Saturday, January 20, 2018

(९१) चर्चाएं ...भाग - 10

(१) अध्यात्म मार्ग पर चल कर व्यक्ति में क्या परिवर्तन आते हैं? आज अध्यात्म शब्द एक फैशन सा बनता जा रहा है ....किन्तु ऐसा देखने में आया है कि बहुत विरले लोगों में ही सुधार नज़र आता है ...क्यों?
अध्यात्म मार्ग पर चलकर (वास्तव में अमल करके) सर्वप्रथम व्यक्ति के प्रभामंडल में सकारात्मक परिवर्तन आता है, वह शीतल, सुखद और मन को भाने वाला हो जाता है; इसके अलावा स्नायुतंत्रों पर नियंत्रण होता है, इच्छाओं पर नियंत्रण होता है, राग-द्वेष कम होता है, सोच और कर्म न्यायोचित होते हैं, रवैया पक्षपात रहित होता है, मिजाज अच्छा और सकारात्मक हो जाता है. शेष आपके इस कथन से मैं सौ फीसदी सहमत हूँ कि आज 'अध्यात्म' शब्द एक फैशन सा बनता जा रहा है. भौतिक जीवनचर्या से हट कर केवल नाम भर के लिए किसी आध्यात्मिक गुरु अथवा संस्था से जुड़ना आज एक अतिरिक्त गतिविधि या स्टेटस सिम्बल के रूप में स्थापित होता जा रहा है! तो अध्यात्म से जुड़कर व्यक्ति की सोच और जीवनशैली में सही मायनों में जो परिवर्तन या सुधार आना चाहिए, वो विरले ही देखने में मिलता है. अधिकांशतः हमारी आध्यात्मिक गतिविधियाँ यंत्रवत या देखादेखी या केवल शौकिया ही होती हैं इसलिए उनमें उथलापन होता है.

(२) आज देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क्या है...? क्या देश में धर्म की लड़ाई सबसे बड़ी चुनौती नहीं है क्योंकि इससे देश की एकता को खतरा है!?
मेरे विचार से आज देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे देश की आम जनता को शिक्षित व परिपक्व किया जाये! निश्चित रूप से वर्तमान सरकार तो इस मामले में गंभीर नहीं है! क्योंकि देश की जनता शिक्षित माने परिपक्व सोच की हो जाती है तो धर्म-आधारित परस्पर लड़ाइयाँ समाप्त हो जायेंगी और इससे उनके वोट-बैंक को भारी खतरा हो जायेगा! तब आम जनता विकास सम्बन्धी असली मुद्दों पर ही विचार करके वोट देगी! ...'अशिक्षित और भोली' (अपरिपक्व) जनता के बीच फूट डालकर राज करना अत्यंत सरलता से संभव होता है यह बात कभी अंग्रेजों ने भी समझ ली थी और यहाँ एक लम्बे समय के लिए अपना राज स्थापित किया था! यह सिलसिला तब से अबतक अनवरत चलता आ रहा है! तब से अबतक अशिक्षा की भूमि पर सत्ता की फसलें उगाई जाती रही हैं और उर्वरक के तौर पर 'धर्म' को इस्तेमाल किया जाता रहा है! देश की हिन्दीभाषी बेल्ट में केवल 'दिल्ली' प्रदेश में ही यह सिलसिला टूटा है! आशा है कि अन्य जगहों पर भी शायद जनता के दिलोदिमाग में कुछ परिवर्तन आए, लेकिन मौजूदा राष्ट्रीय राजनीतिक दल पूरा जोर लगा रहे हैं कि जनता अशिक्षित, अपरिपक्व और धार्मिक वैमनस्य-झगड़ों आदि में ही उलझी रहे! ...इसके अतिरिक्त, नोटबंदी से लेकर अबतक जबरन डिजिटलीकरण, विभिन्न टैक्स और बेतरतीब लाइसेंस ढांचों आदि के द्वारा आम जनता को इस कदर भयभीत और व्यस्त कर दिया गया है कि वह बस बचने-बचाने में ही लगी है! सोचने-समझने और निज-विचार अभिव्यक्ति की गुंजाईश ही खत्म कर दी गयी है. इसके बाद जनता के पास थोड़ा-बहुत सोचने के लिए कुछ बचता है तो वह है 'धर्म'! ..और फिर उसकी धार्मिक भावनाओं को भड़का कर सम्मोहित अवस्था में ला कर मनचाहा धार्मिक द्वेष उत्पन्न किया जा रहा है, ..और इस प्रकार सत्ता को अक्षुण्ण रखने के प्रयास चल रहे हैं.

(३) देश में बैंकों में जमा धन को लेकर लोगों की चिंता कितनी सही है...? आज बैंकों में जमा धन को लेकर लोगों की बढ़ती चिंता के पीछे बैंकों के बढ़ते घाटे हैं जो गलत नीतियों के परिणाम हैं ...आज इस मुद्दे पर शुरू हुई बहस के पीछे वास्तविकता क्या है ....अपने विचार शेयर करें.
इस मुद्दे पर शुरू हुई किसी बहस के बारे में तो अभी मुझे कोई जानकारी नहीं, पर आप के द्वारा उठाये गए प्रश्न के अनुसार मेरा अनगढ़ उत्तर यह है-- ...मेरे विचार से बैंकों की स्थापना का मूल उद्देश्य लोगों के धन को सुरक्षित रखना, सहेजना ..और बिखरे हुए व निठल्ले धन को एकत्रित (केन्द्रित) करके देश के विकासकार्यों व उत्पादन आदि बढ़ाने में लगाना था. भारतीय बैंक भी यही करते रहे. लेकिन विगत कुछ वर्षों में सरकारी बैंकों के ऊपर एक संकट एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स अर्थात् गैर-निष्पादित राशि के रूप में आया. ये गैर-निष्पादित राशियाँ मूलतः या मुख्यतः बैंकों द्वारा दिए गए विभिन्न ऐसे कर्ज थे जिनको कर्जदारों द्वारा वापस चुकाया नहीं गया और न ही उनको वापस पाने की संभावनाएं ठोस रूप से दिख रही हैं! इसका मुख्य कारण यह है कि बहुत से कर्ज सरकारों द्वारा माफ़ कर दिए गए हैं और अनेक अन्य कर्जों के कर्जदार दिवालिया या भगौड़े हो गए हैं! वित्त मंत्रालय ने भी इन कर्जों को लेकर चिंता जताई है, लेकिन कर्ज-वसूली या भरपाई को लेकर कोई ठोस उपाय अभी तक सामने नहीं आया है. ...उधर बैंकों ने भी हुए नुकसान की भरपाई के लिए विभिन्न बैंकिंग सुविधाओं पर अनेकों शुल्क बढ़ा दिए हैं और कई नए भी लगा दिए हैं, जमा धन पर ब्याज दरों में भी काफी कटौती की है; सरकार ने भी नोटबंदी और जबरन डिजिटलीकरण आदि उपायों से दबाव बनाकर आम जनता का लगभग सारा धन बैंकों में एकत्रित कर लिया है! नोटबंदी के बाद से अबतक खाताधारकों के प्रति बैंक-कर्मियों के व्यवहार में भी बहुत गिरावट आई है; सरकार और बैंक-कर्मी आदि साधारण खाताधारक को संशय से देखते हैं और असभ्यता व रुखाई से पेश आते हैं! ..अब आमजन को यह चिंता होनी स्वाभाविक है कि एक तो वह अपने श्रम से कमाया हुआ समस्त पैसा बैंक में ही रखने को बाध्य है, उसे संदेह की दृष्टि से भी देखा जाता है, सरकार और आयकर विभाग भी अपनी धौंस जमाते रहते हैं, ...और दूसरी ओर उसी के जमा धन को सरकारी दबावों द्वारा ऐसे कर्जदारों में बाँट दिया जाता है जहाँ से सकुशल वापसी की उम्मीद बहुत ही कम होती है!!! ...और फिर जो घाटा होता है उसे भी आम खाताधारकों (आम जनता) से ही वसूला जाता है (विभिन्न शुल्कों और कम ब्याजदरों के रूप में)! इसके अलावा बैंकों से लीक या बर्बाद हुए पैसों की कुछ भरपाई यदि सरकार भी करती है तो वह भी आम जनता पर कई टैक्स थोप के, उससे अर्जित करके! यानी लांछन, संदेह, आर्थिक हानि, टैक्स-शुल्कों की मार, अपमानजनक व्यवहार.., सब तरह के डंडे आम जनता के सिर पर! ..फिर किसका मन करेगा कि सरकारी कानूनों के साथ सहयोग किया जाये!? सहयोग होगा भी तो बेमन से और मजबूरी में, राष्ट्रहित में तो शायद कतई नहीं!!! गलत सरकारी नीतियों से धन की बहुत बर्बादी हो रही है और सरकार वसूली कर रही है आम जनता से.., वह भी बलात्... और अपमानजनक ढंग से ताली बजा-बजा कर; ...तो जनता में देशप्रेम की, स्नेह की भावना कैसे बनी रहेगी? लोग भी फिर क्यों न स्वार्थ की ओर मुड़ेंगे??? सरकार और सरकारी बैंकों के इन सब आचरणों से समाज में नैतिकता फैल रही या अनैतिकता? विश्वास फैल रहा है या अविश्वास? सुरक्षा की भावना बढ़ रही है या असुरक्षा की भावना?? जरा सोचिए!

(४) हमें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त होती है? मेरे मन में ये सवाल बहुत दिनों से घूम रहा है!
किसी भी कार्य के दौरान सकारात्मक एवं उल्लासित मनोदशा से या/और किसी ठोस अचीवमेंट की दशा में! इसके विपरीत मनोदशा (यानी नकारात्मक व मन बुझा) रहने से हम स्वयं को ऊर्जा-विहीन महसूस करते हैं, भले ही हमने बहुत अच्छा खाया-पिया हो या कितना भी आराम कर रखा हो!

(५) परमेश्वर ने मुझसे कहा कि वह मुझे मार देगा! इसका अर्थ क्या हुआ, वह मुझे मारना क्यों चाहता है जबकि मै जीना चाहता हूं। और वह इस संसार के साथ मिल कर मुझे क्यों मार रहा है? (प्रश्नकर्ता- जीवीबी मास्टर ऑफ़ वेद मंत्र)
फिर आगे अपने ही मुद्दे के उत्तर-स्वरूप आपने पुनः अपनी बात (भ्रम) को आगे बढाया है कि "मेरा ज्यादा समय तक शरीर में रहना संभव नहीं है!" .....मुझे लगता है कि कदाचित् आप पाठकों के आध्यात्मिक ज्ञान की परीक्षा ले रहे हैं!!! ...जो उत्तर सत्य है और कुछ कटु भी, वह प्रस्तुत है--- 'मेरा' अर्थात् 'अहं '(यानी 'मैं' अर्थात् "जीवीबी मास्टर ऑफ़ वेद मंत्र" यह विशेषण-युक्त प्राणी) का अब इस शरीर में रहना मुश्किल है. जब "अहं" अर्थात् "मैं और परमेश्वर भिन्न" हट जायेगा तो मेरा नाम व उपनाम या विशेषण आदि संपूर्णतः हट कर अब 'मैं' केवल "आत्मा-स्वरूप" शेष रह जाऊंगा! अब 'मैं' यानी 'आत्मा' रहेगा तो इस ईश्वरीय उपहार स्वरूपी शरीर में ही (इस शरीर की प्राकृतिक एक्सपायरी डेट तक), लेकिन साथ ही इस शरीर को ही 'मैं' व 'स्थाई' मानकर नहीं! इससे मेरा मोह समाप्तप्राय हो जायेगा! इस स्थूल और भौतिक देह की हिफाजत और देखरेख में कोई कमी नहीं आयेगी क्योंकि यह ईश्वर-प्रदत्त है, इसका सम्मान पूर्ववत् ही होगा, पर इसका सदुपयोग अब ईश्वरीय अर्थात् श्रेष्ठ कार्यों हेतु, वह भी अकर्म-कर्म द्वारा ही सम्पादित होगा! संसार अब भी मुझे मेरे नाम, उपनाम या विशेषण द्वारा शायद जाने, पर मैं जानता हूँ कि मैं इन सबसे आगे प्रथमतः एक आत्मास्वरूप हूं, आत्मा ही हूँ! इस शरीर में मेरा प्रवास ईश्वरेच्छा से है और मैं (आत्मा) इस ईश्वर-इच्छा का सम्मान करता हूँ. मेरा नाम, उपनाम (विशेषण), गोत्र, जाति, आदि सब किसी जागतिक भौतिक सभ्यता के कारण या संस्कृति-वश ही हैं मात्र! ....इनमें से उपनाम (विशेषण) तो शायद मेरा अहंकार से ही उपजा है!!! जब अहं नहीं तो यह विशेषण भी नहीं!!! विनम्रता से त्यागता हूँ इसे!!!

(६) ऊपर के प्रश्नकर्ता "जीवीबी मास्टर ऑफ़ वेद मंत्र" जी का उत्तर-- इस सत्य से मेरा साक्षात्कार हो चुका है कि इस शरीर में दो है एक मैं स्वयं दूसरा जिसे मैं परमेश्वर समझता हूं वह मुझसे शक्तिशाली है उसने मुझसे जो कहा था उसी मार्ग का हमारी शरीर अनुसरण कर रही है। मै स्वंय को जानता हूं जो एक शरीर धारी है आत्मा है यहां बात शरीर की हो रही है। वह मुझ आत्मा को मारने में समर्थ हो सकता है क्योकि कि मुझ शरीर धारी आत्मा को मारने का चक्रव्युह रच दिया है जिसमें हमारी शरीर फंस चुकी है। जिसे हम आत्मा कहते हैं वास्तव में जब वही ज्ञानवान होता है तो परमात्मा जैसा हो जाता है।
कहते हैं कमी व अति हर चीज की बुरी. ..जीवीबी मास्टर ऑफ़ वेद मंत्र महोदय जी, आप आध्यात्मिक ज्ञानवर्धन के अतिरेक में बहकर अनेक 'भ्रमों' का शिकार हो रहे हैं!
एक और भाई ने प्रथमतः आपको बिलकुल सटीक जवाब दिया था कि, "भ्रम में ना रहें। परमेश्वर कभी किसी को नहीं मारता, अज्ञानी मनुष्य ही एक दूसरे को मारने का प्रयास मात्र करता है। परमेश्वर तो परमात्मा हैं, वे मनुष्य रूपी आत्मा को क्यों मारना चाहेगा ? क्या कभी सागर किसी बूंद को मारने का प्रयास कर सकता है?"
अंत में आपके उपरोक्त उत्तर की अंतिम पंक्ति, "जिसे हम आत्मा कहते हैं वास्तव में जब वही ज्ञानवान होता है तो परमात्मा जैसा हो जाता है.", के उत्तर में एक बात कहना चाहूंगा कि, "आत्मा तो परमात्मा का ही एक अंश है, और उसके गुणधर्म बिलकुल परमात्मा के गुणधर्मों के समान हैं. हाँ, उस पर विभिन्न सांसारिक संस्कारों, मानवीय बुद्धि और 'अहं' का आवरण चढ़ जाता है जिससे वह (आत्मा) अपने मूल स्वरूप में प्रकट नहीं हो पाती. आध्यात्मिक साधना, सत्संग और सत्सेवा आदि से धीरे-धीरे वह आवरण नष्ट होता है और आत्मा अपने मूल स्वरूप में प्रकट होती है. इसी को आत्मसाक्षात्कार भी कह सकते हैं. जब बुद्धि, संस्कार और अहं आदि का आवरण स्थाई रूप से पूर्णतया नष्ट हो जाता है तभी कह सकते हैं कि आत्मा अब परमात्मा तुल्य (के समान) हो गयी यानी उसका ज्ञान (जो उसमें पहले से ही विद्यमान था ही) आवरण नष्ट होने से अब प्रकट हो गया.

(७) फिल्मों के माध्यम से सामाजिक सन्देश देना कितना सफल है...??
सामाजिक सन्देश देने के लिए फिल्में एक बहुत सशक्त माध्यम हैं. आमिर खान सरीखे चुनिन्दा हिंदी फ़िल्मकार अपनी फिल्मों के माध्यम से समय समय पर अनेकों सार्थक सन्देश देते रहते हैं और दर्शकों को भी उनकी फिल्मों का इंतजार रहता है! इन फिल्मकारों की फिल्में कुछेक ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर भी दर्शकों को अनोखा, नवीन, स्वस्थ एवं तटस्थ दृष्टिकोण दे जाती हैं जिन मुद्दों पर कुछ बोलने में बड़े-बड़े कद्दावर नेता भी घबराते हैं. मैं और मेरे जैसे असंख्य दर्शकों को ऐसी फिल्मो का इंतजार बेसब्री से रहता है. ऐसी फिल्में हमारे सुप्तप्राय समाज में बड़ी क्रांति लाने में तो शायद अभी सक्षम नहीं, पर उसके बीज तो वो बो ही रही हैं!

(८) तथाकथित 'अच्छे' लोग ही क्यों अधिक झेलते हैं? एक ही कारण है कि तथाकथित अच्छे व्यक्तियों को भुगतना पड़ता है, क्योंकि ये कुछ कृत्यों को पाप सदृश्य मानते हैं। जो लोग खुद को "अच्छा" कहते हैं और इसमें गर्व करते हैं, वे "अच्छेपन के अहंकार" से ग्रस्त हैं... वे स्थिति की जरूरतों और मांगों के आधार पर कार्य नहीं करते हैं, बल्कि वे अच्छे दिखने के अहंकार से प्रेरित होते हैं। यह समझने पर कि कुछ कर्म पापपूर्ण हैं, उनके लिए अपराधबोध और शर्म आती है और इन भावनाओं के चलते उन्हें अधिक भुगतना पड़ता है. 'कर्म का विधान' केवल पिछले जन्मों के लेखानुसार ऋण उतारने की बात ही नहीं बल्कि बड़े अर्थों में यह आध्यात्मिक सबक सीखने के बारे में है. कर्म के विधान के उच्च पहलू में पाप के लिए कोई स्थान नहीं है। जिस क्षण हम पाप की अवधारणा को स्वीकार करते हैं, हमें और अधिक भुगतना पड़ता है।
आपका विश्लेषण काफी हद तक सही है श्रीमान् जी! जी हाँ, यह सच है कि अधिकांश तथाकथित 'अच्छे' व्यक्ति कुछएक कृत्यों को पाप की श्रेणी में रखकर, उनसे घृणा कर स्वयं को जबरन उनसे दूर रखकर, खुद को 'अच्छा' घोषित करते हैं; वे अवश्य ही 'अच्छेपन' के अहंकार से ग्रस्त हैं! वे पाप और पुण्य की एक सख्त सी धारणा रखते हैं, सिर्फ विचारों में ही नहीं बल्कि खानपान तक में! ...वो सोचते हैं कि उनके यह विचार सभी को हर हाल में 'स्वीकार्य' हो! उनकी यह तीव्र इच्छा उनके कर्मफलों में अनेकों जटिलताएं पैदा करती हैं! ...देखा जाये तो प्रत्येक व्यक्ति को देश-काल-परिस्थिति अनुसार अनेकों कृत्य करने होते हैं; लेकिन तथाकथित 'अच्छे' व्यक्ति जब उनमें से कुछ कृत्यों को करते समय अपने ही पूर्वाग्रह या विश्वास के कारण अपराधबोध या ग्लानि से ग्रस्त होते हैं तब उनको उन कृत्यों का दंड अधिक मात्रा में भोगना पड़ता है! ...क्योंकि यह एक परम एवं कटु सत्य है कि, जो कर्म विश्वास के साथ या विश्वास के अनुसार नहीं किया गया या जो कर्म आपने आपकी धारणा के विरुद्ध किया, वह आपके लिए निश्चित ही 'पाप' है! ...इसलिए मेरे विचार से, 'वास्तव में अच्छे' व्यक्ति सरल स्वभाव के होते हैं, वे पाप और पुण्य आदि की पूर्वस्थापित धारणाओं से दूर रहकर खुद को देश-काल-परिस्थिति अनुसार अच्छे से अच्छा करने को प्रेरित करते रहते हैं. हमें सदैव प्रथम सकारात्मकता के बारे में सोचना होगा, पहले से ही नकारात्मकता का विचार लाना व उससे बचने की सोचना मानों पाप को न्योता देने समान है! ..उदाहरण के लिए, यदि हम सत्य का ही विचार करेंगे और यथासंभव केवल सच ही बोलेंगे तो झूठ से तो अपनेआप ही पर्याप्त दूरी बन जाएगी! ..इसके विपरीत, यदि हम झूठ को पाप समझेंगे और बार-बार खुद को याद दिलाएंगे कि झूठ से दूर रहना है, उतनी ही बार हम झूठ को याद कर रहे होंगे; ..और फिर किन्हीं विषम परिथितियों में अच्छे के लिए ही जरा सा झूठ बोलते ही हम ग्लानि से भर जायेंगे और तीव्र नकारात्मक कर्मफल के भागी होंगे. ..जबकि बिना किसी जटिल व नकारात्मक पूर्वनिर्धारित सोच के हम अपेक्षाकृत बहुत सरल स्वभाव के होंगे और तब उस कर्म का तीव्र विपरीत असर हम पर नहीं होगा! जी हाँ, सरलता ही अपनेआप असली अच्छाई को जन्म देती है.

(९) फिल्म पद्मावत को लेकर मचे घमासान के पीछे क्या सत्य है...?? क्या यह एक गन्दी राजनीति है...?
हमारे यहाँ किसी भी समुदाय के लोग हों या फ़िल्मकार..., समझदारी, रचनात्मकता, बौद्धिक क्षमता आदि तो बढ़ी है, परन्तु उसमें गहराई व परिपक्वता नदारद है. बल्कि मैं तो यह कहूँगा कि नकारात्मक संवेदनशीलता क्रमशः बढ़ ही रही है! इसके बढ़ने के पीछे की बड़ी वजह प्रत्येक समुदाय के शीर्ष पर बैठे कुछ लोग हैं; राजनीतिज्ञ भी वोट-बैंक की खातिर इनकी जड़ता को बढ़ाने के लिए हवा दे ही रहे हैं. आज के फ़िल्मकार भी बोल्ड रचनात्मकता के नाम पर बिना इनकी परवाह किये तथाकथित संवेदनशील मुद्दों पर सीधे-सीधे फिल्में बनाना चाह रहे हैं. क्या किरदारों और स्थान आदि के काल्पनिक नाम रखकर किसी सत्यकथा पर आधारित फिल्में बनाना संभव नहीं है?? फिल्मों का निर्माण मनोरंजन, रचनात्मकता के प्रदर्शन, कोई सन्देश देने, पैसा कमाने आदि उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ही तो किया जाता है! ..फिर लोगों की वर्तमान अति संवेदनशील मानसिकता को छेड़ना क्या जरूरी है?? चाइनीस फ़ूड का बहिष्कार करने वाला कोई अतिसंवेदनशील व्यक्ति यदि चाउमीन खाने से बिदकता है तो उसका देसी संस्करण रामदेव जी का आटा नुडल्स तो वह खा ही लेता है!!! कहने का अर्थ यह कि जब तक लोगों का दिल विशाल न हो जाये, फिल्मकारों को भी सावधानी बरतनी चाहिए! ....फिल्म पद्मावत को लेकर घमासान इसलिए मचा हुआ है कि फ़िल्मकार और कतिपय समुदायों ने इस मुद्दे को अपनी आन, बान और शान का विषय बना लिया है! राजनेताओं की तो बल्ले-बल्ले है-- पाँचों उँगलियाँ घी में और सिर कड़ाही में (चित भी मेरी पट भी मेरी).... खूब मजा ले रहे हैं वो! सुप्रीम कोर्ट को ही देश की व्यवस्था सुनिश्चित करनी पड़ रही है, इससे अधिक विडम्बना की बात लोकतंत्र के लिए और क्या होगी भला! ...कभी-कभी मेरे दिल में यह ख्याल आता है कि इस देश में सुप्रीम कोर्ट न होती तो क्या होता!!? .. वैसे वहां भी दरारें पड़नी शुरू हो चुकी हैं! मैं तो सारा ठीकरा गन्दी राजनीति पर ही फोड़ना चाहूंगा; मूल में वही है जो अहंकार और नफरत को बढ़ाकर सामान्य मानसिकता को रसातल में ले जाना चाहती है! उदाहरण के लिए-- 'चाइनीस बहिष्कार' का विचार क्या एक आम आदमी या किसी फ़िल्मकार के दिमाग की उपज है???? जी नहीं, यह राजनेताओं के दिमाग की उपज है. नफरत या बहिष्कार से हम ऊपर को जाने वाले नहीं अपितु मेहनत और ईमानदारी से ही वस्तुतः हम ऊपर की सीढ़ियाँ चढ़ेंगे. राजनेता कभी भी यह नहीं सिखाते कि दूसरे का कद छोटा करने के लिए अपना कद बढ़ाने पर ही मात्र ध्यान दो. ...अपना कद बड़ा सिद्ध करने के लिए दूसरे का कद काटने की बात ही होती है यहाँ!!! बात कुछ कटु अवश्य हो गयी मेरी, पर दिल से निकली है, ...सो रोका नहीं!

Monday, December 4, 2017

(९०) चर्चाएं ...भाग - 9

(१) मुझे नहीं पता क्यों लेकिन मुझे बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है, छोटी छोटी बातों पर भी गुस्सा आता है। ऐसा क्यों है? मन हर समय परेशान रहता है, पुरानी बातें भूल नहीं पा रहा।
लगता है कि अतीत की कड़वी बातों या कुछ नकारात्मक प्रसंगों से प्रभावित होकर आपमें चिडचिडाहट आ गयी है! उसका दुष्प्रभाव तभी समाप्त होगा जब आप किसी नयी सकारात्मक दिशा में कुछ कदम उठायेंगे. यानी कुछ नया व कुछ सकारात्मक सोच या काम शुरू करेंगे, जिससे कुछ नए सकारात्मक (अच्छे) प्रसंग होने की सम्भावना बने. ...कड़वे के बाद कुछ मीठा खाना ही मुंह की जलन को दूर कर सकता है! अन्यथा कितना भी उछलते रहिये कड़वे का कष्ट कम होने वाला नहीं! ..तो बंधुवर, नवीन मीठे प्रसंगों को जन्म दीजिये, गुस्सा अपनेआप गायब हो जायेगा! ..यह सरासर आपके अपने हाथ में है, कोशिश तो करें!

(२) यह ज़िंदगी एक रंगमंच है, जहाँ हर एक को अपने दिए गए पात्र का अभिनय करना पड़ता है....
एक कुशल व ईमानदार कलाकार मात्र अभिनय नहीं करता, वरन वह भूमिका में डूबकर उसे जीवंतता की उंचाईयों पर पहुंचाता है. वह उस भूमिका को जीता है. यह सब उसे 'करना पड़ता है', यह बात नहीं! वह खुशी-खुशी स्वेच्छा से अपनी भूमिका को बड़े मनोयोग से निभाता है! इसलिए हे मानव, ..तुम जीवनरूपी इस रंगमंच पर अपनी उपस्थिति को मात्र एक मजबूरी न समझो! अपितु यह एक अवसर है कुशलता से अपनी भूमिका को निभाकर भविष्य में और भी अधिक महत्वपूर्ण भूमिकाएं पाने का! हमारा जीवन मूलतः कर्मप्रधान है; अतः कुशल व जीवंत कर्म से ही हम लौकिक भूमिका से अलौकिक की तरफ बढेंगे.

(३) जीवन में आज तनाव का मुख्य क्या कारण है..? आधुनिक जीवन में बढ़ते तनाव के अनेकों कारण हैं, उनमें प्रमुख कारण क्या है?
सबसे बड़ा कारण है- अपने आत्मिक स्वरूप को भुलाकर मात्र दैहिक स्वरूप को ही याद रखना! मैं अमुक नाम का व्यक्ति हूँ, मेरा ओहदा यह है, मेरा पैकेज इतना है, मेरा स्टेटस यह है, मेरा परिवार यह है, मैंने इनके लिए यह किया वो किया, मुझे अपने साथियों से आगे निकलना है, आज मैं औरों से बहुत आगे हूँ, मेरे इतने फ्लैट और जमीनें हैं, मेरा इतना बैंक-बैलेंस हो गया, मेरा रुतबा औरों से बहुत ऊपर है, मेरी बहुत जानपहचान है, मैं बहुत सुन्दर हूँ, .....ऐसे न जाने कितने ही सांसारिक विषयों और भौतिक जगत तक ही सीमित रहना और उनके पीछे अंधाधुंध दौड़ना ही आज तनाव का मुख्य कारण है. कितना भी पा लें वो भी कम ही लगता है, तो कुंठा और निराशा साथ नहीं छोडती; ..या ये दोनों नहीं तो और अधिक पाने के लिए लालच तो बना ही रहता है! घर की सुन्दरता, कपड़ों की सुन्दरता, केशसज्जा की सुन्दरता, तन की सुन्दरता आदि पर ही ध्यान बना रहता है बस, ...मन की सुन्दरता को नोटिस करने का ध्यान किसे और कितना है भई! आत्मिक स्वरूप से तो कोसों की दूरी है! फिर तनाव कैसे न हो?! भौतिक संपन्नता पाने के लिए सारी कसरत हो रही है, सब होड़ में हैं, प्रेशर में हैं; ..इंसान बनने की सुध ही किसे है?! एक अच्छा इंसान बनना-बनाना यदि हमारी वरीयता सूची में ही नहीं तो भला तनाव कैसे न हो?!

(४) समझने और समझाने में इतना अंतर क्यों होता है...? कोई बात समझ में मुश्किल से आती है किन्तु समझाना आसान क्यों होता है...?
पुरानी कहावत है कि, 'बोलना तो आसान है पर करना मुश्किल!' ..इसी प्रकार, 'समझाना तो आसान है पर खुद समझना मुश्किल!' ....यीशु मसीह के समय भी कितने ही दिखावटी उपदेशक बहुत सारे प्रवचन दिया करते थे, तब यीशु मसीह ने लोगों से कहा कि, "जो ये उपदेशक कहते हैं बेशक तुम वह सब किया करो, क्योंकि ये ठीक ही बोलते हैं; ..लेकिन वह बिलकुल भी मत करो जो ये करते हैं!" यानी उनकी (उपदेशकों की) कथनी और करनी में भेद था! अर्थात्, कुछ करने के लिए कुछ समझाना तो बहुत सरल है, पर खुद भी समझकर आत्मसात करना व अमल करना बहुत कठिन! बहुत से डॉक्टर भी अपने मरीजों को तम्बाकू, शराब आदि से परहेज रखने को कहते हैं परन्तु दूसरी ओर समानांतर रूप से उनमें से कुछ डॉक्टर शायद इन चीजों का सेवन कर रहे होते हैं! ऐसे ही आज वर्तमान में कितने ही पाखंडी साधू-संतों का भी पर्दाफाश हो रहा है जो समझाते तो बहुत बढ़िया थे, उनके प्रवचन अति सुंदर थे; ..पर खुद क्या वो वह सब समझते भी थे जो वो समझा रहे होते थे!? जी नहीं! समझते होते तो पतन के गड्ढे में न गिरे होते! अतः खुद समझना आसान बात नहीं! समझने की निशानी है- बात को आत्मसात करना; और आत्मसात करने की निशानी है- व्यवहार से प्रकटीकरण (अमल)! ..जबकि समझाना आसान इसलिए है क्योंकि आत्मसात करना और अमल करना तो सुनने वाले का काम है!!!

(५) जैसे जैसे संसार से विमुख हों, ईश्वर के सन्मुख होते जाएँ ...क्या यह कथन सही है? संसार की प्रत्येक वस्तु और संबंध बंधन का कारक हैं ...केवल इनसे विमुख होकर ही मुक्ति संभव है!?
मेरा विचार आपकी बात से थोड़ा विपरीत सा है! मेरे विचार से कुछ 'त्यागकर या छोड़कर' कुछ 'पाने' के जतन से श्रेयस्कर यह होगा कि कुछ ऐसा पाने का जतन किया जाये जिससे अवांछित स्वयं ही छूट जाये! उदाहरण के लिए, 'झूठ' छोड़ने से श्रेयस्कर होगा कि 'सच' को अपना लिया जाये; झूठ अपनेआप छूट जायेगा! ...ईश्वर को जानते और गहराई से समझते जायें (सन्मुख होते जायें) तो संसार से आसक्ति (मोह) अपनेआप कम होता जायेगा! देह और संसार में रहते हुए भी तब हम उसके बंधन से (आसक्ति या मोह) से सर्वथा परे रहेंगे ही! ...अतः पहले विमुखता जरूरी नहीं! ईश्वर से निकटता बढ़ाते जायें तो संसार से विमुखता (बल्कि उसे अनासक्ति कहें तो बेहतर) खुदबखुद हो जाएगी. संसार की कोई भी वस्तु या सम्बन्ध, बंधन का कारक नहीं बल्कि ईश्वरीय गुणों से हमारी दूरी ही विभिन्न सांसारिक आसक्तियों का कारण है!

(६) एक सच्चा देशभक्त कौन होता है...?
एक देश का निर्माण कैसे होता है? लगभग एक समान विचारधारा और मेल खाती संस्कृति के लोगों के गुटों/संघों से ही विभिन्न देशों का निर्माण हुआ. फिर रोजगार, व्यवसाय आदि की तलाश में भी बहुत से लोगों ने किसी न किसी देश की नागरिकता स्वीकार की. कोई भी देश अपने यहाँ रहने वाले अपने नागरिकों को व्यवस्था व सुरक्षा प्रदान करता है. व्यवस्था कायम रखने के निमित्त बनाये गए उसके नियम-कानून प्रत्येक नागरिक को मान्य होने ही चाहियें. व्यवस्था व सुरक्षा पाने की एवज में प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह राष्ट्रभक्त हो. 'राष्ट्रभक्त' यानी राष्ट्र का आदर करने वाला और राष्ट्र को आदर दिलाने वाला! जीवनशैली और विचारों में लगातार सुधार ला कर एक सामान्य नागरिक यह कर सकता है. अपने परिष्कार के अलावा यदि वो समाज रूपी खेत में उग आई फालतू की खरपतवार को भी काटता-छांटता रहे तो और भी उत्तम! चूंकि हमारा जीवन कर्मप्रधान है इसलिए कुछ विशिष्ट बोलना या दिखावटी कृत्य कारण ही वास्तविक देशभक्ति नहीं अपितु कुछ रचनात्मक और सकारात्मक कार्य करना ही वास्तविक देशभक्ति होगी. जो नागरिक कानून के दायरे में रहते हुए अपने देश में अच्छाई को जितना अधिक बढ़ाने में लगा है और बुराई का विरोध भी करता है, वह नागरिक उस देश की प्रगति में उतना ही अधिक योगदान कर रहा है, वह ही खरा देशभक्त है.

(७) धर्म को लेकर राजनीति में विवाद कितने तर्क संगत हैं...?? आज धर्म, राजनीति का अभिन्न अंग बन गया है और राजनीति का स्तर बहुत गिर गया है!
राजनीति में धर्म को कठपुतली समान नचाकर किसी पंथ विशेष को आकृष्ट करने से ओछा काम कोई दूसरा नहीं! वोटों को खींचने लिए धार्मिक भावनाएं भड़काना राष्ट्र को और पीछे लेकर जाता है. क्या यह राष्ट्रद्रोह समान नहीं? बड़े खेद की बात है कि इन्हीं कारणों से पता नहीं कितने ही वर्षों से हमारा देश एक 'विकासशील देश' है! कितने ही छोटे-बड़े राष्ट्र जो कभी हमसे काफी पीछे थे, आज 'विकसित' देशों की कतार में जा खड़े हुए हैं! क्योंकि हमारे आकाओं को अपनी कुर्सी से इतर कुछ दिखता ही कहाँ है! थोड़े बदलाव या आशा की किरण के रूप में मुझे अन्ना हजारे की कक्षा के निर्भीक छात्र अरविन्द केजरीवाल ही दिखते हैं जिन्होंने पारंपरिक भारतीय राजनीति में धारा से विपरीत एक बार नहीं बल्कि दो बार घुसने की और फिर तमाम झंझावातों के बीच डटे रहने की जबरदस्त हिम्मत की (केवल बोलने वाले तो बहुत लोग होते हैं). उनके इस प्रयास में राजधानी दिल्ली की प्रबुद्ध जनता ने उनपर तब ऐसा प्रचंड विश्वास तब दिखाया जब समस्त देश में भाजपा की आंधी चल रही थी! अब राजधानी दिल्ली की जनता को हम अनपढ़ या पिछड़ा हुआ तो नहीं कह सकते ना! तो फिर शायद शेष भारत में चेतना मृतप्रायः है! ये खडूस नेता धार्मिक विवादों को जीवित रखकर उस विकास की आधुनिक चेतना को क्या जागने ही नहीं देंगें कभी?

(८) सद् गुरु, स्वामी अग्निवेश, आचार्य प्रमोद कृष्णम् या इसी प्रकार के कुछ अन्य आध्यात्मिक गुरुओं के कम ही फॉलोवर्स हैं, क्यों?
इन तीनों और इसके सरीखे अनेक अन्य कुछ ज्ञानियों के अनुयायी इसलिए कम हैं क्योंकि ये ज्ञानीजन 'आईने' या 'दर्पण' समान हैं. ...दर्पण सच को सामने लाता है, और दागी व्यक्ति अपने दागों और ऐबों को छुपाता है, उनसे छुपता है; इसलिए वह आईने के सामने जाना अवॉयड करता है, टालता है, उससे बचता है! यह बिलकुल सच है कि हममें से अधिकांश तथाकथित धार्मिक या बुद्धिजीवी लोग परले दर्जे के स्वार्थी और मौकापरस्त हैं, ओछी मानसिकता के अनेकों दाग रखते हैं, ...इसलिए इन सरीखे ज्ञानियों से पर्याप्त दूरी बनाकर रखते हैं. ..बहुत त्रासद है यह कि, कई दूसरे धर्मगुरु जो केवल हमारी भावनाओं, लालसाओं आदि को तुष्ट करते हैं, हमें अनेकों सब्जबाग दिखाते हैं, हम सिर्फ उन्हीं को पसंद करते हैं!

(९) एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु की क्या पहचान है....?? आज बहुत सी संख्या में आचार्य और गुरु मिल जाते हैं किन्तु सच्चे निष्ठावान गुरु को कैसे पहचानें?
एक सच्चे आचार्य, आध्यात्मिक गुरु, या मार्गदर्शक का सर्वप्रथम 'संत' वृत्ति का होना परम आवश्यक है. स्वयंभू संत नहीं वरन सच्चा संत! एक सच्चा संत ही एक खरा आध्यात्मिक गुरु सिद्ध हो सकता है. वास्तविक संत की पहचान-- (१) संत ऊपर से दिखने पर साधारण मनुष्यों जैसे ही होते हैं, जल्दी पहचान में नहीं आते; वे केवल आनंद और संतोष की सुगंध से ही पहचाने जाते हैं. ..(२) संत का अस्तित्व उसकी भौतिक देह या वेशभूषा में न होकर केवल उसके वचनों में होता है. कैसी भी थैली में हीरा रखने पर थैली का महत्त्व नगण्य होकर केवल हीरे का महत्त्व रहता है. ..(३) खरे संत की पहचान उसके विशिष्ट वस्त्रों, केश-विन्यास, भावभंगिमाओं अथवा वाह्य श्रृंगार (मेकअप) से नहीं, वरन उसके नैसर्गिक प्रभामंडल से होती है. ..(४) संत का उद्देश्य अपने उपदेशों या वचनों द्वारा सुनने वालों को मात्र रिझाना नहीं होता, वरन उनके वास्तविक कल्याण की दृष्टि से वे उपदेश देते हैं. ..(५) जिसकी संगति में हमारे अंतर्मन में भगवत्-प्रेम प्रकट हो और विषयों के प्रति आसक्ति कम हो, उसे संत जानें. ..(६) संत के पास जाकर संतोष, शांति व आनंद आदि का वास्तविक अर्थ पता चलता है और इन्हें पाने की रूचि उत्पन्न होती है, ..(७) ईश्वर की सगुण अथवा निर्गुण भक्ति तथा ईश्वरीय गुणधर्मों से ओतप्रोत जीवन जीने के अतिरिक्त कोई भी बात संतों को रुचिकर नहीं लगती. ..(८) अपने व्याख्यानों में संतजन जिन सिद्धांतों की चर्चा करते हैं, उन्हें वे भलीभांति हृदयंगम कर चुके होते हैं और आचरण द्वारा सतत प्रकट करते हैं. ..(९) संतों के व्याख्यान उनके स्वयं के अनुभवों और अनुभूतियों पर आधारित होते हैं, वे व्यर्थ का ढोंग या दिखावा नहीं करते; उपदेश करना उनका व्यवसाय नहीं होता. ..(१०) संतों में भी षड्-विकार होते हैं परन्तु उनका रूपान्तरण भगवत्-भक्ति के साधन के रूप में हो जाता है; तब ये षड्-रिपु व्यष्टि और समष्टि साधना के लिए उपकरण समान बन जाते हैं. ..(११) संतों को भी पूर्वकर्मजन्य प्रारब्ध को भोगना पड़ता है, शारीरिक कष्ट भी होते हैं, परन्तु देहभान न होने के कारण उन्हें इसके कारण किसी सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता. ..(१२) संत हमारे जीवन में आने वाले कष्टों को दूर नहीं करते, वरन वे कष्टों के प्रति हमारे भय को समाप्त कर देते हैं. संकट से अधिक दुखदाई संकट का भय होता है! ..(१३) संत के संसर्ग से हम पापकर्म से दूर होते हैं तथा दुखों में आश्वासन, धैर्य व ढाढ़स प्राप्त करते हैं. ..(१४) संत की संगति से तर्क क्षीण होते हैं, वृत्ति बदलती है, अनुभव और अनुभूतियाँ बढ़ते हैं, अंततः ईश्वर के अस्तित्व की अनुभूति होती है; क्योंकि ईश्वर को तर्क से सिद्ध नहीं किया जा सकता! ..(१५) साधारण संत कहता है, "दुष्टों का नाश हो", जबकि खरा संत कहता है, "दुष्टता का नाश हो" अर्थात् दुष्ट व्यक्तियों की दुष्टता मिटे. ..(१६) खरे संत की सबसे बड़ी पहचान यह है कि आप किसी सांसारिक अभिलाषा की प्राप्ति के लिए उसके पास जायेंगे और अभिलाषा रहित होकर लौटेंगे; संत-संग का यह सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम है. ..(१७) खरा संत हमें कभी भी सांसारिक विषयों में उलझाएगा नहीं, न ही उन्हें एकदम से त्यागने के लिए कहेगा; बल्कि वह उन विषयों के प्रति हमारी आसक्ति को समाप्तप्राय कर देगा. ..(१८) खरा संत कभी भी अपने 'संत' होने का प्रचार-प्रसार नहीं करता और न ही किसी के द्वारा 'संत' कहने-कहलाने पर गदगद् (प्रसन्न) होता है. ..(१९) संत किसी प्रकार का चमत्कार नहीं करते, चमत्कार जैसा कुछ स्वयमेव हो जाता है! इसके लिए आवश्यकता है सतत संत-संगति की.

Thursday, November 16, 2017

(८९) चर्चाएं ...भाग - 8

(१) सपने का मतलब? सपने में यदि मैं खुद को पके धान का खेत काटते हुए देखूं तो इसका क्या मतलब है?
सपने को यदि मात्र सपना ही माना जाए तो इसका कोई गंभीर मतलब कतई नहीं है! यदि सपने का अर्थ किसी संकेत से लगाया जाए तो फिर बीसियों अंधे अनुमान लगाये जा सकते हैं! विभिन्न घटनाओं-प्रसंगों, देखे-सुने किस्से-कहानियों, फिल्मों, टीवी सीरियल, रोजमर्रा की बातचीत वगैरह के अपभ्रंश स्वरूप (एबनॉर्मल या करप्ट फॉर्म) हमारे अवचेतन मन में इकठ्ठा होते रहते हैं. सोते समय अवचेतन मन में इन्हीं अपभ्रंशों के जागने से सपने जन्म लेते हैं. इसीलिए अधिकांश सपनों का कोई सिर-पैर नहीं होता अर्थात् वे अर्थहीन होते हैं! अतः ज्यादा पचड़े में मत पड़िए; ज्यादा मत सोचिए!

(२) प्रेम विवाह के लिए घर वाले नहीं मान रहे तो क्या करना चाहिए?
जरूरी नहीं कि आप सही हों, ..और यह भी जरूरी नहीं कि आपके घरवाले भी सही ही हों. वे मना कर रहे हैं, तो सबसे पहले आप उनकी बात मानते हुए सब्र रखिये और भावुक होकर विद्रोह करने की सोच को बिलकुल छोड़ दीजिये; क्योंकि यह बात पक्की है कि घरवाले ही हमारा सबसे अधिक भला चाहने वाले होते हैं. फिर भी यदि आपके मन में कोई संदेह या वैचारिक मतभेद शेष रह जाएं तो परिवार के किसी अन्य समझदार व परिपक्व रिश्तेदार को मध्यस्थ बनाएं जिसपर आप सहित सभी को पूरा विश्वास हो. फिर वह जो भी निर्णय दे उसे सबके हित में खुले दिल से स्वीकार करें.

(३) मन में उठते संशय कैसे दूर किये जा सकते हैं...?
अच्छी विचारधारा के लोगों, मित्रों के समक्ष उन संशयों को रखकर परस्पर स्वस्थ चर्चा करने से काफी हद तक हल पाया जा सकता है. शेष व्यक्ति की बुद्धि, विवेक आदि उस हल पर निर्णायक मुहर लगाते हैं. संशय गंभीर होने पर किसी योग्य काउंसलर की मदद भी ली जा सकती है.

(४) नोटबंदी को लेकर लोगों के विचार अत्यधिक बंटे हुए क्यों हैं...?
वह इसलिए कि भाजपा ने अपने ढंग से इसके फायदे बताए और विपक्षी दलों ने अपने ढंग से इसके नुकसान! तो आम जनता के विचार का इस मुद्दे पर बंटना स्वाभाविक है. हमारे यहाँ का मतदाता एगोइस्टिक अंध-अनुयायी टाइप का होता है. वह एक दल पर काफी समय तक श्रद्धा रखता है, भले ही वह दल कुछ भी करे! ..सर्वविदित है कि केंद्र में भाजपा की सरकार चुनी गयी थी; मतदाताओं के एक बड़े समूह ने ही तो उसे चुना होगा ना! ..तो वह बड़ा समूह अपने निर्णय को सही ठहराने के लिए अपनी श्रद्धा आजतक बनाये हुए है! अपने चुनाव को सही ठहराने के क्रम में वह केंद्र की हर सही-गलत नीति का समर्थन आंख मींचकर कर रहा है. नोटबंदी उनमें से एक है.
नोटबंदी हो चाहे जीएसटी या फिर डिजिटलीकरण, बिना किसी होमवर्क के बिना किसी 'पुख्ता' तैयारी के लागू करने से त्राहि-त्राहि ही मची है. मैं सरकार की इन नीतियों का समर्थक तो कतई नहीं! गुब्बारे में हवा भरकर विकास के फुलाव को दर्शाना ही लगता है मुझे यह सब! सत्ता के कार्यकाल की शुरुआत में मैं मोदी जी का प्रबल प्रशंसक था, मेरा वोट भी उन्हीं को डला था. लेकिन बाद में..., ..उनकी विभिन्न घोषणाओं के मध्य जो बात मुझे सबसे ज्यादा अखरी वह थी- अपनी सभाओं के दौरान अहंकारपूर्ण ढंग से ताली पीट कर अपनी बात को कहना. खुद को परम समझना और अन्यों को गाजर-मूली; उनकी यह अदा, उनकी सोच और कार्यशैली को दर्शाती है! ...नोटबंदी से लोगों को फायदा महसूस हुआ हो या नुकसान, लेकिन मैं तो मानता हूँ कि आत्मसम्मान को खोकर पाया कोई भी फायदा बेकार का होता है. ...और नोटबंदी के बाद आम जनता अनेकों बार आत्मसम्मान पर गहरी चोटें सह चुकी है. यदि अंगेजों द्वारा दी गयी गुलाम मानसिकता अभी भी भारतीय डीएनए में है और उसको कुछ भी महसूस नहीं होता तो बात अलग है!

(५) व्यवहार में संयम और भाषा की मर्यादा एक सुपात्र को पहचान देते हैं ...क्या आप इस विचार से सहमत हैं? व्यक्ति केवल डिग्री लेकर ही सुपात्र नहीं बनता!
अभी आपकी एक पूर्व-चर्चा "नोटबंदी को लेकर....." पर मोदी जी के आचरण (व्यवहार) पर कुछ लिख रहा था, उसके तुरंत बाद आप द्वारा छेड़ी गयी यह चर्चा देखी तो बरबस सोचने को बाध्य हो गया कि व्यवहार में असंयमता और अमर्यादित भाषा, एक 'प्रधानमंत्री पद' की गरिमा को भी नीचे गिरा सकती है! ....यानी सुपात्रता बल्कि गरिमा कागजी डिग्री से नहीं हासिल होती; वह प्रधानमंत्री पद मिल जाने तक से भी हासिल नहीं होती! गरिमा या ग्रेस आती है तो केवल भेदभावरहित सुन्दर व संयमित व्यवहार से और मर्यादित वाणी से! निःसंदेह, ऐसी गरिमा प्राप्त व्यक्ति ही असली सुपात्र होता है. उसके स्पंदन शीतल व सुखदाई होते हैं (राजनीतिज्ञों में उदाहरण- श्री अटल विहारी बाजपेयी). उसमें तेज होता है, उसकी निर्णयक्षमता उत्कृष्ट होती है, और वह किसी पंथ विशेष का नहीं अपितु वैश्विक धर्म यानी राईटएचनेस का योगक्षेम वहन करने में समर्थ होता है. वह भले लोगों में ही लोकप्रिय होता है, दुष्टजनों में नहीं! लेकिन वह ईश्वर का चहेता होता है.

(६) मानव जीवन का प्रयोजन क्या है?
समझने के लिए यहाँ हम शाब्दिक कल्पना का सहारा लेंगे. हमारी आत्मा, परमात्मा का एक छोटा सा अंश है. जैसे सागर की एक बूँद. पृथ्वी या भूलोक पर सृष्टि की रचना हेतु विभिन्न जीवों को जन्म देकर परमात्मा ने अपने चैतन्यमय अंशों (आत्माओं) को उनके भौतिक शरीरों में स्थापित किया. इन सभी में 'केवल' मनुष्य को उन्होंने अपने समान मौलिक गुणधर्मों से नवाजा और 'हमेशा' का भौतिक जीवन दिया, जबकि शेष जीव सीमित आयुष्य वाले थे. अन्य प्रत्येक जीव, वनस्पति एवं कच्चे पदार्थों का निर्माण मनुष्य के जीवन की सरलता व सम्पूर्णता हेतु हुआ था. आपने ही साकार रूप मानव को पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि प्रदान कर कार्य करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया था. अर्थात् कार्यों अथवा चुनाव में कोई भी हस्तक्षेप नहीं. एक बात और, कि परमेश्वर या प्रकृति ने ब्रह्माण्ड में हर चीज, हर क्रिया पूरी तरह से नियमबद्ध कर रखी थी/है. प्रारंभिक काल में मानव यथासंभव प्राकृतिक नियमों के अनुकूल कार्य करता था. पर कालांतर में उसके मन पर आगंतुक संस्कारों का बनना आरंभ हो गया; और प्राकृतिक गुणों के विपरीत निर्मित इन संस्कारों से अनेक अयोग्य कार्य होने आरंभ हो गए. वह आत्मा के मूल गुणधर्म के विपरीत आचरण करने लग गया. प्रकृति-विरुद्ध जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप परमेश्वरी नियमों ने मानव जीवनकाल को सीमित कर दिया, अर्थात् एक आयु पश्चात् मानवों की मृत्यु होने लगी. ...पर चूंकि परमेश्वर बहुत दयालु व न्यायप्रिय है, अतः कुछ योग्य (या अयोग्य भी) आत्माओं को पुनर्जन्म के रूप में यह मानवयोनी दोबारा या कई बार पुनः प्राप्त होती है, जिससे वे पुनः अपने कर्मों एवं प्रारब्ध की सहायता से उन्नति कर सकें. 'प्रारब्ध' का निर्माण संस्कारजनित कार्यों पर निर्भर करता है, यह प्रकृति के नियमों के अंतर्गत ही होता है, इनमें से एक नियम है-- क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया! पहले के मानव ईश्वरीय गुणों के अनुरूप कार्य करने वाले थे तो दीर्घायु थी, पर कालांतर में गलतियाँ बढ़ने के साथ-साथ मनुष्य की आयु भी कम होती जा रही है. मन पर अंकित अप्राकृतिक एवं आगंतुक संस्कारों द्वारा नियंत्रित व घटित कार्य ही इसका व अन्य दुखों का कारण हैं. ......तो, एक तरह से प्रत्येक जन्म या जीवन जो हम मनुष्य रूप में प्राप्त करते हैं, वह एक और मौका होता है हमारे लिए कि प्रकृति एवं ईश्वर सम्मत उत्कृष्ट भौतिक कार्यों के द्वारा हम अपनी आध्यात्मिक उन्नति भी कर पाएं.

(७) एक दार्शनिक कहते हैं कि जीवन में किसी को मात देना तो बहुत आसान है किन्तु जीतना काफी मुश्किल ...क्या आप इस विचार से सहमत हैं?
इस बात से सहमत हूँ मैं. यहाँ जीत की बात मन की जीत की है, दिल की जीत की है. शारीरिक बल से, अस्त्र-शस्त्र से, शास्त्र से, छल से, बुद्धि से, तर्क से, शब्दजाल आदि से किसी को भी हराना संभव है किन्तु किसी के मन अथवा दिल को जीतकर उसे अपना बनाना बहुत कठिन! एक दार्शनिक सा उदाहरण -- आज के अधिकांश शासक भारी भ्रष्टाचार एवं अपराध की रोकथाम के लिए यहाँ तक कि छोटे-मोटे अपराधों के लिए भी नित नए नियम-कानून बनाते रहते हैं, उनकी सहायता से थोडाबहुत भ्रष्टाचार परास्त भी होता है; लेकिन स्वयं और अपने दल की नेकनीयती यानी उत्कृष्ट आचरण एवं ओजपूर्ण वाणी से प्रजा-जनों के मन को जीतने और योग्य दिशा में परिवर्तित करने की कोशिश ना के बराबर ही रहती है! अर्थात् डंडे के जोर से काबू करना या जीतना सरल है संभव है परन्तु प्यार से दिल जीत कर किसी को अपना बनाकर योग्य मार्ग पर लाना बहुत कठिन! बच्चों की परवरिश भी तभी अच्छी मानी जाती है जब हम उन्हें अपने उदाहरण से सिखाकर योग्य नागरिक बना सकें, वर्ना डंडे या अनुशासन के जोर पर हम बच्चे को एक सीमा तक नियंत्रित तो कर सकते हैं पर उसका मन नहीं जीत सकते! और जब कभी भी अनुशासन का फंदा कमजोर पड़ता है, बच्चा विद्रोह करता ही है, ..क्योंकि हम उसे जीत तो कभी सके ही नहीं थे, हमारा सारा जोर उसे हराने पर ही था! विभिन्न सामाजिक, जातीय, पंथिक झगड़े उपद्रव आदि भी इसीलिए होते हैं कि सबका सारा जोर एकदूसरे को परास्त करने पर होता है. नियंत्रण पाने की इस तरह की कोशिशों से किसी के ऊपर वर्चस्व तो स्थापित किया जा सकता है पर उसे जीता नहीं जा सकता!

(८) जो अपने अहम् को त्याग देता है और पूर्णतय प्रभु को समर्पित हो जाता है, उसे इसी जन्म में मुक्ति मिल जाती है...?? क्या ऐसा कर पाना संभव है...?
"मुक्ति" शब्द मुझे तो बहुत पांडित्यपूर्ण व वजनी सा लगता है. पहले तो यह कि "मुक्ति" आखिर है क्या?! हमारे शास्त्रज्ञों ने इसको इतना भारी और जरूरी सा काम बताकर इसको पाने के लिए विविध स्थूल-सूक्ष्म अनुष्ठानों के कितने ही विचित्र से तरीके बताए हैं! आम जन को तो यह बहुत दूर की कौड़ी (असंभव सा) लगता है! क्यों हम भी अध्यात्म या आध्यात्मिक साधना की गूढ़ता को बढाएं?! ..और "प्रभु को समर्पित हो जाना", यह भी आमजन को बहुत दुष्कर सा कार्य प्रतीत होगा! ...हां, 'अहंकार को तिलांजलि देना', यह नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना हुआ. आम जन को नैतिक मूल्यों से कोई परहेज नहीं और न ही वह नैतिक मूल्यों की शब्दावली से अनभिज्ञ है. उसके लिये यह सरल विषय है. ...तो सरल शब्दों में...., "आध्यात्मिक भाषा में जिसे 'आत्मज्ञान' कहते हैं वह हमारे भीतर की वो आवाज है जिसकी अनुभूति आमजन को भी सहजता से हो सकती है. वह अन्दर की आवाज विभिन्न प्रसंगों में यदाकदा सबको महसूस होती है. इसकी सबसे बड़ी पहचान है कि यह आवाज हमें सदैव अच्छे और मृदु होने के लिए उकसाती है. यह हमारी नैतिकता को उभारती है. इसके चलते हम अच्छा व योग्य निर्णय लेने के लिए प्रेरित या कभी-कभी बाध्य तक हो जाते हैं. ..खरी आध्यात्मिक साधना मेरे हिसाब से तो बस यही है कि हम उस 'यदाकदा' को 'हमेशा' में बदलने का प्रयास करते रहें. 'हमेशा' भीतर की आवाज को सुन पाना, उसको सम्मान देते हुए उसको मानना, यही हमें हमारे व्यक्तित्व को ऊपर उठाता है, हमारे मन पर बने आगंतुक कुसंस्कारों का प्रभाव कम कर उनका दमन करता है. इन संस्कारों से मुक्ति ही वह "मुक्ति" है जिसकी चर्चा यहाँ शुरू की गयी. ..और यह इसी जन्म में संभव है! जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति किसको चाहिए भला?! सबको सुखद जीवन चाहिए चाहे वह इस शरीर में हो, चाहे निराकार आत्मा स्वरूप में, चाहे ईश्वर के साथ एकरूपता में! सोचने, समझने और करने में यदि हम भीतर की आवाज के अनुरूप नेक पथ पर हैं तो हम सदैव मुक्त हैं, सदैव आनंद में हैं." ...और अब आध्यात्मिक शब्दों में...., "भौतिक शरीर के 'भीतर' विद्यमान 'जीव' के 'केंद्र' में शुद्ध आत्मा ही है जो परमात्मा का ही एक 'समान गुणधर्म' वाला अंश है; इसके इर्दगिर्द जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार, मन, बुद्धि, अहं एवं विभिन्न विशेषता, रूचि-अरूचि केंद्र हैं. ...आत्मा और यह सब संस्कार एवं अन्य बताए केंद्र मिलकर एक सूक्ष्म शरीर या सूक्ष्म जीव बनता है. यानी आत्मा सर्वथा मुक्त ना होकर विभिन्न जागतिक संस्कारों, अहं आदि से बद्ध है, ..वह मुक्त नहीं! इस कारण आत्मा भारवान (भारी) रहती है. इस कारण वह भूलोक या निम्न लोकों में रहने को बाध्य होती है, और उसका ऊपर की श्रेष्ठ कक्षाओं में जाना दुष्कर होता है. भूलोक या नीचे के लोक स्थूल होते हैं अतः यहाँ आत्मा को भी स्थूल परिवेश में ही रहना होता है. आध्यात्मिक भाषा में 'अहं' का अर्थ है कि स्वयं को ईश्वर, परमात्मा या आत्मा से भिन्न मानना, मैं पन होना! यह एक बड़ा कारक है कि आत्मा की ध्वनि हमें सुनाई नहीं पड़ती या हम उसे अनसुना कर देते हैं. इसका त्याग होने पर जीव, आत्मा के अधिक निकट हो जाता है. जब आत्मा के इर्दगिर्द अहं सहित सभी आगंतुक केंद्र हट जाते हैं तो इस स्थिति को ही 'मुक्ति' कहा जाता है. अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम जन्मधारी, शरीरधारी हैं या नहीं! हम आत्मा अर्थात् ईश्वर से एकरूप हो जाते हैं." ....मैंने तो पंडितों की अपेक्षा बहुत सरल कर दिया फिर भी कितना कठिन है न समझने में यह व्याख्या!! इसलिए मेरे विचार से सर्वसामान्य को इतने गूढ़ शब्दों में उलझने की जरूरत नहीं! वह पहले बताए सरल तरीके से भी 'मुक्त' होने का मार्ग ढूंढ सकता है. वैसे भी 'अध्यात्म' शब्दों का जंजाल नहीं अपितु मात्र अनुभूति का विषय है!

(९) हम भगवान की पूजा क्यों करते हैं? अगर हम ईश्वर को ना भजें तो क्या वह कमजोर हो जाएंगे? हम भगवान की भक्ति अपने लिए करते हैं कि भगवान् के लिए?
(१) भगवान् की पूजा अपना ढाढ़स बंधाने के लिए, ईश्वर के प्रति भाव बढ़ाने के लिए, मन की स्वच्छता के लिए, आत्मबल बढ़ाने आदि के लिए करना श्रेयस्कर होता है. पर शायद हममें से बहुतों का पूजा-अर्चना करने का आशय कुछ अन्य भी होता है! (२) ईश्वर को 'धार्मिक क्रिया या अनुष्ठान' के रूप में नहीं भजने से हमारे ऊपर ईश्वर की ओर से कोई विपत्ति या दंड जैसा दुष्प्रभाव नहीं होता है; ईश्वर को भजने से ईश्वर को भी कोई लाभ नहीं होता है; ईश्वर को भजने से क्रम संख्या (१) के अनुसार जो भी फायदा होता है वह करने वाले व्यक्ति को ही होता है! (३) अतः भगवान् की भक्ति मूलतः हम अपने लिए ही करते हैं.

(१०) क्या नेगेटिव जरूरी है पॉजिटिव के लिए, शैतान जरूरी है खुदा के लिए? काले आसमान में ही सितारें खिलते है, रूठना जरूरी है मनाने के लिए है!
केवल कुछ करने के लिए ही कुछ करना हो तो ये तुलनाएं करना या परस्पर विलोम कार्यों की सार्थकता सिद्ध करना समझ में आता है! अन्यथा व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए तो सच यही है कि किसी अच्छाई को या अच्छाई का महत्व, दिखाने के लिए उसके बाजू में किसी बुराई का आवश्यक रूप से उपस्थित होना बिलकुल भी जरूरी नहीं! किसी सकारात्मकता को प्रदर्शित करने के लिए नकारात्मक प्रसंग का इंतजार करना क्या उचित होगा? क्या केवल रूठने पर ही प्यार जताना चाहिए? क्या भगवान् का अस्तित्व केवल इसलिए है क्योंकि वहां शैतान भी है? क्या सूरज इसीलिए या तभी चमकता है, जब अन्धकार पनपता है? ...मेरे विचार से तो अँधेरे या नकारात्मकता का कोई अस्तित्व ही नहीं या कोई स्रोत ही नहीं! वह तो केवल प्रकाश या सकारात्मकता की अनुपस्थिति में ही अपने पांव पसार सकता है! हाँ...., यह अवश्य कह सकते हैं कि किसी भी सकारात्मकता या प्रकाश की हमें तब बहुत याद आती है जब वह नहीं होता और उस कारण नकारात्मकता अपने पांव पसार चुकी होती है!

Wednesday, November 8, 2017

(८८) चर्चाएं ...भाग - 7

(१) आत्म ज्ञान बिन नर यूँ भटके कोई मथुरा कोई काशी रे ...आत्मज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है? सही आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए क्या मार्ग सही है..?
प्रथमतः जिज्ञासु होना, मन में जिज्ञासाएं उठना आवश्यक. ..भौतिक अथवा आध्यात्मिक, किसी भी प्रकार का ज्ञान हासिल करने के लिए मन में जिज्ञासा होना बहुत जरूरी. ..तीव्र जिज्ञासा से आगे के द्वार खुदबखुद खुलते चले जाते हैं. हमारे कौतूहलपूर्वक क्रियाशील होने पर स्थूल या सूक्ष्म, किसी न किसी माध्यम से मार्गदर्शन मिलना आरंभ हो जाता है- अखबारी लेखों से, पुस्तकों से, पौराणिक साहित्य से, वर्तमान ईश-आराधना पथ से, किसी गुरु अथवा मार्गदर्शक से, अपनी अंतर्ध्वनि से, और इनके अलावा किसी अन्य माध्यम से भी! माध्यमों की कोई थाह नहीं! शुरुआत में हमारा रुझान व खोजी प्रवृत्ति ही सबसे महत्वपूर्ण हैं! द्वितीय पायदान पर आता है- बुद्धि एवं विवेक का प्रयोग करते हुए, व्याप्त अंधविश्वासों से बचते हुए, प्रायोगिक भाग को करना ..अर्थात् पढ़े या बताए या स्वयं से सूझे उन कृत्यों को करना, जिनकी सहमति बुद्धि व विवेक दे रहे हों; उदाहरण के लिए- कोई नामजप वगैरह करना, किसी सत्संग में जाना, कोई साहित्य पढना, जीवनशैली को बदलने का प्रयास करना, आदि-आदि! ...जब कुछ सार्थक परिणाम आने आरंभ हों, जिनका अनुमोदन आपकी बुद्धि और विवेक भी कर रहे हों, तब सम्बंधित कृत्य या खोज की गहराई में उतरना. ..यहाँ हमारे कुछ पूर्व संस्कार अड़ंगा लगायेंगे, हमारी वृत्ति और आसपास के परिजन विरोध कर सकते हैं या उपहास उड़ा सकते हैं. लेकिन यदि हम उनके, अपनी वर्तमान संस्कृति, पंथ, धार्मिक-कृत्य आदि के प्रति अपने व्यवहार को किंचितमात्र भी ना बदलते हुए समानांतर रूप से अपनी खोज-यात्रा जारी रखते हैं तो उनका विरोध मद्धम पड़कर समाप्तप्राय हो जायेगा. ऐसा करने से हममें 'व्यापकता' का गुण भी बढ़ता है. फिर धीरे-धीरे अनेकों अनुभूतियों के माध्यम से आत्मज्ञान व परमात्मज्ञान मिलता जाता है. हम और व्यापक होते चले जाते हैं. तब धार्मिक कृत्य के नाम पर कुछ विशेष करना, कुछ पारंपरिक करना या बिलकुल कुछ भी ना करना, ये सब हमारे लिए गौण विषय हो जाते हैं. 'व्यापकता' के प्रबल गुण के कारण हम समाज-सम्मत कुछ भी कर सकते हैं और कभी भी कुछ भी त्याग सकते हैं, लेकिन भीतर से हम अति उदार और न्यायसंगत होते जाते हैं. हमारे बदलते प्रभामंडल और अनुकूल व सकारात्मक स्पंदनों के चलते आसपास का समाज ऊपर से हमारा आलोचक होते हुए भी भीतर से हमें सराहने लगता है; व्यष्टि (स्वयं की) साधना उपरांत समष्टि (समाज की) साधना का यह प्रथम चरण सिद्ध होता है! .....पुनः, सम्पूर्ण प्रक्रिया में एक बात का ध्यान अवश्य रखें कि अपने मूल तक पहुंचना हमारा एकमात्र लक्ष्य हो, ..बीच में पड़ रहे विविध मार्गों में से किसी एक में भी हम ऐसा ना उलझ जायें कि वह मार्ग ही हमें लक्ष्य प्रतीत होने लगे!! हमें किसी मार्ग-विशेष में फंसना या अटकना नहीं है. हम निरंतर आगे को बढ़ते रहें. और अगले-अगले बिंदु पर जिस-जिस मार्ग से चलकर पहुंचे, उन मार्गों को धन्यवाद दें उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें, लेकिन उन्हें त्यागकर और आगे को प्रस्थान अवश्य करें. ...पुस्तकें, कोई विशिष्ट सत्संग, गुरु, नामजप क्रिया, आध्यात्मिक मार्गदर्शक आदि ये सब एक प्रकार से हमारी खोज-यात्रा के दौरान पड़ने वाले विविध मार्ग या साधन ही हैं. उन्हें अवश्य अपनाएं, उनकी मदद लें, उनके प्रति सदैव आभारी रहें, किन्तु उनके प्रति आसक्त कदापि न हों.

(२) मैं कौन हूँ पता चल गया तो क्या होगा?
तब जीवन तो हम वही व्यतीत करेंगे; ..हमारा सांसारिक नाम, स्टेटस, ओहदा, काम वगैरह भी वही रहेंगे जो अभी हैं, लेकिन सोचने और जीवन जीने का अंदाज यानी 'दृष्टिकोण' बदल जायेगा! हम पहले की अपेक्षा अधिक अच्छे, तनावरहित, अनासक्त, संतुष्ट और आनंदित रह सकेंगे. व्यवहार और जीवन जीने की कला में निखार आएगा. हमारा प्रभामंडल और हमसे प्रक्षेपित होने वाले स्पंदन सकारात्मक और अन्यों को अच्छा लगने वाले होंगे.

(३) संसार के लगभग सभी देश आज अशांति और आतंकवाद का शिकार हो रहे हैं ...क्या इसे हम कभी दूर कर पाएंगे?
कुछ लोगों के जवाब यह इंगित कर रहे हैं कि इनके पीछे ईश्वर-इच्छा है! मेरे विचार से सबसे पहली बात यह कि ये सब ईश्वर की इच्छा या मर्जी से बिलकुल भी नहीं हो रहा है! ईश्वर (या प्रकृति) के जीवनशैली सम्बन्धी नैसर्गिक इच्छाओं (नियमों) से अर्थात् करने या न करने योग्य बुनियादी 'मानवीय' आचरण से सभी परिचित हैं; इस सम्बन्ध में विभिन्न वैज्ञानिक दृष्टिकोणों से भी पर्याप्त ज्ञान हमें मिलता ही है! ..तो फिर हम यह कैसे मान सकते हैं कि इन घटनाओं के पीछे प्रकृति या ईश्वर की स्वीकृति है!! ..हाँ, ईश्वर या प्राकृतिक व्यवस्था यह सब देख अवश्य रही है और अति होने पर उधर से प्रतिक्रिया स्वरूप किसी न किसी माध्यम से प्रतिकार अवश्य आएगा (आता भी रहता है). सत्य और असत्य के बीच सदा से संघर्ष होता ही रहा है, समय समय पर अनेकों विनाशलीलाएं भी होती रही हैं! 'गलत' के विरुद्ध प्रत्येक मानवीय अथवा महामानवीय विध्वंस या प्राकृतिक आपदा के पश्चात् मानवजाति चिंतन, संकल्प आदि भी करती रही है कि आगे से ऐसा (प्रकृति या ईश्वरेच्छा विरुद्ध आचरण) नहीं होगा, फिर भी अज्ञान, लोभ या ईर्ष्यावश पुनः पुनः ऐसा होता रहा है. अभी वर्तमान में भी हो रहा है! किसी भी शारीरिक बीमारी के मामले में हम क्या करते हैं कि पहले जीवनशैली में बदलाव (किसी चीज से परहेज और कुछ नया अपनाना), फिर हलकी दवा, ..फिर भी ठीक न होने पर भारी दवा, ..और फिर भी न ठीक होने पर शल्यक्रिया (सर्जरी), ...और जब बात किसी अंग विशेष में इन्फेक्शन होने से पूरे शरीर में जहर फैलने की आती है, सवाल जीवन-मृत्यु का हो जाता है, तब उचित सर्जरी से उस अंग को ही शरीर से निकलवा देते हैं!! बढ़ते आतंक और आतंकवादियों से भी विचारशील सरकारें इसी प्रकार जूझती हैं, चरणबद्ध ऐसा ही करना श्रेयस्कर रहेगा! शेष...ईश्वर सत्य का साथ देगा ही! केवल ऐसा सोचना कि सबकुछ ईश्वरेच्छा से ही घटित हो रहा है, हम कुछ भी नहीं कर सकते, यह बुजदिली और अकर्मण्यता का सूचक है! ऐसा नकारात्मक सोचने वाले खुद से प्रश्न करें कि वे अपनी व्यक्तिगत आपदा या बीमारी के समय भी क्या ऐसा ही सोचते हैं और कुछ भी नहीं करते???

(४) पिछली शती में मकान चाहे कच्चे थे किन्तु रिश्ते सारे सच्चे थे ...आज विकास के नाम पर हमने क्या क्या खो दिया है...?? आधुनिकता की क्या कीमत चुका रहा है मानव?
देखा जाये तो विगत कई सौ वर्षों में भी मानवदेह संरचना में कोई बदलाव नहीं आया है, पेड़-पौधे और वनस्पतियों की मूल संरचना में भी हम ऐसा ही पाते हैं. हमारा कोई अंग न तो गायब हुआ है और न ही कोई नया निकला है! यानी प्राकृतिक नियमों-मूल्यों में नैसर्गिक रूप से कोई अंतर नहीं आया है. यदि थोड़ा-बहुत आया भी है तो वह मानवीय हस्तक्षेप के कारण ही! यानी निष्कर्ष यह कि मूलतः हम एक ऐसे अपरिवर्तनीय प्राकृतिक जीव हैं जो सामाजिक भी है; और इन दोनों कारणों से इस जीव की कुछ मूलभूत भौतिक-सामाजिक आवश्यकताएं भी हैं. यदि आज हमें रिश्तों-नातों में गर्माहट की कमी से कुछ शून्य सा उभरता अनुभूत हो रहा है तो निःसंदेह यह अनुभूति असत्य नहीं! अनुभूतियाँ अक्सर हमें सही और गलत में अंतर बताती हैं. पुनः मुख्य विषय पर आते हैं..., मकान, वस्त्र और भोजन इंसान की मूलभूत भौतिक आवश्यकताएं हैं और परस्पर प्रगाढ़ भावनात्मक मानवीय रिश्ते हमारी मूलभूत सामाजिक आवश्यकता है; ..शेष सब पदार्थ और विषय आदि इनके पश्चात् आते हैं! शेष जो भी चीज हमें अपना भौतिक या सामाजिक स्तर ऊपर उठाने में सहूलियत दे, और हमारी मदद करे, हमारा जीवन आसान बनाये, उसका सहर्ष स्वागत है...ऐसी आधुनिकता भला किसे काटेगी! ...विभिन्न वैज्ञानिक खोजें यही काम करती हैं और उन्हें अपनाकर हम आधुनिकता की ओर कदम बढ़ाते हैं. आधुनिकता माने उन्नति. ....लेकिन कहते हैं न कि, "कमी और अति" हर चीज की बुरी! जब हम मन को साध नहीं पाते और अत्यधिक लोभ व होड़ में पड़ जाते हैं तब यह अतिरेक हमारे नैसर्गिक जीवन के लिए घातक हो जाता है, हम मशीन में बदलने लगते हैं, और मशीन भावना-रहित होती है! आज हमारे भूभाग में यही हो रहा है.

(५) पर्यावरण को सुधारने के सभी उपाय अभी तक विफल क्यों हो रहे हैं...?
हम बात 'अपने यहाँ' की ही करें तो मूल में ये कारण मिलते हैं-- (१) पर्यावरण के ज्ञान (गणित) की पर्याप्त समझ ना होना. ...(२) केवल अपने हित तक सीमित रहने की प्रवृत्ति (कूड़ा कहीं भी डालने-फेंकने की प्रवृत्ति; बस अपने से कुछ दूर हो जाये, मात्र इतना ही ध्यान रखना). ...(३) मानवता, जागरूकता और सहयोग की भारी कमी. ...(४) सरकार भी पर्याप्त जागरूकता फैलाने में असफल सिद्ध हो रही है क्योंकि वहां भी वैचारिक कूड़े का भारी जमाव! कोई भी पाठ पढ़ने वाला यदि खुद ही उस पाठ के क्रियान्वयन में कमजोर हो तो फलप्राप्ति की सम्भावना गिर जाती है. ...(५) लोगों के विवेक पर लोभ, स्वार्थ, जागतिक इच्छाओं आदि का ऐसा पर्दा पड़ा होना कि इस कारण से उनका ऐसा विचार बनना कि मेरे सोचने-करने से क्या होगा, ..सब ईश्वर-इच्छा से ही तो होता है!

(६) आग लगी आकाश में, झर झर पड़त अंगार , संत न होते जगत में तो जल मरता संसार! संत समाज की देन को भुलाया नहीं जा सकता किन्तु आज के संत समाज को किस दिशा में ले जा रहे हैं....?
किसी भी संघ की सर्वांगीण उन्नति में संतों की बड़ी भूमिका रहती है. हमारे देश में भी समय-समय पर राजा-प्रजा आदि को शिक्षित एवं जागरूक करने में उनकी बड़ी कृपा रही. ..लेकिन अब बहुत समय से वैसे खरे संत-गुरु देखने में नहीं आए. ..मेरे विचार से देश की आजादी की सुगंध मिलने के काल से ही हमारे यहाँ सत्तालोलुपता और इस निमित्त द्वंद्वफंद इतने अधिक बढ़ते गए कि नैतिकता का ग्राफ गिरता चला गया. आध्यात्मिक जगत भी इससे अछूता न रहा! परिणामस्वरूप प्रजा भी भ्रष्ट होने लगी. ..और बढ़ते-बढ़ते बात यहाँ तक आ पहुंची कि भ्रष्ट हो चुके राजा, प्रजा और गुरुजन तीनों स्वार्थपूर्ति हेतु एक-दूसरे के ऊपर आश्रित हो गए और आपस में मजबूत गठजोड़ कर लिया. तब से नेता हों या गुरुजन, जनता भी चोरों-उचक्कों को चुनने लगी! फिर कुकरमुत्तों की तरह कितने ही भ्रष्ट और व्यापारी गुरु व संत उदित हुए! प्रजा और राजा, इन दोनों का योगदान है उनके फलने-फूलने में! काले कारनामे बिलकुल ही उधड़ने व उजागर हो जाने उपरांत ही उनके खिलाफ कोई कार्यवाही की जाती है! ऐसे में आज के ऐश्वर्यपूर्ण ढोंगी संतों से समाज को सही दिशा में ले जाने की भला क्या उम्मीद की जा सकती है! हकीकत तो यही है कि आज का हमारा समाज खुद भी नहीं सुधरना चाहता इसलिए वह भ्रष्ट संतों की सत्ता बनाता है या स्वीकारता है, उनके चरण धो-धो कर पीता है, क्योंकि उसे रिद्धि-सिद्धि, ऐश्वर्य, पुत्र, नौकरी, ऊंचा पैकेज, सुन्दर स्त्री, बड़ी गाड़ी, बंगला आदि ही प्रथम चाहिए! उसे लगता है कि संतकृपा ही उसे ये सब दिलाती है या दिला सकती है!

(७) शरीर के प्रति आसक्ति को कैसे दूर किया जाए?
समुचित ज्ञानार्जन से ही हम शरीर और उसके महत्त्व को समझ पायेंगे, आत्मिक ऊर्जा से भी परिचित हो पायेंगे. ..तत्पश्चात् हम अपने शरीर को भगवान् या प्रकृति के अनमोल तोहफे की तरह मानेंगे, उसकी इज्जत व हिफाजत करेंगे, उसका ध्यान रखेंगे, उसे रोगों और असमय मृत्यु से परे रखने की कोशिश भी करेंगे; ..लेकिन फिर भी, उसके प्रति आसक्त नहीं होंगे! ठीक वैसे ही जैसे कोई शल्य-चिकित्सक किसी मरीज का ऑपरेशन करते समय अपना दृष्टिकोण रखता है.

(८) जब तक मनुष्य बच्चों जैसा सरल नहीं हो जाता तब तक उसे ज्ञानलाभ नहीं होता! क्या यह सही है?
जी हाँ, बिलकुल सही कहा आपने! मन की सरलता ही आध्यात्मिकता हेतु पोषक वातावरण है. मन की सरलता से तात्पर्य है हठीले संस्कारों का कम से कम होना. बचपन में दुनियावी संस्कार इतने बलिष्ठ नहीं होते इसीलिए आध्यात्मिक ज्ञानप्राप्ति हेतु बच्चों सरीखा सरल-स्वभाव होने पर जोर दिया जाता है. पथरीली भूमि में किसी नए बीज का रोपण बहुत कठिन होता है और उसका अंकुरण तो और भी अधिक कठिन!

(९) दिल्ली के जानलेवा प्रदूषण के लिए कौन ज़िम्मेदार है...?
सिर्फ दिवाली के पटाखे और फसल के अवशेष जलाये जाना इस जानलेवा प्रदूषण का एकमात्र कारण नहीं है! अपितु बढ़ते दोपहिया व चारपहिया वाहनों और कारखानों द्वारा नियमित रूप से हो रहा विषैला उत्सर्जन इसकी सबसे बड़ी वजह है. नियमित रूप से विभिन्न प्रकार का ढेरों कूड़ा जलाया जाना भी इसकी एक अन्य वजह है. आधुनिकता के नाम पर बहुत सारी चीजों का अंधाधुंध निर्माण होना व उन्हें बेतहाशा अपनाया जाना मानवजाति के लिए ही असमय काल का या भीषण बीमारियों का कारण बन रहा है. मैं इन सब के लिए सरकारी नीतियों और विकास से सम्बंधित बेढब योजनाओं को दोषी मानता हूँ. विकास की योजनायें कुछ इस प्रकार की हैं कि विकास या आधुनिकीकरण दिल्ली सहित केवल कुछ बड़े शहरों तक ही सीमित है! दिल्ली से उत्तरप्रदेश होते हुए बिहार व झारखण्ड तक केवल दिल्ली, एन सी आर के कुछ शहर और लखनऊ जैसे कुछएक बड़े शहरों में ही बिजली-पानी सहजता से उपलब्ध है. अतः इस बड़े भूभाग (दिल्ली-उत्तरप्रदेश-बिहार) के लिए रोजगार आदि की संभावनाएं भी दिल्ली क्षेत्र में ही सर्वाधिक हैं. तो अविकसित स्थानों से रोजी-रोटी की तलाश में लोग भारी मात्रा में दिल्ली सरीखे विकसित स्थानों पर आकर बसते हैं. जनसंख्या का दबाव भी निरंतर बढ़ रहा है और प्रदूषण का भी! पुनः..., इसके लिए मूलतः प्रवासी लोग जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि विकास का बेढब ढांचा जिम्मेदार है. लोग मजबूर हैं कि जीवनयापन हेतु वे केवल कुछेक स्थानों पर ही इकठ्ठा हों! ..इसके अलावा हमारे देश में कमजोर नीतियों के चलते इस प्रथा का प्रचलन लगभग ना के बराबर है कि एम्प्लायर द्वारा काम की जगह के इर्दगिर्द ही कर्मचारियों के लिए स्कूल, अस्पताल और शॉपिंग-काम्प्लेक्स सहित 'टाउनशिप' का निर्माण कराया जाता हो! यदि ऐसा हो जाये तो वर्क-प्लेस पर आने-जाने के लिए जो बड़ा समय खर्च होता है वह बच जायेगा; मकान ढूंढने की समस्या समाप्त हो जाएगी; बच्चों का सरलता से स्कूल आना-जाना संभव होगा; परिवार को सुरक्षा एवं उत्कृष्ट सामाजिक वातावरण मिलेगा; वाहनों का प्रयोग ना के बराबर हो जायेगा, इस कारण प्रदूषण भी बहुत कम हो जायेगा, धन की भी बचत होगी; समय अधिक मिलने से परिवार ज्यादा समय एकसाथ रह पाएगा; एक-दूसरे के घर आना-जाना और खुशियाँ बाँटना अब संभव होगा; तनाव क्षीण होगा, आदि-आदि. ..मैं तो कहता हूँ कि सरकारी और गैर सरकारी बड़े कार्यालयों (मुख्यालयों) और विभिन्न बड़ी इंडस्ट्रीज के लिए इस नियम (टाउनशिप और वर्कप्लेस एक ही कैंपस में) को 'अनिवार्य' घोषित किया जाये. यह नीति प्रासंगिक और सर्वथा संभव है, यदि राष्ट्रहित में पर्याप्त इच्छशक्ति हो तो! इसके अलावा, केवल महानगरों तक ही सीमित ना रहते हुए हर जगह पर विकास को महत्त्व दिया जाये. पर्यटन के दौरान मैंने दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में इसको (विस्तृत विकास को) महसूस किया है, इसीलिए वहां व्यर्थ की हौचपौच और प्रदूषण आदि यहाँ की अपेक्षा बहुत कम है.

(१०) क्या मन को वशीभूत कर पूर्णतया पवित्र या दुर्गुण मुक्त किया जा सकता है...?
आदतन भले ही हम बहुत सफाई का बहुत ध्यान रखते हों, लेकिन सामाजिक प्राणी होने के नाते, तथा पढाई-लिखाई या रोजगार के निमित्त हमें नित्यप्रति बाहर की दुनिया के संपर्क में आना भी आवश्यक होता है, या घर में ही अनेकों तरह के काम करते हैं. इस प्रक्रिया में हम रोज ही शारीरिक रूप से कुछ मैले हो जाते हैं. इस मैल को दूर करने के लिए हम नित्यप्रति नहाते-धोते हैं! ...अब मुख्य विषय पर आते हैं.., विभिन्न साधनों-साधनाओं द्वारा मन को वश में करके या उसको साफ करके हम उसे काफी हद तक या मानों पूर्णतया ही पवित्र या दुर्गुण-मुक्त कर लेते हैं; ..पर क्या फिर हम पुनः पुनः बाहर की दुनिया के संपर्क में आकर मानसिक रूप से मैले नहीं होते रहते!! ..जी हाँ, किसी भी साधना को एक बार करके हम हमेशा के लिए पवित्र मन के नहीं हो सकते! हमारे मन को भी रोजाना सफाई की जरूरत पड़ती है, क्योंकि हम सामाजिक प्राणी हैं. आज हमारे आसपास सबकुछ आदर्श या पवित्र नहीं है. हम प्रतिदिन अपनी आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से जो कुछ भी ग्रहण करते हैं वह हमारे मन को कुछ तो प्रदूषित करता ही है. तो सफाई का काम भी नियमित रूप से करना ही पड़ता है, अन्यथा हम दोबारा उसी जगह पर पहुँच सकते हैं जो कभी बहुत मैली थी! इसके लिए नियमित रूप से 'सत्संग' यानी अच्छे लोगों के संपर्क में रहना तथा उनसे वार्तालाप करना अत्यावश्यक होता है. रोजाना घर के सदस्यों का आपस में ही सकारात्मक एवं नैतिक मूल्यों सम्बन्धी कुछ सार्थक संवाद भी एक प्रकार का सत्संग ही सिद्ध होता है; तल्लीनता के साथ अच्छा साहित्य नियमित पढ़ना भी एक प्रकार का सत्संग ही है. कहने का अर्थ यह कि कुछ अच्छे विचारों से रोजाना साक्षात्कार करके जब हम मन को नियमित रूप से नहलाते हैं तभी हम अपनी अच्छाई को बरकरार रख पाते हैं, अन्यथा मानसिक पतन में समय नहीं लगता!

Saturday, October 28, 2017

(८७) चर्चाएं ...भाग - 6

(१) क्यों लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए उतावले रहते हैं या प्रयत्नशील रहते हैं? माना कि किसी का जीवन नर्क जैसा रहा हो तो वे पुनर्जन्म से कतराते होंगे और इस जीवन-मृत्यु चक्र से निजात पाना चाहेंगे या मोक्ष चाहेंगे मगर जिसका जीवन सुखमय रहा और खूब आनन्दपूर्वक कटा, उसे भी क्यों मोक्ष चाहिए? उसके सगे-सम्बन्धी भी यही प्रयत्न करते हैं कि उसे मोक्ष प्राप्त हो, ऐसा क्यों?
बहुत ही अच्छा और प्रासंगिक विषय उठाया आपने भैया! बड़े खेद की बात है कि हमारे यहाँ पंडित-पुरोहितों द्वारा 'मोक्ष' का अर्थ 'जन्म-मृत्यु के फेरों से मुक्ति' मात्र ऐसा बताया जाता है. अज्ञानवश या निजस्वार्थ पूर्ति हेतु उनके द्वारा लोगों को अधकचरा और अतिसीमित व संकीर्ण सोच वाला ज्ञान दिया जाता है. इसके लिए भोले और अज्ञानी यजमानों को अनुष्ठानों के रूप में अनेकों स्थूल उपाय बताए भी जाते हैं. लोग इन छद्म आध्यात्मिक चक्करों में ऐसा उलझ जाते हैं कि काल्पनिकता में खो कर उन्मत्त से हो जाते हैं. शायद इसी कारण से धर्म व अध्यात्म आदि को अफीम का नशा कहा जाता है. इस मंच पर भी ऐसा माहौल खूब दिखता है! ...'मोक्ष' शब्द अपनेआप में कुछ गलत नहीं, वरन उसकी अजीबोगरीब व्याख्याएं उलझाने और भटकाने वाली हैं. ...वस्तुतः 'मोक्ष' एक अवस्था है, और मोक्ष की अवस्था आध्यात्मिक साधना का अब तक का ज्ञात 'चरम बिंदु' है. मोक्ष की अवस्था प्राप्त मनुष्य की प्रसन्नता, आनंद या हैप्पीनेस किसी विषय-विशेष पर आश्रित नहीं रह जाती, वह दुःख और सुख यानी प्रत्येक स्थिति में समान रहने में सक्षम रहता है, उसकी सोच व निर्णय सदैव भले और न्यायोचित होते हैं, दुनियावी राग-द्वेष से वह परे रहता है. किसी गुफा, पर्वत या जंगल में रहकर नहीं बल्कि आम समाज में रहते हुए वह यह सब साधने में सफल होता है. सतत यह साध लेना ही 'साधना' की पराकाष्ठा है, मोक्ष की स्थिति है. ऐसे मोक्ष के लिए भला कौन आपत्ति करेगा! ...लेकिन फिर भी आपत्ति होती है क्योंकि अहं को, राग-द्वेष को, लालच को, स्वार्थ को, कमाने-खाने के गलत रास्तों आदि को तिलांजलि देनी पड़ती है! 'मोक्ष' का मार्ग आपको जीने से वंचित बिलकुल भी नहीं करता बल्कि वह गलत माने अधर्म के मार्ग को छोड़ने को उकसाता है. ..."आध्यात्मिक भाषा में 'मोक्ष' अर्थात् मन पर से दुनियावी संस्कारों के प्रभुत्व को समाप्त करना." ..अधिकांशतः सोचने व निर्णय लेने के लिए हम मन में उपस्थित दुनियावी संस्कारों की मदद लेते हैं. ये दुनियावी संस्कार हमारे जन्म उपरांत आंख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अपने आसपास घटित हो रहे प्रसंगों-घटनाओं आदि से निर्मित होते हैं. पैदा होने के बाद हमारे आसपास की दुनिया की आवाजें, भाषा, प्रसंग, घटनाएं, संस्कृति आदि हमारे मन पर निरंतर कुछ संस्कार अंकित करती हैं. उन्हीं संस्कारों के अनुसार हमारा एक व्यक्तित्व, पसंद-नापसंद, व्यवहार आदि बनता है. हमारे आसपास अच्छा या बुरा जैसा भी चलन चल रहा होता है, हमारे संस्कार भी कमोवेश वैसे ही निर्मित होते जाते हैं. फिर हम जब कुछ बड़े हो जाते हैं तो कई बार हमारे सामने जब कुछ प्रसंग घटता है तो अधिकांशतः हम अपने पूर्वनिर्मित संस्कारों के चश्मे से ही उसे देखते हैं और उन्हीं के अनुसार उस प्रसंग से निपटते हैं. मानों संस्कारवश बनी किसी गलत सोच के कारण हम किसी घटना में कुछ नकारात्मक ढंग से सोचते हैं, तो कभी-कभी समानांतर रूप से हमें भीतर से एक और ध्वनि सुनाई पड़ती है जो हमें उस गलत संस्कार के विरुद्ध जाकर कुछ अन्य (यानी कुछ अच्छा) करने को उकसा रही होती है. ...हम सिर झटक कर उस ध्वनि को सुना-अनसुना कर देते हैं क्योंकि संस्कार का प्रभुत्व उस आवाज से अधिक बलशाली है. ...लेकिन कभी-कभी उस अंतर्ध्वनि के अनुसार (संस्कार विरुद्ध जाकर) भी कुछ निर्णय लेते हैं. वह निर्णय हमारे इर्दगिर्द के समाज के मापदंडों के अनुसार तो नहीं होता लेकिन फिर भी वह करके हमें असीम शांति व सुख का अनुभव होता है, अक्सर वह शब्दातीत होता है, हम उसे व्यक्त नहीं कर पाते! दरअसल वह भीतर की शुद्ध आवाज उस आत्मा रूपी प्राकृतिक या ईश्वरीय सॉफ्टवेयर की है, जिसकी खोज व प्रकटीकरण हम 'अध्यात्म' के अंतर्गत करते हैं. वास्तविक धर्म माने राईटयचनैस उसी आत्मा रूपी सॉफ्टवेयर में नैसर्गिक रूप से पूर्वस्थापित होता है. ...यानी अब हमने जाना कि हमारी सोच और निर्णय-क्षमता, दोनों के दो स्रोत हैं-- पहला मन में उपस्थित दुनियावी संस्कारों का समूह, और दूसरा नैसर्गिक (किताबी नहीं) आत्मिक ज्ञान. ...'मोक्ष' अर्थात् दुनियावी संस्कारों पर आत्मिक निर्देशों को प्राथमिकता देना, फिर धीरे-धीरे उन संस्कारों की दासता से सम्पूर्ण मुक्ति पाना. शेष फिर......., वैसे बात पूरी हो चुकी है!

(२) भगवान है या नहीं?
कुछ लोग इसका उत्तर 'हाँ' में देते हैं, कुछ 'ना' में, ...और कुछ संशय में रहते हैं कि भगवान् 'है' या 'नहीं'! ...यद्यपि 'हाँ' कहने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है, और 'ना' कहने वालों की बहुत अल्प; तदपि 'हाँ' कहने वालों में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, 'हाँ' पर जिनकी निष्ठा एवं विश्वास डोलते रहते हैं! आराधनालयों में वे आस्तिक होते हैं परन्तु दुनियावी स्वार्थों की पूर्ति के समय अंदरूनी तौर पर वे घनघोर नास्तिक दिखते हैं. ...और केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने वालों के लिए एकदम ठोस प्रमाणिकता से यह कहना कि "भगवान् हैं" या "भगवान् नहीं हैं", बहुत मुश्किल है. दोनों ही बातों का भौतिक या स्थूल प्रमाण देने का प्रयास व्यर्थ के वाद-विवाद को जन्म देता है. ..वैसे इस बारे में मेरा निजी मत आप मेरे पहले के ब्लॉग (चर्चाएं ...भाग - 1) के २०वें बिंदु में विस्तार से पढ़ सकते हैं.

(३) ईसा पूर्व लगभग 3500 सिंधु सभ्यता के प्रमाण मिले राम कृष्ण के नहीं, तो पूर्ण श्रद्धा कैसे होगी? हमारे धार्मिक इतिहास को प्रामाणित कर मन की शंका खत्म कर शान्ति को हमेशा के लिए स्थिर करना चाहता हूं।
किसी पौराणिक दंतकथा के इतिहास को खोदकर हम बहुत कुछ हासिल नहीं कर सकते! आज के परिपेक्ष्य में उससे जो लाभ हम उठा सकते हैं, वह उठा लें, बस यही महत्वपूर्ण है. उदाहरण के लिए-- एक प्रसिद्ध फल 'आम' की मौजूदा मिठास उसका इतिहास जानने से क्या कम या ज्यादा हो जाएगी?? यदि एक 'आम' हमारे समक्ष रखा है, तथा उसकी सुगंध और मिठास हमें आकर्षित व आमंत्रित कर रही है कि हम उसका रसास्वादन कर उसका लाभ उठाएं, किन्तु हम हैं कि उसको खाने से पहले उसके इतिहास या उसके बनने की प्रक्रिया पर लंबी खोजबीन व चर्चा करने में लग जाते हैं. कुछ समय बाद हम पाते हैं कि वह सुगन्धित व स्वादिष्ट फल मुरझाकर गलने लगा और हमारे लिए बेकार हो गया! ...इसी प्रकार भगवान्, परमेश्वर या उनसे सम्बंधित कथाएं यदि हमें कुछ शिक्षा देने, प्रेरित करने और भले मार्ग पर अग्रसर करने में सहायक प्रतीत होती हैं तो उन्हें अपना लें, उनका लाभ उठा लें, अन्यथा बहुत चर्चा करने से भी हमारे लिए वे निस्तेज होती जाती हैं. साथ में इतना अवश्य करें कि उनका अनुभव करके, उनसे सीखकर, और आगे को बढ़ें; एक जगह पर ही अटके न रहें. अध्यात्म (आत्मा-परमात्मा संबंधी ज्ञान) हमें निरंतर चलाएमान रहने को कहता है. इस मंच पर रहते हुए भी यदि हमारी आध्यात्मिक प्रगति न हो तो समझो कि हम कुछ बेड़ियों में जकड़े हुए हैं! पुनः, ...आम की मिठास के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त होने के लिए उसका इतिहास जानना कोई जरूरी तो नहीं, बस उसे चखने की जरूरत है, विश्वास अपनेआप हो जायेगा! ...यह भी अपनेआप में कितना आश्चर्यजनक है कि पेड़-पौधे अपनी जड़ों द्वारा साधारण मिट्टी से ही पता नहीं क्या और कैसे कुछ चूसकर पता नहीं कितने अलग-अलग प्रकार के फल-फूल, सब्जियां, अन्न आदि पैदा करते हैं! क्या हम किसी भी प्रोसेस की पूरी जांच करके कृत्रिम तरीकों से एक भी असली अन्न का दाना अथवा कोई एक फल या फूल लेबोरेटरी में बना पाए हैं- बिना बीज, पानी और मिट्टी के?! अपने प्रयासों से कृत्रिम विधि से एक असली चींटी तक बना पाना हमारे बस का नहीं! ...इतना ही मनन-चिंतन कर लेंगे तो एक अनदेखे निराकार ईश्वर पर विश्वास हो जायेगा. ..राम, कृष्ण आदि उसी के साकार महामानव रूप थे जिनके चरित्र आज के परिपेक्ष्य में भी हमें प्रेरित करने में समर्थ हैं, आज भी वे प्रासंगिक हैं.

(४) क्या कलयुग अब अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका है...? विश्व में बढ़ते आतंकवाद और अन्य गतिविधियां क्या सृष्टि के अंत की ओर संकेत करती हैं...?
बढ़ता आतंकवाद तो नहीं, हाँ हमारे इर्दगिर्द तेजी से बदलती जीवनशैली, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, हर चीज में व्यापारिक सोच, नैतिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ना आदि इस बात के संकेत देते हैं कि दीया बुझने से पहले बहुत तेजी से जल रहा है!

(५) आज मनुष्य संतुष्ट क्यों नहीं है सब बेचैन हैं!?
अनेक कारण हैं-- (१) बचपन में ही परिवार और समाज से ऐसे संस्कार मिलना जिनमें भौतिक आकांक्षाओं व अपेक्षाओं को बहुत महत्त्व दिया जाता है. ..(२) संस्कारों में अब अक्सर जीवन मूल्यों और नैतिक मूल्यों को सहेजने की कला लगभग नदारद. ..(३) बड़े होते जाने पर क्रमशः कड़ी प्रतिस्पर्धा वाला माहौल मिलना और उस माहौल में सामर्थ्य से अधिक श्रम की आवश्यकता पड़ना, व उस कारण तनाव का उपजना. ..(४) ..इस प्रक्रिया के चलते प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक प्रतिभा का नैसर्गिक तरीके से विकास न हो पाना, उसकी भी कहीं न कहीं टीस उपजना और वह टीस भी बढ़ती बैचैनी का एक सबब बनना. ..(५) कुछ बड़े होने होने पर यह समझ में आना कि जीवन को आगे चलाने के लिए कुछ न कुछ ऐसी शिक्षा या विशेषज्ञता जरूरी जो काफी धन कमाने में सहायक हो सके, धन के महत्त्व को अपरम्पार जानना. ..(६) इन सब कारणों से मेधा को जबरन इस प्रकार से ढालना कि वह नोट कमाने वाली मशीन बन सके. ..(७) किसी भी काम का महत्त्व जन-कल्याण, मन की खुशी, या फिर विकास में सहयोग न होकर प्रथमतः धनार्जन हेतु ही होना. ..(८) रही सही कसर मौजूदा सरकार और उसके उपक्रमों द्वारा हाहाकारी विकास और डिजिटलीकरण द्वारा निकलना. सही बताएं तो विभिन्न विकसित देशों में डिजिटलीकरण विविध कार्यों में सरलता लाता है, समय, धन और श्रम की बचत करता है; लेकिन हमारे यहाँ यह भी बेचैनी और तनाव का एक मुख्य स्रोत है. कुछ तो बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर कमजोर है और उससे भी अधिक मानसिकता व उद्देश्य खोखले हैं! इसलिए न तो मूल्यवान समय बचता है, और न ही आसानी होती है; बल्कि सिरदर्द और तनाव ही बहुधा बढ़ते हैं इससे! उदाहरण संख्या (क)-- मेरी हिन्दीभाषी बेटी का आधार-कार्ड बना कोई छह साल पहले 'कर्नाटक' राज्य में, क्योंकि उस समय वह वहां उच्चशिक्षा हेतु कुछ समय के लिए थी. आधारकार्ड में अंग्रेजी के अलावा लोकल भाषा कन्नड़ डाली गयी. अब से तीन वर्ष पहले उसके विवाहोपरांत नया पता (दिल्ली का) और उपनाम, ये दोनों बदलने के लिए 'ऑनलाइन' प्रक्रिया की. सारी डिटेल्स दोबारा कैपिटल लेटर्स में टाइप करनी थी. अंग्रेजी में टाइप करते समय इनबिल्ट ट्रांसलिटरेट सॉफ्टवेयर से समानांतर रूप से ऑटोमेटिकली कन्नड़ भाषा में भी टाइप होता चला गया. आधार कार्ड चुटकियों में अपडेट हो गया. ...लेकिन बाद में नए और पुराने का मिलान किया तो पाया कि कन्नड़ में नाम वगैरह की स्पेलिंग्स अब बहुत बड़ी हो गयी थीं, आकृति भी बदल गयी थी. कन्नड़ भाषा में हम तो ठहरे जीरो. लेकिन खोजी दिमाग ने खोज की, ..फिर से साईट खोली फिर से टाइप किया, लेकिन इस बार स्माल लेटर्स में ..और ट्रांसलिटरेट पर गौर किया तो स्पेलिंग का साइज़ व आकृति अब पुराने से एकदम मिलते हुए निकले! दोबारा फिर से अपडेट करने का प्रोविजन न था, पर सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी पकड़ ली थी हमने! ..हमने आधार कार्यालय से काफी डिजिटल पत्र-व्यवहार किया कि या तो लोकल भाषा हिंदी कर दी जाये या फिर कन्नड़ की स्पेलिंग्स ठीक कर दी जायें, पर हमारी एक न सुनी गयी और न ही कोई जवाब आया! बाद में भी हम पुनः पुनः वेबसाइट की त्रुटि को चेक करते रहे, तब से कोई एक वर्ष बाद सॉफ्टवेयर सम्बन्धी वह त्रुटि दूर हो गयी लेकिन हमारी बेटी का आधार कार्ड ठीक न हो पाया. ..खैर...., अंग्रेजी जिंदाबाद! इस विदेशी भाषा में आधार-डिटेल्स बिलकुल दुरुस्त हैं!!! उदाहरण संख्या (ख)-- एक सप्ताह पहले दिल्ली से लखनऊ, और फिर वापस दिल्ली की राउंड ट्रिप का जनवरी माह का इकॉनमी क्लास हवाई टिकट डिजिटली लेने बैठा. यात्रा डॉट कॉम, मेक माय ट्रिप, तथा इंडिगो, जेट एयरवेज, गो एयर, विस्तारा आदि की ऑफिशियल वेबसाइट पर देखा. हैरत की बात यह कि एयर लाइन्स की वेबसाइट्स पर किराया दलालों की वेबसाइट से डेढ़ से दो गुना ज्यादा था! सभी साइट्स पर दोबारा-दोबारा लॉग इन करने पर रेट्स भी कम-ज्यादा हो रहे थे!! काफी माथापच्ची व तुलना के बाद अंततः एक दलाल साईट से ही रिजर्वेशन कराया! पूरे दो घंटे लग गए! ..कल्पना कीजिये कि किसी दिन यदि लोगों को रेलवे टिकट के मामले में भी यही माथापच्ची करनी पड़े तो करोड़ों लोग बेवजह व्यस्त और तनावग्रस्त हो जायेंगे! जय हो डिजिटलीकरण की..., जिसने लोगों को कमाने, खाने, व्यस्त और बेचैन रहने के इतने अवसर प्रदान किये.

(६) सरकार द्वारा आधार कार्ड का सभी प्रमुख सेवाओं को जोड़ना कितना तर्कसंगत है...? इसका विरोध क्या सही है...?
कहा गया है- "कमी और अति हर चीज की बुरी!" ...पहचान के रूप में 'आधार नंबर' एक बहुत काम की चीज है. इसकी सहायता से किसी भी व्यक्ति का डिजिटल आइडेंटिफिकेशन पूरे भरोसे के साथ किया जा सकता है. समय, आयु और सेहत के साथ हस्ताक्षर, चेहरा आदि बदल जाने पर भी उसकी पहचान अब संभव है. इसलिए बैंकिंग और मोबाइल सिम आदि महत्वपूर्ण जगहों में इसको अकाउंट के साथ जोड़ना ग्राहक के हित में ही है. लेकिन रोजमर्रा के जीवन में की जाने वाली खरीदारियों और छोटे-मोटे लेनदेनों में भी इसकी अनिवार्यता की बात, या सभी भुगतान डिजिटली करने इसलिए आवश्यक कि सरकार की नजरों में हर चीज रहे, यह तो अति है!!! यह व्यक्ति के निजता के अधिकार पर हमला व अतिक्रमण है! नए और संतुलित क़दमों का स्वागत होना चाहिए पर जीवन जीने के पारंपरिक तरीकों को जड़ से मिटा देना भी बुद्धिमानी नहीं. मेरा तो कहना है कि हर नयी चीज ऑप्शनल होनी चाहिए; ..जब तक जो प्रासंगिक, आरामदायक व सुरक्षित रहेगा वो तब तक टिका रहेगा, और उसके बाद वह स्वतः ही ढह जायेगा. पश्चात् लोग खुशी-खुशी दूसरा समर्थ विकल्प अपनायेंगे. ..बदलाव के लिए बलात् कुछ 'थोपना' डिक्टेटरशिप का द्योतक है. बेहतर हो कि सरकार आधार के असली फायदे बताकर आमजन को प्रेरित करे उसे अपनाने के लिए, लेकिन यह भी सुनिश्चित करे कि जो किन्हीं कारणों इसे नहीं अपना रहे या नहीं अपना पा रहे, वो भी किसी लाभ से वंचित न रहें. यानी हर चीज में जबरन इसकी 'बाध्यता' कोई ठीक बात नहीं.

(७) ज्ञान होना एक बात है किन्तु ज्ञानी होना अति उत्तम...?? ज्ञान प्राप्ति तो बहुत सहज है किन्तु ज्ञान का सही प्रयोग बहुत दुर्लभ है.
केवल किताबी या रटे हुए ज्ञान को मैं ज्ञान मानता ही नहीं हूँ. असली ज्ञानी तो वह जो ज्ञान को व्यवहार में उतार कर उस ज्ञान के मर्म को समझे. जब तक हम ज्ञान को अमल में ला कर उसके लाभ (या हानि) की अनुभूति नहीं लेते तब तक हमारा ज्ञान बिलकुल सतही है! अर्थात् ज्ञान प्राप्ति या ज्ञानी होना कोई सहज बात नहीं! इसलिए प्रथमतः उस ज्ञानप्राप्ति पर ही मेरा प्रश्नचिह्न है जो विविध परीक्षणों, व्यवहार या अमल की भट्टी में न तपा हो! वह तपता है तो प्रयोग तो हुआ ही न! ..अर्थात् यथार्थ ज्ञानी अपने ज्ञान का प्रयोग करते हुए ही 'खरा ज्ञानी' बनता है; शेष सब रट्टू तोते होते हैं, वो बहुत आवाजें करते हैं!

(८) क्या कारण है- हम हमेशा द्वंद्व में रहते हैं?
"चित भी मेरी और पट भी मेरी", इसी उधेड़बुन में अक्सर हम वैचारिक द्वंद्व में रहते हैं. फायदा, ..फायदा, ....और फायदा, बस यही गूंजता रहता है दिलोदिमाग में ..तो मानसिक द्वन्द कैसे न हो?! हममें से अधिकतर धन और यश दोनों के अभिलाषी हैं, ..और कुछ जो धन के नहीं भी हैं तो यश के तो अवश्य ही हैं! ...दूसरी एक अन्य वजह भी है मानसिक द्वंद्व की कुछेक लोगों में, कि उनको अन्दर की आत्मिक आवाज का कुछ ज्ञान हो जाता है और फिर लड़ाई होने लगती है संस्कारों की उस अंतरात्मा की आवाज के साथ!

(९) अतीत डराता है, भविष्य चिंतित करता है, क्यों? ऐसे में वर्तमान को सुन्दर कैसे बनाया जाए?
हमारे संस्कारों का प्रभाव कुछ ऐसा है कि बहुधा हमें नकारात्मक ही पहले सूझता है. चाहे अतीत हो या फिर भविष्य, यादाश्त और कल्पना में नकारात्मक प्रसंग ही पहले उभरते हैं. तो इनके चलते वर्तमान पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है. हमारा वर्तमान भी बहुत भारी वजन का लगने लगता है हमें! एक ही उपाय है वर्तमान और सबकुछ सुन्दर बनाने का, कि हम किसी प्रकार से अंतरात्मा की आवाज को संस्कारों का मॉनिटर (मुखिया) बना दें, संस्कारों का महत्त्व गौण कर दें. ..फिर अंतरात्मा की आवाज पर सबकुछ केवल अच्छा और नेक तरीके से करने की झड़ी लगा दें (बिना फल की बाट जोहते हुए), ..कुछ समय बाद हमें सबकुछ अच्छा लगने लगेगा, सबकुछ 'हमारे लिए' फिर अच्छा ही होगा.

(१०) किसे जानने से सबकुछ जाना जा सकता है?
जिस दिन हम स्वयं को आध्यात्मिक रूप से भलीभांति जान लेंगे, जीवन की वजह और उद्देश्य समझ में आ जायेगा, उस दिन हम लगभग सबकुछ जानने के मुहाने पर होंगे. तब उस परम शक्ति को भी अनुभूत कर लेंगे जो इस सृष्टि के पार्श्व में है! तब योगादि कसरत के बिना भी जीवन जीने की कला स्वतः आती जाएगी, जीवन सरल और सहज हो जायेगा.

Monday, October 16, 2017

(८६) चर्चाएं ...भाग - 5

(१) क्या आत्मा मरती है? नहीं.. तो कहां जाती है? सभी कहते हैं आत्मा मरती नहीं, क्या यह दुबारा जन्म लेती है? अगर हाँ तो हमें याद क्यों नहीं होता कि हम पहले क्या थे?
आत्मा एक प्रकार की ऊर्जा है. एक ऐसा ऊर्जा रूपी सॉफ्टवेयर जो किसी देह रूपी हार्डवेयर को चलाने या ऑपरेट करने में सक्षम है. विज्ञान के अनुसार भी किसी भी ऊर्जा का अपना कोई रूप-रंग-आकार आदि नहीं होता; ऊर्जा अक्षुण्ण होती है अर्थात् कभी नष्ट नहीं होती; ऊर्जा की कोई यादाश्त भी नहीं होती. ...विभिन्न अन्य ऊर्जाएं जैसे न दिखते हुए भी वातावरण में कहीं न कहीं तो अवश्य होती हैं वैसे ही आत्मा भी होती हैं. गर्भ या बीज के माध्यम से किसी नवीन देह में प्रत्यारोपित होते ही उसके हार्डवेयर से जुड़कर ही वह सक्रिय (एक्टिवेट) होती है और उसे भी सक्रिय करती है. जैसे बहुत सी प्राकृतिक पेचीदगियों की गांठ विज्ञान अभी तक नहीं खोल पाया है, आत्मा भी उनमें से एक है. ...वैसे यह उत्तर अति संक्षिप्त और प्राथमिक स्तर का ही है.

(२) भारतीय संस्कृति में व्रत और पूजा विधानों का क्या महत्त्व है...? क्या आज भी व्रत विधानों का कोई औचित्य है...?
किसी विश्वास के रहते मन की पवित्रता और मानसिक बल प्राप्त करने हेतु व्रत एवं अनुष्ठान आदि करना सर्वथा उचित है. लेकिन अन्य किसी प्रयोजन से इन्हें करना अब प्रासंगिक एवं उचित नहीं! किसी भी पूजा-आराधना का उद्देश्य यदि ईश्वर के गुणधर्म को आत्मसात करना ही हो तो ही उत्तम. यदि कोई भी पूजा-अनुष्ठान हमारे भीतर दैवीय गुणों में वृद्धि कर हमें और बेहतर इंसान बना पा रहा हो तो उसका सहर्ष स्वागत. ...अन्यथा सब मिथ्या है, त्याज्य है.
इस विषय पर चर्चा में अनेक वाद-विवाद पढ़े. देखिये, यदि विश्वास और भाव के बिना कोई व्रत आदि रखा जाये तो उसका कोई भी औचित्य नहीं, वह बेकार की एक्सरसाइज होगी....लेकिन विश्वास सहित भावपूर्ण कृत्य के लाभ अवश्य होते हैं. अपने अनुभवों से मेरा यह मानना है कि करवाचौथ जैसे कठिन व्रत यदि "भावपूर्ण" किये जायें तो 'संभावित' लाभ ये हैं-- ...(१) स्त्री के मन में अपने पति के लिए आदर और केयरिंग का भाव बढ़ता है और फलस्वरूप पति के मन में भी ऐसा ही भाव बढ़ता है. तब आपसी सम्बन्ध और अधिक प्रगाढ़ होते हैं. ...(२) व्रत के दिन पत्नी के मन में यदि श्रद्धाभाव और अनन्य विश्वास है तो उसका मानसिक बल एवं पवित्रता बहुत बढ़ जाते हैं. इसके कारण बहुत सी विपत्तियाँ टल सकती हैं, ..हो सकता है पति अब पत्नी की नेक सलाहों पर अधिक ध्यान दे इसलिए ही! ..क्योंकि यह एक स्थापित सत्य है कि नैसर्गिक रूप से पुरुष मन की अपेक्षा एक स्त्री मन अधिक नैतिक एवं शुद्ध (माने अधिक अच्छा) होता है. ...(३) अधिकांश भारतीय भावपूर्ण आस्तिक दंपत्तियों को व्रत के दिन हुए ये उपरोक्त लाभ व्रत के बाद भी कायम रहते हैं और प्रत्येक वर्ष इनके पुनः पुनः होने पर ये लाभ गहराते जाते हैं. .....निचोड़ यह कि भावना नेक व भाव सच्चा हो तो ही ईश्वरीय मदद मिलती है अन्यथा ईश्वर कोई रिश्वतखोर राजा नहीं! भावपूर्ण उपासना होने पर भी ईश्वर कोई चमत्कार जैसा नहीं करते अपितु वह बुद्धि और विवेक को शुद्ध करके आपसी समझ व प्यार को विकसित करते हैं; जब ऐसा होता है तो हमारी निर्णय क्षमता बेहतर होती है और फलतः संकट टलते हैं. ..जिस व्रत से परस्पर प्यार व सम्मान बढ़े, मानसिक बल बढ़े, बुद्धि और विवेक शुद्ध होते हों, ..और फिर इन सब से संकट टलते हों, ऐसा व्रत आलोचना का पात्र कैसे हो सकता है!? हाँ जिनको विश्वास नहीं उनको दिखावे के लिए व्रत रखने-रखवाने की कोई भी आवश्यकता नहीं, उसका कोई भी लाभ होने वाला नहीं! धर्म के क्षेत्र में कुछ भी जबरन करना या करवाना गलत है, हाँ कुछ वास्तव में गलत होने पर उसका विरोध जायज है- जैसे स्वार्थपूर्ति के लिए अंधश्रद्धा गलत है. उदाहरण के लिए- कुछ लोगों में विश्वास, श्रद्धा, भाव वगैरह ना होते हुए भी मात्र स्वार्थपूर्ति के लिए वे विभिन्न अनुष्ठान करते-करवाते हैं, या मात्र भौतिक स्वार्थ साधने के लिए ही विश्वास, श्रद्धा व भाव को बढ़ाने का प्रयास करते हैं, ...इन्हीं के कारण अंधश्रद्धा बढ़ती है और समाज का खरा भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास रुक जाता है.
धर्म के क्षेत्र में इस समय बहुत कुछ गलत है लेकिन सब कुछ गलत घोषित कर देना अतिरेक होगा. किसी दुर्लभ सी अपवाद वाली घटना से हमें एकदम से गलत अर्थ नहीं निकालने चाहियें. अपवाद कहाँ नहीं होते??? अध्यात्म की जड़ में घुसकर ही हम इसे भलीभांति जान सकते हैं, फिर इसमें व्याप्त अच्छाईयाँ व बुराईयाँ हमें स्पष्ट हो जाती हैं, हम उन्हें फ़िल्टर कर सकते हैं. याद रखिये कि अध्यात्म केवल निरंतर अभ्यास (इम्प्लेमेंट) एवं अनुभूति का शास्त्र है! .....अति प्राचीन व्रत एवं उनके आशय गलत थे नहीं, हमने ही उनका स्वरूप बिगाड़ दिया है! ...और अनेक व्रत विधान आदि बाद के लोभी पंडितों ने नए भी पैदा कर दिए, ...या फिर उन्होंने भी प्राचीन का स्वरूप बिगाड़ कर रख दिया. ...लेकिन मेरा यह मजबूती से मानना है कि किसी व्यक्ति का जब विश्वास खंडित हो जाये तो फिर उसके लिए वह अनुष्ठान व्यर्थ का है, उसे बिलकुल भी ना करना चाहिए, ..जिनका विश्वास झूठा है, उनका विरोध भी करना चाहिए, ...पर जिनका विश्वास अभी भी सच्चा है, उनकी भर्त्सना करना उचित नहीं!

(३) मैं एक सिविल इंजिनियर हूँ और मैं जल विभाग में कार्यरत हूँ।और मैं अपने शहर को साफ सुथरा रखना चाहता हूँ, मैं पेड लगाने और नदियों को साफ सुथरा रखना चाहता हूँ लेकिन कैसे करें समझ नहीं आ रहा है।
आप जहाँ कहीं भी रहते हैं सबसे पहले वहां अपनी सोशल एक्टिविटीज़ को बढाएं. यदि आपके लिए संभव हो तो अपने आसपास के पड़ोसियों से संपर्क साधकर एक सामाजिक संगठन बनाएं, ...या फिर अपने क्षेत्र के किसी बेहतर संगठन या संस्था को ज्वाइन कर लें. ..अब आरंभ में ही अपने सपने या चाहत को उन्हें ना बताकर पहले उनसे सामाजिक घनिष्ठता बढाएं, उनके वर्तमान कार्यों में सहभाग करें और फिर कुछ समय पश्चात् अपना यह प्रस्ताव उनके समक्ष रखें. किसी भी बड़े कार्य को अंजाम देने से पहले उसकी एक फिजा तैयार करनी पड़ती है. ...आप समझ गए होंगे. ...आपका इरादा नेक है और तरीके व्यावहारिक तो अवश्य ही अपने मिशन में सफल होंगे. समाज या सरकार का सहयोग लेकर ही बड़े पैमाने पर कार्य संभव हो पाता है. मेरे विचार से करप्शन-रहित कार्य के लिए सरकार की अपेक्षा समाज का सहयोग लेना ज्यादा अच्छा रहेगा. ...मेरी शुभकामनाएं.

(४) धर्म के नाम पर हिंसा करना सबसे बड़ा पाप है...? समाज में हिंसा फैलाने में आज धर्म का सहारा लिया जाता है ...क्यों ?
जी हाँ, सहमत हूँ आपसे. ...ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हिंसा भड़काने वाले स्वार्थी होते हैं और वे भलीभांति जानते हैं कि अधिसंख्य लोगों का धार्मिक या आध्यात्मिक ज्ञान बहुत उथला है, बहुधा लोग पिछड़ेपन वाले अंधभक्त हैं, इसलिए धर्म के नाम पर उन्हें आसानी से बरगलाया व हिंसक किया जा सकता है. पिछड़े और विकासशील संघों में ही यह होता है, लेकिन एक विकसित राष्ट्र के लोगों को धर्म के नाम पर उत्तेजित करना सरल नहीं, वे किसी जायज मुद्दे पर ही स्वतः उत्तेजित होते हैं!

(५) तनावरहित जीवन जीने की कला क्या है ?
"सादा जीवन उच्च विचार"! ....'सादा' का अर्थ 'रूखा-सूखा' नहीं होता! 'सादा' अर्थात् 'आडंबरहीन'! जीवन में सबकुछ करें..., लेकिन सहजभाव से, बिना दिखावे के! पिछलग्गू न बनें, अपनी आवश्यकताओं का आंकलन स्वयं करें, लालच में उन्हें अधिक विस्तार ना दें, और अपनी वरीयताएं उन्हीं के अनुसार स्वयं तय करें! ..जीवन की भंगुरता का सदैव ध्यान रहे! कुछ भी सदा के लिए नहीं रहना है, इसका ध्यान रखते हुए भविष्य की योजनाओं में सीमित ऊर्जा खर्च करें! तुलना से बचें, होड़ से बचें, जो भी प्राप्त है उसपर गर्व करें, हीन अथवा उच्च भावना से दूर रहें! ....सबसे जरूरी बात कि जो भी काम-धंधा या नौकरी आदि कर रहे हैं उसे दिल लगाकर, सिर उठाकर, पूरे मनोयोग से लुफ्त लेते हुए (यानी एन्जॉयमेंट की फीलिंग के साथ) गर्व से करें..., तनाव कोसों दूर रहेगा! कार्य में संतुष्टि यानी वर्क सैटिस्फेक्शन से ही दिमागी सुकून मिलता है, फिर बदले में मिले पैसे की मात्रा बहुत महत्त्व नहीं रखती! जीवन को भरपूर जियें, हर्ष-उल्लास के छोटे-बड़े मौके ढूंढते रहें, जीवनसाथी और अन्य परिजनों के साथ भरपूर समय बिताएं, पारिवारिक समारोहों में सक्रियता से हिस्सा लें, खुशमिजाजी रखें, ...इन सब में बहुत पैसे की आवश्यकता नहीं होती! सदैव भान रहे कि पैसा बहुत कुछ है, लेकिन सबकुछ नहीं! कुछ भी बड़ा खर्च करने से पहले अपने अंतर्मन से यह प्रश्न अवश्य करें कि.. क्यों? क्या यह सही में मेरी आवश्यकता है? ..या देखा-देखी, भेड़चाल में, ऐसा करने की सोच आ रही है? ..ऐसा करने पर हमारे भीतर की आवाज हमें अनेकों अनचाहे और गैरजरूरी खर्चों से बचाकर हमें तनावमुक्त रख सकती है. ...इन सब के अतिरिक्त यदि अध्यात्म को भी समझने का प्रयत्न करते रहेंगे तो जीवन जीने की कला स्वयमेव आती जाएगी.

(६) भारत 119 देशों में से 100 वें स्थान पर पहुँच गया है भुखमरी में! हमें विकास किस क्षेत्र में करना चाहिए? और क्या हम सही विकास के राह पर हैं? बुलेट ट्रेन,राम के, पटेल के, शिवाजी के प्रतिमाएं बनाना ज्यादा जरूरी हैं?
संघ के सुदृढ़ और खरे विकास के लिए सभी को अच्छा इंसान बनने-बनाने के क्षेत्र में सबसे पहले कार्य करना होगा, ...उसके बाद, हमारे पास आलरेडी जो भी है उसे संभालना, सहेजना सीखना होगा. ...वर्तमान ढांचे, संसाधनों आदि को जब हम मेन्टेन करने में, ग्रिप में लेने में जब सफल हो जायें, तब ही हमें आगे के विकास का कार्य आरंभ करना चाहिए! ...मोदी जी तो देश के सिस्टम को बिना बुनियादी पाठ अमल करवाए आगे के सिलेबस में धकेले जा रहे हैं, ..यह आत्मघाती कदम सिद्ध होगा, हमारा विकास एक खोखला विकास ही सिद्ध होगा (हो रहा है!). दूर अतीत में अंग्रेजों द्वारा बनवाये गए और यूनेस्को द्वारा 'विश्व धरोहर' घोषित "कालका-शिमला रेलपथ" को भारतीय रेल विभाग ठीक से मेन्टेन करने में जहाँ आज भी 'अक्षम' है, दूसरी सवारी गाड़ियों की लेटलतीफी और एक्सीडेंट्स लगातार बढ़ते जा रहे हैं, स्टेशनों और प्लेटफार्मों की हालत खस्ता बनी हुई है, यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाएं और सुरक्षा व्यवस्थाएं बद से बदतर होती जा रही हैं, ...वहां इन सब को दुरुस्त किये बगैर ही बुलेट ट्रेन का शिगूफा छोड़ना निहायत बेवकूफी भरी बात लगता है! ...रेलवे का जिक्र तो मात्र एक उदाहरण के रूप में किया मैंने, ..सभी क्षेत्रों और विभागों में बुनियादी संरचना को मजबूत करना सरकार का पहला लक्ष्य होना चाहिए. ...खोखली बुनियाद पर विकास की इमारत खड़ी करने की कोशिश में एक दिन सब भरभरा कर गिर जायेगा, और नुकसान देश के आम नागरिकों का ही होगा, हम फिर से कई बरस पीछे चले जायेंगे! ...अभी मैं ५४ वर्ष का हो चुका हूँ और होश संभालते ही पिछले ५० वर्षों से अभी तक सुन और पढ़ रहा हूँ कि 'भारत एक विकासशील देश है'!
प्रतिमाएं आदि तब बनाएं जब असली विकास करके थोड़ा सा सुस्ताना हो, अपने पर खुश होना हो! अभी तो बहुत काम पड़े हैं, अभी मूर्तियां बनवाने की बात सुनना भी कानों को नागवार गुजरता है, क्रोध आता है मूर्खतापूर्ण बातों पर! छोटा सा बच्चा समझ रखा है आम जनता को कि झुनझुना पकड़ा देंगे!

(७) दीपावली मनाने का सर्वोत्तम तरीका क्या है और क्यों....? दीपावली मनाने के पीछे क्या भाव है...?
असत्य पर सत्य की विजय उपरांत धर्मयुद्ध के नायकों के स्वागतार्थ एवं सम्मानार्थ तथा इस निमित्त अपना हर्षोल्लास व्यक्त करने हेतु दीपावली का पर्व मनाया जाता है. कार्तिक माह की अमावस्या की रात्रि विभिन्न प्रकार की रोशनियों से वातावरण को जगमगा कर अंधकार को परास्त कर प्रतीक रूप में नकारात्मकता पर सकारात्मकता (असत्य पर सत्य) की जीत को दर्शाया जाता है. वैसे समय के साथ दीपावली मनाने के अनेक अन्य कारण भी साथ में जुड़ गए. इस कारण इस त्यौहार का महत्त्व और भी बढ़ जाता है. सब विश्वास और परंपरा की बातें हैं. लेकिन यह तो सच है कि प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी तरह यह त्यौहार हमारे भीतर एक नवीन ऊर्जा एवं आह्लाद का संचार करता ही है. अतः यह आलोचना का तो पात्र कदापि नहीं. हम अपने विश्वास के चलते किसी भी ढंग से इसे मनाएं, पर अंततः परिणामी भाव यही आए कि, "सकारात्मकता बढ़े, सत्य की राह पर अग्रसर एवं स्थिर हों, आपसी भाईचारा बढ़े, सात्त्विकता बढ़े, बहुमुखी समृद्धि एवं विकास की ओर बढ़ें, जीवन में तनाव कम होकर हर्षोल्लास बढ़े, भीतरी ऊर्जा बढ़े."

(८) देश में लोग सुधार लाने में सहयोग देने के बजाये अपनी बात को एहमियत क्यों देते हैं? बिना पटाखों की दिवाली,कैसा विचार है..?
किसी भी बेहतर चीज (बदलाव) को लागू करवाने के लिए कानूनी दबाव की अपेक्षा जागरूकता पैदा करना एक अच्छा विकल्प है. लोगों के जागरूक न होने की दशा में कानूनी दबाव भी चरण दर चरण बनाया जाना चाहिए. एकदम से हिटलरशाही थोप देना भी सामाजिक असंतोष को जन्म देता है, खासतौर पर जब मामला किसी पारंपरिक धार्मिक त्यौहार से जुड़ा हो. ..."बिना पटाखों की दिवाली" वैसे तो एक बहुत अच्छा विचार है, पर इसे चरण दर चरण बुद्धिमानी से लागू किया जाता तो बेहतर होता. उदाहरण के लिए -- दिल्ली में हर साल की तरह इस साल भी आतिशबाजी के फुटकर और थोक व्यापारियों को लाइसेंस जारी किये गए, उनको जारी करने के लिए रिश्वत वगैरह भी वैसे ही खायी गयी, चूंकि इनसे जुड़े व्यापारियों के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा दीपावली में ही पूरा होता है, अतः उन्होंने इस दिवाली से पूर्व ही निर्माता कम्पनियों को भारी एडवांस धनराशि के साथ बड़े आर्डर दे दिए, छोटे व्यापारियों ने बड़े व्यापारियों के यहाँ भी ऐसा ही कुछ कर दिया. अब न्यायालय का पटाखा-प्रतिबन्ध का आदेश आ गया, तो कारोबार से जुड़े व्यापारियों को तो दोहरा-तिगुना नुकसान हो गया. लाइसेंस फीस का घाटा, एडवांस धनराशि का घाटा, बिक्री शून्य तो मुनाफा भी शून्य, इस वर्ष कोई अन्य काम न करने के कारण कमाई भी शून्य. ...'दिवाला' निकल गया होगा उनका! बरसों से चले आ रहे एक दस्तूर को एकाएक समाप्त कर देना मुझे तो समझ में नहीं आया. ...हल के तौर पर होना यह चाहिए था कि न्यायालय यह निर्णय लेता कि अभी से, यानी इसी दीपावली पर ही यह घोषणा कर दी जाती कि इस वित्तीय वर्ष के उपरांत पूरे राजधानी क्षेत्र में सभी त्यौहारों पर आतिशबाजी सख्ती से प्रतिबंधित रहेगी. दीपावली उपरांत के लिए व्यापारीवर्ग इस बीच अपना कोई दूसरा काम-धंधा ढूंढ लेता, उसका नुकसान न होता. इति.

(८५) चर्चाएं ...भाग - 4

(१) देवी पूजन का कलयुग में बढ़ता महात्म्य ...क्या कारण है? भारत में देवी पूजन का चलन और कन्या भ्रूण हत्या कितनी विडंबना!
हम उच्चकोटि के स्वार्थी, पाखंडी और मंगते (भिखारी समान) हैं, यही एक मात्र कारण है गणेशोत्सव हो या नवरात्रि, या फिर कोई भी अन्य पर्व; पूजन में आडंबरों, तड़क-भड़क व दिखावों का जोश-ओ-खरोश निरंतर बढ़ ही रहा है. ...लेकिन हमारे दिखाने और खाने के दांतों में बहुत अंतर है! ...समाज में बढती धार्मिकता की सूजन के साथ कन्या भ्रूण हत्या की दर भी निरंतर बढती जा रही है! हम आखिर क्या चाहते हैं, कहाँ जा रहे हैं??? ...धिक्कार है, शर्म महसूस होती है.
कन्या भ्रूणहत्या पर लगाम लगाने के लिए आज स्त्रियों के प्रति सम्मान का बढ़ना अतिआवश्यक प्रतीत हो रहा है. इस निमित्त इस काल में देवी पूजन का बहुत महात्म्य है. लेकिन लोगों का स्वार्थ जो है न, वो भक्ति की मूल भावना और भाव को कुचले दे रहा है. लोग तो पूजन के समय देवी माँ से भी प्रार्थना करते हैं कि- सभी भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति हो, बड़े स्कूल में एडमिशन, अच्छे नंबर, अच्छी नौकरी, ऊंचा पैकेज, कामकाजी बीवी और 'पुत्र' की प्राप्ति हो!! केवल भक्ति हेतु ही भक्ति, ऐसी 'निष्काम' भक्ति अब देखने में नहीं आती. आज सब 'सकाम' हो गया है या फिर केवल मौज-मस्ती! 

(२) सबके हित में जिसकी प्रीति हो गई है उन्हें भगवान् प्राप्त हो जाते है! आसान है पर मुश्किल जान पड़ता है!
कितनी बढ़िया बात कही आपने, दिल खुश हो गया. "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना जिसके दिल में ठीक से आ गयी, उसने तो मानों भगवान् को पा लिया. उसकी सोच फिर निराली ही होती है- सभी निर्बंधों से परे, आकाश से भी ऊंची, कल्पनातीत! ..आपने सही कहा कि यह आसान है, पर बहुत मुश्किल जान पड़ता है; क्योंकि व्यक्ति के हजारों-लाखों स्वार्थ जो आड़े आ जाते हैं! आज के बाबा, तथाकथित संत और धार्मिक मार्गदर्शक भी इन स्वार्थों से अछूते नहीं! भगवान् को पा लेने का ढोंग करते हैं वो!
...आपने ऊपर एक शब्द "प्रीति" का प्रयोग किया है. अध्यात्म में इस शब्द (गुण) का बहुत महत्त्व है. प्रीति का अर्थ है- निरपेक्ष प्रेम (अनकंडीशनल लव)! जिस मानव का सभी (सम्पूर्ण सृष्टि) के प्रति निरपेक्ष प्रेम स्थापित हो जाये तो मानो सब सध गया, कुछ शेष न रहा. यही तो चरम बिंदु है किसी भी भक्ति, उपासना या साधना का! वातावरण में व्याप्त अनेकों अहं के स्पंदनों के कारण साधारण व्यक्ति इस चरम बिंदु को पा नहीं पाता, इसीलिए उसे यह कठिन जान पड़ता है. लेकिन यदि किसी प्रकार अहं व स्वार्थ आदि से मुक्ति पा ली जाये तो यह स्वतः बड़ी आसानी से सध जाता है. किसी भी आध्यात्मिक साधना में भी हमारे कृत्य या एक्शन का प्रमुख केंद्र अहं-निर्मूलन ही होता है. ..और अहं का निर्मूलन तभी संभव हो पाता है जब सत्संग और सत्साहित्य की मदद से हम मन में ईश्वरीय (नोबेल) गुणों की वृद्धि करते जाते हैं और उन गुणों को अपने दैनंदिन जीवन में हर पल, हर जगह, हर प्रसंग में 'निरंतर' उपयोग भी करते हैं. फिर धीरे-धीरे हमारा प्रत्येक कृत्य बेहतर से बेहतर होता चला जाता है. जब हम प्रकाशित होते जायेंगे तो अहं रूपी अंधकार भी क्रमशः कम होता चला जायेगा. अहं या किसी अन्य दुर्गुण रूपी अंधकार को मिटाने का यही सर्वोत्तम मार्ग है कि कोई प्रकाश-स्रोत प्रज्जवलित किया जाये. अंधकार को यूं ही धक्का मारने पर वो कभी भी नहीं जायेगा! अँधेरे का कोई स्रोत, स्विच या बटन नहीं होता जिसको ऑन-ऑफ किया जा सके लेकिन प्रकाश का स्रोत होता है. प्रकाश की अनुपस्थिति में ही अंधकार अपने पांव पसारता है. ...हमें परमेश्वर से साक्षात्कार इसलिए भी मुश्किल जान पड़ता है क्योंकि हम बिना किसी प्रकाश-स्रोत की मदद लिए अंधकार को भगाने की जुगत करते रहते हैं.

(३) आज अधिकांश लोग विश्वास से अधिक अंधविश्वास के शिकार क्यों नज़र आते हैं...? अधिकांश लोग अंधविश्वासों के शिकार हो कर ढोंगी बाबाओं के चक्कर में फंस जाते हैं!
इसके दो प्रमुख कारण हैं-- (१) मन में भरा असीमित लालच और सांसारिक इच्छाएं (ईश्वरभक्ति का दृष्टिकोण प्रायः 'सकाम' होना); (२) शिक्षा और जागरूकता की कमी! .....अधिकांश लोगों के मन में यह भ्रम होता है कि मंदिर के पंडित, पंडे, कथावाचक, बाबा, आदि बहुत ज्ञानी होते हैं तथा वे भगवान् और सामान्य जन के बीच सेतु (ब्रिज) का काम बखूबी कर सकते हैं! इसीलिए लोग "उपाय" पूछते हैं और वे बताते हैं! ...लोगों द्वारा सामान्यतः किन चीजों के उपाय पूछे जाते हैं- बच्चा (पुत्र) कब होगा, शादी कब होगी, नौकरी कब लगेगी, पैसा कब मिलेगा, व्यापार में घाटा कैसे कम होगा, मुनाफा कैसे बढेगा, वशीकरण के कुछ उपाय बताएं, मुकदमा कब छूटेगा, राहु-केतु-शनि आदि शांत कैसे होंगे, बीमारी कब जाएगी, अच्छे दिन कब और कैसे आयेंगे???? ...तथाकथित बाबा भी कुछ ऐसी लच्छेदार भाषा में सांत्वना देते हैं और उपाय बताते हैं कि सामने वाला निहाल हो जाता है (गुड सेल्समैनशिप), ...आपको लगने लगता है कि काम अब बना ही समझो! ..चूंकि हमारी समस्याओं में से अधिकांशतः साइकोलॉजिकल स्तर पर होती हैं तो वे तो बातें करते-करते ही काफी ठीक हो गयी प्रतीत होती हैं, शेष कुछ इसलिए ठीक हो जाती हैं क्योंकि कहकर ..भड़ास निकालकर हमारे दिल पर से बोझ काफी कम हो जाता है और अब हम हलके मन से समस्याओं से ठीक ढंग से लड़ सकते हैं, ...हम निर्भय होकर समस्याओं के सामने जाते हैं और जीत जाते हैं (निर्भय इसलिए हो जाते हैं क्योंकि बाबाजी ने सारा बोझ तो अब उपायों और भगवान् के ऊपर डलवा दिया)!!! ...बहुत बड़ा साइकोलॉजिकल ट्रीटमेंट है यह, लेकिन है तो आखिर धोखा ही!!! "उपायों" के माध्यम से वो खूब चूसते व लूटते हैं बुद्धुओं और लालचियों को! उनके फलने-फूलने का कारण हम और हमारी असीमित इच्छाएं ही हैं या फिर हमारा बुद्धू होना.

(४) समाज में बढ़ते व्यभिचार का मूल कारण क्या है...? सभी बुराइयों का मूल कारण केवल कलयुग को बताना कहाँ तक तर्कसंगत है...?
मुख्य कारण है हमारी तेजी से बदलती जीवनशैली के साथ नैतिक मूल्यों का गिरना. उन्नत देशों ने अपने नित-नवीन आविष्कारों से जो कुछ धीरे-धीरे एक बहुत लम्बे समय में हासिल किया, वो हमारे देशवासियों (विकासशील देशों) ने वैश्वीकरण के चलते एक ही झटके में एकाएक प्राप्त कर लिया. इसलिए हाजमा खराब हो गया हमारा! आज जो भी तकनीक, मोबाइल, इंटरनेट, आदि हम मुक्तहस्त से प्रयोग कर रहे हैं, उनमें से कितनों को ईजाद करने में हमारा योगदान रहा, और कितना प्रतिशत?! बना-बनाया मिल गया हमें तो टूट पड़े भूखों की तरह! "तकनीक और गैजेट्स को योग्य संस्कृति से प्रयोग ना कर पाना प्रथम कारण है बढ़ते व्यभिचार का." ..."अन्यों की संस्कृति का केवल काला पक्ष ही ग्रहण करना दूसरा कारण है बढ़ते व्यभिचार का." ..."कहने को बहुत व्यस्त, लेकिन व्यस्तता कहाँ, इसको टटोलें तो मिलता है तीसरा कारण बढ़ते व्यभिचार का." ..."खराब और उदासीन पेरेंटिंग चौथा बड़ा कारण है बढ़ते व्यभिचार का. (कहने को हम बच्चों को प्रवचन के जैसे बहुत से डू एंड डोंट्स बताते हैं, पर समानांतर रूप से कितना अमल हम खुद करते हैं!)." ...कलयुग या सतयुग कोई ऊपर से नहीं टपकता, एक संघ के नागरिकों की जीवनशैली ही इनका निर्माण करती है. और जो संस्कृति बदलती जीवनशैली के साथ नैतिक मूल्यों को सहेज नहीं पाती वह घोर कलियुग का सामना करेगी ही!

(५) बढ़ती धार्मिक हिंसा और आतंकवाद आज विश्व की सबसे बड़ी चुनौती हैं ...क्या आप इस विचार से सहमत हैं..? भारतवर्ष गत कई वर्षों से वर्षों से पाकिस्तान द्वारा फैलाये गए आतंकवाद का शिकार रहा है ...कल अमरीका में हुए आतंककवादी हमले में कई लोग मारे गए ...इस आतंकवाद का मज़हबी चेहरा कितना भयावह है!
जी हाँ..., मैं सहमत हूँ आपसे. ...परन्तु केवल पाकिस्तान का नाम लेना ही उचित न होगा, सम्पूर्ण विश्व में धार्मिक हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है. माना कि पहले लोग एक-दूसरे से परिचित नहीं थे, अन्य संस्कृतियों एवं सभ्यताओं से अपरिचित थे, तो अपनी-अपनी श्रेष्ठता का अहंकार होना स्वाभाविक था; सो अतीत में कभी ईसाईयों ने भी काफी धार्मिक हिंसा की, ...लेकिन समय बीतते ईसाईयों ने खुद को नियंत्रित किया किन्तु कुछ अन्य बड़े धर्म अपने अनुयायियों को आज तक सहिष्णु न बना पाए! ..दुनिया में इतने विकास और जान-पहचान के बाद भी किसी धर्मपंथ में धार्मिक असहिष्णुता, उन्माद या हिंसा का अभी भी होना उसके 'पिछड़ेपन' का द्योतक है. इसी कारण उनके लोग आज भी इतने अशिक्षित या/एवं गरीब हैं. ये अलगाववादी अपने कृत्यों के कारण स्वयं ही अन्य लोगों से अलग-थलग होते जा रहे हैं. कुछ समय बाद ये इतने अल्प व अलग-थलग हो जायेंगे कि इनके लिए अपने अस्तित्व की रक्षा करना भी मुश्किल हो जायेगा (उदाहरण के लिए - रोहिंग्या चरमपंथी और उनके मासूम बीवी-बच्चे - ..गेहूं के साथ घुन भी कैसे पिस जाता है, इसकी एक बानगी). .....वैसे धार्मिक हिंसा के अलावा अपना दादागिरी टाइप का वर्चस्व स्थापित करने की चेष्टा भी आतंकवाद या युद्ध का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है (उदाहरण- उत्तर कोरिया व तानाशाही प्रवृत्ति वाले कुछ अन्य राष्ट्र). ....लेकिन यह तय है कि आने वाले समय में पिछड़े व कट्टर धर्मपंथ तथा तानाशाही राष्ट्र एक भारी कीमत चुका कर विलुप्तप्राय हो जायेंगे.

(६) समाज में उचित बदलाव लाने के लिए पहल किसे करनी चाहिए - बड़े लोगों को या नवयुवकों को? समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए क्या सही मार्ग है?
नौजवानों और बड़ों, दोनों को पहल करनी होगी. अपने अहंकार को किनारे रखकर, शुद्ध रूप से केवल 'उचित' के लिए ही दोनों पीढ़ियों को एक-दूसरे से प्रेरित होने में तथा एक-दूसरे को प्रेरित करने में जी-जान लगानी होगी. उचित और अनुचित में भेद हम तब ही कर पायेंगे जब हम अपने (समाज के) कृत्यों का तटस्थ एवं शिक्षित दृष्टिकोण से आंकलन करेंगे. आधुनिक और विकसित होने की दुहाई देकर हम उन पुरानी मान्यताओं व मूल्यों को तिलांजलि नहीं देंगे जो आज भी हमें नैतिक रूप से स्थिर रखने में सहायक हैं. ..हां, उन पुरानी बेड़ियों को अवश्य काटेंगे जो हमारी सोच को आगे ले जाने में बाधक हैं. ...याद रहे कि समाज को 'बदलाव' नहीं बल्कि 'विकास' चाहिए, ..और 'विकास' के क्रम में कुछ वैसा ही रखना, कुछ नया जोड़ना और कुछ डिलीट करना आवश्यक होता है. लेकिन संजोते, जोड़ते या मिटाते हुए अहंकार-रहित विवेक का जागृत रहना अत्यावश्यक! इस निमित्त बेहतर दिशा सुनिश्चित करने के लिए नौजवानों के साथ जागरूक और खुले दिमाग वाले बुजुर्गों का खड़ा रहना भी जरूरी.

(७) हमारे पर्वों का वास्तविक महत्त्व कब पूरा होगा? आज पर्वों के नाम पर केवल पैसे की बर्बादी और शोरगुल ही रह गया है ...क्यों?
हमारे पर्वों का वास्तविक उद्देश्य तब ही पूरा होगा जब वे हमें भीतर से और अधिक पवित्र, सहिष्णु तथा 'उचित' बना पाएं. ..किसी भी धार्मिक कृत्य या पर्व आदि की सार्थकता तब ही है जब वह हमारा आन्तरिक भाव बदलने या बेहतर करने में सक्षम हो, ..अन्यथा पुनर्विचार की आवश्यकता.  ...साल दर साल बढ़ते शोरगुल और पैसे की बर्बादी को देखते हुए तो इनके प्रासंगिक होने पर ही एक बड़ा सा प्रश्नचिह्न लग गया है! मुझे तो पर्व मनाने में विकृतियों का एक ही कारण समझ में आ रहा है कि धर्मगुरुओं द्वारा उचित एवं प्रासंगिक धर्मशिक्षा के अभाव में लोगों के विश्वास का खोखला हो जाना! अब पर्वों को वे मात्र "परिवर्तन और मनोरंजन" (चेंज और एंटरटेनमेंट) के रूप में मनाते हैं, और इन पर्वों में जो पूजा-अनुष्ठान आदि होते हैं, यंत्रवत करते हुए उनमें भी भगवान् से धन-यश आदि की गुजारिश वे कर लेते हैं कि शायद भगवान् खुश होकर उन्हें कुछ यूँ ही दे दें!

(८) आज समाज बदल रहा है या बुराइयों की गर्त में जा रहा है...? आधुनिक समाज तेजी से बदल रहा है जिसमें अनेकों बुराइओं का समावेश चिंता का विषय बन गया है ...आप भी अपने विचारों द्वारा इस बदलते सामाजिक परिवेश पर चर्चा करें.
अजी हमारे स्पीकिंग ट्री पर ही नजर दौड़ा लें! आध्यात्मिक कहा जाने वाला यह मंच कितने ही मसालेदार व्यंजनों से भरपूर है. प्रसिद्ध ब्लॉग देखिये, प्रसिद्ध स्लाइड शो, या टॉप ट्रेंडिंग चर्चा, किसका ट्रेंड चल रहा है और कौन प्रसिद्ध है, इसको देखने से साफ पता चलता है कि हमारी मानसिकता क्या हो गयी है! आगे किसी अन्य चर्चा या स्पष्टीकरण की आवश्यकता है क्या???!

(९) हम नित्यप्रति ज्ञान के बड़े बड़े सन्देश सुनते या पढ़ते हैं किन्तु व्यवहार में बदलाव क्यों नहीं ला पाते...?
यदि हम ज्ञान को व्यवहार में नहीं लायेंगे तो किसी भी सकारात्मक बदलाव की अपेक्षा रखना व्यर्थ होगा. विश्व में जहाँ कहीं भी ज्ञान को सकारात्मकता के साथ आचरण में समाहित किया गया वहां-वहां समाज (संघ) का ठोस विकास हुआ है. ....वैसे हमें प्राप्त ज्ञान की गुणवत्ता हमारी जिज्ञासाओं में भी प्रतिबिंबित होती है! हमारे देश के बीसियों धार्मिक चैनलों पर ज्ञान के बड़े-बड़े सन्देश हमारी बुद्धि को कहाँ ले जा रहे हैं इसके उदाहरण के लिए नीचे क्रमांक (१०) से (१२) पर पूछी गयी जिज्ञासाओं को देखें.

(१०) क्या किसी से पैन गिफ्ट में लेना चाहिए या नहीं, मैने मेरी छोटी बहन से कहकर पैन आस्ट्रेलिया से मंगवाया है, यदि यह गलत है तो ऐसा क्या करें जिससे हम दोनों में किसी को भी बुरा प्रभाव न हो!?
हद हो गयी भाई अंधविश्वास की!!! पेन रख सकने वाले और आस्ट्रेलिया तक जा पहुंचे आप जैसे पढ़ेलिखे लोग भी ऐसी बात करेंगे, यकीन नहीं हो रहा!! सही में हम ****** हैं!

(११) रात में श्वान का भौंकना अच्छा होता है या फिर बुरा?
श्वान की तो जबान, बोली, भाषा ...सबकुछ भौंकना ही है!! हाँ कभी-कभी वो अजीब सी आवाज में रोते भी हैं, उसका जरूर टेढ़ा अर्थ निकलते हैं कुछ लोग! ..ऐसे तो बिल्लियाँ भी म्याऊं म्याऊं करने के अलावा कभी-कभी रोती भी हैं!! सभी पशुओं के साथ ऐसा होता ही है. पर हमारे आसपास चूंकि कुत्ता-बिल्ली जैसे जानवर ही प्रायः पाए जाते हैं इसलिए हम सिर्फ उन्हीं की हरकतें देख पाते हैं. "कुत्ता रात में उन अजनबियों को देखकर भौंकता है जो आमतौर पर उससे परिचित नहीं होते." सावधान! उन्हें वो काट भी लेता है! ..अब कुत्ते का यह भौंकना आपके लिए बुरा है या अच्छा, यह तो इसपर निर्भर करता है कि कुत्ते के लिए अजनबी वह शख्स आपका कोई नाते-रिश्तेदार है या कोई चोर-उचक्का!

(१२) गाय का घर के दरवाजे पर आकर रम्भाना क्या संकेत लेकर आता है?
स्पष्ट संकेत है कि गाय भूखी है, कुछ भोजन चाहती है; ..वैसे हम लोग आड़ा-तिरछा सोचकर बहुत सारे अन्य अर्थ भी निकाल सकते हैं!