खंडित हो जाये तो फिर उसके लिए वह अनुष्ठान व्यर्थ का है, उसे बिलकुल भी ना करना चाहिए, ..जिनका विश्वास झूठा है, उनका विरोध भी करना चाहिए, ...पर जिनका विश्वास अभी भी सच्चा है, उनकी भर्त्सना करना उचित नहीं!

(३) मैं एक सिविल इंजिनियर हूँ और मैं जल विभाग में कार्यरत हूँ।और मैं अपने शहर को साफ सुथरा रखना चाहता हूँ, मैं पेड लगाने और नदियों को साफ सुथरा रखना चाहता हूँ लेकिन कैसे करें समझ नहीं आ रहा है।
आप जहाँ कहीं भी रहते हैं सबसे पहले वहां अपनी सोशल एक्टिविटीज़ को बढाएं. यदि आपके लिए संभव हो तो अपने आसपास के पड़ोसियों से संपर्क साधकर एक सामाजिक संगठन बनाएं, ...या फिर अपने क्षेत्र के किसी बेहतर संगठन या संस्था को ज्वाइन कर लें. ..अब आरंभ में ही अपने सपने या चाहत को उन्हें ना बताकर पहले उनसे सामाजिक घनिष्ठता बढाएं, उनके वर्तमान कार्यों में सहभाग करें और फिर कुछ समय पश्चात् अपना यह प्रस्ताव उनके समक्ष रखें. किसी भी बड़े कार्य को अंजाम देने से पहले उसकी एक फिजा तैयार करनी पड़ती है. ...आप समझ गए होंगे. ...आपका इरादा नेक है और तरीके व्यावहारिक तो अवश्य ही अपने मिशन में सफल होंगे. समाज या सरकार का सहयोग लेकर ही बड़े पैमाने पर कार्य संभव हो पाता है. मेरे विचार से करप्शन-रहित कार्य के लिए सरकार की अपेक्षा समाज का सहयोग लेना ज्यादा अच्छा रहेगा. ...मेरी शुभकामनाएं.

(४) धर्म के नाम पर हिंसा करना सबसे बड़ा पाप है...? समाज में हिंसा फैलाने में आज धर्म का सहारा लिया जाता है ...क्यों ?
जी हाँ, सहमत हूँ आपसे. ...ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हिंसा भड़काने वाले स्वार्थी होते हैं और वे भलीभांति जानते हैं कि अधिसंख्य लोगों का धार्मिक या आध्यात्मिक ज्ञान बहुत उथला है, बहुधा लोग पिछड़ेपन वाले अंधभक्त हैं, इसलिए धर्म के नाम पर उन्हें आसानी से बरगलाया व हिंसक किया जा सकता है. पिछड़े और विकासशील संघों में ही यह होता है, लेकिन एक विकसित राष्ट्र के लोगों को धर्म के नाम पर उत्तेजित करना सरल नहीं, वे किसी जायज मुद्दे पर ही स्वतः उत्तेजित होते हैं!

(५) तनावरहित जीवन जीने की कला क्या है ?
"सादा जीवन उच्च विचार"! ....'सादा' का अर्थ 'रूखा-सूखा' नहीं होता! 'सादा' अर्थात् 'आडंबरहीन'! जीवन में सबकुछ करें..., लेकिन सहजभाव से, बिना दिखावे के! पिछलग्गू न बनें, अपनी आवश्यकताओं का आंकलन स्वयं करें, लालच में उन्हें अधिक विस्तार ना दें, और अपनी वरीयताएं उन्हीं के अनुसार स्वयं तय करें! ..जीवन की भंगुरता का सदैव ध्यान रहे! कुछ भी सदा के लिए नहीं रहना है, इसका ध्यान रखते हुए भविष्य की योजनाओं में सीमित ऊर्जा खर्च करें! तुलना से बचें, होड़ से बचें, जो भी प्राप्त है उसपर गर्व करें, हीन अथवा उच्च भावना से दूर रहें! ....सबसे जरूरी बात कि जो भी काम-धंधा या नौकरी आदि कर रहे हैं उसे दिल लगाकर, सिर उठाकर, पूरे मनोयोग से लुफ्त लेते हुए (यानी एन्जॉयमेंट की फीलिंग के साथ) गर्व से करें..., तनाव कोसों दूर रहेगा! कार्य में संतुष्टि यानी वर्क सैटिस्फेक्शन से ही दिमागी सुकून मिलता है, फिर बदले में मिले पैसे की मात्रा बहुत महत्त्व नहीं रखती! जीवन को भरपूर जियें, हर्ष-उल्लास के छोटे-बड़े मौके ढूंढते रहें, जीवनसाथी और अन्य परिजनों के साथ भरपूर समय बिताएं, पारिवारिक समारोहों में सक्रियता से हिस्सा लें, खुशमिजाजी रखें, ...इन सब में बहुत पैसे की आवश्यकता नहीं होती! सदैव भान रहे कि पैसा बहुत कुछ है, लेकिन सबकुछ नहीं! कुछ भी बड़ा खर्च करने से पहले अपने अंतर्मन से यह प्रश्न अवश्य करें कि.. क्यों? क्या यह सही में मेरी आवश्यकता है? ..या देखा-देखी, भेड़चाल में, ऐसा करने की सोच आ रही है? ..ऐसा करने पर हमारे भीतर की आवाज हमें अनेकों अनचाहे और गैरजरूरी खर्चों से बचाकर हमें तनावमुक्त रख सकती है. ...इन सब के अतिरिक्त यदि अध्यात्म को भी समझने का प्रयत्न करते रहेंगे तो जीवन जीने की कला स्वयमेव आती जाएगी.

(६) भारत 119 देशों में से 100 वें स्थान पर पहुँच गया है भुखमरी में! हमें विकास किस क्षेत्र में करना चाहिए? और क्या हम सही विकास के राह पर हैं? बुलेट ट्रेन,राम के, पटेल के, शिवाजी के प्रतिमाएं बनाना ज्यादा जरूरी हैं?
संघ के सुदृढ़ और खरे विकास के लिए सभी को अच्छा इंसान बनने-बनाने के क्षेत्र में सबसे पहले कार्य करना होगा, ...उसके बाद, हमारे पास आलरेडी जो भी है उसे संभालना, सहेजना सीखना होगा. ...वर्तमान ढांचे, संसाधनों आदि को जब हम मेन्टेन करने में, ग्रिप में लेने में जब सफल हो जायें, तब ही हमें आगे के विकास का कार्य आरंभ करना चाहिए! ...मोदी जी तो देश के सिस्टम को बिना बुनियादी पाठ अमल करवाए आगे के सिलेबस में धकेले जा रहे हैं, ..यह आत्मघाती कदम सिद्ध होगा, हमारा विकास एक खोखला विकास ही सिद्ध होगा (हो रहा है!). दूर अतीत में अंग्रेजों द्वारा बनवाये गए और यूनेस्को द्वारा 'विश्व धरोहर' घोषित "कालका-शिमला रेलपथ" को भारतीय रेल विभाग ठीक से मेन्टेन करने में जहाँ आज भी 'अक्षम' है, दूसरी सवारी गाड़ियों की लेटलतीफी और एक्सीडेंट्स लगातार बढ़ते जा रहे हैं, स्टेशनों और प्लेटफार्मों की हालत खस्ता बनी हुई है, यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाएं और सुरक्षा व्यवस्थाएं बद से बदतर होती जा रही हैं, ...वहां इन सब को दुरुस्त किये बगैर ही बुलेट ट्रेन का शिगूफा छोड़ना निहायत बेवकूफी भरी बात लगता है! ...रेलवे का जिक्र तो मात्र एक उदाहरण के रूप में किया मैंने, ..सभी क्षेत्रों और विभागों में बुनियादी संरचना को मजबूत करना सरकार का पहला लक्ष्य होना चाहिए. ...खोखली बुनियाद पर विकास की इमारत खड़ी करने की कोशिश में एक दिन सब भरभरा कर गिर जायेगा, और नुकसान देश के आम नागरिकों का ही होगा, हम फिर से कई बरस पीछे चले जायेंगे! ...अभी मैं ५४ वर्ष का हो चुका हूँ और होश संभालते ही पिछले ५० वर्षों से अभी तक सुन और पढ़ रहा हूँ कि 'भारत एक विकासशील देश है'!
प्रतिमाएं आदि तब बनाएं जब असली विकास करके थोड़ा सा सुस्ताना हो, अपने पर खुश होना हो! अभी तो बहुत काम पड़े हैं, अभी मूर्तियां बनवाने की बात सुनना भी कानों को नागवार गुजरता है, क्रोध आता है मूर्खतापूर्ण बातों पर! छोटा सा बच्चा समझ रखा है आम जनता को कि झुनझुना पकड़ा देंगे!

(७) दीपावली मनाने का सर्वोत्तम तरीका क्या है और क्यों....? दीपावली मनाने के पीछे क्या भाव है...?
असत्य पर सत्य की विजय उपरांत धर्मयुद्ध के नायकों के स्वागतार्थ एवं सम्मानार्थ तथा इस निमित्त अपना हर्षोल्लास व्यक्त करने हेतु दीपावली का पर्व मनाया जाता है. कार्तिक माह की अमावस्या की रात्रि विभिन्न प्रकार की रोशनियों से वातावरण को जगमगा कर अंधकार को परास्त कर प्रतीक रूप में नकारात्मकता पर सकारात्मकता (असत्य पर सत्य) की जीत को दर्शाया जाता है. वैसे समय के साथ दीपावली मनाने के अनेक अन्य कारण भी साथ में जुड़ गए. इस कारण इस त्यौहार का महत्त्व और भी बढ़ जाता है. सब विश्वास और परंपरा की बातें हैं. लेकिन यह तो सच है कि प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी तरह यह त्यौहार हमारे भीतर एक नवीन ऊर्जा एवं आह्लाद का संचार करता ही है. अतः यह आलोचना का तो पात्र कदापि नहीं. हम अपने विश्वास के चलते किसी भी ढंग से इसे मनाएं, पर अंततः परिणामी भाव यही आए कि, "सकारात्मकता बढ़े, सत्य की राह पर अग्रसर एवं स्थिर हों, आपसी भाईचारा बढ़े, सात्त्विकता बढ़े, बहुमुखी समृद्धि एवं विकास की ओर बढ़ें, जीवन में तनाव कम होकर हर्षोल्लास बढ़े, भीतरी ऊर्जा बढ़े."

(८) देश में लोग सुधार लाने में सहयोग देने के बजाये अपनी बात को एहमियत क्यों देते हैं? बिना पटाखों की दिवाली,कैसा विचार है..?
किसी भी बेहतर चीज (बदलाव) को लागू करवाने के लिए कानूनी दबाव की अपेक्षा जागरूकता पैदा करना एक अच्छा विकल्प है. लोगों के जागरूक न होने की दशा में कानूनी दबाव भी चरण दर चरण बनाया जाना चाहिए. एकदम से हिटलरशाही थोप देना भी सामाजिक असंतोष को जन्म देता है, खासतौर पर जब मामला किसी पारंपरिक धार्मिक त्यौहार से जुड़ा हो. ..."बिना पटाखों की दिवाली" वैसे तो एक बहुत अच्छा विचार है, पर इसे चरण दर चरण बुद्धिमानी से लागू किया जाता तो बेहतर होता. उदाहरण के लिए -- दिल्ली में हर साल की तरह इस साल भी आतिशबाजी के फुटकर और थोक व्यापारियों को लाइसेंस जारी किये गए, उनको जारी करने के लिए रिश्वत वगैरह भी वैसे ही खायी गयी, चूंकि इनसे जुड़े व्यापारियों के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा दीपावली में ही पूरा होता है, अतः उन्होंने इस दिवाली से पूर्व ही निर्माता कम्पनियों को भारी एडवांस धनराशि के साथ बड़े आर्डर दे दिए, छोटे व्यापारियों ने बड़े व्यापारियों के यहाँ भी ऐसा ही कुछ कर दिया. अब न्यायालय का पटाखा-प्रतिबन्ध का आदेश आ गया, तो कारोबार से जुड़े व्यापारियों को तो दोहरा-तिगुना नुकसान हो गया. लाइसेंस फीस का घाटा, एडवांस धनराशि का घाटा, बिक्री शून्य तो मुनाफा भी शून्य, इस वर्ष कोई अन्य काम न करने के कारण कमाई भी शून्य. ...'दिवाला' निकल गया होगा उनका! बरसों से चले आ रहे एक दस्तूर को एकाएक समाप्त कर देना मुझे तो समझ में नहीं आया. ...हल के तौर पर होना यह चाहिए था कि न्यायालय यह निर्णय लेता कि अभी से, यानी इसी दीपावली पर ही यह घोषणा कर दी जाती कि इस वित्तीय वर्ष के उपरांत पूरे राजधानी क्षेत्र में सभी त्यौहारों पर आतिशबाजी सख्ती से प्रतिबंधित रहेगी. दीपावली उपरांत के लिए व्यापारीवर्ग इस बीच अपना कोई दूसरा काम-धंधा ढूंढ लेता, उसका नुकसान न होता. इति.

(८५) चर्चाएं ...भाग - 4

(१) देवी पूजन का कलयुग में बढ़ता महात्म्य ...क्या कारण है? भारत में देवी पूजन का चलन और कन्या भ्रूण हत्या कितनी विडंबना!
हम उच्चकोटि के स्वार्थी, पाखंडी और मंगते (भिखारी समान) हैं, यही एक मात्र कारण है गणेशोत्सव हो या नवरात्रि, या फिर कोई भी अन्य पर्व; पूजन में आडंबरों, तड़क-भड़क व दिखावों का जोश-ओ-खरोश निरंतर बढ़ ही रहा है. ...लेकिन हमारे दिखाने और खाने के दांतों में बहुत अंतर है! ...समाज में बढती धार्मिकता की सूजन के साथ कन्या भ्रूण हत्या की दर भी निरंतर बढती जा रही है! हम आखिर क्या चाहते हैं, कहाँ जा रहे हैं??? ...धिक्कार है, शर्म महसूस होती है.
कन्या भ्रूणहत्या पर लगाम लगाने के लिए आज स्त्रियों के प्रति सम्मान का बढ़ना अतिआवश्यक प्रतीत हो रहा है. इस निमित्त इस काल में देवी पूजन का बहुत महात्म्य है. लेकिन लोगों का स्वार्थ जो है न, वो भक्ति की मूल भावना और भाव को कुचले दे रहा है. लोग तो पूजन के समय देवी माँ से भी प्रार्थना करते हैं कि- सभी भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति हो, बड़े स्कूल में एडमिशन, अच्छे नंबर, अच्छी नौकरी, ऊंचा पैकेज, कामकाजी बीवी और 'पुत्र' की प्राप्ति हो!! केवल भक्ति हेतु ही भक्ति, ऐसी 'निष्काम' भक्ति अब देखने में नहीं आती. आज सब 'सकाम' हो गया है या फिर केवल मौज-मस्ती! 

(२) सबके हित में जिसकी प्रीति हो गई है उन्हें भगवान् प्राप्त हो जाते है! आसान है पर मुश्किल जान पड़ता है!
कितनी बढ़िया बात कही आपने, दिल खुश हो गया. "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना जिसके दिल में ठीक से आ गयी, उसने तो मानों भगवान् को पा लिया. उसकी सोच फिर निराली ही होती है- सभी निर्बंधों से परे, आकाश से भी ऊंची, कल्पनातीत! ..आपने सही कहा कि यह आसान है, पर बहुत मुश्किल जान पड़ता है; क्योंकि व्यक्ति के हजारों-लाखों स्वार्थ जो आड़े आ जाते हैं! आज के बाबा, तथाकथित संत और धार्मिक मार्गदर्शक भी इन स्वार्थों से अछूते नहीं! भगवान् को पा लेने का ढोंग करते हैं वो!
...आपने ऊपर एक शब्द "प्रीति" का प्रयोग किया है. अध्यात्म में इस शब्द (गुण) का बहुत महत्त्व है. प्रीति का अर्थ है- निरपेक्ष प्रेम (अनकंडीशनल लव)! जिस मानव का सभी (सम्पूर्ण सृष्टि) के प्रति निरपेक्ष प्रेम स्थापित हो जाये तो मानो सब सध गया, कुछ शेष न रहा. यही तो चरम बिंदु है किसी भी भक्ति, उपासना या साधना का! वातावरण में व्याप्त अनेकों अहं के स्पंदनों के कारण साधारण व्यक्ति इस चरम बिंदु को पा नहीं पाता, इसीलिए उसे यह कठिन जान पड़ता है. लेकिन यदि किसी प्रकार अहं व स्वार्थ आदि से मुक्ति पा ली जाये तो यह स्वतः बड़ी आसानी से सध जाता है. किसी भी आध्यात्मिक साधना में भी हमारे कृत्य या एक्शन का प्रमुख केंद्र अहं-निर्मूलन ही होता है. ..और अहं का निर्मूलन तभी संभव हो पाता है जब सत्संग और सत्साहित्य की मदद से हम मन में ईश्वरीय (नोबेल) गुणों की वृद्धि करते जाते हैं और उन गुणों को अपने दैनंदिन जीवन में हर पल, हर जगह, हर प्रसंग में 'निरंतर' उपयोग भी करते हैं. फिर धीरे-धीरे हमारा प्रत्येक कृत्य बेहतर से बेहतर होता चला जाता है. जब हम प्रकाशित होते जायेंगे तो अहं रूपी अंधकार भी क्रमशः कम होता चला जायेगा. अहं या किसी अन्य दुर्गुण रूपी अंधकार को मिटाने का यही सर्वोत्तम मार्ग है कि कोई प्रकाश-स्रोत प्रज्जवलित किया जाये. अंधकार को यूं ही धक्का मारने पर वो कभी भी नहीं जायेगा! अँधेरे का कोई स्रोत, स्विच या बटन नहीं होता जिसको ऑन-ऑफ किया जा सके लेकिन प्रकाश का स्रोत होता है. प्रकाश की अनुपस्थिति में ही अंधकार अपने पांव पसारता है. ...हमें परमेश्वर से साक्षात्कार इसलिए भी मुश्किल जान पड़ता है क्योंकि हम बिना किसी प्रकाश-स्रोत की मदद लिए अंधकार को भगाने की जुगत करते रहते हैं.

(३) आज अधिकांश लोग विश्वास से अधिक अंधविश्वास के शिकार क्यों नज़र आते हैं...? अधिकांश लोग अंधविश्वासों के शिकार हो कर ढोंगी बाबाओं के चक्कर में फंस जाते हैं!
इसके दो प्रमुख कारण हैं-- (१) मन में भरा असीमित लालच और सांसारिक इच्छाएं (ईश्वरभक्ति का दृष्टिकोण प्रायः 'सकाम' होना); (२) शिक्षा और जागरूकता की कमी! .....अधिकांश लोगों के मन में यह भ्रम होता है कि मंदिर के पंडित, पंडे, कथावाचक, बाबा, आदि बहुत ज्ञानी होते हैं तथा वे भगवान् और सामान्य जन के बीच सेतु (ब्रिज) का काम बखूबी कर सकते हैं! इसीलिए लोग "उपाय" पूछते हैं और वे बताते हैं! ...लोगों द्वारा सामान्यतः किन चीजों के उपाय पूछे जाते हैं- बच्चा (पुत्र) कब होगा, शादी कब होगी, नौकरी कब लगेगी, पैसा कब मिलेगा, व्यापार में घाटा कैसे कम होगा, मुनाफा कैसे बढेगा, वशीकरण के कुछ उपाय बताएं, मुकदमा कब छूटेगा, राहु-केतु-शनि आदि शांत कैसे होंगे, बीमारी कब जाएगी, अच्छे दिन कब और कैसे आयेंगे???? ...तथाकथित बाबा भी कुछ ऐसी लच्छेदार भाषा में सांत्वना देते हैं और उपाय बताते हैं कि सामने वाला निहाल हो जाता है (गुड सेल्समैनशिप), ...आपको लगने लगता है कि काम अब बना ही समझो! ..चूंकि हमारी समस्याओं में से अधिकांशतः साइकोलॉजिकल स्तर पर होती हैं तो वे तो बातें करते-करते ही काफी ठीक हो गयी प्रतीत होती हैं, शेष कुछ इसलिए ठीक हो जाती हैं क्योंकि कहकर ..भड़ास निकालकर हमारे दिल पर से बोझ काफी कम हो जाता है और अब हम हलके मन से समस्याओं से ठीक ढंग से लड़ सकते हैं, ...हम निर्भय होकर समस्याओं के सामने जाते हैं और जीत जाते हैं (निर्भय इसलिए हो जाते हैं क्योंकि बाबाजी ने सारा बोझ तो अब उपायों और भगवान् के ऊपर डलवा दिया)!!! ...बहुत बड़ा साइकोलॉजिकल ट्रीटमेंट है यह, लेकिन है तो आखिर धोखा ही!!! "उपायों" के माध्यम से वो खूब चूसते व लूटते हैं बुद्धुओं और लालचियों को! उनके फलने-फूलने का कारण हम और हमारी असीमित इच्छाएं ही हैं या फिर हमारा बुद्धू होना.

(४) समाज में बढ़ते व्यभिचार का मूल कारण क्या है...? सभी बुराइयों का मूल कारण केवल कलयुग को बताना कहाँ तक तर्कसंगत है...?
मुख्य कारण है हमारी तेजी से बदलती जीवनशैली के साथ नैतिक मूल्यों का गिरना. उन्नत देशों ने अपने नित-नवीन आविष्कारों से जो कुछ धीरे-धीरे एक बहुत लम्बे समय में हासिल किया, वो हमारे देशवासियों (विकासशील देशों) ने वैश्वीकरण के चलते एक ही झटके में एकाएक प्राप्त कर लिया. इसलिए हाजमा खराब हो गया हमारा! आज जो भी तकनीक, मोबाइल, इंटरनेट, आदि हम मुक्तहस्त से प्रयोग कर रहे हैं, उनमें से कितनों को ईजाद करने में हमारा योगदान रहा, और कितना प्रतिशत?! बना-बनाया मिल गया हमें तो टूट पड़े भूखों की तरह! "तकनीक और गैजेट्स को योग्य संस्कृति से प्रयोग ना कर पाना प्रथम कारण है बढ़ते व्यभिचार का." ..."अन्यों की संस्कृति का केवल काला पक्ष ही ग्रहण करना दूसरा कारण है बढ़ते व्यभिचार का." ..."कहने को बहुत व्यस्त, लेकिन व्यस्तता कहाँ, इसको टटोलें तो मिलता है तीसरा कारण बढ़ते व्यभिचार का." ..."खराब और उदासीन पेरेंटिंग चौथा बड़ा कारण है बढ़ते व्यभिचार का. (कहने को हम बच्चों को प्रवचन के जैसे बहुत से डू एंड डोंट्स बताते हैं, पर समानांतर रूप से कितना अमल हम खुद करते हैं!)." ...कलयुग या सतयुग कोई ऊपर से नहीं टपकता, एक संघ के नागरिकों की जीवनशैली ही इनका निर्माण करती है. और जो संस्कृति बदलती जीवनशैली के साथ नैतिक मूल्यों को सहेज नहीं पाती वह घोर कलियुग का सामना करेगी ही!

(५) बढ़ती धार्मिक हिंसा और आतंकवाद आज विश्व की सबसे बड़ी चुनौती हैं ...क्या आप इस विचार से सहमत हैं..? भारतवर्ष गत कई वर्षों से वर्षों से पाकिस्तान द्वारा फैलाये गए आतंकवाद का शिकार रहा है ...कल अमरीका में हुए आतंककवादी हमले में कई लोग मारे गए ...इस आतंकवाद का मज़हबी चेहरा कितना भयावह है!
जी हाँ..., मैं सहमत हूँ आपसे. ...परन्तु केवल पाकिस्तान का नाम लेना ही उचित न होगा, सम्पूर्ण विश्व में धार्मिक हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है. माना कि पहले लोग एक-दूसरे से परिचित नहीं थे, अन्य संस्कृतियों एवं सभ्यताओं से अपरिचित थे, तो अपनी-अपनी श्रेष्ठता का अहंकार होना स्वाभाविक था; सो अतीत में कभी ईसाईयों ने भी काफी धार्मिक हिंसा की, ...लेकिन समय बीतते ईसाईयों ने खुद को नियंत्रित किया किन्तु कुछ अन्य बड़े धर्म अपने अनुयायियों को आज तक सहिष्णु न बना पाए! ..दुनिया में इतने विकास और जान-पहचान के बाद भी किसी धर्मपंथ में धार्मिक असहिष्णुता, उन्माद या हिंसा का अभी भी होना उसके 'पिछड़ेपन' का द्योतक है. इसी कारण उनके लोग आज भी इतने अशिक्षित या/एवं गरीब हैं. ये अलगाववादी अपने कृत्यों के कारण स्वयं ही अन्य लोगों से अलग-थलग होते जा रहे हैं. कुछ समय बाद ये इतने अल्प व अलग-थलग हो जायेंगे कि इनके लिए अपने अस्तित्व की रक्षा करना भी मुश्किल हो जायेगा (उदाहरण के लिए - रोहिंग्या चरमपंथी और उनके मासूम बीवी-बच्चे - ..गेहूं के साथ घुन भी कैसे पिस जाता है, इसकी एक बानगी). .....वैसे धार्मिक हिंसा के अलावा अपना दादागिरी टाइप का वर्चस्व स्थापित करने की चेष्टा भी आतंकवाद या युद्ध का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है (उदाहरण- उत्तर कोरिया व तानाशाही प्रवृत्ति वाले कुछ अन्य राष्ट्र). ....लेकिन यह तय है कि आने वाले समय में पिछड़े व कट्टर धर्मपंथ तथा तानाशाही राष्ट्र एक भारी कीमत चुका कर विलुप्तप्राय हो जायेंगे.

(६) समाज में उचित बदलाव लाने के लिए पहल किसे करनी चाहिए - बड़े लोगों को या नवयुवकों को? समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए क्या सही मार्ग है?
नौजवानों और बड़ों, दोनों को पहल करनी होगी. अपने अहंकार को किनारे रखकर, शुद्ध रूप से केवल 'उचित' के लिए ही दोनों पीढ़ियों को एक-दूसरे से प्रेरित होने में तथा एक-दूसरे को प्रेरित करने में जी-जान लगानी होगी. उचित और अनुचित में भेद हम तब ही कर पायेंगे जब हम अपने (समाज के) कृत्यों का तटस्थ एवं शिक्षित दृष्टिकोण से आंकलन करेंगे. आधुनिक और विकसित होने की दुहाई देकर हम उन पुरानी मान्यताओं व मूल्यों को तिलांजलि नहीं देंगे जो आज भी हमें नैतिक रूप से स्थिर रखने में सहायक हैं. ..हां, उन पुरानी बेड़ियों को अवश्य काटेंगे जो हमारी सोच को आगे ले जाने में बाधक हैं. ...याद रहे कि समाज को 'बदलाव' नहीं बल्कि 'विकास' चाहिए, ..और 'विकास' के क्रम में कुछ वैसा ही रखना, कुछ नया जोड़ना और कुछ डिलीट करना आवश्यक होता है. लेकिन संजोते, जोड़ते या मिटाते हुए अहंकार-रहित विवेक का जागृत रहना अत्यावश्यक! इस निमित्त बेहतर दिशा सुनिश्चित करने के लिए नौजवानों के साथ जागरूक और खुले दिमाग वाले बुजुर्गों का खड़ा रहना भी जरूरी.

(७) हमारे पर्वों का वास्तविक महत्त्व कब पूरा होगा? आज पर्वों के नाम पर केवल पैसे की बर्बादी और शोरगुल ही रह गया है ...क्यों?
हमारे पर्वों का वास्तविक उद्देश्य तब ही पूरा होगा जब वे हमें भीतर से और अधिक पवित्र, सहिष्णु तथा 'उचित' बना पाएं. ..किसी भी धार्मिक कृत्य या पर्व आदि की सार्थकता तब ही है जब वह हमारा आन्तरिक भाव बदलने या बेहतर करने में सक्षम हो, ..अन्यथा पुनर्विचार की आवश्यकता.  ...साल दर साल बढ़ते शोरगुल और पैसे की बर्बादी को देखते हुए तो इनके प्रासंगिक होने पर ही एक बड़ा सा प्रश्नचिह्न लग गया है! मुझे तो पर्व मनाने में विकृतियों का एक ही कारण समझ में आ रहा है कि धर्मगुरुओं द्वारा उचित एवं प्रासंगिक धर्मशिक्षा के अभाव में लोगों के विश्वास का खोखला हो जाना! अब पर्वों को वे मात्र "परिवर्तन और मनोरंजन" (चेंज और एंटरटेनमेंट) के रूप में मनाते हैं, और इन पर्वों में जो पूजा-अनुष्ठान आदि होते हैं, यंत्रवत करते हुए उनमें भी भगवान् से धन-यश आदि की गुजारिश वे कर लेते हैं कि शायद भगवान् खुश होकर उन्हें कुछ यूँ ही दे दें!

(८) आज समाज बदल रहा है या बुराइयों की गर्त में जा रहा है...? आधुनिक समाज तेजी से बदल रहा है जिसमें अनेकों बुराइओं का समावेश चिंता का विषय बन गया है ...आप भी अपने विचारों द्वारा इस बदलते सामाजिक परिवेश पर चर्चा करें.
अजी हमारे स्पीकिंग ट्री पर ही नजर दौड़ा लें! आध्यात्मिक कहा जाने वाला यह मंच कितने ही मसालेदार व्यंजनों से भरपूर है. प्रसिद्ध ब्लॉग देखिये, प्रसिद्ध स्लाइड शो, या टॉप ट्रेंडिंग चर्चा, किसका ट्रेंड चल रहा है और कौन प्रसिद्ध है, इसको देखने से साफ पता चलता है कि हमारी मानसिकता क्या हो गयी है! आगे किसी अन्य चर्चा या स्पष्टीकरण की आवश्यकता है क्या???!

(९) हम नित्यप्रति ज्ञान के बड़े बड़े सन्देश सुनते या पढ़ते हैं किन्तु व्यवहार में बदलाव क्यों नहीं ला पाते...?
यदि हम ज्ञान को व्यवहार में नहीं लायेंगे तो किसी भी सकारात्मक बदलाव की अपेक्षा रखना व्यर्थ होगा. विश्व में जहाँ कहीं भी ज्ञान को सकारात्मकता के साथ आचरण में समाहित किया गया वहां-वहां समाज (संघ) का ठोस विकास हुआ है. ....वैसे हमें प्राप्त ज्ञान की गुणवत्ता हमारी जिज्ञासाओं में भी प्रतिबिंबित होती है! हमारे देश के बीसियों धार्मिक चैनलों पर ज्ञान के बड़े-बड़े सन्देश हमारी बुद्धि को कहाँ ले जा रहे हैं इसके उदाहरण के लिए नीचे क्रमांक (१०) से (१२) पर पूछी गयी जिज्ञासाओं को देखें.

(१०) क्या किसी से पैन गिफ्ट में लेना चाहिए या नहीं, मैने मेरी छोटी बहन से कहकर पैन आस्ट्रेलिया से मंगवाया है, यदि यह गलत है तो ऐसा क्या करें जिससे हम दोनों में किसी को भी बुरा प्रभाव न हो!?
हद हो गयी भाई अंधविश्वास की!!! पेन रख सकने वाले और आस्ट्रेलिया तक जा पहुंचे आप जैसे पढ़ेलिखे लोग भी ऐसी बात करेंगे, यकीन नहीं हो रहा!! सही में हम ****** हैं!

(११) रात में श्वान का भौंकना अच्छा होता है या फिर बुरा?
श्वान की तो जबान, बोली, भाषा ...सबकुछ भौंकना ही है!! हाँ कभी-कभी वो अजीब सी आवाज में रोते भी हैं, उसका जरूर टेढ़ा अर्थ निकलते हैं कुछ लोग! ..ऐसे तो बिल्लियाँ भी म्याऊं म्याऊं करने के अलावा कभी-कभी रोती भी हैं!! सभी पशुओं के साथ ऐसा होता ही है. पर हमारे आसपास चूंकि कुत्ता-बिल्ली जैसे जानवर ही प्रायः पाए जाते हैं इसलिए हम सिर्फ उन्हीं की हरकतें देख पाते हैं. "कुत्ता रात में उन अजनबियों को देखकर भौंकता है जो आमतौर पर उससे परिचित नहीं होते." सावधान! उन्हें वो काट भी लेता है! ..अब कुत्ते का यह भौंकना आपके लिए बुरा है या अच्छा, यह तो इसपर निर्भर करता है कि कुत्ते के लिए अजनबी वह शख्स आपका कोई नाते-रिश्तेदार है या कोई चोर-उचक्का!

(१२) गाय का घर के दरवाजे पर आकर रम्भाना क्या संकेत लेकर आता है?
स्पष्ट संकेत है कि गाय भूखी है, कुछ भोजन चाहती है; ..वैसे हम लोग आड़ा-तिरछा सोचकर बहुत सारे अन्य अर्थ भी निकाल सकते हैं!

(८४) चर्चाएं ...भाग - 3

(१) ध्यान किसका करें और कैसे करें? ध्यान की सरल विधि क्या है? ध्यान करने वाले का ध्येय क्या होना चाहिए? हम सभी देखते हैं कि, दुनिया में ध्यान करने की विधियां बहुत हैं, कोई दृष्टि को एक लक्ष्य पर केंद्रित करना ध्यान समझता है, कोई मन में कोई भी संकल्प ना उठे उसे ध्यान कहता है, कोई प्राणायाम को ध्यान समझता है, कोई कुण्डलिनी जागरण को ध्यान की विधि कहता है, कोई खेचरी मुद्रा जैसी अनेक मुद्रा में बैठने को ध्यान कहता है, आखिर ध्यान की अतिसरल विधि क्या है और श्रेष्ठतम ध्यान कौन सा है?
अध्यात्म का एक मूलभूत सिद्धांत है कि -- "जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियाँ (स्वभाव, संस्कृति, सभ्यता, माहौल), उतने ही साधना-मार्ग!" ...ध्यान का अर्थ है-- "मन में चलने वाले विचारों से मुक्त होकर आत्मा (या परमात्मा) से जुड़ना!" ...मेरे विचार से देश-काल-परिस्थिति-संस्कृति-धर्मपंथ-विश्वास आदि के अनुसार ध्यान के बहुत से तरीके हो सकते हैं. किसी एक व्यक्ति के लिए जो विधि बहुत सरल हो, वह किसी अन्य के लिए बहुत कठिन या बेअसर भी हो सकती है! मेरे विचार से खरी एवं वास्तविक ध्यानावस्था में आने के लिए व्यक्ति का भाव, तीव्र जिज्ञासा और तड़प ही महत्वपूर्ण हैं! ...और फिर समुचित अभ्यास और अभ्यस्त हो जाने के पश्चात् व्यक्ति जागते, सोते और कोई काम करते समय भी समानांतर रूप से अनवरत ध्यानावस्था में रह सकता है! इस अवस्था में वह अधिकांशतः आनंदित रहता है तथा उसके द्वारा किये गए लगभग सभी कार्य निष्पक्ष और न्यायसंगत होते हैं. ध्यान का ध्येय भी यही होना चाहिए.

(२) जीवन को व्यवस्थित और अनुशासित कैसे किया जाए...? आज की पीढ़ी में बढ़ती अनुशासनहीनता सबसे बड़ी समस्या है.
आपने आज की पीढ़ी की बात की, यानी नयी पौध की! पुराने अर्थात् पिछली पीढ़ियों के लोग ही माली बनकर नयी पौध को पोषक वातावरण प्रदान करते हैं. उनके कोरे कागज समान मन पर हम ही वो इबारत लिखते हैं जिन्हें मूलभूत संस्कार कहते हैं. नयी पीढ़ी में आज यदि कहीं अनुशासनहीनता दिखाई दे रही है तो हमारे द्वारा दिए गए वैचारिक पोषक वातावरण, जिसका जूस पीकर वे बड़े हो रहे हैं ..उस पर विचार करने की आवश्यकता है!!! हमें पुनः नजर दौड़ाने की जरूरत है हमारे द्वारा दिए जाने वाले मूलभूत संस्कारों या वैचारिक पोषक वातावरण पर!!! हम यह सब उपदेश के रूप में दे रहे हैं या खुद अमल करके एक उदाहरण के रूप में!? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम स्वयं अव्यवस्थित और अनुशासनहीन हों या परेशान, उद्विग्न या अशांत मन हों और आगामी पीढ़ी को व्यवस्थित, अनुशासबद्ध और शांत होने का पाठ पढ़ा रहे हों!!? अपने निजी और प्रैक्टिकल अनुभवों के आधार पर मेरा तो बहुत मजबूती से यह मानना है कि हमारे आसपास की दुनिया चाहे जितनी भी खराब हो, लेकिन यदि हम अपनी संतान को पर्याप्त समय तथा सर्वोत्तम बुनियादी संस्कार देने की ईमानदार कोशिश करें (खुद भी अमल करते हुए) और वह भी रीजनिंग (कार्यकारणभाव) समझाते हुए, पूरी निष्पक्षता व प्रोग्रेसिव दृष्टिकोण रखते हुए, ...तो फिर वह संतान आजीवन अडिग रहती है, चाहे जीवन में कितने भी झंझावात आ जायें; वह हर माहौल में खुद की राइटियचनेस (अच्छाई रूपी धर्म) को बरकरार रख सकती है.

(३) मन में निरंतर विचार आने से मन बैचैन और व्यथित रहता है ...इस का किस प्रकार निरोध किया जाए..? अपने मन को शांत कैसे करें...?
एक चंचल बच्चा जब बहुत उधम काट रहा होता है और उससे सारे घर वाले परेशान हो जाते हैं, तो उसे नियंत्रित करने का केवल एक ही कारगर उपाय होता है कि उसे किसी ऐसे काम में लगा दो जो उसकी रूचि का भी हो और साथ ही सार्थक व कंस्ट्रक्टिव भी हो! बच्चा उसमें रूचिपूर्वक व्यस्त हो जायेगा और नकारात्मक शरारतें छोड़ देगा! ...मन भी एक बच्चे समान ही है; जब तक उसके सामने कोई रचनात्मक और सार्थक लक्ष्य नहीं होता, वह व्यर्थ के विचारों में भटकता रहता है! ...अधिकांश काउंसलर कहते हैं कि पहले मन शांत करो फिर कोई काम हाथ में लो; लेकिन मैं कहता हूँ कि किसी भी बिंदु से अपनी इच्छा व रूचि अनुसार किसी सार्थक काम को शुरू करो, ..मन में सकारात्मकता आनी शुरू जाएगी, मन शांत होता चला जायेगा! उदाहरण के लिए- वह कार्य अपने प्रियजनों के लिए गरमागरम स्वादिष्ट पकोड़े या नाश्ता आदि बनाना भी हो सकता है! कहने का अर्थ यह कि खुद को किसी ऐसे काम में व्यस्त कर लें जो रचनात्मक हो, आपकी रूचि का भी हो, साथ ही वह काम आपको कुछ अचीवमेंट का एहसास कराये! अपने किसी प्रियजन के किसी बहुत छोटे से काम में भी उसकी बहुत थोड़ी सी हेल्प करके भी हम अचीवमेंट को अनुभूत कर सकते हैं, शर्त यह कि यदि हम इस प्रकार का प्रयास रोज या अक्सर यानी नियमित रूप से करें!

(४) मन को कैसे जीता जाए? मन ही उत्थान व पतन का कारण है!
मन में कुछ सकारात्मक विचारों को डालकर ही हम मन को साध सकते हैं! सकारात्मक विचार यदि न डल पा रहे हों तो हठपूर्वक (यानी दूषित मन के विपरीत) कोई सकारात्मक कार्य ही करना शुरू करें एवं सुखद अचीवमेंट को अनुभूत करें, अब तो अवश्य ही सकारात्मक विचार जन्म लेने लगेंगे!

(५) अधिकाँश लोग जीवन में ख़ुशी की तलाश में समय व्यर्थ कर देते हैं, क्यों..? क्या ख़ुशी ढूंढ़ने से मिल सकती है...?
देखा जाये तो हर एक व्यक्ति प्रसन्न या खुश रहना चाहता है. सभी अपने-अपने ढंग से खुशियाँ ढूंढने की कोशिश करते हैं. किसी को वह कोई अमुक कार्य करने पर मिलती है तो किसी को कोई अन्य काम करने में! भीतर से खुश रहना चूंकि इस मानव जीवन का प्रमुख उद्देश्य भी है अतः खुशी को ढूंढना व्यर्थ कदापि नहीं! ...और खुशी मिलती भी है! यह अलग बात है कि बहुतों को मिली खुशी क्षणिक या अस्थाई होती है क्योंकि खुशी पाने के क्रम में उनके द्वारा चुने एवं किये गये कार्य का चुनाव या तो सही नहीं होता या फिर वे इसे ठीक ढंग से (परिपूर्णता से/मन लगाकर/लगन से) करते नहीं हैं. पढ़ाई की दृष्टि से या जीविकोपार्जन की दृष्टि से या घरेलू गृहणी होने की दृष्टि से अधिकांशतः चुनने के लिए हमारे पास कुछ सीमित विकल्प होते हैं, उन्हीं के इर्दगिर्द हमारे प्रयास (कार्य/कर्म) होते हैं. ....तो उन्हीं विकल्पों में से कुछ/किसी को चुनकर हम कार्य करना आरंभ करते हैं. ..पश्चात् उस/उन कार्यों से हमें दीर्घकालिक खुशी इसलिए नहीं मिल पाती क्योंकि कुछ समय व्यतीत होते-होते उस चुने हुए कार्य में हमारी एकाग्रता और समर्पणभाव कम होने लगते हैं. हमारा मन अन्यत्र भटकने लगता है. हम अन्य एवं ज्यादा प्रलोभनों में पड़ते जाते हैं, और श्रम भी कम करना चाहते हैं. ..यदि श्रम अधिक भी करते हैं तो अधिक भौतिक रिटर्न के लालच में. इस स्थिति में काम के प्रति हमारा मूल उद्देश्य (खुशी पाना) कहीं खो जाता है. यानी अब हम उस काम को एन्जॉय नहीं कर रहे होते! जब तक हम किसी चुने हुए या किसी द्वारा सौंपे गए काम को एन्जॉयमेंट की फीलिंग के साथ नहीं करेंगे तब तक खुशियाँ हमसे दूर ही रहेंगी. हम भटकते ही रह जायेंगे उन्हें हासिल करने के लिए! ....सारांश में पुनः, ....स्वेच्छा से चुना हो या मज़बूरी में ही मिल गया हो कोई कार्य, ..और उसे करना आवश्यक या अनिवार्य सा प्रतीत हो रहा हो, तो यदि हम उस कार्य को पूरी तरह से मन रमा कर, लगन से, समर्पणभाव से और कर्तव्य समझकर करेंगे तो अवश्य ही हमें सफलता मिलेगी और गहरी खुशी भी!! यही तो अध्यात्म का भी एक सिद्धांत है-- "समक्ष आए प्रत्येक कार्य को कर्तव्य समझकर करो!" कार्य कोई सा भी हो सकता है, कार्य कभी छोटा या बड़ा नहीं होता. (नोट:- वस्तुतः चिरस्थाई खुशी या आनंद किसी भजन-कीर्तन, सत्संग, योगाभ्यास, धार्मिक अनुष्ठान आदि में नहीं छुपी! बल्कि इन सब से हमें प्रेरणा मिलती है हर समक्ष आए प्रत्येक काम को 'साधना' समझकर करने की! अध्यात्म तो अपने आम जीवन में उतारने का, अमल करने का शास्त्र है).

(६) भगवान् एक दिव्य माँ हैं अथवा पिता?
एक बच्चे के 'योगक्षेम' हेतु यद्यपि एक माँ की बहुत बड़ी भूमिका होती है लेकिन पिता का सहयोग मिलकर ही वह योगक्षेम 'पूर्ण' होता है. अतः भक्त की आवश्यकतानुसार भगवान् कभी माँ रूप में होते हैं तो कभी पिता रूप में! परन्तु वास्तव में वो लिंगभेद से परे हैं.

(७) भगवान है या नहीं?
भगवान् तो अनुभव या अनुभूति का विषय हैं. जिसको यह होती है उसके लिए हैं, जिसको नहीं होती उसके लिए नहीं. विश्वास या अविश्वास से किसी का कुछ बनता या बिगड़ता नहीं है! हाँ, विश्वास होने से हमारे मन-मस्तिष्क पर कुछ लगाम लगी रहती है, हम गलत करने से डरते हैं; ..और अविश्वास की दशा में हम निरंकुश हो जाते हैं! सही या गलत करने से ही हमारा कुछ बनता या बिगड़ता है.

(८) कौन से लोग ऐसे हैं जो भगवान् के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं...? जब कण कण में वह व्याप्त है तो फिर ऐसे विचार क्यों...?
भगवान् के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने वाले आज के जिज्ञासु और भविष्य के साधक हैं! गहरा ज्ञान पाने की शुरुआत क्रॉस-क्वेश्चनिंग से ही होती है. स्कूल-कॉलेज की भी किसी कक्षा में असहमत, असंतोषी और बहुत से बुनियादी प्रश्न करने वाला विद्यार्थी ही बहुत आगे तक जाता है.

(९) आत्मा-परमात्मा क्या कल्पना मात्र हैं?
आपका कहना कुछ हद तक बिलकुल सही है! चमत्कारी प्रकृति के रहस्यों और उसके अकाट्य सिद्धांतों को समझने के लिए विज्ञान में और अनेक सवालों को सुलझाने हेतु गणित विषय में भी हम अनेकों परिकल्पनाओं का सहारा लेते हैं. तो अध्यात्म विषय भी एक प्रकार का शास्त्र (विज्ञान) ही है- "सूक्ष्म का शास्त्र"! ..तो इसमें भी चमत्कारी जीवन से सम्बंधित रहस्यों और उसके अकाट्य सिद्धांतों को समझने-सुलझाने के लिए आत्मा, परमात्मा जैसे शब्दों द्वारा कल्पनातीत की कल्पना की गयी है. बिलकुल वैसे ही जैसे- ..कुछ अदृश्य सा झोंका आता है और मेज पर रखे सभी पन्ने उड़ जाते हैं, हमने उस शक्ति का नाम 'वायु', 'हवा', आदि रख दिया! इसी प्रकार जिसमें जीवन के मूलस्रोत का आभास हो रहा है/होगा, उसका नाम अध्यात्मशास्त्रियों ने 'आत्मा' रख दिया; ...और इस स्रोत का भी जो बड़ा स्रोत है, जिसमें से यह स्रोत उपजा है/होगा, उसका नाम 'परमात्मा' कल्पित कर लिया! हो सकता है कि विश्व में किसी अन्य भाषा, संस्कृति या सभ्यता के लोगों ने अपनी खोज-यात्रा में किन्हीं अन्य नामों की कल्पना की हो!

(१०) कलयुग में भगवान् में आस्था कम होने का मुलभुत कारण क्या है...? क्या शायद इसी लिए पाप कर्मों में भी निरंतर वृद्धि हो रही है!?
भगवान् में आस्था कम होने के कुछ कारण-- (१) अहंकार का बहुत बढ़ जाना, (२) अहं के कारण यह भ्रम होना कि मनुष्य सिर्फ देह है, (३) यह समझना कि देह और इसमें उपस्थित मस्तिष्क ही सर्वगुणसंपन्न और सर्वशक्तिशाली है, (४) विज्ञान द्वारा खोज निकाले गए सिद्धांतों की परिधि से भी स्वयं को बाहर मानना, (५) धर्मों (पंथों) में व्याप्त विभिन्न अंधविश्वासों से उकता जाना, (६) वर्तमान आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा आध्यात्मिक शिक्षा को स्वयं ही अपने आचरण द्वारा ना प्रकट कर पाना, (७) अध्यात्म, धर्म या भगवान् आदि शब्दों की व्याख्या आधुनिक समयानुसार प्रासंगिक या सर्वथा स्पष्ट ना होना, (८) धार्मिकता (अच्छेपन) को कायम रखने के लिए आध्यात्मिक या धार्मिक शिक्षा में समयानुसार किसी भी सकारात्मक परिवर्तन का साहस किसी में भी ना दीखना (लकीर के फ़क़ीर बने रहना), (९) इन सब कारणों से लोगों का धर्म के प्रति उदासीन एवं निष्क्रिय होना, (१०) वर्तमान धर्मगुरुओं की भी अकर्मण्यता, उदासीनता व मात्र दिखावटी प्रदर्शन से आमजन में जिज्ञासा और जानने की 'निष्काम' तड़प अब दुर्लभ होना, (११) जब जिज्ञासा, पर्याप्त तड़प आदि नहीं तो भगवान् सम्बन्धी ज्ञान का खोखला होना, ...और जब ज्ञान उथला तो विश्वास का 'टिकाऊ' होना कैसे संभव?! ....इन्हीं सब कारणों से आज 'धर्म' (सही सोच, सत्य, न्याय, अच्छापन आदि) की भारी हानि हो रही है और पाप व भ्रष्टाचार बढ़ रहे हैं.

(११) मुझे परमात्मा से साक्षात्कार करना है मैं क्या करूं?
मैं कोई गुरु नहीं अपितु आप ही की भांति कदाचित् एक साधक ही हूँ. अपने अनुभव व अनुभूति के आधार पर, ....चिरपरिचित सोलह अक्षर के महामंत्र का अपने खाली समय में प्रतिदिन कुछ देर तक सस्वर पाठ करें- "हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ; हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे". ...लय लाने के लिए राम को रामा और कृष्ण को कृष्णा उच्चारित किया जा सकता है. ...स्वयंभू गुरुओं, दिखावटी सत्संगों और कोरी भावुकता से बचें. गीताप्रेस, गोरखपुर के संस्थापक/लेखक दिवंगत श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार जी एवं स्वामी विवेकानंद जी का साहित्य पढ़ें, ..पर्याप्त रहेगा. .....तथा बहुत महत्वपूर्ण यह कि, अपने व अपने घर वालों से जुड़े प्रत्येक कार्य को कर्त्तव्य (साधना) समझकर करें. ...कहा गया है, "योगः कर्मसु कौशलम्", अर्थात् कुशलता से किया गया प्रत्येक कार्य ही योग (ईश्वर से जुड़ना) है!

Tuesday, October 10, 2017

(८३) चर्चाएं ...भाग - 2

(१) भगवान एक हैं - फिर भी लोग इस बात को क्यों नहीं समझ पाते?
इसका एक ही कारण दिखता है कि धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में हम सभी पंथों के लोग वर्षों से एक ही स्थान पर रुके हुए हैं, विज्ञान के क्षेत्र में हम व्यापक होकर कहाँ से कहाँ पहुँच गए परन्तु धर्म के क्षेत्र में हम अभी भी कुंए के मेंढक हैं. धर्म और ईश्वर आखिर हैं क्या, और क्यों, आपस में लड़ने से पहले इस पर कभी विचार कभी किया हमने!? "धर्म" अर्थात् ऐसा योग्य आचरण अथवा कार्य, जो हमें वाह्य (भौतिक) एवं आन्तरिक सुख प्रदान करा सके. श्रेयस्कर आचरण कौन सा है, इसे निर्धारित करने का कार्य मानवीय बुद्धि का नहीं, बल्कि केवल एक दिव्य अलौकिक शक्ति (सार्वभौमिक परमात्मा) का है, ऐसा सभी पंथ मानते हैं. ..यदि हम यह मानते हैं कि सभी धार्मिक पंथों का ईश्वर एक ही है और वह वही दिव्य अलौकिक शक्ति है, तो फिर उनके धर्मग्रंथों में दी गयीं नीतियों और आदेशों में भिन्नता क्यों, ईश्वर के नाम भिन्न क्यों? हास्यास्पद यह कि सभी के धर्मगुरु कहते हैं कि उनके पंथ का धर्मग्रन्थ और ईश्वर ही प्रामाणिक है; अन्य सब निम्न श्रेणी के या झूठे हैं! वस्तुतः प्रत्येक पंथ के शीर्ष स्तर पर जब ऐसी सोच या मनोवृत्ति होती है, तब परस्पर धार्मिक या पंथिक द्वेष जन्म लेता है. यही द्वेष विश्व भर में फैली अनेक बुराइयों एवं वैमनस्य की जड़ है. बिना यह समझे कि यह भिन्नता क्यों है, अपने-अपने ईश्वर और धर्मग्रन्थ को ही श्रेष्ठतम कहने का दावा करना अहं-सूचक है. वस्तुतः विश्व के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग ढंग से मानव सभ्यता का क्रमिक विकास हुआ. तब यातायात के इतने साधन उपलब्ध न होने से लोग अपने-अपने क्षेत्रों, कबीलों और संघों तक ही सीमित रहते थे. यही तो मूल कारण था कि भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का निर्माण हुआ एवं एक-दूसरे की बात समझने-समझाने के लिए असंख्य भाषाओँ का भी क्रमिक उदय एवं विकास हुआ. ..विकास के इस क्रम में सभी समुदायों में अच्छाई भी उभरी और बुराई भी. मूलतः आत्मिक प्राणी होने के कारण सभी संघों के तत्कालीन प्रबुद्ध, अग्रणी और नेतृत्व-क्षमतावान चुनिन्दा जनों को अच्छाई यानी "धर्म" का महत्त्व समझ में आया; और फिर उन्होंने अपने लोगों को "योग्य आचरण" यानी धर्म के मार्ग पर प्रवृत्त करने लिए स्थान-काल-परिस्थिति अनुसार, तत्कालीन लोगों के विवेक, बुद्धि, भाषा और संस्कृति अनुसार, कुछ नियम और आज्ञाएं लिखीं, बताईं या लागू कीं. ... निराकार सार्वभौमिक परमेश्वर को भी शब्दों के माध्यम से कुछ-कुछ समझाने की कोशिश की. ...समझने में सुविधा और श्रद्धा के सरल निर्माण हेतु देश-काल-संस्कृति-परिस्थिति अनुसार कालांतर में ईश्वर के विभिन्न सगुण रूपों का भी उदय हुआ. समय-समय पर किसी संघ में बुराई के अत्यधिक बढ़ जाने पर उस काल के किसी योग्य, न्यायप्रिय व साहसी ने अवतार रूप में दुष्टों का संहार करके आम जन को राहत पहुंचाई एवं लोककथाओं में अपनी उपस्थिति सदैव के लिए दर्ज की (आध्यात्मिक दृष्टि से हम सब भी तो छोटे-छोटे अवतार ही तो हैं). इतिहास गवाह है कि विभिन्न देशों के व्यक्तियों ने जब लम्बी यात्राएं की, तो उन्हें अन्य देशों व संस्कृतियों के बारे में पता चला. यही कारण है कि प्रत्येक समुदाय व संघ के ईश्वर एवं धार्मिक ग्रन्थ भिन्नता लिए हैं! सिर्फ भारत में ही कितनी अधिक भाषाएँ, सभ्यताएं, संस्कृतियाँ, ईश्वर के नाम एवं रूप हैं तो सम्पूर्ण विश्व के बारे में जरा सोचिए! ...अरे, इतना जानने के बाद भी धर्म के नाम पर लड़ने वाले संकुचित, खोखले और पिछड़े हैं भीतर से! ....परमेश्वर अर्थत ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च सत्ता को जानने-समझने के लिए विभिन्न उपासना पद्धतियाँ, धार्मिक कृत्य, कर्मकांड आदि सब एक प्रकार से माध्यम ही हैं उस तक पहुँचने का; ये सब लोगों की संस्कृति का ही एक हिस्सा हैं, तभी तो ये स्थान एवं जाति अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं! ...बस एक ही चीज पूरे संसार में, सब लोगों में, सब पंथों में, समुदायों में एक सी पाई जाती है, वह है एक सर्वोच्च अद्भुत शक्ति को मान्यता; जो अदृश्य व निराकार है, परन्तु हर जगह विद्यमान है! ...एक और चीज पूरे संसार में, सब लोगों में, पंथों में एक सी पाई जाती है, वह है- यथासंभव श्रेष्ठ (सर्वमान्य, सार्वभौमिक) नैतिक मूल्यों को अपनाना. ....तथापि एक चीज अस्थाई है और सब जगह अलग-अलग पाई जाती है, वह है- ईश्वर के विभिन्न नाम, रूप, उपासना पद्धतियाँ, ..यानी अलग-अलग संस्कृतियाँ!!! ...अब लोग ही फैसला करें कि 'सिद्धांत' रूपी 'धर्म' बड़ा है या 'संस्कृति' रूपी 'धर्म'!!! 'लौकिक धर्म' के नाम पर आपस में लड़ने वाले बहुत से लोगों को अभी यह भी ज्ञात नहीं होगा कि अध्यात्म आखिर है क्या???? अध्यात्म वह है जो हमें 'सिद्धांत' रूपी 'धर्म' से परिचित कराता है!

(२) भगवान् ने कभी नहीं कहा कि मेरी पूजा करो फिर भी लोग करते हैं क्यों? हम अक्सर देखते है कि लोग अपना काम वगैरह छोड़कर मंदिर में जाते हैं, खुद तो जाते हैं अपने छोटों को भी ले जाते है चाहे इसके लिए उन्हें उनके काम से वंचित क्यों ना करना पड़े, कहते हैं पुण्य मिलेगा, भगवान् आपकी सहायता करेगा कैसे?
परमात्मा के गुणों को अपने भीतर विकसित एवं दृढ़ करने के लिए तथा चंचल मन के विरुद्ध जाकर 'धर्म' यानी अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा व ऊर्जा पाने के लिए एक सामान्य व्यक्ति को कुछ ध्यान-स्मरण आवश्यक होता है. परमात्मा तो अदृश्य व निराकार है, तो समझने में सुविधा और भाव के सरल निर्माण हेतु प्रत्येक समाज के प्रबुद्धों ने अतीत में देश-काल-संस्कृति-समय एवं तत्कालीन लोगों की बुद्धि-विवेक अनुसार ईश्वर के विभिन्न सगुण रूपों की आराधना आरंभ की. आशय नेक था और वह केवल यही था कि तत्कालीन आम लोग प्रेरित होकर यथासंभव योग्य आचरण करें. ...संस्कृति-अनुसार प्रेरणा पाने का यह अद्भुत तरीका कालांतर में एक रूढ़िवादी सभ्यता में परिवर्तित हो गया! ...अब लोग बस पूजा-पाठ करते हैं, पूछो क्यों करते हैं, तो विरले ही यह जवाब सुनने को मिलेगा कि 'ईश्वरीय गुणों को आत्मसात करने के लिए'!!! समय के साथ हमने पूजा-अर्चना करने का लक्ष्य बदल दिया, बहुधा अब वह 'सकाम' है! परमेश्वर भी अवश्य खिन्न होंगे यह सब देखकर! ...पर फिर भी वह कुछ नहीं करेंगे, ...करेंगे तो उनके नियम, सिद्धांत व अनोखी स्वचालित न्याय-व्यवस्था!

(३) पाप और पुण्य का भेद समझना मुश्किल क्यों हो जाता है....?
ऐसा कर्म जिससे 'धर्म' (नैतिकता द्वारा अनुमोदित न्याय, सही बात, निर्दोष) की रक्षा हो, केवल वह ही करने योग्य है. ....ऐसा विचार या कर्म, जो शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, या आध्यात्मिक, इन चार रूप से किसी को (स्वयं या/और अन्य किसी को) नुकसान पहुंचाए, वह गलत (पाप) होगा, ...शेष सब सही!!! ...केवल किसी आपातकाल में (अर्थात् उपर्लिखित परिभाषित 'धर्म' के संकटकाल में), केवल धर्म (सत्य) की रक्षा और पुनर्स्थापना हेतु किसी को उपरोक्त चार तरह से आहत भी करना पड़े, तो वह कोई पाप नहीं, ....लेकिन ध्यान रहे कि कार्य संपन्न होते ही यानी सत्य की रक्षा होते ही तुरंत 'सामान्य धर्म' में लौटना अत्यंत आवश्यक, अन्यथा व्यक्ति गंभीर पाप का भागी होगा. अधिकांशतः हमें 'सामान्य धर्म' का अनुपालन ही करना होता है.

(४) अध्यात्म से जुड़ने का सही अर्थ क्या है...? लोग गलत बाबाओं के पास जा कर आध्यात्मिक होने की गलतफहमी पाल लेते हैं...!
अध्यात्म वह है जो "सिद्धांत" रूपी "धर्म" से हमारा परिचय कराता है. हमारी आत्मा उस धर्म से सराबोर है; या यह भी कहें कि आत्मा, साक्षात् धर्मस्वरूप ही है तो भी यह कोई अतिशयोक्ति वाली बात नहीं! किसी स्थूल गुरु या मार्गदर्शक से हमें केवल कुछ ऊपरी दिशा-निर्देश मिल सकते हैं, पर यात्रा तो हमें अपने प्रयासों से ही करनी होती है. ..लेकिन अज्ञानतावश लोग किसी गुरु या बाबा को ही सबकुछ (ईश्वर तक) मानकर अपना सबकुछ उसपर लुटा देते हैं. स्मरण रहे कि एक खरे गुरु को भौतिक लालसाएं छू भी नहीं सकतीं और वह बहुत साधारण जीवन व्यतीत करते हैं, बिना औपचारिकताओं के वह सबको सहज उपलब्ध रहते हैं. ..वह शिष्यों की भीड़ लगाने में विश्वास नहीं करते.

(५) आज देश अनेकों चुनौतियों का सामना कर रहा है ...आपके विचार में सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती कौन सी है? देश में गरीबी, बेरोज़गारी, बढ़ती असमानता, धार्मिक असहिष्णुता, रिश्वतखोरी प्रमुख है.
अच्छा मुद्दा उठाया आपने. आपने हमारे समक्ष खड़ी मौजूदा चुनौतियों के कुछ उदाहरण भी दिए! लेकिन मुख्य प्रश्न आपका यह है कि "सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती कौन सी है?" समस्या की जड़ में जाना हो तो कुछ खोदकर जड़ को ढूंढना आवश्यक. ...समस्या रूपी पेड़ की कुछ टहनियां या कुछ पत्ते काटने-छांटने से पेड़ नष्ट नहीं होगा, जड़ पर प्रहार करना होगा! ...मेरे विचार से देश में (दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड़कर) जहाँ भी गरीबी, बेरोजगारी, रिश्वतखोरी, असमानता, धार्मिक असहिष्णुता आदि जैसी समस्याएं हैं, उनकी जड़ में वहां के समाज (अभिजात वर्ग और अगुवाओं सहित) में व्याप्त नैतिक पतन है! ..कई बुद्धिजीवी कहेंगे कि "गरीब या बेरोजगार से नैतिकता की उम्मीद क्यों करते हो भाई!?" ...जी हाँ, ..बिलकुल सही बात है आपकी, मेरे विचार से भी नैतिकता की उम्मीद सदैव ऊपर (राजा, मंत्री, पुलिस, वकील, डॉक्टर, अभिजातवर्ग, व्यवसाई, नौकरीपेशा आदि) से ही आरंभ होनी चाहिए. ...क्या वहां पर्याप्त नैतिकता है????? लगभग सभी किसी न किसी प्रकार से किसी न किसी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं! कल की खबरों में एक खुलासा देखा कि उत्तरप्रदेश की अनेक ग्रामीण सरकारी पाठशालाओं में नियुक्त अध्यापकों ने भाड़े पर टीचर रखे हुए हैं (खुद हजारों रुपए प्रति माह वेतन लेकर केवल कुछ सौ रुपयों पर)!!! कहीं किसी अध्यापिका का पति ही भाड़े पर लगा है, कहीं मिड डे मील का रसोइया, कहीं सफाई कर्मचारी की बेटी, तो कहीं आंगनबाड़ी वाली महिला एक्स्ट्रा पार्ट-टाइम जॉब के रूप में नियुक्त कर रखी है. बढ़ती दुर्घटनाओं से चिंतित रेलवे का भी एक फैसला पढ़ने में आया कि फ़ील्ड-वर्क (जैसे खलासी, लाइनमैन आदि) के पद अब बहुत उच्चशिक्षा प्राप्त अभ्यर्थियों से नहीं भरे जायेंगे! ..क्योंकि उन्हें काम करने में शर्म आती है, और वे अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं करते! कुछ ऐसा ही नवनियुक्त सरकारी सफाई-कर्मचारी भी करते हैं! इसी प्रकार का कार्य पी.एम.एस अंतर्गत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में तैनात सरकारी डॉक्टर भी करते हैं, ..महीने में दो-चार दिन जाकर पूरे महीने का वेतन उठाते हैं और शहर में प्राइवेट प्रैक्टिस भी करते हैं! सब के सब बटोरने में, नोचने में लगे हैं! सभी इसी फिराक और होड़ में हैं कि कौन किसको अधिक 'चूना' लगा सकता है! पुलिस, प्रशासन आदि की बात भी करें तो कई दिन लग जायेंगे, ...उनके बारे में कुछ छुपा नहीं है किसी से! ...यानी इन सब बातों से क्या सिद्ध हुआ कि पिछड़े प्रदेश, इस वजह से पिछड़े हैं क्योंकि वहां नैतिकता को हाशिये पर डाल दिया गया है! ...तो सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती हमारे समक्ष है तो वह है नैतिकता की! ...मनुष्य को मानव बनना होगा! जब हम अच्छे और सरल बनेंगे, दूसरे का हक़ मारना बंद करेंगे, अपना काम सिर उठाकर गर्व से करेंगे, जिम्मेदार बनेंगे, वेतन या फीस के बदले ईमानदारी से अपेक्षित काम करेंगे, तभी दुर्दिन दूर होंगे. ..इस स्थिति के लिए तथाकथित बड़ों (गुरुओं और नेताओं) को ही पहल करनी होगी.
...समाज में नैतिकता इसीलिये कम है क्योंकि परमेश्वर, प्रकृति आदि के नियमों और सिद्धांतों पर किसी को विश्वास ही नहीं रहा! किताबों में नियम-सिद्धांत खूब पढ़ते हैं, रटते हैं, ..और उन पर बड़े-बड़े भाषण, व्याख्यान, प्रवचन आदि भी देते हैं, पर स्वयं को उनकी परिधि से बाहर मानते हैं!!! अध्यात्म को मात्र पढ़ना या समझना काफी नहीं, उसके क्रियान्वयन से ही बात बनती है.

(६) लोग अक्सर अपनेआप को तकलीफ देकर भगवान को खुश करने की कोशिश करते हैं क्यों? जैसे हम व्रत करते हैं और नंगे पांव मंदिर के चक्कर लगाते हैं, ज्यादा भीड़ में घुस जाते हैं और बाद में बीमार पड़ जाते हैं; ये सब कोई अपने लिए नहीं करता लेकिन जिनके लिए करता है वो उसका मूल्य समझते हैं क्या? अगर भगवान को खुश करने के लिए तो कोई वो काम क्यों नही करता जिससे बाकियों की सोच सही हो और बढे?!
अक्सर लोग खुद अपनी या अपने किसी परिजन की कोई अभिलाषा पूर्ण करने के लिए, अथवा मन की शांति और हृदय की पवित्रता हेतु पूजा-पाठ, व्रत, दर्शन, आदि करते हैं. इसमें कोई भी संदेह नहीं कि इस प्रक्रिया में वो कुछ त्यागते हैं और कुछ कष्ट उठाते हैं. बहुत से पंथों में पूजा के विशिष्ट दिनों में व्रत आदि का प्रावधान इसलिए है कि उस अवसर पर हम अपनी इन्द्रियों के स्वाद, लालच आदि को त्यागकर कुछ संयम रखना सीखें. 'संयम' भी परमेश्वर का ही एक गुण है. लेकिन भारी भीड़ में धूप, गर्मी, या भीषण सर्दी और बरसात में लाइनें लगाकर, भारी कष्ट उठाकर व बीमार पड़कर भगवान् का दर्शन करने से उन्हें क्या लाभ पहुँचता है, उनका कौन सा गुण बढ़ता है, यह मेरी समझ से परे है! ...हाँ, शांत वातावरण वाले किसी पूजा स्थल पर दर्शन करने जाना और भावपूर्ण वातावरण में परिक्रमा आदि करना तो अवश्य ही उतने समय के लिए हृदय को पवित्र और मन को शांत कर देता है. ...बस एक बात और हो जाये तो कितना ही अच्छा हो कि हमारी ये धार्मिक गतिविधियाँ किसी विशिष्ट स्वार्थभावना से (अर्थात् सकाम) ना हों! इनसे यदि सत्य, संयम, उदारता सरीखे ईश्वरीय गुणों में वृद्धि हो रही हो तो समझ लेना चाहिए कि दर्शन, पूजा, व्रत, कष्ट उठाना आदि सफल रहे, अन्यथा पुनर्विचार की आवश्यकता! ....आपके मूल प्रश्न पर आते हैं, ...भगवान् तो अपनेआप में ही खुशी का समुद्र हैं, हम उनको क्या खुश करेंगे!!! हाँ, यदि हम ऐसा सोचते हैं कि हमारे किसी स्थूल धार्मिक अनुष्ठान से प्रसन्न होकर भगवान् हमें मनचाहा वरदान दे देंगे, तो यह हमारी भूल है! यदि ऐसा संभव होता तो विश्व में यह चीजें सबसे अधिक हमारे भारत में ही होने के कारण हम आज सर्वोच्च शिखर पर होते! ...कुछ लोग शायद तर्क दें कि हाँ, हमारा भारत कभी इन्हीं कारणों से शिखर पर था! ...मेरा उत्तर होगा कि, ..जी हाँ, बिलकुल था और इन्हीं कारणों से ही था; ...लेकिन तब विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य बड़ा होता था; ..निजी अभिलाषाओं तक सीमित न होकर वह समस्त प्राणिजगत के कल्याणार्थ तथा धर्म (सत्य व न्याय) की रक्षा के निमित्त होता था. ..तब हम पूजा-पाठ, व्रत, दर्शन, तपस्या, अनुष्ठान आदि से अपनी मलिनताओं और अवगुणों को धो कर अपनी पवित्र आत्मा को प्रकट करते थे; ...आत्मा के प्रकटीकरण होते ही साक्षात् ईश्वर से साक्षात्कार संभव होता था, ...और फिर हमें वे प्रत्येक अपेक्षित योग्यताएं मिलती थीं, जिनके बल पर हम "सत्य व न्याय" (धर्म) को पुनर्स्थापित करने में सफल होते थे, फिर हमारी जयजयकार होती थी, हम सिरमौर घोषित होते थे! .....यह था भारत का स्वर्णिम अतीत! लेकिन अभी हमारा आशय या लक्ष्य आदि इतना महान होता है क्या?

(७) अधिकाँश लोगों को दूसरों में दोष दिखाई देते है किन्तु अपनी स्लेट साफ़ क्यों दिखती है...? बहुत बड़ी विडंबना है ...क्यों?
जी हाँ, बिलकुल सही कहा आपने कि यह बहुत बड़ी विडम्बना है. इसका मूल कारण "प्रत्येक व्यक्ति का अपना अहंकार" है. व्यक्ति को अपनी बुद्धि, जाति, पंथ, उपासना पद्धति, ईश्वर-रूप, भक्ति, भाषा, संस्कृति, भौतिक हैसीयत (संपन्नता), पसंद-नापसंद आदि का अहंकार हो सकता है! जिस भी चीज का अहंकार व्यक्ति को होता है, वह अन्यों को उस क्षेत्र में छोटा व हीन समझता है! विश्व के इस भाग में अहंकार कुछ अधिक ही है! विरले ही ऐसा देखने में आता है कि किसी को अपने दोष स्वीकार्य हों, ...या वह दूसरे के गुणों की उन्मुक्तता से (दिल खोलकर) सराहना कर सके!!! मजे की बात यह है कि धार्मिक सभाओं या सत्संगों आदि में भी सामान्य साधकों से लेकर बड़े मार्गदर्शकों तक में यह मनोवृत्ति देखी जा सकती है! अहंकार ही है यह, जो हमें निरंतर यह बताता, जताता और समझाता रहता है कि तुम और तुमसे जुड़ी हर चीज सर्वोत्तम, शेष सब दीन-हीन! अनेक सत्संगों में अहं-निर्मूलन हेतु विशेष वर्कशॉप देखीं हैं मैंने, लेकिन सूक्ष्म निरीक्षण करने पर यह पाया कि यह कई स्वभावदोष और अहंकार तो अवश्य कम करती है लेकिन अनेक अन्य उपजा भी देती है. .....दार्शनिक भाव से विवेचना करें तो निष्कर्ष पाते हैं कि जीवन में हम अनेक भूमिकाओं में होते हैं; ...कहीं हम कुछ 'सीखते' हैं और कहीं कुछ 'सिखाते' हैं! ...जब हम सीख रहे हों तो सिखाने वाले के केवल गुणों पर ध्यान दें, तभी हम कुछ सीख पायेंगे; ...और जब हम किसी को कुछ सिखा रहे हों तो उसके अवगुणों पर अवश्य समुचित ध्यान दें, तभी हम उसका उचित विकास कर पायेंगे. ..ये दोनों काम अहंकार को किनारे कर देने पर ही संभव हो सकते हैं. यदि लोगों में खुद सुधरकर फिर अन्य को अपना समझकर सुधारने की सच्ची भूख जागेगी तभी अहंकार कुछ कम होगा और समाज श्रेष्ठ बनेगा. आश्चर्य की बात है कि सबके जीवन में ऐसा होता भी है, उदाहरण- अभिभावकों (खासतौर पर एक जागरूक माँ) द्वारा बच्चे को सिखाना, ...अपने बच्चे को कुछ सिखाने की प्रक्रिया में माँ अनेक गुण पहले खुद आत्मसात करती है, फिर बड़े मनोयोग से अपने बच्चे को भी सिखाती है. कैसे सीखती है और कैसे सिखाती है? ...बिलकुल वैसे जैसे ऊपर बताया! वह अपने अहं को न्यून करके ही उचित चीजें सीख पाती है और बच्चे के प्रत्येक अवगुण पर नजर रखते हुए उसे सर्वगुणसंपन्न बनाने की निःस्वार्थ चेष्टा करती है!

(८) अहंकार और स्वाभिमान में क्या अंतर है? अहंकार में कोई भी अपनेआप को सबसे अधिक शक्तिशाली समझता है तो अहंकार हो जाता है, नहीं तो बिना कुछ किये ही लोग दूसरों के सामने हारे मान लेते है क्यों?
जिसमें अहंकार होता है वह अपने बल, बुद्धि, राज्य, भाषा, संस्कृति और अपनी प्रत्येक चीज को पर "घमंड" करता है, उन्हें "श्रेष्ठतम" समझता है और अन्यों की तुच्छ या हीन!! इस कारण वह आक्रान्ता (आक्रामक) हो जाता है. वह दूसरों पर विचारों या अस्त्रशस्त्र से हमला करता रहता है, अपना वर्चस्व स्थापित करने की चेष्टा करता है. इस क्रम में वह धर्म (सत्य एवं न्याय) की भी अवहेलना करता है. ....जिसमें स्वाभिमान होता है, वह अपने बल, बुद्धि, राज्य, भाषा, संस्कृति और अपनी प्रत्येक चीज पर "गर्व" करता है, उन्हें "श्रेष्ठ" समझता है (लेकिन श्रेष्ठतम नहीं) और अन्यों की भी इन्हीं चीजों का सम्मान करता है. वह दूसरों से भी कुछ-कुछ सीखकर व सहयोग लेकर अपने से जुड़ी हर चीज को और बेहतर बनाने की सतत चेष्टा करता रहता है. वह आक्रान्ता नहीं होता, परन्तु अपने पर किये आक्रमण को सहन भी नहीं करता, समुचित प्रत्युत्तर अवश्य देता है, प्रत्येक दशा में वह धर्म (सत्य एवं न्याय) का पक्ष लेता है. ....तीसरे प्रकार के वो होते हैं जो बिना प्रतिरोध किये अधर्मी अहंकारी आतताई के समक्ष घुटने टेक देते हैं, या जान कर भी अनजान बने रहते हैं, वे कायर और नपुंसक होते हैं!

(९) सांसारिक सुखों की तलाश में आज लोग अधिक दुखी क्यों दिखाई देते हैं...? वास्तविक खुशी मन की शांति है, या अत्यधिक आराम सुविधा का संग्रह?
सांसारिक सुखों की तलाश में आज लोग इतना अधिक दुखी इसलिए दिखाई पड़ते हैं क्योंकि वे बहुत 'बड़ा' सोचते हैं! बड़ा यानी प्रचुर सुख-सामग्री, प्रचुर आमदनी, बहुत सारा लाभ! इस 'बड़े' की कोई सीमा नहीं होती जबकि हमारे शरीर की आवश्यकताओं की एक सीमा है! बहुत ज्यादा के चक्कर में हम सही ढंग से मिल रहा 'थोड़ा' या 'पर्याप्त' ठुकरा देते हैं, और इस कारण भी बेरोजगारी जैसे संकट में भी पड़ जाते हैं या बहुत घाटा उठा जाते हैं. फलतः अनेकों मानसिक या मनोदैहिक रोगों को न्योता दे बैठते हैं. अपने शरीर और परिवार की आवश्यकताओं के अनुरूप जरूरी भौतिक संसाधन जुटाना कोई बुरी बात नहीं, ...लेकिन लिप्सा में पड़कर उन आवश्यकताओं को विलासिता की हद तक विस्तारित करना दुखों को आमंत्रित करना ही है. उदाहरण के लिए-- "कहते हैं, जल ही जीवन है, ...तो क्या हम बहुत सारा पानी एकसाथ पी सकते हैं?" क्या हम शरीर (पेट) की भूख से बहुत अधिक मात्रा में इकट्ठा खा सकते हैं?? यदि आवश्यकता से बहुत अधिक पानी पियेंगे या खाना खायेंगे तो संकट में पड़ जायेंगे!!! ...ठीक ऐसा ही विलासिता की चीजें आवश्यकता से अधिक जुटाने पर भी होता है, उसका भी साइड इफ़ेक्ट होता है, पर वो हम नजरअंदाज कर देते हैं, और साइड इफ़ेक्ट के तौर पर मन की शांति खो बैठते हैं! उदाहरण के लिए-- मेरे परिवार के आकार के अनुसार मानों मुझे एक गेस्ट-रूम सहित तीन-चार कमरे का मकान पर्याप्त है, तो फिर यदि मैं दस कमरे का मकान खरीद लेता हूँ तो उसकी देखरेख, सफाई, मेंटेनेंस आदि पर समय, ऊर्जा व धन आदि क्या अधिक खर्च नहीं करना पड़ेगा!? उस धन को जुटाने के लिए क्या अधिक मेहनत और जोड़तोड़ नहीं करना पड़ेगा? क्या उस एक्स्ट्रा मेहनत या जोड़तोड़ की कोई सार्थकता बता सकते हैं??? इन्वेस्टमेंट के पॉइंट ऑफ़ व्यू से हम अनेक प्लाट, जमीनें आदि खरीद लेते हैं और उनकी सुरक्षा, देखरेख आदि के लिए हमारी रातों की नींदें हराम हो जाती हैं. पैसों से तो हम अमीर हो जाते हैं, लेकिन मन की शांति और आनंद के दृष्टिकोण से गरीबी हमपर हावी होने लगती है! हाँ, किसी बहुत ही नेक इरादे से ज्यादा काम करना, और ज्यादा कमाना हमें और अधिक आनंदित कर सकता है! लेकिन अनावश्यक संग्रह से हमें फिर भी दुःख ही पहुंचेगा.

(१०) आध्यात्मिक चर्चा में - अध्यात्म से सम्बन्धित प्रश्न क्यों नही पूछते हैं?
बिलकुल सही है आपका कहना. यहाँ नौकरी कैसे मिले, रोजगार में कैसे तरक्की हो जैसे गैर-आध्यात्मिक प्रश्नों के अतिरिक्त अन्य भी बहुत से ऐसे मुद्दे लिखे जाते हैं जिनका अध्यात्म से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता! अध्यात्म का शुद्ध अर्थ आखिर है क्या, केवल इसी पर एक लम्बी चर्चा हो जाये तो लोगों को कुछ बुनियादी बातें पता चल जायें! ..अध्यात्म से परिचय दरअसल हमारे व्यावहारिक जीवन को भी बहुत प्रकाशित करता है, उसे संवारता है. लेकिन श्रीमान् जी, साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि आध्यात्मिक चर्चा से क्या व्यवहार यानी असल भौतिक जीवन में भी कुछ सुधार आ रहा है या नहीं! केवल अनुष्ठान, ध्यान, साधना आदि ही इस बात के सूचक नहीं हैं कि हम साधक हैं और हम अध्यात्म से जुड़े हैं! बल्कि हमारे आम जीवन में नैतिकता की मात्रा यह निर्धारित करती है कि हम कितने आध्यात्मिक हैं! हमारी नैतिकता ही हमारी आध्यात्मिकता का दृश्य पैमाना है! ...अतः नैतिक गुणों या नैतिक मूल्यों की चर्चा भी एक प्रकार से आध्यात्मिक चर्चा ही होगी!

(११) भगवान् पर हमेशा भरोसा और विश्वास बना रहे इसलिए क्या किया जाये, क्योंकि निराशा के कारण भरोसा कम होता जाता है!?
भगवान् और भगवान् द्वारा बनाई गयी इस प्रकृति के नियम व सिद्धांत बहुत ही भरोसे और विश्वास के लायक हैं! इनके अनुसार हमें मिलने वाले हर दुःख और हर सुख के पीछे कारण के तौर पर कहीं न कहीं हम भी जुड़े होते हैं. जरा सोचिए- भगवान् कैसे हैं? भीतर से जवाब आएगा- बहुत ही नेक-दिल, विनम्र, सत्य को पसंद करने वाले एवं न्यायप्रिय. भगवान् यदि बहुत अच्छे व्यक्तित्व के स्वामी हैं तो वो हमसे क्या उम्मीद रखते होंगे? जवाब यह होगा कि- अच्छी सोच, नेक व्यवहार और ईमानदारी व लगन के साथ हर एक काम को करना! यदि हम इस प्रकार से हैं तो हम ऐसे ही नेक और कर्मठ बने रहकर यह भरोसा रख सकते हैं कि हमारे भी अच्छे दिन जरूर आयेंगे! लेकिन, यदि हमारी सोच और काम में मिलावट है तो हमारे दुःख बढ़ेंगे ही, घटेंगे नहीं; चाहे हम कितनी भी पूजा और किसी पंडित से कितने भी अनुष्ठान करवा लें! भगवान् एक ऐसा राजा है जो अपनी जयजयकार, फूलमाला व प्रसाद आदि चढाने आदि से खुश नहीं होता बल्कि वह हमारे अच्छे कामों और अच्छी सोच से प्रभावित होता है! वह चापलूसी पसंद राजा नहीं है! हम हर पल उसकी निगाह में हैं! अतः भरोसा रखिये निराशा के बादल एक दिन जरूर छटेंगे! जरूरी नहीं कि दुःख अभी के कर्म की वजह से हों, वो पुराने किसी कर्म की वजह से भी हो सकते हैं जो आपकी यादाश्त में ही नहीं! ..पर दुःख है तो कारण भी हम ही! ..आगे सुख आएगा तो भी कारण हम ही! ऐसा विश्वास रखेंगे तो दुःख परेशान नहीं कर पाएगा! सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं! आजके किये अच्छे का अच्छा फल आने में कुछ देर हो सकती है पर वो आएगा जरूर, चाहे वो किसी बदले हुए रूप में आए. अच्छा बन के और अच्छा करके भरोसा रखें कि अवश्य ही भगवान् इसे एक दिन ब्याज-समेत लौटायेंगे!

(१२) आज हमारे विद्यालय बच्चों के लिए असुरक्षित क्यों बनते जा रहे हैं...?
सामान्य समाज में भी तेजी से फैल रहा नैतिक पतन इसका एकमात्र कारण है! बस कहने को ही हम विकसित हो रहे हैं! विकास के साथ जब तक नैतिकता संलग्न न हो, वो विकास नहीं अभिशाप है!
आज के अधिकांश प्राइवेट स्कूल शिक्षा की दुकानें बनकर रह गए हैं. और अधिकांश अभिभावक भी मात्र मोटी फीस देकर निश्चिन्त होकर बाकी चीजों से मुंह मोड़ लेते हैं! सब अति व्यस्तता का रोना रोते हैं, ...लेकिन यह अति-व्यस्तता क्यों है? यदि हम व्यस्तता के क्षणों की गुणवत्ता का लेखाजोखा करें तो पता चलेगा कि कुछ बेवजह की व्यस्तता हमें नैतिकता की पटरी से नीचे उतार रही है! हम अभिभावक हों या स्कूल का स्टाफ, सभी आज नीचे को जा रहे हैं, लेकिन अपने व अपनों के लिए बेहतरी की उम्मीद पालते हैं! समाज में नैतिकता के ह्रास का प्रदूषण यदि फैलेगा तो चपेट में हम भी आयेंगे ही! भूकंप में पृथ्वी यदि डोलेगी तो झटका हमें भी लगेगा ही! हम सामाजिक प्राणी हैं, हमें समाज से सरोकार होता है, तो उसको ठीक करने की कोशिश क्यों नहीं करते? कुछ खुद सुधरें और कुछ औरों को भी प्रेरित करें, उस बेवजह की व्यस्तता को कम करें जो हमें और समाज को रसातल में लेकर जा रही है.
पुनः एक पाठक का कमेंट-- साइंस बरदान है या अभिशाप, इसे तर्क से आप स्वयं खुद से पूछें.
मेरा उत्तर-- हमने एक बार भी नहीं कहा कि साइंस अभिशाप है! हमने कहा कि जिस तरह से विकास हो रहा है, उस क्रम में हम नैतिकता को समानांतर रूप से नहीं लेकर चल रहे हैं, फलस्वरूप आपाधापी वाला विकास अभिशाप सिद्ध हो रहा है। विज्ञान तो अतुलनीय सिद्धांतों का पिटारा है भाई जी; उसमें कोई भी कमी नहीं। हां, उसको अप्लाई करने के हमारे ढंग में त्रुटि संभव है। जैसे परमाणु ऊर्जा का आविष्कार विज्ञान की एक बड़ी देन है। अब कुछ लोग इससे बिजली उत्पादन जैसा उपयोगी कार्य करते हैं, तो कोई विध्वंसक बम बनाता है। ऐसे ही इंटरनेट एक वैज्ञानिक खोज है; कोई इसे ज्ञान और उपयोगी जानकारियां हासिल करने के लिए इस्तेमाल करता है, तो कोई वीडियो गेम और अन्य समय-नाशक दुरुपयोग के लिए। विज्ञान ने हमको ताकत दी है विकास करने की। अब हमारे ऊपर है कि हम इस ताकत का सदुपयोग करें या दुरुपयोग। विज्ञान रूपी सिद्धांत गलत नहीं, उसे प्रयोग करने वाला हमारा विवेक सही या गलत होता है।

(१३) संसार को सुख पहुँचाना ही परमात्मा को सुख पहुँचाना है!?
जी हाँ, बिलकुल! ...मेरे विचार से इस संसार को परमात्मा ने ही रचा है, तो परमात्मा की कृति को कोई नुकसान या दुःख पहुँचाने की हम सोच भी कैसे सकते हैं? परमात्मा द्वरा रचित सभी स्थूल (भौतिक) चीजों में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है और सूक्ष्म चीजों में श्रेष्ठ है मनुष्य देह में उपस्थित आत्मा! मानव देह व आत्मा के अलावा भी सबकुछ यद्यपि परमात्मा द्वारा रचित है और हमें उनका भी ध्यान रखना है, तथापि वरीयता क्रम में अन्य सभी का नंबर मनुष्य और मनुष्यता के पश्चात् ही आता है. हम यह पहली चीज साध लेंगे तो अन्य स्वतः ही सध जायेंगी.

(१४) क्या स्वयं से संन्यास लेना सम्भव है? यदि हाँ, तो कैसे?
संन्यास से आपका क्या अर्थ है? यदि संन्यास से आपका अर्थ यह है कि घरद्वार छोड़कर हरिद्वार, काशी आदि जैसे तीर्थस्थलों में जाकर किसी आश्रम या मठ आदि में रहना, ..तो मेरा उत्तर होगा कि यह केवल नाम का (स्थूल) संन्यास होगा! असली संन्यास वो भी नहीं जिसके लिए बहुत से तथाकथित संत-महात्मा आह्वान करते हैं कि चल-अचल संपत्ति आश्रम के नाम कर दो और यहाँ आकर सेवा करो! .....संन्यास लेने का वास्तविक अर्थ है कि- अपनी दुनियावी इच्छाओं-आकांक्षाओं को उम्र बढ़ने के साथ सीमित करते जाना; किसी वस्तु या व्यक्ति का त्याग नहीं बल्कि उनके प्रति आसक्ति (संग्रह की प्रवृत्ति व मोह आदि का) का त्याग करना; संन्यास का अर्थ जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना नहीं बल्कि जिम्मेदारियों को बिना किसी लालच या स्वार्थ आदि के और अधिक लगन से निभाना है! यानी, ...लालच, स्वार्थ, अनावश्यक संग्रह, मोह, और आसक्ति आदि को क्रमशः त्यागना ही वास्तविक संन्यास है! ...और यह स्वयं से संभव है. सौ प्रतिशत!

(१५) पश्चिमी सभ्यता की नक़ल समाज को किस प्रकार दुष्प्रभावित कर रही है..?
माफ़ कीजियेगा, ..यहाँ आप कुछ वह गलती कर रही हैं जो हमारे रूढ़िवादी 'बड़े' लोग (नेता व साधू-संत) करते आए हैं कि आज हमारे समाज में व्याप्त विभिन्न बुराईयों का ठीकरा सीधे-सीधे पश्चिमी सभ्यता के सिर मढ़ देना! यदि एक बार को हम यह मान भी लेते हैं कि हमारे समाज में आज व्याप्त भ्रष्टाचार, अनैतिकता, व्यभिचार, खून-खराबा, समय की बर्बादी आदि अवगुण पश्चिमी सभ्यता की देन हैं, ..तो यह भी तुरंत मान लेना पड़ेगा कि पश्चिमी देशों के समाज में भी उपरोक्त अवगुण प्रचुर मात्रा में हैं!!! तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि आज अधिकांश पश्चिमी देश बहुमुखी विकास कर चुके हैं या तेजी से कर रहे हैं! ...क्या इन अवगुणों के साथ उनका यह विकास संभव हो पाता??? हम देखते हैं कि उनके यहाँ कानून और न्यायव्यवस्था बहुत बेहतर है, हर चीज का परेशानी-रहित एक सटीक सिस्टम है; वहां एक दुर्घटनाग्रस्त घायल को चिकित्सीय सुविधाएं तुरंत और परेशानी-रहित तरीके से मुहैया होती हैं; बीमा-क्लेम या बैंकिंग सिस्टम भी बहुत पारदर्शी और परेशानी-रहित है; विभिन्न टैक्स भी लोग ईमानदारी से भरते हैं; एक इनोसेंट पर्सन के लिए कानूनी पेचीदगियां बिलकुल नहीं हैं, लेकिन एक अपराधी का बच पाना बेहद मुश्किल है; जो भी लॉ एंड आर्डर का ईमानदारी से पालन करता है वह खुद को सामान्यतः बहुत प्रोटेक्टेड और सेफ फील करता है; आम जनता में अनुशासन और केयरिंग की भावना साफ दिखती है, कोई लाइन तोड़कर पहले जाने की जद्दोजहद करता नहीं दीखता, बुजुर्गों और प्रेगनेंट महिलाओं को लोग आउट ऑफ़ टर्न पहले मौका देते हैं; संसद में एक-दूसरे के ऊपर कुर्सियां नहीं फेंकी जातीं; राजनीति में अधिकांशतः दो ही प्रमुख राष्ट्रीय दल होते हैं, हर नेता अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग अलापता नहीं दिखता, शालीनता से बहस करने की कोशिश रहती है; डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक अपना-अपना काम निष्ठा व लगन से करते हैं, इसीलिए वहां मानव-त्रुटि के कारण आकस्मिक मृत्यु या दुर्घटनाएं लगभग नगण्य हैं; .....अब फाइव डे वीक में वो पांच दिन डट के काम करते हैं और फिर जो दो दिन वे मौज-मस्ती करते हैं उसमें कम से कम एक दिन वे पूरे परिवार के साथ बिताते हैं; वर्क फ़ोन और पर्सनल फोन अलग होता है तथा इसी प्रकार वर्किंग लाइफ और पर्सनल लाइफ भी; हौचपौच, व्यर्थ की भागादौड़ी, ट्रेनों में शोरशराबा विरले ही देखने को मिलता है; एक ही धर्मग्रन्थ से बहुत कुछ व्यावहारिक शिक्षा ले लेते हैं; अन्य धर्मों के प्रति उचित सहिष्णुता देखने को मिलती है; विश्व में कहीं भी कोई त्रासदी या प्राकृतिक आपदा आए तो वो सच्ची मदद पहुँचाने की चेष्टा करते हैं!!! ...इतने ही उदाहरण काफी हैं यह बताने के लिए कि बहुत से महत्वपूर्ण मामलों में निःसंदेह वे हमसे बेहतर हैं, इसीलिए वे विकसित राष्ट्र हैं! ...और हमपर वर्षों से विकासशील का तमगा लगा हुआ है! क्यों??? ...क्योंकि हम 'श्रीकृष्ण' की भी केवल रासलीला को ही देखते हैं वो भी व्यभिचारी दृष्टि से; ...पता नहीं कहाँ से सुना और सीखे लेकिन निश्चित ही बहुत से नशेड़ी भी भांग, धतूरा, मद्य, चरस, गांजा और अन्य अनेक नशीली चीजें 'शिवजी' के नाम पर लेते हैं (बाबा और भक्त दोनों), ...मौके-माहौल के हिसाब से हमारी वरीयताएं झट से बदल जाती हैं! ....दरअसल हमने उपर्लिखित दूषित प्रवृत्ति से अभी तक पश्चिमी सभ्यता में भी बुरा ही खोजा और उसे फ़ौरन अपना लिया, लेकिन अच्छे को देख ही नहीं पाए, ...या देखना ही नहीं चाहते! देखिये, ...अच्छा और बुरा हर जगह होता है, हर सभ्यता के कुछ गुण या दोष हैं; ...लेकिन असली विकास वहीं होता है जहाँ अच्छाई, बुराई पर हावी रहे! पश्चिमी विकसित देशों में अच्छाईयाँ, बुराईयों से अधिक हैं और वे बुराई पर हावी हैं; जबकि हमारे यहाँ बुरे से बुरा खोजकर उसे अपनाने की दूषित प्रवृत्ति है, इसीलिए हम दिनप्रतिदिन खोखले विकास की ओर अग्रसर हैं.

Saturday, October 7, 2017

(८२) चर्चाएं ...भाग - 1

एक आध्यात्मिक वेबसाइट के चर्चा सेक्शन पर उपस्थित ज्ञानियों, साधकों और जिज्ञासुओं के द्वारा छेड़ी गयी कुछ चर्चाओं पर मैं भी कुछ प्रतिक्रियाएं देने का प्रयास करता रहता हूँ. उन्हीं को संकलित कर कुछ ब्लॉग-पोस्ट्स के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ.

(१) क्या इस संसार में केवल दुःख ही दुःख है?
आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी, "कोई भी घटना अकारण नहीं होती (दुःख और सुख भी)." जो कोई भी जिस किसी भी अवस्था (दुःख-सुख) को महसूस कर रहा है, उस अवस्था के उत्पन्न होने के लिए परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से उसका भी एक बड़ा योगदान रहता है. क्रिया-प्रतिक्रिया के वैज्ञानिक सिद्धांत के रूप में न्यूटन जी का भी यही कहना है (प्रतिक्रिया त्वरित अथवा विलंबित भी हो सकती है). अतः वैज्ञानिक रूप से भी यह सिद्ध होता है कि दुःख और सुख हमारे ही कारण (क्रिया अनुसार) आता है और मात्र अपने 'कर्म' से ही हम उसे नियंत्रित कर सकते हैं.

(२) मानव अनंत आनंद चाहता है पर वह यह नहीं जानता कि उसे कैसे और कहाँ से प्राप्त करें!?
देखिए सच तो यह है कि पढ़े-लिखे लोगों को अब भलीभांति यह "ज्ञान" है कि आनंद कहाँ और कैसे मिलेगा! लेकिन जब तक उस "ज्ञान" को अप्लाई नहीं किया जायेगा, इम्प्लीमेंट नहीं होगा, तब तक व्यक्ति उसे वस्तुतः पा नहीं पाएगा! "मैं तैराकी से सम्बंधित कितनी भी किताबें पढ़ लूं, कितना भी ज्ञान हासिल कर लूं; वो मुझे तैराकी नहीं सिखा पाएगा! ..तैराक बनने के लिए मुझे पानी में उतरकर ज्ञान को व्यवहार में उतारना ही पड़ेगा!" निचोड़ यह कि मात्र पढ़कर, सीखकर और ढेर सारा ज्ञान बटोरकर हम आनंदित नहीं हो सकते, ...हाँ, ब्रह्मराक्षस (अहंकारी ज्ञानी) अवश्य बन सकते हैं.

(३) अपने को कैसे जाना जा सकता है?
व्यक्ति में स्वयं को जानने की पर्याप्त भूख यानी प्रबल जिज्ञासा या तड़प होनी चाहिए. ऐसा होने पर अपने भीतर से ही या अन्यत्र कहीं से आपको समुचित जवाब अवश्य मिलेगा. स्वयं को जानने की प्रक्रिया में शाब्दिक ज्ञान होना पर्याप्त नहीं, अनुभूति होनी आवश्यक है. और साधना में उपरोक्त लिखित गुण होने से ही "असली" अनुभूति होनी संभव होती है. वैसे हम अधिकांशतः कोरी भावना के स्तर पर ही रह जाते हैं अतः हमारी अनुभूतियाँ भी मन के स्तर की ही होती हैं, आत्मा या सूक्ष्म के स्तर की नहीं होतीं, अर्थात यथार्थ नहीं होतीं! यथार्थ अनुभूति न होने या मन के स्तर पर ही रह जाने या कोरी भावना में बहने का मुख्य कारण यह होता है कि आज के युग में व्यक्ति कोई संकट या दुःख आने पर ही अध्यात्म की ओर मुड़ता है. आर्त या परेशान व्यक्ति बहुधा भावुक ही होता है, उसकी साधना 'सकाम' होती है! अतः स्वयं या ईश्वर की खोज की साधना सदैव 'निष्काम' भाव से हो तो ही सफलता मिलती है.

(४) आत्मज्ञान के बिना योगी भोगी बन जाता है?
जिनके पास आत्मज्ञान नहीं, जो आध्यात्मिक गुणों में लीन नहीं, केवल वे ही तो छद्म (नकली या आभासी) आध्यात्मिक साम्राज्य बनाते हैं! आध्यात्मिक गुणों के अभाव में ऐसे योगी केवल धन-यश की कामना से जनसाधारण को बड़े-बड़े सपने दिखाते हैं, उन्हें ईश्वर-प्राप्ति का लालच देते हैं, उन्हें सांसारिक आकांक्षाओं की पूर्ति का लालच देते हैं, परीक्षा में उत्तीर्ण होने, नौकरी पाने, धन पाने आदि का उपाए सुझाते हैं या वरदान देते हैं. जबकि वास्तव में खरा आत्मज्ञानी कभी भी अपना या अपने बड़े होने का, या ईश्वर के किसी विशिष्ट रूप का, या रिद्धि-सिद्धि आदि का "प्रचार" नहीं करता, वो केवल सादगी से धर्म (राइटियसनेस) का "प्रसार" करता है! आत्मज्ञान रहित योगी, एक भोगी की भांति भौतिक संसाधन एकत्रित करके अपना साम्राज्य विस्तारित करता रहता है, उसमें लोकहित की भावना केवल दिखाने के लिए होती है, वस्तुतः वह अपना स्वहित ही साध रहा होता है; एक सामान्य जन को उससे मुलाकात करना सरलता से संभव नहीं होता. जबकि एक आत्मज्ञानी कभी भी भौतिक संग्रहण में विश्वास नहीं रखता, और वह सबको सहज ही उपलब्ध होता है (उससे कोई भी कभी भी मिल सकता है)! बहुत बड़े मूलभूत अंतर हैं ये इन दोनों के! लेकिन आमजन को यह देखने की फुर्सत कहाँ, ...भौतिकतावाद के इस युग में वह तो केवल तड़क-भड़क की ओर ही आकर्षित होता है!

(५) आज धर्म के नाम पर बढ़ते अपराधों के लिए कौन उत्तरदायी है...?
इसके लिए दोषी हैं-- (१) आम आदमी के निजी स्वार्थ, लालच, निकम्मापन, कोरी भावुकता, अशिक्षा, अंधश्रद्धा, भेड़चाल, फालतू के कामों में व्यस्तता, अच्छी बातों को केवल सुनना लेकिन अमल नहीं करना, नैतिक रूप से कमजोर होना, केवल स्वकेंद्रित होना. ..(२) राजनेताओं का घोर अवसरवादी होना, अति भ्रष्ट होना, सत्तालोलुप होना, वोट बैंक की खातिर सांप्रदायिक (पक्षपाती) होना, देख-सुन कर भी आफतों के हल के लिए समय पर कोई कदम ना उठाना, धन-यश का जबरदस्त लालच होना और हासिल कर लेने के बाद पतितता की सीमाएं लांघना. ..(३) सभी धर्मों के धार्मिक मार्गदर्शकों का प्रसिद्धि या/और धन के लिए अत्यधिक लोभी होना, धन-यश को पाने के लिए अनुयायियों को अनेकों काल्पनिक सब्जबाग दिखाना, अपने आप को स्वयंभू गुरु और ईश्वर तक घोषित करना, धन और यश के प्राप्त हो जाने पर उनमें विभिन्न पतित इच्छाएं उत्पन्न होना और फलतः जघन्य पाप करना.

(६) व्यक्ति कब और कैसे सही रूप से जागरूक होता है...? क्या केवल शिक्षा द्वारा जागरूकता संभव है?
शिक्षा द्वारा पर्याप्त जागरूकता संभव है, ...कहा तो यही जाता है ..और दुनिया के अधिकांश भूभाग पर यह बात खरी उतरी भी है. ..परन्तु हम भारतवासी खासतौर पर हिन्दीभाषी बेल्ट इसका अपवाद है! हमारे नीति-नियंताओं (राजनीतिज्ञों) की असीम कृपा से देश के लोगों में जब "पिछड़ा" बनने की होड़ हो तब हमारा देश आगे कैसे बढेगा? इस स्थिति में तो कितना भी पढ़-लिख कर भी हम पिछड़े या विकासशील का तमगा ही सदा के लिए लगाये रखेंगे! अगड़ा व जागरूक होने की रीढ़ तोड़ने की रही-सही कसर तथाकथित बाबा और धार्मिक गुरु पूरी किये दे रहे हैं! निचोड़ यह कि अवसरवादी राजनेताओं और ढोंगी बाबाओं की छत्रछाया में शिक्षा भी हमें कभी जागरूक नहीं कर सकती!!! उम्र गुजारने के साथ यह तजुर्बा हुआ है कि "वस्तुतः हमारी जागरूकता का ग्राफ नीचे को ही जा रहा है. हमें प्राप्त व्हाट्सएप एवं अन्य मीडिया संदेशों में इसकी छवि साफतौर पर दिखती है." और तो और..., हमारे इसी उन्नत कहे जाने वाले मंच पर उठाये जाने वाले सवालों को टटोल लें! ...क्या आपने ऐसा अनुभव किया?

(७) कट्टर धर्मान्धता अध्यात्म पथ पर सबसे बड़ी रूकावट है ...क्या आप इस मत से सहमत हैं...?
जी हाँ मैं सहमत हूँ आपसे. यह बहुत त्रासद है कि अन्धश्रद्ध कट्टरपन दिनोंदिन बढ़ रहा है और खरे अध्यात्म से लोग विमुख हो रहे हैं! विभिन्न तथाकथित बाबा, गुरु आदि तो इसके लिए जिम्मेदार हैं ही, हम आम जनता भी कोई कम दोषी नहीं! सर्वत्र लोभ एवं स्वार्थों का बोलबाला है! बाबा जैसे लोग यदि झूठे सब्जबाग दिखाते हैं तो हम भी तो लालच के मारे उसमें फंस जाते हैं और वांछित पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं! लोभ और लालच ने हमारे बुद्धि-विवेक को हर लिया है! खरा अध्यात्म चूंकि हमें स्वच्छ आईना दिखाता है तो इसीलिए हम उससे बचते हैं! मजे की बात यह कि खरा अध्यात्म बहुत सरल और अल्प लेकिन शक्तिशाली सिद्धांतों वाला है और लगभग सब उससे परिचित भी हैं लेकिन लोभ एवं स्वार्थों के चलते हम इतने भ्रष्ट हो गए हैं कि उसे पहचानने व जानने से इंकार कर देते हैं; ऐसे अभिनय करते हैं मानों वह (अध्यात्म) बहुत दुरूह है और हमारे लिए नहीं बना!!! बहुत हास्यास्पद और त्रासद है यह स्थिति!

(८) जीवन में सुधार किस आयु से आना ज़रूरी है...? अधिकाँश लोग यौवन तक जीवन को केवल मौज मस्ती का ही एक भाग मानते हैं!?
यह प्रश्न अपने में ही बेहद हास्यास्पद है! सुधार यानी इम्प्रूवमेंट की कहीं कोई आयु अथवा समय होता है!? किसी भी व्यक्ति को इम्प्रूवमेंट की भूख हमेशा होनी चाहिए और वो कभी सेचुरेट नहीं होनी चाहिए. ...और हाँ..., यदि आपके अनुसार यदि अधिकांश लोग यौवन तक जीवन को केवल मौज-मस्ती का ही एक भाग मानते हैं, ..तो मेरे अनुसार मौज-मस्ती कोई पाप नहीं यदि वह समझदारी से मानवता, उचित मर्यादा और सामाजिक गरिमा का ध्यान रखते हुए की गयी है! मैं तो कहता हूँ कि व्यक्ति को किसी भी आयु में खिलंदड़ा (खुशमिजाज और भरपूर मस्त) रहना चाहिए! क्या गंभीरता ओढ़ लेना ही व्यक्तित्व में सुधार या इम्प्रूवमेंट का परिचायक है?! संक्षेप में उत्तर यह कि मौज-मस्ती करते हुए भी समानांतर रूप से पर्याप्त सुधार संभव हैं और उनका आरंभ शैशवावस्था से ही होना चाहिए तथा जीवनभर जारी रहना चाहिए.

(९) भगवान् के न्याय पर कब प्रश्नचिन्ह लगाने को हम मजबूर हो जाते हैं? क्या ऐसा करना उचित भी है...?
गर्भावस्था में ही अथवा जन्मते ही नवजात अबोध शिशु की मृत्यु; इसके अलावा सूखे, बाढ़, भुखमरी, प्राकृतिक आपदा, युद्ध, आतंकी हमलों अथवा किसी दुर्घटना के कारण निर्दोषों या मासूमों की मृत्यु. ये सब देखकर एक सामान्य व्यक्ति को यही लगता है कि ईश्वर के न्याय में कहीं गड़बड़ है, उसका विश्वास डगमगाता है, वह ईश्वर को कोसता भी है. तब बड़े-बूढ़े या अन्य समझदार परिजन यह कहकर उन्हें सांत्वना देते हैं कि "शायद ईश्वर की यही मर्जी थी!" यह सुनकर दुखियों का मन शांत तो हो जाता है, पर सवाल यह उठता है किक्या इस प्रकार की सांत्वना देकर हम भगवान् के न्याय पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहे!? जिस पूजा-आराधना का हवाला देकर कोसते हुए हम यह कहते हैं कि सारी उपासना-अनुष्ठान बेकार गए, तो क्या हम यह समझते हैं कि पूजा-आराधना ही हमारी सुरक्षा की गारंटी है!? अध्यात्म के अनुसार और आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी सच तो यही है कि कोई एक्सीडेंट भी एक्सिडेंटली नहीं होता! मूल में कोई कारण तो अवश्य होता है! ...और वह कारण भगवान्, प्रकृति, या कुदरत के नियमों का निष्ठुर होना तो बिलकुल भी नहीं है! यह तो सब मानते ही हैं कि कोई सिस्टम तो है जिसके अंतर्गत समस्त गतिविधियाँ चल रही हैं; पहले अध्यात्म ने और अब विज्ञान ने उस सिस्टम की अनेकों परतें तो आम आदमी के लिए खोल ही दी हैं. तो फिर क्या ही अच्छा हो कि हम उस सिस्टम को फ़ॉलो करें. हम सिस्टम के अनुसार चलेंगे तो सुख से रहेंगे और विरुद्ध जायेंगे तो सिस्टम के अनुसार ही हम कुछ नकारात्मक भी पायेंगे, यह सोच आज नदारद है. सिस्टम को आप कोई घूस नहीं दे सकते! हमारी ज्यादातर आराधनाओं को हम ईश्वर को दिया उपहार या घूस ही तो समझते हैं और उसकी एवज में उससे बच्चों समान अपेक्षाएं रखते हैं! ....आदर्श रूप से हमारी किसी भी पूजा-अर्चना का मूल उद्देश्य यही होना चाहिए कि ईश्वर तू हमें अपने गुणों से सराबोर कर हमें अपने समान ही नेकी और न्यायपूर्ण पथ पर चला. जब हम ऐसे हो जायेंगे तो फिर भविष्य के दिन या जन्म अच्छे ही होंगे!

(१०) क्या अध्यात्म मार्ग पर चल कर व्यक्ति दोष रहित हो जाता है?
अध्यात्म के मार्ग पर चलने से व्यक्ति सही और गलत में वास्तविक अंतर को समझता है, अपने लिए सही को चुन सकता है. इससे धीरे-धीरे दोष कम होते हैं या फिर दोषों की तीव्रता घटती है. दोषरहित हो जाना तो बहुत बड़ी बात है, बहुत-बहुत मुश्किल है, ...लेकिन असंभव नहीं!

(११) अध्यात्म पथ पर चलने में सबसे बड़ी चुनौती कौन सी आती है और क्यों....? कहते हैं कि अध्यात्म का मार्ग सबसे कठिन मार्ग है...!?
सबसे पहले ईश्वर के सार्वभौमिक गुणों या ईश्वर-निर्मित प्रकृति के सिद्धांतों पर विश्वास दृढ़ करने की चुनौती! क्योंकि अक्सर हम सिद्धांत जानते तो हैं, पर स्वयं को उन सिद्धांतों की परिधि से बाहर मानते हैं! ..तो विश्वास तो खोखला हो गया हमारा! अध्यात्म में मात्र "भाव" (विकल्परहित विश्वास) का ही महत्व है. ...दूसरी चुनौती सामने आती है- अध्यात्म और व्यवहार (प्रतिदिन के कार्यों) के मध्य संतुलन बैठाने की, ..क्योंकि अध्यात्म, ईश्वर या प्रकृति के नैसर्गिक सिद्धांत कुछ कह रहे होते हैं और सामान्य समाज (आमजन) कुछ अन्य कर रहा होता है! यह देखकर अत्यधिक मानसिक अंतर्द्वद्व होता है! ...इसके अलावा अध्यात्म का मार्ग सबसे कठिन होने का भ्रम इसलिए है क्योंकि हममें से निन्यानवे प्रतिशत लोग हर काम में मात्र अनुयायी हैं (पहल करना नहीं जानते या करना नहीं चाहते), और चूंकि आज समाज के व्यवहार में हमें खरी आध्यात्मिकता देखने को नहीं मिलती है तो इस कारण हम प्रेरित नहीं हो पाते अध्यात्म का अनुसरण करने के लिए!

(१२) कहते हैं- आशा तृष्णा न मिटी , मिट मिट गए शरीर, ...क्या हम अपनी इच्छाओं पर विजय पा सकते है ? यदि हाँ तो कैसे...?
इच्छाओं को मारना और इच्छाओं को नियंत्रित करना, ये दो अलग-अलग बातें हैं. यदि इच्छाओं को नियंत्रित करना ही इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना है, तो जी हाँ यह संभव है. लेकिन समस्त इच्छाओं (सात्त्विक, राजसिक और तामसिक) को मारना या पूर्ण रूप से समाप्त कर देना ही इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना है तो वह तो मनुष्यों के लिए संभव नहीं! आत्मा जब तक मानव देह में है, उसकी कुछ मूलभूत आवश्यकताएं तो रहेंगी ही और उनको पूरा करने के लिए इच्छा उठना तो स्वाभाविक ही है. इच्छा उठेगी तो प्रयास होगा, प्रयास होगा तो ही आवश्यकता की पूर्ति होगी. अब कोई यह कहे कि भौतिक देह में रहकर कोई भौतिक आवश्यकता या लालसा न हो तो वह झूठ होगा. हाँ, लालसाओं को कम करना व नियंत्रित करना मानव के वश में है. जो "सही में मूलभूत" आवश्यकताएं हों बस उन्हीं पर ही फोकस कर उन्हें न्यायोचित ढंग से प्राप्त करने का निरंतर अभ्यास मनुष्य को यह विजय प्राप्त करा सकता है.

(१३) देश में नारी वर्ग कब और कैसे सुरक्षित अनुभव कर पायेगा....?? नारी को लेकर देश में राजनीति तो बहुत हो रही है किन्तु दुर्भाग्यवश स्थिति दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है, ....क्यों?
संकोचों को त्यागकर हमें समस्या की जड़ में जाना आवश्यक. हमारे समाज में दिन-प्रतिदिन अनाचार व व्याभिचार (विवाहेतर सम्बन्ध) बढ़ रहा है जिसके फलस्वरूप दुराचार भी बढ़ रहा है. आयु बढ़ने के साथ होने वाले हार्मोनल परिवर्तनों के कारण स्त्री और पुरुष दोनों में दैहिक आकर्षण जन्म लेता है. इस तृष्णा की सम्मानजनक और गरिमामय पूर्ति हेतु सभी सम्प्रदायों के धार्मिक ग्रंथों में कुछ नियमों, आज्ञाओं के तहत एक उपयुक्त आयु में विवाह संस्कार की व्यवस्था बताई गयी है. इन्हीं में अन्य संतुतियों के माध्यम से अन्य अनेक रिश्तों (जैसे माता-पिता, भाई-बहन, भाभी, देवर आदि) की भी व्याख्या की गयी है. समाज जब तक इन संतुतिओं और निर्बंधों को 'धर्म' या 'अकाट्य नियम' जानकर मानता रहा, तब तक सब 'लगभग' ठीक रहा. धार्मिक अगुवाओं की ही मेहरबानी से अब जब समस्त धर्म-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है तो नैतिकता की अनुपस्थिति में लड़के और लड़कियां दोनों निरंकुश से हो गए हैं. विवाहेतर (विवाह से पूर्व एवं पश्चात्) सम्बन्ध बढ़ते जा रहे हैं. ...इस अनैतिकता के दौर में शारीरिक गठन अधिक पुष्ट होने के कारण पुरुष अधिक आक्रामक हो गया है. स्त्री-पुरुष के बीच परस्पर सहमति से भी यदि व्यभिचार होता है तो भी उसके पश्चात् एक स्त्री को ही उसका दुष्प्रभाव झेलना पड़ता है. कारण यह कि व्यभिचार पश्चात् पुरुष में कोई भी शारीरिक प्रभाव-दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, जबकि स्त्री की देह में अवश्य ही अनेक परिवर्तन होते हैं. दिखाई और महसूस हो सकने वाले दैहिक प्रभावों की वजह से स्त्री के मन-मस्तिष्क पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है. यदि वह बहुत ही दुश्चरित्र न हो तो अवश्य ही वह गहरे सदमे और डिप्रेशन में चली जाती है, जबकि सम्बंधित पुरुष ऐसा कोई भी परिवर्तन या प्रभाव नहीं झेलता. मात्र यही कारण है कि पुरुष अधिक आक्रामक और कामी और ढीठ हो गया है. ऐसे पाप वो अतीत में भी करता था पर उसका आधिक्य अब इसलिए भी हो गया है क्योंकि स्त्रियों का भी उकसावा उसे अब अधिक मात्रा में मिलता है. 'लिव-इन' परंपरा इसका एक ज्वलंत उदाहरण है. महानगरों में पढ़ने और नौकरी करने वाले लड़के-लड़कियों के बीच इसका चलन बढ़ता जा रहा है. प्रचलित विवाह-व्यवस्था से इतर अन्य ढंग ढूँढने से आरंभ में तो आजादी महसूस होती है, परन्तु सुख के निरंतरता की गारंटी जैसी चीज नदारद रहती है, एक ठोस सामाजिक जीवन से वह युगल वंचित रह जाता है. इनके अलावा सस्ता होता इन्टरनेट डाटा और इन्टरनेट पर बढती पोर्नोग्रफिक सामग्री भी व्यभिचार और दुराचार की एक बड़ी वजह है. उसके कारण अब ११-१२ वर्ष की अवस्था में ही यौन सम्बन्ध बनने लग गए हैं या कम से कम उनकी पूरी जानकारी तो हो ही जाती है. लोग कहते हैं कि परिवर्तन अपरिहार्य होता है! क्या प्रकृति के नियमों-सिद्धांतों में, या हमारी देह में कोई परिवर्तन आया है पिछले सैकड़ों वर्षों में?? क्या धरती पर गुरुत्वाकर्षण के मान 9.8 में कोई बदलाव आया है? क्या हमारा शरीर बदल कर बन्दर जैसा हो गया है? क्या भगवान बदल गए हैं? क्या नैतिक मूल्यों की परिभाषा बदल गयी है? ...जब यह सब नहीं बदला तो क्यों हम प्राचीन अकाट्य और आज भी प्रासंगिक नियमों को तोड़ने हेतु इतना व्यग्र हैं? पुरानी परम्पराएं तोडिये..., पर केवल वो, जो आज अप्रासंगिक हैं, कमजोर हो गयी हैं, बूढी हो गयी हैं! स्त्रियों को स्वयं, और पुरुषों को भी स्त्रियों की उपर्लिखित शारीरिक और मानसिक कोमलताओं को समझकर तदनुसार श्रेष्ठ एवं गरिमामय आचरण करना सीखना होगा. एक माँ को भी आज आगे आकर बाल्यकाल से ही अपनी संतानों को इसका पाठ पढ़ाना होगा.

(१४) धर्म को लेकर आज लोगों के मन में बहुत से प्रश्न उठ रहे हैं, क्यों? क्या यदि धर्म न होता तो इंसान जानवरों जैसा व्यवहार करता?
मुझे लग रहा है कि 'धर्म' शब्द से आपका आशय रिलिजन है, तो विभिन्न रिलिजन पर से विश्वास उठने का एक बड़ा कारण उनमें आ गयी कट्टरता ही है. अंधी कट्टरता तो अन्यों के साथ भेदभाव और वैमनस्य को बढ़ा रही है. इसके अलावा बहुत सारे अन्धविश्वास और पाखंड, पाखंडी भी घुस गए हैं सभी पंथों के शीर्ष में! इनके बीच असली 'धर्म', जो सर्वथा योग्य और न्यायप्रिय आचरण का स्रोत है, वह कहीं खो गया है.असली 'धर्म' (राइटियसनेस) तो वैसे सभी पंथों के केंद्र में बीजस्वरूप विद्यमान है, किन्तु उसे देखने और पोषण देने का कार्य कोई भी पंथ आज करता नहीं दिखता (सबसे सहिष्णु हिन्दू भी नहीं, वे भी आज दिग्भ्रमित हैं), ...तो फिर एक जाग्रत नागरिक इन सब तथाकथित धर्मों (पंथों) के जंजाल से उकता चुका है. उसे यथार्थ "धर्म" से कोई परेशानी नहीं है और वो उसके भीतर ही है, और वही तो व्यक्ति को इन पंथिक जंजालों से मुक्त करवाना चाहता है.आपके दूसरे प्रश्न का उत्तर है कि यथार्थ "धर्म" तो सार्वभौमिक है, विभिन्न पंथों या किसी विशेष जीवन पद्धति (जैसी कि हिन्दू शब्द की व्याख्या हो रही है) से भी परे है. यथार्थ 'धर्म' (विशुद्ध ईश्वरीय ज्ञान) तो सभी मानवों के भीतर नैसर्गिक रूप से विद्यमान है. अतः यदि तथाकथित धर्म अर्थात पंथिक ज्ञान उपलब्ध न होता तो भी इन्सान आध्यात्मिक विकास के क्रम में आगे को बढ़ता ही.

(१५) "निवृत्ति" और जिम्मेदारियों से भागने के बीच क्या अंतर है?
प्रश्न अच्छा पूछना चाहा है आपने! ..."निवृत्ति" का अर्थ है कार्यमुक्ति, रिटायरमेंट, या परित्याग! ..."निवृत्ति" का अर्थ जिम्मेदारियों से मुक्ति या जिम्मेदारियों का परित्याग कदापि नहीं है और ना ही इसका अर्थ किसी लक्ष्य के प्रति प्रयासों को छोड़ देना है! "निवृत्ति" सदैव ही "प्रवृत्ति" पश्चात् होती है! पहले 'प्रवृत्ति'..., उसके बाद ही 'निवृत्ति'! "प्रवृत्ति" अर्थात् टेंडेंसी, रुझान, उन्मुखता, और प्रवणता. यानी प्रयास करके कुछ प्राप्त करना, वह भी पूरी तरह से! ...आधे वाक्य या आधी शिक्षा से हमेशा नुकसान ही हुआ है! सच तो यह है कि त्याग उसी का संभव है जो आलरेडी मेरे पास है या मुझे सहज ही प्राप्य है! प्राचीन नीतिवचनों में कभी भी किसी लक्ष्य की ओर उन्मुख होने (प्रवृत्ति) को मना नहीं किया गया है, बल्कि हर सही और न्यायपूर्ण लक्ष्य को गंभीर व न्यायोचित पुरुषार्थ (श्रम) से हासिल करने पर जोर दिया गया है. हम (आत्मा) एक भौतिक देह में हैं तो कुछ भौतिक आवश्यकताएं होना भी अवश्यम्भावी ही है; तो फिर उन्हें प्राप्त करना (प्रवृत्ति) तो अत्यावश्यक; ..पुनः, चूंकि हम मूलतः एक आध्यात्मिक देह हैं और एक समयकाल के पश्चात् यह भौतिक देह त्यागने का समय निकट आता ही है, ...तो यह समय निकट आते-आते हमें अपने श्रम से प्राप्त भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति (अटैचमेंट) के त्याग (यानी 'निवृत्ति') की भी गंभीर जरूरत! निचोड़ यह कि फिजिकल शरीर व जीवन के लिए कुछ आवश्यक सांसारिक चीजों को प्राप्त करना आवश्यक ताकि हम (भौतिक शरीर) भलीभांति और सुख से जीवित रह सकें. लेकिन इस भौतिक शरीर की एक मर्यादा, सीमा या आयु और उसके बाद हमारा आध्यात्मिक जीवन ही शेष रह जायेगा; तो फिर उस यात्रा की तैयारी भी बहुत जरूरी! उस यात्रा में भौतिक वस्तुओं का फिर कोई रोल (भूमिका) नहीं! तो आवश्यकता के अनुरूप ही प्रयास आवश्यक होते हैं. आवश्यकता न होने पर भी हम कुछ चीजों को यदि अपने साथ ढोते हैं तो वे बोझ बन जाती हैं! तो इस भौतिक जगत में प्रवेश करते ही "प्रवृत्ति" आवश्यक, ..फिर इस जगत से निकासी का समय आते-आते "निवृत्ति" भी आवश्यक! कितना ही अच्छा हो कि प्रत्येक "प्रवृत्ति"के साथ-साथ समानांतर रूप से हमें "निवृत्ति" का भी भान रहे! पुनः स्पष्ट कर दें कि "निवृत्ति" का अर्थ किसी वस्तु या व्यक्ति का 'त्याग' नहीं बल्कि उसके प्रति 'आसक्ति' (अटैचमेंट) का त्याग है! आशा है सब स्पष्ट हो गया होगा, अन्यथा आगे और प्रश्न कर सकते हैं.

(१६) आत्मा कौन है? आत्मा के विषय में जानकारी, आत्मा का स्वरूप!? आध्यात्मिक साधना क्या?
अच्छा आध्यात्मिक प्रश्न पूछा आपने! अध्यात्म अर्थात् आत्मा के विषय में! अपने भीतर की चेतना अथवा चैतन्य को हम आत्मा कह सकते हैं, जिसके कारण हम जीवित हैं या अस्तित्व में हैं. यही वह शक्ति है जो हमें वास्तविक धर्म (सर्वथा योग्य एवं न्यायपूर्ण आचरण) का परिचय कराती है या करा सकती है. यदि हम एक शब्द में आत्मा के मूल गुण को बताएं तो वह है- "सच्चिदानंद" अर्थात् सत् (सतत/सदैव रहने वाली) चित् (चैतन्यमय) आनंद (आनंदमय)! इसका कोई आकार या स्वरूप नहीं है जिसे हम आँखों से देख सकें. आँखों से ना दिखाई देने वाली फिर भी बहुत महत्त्वपूर्ण, विज्ञान की भाषा में बोलें तो यह हमारे भौतिक (स्थूल) शरीर का सॉफ्टवेयर है. हमारा भौतिक या स्थूल शरीर यानी हार्डवेयर, और आत्मा अर्थात् शरीर रूपी हार्डवेयर का ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर!! इस दुनिया के कार्यकलापों को संपन्न करने-कराने हेतु ये हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर एक-दूसरे के लिए पूरक हैं. पर अधिक महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर ही है! क्योंकि यदि यह निकल गया तो ऊपर से ठीकठाक दिखने वाला शरीर भी मृत घोषित होता है. ...और शरीर भंगुर है, धीरे-धीरे बूढ़ा होकर नष्ट होता है जबकि आत्मा नित-नवीन है! यह तो मात्र सरलता से समझने हेतु एक उदाहरण था. वास्तव में आत्मा का महत्त्व कहीं अधिक है. ..और आत्मा को पूरी तरह से जानने-समझने व इसे शुद्ध रूप में प्रकट करने का (यानी इसके ऊपर जमी धूल-गर्त साफ करने का) कार्य हम अध्यात्मशास्त्र (आध्यात्मिक साधना) द्वारा करते हैं. भलीभांति स्मरण रहे कि एक खरी आध्यात्मिक साधना, कुछ भी प्राप्त नहीं करवाती, कोई चमत्कार नहीं करती, कोई रिद्धि-सिद्धि प्रदान नहीं करती; वरन वह केवल आत्मा के ऊपर के विकारों, गन्दगी और धूल-गर्त आदि को साफ करती है! पश्चात् आत्मा सर्वथा समर्थ होती है! विज्ञान की भाषा में आध्यात्मिक साधना एक एंटीवायरस के समान है जो आत्मा रूपी ऑपरेटिंग सिस्टम को हानिकारक वायरसों से मुक्त कराता है. इससे सिस्टम अपने मूल रूप में अधिक दक्षता से काम करता है!

(१७) गुरु कैसा होना चाहिए? और हम कितने गुरु बना सकते हैं एक, दो या फिर जितने चाहो उतने?? कोई वैदिक उदाहरण?
सच्चे स्थूल (मानव देह) गुरु में अहंकार, धन या यश की भूख आदि किंचित मात्र भी नहीं होते. सीधा, सच्चा और सरल जीवन व्यतीत करते हैं. आडम्बरों और औपचारिकताओं से कोसों दूर रहते हैं. सबसे बड़ी बात कि वह प्रत्येक शिष्य या जिज्ञासु को सहज एवं सदैव उपलब्ध रहते हैं. ...रही बात गुरु धारण करने की तो हम सच तो यह है कि अध्यात्म में शिष्य गुरु को धारण नहीं करता, अपितु गुरु शिष्य को धारण करते हैं! शिष्य या जिज्ञासु में योग्यता या पात्रता देखकर ही एक खरा गुरु उसे स्वीकारता है. ..वैसे गुरु के सीधे संपर्क में न रहते हुए भी एकलव्य समान एक लगनशील शिष्य किसी भी गुरु से बहुत कुछ सीख सकता है! उत्तरोत्तर सीखते जाने के लिए व्यक्ति क्रमशः कितने भी गुरुओं की सहायता ले सकता है, यदि उसे अनंत के लिए उड़ान भरनी है! मेरे विचार से, प्रगति के इस क्रम में शिष्य के जीवन में आने वाले सभी गुरु अपने उस शिष्य से बहुत प्रसन्न होंगे! ...और अंत में बात किसी वैदिक उदाहरण की..., तो श्रीमान्, वो तो मेरे पास नहीं! शब्दों, विश्लेषणों और उदाहरणों के चक्रव्यूह में फंसकर मात्र इतिहासकार बन जाने को मैं अध्यात्म-साधना नहीं समझता हूँ. ..कहीं पढ़ा था कि, आध्यात्मिक-साधना सदैव हमें आगे की कक्षाओं में जाने को प्रेरित करती है, निरंतर चलाएमान रहने की अपेक्षा करती है; यहाँ तक कि "वेद" भी हमें यह कहते हैं कि "जब तुम हमें समझ जाओ और हृदयंगम कर चुको, तो हमें भी त्यागकर और आगे को..., हमसे भी आगे...., अनंत की तरफ बढ़ो!"

(१८) गुरु शरीर है या ज्ञान है?
अध्यात्म के संदर्श में "गुरु" एक सूक्ष्म, निर्गुण, निराकार "तत्त्व" (एलिमेंट या सब्सटेंस) है. यह तत्त्व हमें सूक्ष्म (कंसाईज़) तरीके से आत्मज्ञान सिखाता या सिखा सकता है. ...कभी किसी स्थूल देह के माध्यम से यदि यह तत्त्व कार्य करता है, तो वह देह सगुण (व्यक्ति रूप) गुरु कहलाती है. मेरे अनुभव के अनुसार 'निन्यानवे प्रतिशत' मामलों में केवल सूक्ष्म निराकार 'गुरु-तत्त्व' ही कार्य करता है! ...यह तत्त्व, वातावरण में सदैव एवं सहज ही उपलब्ध रहता है (जैसे मोबाइल फोन की तरंगें), ...हमें ही पर्याप्त जिज्ञासा व तड़प से अपनेआप को ट्यून करना पड़ता है जिससे हम इन्हें ग्रहण कर पाएं. आध्यात्मिक ज्ञानप्राप्ति हेतु (यानी स्वयं और भगवान् को पता करने व प्राप्त करने के लिए) जब हममें पर्याप्त जिज्ञासा और तड़प जन्म लेती है तब हम इस गुरु-तत्त्व को ग्रहण करने योग्य बनते हैं.

(१९) भगवान कहां है कोई बता सकता है क्या, और कहां रहते हैं?
बचपन से हरेक व्यक्ति ने अपने-अपने धर्म (विश्वास) की वजह से भगवान् की किसी न किसी खास आकृति या/और नाम के रूप में कल्पना अवश्य की है. बड़े होने पर कन्फ्यूजन होना स्वाभाविक है कि इतने सारे भगवान् तो होने संभव नहीं, सच्चा भगवान् आखिर है कौन सा? प्रत्येक धर्म (विश्वास) के पदाधिकारी जब अपने-अपने भगवान् को ही सच्चा भगवान् ठहराते हैं तो दिमाग और घूम जाता है!!! इस कन्फ्यूज्ड दिमाग से ही यथार्थ भगवान् की खोज शुरू होती है. ...आप भी प्रबल जिज्ञासा लेकर अपने पैरों (प्रयासों) से खोजिये, उत्तर अवश्य मिलेगा. आध्यात्मिक (मैं और भगवान् सम्बन्धी) ज्ञान की यात्रा दूसरे के पैरों से होना संभव ही नहीं! आपकी स्वयं की अनुभूति ही आपको 'पक्का' यकीन दिला सकती है कि भगवान् मायने यह...! मेरी या अन्यों की अनुभूतियाँ या ज्ञान आपको और अधिक कंफ्यूज ही करेगा, क्योंकि सबके अलग-अलग उत्तर होंगे. ...क्योंकि सच तो यही है कि कुछेक को छोडकर अधिकांश ज्ञानियों की व्याख्या अभी भी अनुभूति रहित ज्ञान से उपजी है! भगवान् को जानना है तो प्रबल इच्छा, तड़प और समर्पण भाव से आत्ममंथन व गहरे चिंतन की आवश्यकता है वो भी खुद से, बिना किसी अवलम्बन के! किसी गुरु या समझदार व्यक्ति से केवल कुछ मार्गदर्शन मिल सकता है, मंजिल नहीं! जिम-ट्रेनर या कोई कोच हमें कुछ टिप्स मात्र देता है, व्यायाम हमें खुद ही करना पड़ता है! किसी की भी कसरत से सिर्फ उसी का शरीर बलवान बनता है! ऐसा संभव ही नहीं कि जिम-ट्रेनर व्यायाम करे और सिक्स-पैक्स आपके बन जायें! आप कोई बल प्राप्त करते हैं तो उस बल को भीतर से केवल आप ही महसूस कर सकते हैं कोई दूसरा नहीं (इसी को अनुभूति कहते हैं)! माना कि यदि कोई ईश्वर को प्राप्त भी कर चुका है तो उसकी अनुभूति वह आपको कैसे करा सकता है?! अच्छे से स्मरण रहे, अध्यात्म का मूलभूत सिद्धांत है-- "जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियाँ (स्वभाव), उतने ही साधना-मार्ग!" अतः आपसे यदि कोई यह कहे कि अमुक (फलाने) मार्ग पर चलकर मैंने ईश्वर को प्राप्त किया, तो जरूरी नहीं कि उसी मार्ग से आपको भी वह अनुभूति हो सके!

(२०) प्रकृति, पुरुष और परमात्मा मे क्या अंतर है? हम स्थूल रूप में प्रकृति को ही गुरु मानते है क्योकि, हम मनुष्य की हर विज्ञान की खोज अधिकतर प्रकृति का सूक्ष्म अवलोकन कर निकाली है, क्या प्रकृति मनुष्य के वश है या मनुष्य प्रकृति के वश या सब परमात्मा के अधीन है या परमात्मा भी इस प्रकृति के अधीन है??
आदरणीय श्रीमान् जी, सादर प्रणाम. कुछ कहने से पहले स्पष्ट कर दूं कि मैंने अध्यात्म का कोई भी ज्ञान शास्त्रीय पद्धति से नहीं पाया है; अध्यात्म को जितना भी आजतक समझा है वह सब स्वयं ही गिरते-पड़ते, और वह भी विज्ञान के चश्मे से! "...(१) सॉफ्टवेयर के रूप में कोई तो ऑपरेटिंग सिस्टम या ऊर्जा इस देह के भीतर विद्यमान होती है, जिससे हमारा शरीर जिन्दा व चलायमान रहता है, अध्यात्म में जिसे आत्मा का नाम दिया गया है. ...(२) सभी देहों में समान प्रॉपर्टीज़ (गुणधर्म) के साथ आत्मा का एक ही स्वरूप विद्यमान होता है. ...(३) देह एवं मस्तिष्क (ब्रेन) तथा उसमें उपस्थित संस्कार, वृत्ति आदि प्रत्येक में (उसकी अपनी सोच और कर्म के अनुसार) भिन्न-भिन्न होती है, इसी कारण उनका आचरण, व्यवहार आदि भिन्नता लिए होता है. ...(४) बूंद रूपी इतनी सारी आत्माएं हैं, तो विशाल सागर (परमात्मा) भी अवश्य होगा, जिसमें से विलग होकर ये देहों में आई हैं! आत्मा यदि निराकार, अदृश्य और सनातन (सदैव अस्तित्व में, अविनाशी) है तो परमात्मा भी ऐसा ही होगा/है. ...(५) आत्मा की सफल अनुभूति के अतिरिक्त हमें एक बात और समझ में आती है (जिसका अनुमोदन विज्ञान भी करता है) कि हमारी पृथ्वी सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक 'सिस्टम' के अधीन है, इस सिस्टम को हम प्रकृति का सिस्टम या प्रकृति के नियम भी कहते हैं! जैसे गुरुत्वाकर्षण का नियम, क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम, ऊर्जा की अक्षुण्णता का सिद्धांत (यानी ऊर्जा नष्ट नहीं होती), ..आदि-आदि. ...(६) यह सब है तो इनका निर्माणकर्ता कोई तो अवश्य होगा (जिसको हम परमात्मा कहते हैं) अर्थात् परमात्मा की सफल अनुभूति हमें प्रकृति और उसके अकाट्य नियम व सिद्धांत कराते हैं! ...(७) परमात्मा ने समस्त ब्रह्माण्ड रचा, एक ही बार में बहुत सारे चिरस्थाई नियम-सिद्धांत बनाये (जिनको हम विज्ञान द्वारा धीरे-धीरे जान रहे हैं), मानव सहित बहुत सारे जीवों को जन्म दिया, उनकी भौतिक देहों के जीवित रहने के लिए उनके ऑपरेटिंग सिस्टम के तौर पर अपने कुछ सनातन अंशों (आत्माओं) को उनमें स्थापित किया; ...(८) सबसे बड़ी बात कि शरीरों को भौतिक और भंगुर बनाया.. ...(९) ..और मानव शरीर को कुछ ख़ास ही बनाया जिसमें उत्कृष्ट हार्डवेयर प्रयुक्त किया गया, पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कर्मेन्द्रियों के अतिरिक्त इस हार्डवेयर (देह) का एक विशिष्ट हिस्सा बहुत उन्नत ब्रेन (मस्तिष्क) भी है.., जो हमारे विचारों, संस्कारों और वृत्ति (प्रवृत्ति) का कारखाना व वेयरहाउस (गोदाम) है. हमारे अधिकतर काम और सोच आज इसी के द्वारा नियंत्रित होती है! ...(१०) परमात्मा ने यह सब रचकर, नियम-कानून (प्रकृति के सिद्धांत) बनाकर हमें स्वतंत्र छोड़ दिया (सोचने और करने की स्वतंत्रता देकर). ...(११) इसके बाद वह है..., लेकिन बंधा है अपने ही नियमों-सिद्धांतों के अंतर्गत सब होता देखने के लिए. ..वह है..., लेकिन हस्तक्षेप बिलकुल भी नहीं करता क्योंकि उसके नियम-सिद्धांत पर्याप्त हैं स्वतः न्याय होने देने के लिए. ..वह है..., उन्हीं सब गुणधर्मों के साथ, जो आत्मा के हैं, इसलिए जब भी हम कातर होकर उससे विनय-अनुनय करते हैं तो वह बदले में केवल यह कृपा करता है कि हमें आत्मा (परमात्मा) के मूल गुणों से बारम्बार परिचित कराता रहता है..., क्योंकि मात्र उन्हीं गुणों को जीवन में उतार कर (अमल करके) हम आनंदित रह सकते हैं और मोक्ष (चिरस्थाई आनंद) का अनुभव जीते जी और दैहिक मृत्यु के पश्चात् भी कर सकते हैं. .....(क्रमशः... फिर कभी)
...सार्वभौमिक रूप से विश्व में व्याप्त एवं मान्य नैतिक गुण ही परमात्मा के मूल गुणधर्म हैं (क्योंकि दुनियावी संस्कारों को एक किनारे कर देने पर प्रत्येक की शुद्ध आत्मा से भी ऐसी ही ध्वनि आती है)! परमात्मा निराकार होते हुए भी प्रकृति के रूप में व्यक्त होता है. परमात्मा के नियम-सिद्धांत आदि भी प्रकृति के जाने-अनजाने नियम-सिद्धांतों के रूप में हमारे समक्ष हैं. व्यक्ति प्रकृति के अधीन है; यदि वह प्रकृति के नियमों को सम्मान देकर उनपर चलता है तो सुख में रहता है, अन्यथा संकट में पड़ता है. परमात्मा यद्यपि रचियता है इस प्रकृति का और इससे जुड़े प्रत्येक नियम का, ...तथापि प्रकृति का "संविधान" रचने के बाद वह भी इससे बद्ध है.

(२१) यदि अंतरात्मा की आवाज़ होती है तो वे सब को सुनाई क्यों नहीं देती...?
एक जलते हुए यानी प्रकाशित बल्ब के ऊपर यदि हम एक मोटा तौलिया, कंबल या कोई आवरण डालकर उसे ढक दें, तो उस जलते बल्ब का प्रकाश अस्तित्व में होते हुए भी हमें दिखाई नहीं पड़ता या कपड़े की मोटाई के अनुसार वह प्रकाश हमें हल्का सा दिखाई पड़ता है। ...समझने के लिए बल्ब यानी आत्मा; प्रकाश यानी आत्मिक प्रकाश (आत्मा की आवाज या मार्गदर्शन); बल्ब के ऊपर आवरण यानी हमारे मन पर अंकित संस्कार (वर्तमान एवं पूर्व के भी), हमारे स्वभाव-केंद्र, हमारी प्रवृत्ति, सोच, आदि। ..इस मानसिक आवरण के कारण आत्मा के दिशा-निर्देश हमारी ज्ञानेन्द्रियों या कर्मेन्द्रियों तक नहीं पहुंच पाते और हमारे अधिकतर निर्णय या कार्य मन में विद्यमान संस्कारों के निर्देशानुसार होते हैं! ...इससे एक अन्य प्रश्न का भी उत्तर मिलता है कि "आत्मा सबकी एक परंतु सोच व कर्म अलग कैसे?" उत्तर होगा-- आत्मा सबमें एक पर आवरण का प्रकार प्रत्येक पर भिन्न-भिन्न! यही कारण है हमारी भिन्नता का!

(२२) क्यों हम अपने द्वारा किये गए हर कर्म के उत्तरदायी होते है? हम लोग अक्सर भावना के शिकार हो जाते है हमारे आपने लोग कभी कभी हमें गलत काम करने के किये विवश कर देत्ते है और कभी कभी परिस्थिति के शिकार भी हो जाते है!?
चूंकि प्रत्येक कार्य को करने के लिए फैसला हमें ही लेना होता है, तब भी यदि हम यह जानते हुए भी कोई वह कार्य करते हैं जिसको हम भलीभांति समझ रहे हैं कि वो गलत काम है, ...तो उसके उत्तरदाई पूरी तरह से हम ही होते हैं। इसमें कोई भी संदेह नहीं! ....हाँ, यदाकदा किसी आपातकाल में "धर्म" यानी 'सही' की रक्षा हेतु कोई गलत काम भी करते हैं तो वो कोई अपराध नहीं! लेकिन ध्यान रखें कि सत्य की रक्षा होते ही उस गलत काम को छोड़कर वापस हमें 'सही' मार्ग पर 'तुरंत' लौटना होगा, अन्यथा फिर हम उत्तरदाई होंगे। इसे 'आपदधर्म' भी कह सकते हैं. ..पुनः, सचेत रहें कि 'आपदधर्म' केवल 'अल्पकाल' के लिए, केवल 'धर्मरक्षा' के लिए (सत्य एवं न्याय की रक्षा के लिए) होता है, और कार्य पूर्ण होते ही उसे (आपदधर्म को) त्यागकर 'सामान्य सही मार्ग' पर तुरंत लौटना आवश्यक होता है, अन्यथा हम पाप के भागी बनते हैं!

(२३) आम जीवनयापन के अतिरिक्त जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या होना चाहिए?
आध्यात्मिक गुणों का व्यवहारिक अमल कर अच्छा इंसान और बेहतर नागरिक बनना; इसके लिए शैशवकाल से ही अच्छे लोगों और उत्कृष्ट साहित्य की संगत जरूरी।

(२४) क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, इसपर कैसे विजय पाएं...?
अबतक के विचार-मंथन से हमने मोटे तौर पर यह तो निष्कर्ष निकाल ही लिया होगा कि 'क्रोध' हमारे (यानी आत्मा के) मूल गुणधर्म का हिस्सा नहीं!!! यह एक आगंतुक संस्कार है, जब हम ऐसा समझ लेंगे तो धीरे-धीरे उसपर नियंत्रण पा लेंगे. ...बड़ा हठी होता है 'क्रोध', लेकिन है तो अनचाहा आगंतुक ही, ...तो निपटा जा सकता है उससे जैसे हम अपने घर में घुस आए किसी अनचाहे उचक्के आततायी से निपटते हैं. ...एक अन्य उपाय-- ...जैसे निरंतर प्रकाश के सान्निध्य में रहकर हम अंधकार से दूर रह सकते हैं वैसे ही अच्छी संगति, अच्छे विचारों और आत्मा के करीब रहकर हम क्रोध से परे रह सकते हैं.
उपरोक्त प्रयास हम पहले स्वयं करें तदोपरांत इसके लिए पर्याप्त जनजागृति भी करें तो हमारे समाज में आत्मिक गुण बढ़ेंगे, फलतः हिंसा व अपराध भी कम होंगे.

(२५) क्रोध से बचने का क्या उपाय है?
सात्त्विक विचारों के सान्निध्य में सतत रहना ही क्रोध को टालने या नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय है, जैसे कोई दीपक प्रज्जवलित करने पर ही अंधकार का नाश संभव होता है.

(२६) क्या कारण है हम हमेशा सही होते है और दूसरे गलत?
हमारा "अहंकार" ही हमें हमेशा यह बताता और जताता है कि दूसरे गलत या हीन हैं और केवल हम ही श्रेष्ठ! आध्यात्मिक (धार्मिक) जगत में भी यह बीमारी बहुत है.

(२७) सुखी होने का मूल मंत्र क्या है?
आत्मा और आत्मा के गुणों को खोजते रहें, उन्हें जानते-पहचानते रहें, ...फिर सबसे बड़ी बात कि उनपर अमल भी करते चलें। अवश्य ही हम खरा सुख प्राप्त करेंगे ही।

(२८) भगवान में न्याय और कृपा- दोनों पूरे-के-पूरे हैं, वे कृपा करते ही रहते हैं, कृपा करना उनका स्वभाव है! हम उन्हें दोषी क्यों बनाते हैं?
हम मूर्ख और मूढ़बुद्धि हैं इसीलिये! ..यह बात नहीं कि ईश्वर के बारे में पता नहीं हमको, फिर भी.....!! ..शायद ईश्वर और ईश्वर निर्मित प्रकृति के अकाट्य नियमों पर हमारा विश्वास खोखला है, और ईश्वर के तथाकथित ढोंगी मीडिएटर्स पर हम कुछ ज्यादा ही आश्रित हैं!

(२९) सकारात्मक कर्म नकारात्मक को काटता है?
नहीं, एक-दूसरे से कटते नहीं है! सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के कर्मों के फल कर्म की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग प्राप्त होते हैं। अच्छे के बदले अच्छा, और बुरे के बदले बुरा! ...दोनों का खाता अलग-अलग होता है।