Thursday, November 16, 2017

(८९) चर्चाएं ...भाग - 8

(१) सपने का मतलब? सपने में यदि मैं खुद को पके धान का खेत काटते हुए देखूं तो इसका क्या मतलब है?
सपने को यदि मात्र सपना ही माना जाए तो इसका कोई गंभीर मतलब कतई नहीं है! यदि सपने का अर्थ किसी संकेत से लगाया जाए तो फिर बीसियों अंधे अनुमान लगाये जा सकते हैं! विभिन्न घटनाओं-प्रसंगों, देखे-सुने किस्से-कहानियों, फिल्मों, टीवी सीरियल, रोजमर्रा की बातचीत वगैरह के अपभ्रंश स्वरूप (एबनॉर्मल या करप्ट फॉर्म) हमारे अवचेतन मन में इकठ्ठा होते रहते हैं. सोते समय अवचेतन मन में इन्हीं अपभ्रंशों के जागने से सपने जन्म लेते हैं. इसीलिए अधिकांश सपनों का कोई सिर-पैर नहीं होता अर्थात् वे अर्थहीन होते हैं! अतः ज्यादा पचड़े में मत पड़िए; ज्यादा मत सोचिए!

(२) प्रेम विवाह के लिए घर वाले नहीं मान रहे तो क्या करना चाहिए?
जरूरी नहीं कि आप सही हों, ..और यह भी जरूरी नहीं कि आपके घरवाले भी सही ही हों. वे मना कर रहे हैं, तो सबसे पहले आप उनकी बात मानते हुए सब्र रखिये और भावुक होकर विद्रोह करने की सोच को बिलकुल छोड़ दीजिये; क्योंकि यह बात पक्की है कि घरवाले ही हमारा सबसे अधिक भला चाहने वाले होते हैं. फिर भी यदि आपके मन में कोई संदेह या वैचारिक मतभेद शेष रह जाएं तो परिवार के किसी अन्य समझदार व परिपक्व रिश्तेदार को मध्यस्थ बनाएं जिसपर आप सहित सभी को पूरा विश्वास हो. फिर वह जो भी निर्णय दे उसे सबके हित में खुले दिल से स्वीकार करें.

(३) मन में उठते संशय कैसे दूर किये जा सकते हैं...?
अच्छी विचारधारा के लोगों, मित्रों के समक्ष उन संशयों को रखकर परस्पर स्वस्थ चर्चा करने से काफी हद तक हल पाया जा सकता है. शेष व्यक्ति की बुद्धि, विवेक आदि उस हल पर निर्णायक मुहर लगाते हैं. संशय गंभीर होने पर किसी योग्य काउंसलर की मदद भी ली जा सकती है.

(४) नोटबंदी को लेकर लोगों के विचार अत्यधिक बंटे हुए क्यों हैं...?
वह इसलिए कि भाजपा ने अपने ढंग से इसके फायदे बताए और विपक्षी दलों ने अपने ढंग से इसके नुकसान! तो आम जनता के विचार का इस मुद्दे पर बंटना स्वाभाविक है. हमारे यहाँ का मतदाता एगोइस्टिक अंध-अनुयायी टाइप का होता है. वह एक दल पर काफी समय तक श्रद्धा रखता है, भले ही वह दल कुछ भी करे! ..सर्वविदित है कि केंद्र में भाजपा की सरकार चुनी गयी थी; मतदाताओं के एक बड़े समूह ने ही तो उसे चुना होगा ना! ..तो वह बड़ा समूह अपने निर्णय को सही ठहराने के लिए अपनी श्रद्धा आजतक बनाये हुए है! अपने चुनाव को सही ठहराने के क्रम में वह केंद्र की हर सही-गलत नीति का समर्थन आंख मींचकर कर रहा है. नोटबंदी उनमें से एक है.
नोटबंदी हो चाहे जीएसटी या फिर डिजिटलीकरण, बिना किसी होमवर्क के बिना किसी 'पुख्ता' तैयारी के लागू करने से त्राहि-त्राहि ही मची है. मैं सरकार की इन नीतियों का समर्थक तो कतई नहीं! गुब्बारे में हवा भरकर विकास के फुलाव को दर्शाना ही लगता है मुझे यह सब! सत्ता के कार्यकाल की शुरुआत में मैं मोदी जी का प्रबल प्रशंसक था, मेरा वोट भी उन्हीं को डला था. लेकिन बाद में..., ..उनकी विभिन्न घोषणाओं के मध्य जो बात मुझे सबसे ज्यादा अखरी वह थी- अपनी सभाओं के दौरान अहंकारपूर्ण ढंग से ताली पीट कर अपनी बात को कहना. खुद को परम समझना और अन्यों को गाजर-मूली; उनकी यह अदा, उनकी सोच और कार्यशैली को दर्शाती है! ...नोटबंदी से लोगों को फायदा महसूस हुआ हो या नुकसान, लेकिन मैं तो मानता हूँ कि आत्मसम्मान को खोकर पाया कोई भी फायदा बेकार का होता है. ...और नोटबंदी के बाद आम जनता अनेकों बार आत्मसम्मान पर गहरी चोटें सह चुकी है. यदि अंगेजों द्वारा दी गयी गुलाम मानसिकता अभी भी भारतीय डीएनए में है और उसको कुछ भी महसूस नहीं होता तो बात अलग है!

(५) व्यवहार में संयम और भाषा की मर्यादा एक सुपात्र को पहचान देते हैं ...क्या आप इस विचार से सहमत हैं? व्यक्ति केवल डिग्री लेकर ही सुपात्र नहीं बनता!
अभी आपकी एक पूर्व-चर्चा "नोटबंदी को लेकर....." पर मोदी जी के आचरण (व्यवहार) पर कुछ लिख रहा था, उसके तुरंत बाद आप द्वारा छेड़ी गयी यह चर्चा देखी तो बरबस सोचने को बाध्य हो गया कि व्यवहार में असंयमता और अमर्यादित भाषा, एक 'प्रधानमंत्री पद' की गरिमा को भी नीचे गिरा सकती है! ....यानी सुपात्रता बल्कि गरिमा कागजी डिग्री से नहीं हासिल होती; वह प्रधानमंत्री पद मिल जाने तक से भी हासिल नहीं होती! गरिमा या ग्रेस आती है तो केवल भेदभावरहित सुन्दर व संयमित व्यवहार से और मर्यादित वाणी से! निःसंदेह, ऐसी गरिमा प्राप्त व्यक्ति ही असली सुपात्र होता है. उसके स्पंदन शीतल व सुखदाई होते हैं (राजनीतिज्ञों में उदाहरण- श्री अटल विहारी बाजपेयी). उसमें तेज होता है, उसकी निर्णयक्षमता उत्कृष्ट होती है, और वह किसी पंथ विशेष का नहीं अपितु वैश्विक धर्म यानी राईटएचनेस का योगक्षेम वहन करने में समर्थ होता है. वह भले लोगों में ही लोकप्रिय होता है, दुष्टजनों में नहीं! लेकिन वह ईश्वर का चहेता होता है.

(६) मानव जीवन का प्रयोजन क्या है?
समझने के लिए यहाँ हम शाब्दिक कल्पना का सहारा लेंगे. हमारी आत्मा, परमात्मा का एक छोटा सा अंश है. जैसे सागर की एक बूँद. पृथ्वी या भूलोक पर सृष्टि की रचना हेतु विभिन्न जीवों को जन्म देकर परमात्मा ने अपने चैतन्यमय अंशों (आत्माओं) को उनके भौतिक शरीरों में स्थापित किया. इन सभी में 'केवल' मनुष्य को उन्होंने अपने समान मौलिक गुणधर्मों से नवाजा और 'हमेशा' का भौतिक जीवन दिया, जबकि शेष जीव सीमित आयुष्य वाले थे. अन्य प्रत्येक जीव, वनस्पति एवं कच्चे पदार्थों का निर्माण मनुष्य के जीवन की सरलता व सम्पूर्णता हेतु हुआ था. आपने ही साकार रूप मानव को पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि प्रदान कर कार्य करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया था. अर्थात् कार्यों अथवा चुनाव में कोई भी हस्तक्षेप नहीं. एक बात और, कि परमेश्वर या प्रकृति ने ब्रह्माण्ड में हर चीज, हर क्रिया पूरी तरह से नियमबद्ध कर रखी थी/है. प्रारंभिक काल में मानव यथासंभव प्राकृतिक नियमों के अनुकूल कार्य करता था. पर कालांतर में उसके मन पर आगंतुक संस्कारों का बनना आरंभ हो गया; और प्राकृतिक गुणों के विपरीत निर्मित इन संस्कारों से अनेक अयोग्य कार्य होने आरंभ हो गए. वह आत्मा के मूल गुणधर्म के विपरीत आचरण करने लग गया. प्रकृति-विरुद्ध जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप परमेश्वरी नियमों ने मानव जीवनकाल को सीमित कर दिया, अर्थात् एक आयु पश्चात् मानवों की मृत्यु होने लगी. ...पर चूंकि परमेश्वर बहुत दयालु व न्यायप्रिय है, अतः कुछ योग्य (या अयोग्य भी) आत्माओं को पुनर्जन्म के रूप में यह मानवयोनी दोबारा या कई बार पुनः प्राप्त होती है, जिससे वे पुनः अपने कर्मों एवं प्रारब्ध की सहायता से उन्नति कर सकें. 'प्रारब्ध' का निर्माण संस्कारजनित कार्यों पर निर्भर करता है, यह प्रकृति के नियमों के अंतर्गत ही होता है, इनमें से एक नियम है-- क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया! पहले के मानव ईश्वरीय गुणों के अनुरूप कार्य करने वाले थे तो दीर्घायु थी, पर कालांतर में गलतियाँ बढ़ने के साथ-साथ मनुष्य की आयु भी कम होती जा रही है. मन पर अंकित अप्राकृतिक एवं आगंतुक संस्कारों द्वारा नियंत्रित व घटित कार्य ही इसका व अन्य दुखों का कारण हैं. ......तो, एक तरह से प्रत्येक जन्म या जीवन जो हम मनुष्य रूप में प्राप्त करते हैं, वह एक और मौका होता है हमारे लिए कि प्रकृति एवं ईश्वर सम्मत उत्कृष्ट भौतिक कार्यों के द्वारा हम अपनी आध्यात्मिक उन्नति भी कर पाएं.

(७) एक दार्शनिक कहते हैं कि जीवन में किसी को मात देना तो बहुत आसान है किन्तु जीतना काफी मुश्किल ...क्या आप इस विचार से सहमत हैं?
इस बात से सहमत हूँ मैं. यहाँ जीत की बात मन की जीत की है, दिल की जीत की है. शारीरिक बल से, अस्त्र-शस्त्र से, शास्त्र से, छल से, बुद्धि से, तर्क से, शब्दजाल आदि से किसी को भी हराना संभव है किन्तु किसी के मन अथवा दिल को जीतकर उसे अपना बनाना बहुत कठिन! एक दार्शनिक सा उदाहरण -- आज के अधिकांश शासक भारी भ्रष्टाचार एवं अपराध की रोकथाम के लिए यहाँ तक कि छोटे-मोटे अपराधों के लिए भी नित नए नियम-कानून बनाते रहते हैं, उनकी सहायता से थोडाबहुत भ्रष्टाचार परास्त भी होता है; लेकिन स्वयं और अपने दल की नेकनीयती यानी उत्कृष्ट आचरण एवं ओजपूर्ण वाणी से प्रजा-जनों के मन को जीतने और योग्य दिशा में परिवर्तित करने की कोशिश ना के बराबर ही रहती है! अर्थात् डंडे के जोर से काबू करना या जीतना सरल है संभव है परन्तु प्यार से दिल जीत कर किसी को अपना बनाकर योग्य मार्ग पर लाना बहुत कठिन! बच्चों की परवरिश भी तभी अच्छी मानी जाती है जब हम उन्हें अपने उदाहरण से सिखाकर योग्य नागरिक बना सकें, वर्ना डंडे या अनुशासन के जोर पर हम बच्चे को एक सीमा तक नियंत्रित तो कर सकते हैं पर उसका मन नहीं जीत सकते! और जब कभी भी अनुशासन का फंदा कमजोर पड़ता है, बच्चा विद्रोह करता ही है, ..क्योंकि हम उसे जीत तो कभी सके ही नहीं थे, हमारा सारा जोर उसे हराने पर ही था! विभिन्न सामाजिक, जातीय, पंथिक झगड़े उपद्रव आदि भी इसीलिए होते हैं कि सबका सारा जोर एकदूसरे को परास्त करने पर होता है. नियंत्रण पाने की इस तरह की कोशिशों से किसी के ऊपर वर्चस्व तो स्थापित किया जा सकता है पर उसे जीता नहीं जा सकता!

(८) जो अपने अहम् को त्याग देता है और पूर्णतय प्रभु को समर्पित हो जाता है, उसे इसी जन्म में मुक्ति मिल जाती है...?? क्या ऐसा कर पाना संभव है...?
"मुक्ति" शब्द मुझे तो बहुत पांडित्यपूर्ण व वजनी सा लगता है. पहले तो यह कि "मुक्ति" आखिर है क्या?! हमारे शास्त्रज्ञों ने इसको इतना भारी और जरूरी सा काम बताकर इसको पाने के लिए विविध स्थूल-सूक्ष्म अनुष्ठानों के कितने ही विचित्र से तरीके बताए हैं! आम जन को तो यह बहुत दूर की कौड़ी (असंभव सा) लगता है! क्यों हम भी अध्यात्म या आध्यात्मिक साधना की गूढ़ता को बढाएं?! ..और "प्रभु को समर्पित हो जाना", यह भी आमजन को बहुत दुष्कर सा कार्य प्रतीत होगा! ...हां, 'अहंकार को तिलांजलि देना', यह नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना हुआ. आम जन को नैतिक मूल्यों से कोई परहेज नहीं और न ही वह नैतिक मूल्यों की शब्दावली से अनभिज्ञ है. उसके लिये यह सरल विषय है. ...तो सरल शब्दों में...., "आध्यात्मिक भाषा में जिसे 'आत्मज्ञान' कहते हैं वह हमारे भीतर की वो आवाज है जिसकी अनुभूति आमजन को भी सहजता से हो सकती है. वह अन्दर की आवाज विभिन्न प्रसंगों में यदाकदा सबको महसूस होती है. इसकी सबसे बड़ी पहचान है कि यह आवाज हमें सदैव अच्छे और मृदु होने के लिए उकसाती है. यह हमारी नैतिकता को उभारती है. इसके चलते हम अच्छा व योग्य निर्णय लेने के लिए प्रेरित या कभी-कभी बाध्य तक हो जाते हैं. ..खरी आध्यात्मिक साधना मेरे हिसाब से तो बस यही है कि हम उस 'यदाकदा' को 'हमेशा' में बदलने का प्रयास करते रहें. 'हमेशा' भीतर की आवाज को सुन पाना, उसको सम्मान देते हुए उसको मानना, यही हमें हमारे व्यक्तित्व को ऊपर उठाता है, हमारे मन पर बने आगंतुक कुसंस्कारों का प्रभाव कम कर उनका दमन करता है. इन संस्कारों से मुक्ति ही वह "मुक्ति" है जिसकी चर्चा यहाँ शुरू की गयी. ..और यह इसी जन्म में संभव है! जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति किसको चाहिए भला?! सबको सुखद जीवन चाहिए चाहे वह इस शरीर में हो, चाहे निराकार आत्मा स्वरूप में, चाहे ईश्वर के साथ एकरूपता में! सोचने, समझने और करने में यदि हम भीतर की आवाज के अनुरूप नेक पथ पर हैं तो हम सदैव मुक्त हैं, सदैव आनंद में हैं." ...और अब आध्यात्मिक शब्दों में...., "भौतिक शरीर के 'भीतर' विद्यमान 'जीव' के 'केंद्र' में शुद्ध आत्मा ही है जो परमात्मा का ही एक 'समान गुणधर्म' वाला अंश है; इसके इर्दगिर्द जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार, मन, बुद्धि, अहं एवं विभिन्न विशेषता, रूचि-अरूचि केंद्र हैं. ...आत्मा और यह सब संस्कार एवं अन्य बताए केंद्र मिलकर एक सूक्ष्म शरीर या सूक्ष्म जीव बनता है. यानी आत्मा सर्वथा मुक्त ना होकर विभिन्न जागतिक संस्कारों, अहं आदि से बद्ध है, ..वह मुक्त नहीं! इस कारण आत्मा भारवान (भारी) रहती है. इस कारण वह भूलोक या निम्न लोकों में रहने को बाध्य होती है, और उसका ऊपर की श्रेष्ठ कक्षाओं में जाना दुष्कर होता है. भूलोक या नीचे के लोक स्थूल होते हैं अतः यहाँ आत्मा को भी स्थूल परिवेश में ही रहना होता है. आध्यात्मिक भाषा में 'अहं' का अर्थ है कि स्वयं को ईश्वर, परमात्मा या आत्मा से भिन्न मानना, मैं पन होना! यह एक बड़ा कारक है कि आत्मा की ध्वनि हमें सुनाई नहीं पड़ती या हम उसे अनसुना कर देते हैं. इसका त्याग होने पर जीव, आत्मा के अधिक निकट हो जाता है. जब आत्मा के इर्दगिर्द अहं सहित सभी आगंतुक केंद्र हट जाते हैं तो इस स्थिति को ही 'मुक्ति' कहा जाता है. अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम जन्मधारी, शरीरधारी हैं या नहीं! हम आत्मा अर्थात् ईश्वर से एकरूप हो जाते हैं." ....मैंने तो पंडितों की अपेक्षा बहुत सरल कर दिया फिर भी कितना कठिन है न समझने में यह व्याख्या!! इसलिए मेरे विचार से सर्वसामान्य को इतने गूढ़ शब्दों में उलझने की जरूरत नहीं! वह पहले बताए सरल तरीके से भी 'मुक्त' होने का मार्ग ढूंढ सकता है. वैसे भी 'अध्यात्म' शब्दों का जंजाल नहीं अपितु मात्र अनुभूति का विषय है!

(९) हम भगवान की पूजा क्यों करते हैं? अगर हम ईश्वर को ना भजें तो क्या वह कमजोर हो जाएंगे? हम भगवान की भक्ति अपने लिए करते हैं कि भगवान् के लिए?
(१) भगवान् की पूजा अपना ढाढ़स बंधाने के लिए, ईश्वर के प्रति भाव बढ़ाने के लिए, मन की स्वच्छता के लिए, आत्मबल बढ़ाने आदि के लिए करना श्रेयस्कर होता है. पर शायद हममें से बहुतों का पूजा-अर्चना करने का आशय कुछ अन्य भी होता है! (२) ईश्वर को 'धार्मिक क्रिया या अनुष्ठान' के रूप में नहीं भजने से हमारे ऊपर ईश्वर की ओर से कोई विपत्ति या दंड जैसा दुष्प्रभाव नहीं होता है; ईश्वर को भजने से ईश्वर को भी कोई लाभ नहीं होता है; ईश्वर को भजने से क्रम संख्या (१) के अनुसार जो भी फायदा होता है वह करने वाले व्यक्ति को ही होता है! (३) अतः भगवान् की भक्ति मूलतः हम अपने लिए ही करते हैं.

(१०) क्या नेगेटिव जरूरी है पॉजिटिव के लिए, शैतान जरूरी है खुदा के लिए? काले आसमान में ही सितारें खिलते है, रूठना जरूरी है मनाने के लिए है!
केवल कुछ करने के लिए ही कुछ करना हो तो ये तुलनाएं करना या परस्पर विलोम कार्यों की सार्थकता सिद्ध करना समझ में आता है! अन्यथा व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए तो सच यही है कि किसी अच्छाई को या अच्छाई का महत्व, दिखाने के लिए उसके बाजू में किसी बुराई का आवश्यक रूप से उपस्थित होना बिलकुल भी जरूरी नहीं! किसी सकारात्मकता को प्रदर्शित करने के लिए नकारात्मक प्रसंग का इंतजार करना क्या उचित होगा? क्या केवल रूठने पर ही प्यार जताना चाहिए? क्या भगवान् का अस्तित्व केवल इसलिए है क्योंकि वहां शैतान भी है? क्या सूरज इसीलिए या तभी चमकता है, जब अन्धकार पनपता है? ...मेरे विचार से तो अँधेरे या नकारात्मकता का कोई अस्तित्व ही नहीं या कोई स्रोत ही नहीं! वह तो केवल प्रकाश या सकारात्मकता की अनुपस्थिति में ही अपने पांव पसार सकता है! हाँ...., यह अवश्य कह सकते हैं कि किसी भी सकारात्मकता या प्रकाश की हमें तब बहुत याद आती है जब वह नहीं होता और उस कारण नकारात्मकता अपने पांव पसार चुकी होती है!

Wednesday, November 8, 2017

(८८) चर्चाएं ...भाग - 7

(१) आत्म ज्ञान बिन नर यूँ भटके कोई मथुरा कोई काशी रे ...आत्मज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है? सही आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए क्या मार्ग सही है..?
प्रथमतः जिज्ञासु होना, मन में जिज्ञासाएं उठना आवश्यक. ..भौतिक अथवा आध्यात्मिक, किसी भी प्रकार का ज्ञान हासिल करने के लिए मन में जिज्ञासा होना बहुत जरूरी. ..तीव्र जिज्ञासा से आगे के द्वार खुदबखुद खुलते चले जाते हैं. हमारे कौतूहलपूर्वक क्रियाशील होने पर स्थूल या सूक्ष्म, किसी न किसी माध्यम से मार्गदर्शन मिलना आरंभ हो जाता है- अखबारी लेखों से, पुस्तकों से, पौराणिक साहित्य से, वर्तमान ईश-आराधना पथ से, किसी गुरु अथवा मार्गदर्शक से, अपनी अंतर्ध्वनि से, और इनके अलावा किसी अन्य माध्यम से भी! माध्यमों की कोई थाह नहीं! शुरुआत में हमारा रुझान व खोजी प्रवृत्ति ही सबसे महत्वपूर्ण हैं! द्वितीय पायदान पर आता है- बुद्धि एवं विवेक का प्रयोग करते हुए, व्याप्त अंधविश्वासों से बचते हुए, प्रायोगिक भाग को करना ..अर्थात् पढ़े या बताए या स्वयं से सूझे उन कृत्यों को करना, जिनकी सहमति बुद्धि व विवेक दे रहे हों; उदाहरण के लिए- कोई नामजप वगैरह करना, किसी सत्संग में जाना, कोई साहित्य पढना, जीवनशैली को बदलने का प्रयास करना, आदि-आदि! ...जब कुछ सार्थक परिणाम आने आरंभ हों, जिनका अनुमोदन आपकी बुद्धि और विवेक भी कर रहे हों, तब सम्बंधित कृत्य या खोज की गहराई में उतरना. ..यहाँ हमारे कुछ पूर्व संस्कार अड़ंगा लगायेंगे, हमारी वृत्ति और आसपास के परिजन विरोध कर सकते हैं या उपहास उड़ा सकते हैं. लेकिन यदि हम उनके, अपनी वर्तमान संस्कृति, पंथ, धार्मिक-कृत्य आदि के प्रति अपने व्यवहार को किंचितमात्र भी ना बदलते हुए समानांतर रूप से अपनी खोज-यात्रा जारी रखते हैं तो उनका विरोध मद्धम पड़कर समाप्तप्राय हो जायेगा. ऐसा करने से हममें 'व्यापकता' का गुण भी बढ़ता है. फिर धीरे-धीरे अनेकों अनुभूतियों के माध्यम से आत्मज्ञान व परमात्मज्ञान मिलता जाता है. हम और व्यापक होते चले जाते हैं. तब धार्मिक कृत्य के नाम पर कुछ विशेष करना, कुछ पारंपरिक करना या बिलकुल कुछ भी ना करना, ये सब हमारे लिए गौण विषय हो जाते हैं. 'व्यापकता' के प्रबल गुण के कारण हम समाज-सम्मत कुछ भी कर सकते हैं और कभी भी कुछ भी त्याग सकते हैं, लेकिन भीतर से हम अति उदार और न्यायसंगत होते जाते हैं. हमारे बदलते प्रभामंडल और अनुकूल व सकारात्मक स्पंदनों के चलते आसपास का समाज ऊपर से हमारा आलोचक होते हुए भी भीतर से हमें सराहने लगता है; व्यष्टि (स्वयं की) साधना उपरांत समष्टि (समाज की) साधना का यह प्रथम चरण सिद्ध होता है! .....पुनः, सम्पूर्ण प्रक्रिया में एक बात का ध्यान अवश्य रखें कि अपने मूल तक पहुंचना हमारा एकमात्र लक्ष्य हो, ..बीच में पड़ रहे विविध मार्गों में से किसी एक में भी हम ऐसा ना उलझ जायें कि वह मार्ग ही हमें लक्ष्य प्रतीत होने लगे!! हमें किसी मार्ग-विशेष में फंसना या अटकना नहीं है. हम निरंतर आगे को बढ़ते रहें. और अगले-अगले बिंदु पर जिस-जिस मार्ग से चलकर पहुंचे, उन मार्गों को धन्यवाद दें उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें, लेकिन उन्हें त्यागकर और आगे को प्रस्थान अवश्य करें. ...पुस्तकें, कोई विशिष्ट सत्संग, गुरु, नामजप क्रिया, आध्यात्मिक मार्गदर्शक आदि ये सब एक प्रकार से हमारी खोज-यात्रा के दौरान पड़ने वाले विविध मार्ग या साधन ही हैं. उन्हें अवश्य अपनाएं, उनकी मदद लें, उनके प्रति सदैव आभारी रहें, किन्तु उनके प्रति आसक्त कदापि न हों.

(२) मैं कौन हूँ पता चल गया तो क्या होगा?
तब जीवन तो हम वही व्यतीत करेंगे; ..हमारा सांसारिक नाम, स्टेटस, ओहदा, काम वगैरह भी वही रहेंगे जो अभी हैं, लेकिन सोचने और जीवन जीने का अंदाज यानी 'दृष्टिकोण' बदल जायेगा! हम पहले की अपेक्षा अधिक अच्छे, तनावरहित, अनासक्त, संतुष्ट और आनंदित रह सकेंगे. व्यवहार और जीवन जीने की कला में निखार आएगा. हमारा प्रभामंडल और हमसे प्रक्षेपित होने वाले स्पंदन सकारात्मक और अन्यों को अच्छा लगने वाले होंगे.

(३) संसार के लगभग सभी देश आज अशांति और आतंकवाद का शिकार हो रहे हैं ...क्या इसे हम कभी दूर कर पाएंगे?
कुछ लोगों के जवाब यह इंगित कर रहे हैं कि इनके पीछे ईश्वर-इच्छा है! मेरे विचार से सबसे पहली बात यह कि ये सब ईश्वर की इच्छा या मर्जी से बिलकुल भी नहीं हो रहा है! ईश्वर (या प्रकृति) के जीवनशैली सम्बन्धी नैसर्गिक इच्छाओं (नियमों) से अर्थात् करने या न करने योग्य बुनियादी 'मानवीय' आचरण से सभी परिचित हैं; इस सम्बन्ध में विभिन्न वैज्ञानिक दृष्टिकोणों से भी पर्याप्त ज्ञान हमें मिलता ही है! ..तो फिर हम यह कैसे मान सकते हैं कि इन घटनाओं के पीछे प्रकृति या ईश्वर की स्वीकृति है!! ..हाँ, ईश्वर या प्राकृतिक व्यवस्था यह सब देख अवश्य रही है और अति होने पर उधर से प्रतिक्रिया स्वरूप किसी न किसी माध्यम से प्रतिकार अवश्य आएगा (आता भी रहता है). सत्य और असत्य के बीच सदा से संघर्ष होता ही रहा है, समय समय पर अनेकों विनाशलीलाएं भी होती रही हैं! 'गलत' के विरुद्ध प्रत्येक मानवीय अथवा महामानवीय विध्वंस या प्राकृतिक आपदा के पश्चात् मानवजाति चिंतन, संकल्प आदि भी करती रही है कि आगे से ऐसा (प्रकृति या ईश्वरेच्छा विरुद्ध आचरण) नहीं होगा, फिर भी अज्ञान, लोभ या ईर्ष्यावश पुनः पुनः ऐसा होता रहा है. अभी वर्तमान में भी हो रहा है! किसी भी शारीरिक बीमारी के मामले में हम क्या करते हैं कि पहले जीवनशैली में बदलाव (किसी चीज से परहेज और कुछ नया अपनाना), फिर हलकी दवा, ..फिर भी ठीक न होने पर भारी दवा, ..और फिर भी न ठीक होने पर शल्यक्रिया (सर्जरी), ...और जब बात किसी अंग विशेष में इन्फेक्शन होने से पूरे शरीर में जहर फैलने की आती है, सवाल जीवन-मृत्यु का हो जाता है, तब उचित सर्जरी से उस अंग को ही शरीर से निकलवा देते हैं!! बढ़ते आतंक और आतंकवादियों से भी विचारशील सरकारें इसी प्रकार जूझती हैं, चरणबद्ध ऐसा ही करना श्रेयस्कर रहेगा! शेष...ईश्वर सत्य का साथ देगा ही! केवल ऐसा सोचना कि सबकुछ ईश्वरेच्छा से ही घटित हो रहा है, हम कुछ भी नहीं कर सकते, यह बुजदिली और अकर्मण्यता का सूचक है! ऐसा नकारात्मक सोचने वाले खुद से प्रश्न करें कि वे अपनी व्यक्तिगत आपदा या बीमारी के समय भी क्या ऐसा ही सोचते हैं और कुछ भी नहीं करते???

(४) पिछली शती में मकान चाहे कच्चे थे किन्तु रिश्ते सारे सच्चे थे ...आज विकास के नाम पर हमने क्या क्या खो दिया है...?? आधुनिकता की क्या कीमत चुका रहा है मानव?
देखा जाये तो विगत कई सौ वर्षों में भी मानवदेह संरचना में कोई बदलाव नहीं आया है, पेड़-पौधे और वनस्पतियों की मूल संरचना में भी हम ऐसा ही पाते हैं. हमारा कोई अंग न तो गायब हुआ है और न ही कोई नया निकला है! यानी प्राकृतिक नियमों-मूल्यों में नैसर्गिक रूप से कोई अंतर नहीं आया है. यदि थोड़ा-बहुत आया भी है तो वह मानवीय हस्तक्षेप के कारण ही! यानी निष्कर्ष यह कि मूलतः हम एक ऐसे अपरिवर्तनीय प्राकृतिक जीव हैं जो सामाजिक भी है; और इन दोनों कारणों से इस जीव की कुछ मूलभूत भौतिक-सामाजिक आवश्यकताएं भी हैं. यदि आज हमें रिश्तों-नातों में गर्माहट की कमी से कुछ शून्य सा उभरता अनुभूत हो रहा है तो निःसंदेह यह अनुभूति असत्य नहीं! अनुभूतियाँ अक्सर हमें सही और गलत में अंतर बताती हैं. पुनः मुख्य विषय पर आते हैं..., मकान, वस्त्र और भोजन इंसान की मूलभूत भौतिक आवश्यकताएं हैं और परस्पर प्रगाढ़ भावनात्मक मानवीय रिश्ते हमारी मूलभूत सामाजिक आवश्यकता है; ..शेष सब पदार्थ और विषय आदि इनके पश्चात् आते हैं! शेष जो भी चीज हमें अपना भौतिक या सामाजिक स्तर ऊपर उठाने में सहूलियत दे, और हमारी मदद करे, हमारा जीवन आसान बनाये, उसका सहर्ष स्वागत है...ऐसी आधुनिकता भला किसे काटेगी! ...विभिन्न वैज्ञानिक खोजें यही काम करती हैं और उन्हें अपनाकर हम आधुनिकता की ओर कदम बढ़ाते हैं. आधुनिकता माने उन्नति. ....लेकिन कहते हैं न कि, "कमी और अति" हर चीज की बुरी! जब हम मन को साध नहीं पाते और अत्यधिक लोभ व होड़ में पड़ जाते हैं तब यह अतिरेक हमारे नैसर्गिक जीवन के लिए घातक हो जाता है, हम मशीन में बदलने लगते हैं, और मशीन भावना-रहित होती है! आज हमारे भूभाग में यही हो रहा है.

(५) पर्यावरण को सुधारने के सभी उपाय अभी तक विफल क्यों हो रहे हैं...?
हम बात 'अपने यहाँ' की ही करें तो मूल में ये कारण मिलते हैं-- (१) पर्यावरण के ज्ञान (गणित) की पर्याप्त समझ ना होना. ...(२) केवल अपने हित तक सीमित रहने की प्रवृत्ति (कूड़ा कहीं भी डालने-फेंकने की प्रवृत्ति; बस अपने से कुछ दूर हो जाये, मात्र इतना ही ध्यान रखना). ...(३) मानवता, जागरूकता और सहयोग की भारी कमी. ...(४) सरकार भी पर्याप्त जागरूकता फैलाने में असफल सिद्ध हो रही है क्योंकि वहां भी वैचारिक कूड़े का भारी जमाव! कोई भी पाठ पढ़ने वाला यदि खुद ही उस पाठ के क्रियान्वयन में कमजोर हो तो फलप्राप्ति की सम्भावना गिर जाती है. ...(५) लोगों के विवेक पर लोभ, स्वार्थ, जागतिक इच्छाओं आदि का ऐसा पर्दा पड़ा होना कि इस कारण से उनका ऐसा विचार बनना कि मेरे सोचने-करने से क्या होगा, ..सब ईश्वर-इच्छा से ही तो होता है!

(६) आग लगी आकाश में, झर झर पड़त अंगार , संत न होते जगत में तो जल मरता संसार! संत समाज की देन को भुलाया नहीं जा सकता किन्तु आज के संत समाज को किस दिशा में ले जा रहे हैं....?
किसी भी संघ की सर्वांगीण उन्नति में संतों की बड़ी भूमिका रहती है. हमारे देश में भी समय-समय पर राजा-प्रजा आदि को शिक्षित एवं जागरूक करने में उनकी बड़ी कृपा रही. ..लेकिन अब बहुत समय से वैसे खरे संत-गुरु देखने में नहीं आए. ..मेरे विचार से देश की आजादी की सुगंध मिलने के काल से ही हमारे यहाँ सत्तालोलुपता और इस निमित्त द्वंद्वफंद इतने अधिक बढ़ते गए कि नैतिकता का ग्राफ गिरता चला गया. आध्यात्मिक जगत भी इससे अछूता न रहा! परिणामस्वरूप प्रजा भी भ्रष्ट होने लगी. ..और बढ़ते-बढ़ते बात यहाँ तक आ पहुंची कि भ्रष्ट हो चुके राजा, प्रजा और गुरुजन तीनों स्वार्थपूर्ति हेतु एक-दूसरे के ऊपर आश्रित हो गए और आपस में मजबूत गठजोड़ कर लिया. तब से नेता हों या गुरुजन, जनता भी चोरों-उचक्कों को चुनने लगी! फिर कुकरमुत्तों की तरह कितने ही भ्रष्ट और व्यापारी गुरु व संत उदित हुए! प्रजा और राजा, इन दोनों का योगदान है उनके फलने-फूलने में! काले कारनामे बिलकुल ही उधड़ने व उजागर हो जाने उपरांत ही उनके खिलाफ कोई कार्यवाही की जाती है! ऐसे में आज के ऐश्वर्यपूर्ण ढोंगी संतों से समाज को सही दिशा में ले जाने की भला क्या उम्मीद की जा सकती है! हकीकत तो यही है कि आज का हमारा समाज खुद भी नहीं सुधरना चाहता इसलिए वह भ्रष्ट संतों की सत्ता बनाता है या स्वीकारता है, उनके चरण धो-धो कर पीता है, क्योंकि उसे रिद्धि-सिद्धि, ऐश्वर्य, पुत्र, नौकरी, ऊंचा पैकेज, सुन्दर स्त्री, बड़ी गाड़ी, बंगला आदि ही प्रथम चाहिए! उसे लगता है कि संतकृपा ही उसे ये सब दिलाती है या दिला सकती है!

(७) शरीर के प्रति आसक्ति को कैसे दूर किया जाए?
समुचित ज्ञानार्जन से ही हम शरीर और उसके महत्त्व को समझ पायेंगे, आत्मिक ऊर्जा से भी परिचित हो पायेंगे. ..तत्पश्चात् हम अपने शरीर को भगवान् या प्रकृति के अनमोल तोहफे की तरह मानेंगे, उसकी इज्जत व हिफाजत करेंगे, उसका ध्यान रखेंगे, उसे रोगों और असमय मृत्यु से परे रखने की कोशिश भी करेंगे; ..लेकिन फिर भी, उसके प्रति आसक्त नहीं होंगे! ठीक वैसे ही जैसे कोई शल्य-चिकित्सक किसी मरीज का ऑपरेशन करते समय अपना दृष्टिकोण रखता है.

(८) जब तक मनुष्य बच्चों जैसा सरल नहीं हो जाता तब तक उसे ज्ञानलाभ नहीं होता! क्या यह सही है?
जी हाँ, बिलकुल सही कहा आपने! मन की सरलता ही आध्यात्मिकता हेतु पोषक वातावरण है. मन की सरलता से तात्पर्य है हठीले संस्कारों का कम से कम होना. बचपन में दुनियावी संस्कार इतने बलिष्ठ नहीं होते इसीलिए आध्यात्मिक ज्ञानप्राप्ति हेतु बच्चों सरीखा सरल-स्वभाव होने पर जोर दिया जाता है. पथरीली भूमि में किसी नए बीज का रोपण बहुत कठिन होता है और उसका अंकुरण तो और भी अधिक कठिन!

(९) दिल्ली के जानलेवा प्रदूषण के लिए कौन ज़िम्मेदार है...?
सिर्फ दिवाली के पटाखे और फसल के अवशेष जलाये जाना इस जानलेवा प्रदूषण का एकमात्र कारण नहीं है! अपितु बढ़ते दोपहिया व चारपहिया वाहनों और कारखानों द्वारा नियमित रूप से हो रहा विषैला उत्सर्जन इसकी सबसे बड़ी वजह है. नियमित रूप से विभिन्न प्रकार का ढेरों कूड़ा जलाया जाना भी इसकी एक अन्य वजह है. आधुनिकता के नाम पर बहुत सारी चीजों का अंधाधुंध निर्माण होना व उन्हें बेतहाशा अपनाया जाना मानवजाति के लिए ही असमय काल का या भीषण बीमारियों का कारण बन रहा है. मैं इन सब के लिए सरकारी नीतियों और विकास से सम्बंधित बेढब योजनाओं को दोषी मानता हूँ. विकास की योजनायें कुछ इस प्रकार की हैं कि विकास या आधुनिकीकरण दिल्ली सहित केवल कुछ बड़े शहरों तक ही सीमित है! दिल्ली से उत्तरप्रदेश होते हुए बिहार व झारखण्ड तक केवल दिल्ली, एन सी आर के कुछ शहर और लखनऊ जैसे कुछएक बड़े शहरों में ही बिजली-पानी सहजता से उपलब्ध है. अतः इस बड़े भूभाग (दिल्ली-उत्तरप्रदेश-बिहार) के लिए रोजगार आदि की संभावनाएं भी दिल्ली क्षेत्र में ही सर्वाधिक हैं. तो अविकसित स्थानों से रोजी-रोटी की तलाश में लोग भारी मात्रा में दिल्ली सरीखे विकसित स्थानों पर आकर बसते हैं. जनसंख्या का दबाव भी निरंतर बढ़ रहा है और प्रदूषण का भी! पुनः..., इसके लिए मूलतः प्रवासी लोग जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि विकास का बेढब ढांचा जिम्मेदार है. लोग मजबूर हैं कि जीवनयापन हेतु वे केवल कुछेक स्थानों पर ही इकठ्ठा हों! ..इसके अलावा हमारे देश में कमजोर नीतियों के चलते इस प्रथा का प्रचलन लगभग ना के बराबर है कि एम्प्लायर द्वारा काम की जगह के इर्दगिर्द ही कर्मचारियों के लिए स्कूल, अस्पताल और शॉपिंग-काम्प्लेक्स सहित 'टाउनशिप' का निर्माण कराया जाता हो! यदि ऐसा हो जाये तो वर्क-प्लेस पर आने-जाने के लिए जो बड़ा समय खर्च होता है वह बच जायेगा; मकान ढूंढने की समस्या समाप्त हो जाएगी; बच्चों का सरलता से स्कूल आना-जाना संभव होगा; परिवार को सुरक्षा एवं उत्कृष्ट सामाजिक वातावरण मिलेगा; वाहनों का प्रयोग ना के बराबर हो जायेगा, इस कारण प्रदूषण भी बहुत कम हो जायेगा, धन की भी बचत होगी; समय अधिक मिलने से परिवार ज्यादा समय एकसाथ रह पाएगा; एक-दूसरे के घर आना-जाना और खुशियाँ बाँटना अब संभव होगा; तनाव क्षीण होगा, आदि-आदि. ..मैं तो कहता हूँ कि सरकारी और गैर सरकारी बड़े कार्यालयों (मुख्यालयों) और विभिन्न बड़ी इंडस्ट्रीज के लिए इस नियम (टाउनशिप और वर्कप्लेस एक ही कैंपस में) को 'अनिवार्य' घोषित किया जाये. यह नीति प्रासंगिक और सर्वथा संभव है, यदि राष्ट्रहित में पर्याप्त इच्छशक्ति हो तो! इसके अलावा, केवल महानगरों तक ही सीमित ना रहते हुए हर जगह पर विकास को महत्त्व दिया जाये. पर्यटन के दौरान मैंने दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में इसको (विस्तृत विकास को) महसूस किया है, इसीलिए वहां व्यर्थ की हौचपौच और प्रदूषण आदि यहाँ की अपेक्षा बहुत कम है.

(१०) क्या मन को वशीभूत कर पूर्णतया पवित्र या दुर्गुण मुक्त किया जा सकता है...?
आदतन भले ही हम बहुत सफाई का बहुत ध्यान रखते हों, लेकिन सामाजिक प्राणी होने के नाते, तथा पढाई-लिखाई या रोजगार के निमित्त हमें नित्यप्रति बाहर की दुनिया के संपर्क में आना भी आवश्यक होता है, या घर में ही अनेकों तरह के काम करते हैं. इस प्रक्रिया में हम रोज ही शारीरिक रूप से कुछ मैले हो जाते हैं. इस मैल को दूर करने के लिए हम नित्यप्रति नहाते-धोते हैं! ...अब मुख्य विषय पर आते हैं.., विभिन्न साधनों-साधनाओं द्वारा मन को वश में करके या उसको साफ करके हम उसे काफी हद तक या मानों पूर्णतया ही पवित्र या दुर्गुण-मुक्त कर लेते हैं; ..पर क्या फिर हम पुनः पुनः बाहर की दुनिया के संपर्क में आकर मानसिक रूप से मैले नहीं होते रहते!! ..जी हाँ, किसी भी साधना को एक बार करके हम हमेशा के लिए पवित्र मन के नहीं हो सकते! हमारे मन को भी रोजाना सफाई की जरूरत पड़ती है, क्योंकि हम सामाजिक प्राणी हैं. आज हमारे आसपास सबकुछ आदर्श या पवित्र नहीं है. हम प्रतिदिन अपनी आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से जो कुछ भी ग्रहण करते हैं वह हमारे मन को कुछ तो प्रदूषित करता ही है. तो सफाई का काम भी नियमित रूप से करना ही पड़ता है, अन्यथा हम दोबारा उसी जगह पर पहुँच सकते हैं जो कभी बहुत मैली थी! इसके लिए नियमित रूप से 'सत्संग' यानी अच्छे लोगों के संपर्क में रहना तथा उनसे वार्तालाप करना अत्यावश्यक होता है. रोजाना घर के सदस्यों का आपस में ही सकारात्मक एवं नैतिक मूल्यों सम्बन्धी कुछ सार्थक संवाद भी एक प्रकार का सत्संग ही सिद्ध होता है; तल्लीनता के साथ अच्छा साहित्य नियमित पढ़ना भी एक प्रकार का सत्संग ही है. कहने का अर्थ यह कि कुछ अच्छे विचारों से रोजाना साक्षात्कार करके जब हम मन को नियमित रूप से नहलाते हैं तभी हम अपनी अच्छाई को बरकरार रख पाते हैं, अन्यथा मानसिक पतन में समय नहीं लगता!

Saturday, October 28, 2017

(८७) चर्चाएं ...भाग - 6

(१) क्यों लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए उतावले रहते हैं या प्रयत्नशील रहते हैं? माना कि किसी का जीवन नर्क जैसा रहा हो तो वे पुनर्जन्म से कतराते होंगे और इस जीवन-मृत्यु चक्र से निजात पाना चाहेंगे या मोक्ष चाहेंगे मगर जिसका जीवन सुखमय रहा और खूब आनन्दपूर्वक कटा, उसे भी क्यों मोक्ष चाहिए? उसके सगे-सम्बन्धी भी यही प्रयत्न करते हैं कि उसे मोक्ष प्राप्त हो, ऐसा क्यों?
बहुत ही अच्छा और प्रासंगिक विषय उठाया आपने भैया! बड़े खेद की बात है कि हमारे यहाँ पंडित-पुरोहितों द्वारा 'मोक्ष' का अर्थ 'जन्म-मृत्यु के फेरों से मुक्ति' मात्र ऐसा बताया जाता है. अज्ञानवश या निजस्वार्थ पूर्ति हेतु उनके द्वारा लोगों को अधकचरा और अतिसीमित व संकीर्ण सोच वाला ज्ञान दिया जाता है. इसके लिए भोले और अज्ञानी यजमानों को अनुष्ठानों के रूप में अनेकों स्थूल उपाय बताए भी जाते हैं. लोग इन छद्म आध्यात्मिक चक्करों में ऐसा उलझ जाते हैं कि काल्पनिकता में खो कर उन्मत्त से हो जाते हैं. शायद इसी कारण से धर्म व अध्यात्म आदि को अफीम का नशा कहा जाता है. इस मंच पर भी ऐसा माहौल खूब दिखता है! ...'मोक्ष' शब्द अपनेआप में कुछ गलत नहीं, वरन उसकी अजीबोगरीब व्याख्याएं उलझाने और भटकाने वाली हैं. ...वस्तुतः 'मोक्ष' एक अवस्था है, और मोक्ष की अवस्था आध्यात्मिक साधना का अब तक का ज्ञात 'चरम बिंदु' है. मोक्ष की अवस्था प्राप्त मनुष्य की प्रसन्नता, आनंद या हैप्पीनेस किसी विषय-विशेष पर आश्रित नहीं रह जाती, वह दुःख और सुख यानी प्रत्येक स्थिति में समान रहने में सक्षम रहता है, उसकी सोच व निर्णय सदैव भले और न्यायोचित होते हैं, दुनियावी राग-द्वेष से वह परे रहता है. किसी गुफा, पर्वत या जंगल में रहकर नहीं बल्कि आम समाज में रहते हुए वह यह सब साधने में सफल होता है. सतत यह साध लेना ही 'साधना' की पराकाष्ठा है, मोक्ष की स्थिति है. ऐसे मोक्ष के लिए भला कौन आपत्ति करेगा! ...लेकिन फिर भी आपत्ति होती है क्योंकि अहं को, राग-द्वेष को, लालच को, स्वार्थ को, कमाने-खाने के गलत रास्तों आदि को तिलांजलि देनी पड़ती है! 'मोक्ष' का मार्ग आपको जीने से वंचित बिलकुल भी नहीं करता बल्कि वह गलत माने अधर्म के मार्ग को छोड़ने को उकसाता है. ..."आध्यात्मिक भाषा में 'मोक्ष' अर्थात् मन पर से दुनियावी संस्कारों के प्रभुत्व को समाप्त करना." ..अधिकांशतः सोचने व निर्णय लेने के लिए हम मन में उपस्थित दुनियावी संस्कारों की मदद लेते हैं. ये दुनियावी संस्कार हमारे जन्म उपरांत आंख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अपने आसपास घटित हो रहे प्रसंगों-घटनाओं आदि से निर्मित होते हैं. पैदा होने के बाद हमारे आसपास की दुनिया की आवाजें, भाषा, प्रसंग, घटनाएं, संस्कृति आदि हमारे मन पर निरंतर कुछ संस्कार अंकित करती हैं. उन्हीं संस्कारों के अनुसार हमारा एक व्यक्तित्व, पसंद-नापसंद, व्यवहार आदि बनता है. हमारे आसपास अच्छा या बुरा जैसा भी चलन चल रहा होता है, हमारे संस्कार भी कमोवेश वैसे ही निर्मित होते जाते हैं. फिर हम जब कुछ बड़े हो जाते हैं तो कई बार हमारे सामने जब कुछ प्रसंग घटता है तो अधिकांशतः हम अपने पूर्वनिर्मित संस्कारों के चश्मे से ही उसे देखते हैं और उन्हीं के अनुसार उस प्रसंग से निपटते हैं. मानों संस्कारवश बनी किसी गलत सोच के कारण हम किसी घटना में कुछ नकारात्मक ढंग से सोचते हैं, तो कभी-कभी समानांतर रूप से हमें भीतर से एक और ध्वनि सुनाई पड़ती है जो हमें उस गलत संस्कार के विरुद्ध जाकर कुछ अन्य (यानी कुछ अच्छा) करने को उकसा रही होती है. ...हम सिर झटक कर उस ध्वनि को सुना-अनसुना कर देते हैं क्योंकि संस्कार का प्रभुत्व उस आवाज से अधिक बलशाली है. ...लेकिन कभी-कभी उस अंतर्ध्वनि के अनुसार (संस्कार विरुद्ध जाकर) भी कुछ निर्णय लेते हैं. वह निर्णय हमारे इर्दगिर्द के समाज के मापदंडों के अनुसार तो नहीं होता लेकिन फिर भी वह करके हमें असीम शांति व सुख का अनुभव होता है, अक्सर वह शब्दातीत होता है, हम उसे व्यक्त नहीं कर पाते! दरअसल वह भीतर की शुद्ध आवाज उस आत्मा रूपी प्राकृतिक या ईश्वरीय सॉफ्टवेयर की है, जिसकी खोज व प्रकटीकरण हम 'अध्यात्म' के अंतर्गत करते हैं. वास्तविक धर्म माने राईटयचनैस उसी आत्मा रूपी सॉफ्टवेयर में नैसर्गिक रूप से पूर्वस्थापित होता है. ...यानी अब हमने जाना कि हमारी सोच और निर्णय-क्षमता, दोनों के दो स्रोत हैं-- पहला मन में उपस्थित दुनियावी संस्कारों का समूह, और दूसरा नैसर्गिक (किताबी नहीं) आत्मिक ज्ञान. ...'मोक्ष' अर्थात् दुनियावी संस्कारों पर आत्मिक निर्देशों को प्राथमिकता देना, फिर धीरे-धीरे उन संस्कारों की दासता से सम्पूर्ण मुक्ति पाना. शेष फिर......., वैसे बात पूरी हो चुकी है!

(२) भगवान है या नहीं?
कुछ लोग इसका उत्तर 'हाँ' में देते हैं, कुछ 'ना' में, ...और कुछ संशय में रहते हैं कि भगवान् 'है' या 'नहीं'! ...यद्यपि 'हाँ' कहने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है, और 'ना' कहने वालों की बहुत अल्प; तदपि 'हाँ' कहने वालों में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, 'हाँ' पर जिनकी निष्ठा एवं विश्वास डोलते रहते हैं! आराधनालयों में वे आस्तिक होते हैं परन्तु दुनियावी स्वार्थों की पूर्ति के समय अंदरूनी तौर पर वे घनघोर नास्तिक दिखते हैं. ...और केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने वालों के लिए एकदम ठोस प्रमाणिकता से यह कहना कि "भगवान् हैं" या "भगवान् नहीं हैं", बहुत मुश्किल है. दोनों ही बातों का भौतिक या स्थूल प्रमाण देने का प्रयास व्यर्थ के वाद-विवाद को जन्म देता है. ..वैसे इस बारे में मेरा निजी मत आप मेरे पहले के ब्लॉग (चर्चाएं ...भाग - 1) के २०वें बिंदु में विस्तार से पढ़ सकते हैं.

(३) ईसा पूर्व लगभग 3500 सिंधु सभ्यता के प्रमाण मिले राम कृष्ण के नहीं, तो पूर्ण श्रद्धा कैसे होगी? हमारे धार्मिक इतिहास को प्रामाणित कर मन की शंका खत्म कर शान्ति को हमेशा के लिए स्थिर करना चाहता हूं।
किसी पौराणिक दंतकथा के इतिहास को खोदकर हम बहुत कुछ हासिल नहीं कर सकते! आज के परिपेक्ष्य में उससे जो लाभ हम उठा सकते हैं, वह उठा लें, बस यही महत्वपूर्ण है. उदाहरण के लिए-- एक प्रसिद्ध फल 'आम' की मौजूदा मिठास उसका इतिहास जानने से क्या कम या ज्यादा हो जाएगी?? यदि एक 'आम' हमारे समक्ष रखा है, तथा उसकी सुगंध और मिठास हमें आकर्षित व आमंत्रित कर रही है कि हम उसका रसास्वादन कर उसका लाभ उठाएं, किन्तु हम हैं कि उसको खाने से पहले उसके इतिहास या उसके बनने की प्रक्रिया पर लंबी खोजबीन व चर्चा करने में लग जाते हैं. कुछ समय बाद हम पाते हैं कि वह सुगन्धित व स्वादिष्ट फल मुरझाकर गलने लगा और हमारे लिए बेकार हो गया! ...इसी प्रकार भगवान्, परमेश्वर या उनसे सम्बंधित कथाएं यदि हमें कुछ शिक्षा देने, प्रेरित करने और भले मार्ग पर अग्रसर करने में सहायक प्रतीत होती हैं तो उन्हें अपना लें, उनका लाभ उठा लें, अन्यथा बहुत चर्चा करने से भी हमारे लिए वे निस्तेज होती जाती हैं. साथ में इतना अवश्य करें कि उनका अनुभव करके, उनसे सीखकर, और आगे को बढ़ें; एक जगह पर ही अटके न रहें. अध्यात्म (आत्मा-परमात्मा संबंधी ज्ञान) हमें निरंतर चलाएमान रहने को कहता है. इस मंच पर रहते हुए भी यदि हमारी आध्यात्मिक प्रगति न हो तो समझो कि हम कुछ बेड़ियों में जकड़े हुए हैं! पुनः, ...आम की मिठास के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त होने के लिए उसका इतिहास जानना कोई जरूरी तो नहीं, बस उसे चखने की जरूरत है, विश्वास अपनेआप हो जायेगा! ...यह भी अपनेआप में कितना आश्चर्यजनक है कि पेड़-पौधे अपनी जड़ों द्वारा साधारण मिट्टी से ही पता नहीं क्या और कैसे कुछ चूसकर पता नहीं कितने अलग-अलग प्रकार के फल-फूल, सब्जियां, अन्न आदि पैदा करते हैं! क्या हम किसी भी प्रोसेस की पूरी जांच करके कृत्रिम तरीकों से एक भी असली अन्न का दाना अथवा कोई एक फल या फूल लेबोरेटरी में बना पाए हैं- बिना बीज, पानी और मिट्टी के?! अपने प्रयासों से कृत्रिम विधि से एक असली चींटी तक बना पाना हमारे बस का नहीं! ...इतना ही मनन-चिंतन कर लेंगे तो एक अनदेखे निराकार ईश्वर पर विश्वास हो जायेगा. ..राम, कृष्ण आदि उसी के साकार महामानव रूप थे जिनके चरित्र आज के परिपेक्ष्य में भी हमें प्रेरित करने में समर्थ हैं, आज भी वे प्रासंगिक हैं.

(४) क्या कलयुग अब अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका है...? विश्व में बढ़ते आतंकवाद और अन्य गतिविधियां क्या सृष्टि के अंत की ओर संकेत करती हैं...?
बढ़ता आतंकवाद तो नहीं, हाँ हमारे इर्दगिर्द तेजी से बदलती जीवनशैली, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, हर चीज में व्यापारिक सोच, नैतिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ना आदि इस बात के संकेत देते हैं कि दीया बुझने से पहले बहुत तेजी से जल रहा है!

(५) आज मनुष्य संतुष्ट क्यों नहीं है सब बेचैन हैं!?
अनेक कारण हैं-- (१) बचपन में ही परिवार और समाज से ऐसे संस्कार मिलना जिनमें भौतिक आकांक्षाओं व अपेक्षाओं को बहुत महत्त्व दिया जाता है. ..(२) संस्कारों में अब अक्सर जीवन मूल्यों और नैतिक मूल्यों को सहेजने की कला लगभग नदारद. ..(३) बड़े होते जाने पर क्रमशः कड़ी प्रतिस्पर्धा वाला माहौल मिलना और उस माहौल में सामर्थ्य से अधिक श्रम की आवश्यकता पड़ना, व उस कारण तनाव का उपजना. ..(४) ..इस प्रक्रिया के चलते प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक प्रतिभा का नैसर्गिक तरीके से विकास न हो पाना, उसकी भी कहीं न कहीं टीस उपजना और वह टीस भी बढ़ती बैचैनी का एक सबब बनना. ..(५) कुछ बड़े होने होने पर यह समझ में आना कि जीवन को आगे चलाने के लिए कुछ न कुछ ऐसी शिक्षा या विशेषज्ञता जरूरी जो काफी धन कमाने में सहायक हो सके, धन के महत्त्व को अपरम्पार जानना. ..(६) इन सब कारणों से मेधा को जबरन इस प्रकार से ढालना कि वह नोट कमाने वाली मशीन बन सके. ..(७) किसी भी काम का महत्त्व जन-कल्याण, मन की खुशी, या फिर विकास में सहयोग न होकर प्रथमतः धनार्जन हेतु ही होना. ..(८) रही सही कसर मौजूदा सरकार और उसके उपक्रमों द्वारा हाहाकारी विकास और डिजिटलीकरण द्वारा निकलना. सही बताएं तो विभिन्न विकसित देशों में डिजिटलीकरण विविध कार्यों में सरलता लाता है, समय, धन और श्रम की बचत करता है; लेकिन हमारे यहाँ यह भी बेचैनी और तनाव का एक मुख्य स्रोत है. कुछ तो बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर कमजोर है और उससे भी अधिक मानसिकता व उद्देश्य खोखले हैं! इसलिए न तो मूल्यवान समय बचता है, और न ही आसानी होती है; बल्कि सिरदर्द और तनाव ही बहुधा बढ़ते हैं इससे! उदाहरण संख्या (क)-- मेरी हिन्दीभाषी बेटी का आधार-कार्ड बना कोई छह साल पहले 'कर्नाटक' राज्य में, क्योंकि उस समय वह वहां उच्चशिक्षा हेतु कुछ समय के लिए थी. आधारकार्ड में अंग्रेजी के अलावा लोकल भाषा कन्नड़ डाली गयी. अब से तीन वर्ष पहले उसके विवाहोपरांत नया पता (दिल्ली का) और उपनाम, ये दोनों बदलने के लिए 'ऑनलाइन' प्रक्रिया की. सारी डिटेल्स दोबारा कैपिटल लेटर्स में टाइप करनी थी. अंग्रेजी में टाइप करते समय इनबिल्ट ट्रांसलिटरेट सॉफ्टवेयर से समानांतर रूप से ऑटोमेटिकली कन्नड़ भाषा में भी टाइप होता चला गया. आधार कार्ड चुटकियों में अपडेट हो गया. ...लेकिन बाद में नए और पुराने का मिलान किया तो पाया कि कन्नड़ में नाम वगैरह की स्पेलिंग्स अब बहुत बड़ी हो गयी थीं, आकृति भी बदल गयी थी. कन्नड़ भाषा में हम तो ठहरे जीरो. लेकिन खोजी दिमाग ने खोज की, ..फिर से साईट खोली फिर से टाइप किया, लेकिन इस बार स्माल लेटर्स में ..और ट्रांसलिटरेट पर गौर किया तो स्पेलिंग का साइज़ व आकृति अब पुराने से एकदम मिलते हुए निकले! दोबारा फिर से अपडेट करने का प्रोविजन न था, पर सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी पकड़ ली थी हमने! ..हमने आधार कार्यालय से काफी डिजिटल पत्र-व्यवहार किया कि या तो लोकल भाषा हिंदी कर दी जाये या फिर कन्नड़ की स्पेलिंग्स ठीक कर दी जायें, पर हमारी एक न सुनी गयी और न ही कोई जवाब आया! बाद में भी हम पुनः पुनः वेबसाइट की त्रुटि को चेक करते रहे, तब से कोई एक वर्ष बाद सॉफ्टवेयर सम्बन्धी वह त्रुटि दूर हो गयी लेकिन हमारी बेटी का आधार कार्ड ठीक न हो पाया. ..खैर...., अंग्रेजी जिंदाबाद! इस विदेशी भाषा में आधार-डिटेल्स बिलकुल दुरुस्त हैं!!! उदाहरण संख्या (ख)-- एक सप्ताह पहले दिल्ली से लखनऊ, और फिर वापस दिल्ली की राउंड ट्रिप का जनवरी माह का इकॉनमी क्लास हवाई टिकट डिजिटली लेने बैठा. यात्रा डॉट कॉम, मेक माय ट्रिप, तथा इंडिगो, जेट एयरवेज, गो एयर, विस्तारा आदि की ऑफिशियल वेबसाइट पर देखा. हैरत की बात यह कि एयर लाइन्स की वेबसाइट्स पर किराया दलालों की वेबसाइट से डेढ़ से दो गुना ज्यादा था! सभी साइट्स पर दोबारा-दोबारा लॉग इन करने पर रेट्स भी कम-ज्यादा हो रहे थे!! काफी माथापच्ची व तुलना के बाद अंततः एक दलाल साईट से ही रिजर्वेशन कराया! पूरे दो घंटे लग गए! ..कल्पना कीजिये कि किसी दिन यदि लोगों को रेलवे टिकट के मामले में भी यही माथापच्ची करनी पड़े तो करोड़ों लोग बेवजह व्यस्त और तनावग्रस्त हो जायेंगे! जय हो डिजिटलीकरण की..., जिसने लोगों को कमाने, खाने, व्यस्त और बेचैन रहने के इतने अवसर प्रदान किये.

(६) सरकार द्वारा आधार कार्ड का सभी प्रमुख सेवाओं को जोड़ना कितना तर्कसंगत है...? इसका विरोध क्या सही है...?
कहा गया है- "कमी और अति हर चीज की बुरी!" ...पहचान के रूप में 'आधार नंबर' एक बहुत काम की चीज है. इसकी सहायता से किसी भी व्यक्ति का डिजिटल आइडेंटिफिकेशन पूरे भरोसे के साथ किया जा सकता है. समय, आयु और सेहत के साथ हस्ताक्षर, चेहरा आदि बदल जाने पर भी उसकी पहचान अब संभव है. इसलिए बैंकिंग और मोबाइल सिम आदि महत्वपूर्ण जगहों में इसको अकाउंट के साथ जोड़ना ग्राहक के हित में ही है. लेकिन रोजमर्रा के जीवन में की जाने वाली खरीदारियों और छोटे-मोटे लेनदेनों में भी इसकी अनिवार्यता की बात, या सभी भुगतान डिजिटली करने इसलिए आवश्यक कि सरकार की नजरों में हर चीज रहे, यह तो अति है!!! यह व्यक्ति के निजता के अधिकार पर हमला व अतिक्रमण है! नए और संतुलित क़दमों का स्वागत होना चाहिए पर जीवन जीने के पारंपरिक तरीकों को जड़ से मिटा देना भी बुद्धिमानी नहीं. मेरा तो कहना है कि हर नयी चीज ऑप्शनल होनी चाहिए; ..जब तक जो प्रासंगिक, आरामदायक व सुरक्षित रहेगा वो तब तक टिका रहेगा, और उसके बाद वह स्वतः ही ढह जायेगा. पश्चात् लोग खुशी-खुशी दूसरा समर्थ विकल्प अपनायेंगे. ..बदलाव के लिए बलात् कुछ 'थोपना' डिक्टेटरशिप का द्योतक है. बेहतर हो कि सरकार आधार के असली फायदे बताकर आमजन को प्रेरित करे उसे अपनाने के लिए, लेकिन यह भी सुनिश्चित करे कि जो किन्हीं कारणों इसे नहीं अपना रहे या नहीं अपना पा रहे, वो भी किसी लाभ से वंचित न रहें. यानी हर चीज में जबरन इसकी 'बाध्यता' कोई ठीक बात नहीं.

(७) ज्ञान होना एक बात है किन्तु ज्ञानी होना अति उत्तम...?? ज्ञान प्राप्ति तो बहुत सहज है किन्तु ज्ञान का सही प्रयोग बहुत दुर्लभ है.
केवल किताबी या रटे हुए ज्ञान को मैं ज्ञान मानता ही नहीं हूँ. असली ज्ञानी तो वह जो ज्ञान को व्यवहार में उतार कर उस ज्ञान के मर्म को समझे. जब तक हम ज्ञान को अमल में ला कर उसके लाभ (या हानि) की अनुभूति नहीं लेते तब तक हमारा ज्ञान बिलकुल सतही है! अर्थात् ज्ञान प्राप्ति या ज्ञानी होना कोई सहज बात नहीं! इसलिए प्रथमतः उस ज्ञानप्राप्ति पर ही मेरा प्रश्नचिह्न है जो विविध परीक्षणों, व्यवहार या अमल की भट्टी में न तपा हो! वह तपता है तो प्रयोग तो हुआ ही न! ..अर्थात् यथार्थ ज्ञानी अपने ज्ञान का प्रयोग करते हुए ही 'खरा ज्ञानी' बनता है; शेष सब रट्टू तोते होते हैं, वो बहुत आवाजें करते हैं!

(८) क्या कारण है- हम हमेशा द्वंद्व में रहते हैं?
"चित भी मेरी और पट भी मेरी", इसी उधेड़बुन में अक्सर हम वैचारिक द्वंद्व में रहते हैं. फायदा, ..फायदा, ....और फायदा, बस यही गूंजता रहता है दिलोदिमाग में ..तो मानसिक द्वन्द कैसे न हो?! हममें से अधिकतर धन और यश दोनों के अभिलाषी हैं, ..और कुछ जो धन के नहीं भी हैं तो यश के तो अवश्य ही हैं! ...दूसरी एक अन्य वजह भी है मानसिक द्वंद्व की कुछेक लोगों में, कि उनको अन्दर की आत्मिक आवाज का कुछ ज्ञान हो जाता है और फिर लड़ाई होने लगती है संस्कारों की उस अंतरात्मा की आवाज के साथ!

(९) अतीत डराता है, भविष्य चिंतित करता है, क्यों? ऐसे में वर्तमान को सुन्दर कैसे बनाया जाए?
हमारे संस्कारों का प्रभाव कुछ ऐसा है कि बहुधा हमें नकारात्मक ही पहले सूझता है. चाहे अतीत हो या फिर भविष्य, यादाश्त और कल्पना में नकारात्मक प्रसंग ही पहले उभरते हैं. तो इनके चलते वर्तमान पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है. हमारा वर्तमान भी बहुत भारी वजन का लगने लगता है हमें! एक ही उपाय है वर्तमान और सबकुछ सुन्दर बनाने का, कि हम किसी प्रकार से अंतरात्मा की आवाज को संस्कारों का मॉनिटर (मुखिया) बना दें, संस्कारों का महत्त्व गौण कर दें. ..फिर अंतरात्मा की आवाज पर सबकुछ केवल अच्छा और नेक तरीके से करने की झड़ी लगा दें (बिना फल की बाट जोहते हुए), ..कुछ समय बाद हमें सबकुछ अच्छा लगने लगेगा, सबकुछ 'हमारे लिए' फिर अच्छा ही होगा.

(१०) किसे जानने से सबकुछ जाना जा सकता है?
जिस दिन हम स्वयं को आध्यात्मिक रूप से भलीभांति जान लेंगे, जीवन की वजह और उद्देश्य समझ में आ जायेगा, उस दिन हम लगभग सबकुछ जानने के मुहाने पर होंगे. तब उस परम शक्ति को भी अनुभूत कर लेंगे जो इस सृष्टि के पार्श्व में है! तब योगादि कसरत के बिना भी जीवन जीने की कला स्वतः आती जाएगी, जीवन सरल और सहज हो जायेगा.

Monday, October 16, 2017

(८६) चर्चाएं ...भाग - 5

(१) क्या आत्मा मरती है? नहीं.. तो कहां जाती है? सभी कहते हैं आत्मा मरती नहीं, क्या यह दुबारा जन्म लेती है? अगर हाँ तो हमें याद क्यों नहीं होता कि हम पहले क्या थे?
आत्मा एक प्रकार की ऊर्जा है. एक ऐसा ऊर्जा रूपी सॉफ्टवेयर जो किसी देह रूपी हार्डवेयर को चलाने या ऑपरेट करने में सक्षम है. विज्ञान के अनुसार भी किसी भी ऊर्जा का अपना कोई रूप-रंग-आकार आदि नहीं होता; ऊर्जा अक्षुण्ण होती है अर्थात् कभी नष्ट नहीं होती; ऊर्जा की कोई यादाश्त भी नहीं होती. ...विभिन्न अन्य ऊर्जाएं जैसे न दिखते हुए भी वातावरण में कहीं न कहीं तो अवश्य होती हैं वैसे ही आत्मा भी होती हैं. गर्भ या बीज के माध्यम से किसी नवीन देह में प्रत्यारोपित होते ही उसके हार्डवेयर से जुड़कर ही वह सक्रिय (एक्टिवेट) होती है और उसे भी सक्रिय करती है. जैसे बहुत सी प्राकृतिक पेचीदगियों की गांठ विज्ञान अभी तक नहीं खोल पाया है, आत्मा भी उनमें से एक है. ...वैसे यह उत्तर अति संक्षिप्त और प्राथमिक स्तर का ही है.

(२) भारतीय संस्कृति में व्रत और पूजा विधानों का क्या महत्त्व है...? क्या आज भी व्रत विधानों का कोई औचित्य है...?
किसी विश्वास के रहते मन की पवित्रता और मानसिक बल प्राप्त करने हेतु व्रत एवं अनुष्ठान आदि करना सर्वथा उचित है. लेकिन अन्य किसी प्रयोजन से इन्हें करना अब प्रासंगिक एवं उचित नहीं! किसी भी पूजा-आराधना का उद्देश्य यदि ईश्वर के गुणधर्म को आत्मसात करना ही हो तो ही उत्तम. यदि कोई भी पूजा-अनुष्ठान हमारे भीतर दैवीय गुणों में वृद्धि कर हमें और बेहतर इंसान बना पा रहा हो तो उसका सहर्ष स्वागत. ...अन्यथा सब मिथ्या है, त्याज्य है.
इस विषय पर चर्चा में अनेक वाद-विवाद पढ़े. देखिये, यदि विश्वास और भाव के बिना कोई व्रत आदि रखा जाये तो उसका कोई भी औचित्य नहीं, वह बेकार की एक्सरसाइज होगी....लेकिन विश्वास सहित भावपूर्ण कृत्य के लाभ अवश्य होते हैं. अपने अनुभवों से मेरा यह मानना है कि करवाचौथ जैसे कठिन व्रत यदि "भावपूर्ण" किये जायें तो 'संभावित' लाभ ये हैं-- ...(१) स्त्री के मन में अपने पति के लिए आदर और केयरिंग का भाव बढ़ता है और फलस्वरूप पति के मन में भी ऐसा ही भाव बढ़ता है. तब आपसी सम्बन्ध और अधिक प्रगाढ़ होते हैं. ...(२) व्रत के दिन पत्नी के मन में यदि श्रद्धाभाव और अनन्य विश्वास है तो उसका मानसिक बल एवं पवित्रता बहुत बढ़ जाते हैं. इसके कारण बहुत सी विपत्तियाँ टल सकती हैं, ..हो सकता है पति अब पत्नी की नेक सलाहों पर अधिक ध्यान दे इसलिए ही! ..क्योंकि यह एक स्थापित सत्य है कि नैसर्गिक रूप से पुरुष मन की अपेक्षा एक स्त्री मन अधिक नैतिक एवं शुद्ध (माने अधिक अच्छा) होता है. ...(३) अधिकांश भारतीय भावपूर्ण आस्तिक दंपत्तियों को व्रत के दिन हुए ये उपरोक्त लाभ व्रत के बाद भी कायम रहते हैं और प्रत्येक वर्ष इनके पुनः पुनः होने पर ये लाभ गहराते जाते हैं. .....निचोड़ यह कि भावना नेक व भाव सच्चा हो तो ही ईश्वरीय मदद मिलती है अन्यथा ईश्वर कोई रिश्वतखोर राजा नहीं! भावपूर्ण उपासना होने पर भी ईश्वर कोई चमत्कार जैसा नहीं करते अपितु वह बुद्धि और विवेक को शुद्ध करके आपसी समझ व प्यार को विकसित करते हैं; जब ऐसा होता है तो हमारी निर्णय क्षमता बेहतर होती है और फलतः संकट टलते हैं. ..जिस व्रत से परस्पर प्यार व सम्मान बढ़े, मानसिक बल बढ़े, बुद्धि और विवेक शुद्ध होते हों, ..और फिर इन सब से संकट टलते हों, ऐसा व्रत आलोचना का पात्र कैसे हो सकता है!? हाँ जिनको विश्वास नहीं उनको दिखावे के लिए व्रत रखने-रखवाने की कोई भी आवश्यकता नहीं, उसका कोई भी लाभ होने वाला नहीं! धर्म के क्षेत्र में कुछ भी जबरन करना या करवाना गलत है, हाँ कुछ वास्तव में गलत होने पर उसका विरोध जायज है- जैसे स्वार्थपूर्ति के लिए अंधश्रद्धा गलत है. उदाहरण के लिए- कुछ लोगों में विश्वास, श्रद्धा, भाव वगैरह ना होते हुए भी मात्र स्वार्थपूर्ति के लिए वे विभिन्न अनुष्ठान करते-करवाते हैं, या मात्र भौतिक स्वार्थ साधने के लिए ही विश्वास, श्रद्धा व भाव को बढ़ाने का प्रयास करते हैं, ...इन्हीं के कारण अंधश्रद्धा बढ़ती है और समाज का खरा भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास रुक जाता है.
धर्म के क्षेत्र में इस समय बहुत कुछ गलत है लेकिन सब कुछ गलत घोषित कर देना अतिरेक होगा. किसी दुर्लभ सी अपवाद वाली घटना से हमें एकदम से गलत अर्थ नहीं निकालने चाहियें. अपवाद कहाँ नहीं होते??? अध्यात्म की जड़ में घुसकर ही हम इसे भलीभांति जान सकते हैं, फिर इसमें व्याप्त अच्छाईयाँ व बुराईयाँ हमें स्पष्ट हो जाती हैं, हम उन्हें फ़िल्टर कर सकते हैं. याद रखिये कि अध्यात्म केवल निरंतर अभ्यास (इम्प्लेमेंट) एवं अनुभूति का शास्त्र है! .....अति प्राचीन व्रत एवं उनके आशय गलत थे नहीं, हमने ही उनका स्वरूप बिगाड़ दिया है! ...और अनेक व्रत विधान आदि बाद के लोभी पंडितों ने नए भी पैदा कर दिए, ...या फिर उन्होंने भी प्राचीन का स्वरूप बिगाड़ कर रख दिया. ...लेकिन मेरा यह मजबूती से मानना है कि किसी व्यक्ति का जब विश्वास खंडित हो जाये तो फिर उसके लिए वह अनुष्ठान व्यर्थ का है, उसे बिलकुल भी ना करना चाहिए, ..जिनका विश्वास झूठा है, उनका विरोध भी करना चाहिए, ...पर जिनका विश्वास अभी भी सच्चा है, उनकी भर्त्सना करना उचित नहीं!

(३) मैं एक सिविल इंजिनियर हूँ और मैं जल विभाग में कार्यरत हूँ।और मैं अपने शहर को साफ सुथरा रखना चाहता हूँ, मैं पेड लगाने और नदियों को साफ सुथरा रखना चाहता हूँ लेकिन कैसे करें समझ नहीं आ रहा है।
आप जहाँ कहीं भी रहते हैं सबसे पहले वहां अपनी सोशल एक्टिविटीज़ को बढाएं. यदि आपके लिए संभव हो तो अपने आसपास के पड़ोसियों से संपर्क साधकर एक सामाजिक संगठन बनाएं, ...या फिर अपने क्षेत्र के किसी बेहतर संगठन या संस्था को ज्वाइन कर लें. ..अब आरंभ में ही अपने सपने या चाहत को उन्हें ना बताकर पहले उनसे सामाजिक घनिष्ठता बढाएं, उनके वर्तमान कार्यों में सहभाग करें और फिर कुछ समय पश्चात् अपना यह प्रस्ताव उनके समक्ष रखें. किसी भी बड़े कार्य को अंजाम देने से पहले उसकी एक फिजा तैयार करनी पड़ती है. ...आप समझ गए होंगे. ...आपका इरादा नेक है और तरीके व्यावहारिक तो अवश्य ही अपने मिशन में सफल होंगे. समाज या सरकार का सहयोग लेकर ही बड़े पैमाने पर कार्य संभव हो पाता है. मेरे विचार से करप्शन-रहित कार्य के लिए सरकार की अपेक्षा समाज का सहयोग लेना ज्यादा अच्छा रहेगा. ...मेरी शुभकामनाएं.

(४) धर्म के नाम पर हिंसा करना सबसे बड़ा पाप है...? समाज में हिंसा फैलाने में आज धर्म का सहारा लिया जाता है ...क्यों ?
जी हाँ, सहमत हूँ आपसे. ...ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हिंसा भड़काने वाले स्वार्थी होते हैं और वे भलीभांति जानते हैं कि अधिसंख्य लोगों का धार्मिक या आध्यात्मिक ज्ञान बहुत उथला है, बहुधा लोग पिछड़ेपन वाले अंधभक्त हैं, इसलिए धर्म के नाम पर उन्हें आसानी से बरगलाया व हिंसक किया जा सकता है. पिछड़े और विकासशील संघों में ही यह होता है, लेकिन एक विकसित राष्ट्र के लोगों को धर्म के नाम पर उत्तेजित करना सरल नहीं, वे किसी जायज मुद्दे पर ही स्वतः उत्तेजित होते हैं!

(५) तनावरहित जीवन जीने की कला क्या है ?
"सादा जीवन उच्च विचार"! ....'सादा' का अर्थ 'रूखा-सूखा' नहीं होता! 'सादा' अर्थात् 'आडंबरहीन'! जीवन में सबकुछ करें..., लेकिन सहजभाव से, बिना दिखावे के! पिछलग्गू न बनें, अपनी आवश्यकताओं का आंकलन स्वयं करें, लालच में उन्हें अधिक विस्तार ना दें, और अपनी वरीयताएं उन्हीं के अनुसार स्वयं तय करें! ..जीवन की भंगुरता का सदैव ध्यान रहे! कुछ भी सदा के लिए नहीं रहना है, इसका ध्यान रखते हुए भविष्य की योजनाओं में सीमित ऊर्जा खर्च करें! तुलना से बचें, होड़ से बचें, जो भी प्राप्त है उसपर गर्व करें, हीन अथवा उच्च भावना से दूर रहें! ....सबसे जरूरी बात कि जो भी काम-धंधा या नौकरी आदि कर रहे हैं उसे दिल लगाकर, सिर उठाकर, पूरे मनोयोग से लुफ्त लेते हुए (यानी एन्जॉयमेंट की फीलिंग के साथ) गर्व से करें..., तनाव कोसों दूर रहेगा! कार्य में संतुष्टि यानी वर्क सैटिस्फेक्शन से ही दिमागी सुकून मिलता है, फिर बदले में मिले पैसे की मात्रा बहुत महत्त्व नहीं रखती! जीवन को भरपूर जियें, हर्ष-उल्लास के छोटे-बड़े मौके ढूंढते रहें, जीवनसाथी और अन्य परिजनों के साथ भरपूर समय बिताएं, पारिवारिक समारोहों में सक्रियता से हिस्सा लें, खुशमिजाजी रखें, ...इन सब में बहुत पैसे की आवश्यकता नहीं होती! सदैव भान रहे कि पैसा बहुत कुछ है, लेकिन सबकुछ नहीं! कुछ भी बड़ा खर्च करने से पहले अपने अंतर्मन से यह प्रश्न अवश्य करें कि.. क्यों? क्या यह सही में मेरी आवश्यकता है? ..या देखा-देखी, भेड़चाल में, ऐसा करने की सोच आ रही है? ..ऐसा करने पर हमारे भीतर की आवाज हमें अनेकों अनचाहे और गैरजरूरी खर्चों से बचाकर हमें तनावमुक्त रख सकती है. ...इन सब के अतिरिक्त यदि अध्यात्म को भी समझने का प्रयत्न करते रहेंगे तो जीवन जीने की कला स्वयमेव आती जाएगी.

(६) भारत 119 देशों में से 100 वें स्थान पर पहुँच गया है भुखमरी में! हमें विकास किस क्षेत्र में करना चाहिए? और क्या हम सही विकास के राह पर हैं? बुलेट ट्रेन,राम के, पटेल के, शिवाजी के प्रतिमाएं बनाना ज्यादा जरूरी हैं?
संघ के सुदृढ़ और खरे विकास के लिए सभी को अच्छा इंसान बनने-बनाने के क्षेत्र में सबसे पहले कार्य करना होगा, ...उसके बाद, हमारे पास आलरेडी जो भी है उसे संभालना, सहेजना सीखना होगा. ...वर्तमान ढांचे, संसाधनों आदि को जब हम मेन्टेन करने में, ग्रिप में लेने में जब सफल हो जायें, तब ही हमें आगे के विकास का कार्य आरंभ करना चाहिए! ...मोदी जी तो देश के सिस्टम को बिना बुनियादी पाठ अमल करवाए आगे के सिलेबस में धकेले जा रहे हैं, ..यह आत्मघाती कदम सिद्ध होगा, हमारा विकास एक खोखला विकास ही सिद्ध होगा (हो रहा है!). दूर अतीत में अंग्रेजों द्वारा बनवाये गए और यूनेस्को द्वारा 'विश्व धरोहर' घोषित "कालका-शिमला रेलपथ" को भारतीय रेल विभाग ठीक से मेन्टेन करने में जहाँ आज भी 'अक्षम' है, दूसरी सवारी गाड़ियों की लेटलतीफी और एक्सीडेंट्स लगातार बढ़ते जा रहे हैं, स्टेशनों और प्लेटफार्मों की हालत खस्ता बनी हुई है, यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाएं और सुरक्षा व्यवस्थाएं बद से बदतर होती जा रही हैं, ...वहां इन सब को दुरुस्त किये बगैर ही बुलेट ट्रेन का शिगूफा छोड़ना निहायत बेवकूफी भरी बात लगता है! ...रेलवे का जिक्र तो मात्र एक उदाहरण के रूप में किया मैंने, ..सभी क्षेत्रों और विभागों में बुनियादी संरचना को मजबूत करना सरकार का पहला लक्ष्य होना चाहिए. ...खोखली बुनियाद पर विकास की इमारत खड़ी करने की कोशिश में एक दिन सब भरभरा कर गिर जायेगा, और नुकसान देश के आम नागरिकों का ही होगा, हम फिर से कई बरस पीछे चले जायेंगे! ...अभी मैं ५४ वर्ष का हो चुका हूँ और होश संभालते ही पिछले ५० वर्षों से अभी तक सुन और पढ़ रहा हूँ कि 'भारत एक विकासशील देश है'!
प्रतिमाएं आदि तब बनाएं जब असली विकास करके थोड़ा सा सुस्ताना हो, अपने पर खुश होना हो! अभी तो बहुत काम पड़े हैं, अभी मूर्तियां बनवाने की बात सुनना भी कानों को नागवार गुजरता है, क्रोध आता है मूर्खतापूर्ण बातों पर! छोटा सा बच्चा समझ रखा है आम जनता को कि झुनझुना पकड़ा देंगे!

(७) दीपावली मनाने का सर्वोत्तम तरीका क्या है और क्यों....? दीपावली मनाने के पीछे क्या भाव है...?
असत्य पर सत्य की विजय उपरांत धर्मयुद्ध के नायकों के स्वागतार्थ एवं सम्मानार्थ तथा इस निमित्त अपना हर्षोल्लास व्यक्त करने हेतु दीपावली का पर्व मनाया जाता है. कार्तिक माह की अमावस्या की रात्रि विभिन्न प्रकार की रोशनियों से वातावरण को जगमगा कर अंधकार को परास्त कर प्रतीक रूप में नकारात्मकता पर सकारात्मकता (असत्य पर सत्य) की जीत को दर्शाया जाता है. वैसे समय के साथ दीपावली मनाने के अनेक अन्य कारण भी साथ में जुड़ गए. इस कारण इस त्यौहार का महत्त्व और भी बढ़ जाता है. सब विश्वास और परंपरा की बातें हैं. लेकिन यह तो सच है कि प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी तरह यह त्यौहार हमारे भीतर एक नवीन ऊर्जा एवं आह्लाद का संचार करता ही है. अतः यह आलोचना का तो पात्र कदापि नहीं. हम अपने विश्वास के चलते किसी भी ढंग से इसे मनाएं, पर अंततः परिणामी भाव यही आए कि, "सकारात्मकता बढ़े, सत्य की राह पर अग्रसर एवं स्थिर हों, आपसी भाईचारा बढ़े, सात्त्विकता बढ़े, बहुमुखी समृद्धि एवं विकास की ओर बढ़ें, जीवन में तनाव कम होकर हर्षोल्लास बढ़े, भीतरी ऊर्जा बढ़े."

(८) देश में लोग सुधार लाने में सहयोग देने के बजाये अपनी बात को एहमियत क्यों देते हैं? बिना पटाखों की दिवाली,कैसा विचार है..?
किसी भी बेहतर चीज (बदलाव) को लागू करवाने के लिए कानूनी दबाव की अपेक्षा जागरूकता पैदा करना एक अच्छा विकल्प है. लोगों के जागरूक न होने की दशा में कानूनी दबाव भी चरण दर चरण बनाया जाना चाहिए. एकदम से हिटलरशाही थोप देना भी सामाजिक असंतोष को जन्म देता है, खासतौर पर जब मामला किसी पारंपरिक धार्मिक त्यौहार से जुड़ा हो. ..."बिना पटाखों की दिवाली" वैसे तो एक बहुत अच्छा विचार है, पर इसे चरण दर चरण बुद्धिमानी से लागू किया जाता तो बेहतर होता. उदाहरण के लिए -- दिल्ली में हर साल की तरह इस साल भी आतिशबाजी के फुटकर और थोक व्यापारियों को लाइसेंस जारी किये गए, उनको जारी करने के लिए रिश्वत वगैरह भी वैसे ही खायी गयी, चूंकि इनसे जुड़े व्यापारियों के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा दीपावली में ही पूरा होता है, अतः उन्होंने इस दिवाली से पूर्व ही निर्माता कम्पनियों को भारी एडवांस धनराशि के साथ बड़े आर्डर दे दिए, छोटे व्यापारियों ने बड़े व्यापारियों के यहाँ भी ऐसा ही कुछ कर दिया. अब न्यायालय का पटाखा-प्रतिबन्ध का आदेश आ गया, तो कारोबार से जुड़े व्यापारियों को तो दोहरा-तिगुना नुकसान हो गया. लाइसेंस फीस का घाटा, एडवांस धनराशि का घाटा, बिक्री शून्य तो मुनाफा भी शून्य, इस वर्ष कोई अन्य काम न करने के कारण कमाई भी शून्य. ...'दिवाला' निकल गया होगा उनका! बरसों से चले आ रहे एक दस्तूर को एकाएक समाप्त कर देना मुझे तो समझ में नहीं आया. ...हल के तौर पर होना यह चाहिए था कि न्यायालय यह निर्णय लेता कि अभी से, यानी इसी दीपावली पर ही यह घोषणा कर दी जाती कि इस वित्तीय वर्ष के उपरांत पूरे राजधानी क्षेत्र में सभी त्यौहारों पर आतिशबाजी सख्ती से प्रतिबंधित रहेगी. दीपावली उपरांत के लिए व्यापारीवर्ग इस बीच अपना कोई दूसरा काम-धंधा ढूंढ लेता, उसका नुकसान न होता. इति.

(८५) चर्चाएं ...भाग - 4

(१) देवी पूजन का कलयुग में बढ़ता महात्म्य ...क्या कारण है? भारत में देवी पूजन का चलन और कन्या भ्रूण हत्या कितनी विडंबना!
हम उच्चकोटि के स्वार्थी, पाखंडी और मंगते (भिखारी समान) हैं, यही एक मात्र कारण है गणेशोत्सव हो या नवरात्रि, या फिर कोई भी अन्य पर्व; पूजन में आडंबरों, तड़क-भड़क व दिखावों का जोश-ओ-खरोश निरंतर बढ़ ही रहा है. ...लेकिन हमारे दिखाने और खाने के दांतों में बहुत अंतर है! ...समाज में बढती धार्मिकता की सूजन के साथ कन्या भ्रूण हत्या की दर भी निरंतर बढती जा रही है! हम आखिर क्या चाहते हैं, कहाँ जा रहे हैं??? ...धिक्कार है, शर्म महसूस होती है.
कन्या भ्रूणहत्या पर लगाम लगाने के लिए आज स्त्रियों के प्रति सम्मान का बढ़ना अतिआवश्यक प्रतीत हो रहा है. इस निमित्त इस काल में देवी पूजन का बहुत महात्म्य है. लेकिन लोगों का स्वार्थ जो है न, वो भक्ति की मूल भावना और भाव को कुचले दे रहा है. लोग तो पूजन के समय देवी माँ से भी प्रार्थना करते हैं कि- सभी भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति हो, बड़े स्कूल में एडमिशन, अच्छे नंबर, अच्छी नौकरी, ऊंचा पैकेज, कामकाजी बीवी और 'पुत्र' की प्राप्ति हो!! केवल भक्ति हेतु ही भक्ति, ऐसी 'निष्काम' भक्ति अब देखने में नहीं आती. आज सब 'सकाम' हो गया है या फिर केवल मौज-मस्ती! 

(२) सबके हित में जिसकी प्रीति हो गई है उन्हें भगवान् प्राप्त हो जाते है! आसान है पर मुश्किल जान पड़ता है!
कितनी बढ़िया बात कही आपने, दिल खुश हो गया. "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना जिसके दिल में ठीक से आ गयी, उसने तो मानों भगवान् को पा लिया. उसकी सोच फिर निराली ही होती है- सभी निर्बंधों से परे, आकाश से भी ऊंची, कल्पनातीत! ..आपने सही कहा कि यह आसान है, पर बहुत मुश्किल जान पड़ता है; क्योंकि व्यक्ति के हजारों-लाखों स्वार्थ जो आड़े आ जाते हैं! आज के बाबा, तथाकथित संत और धार्मिक मार्गदर्शक भी इन स्वार्थों से अछूते नहीं! भगवान् को पा लेने का ढोंग करते हैं वो!
...आपने ऊपर एक शब्द "प्रीति" का प्रयोग किया है. अध्यात्म में इस शब्द (गुण) का बहुत महत्त्व है. प्रीति का अर्थ है- निरपेक्ष प्रेम (अनकंडीशनल लव)! जिस मानव का सभी (सम्पूर्ण सृष्टि) के प्रति निरपेक्ष प्रेम स्थापित हो जाये तो मानो सब सध गया, कुछ शेष न रहा. यही तो चरम बिंदु है किसी भी भक्ति, उपासना या साधना का! वातावरण में व्याप्त अनेकों अहं के स्पंदनों के कारण साधारण व्यक्ति इस चरम बिंदु को पा नहीं पाता, इसीलिए उसे यह कठिन जान पड़ता है. लेकिन यदि किसी प्रकार अहं व स्वार्थ आदि से मुक्ति पा ली जाये तो यह स्वतः बड़ी आसानी से सध जाता है. किसी भी आध्यात्मिक साधना में भी हमारे कृत्य या एक्शन का प्रमुख केंद्र अहं-निर्मूलन ही होता है. ..और अहं का निर्मूलन तभी संभव हो पाता है जब सत्संग और सत्साहित्य की मदद से हम मन में ईश्वरीय (नोबेल) गुणों की वृद्धि करते जाते हैं और उन गुणों को अपने दैनंदिन जीवन में हर पल, हर जगह, हर प्रसंग में 'निरंतर' उपयोग भी करते हैं. फिर धीरे-धीरे हमारा प्रत्येक कृत्य बेहतर से बेहतर होता चला जाता है. जब हम प्रकाशित होते जायेंगे तो अहं रूपी अंधकार भी क्रमशः कम होता चला जायेगा. अहं या किसी अन्य दुर्गुण रूपी अंधकार को मिटाने का यही सर्वोत्तम मार्ग है कि कोई प्रकाश-स्रोत प्रज्जवलित किया जाये. अंधकार को यूं ही धक्का मारने पर वो कभी भी नहीं जायेगा! अँधेरे का कोई स्रोत, स्विच या बटन नहीं होता जिसको ऑन-ऑफ किया जा सके लेकिन प्रकाश का स्रोत होता है. प्रकाश की अनुपस्थिति में ही अंधकार अपने पांव पसारता है. ...हमें परमेश्वर से साक्षात्कार इसलिए भी मुश्किल जान पड़ता है क्योंकि हम बिना किसी प्रकाश-स्रोत की मदद लिए अंधकार को भगाने की जुगत करते रहते हैं.

(३) आज अधिकांश लोग विश्वास से अधिक अंधविश्वास के शिकार क्यों नज़र आते हैं...? अधिकांश लोग अंधविश्वासों के शिकार हो कर ढोंगी बाबाओं के चक्कर में फंस जाते हैं!
इसके दो प्रमुख कारण हैं-- (१) मन में भरा असीमित लालच और सांसारिक इच्छाएं (ईश्वरभक्ति का दृष्टिकोण प्रायः 'सकाम' होना); (२) शिक्षा और जागरूकता की कमी! .....अधिकांश लोगों के मन में यह भ्रम होता है कि मंदिर के पंडित, पंडे, कथावाचक, बाबा, आदि बहुत ज्ञानी होते हैं तथा वे भगवान् और सामान्य जन के बीच सेतु (ब्रिज) का काम बखूबी कर सकते हैं! इसीलिए लोग "उपाय" पूछते हैं और वे बताते हैं! ...लोगों द्वारा सामान्यतः किन चीजों के उपाय पूछे जाते हैं- बच्चा (पुत्र) कब होगा, शादी कब होगी, नौकरी कब लगेगी, पैसा कब मिलेगा, व्यापार में घाटा कैसे कम होगा, मुनाफा कैसे बढेगा, वशीकरण के कुछ उपाय बताएं, मुकदमा कब छूटेगा, राहु-केतु-शनि आदि शांत कैसे होंगे, बीमारी कब जाएगी, अच्छे दिन कब और कैसे आयेंगे???? ...तथाकथित बाबा भी कुछ ऐसी लच्छेदार भाषा में सांत्वना देते हैं और उपाय बताते हैं कि सामने वाला निहाल हो जाता है (गुड सेल्समैनशिप), ...आपको लगने लगता है कि काम अब बना ही समझो! ..चूंकि हमारी समस्याओं में से अधिकांशतः साइकोलॉजिकल स्तर पर होती हैं तो वे तो बातें करते-करते ही काफी ठीक हो गयी प्रतीत होती हैं, शेष कुछ इसलिए ठीक हो जाती हैं क्योंकि कहकर ..भड़ास निकालकर हमारे दिल पर से बोझ काफी कम हो जाता है और अब हम हलके मन से समस्याओं से ठीक ढंग से लड़ सकते हैं, ...हम निर्भय होकर समस्याओं के सामने जाते हैं और जीत जाते हैं (निर्भय इसलिए हो जाते हैं क्योंकि बाबाजी ने सारा बोझ तो अब उपायों और भगवान् के ऊपर डलवा दिया)!!! ...बहुत बड़ा साइकोलॉजिकल ट्रीटमेंट है यह, लेकिन है तो आखिर धोखा ही!!! "उपायों" के माध्यम से वो खूब चूसते व लूटते हैं बुद्धुओं और लालचियों को! उनके फलने-फूलने का कारण हम और हमारी असीमित इच्छाएं ही हैं या फिर हमारा बुद्धू होना.

(४) समाज में बढ़ते व्यभिचार का मूल कारण क्या है...? सभी बुराइयों का मूल कारण केवल कलयुग को बताना कहाँ तक तर्कसंगत है...?
मुख्य कारण है हमारी तेजी से बदलती जीवनशैली के साथ नैतिक मूल्यों का गिरना. उन्नत देशों ने अपने नित-नवीन आविष्कारों से जो कुछ धीरे-धीरे एक बहुत लम्बे समय में हासिल किया, वो हमारे देशवासियों (विकासशील देशों) ने वैश्वीकरण के चलते एक ही झटके में एकाएक प्राप्त कर लिया. इसलिए हाजमा खराब हो गया हमारा! आज जो भी तकनीक, मोबाइल, इंटरनेट, आदि हम मुक्तहस्त से प्रयोग कर रहे हैं, उनमें से कितनों को ईजाद करने में हमारा योगदान रहा, और कितना प्रतिशत?! बना-बनाया मिल गया हमें तो टूट पड़े भूखों की तरह! "तकनीक और गैजेट्स को योग्य संस्कृति से प्रयोग ना कर पाना प्रथम कारण है बढ़ते व्यभिचार का." ..."अन्यों की संस्कृति का केवल काला पक्ष ही ग्रहण करना दूसरा कारण है बढ़ते व्यभिचार का." ..."कहने को बहुत व्यस्त, लेकिन व्यस्तता कहाँ, इसको टटोलें तो मिलता है तीसरा कारण बढ़ते व्यभिचार का." ..."खराब और उदासीन पेरेंटिंग चौथा बड़ा कारण है बढ़ते व्यभिचार का. (कहने को हम बच्चों को प्रवचन के जैसे बहुत से डू एंड डोंट्स बताते हैं, पर समानांतर रूप से कितना अमल हम खुद करते हैं!)." ...कलयुग या सतयुग कोई ऊपर से नहीं टपकता, एक संघ के नागरिकों की जीवनशैली ही इनका निर्माण करती है. और जो संस्कृति बदलती जीवनशैली के साथ नैतिक मूल्यों को सहेज नहीं पाती वह घोर कलियुग का सामना करेगी ही!

(५) बढ़ती धार्मिक हिंसा और आतंकवाद आज विश्व की सबसे बड़ी चुनौती हैं ...क्या आप इस विचार से सहमत हैं..? भारतवर्ष गत कई वर्षों से वर्षों से पाकिस्तान द्वारा फैलाये गए आतंकवाद का शिकार रहा है ...कल अमरीका में हुए आतंककवादी हमले में कई लोग मारे गए ...इस आतंकवाद का मज़हबी चेहरा कितना भयावह है!
जी हाँ..., मैं सहमत हूँ आपसे. ...परन्तु केवल पाकिस्तान का नाम लेना ही उचित न होगा, सम्पूर्ण विश्व में धार्मिक हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है. माना कि पहले लोग एक-दूसरे से परिचित नहीं थे, अन्य संस्कृतियों एवं सभ्यताओं से अपरिचित थे, तो अपनी-अपनी श्रेष्ठता का अहंकार होना स्वाभाविक था; सो अतीत में कभी ईसाईयों ने भी काफी धार्मिक हिंसा की, ...लेकिन समय बीतते ईसाईयों ने खुद को नियंत्रित किया किन्तु कुछ अन्य बड़े धर्म अपने अनुयायियों को आज तक सहिष्णु न बना पाए! ..दुनिया में इतने विकास और जान-पहचान के बाद भी किसी धर्मपंथ में धार्मिक असहिष्णुता, उन्माद या हिंसा का अभी भी होना उसके 'पिछड़ेपन' का द्योतक है. इसी कारण उनके लोग आज भी इतने अशिक्षित या/एवं गरीब हैं. ये अलगाववादी अपने कृत्यों के कारण स्वयं ही अन्य लोगों से अलग-थलग होते जा रहे हैं. कुछ समय बाद ये इतने अल्प व अलग-थलग हो जायेंगे कि इनके लिए अपने अस्तित्व की रक्षा करना भी मुश्किल हो जायेगा (उदाहरण के लिए - रोहिंग्या चरमपंथी और उनके मासूम बीवी-बच्चे - ..गेहूं के साथ घुन भी कैसे पिस जाता है, इसकी एक बानगी). .....वैसे धार्मिक हिंसा के अलावा अपना दादागिरी टाइप का वर्चस्व स्थापित करने की चेष्टा भी आतंकवाद या युद्ध का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है (उदाहरण- उत्तर कोरिया व तानाशाही प्रवृत्ति वाले कुछ अन्य राष्ट्र). ....लेकिन यह तय है कि आने वाले समय में पिछड़े व कट्टर धर्मपंथ तथा तानाशाही राष्ट्र एक भारी कीमत चुका कर विलुप्तप्राय हो जायेंगे.

(६) समाज में उचित बदलाव लाने के लिए पहल किसे करनी चाहिए - बड़े लोगों को या नवयुवकों को? समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए क्या सही मार्ग है?
नौजवानों और बड़ों, दोनों को पहल करनी होगी. अपने अहंकार को किनारे रखकर, शुद्ध रूप से केवल 'उचित' के लिए ही दोनों पीढ़ियों को एक-दूसरे से प्रेरित होने में तथा एक-दूसरे को प्रेरित करने में जी-जान लगानी होगी. उचित और अनुचित में भेद हम तब ही कर पायेंगे जब हम अपने (समाज के) कृत्यों का तटस्थ एवं शिक्षित दृष्टिकोण से आंकलन करेंगे. आधुनिक और विकसित होने की दुहाई देकर हम उन पुरानी मान्यताओं व मूल्यों को तिलांजलि नहीं देंगे जो आज भी हमें नैतिक रूप से स्थिर रखने में सहायक हैं. ..हां, उन पुरानी बेड़ियों को अवश्य काटेंगे जो हमारी सोच को आगे ले जाने में बाधक हैं. ...याद रहे कि समाज को 'बदलाव' नहीं बल्कि 'विकास' चाहिए, ..और 'विकास' के क्रम में कुछ वैसा ही रखना, कुछ नया जोड़ना और कुछ डिलीट करना आवश्यक होता है. लेकिन संजोते, जोड़ते या मिटाते हुए अहंकार-रहित विवेक का जागृत रहना अत्यावश्यक! इस निमित्त बेहतर दिशा सुनिश्चित करने के लिए नौजवानों के साथ जागरूक और खुले दिमाग वाले बुजुर्गों का खड़ा रहना भी जरूरी.

(७) हमारे पर्वों का वास्तविक महत्त्व कब पूरा होगा? आज पर्वों के नाम पर केवल पैसे की बर्बादी और शोरगुल ही रह गया है ...क्यों?
हमारे पर्वों का वास्तविक उद्देश्य तब ही पूरा होगा जब वे हमें भीतर से और अधिक पवित्र, सहिष्णु तथा 'उचित' बना पाएं. ..किसी भी धार्मिक कृत्य या पर्व आदि की सार्थकता तब ही है जब वह हमारा आन्तरिक भाव बदलने या बेहतर करने में सक्षम हो, ..अन्यथा पुनर्विचार की आवश्यकता.  ...साल दर साल बढ़ते शोरगुल और पैसे की बर्बादी को देखते हुए तो इनके प्रासंगिक होने पर ही एक बड़ा सा प्रश्नचिह्न लग गया है! मुझे तो पर्व मनाने में विकृतियों का एक ही कारण समझ में आ रहा है कि धर्मगुरुओं द्वारा उचित एवं प्रासंगिक धर्मशिक्षा के अभाव में लोगों के विश्वास का खोखला हो जाना! अब पर्वों को वे मात्र "परिवर्तन और मनोरंजन" (चेंज और एंटरटेनमेंट) के रूप में मनाते हैं, और इन पर्वों में जो पूजा-अनुष्ठान आदि होते हैं, यंत्रवत करते हुए उनमें भी भगवान् से धन-यश आदि की गुजारिश वे कर लेते हैं कि शायद भगवान् खुश होकर उन्हें कुछ यूँ ही दे दें!

(८) आज समाज बदल रहा है या बुराइयों की गर्त में जा रहा है...? आधुनिक समाज तेजी से बदल रहा है जिसमें अनेकों बुराइओं का समावेश चिंता का विषय बन गया है ...आप भी अपने विचारों द्वारा इस बदलते सामाजिक परिवेश पर चर्चा करें.
अजी हमारे स्पीकिंग ट्री पर ही नजर दौड़ा लें! आध्यात्मिक कहा जाने वाला यह मंच कितने ही मसालेदार व्यंजनों से भरपूर है. प्रसिद्ध ब्लॉग देखिये, प्रसिद्ध स्लाइड शो, या टॉप ट्रेंडिंग चर्चा, किसका ट्रेंड चल रहा है और कौन प्रसिद्ध है, इसको देखने से साफ पता चलता है कि हमारी मानसिकता क्या हो गयी है! आगे किसी अन्य चर्चा या स्पष्टीकरण की आवश्यकता है क्या???!

(९) हम नित्यप्रति ज्ञान के बड़े बड़े सन्देश सुनते या पढ़ते हैं किन्तु व्यवहार में बदलाव क्यों नहीं ला पाते...?
यदि हम ज्ञान को व्यवहार में नहीं लायेंगे तो किसी भी सकारात्मक बदलाव की अपेक्षा रखना व्यर्थ होगा. विश्व में जहाँ कहीं भी ज्ञान को सकारात्मकता के साथ आचरण में समाहित किया गया वहां-वहां समाज (संघ) का ठोस विकास हुआ है. ....वैसे हमें प्राप्त ज्ञान की गुणवत्ता हमारी जिज्ञासाओं में भी प्रतिबिंबित होती है! हमारे देश के बीसियों धार्मिक चैनलों पर ज्ञान के बड़े-बड़े सन्देश हमारी बुद्धि को कहाँ ले जा रहे हैं इसके उदाहरण के लिए नीचे क्रमांक (१०) से (१२) पर पूछी गयी जिज्ञासाओं को देखें.

(१०) क्या किसी से पैन गिफ्ट में लेना चाहिए या नहीं, मैने मेरी छोटी बहन से कहकर पैन आस्ट्रेलिया से मंगवाया है, यदि यह गलत है तो ऐसा क्या करें जिससे हम दोनों में किसी को भी बुरा प्रभाव न हो!?
हद हो गयी भाई अंधविश्वास की!!! पेन रख सकने वाले और आस्ट्रेलिया तक जा पहुंचे आप जैसे पढ़ेलिखे लोग भी ऐसी बात करेंगे, यकीन नहीं हो रहा!! सही में हम ****** हैं!

(११) रात में श्वान का भौंकना अच्छा होता है या फिर बुरा?
श्वान की तो जबान, बोली, भाषा ...सबकुछ भौंकना ही है!! हाँ कभी-कभी वो अजीब सी आवाज में रोते भी हैं, उसका जरूर टेढ़ा अर्थ निकलते हैं कुछ लोग! ..ऐसे तो बिल्लियाँ भी म्याऊं म्याऊं करने के अलावा कभी-कभी रोती भी हैं!! सभी पशुओं के साथ ऐसा होता ही है. पर हमारे आसपास चूंकि कुत्ता-बिल्ली जैसे जानवर ही प्रायः पाए जाते हैं इसलिए हम सिर्फ उन्हीं की हरकतें देख पाते हैं. "कुत्ता रात में उन अजनबियों को देखकर भौंकता है जो आमतौर पर उससे परिचित नहीं होते." सावधान! उन्हें वो काट भी लेता है! ..अब कुत्ते का यह भौंकना आपके लिए बुरा है या अच्छा, यह तो इसपर निर्भर करता है कि कुत्ते के लिए अजनबी वह शख्स आपका कोई नाते-रिश्तेदार है या कोई चोर-उचक्का!

(१२) गाय का घर के दरवाजे पर आकर रम्भाना क्या संकेत लेकर आता है?
स्पष्ट संकेत है कि गाय भूखी है, कुछ भोजन चाहती है; ..वैसे हम लोग आड़ा-तिरछा सोचकर बहुत सारे अन्य अर्थ भी निकाल सकते हैं!

(८४) चर्चाएं ...भाग - 3

(१) ध्यान किसका करें और कैसे करें? ध्यान की सरल विधि क्या है? ध्यान करने वाले का ध्येय क्या होना चाहिए? हम सभी देखते हैं कि, दुनिया में ध्यान करने की विधियां बहुत हैं, कोई दृष्टि को एक लक्ष्य पर केंद्रित करना ध्यान समझता है, कोई मन में कोई भी संकल्प ना उठे उसे ध्यान कहता है, कोई प्राणायाम को ध्यान समझता है, कोई कुण्डलिनी जागरण को ध्यान की विधि कहता है, कोई खेचरी मुद्रा जैसी अनेक मुद्रा में बैठने को ध्यान कहता है, आखिर ध्यान की अतिसरल विधि क्या है और श्रेष्ठतम ध्यान कौन सा है?
अध्यात्म का एक मूलभूत सिद्धांत है कि -- "जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियाँ (स्वभाव, संस्कृति, सभ्यता, माहौल), उतने ही साधना-मार्ग!" ...ध्यान का अर्थ है-- "मन में चलने वाले विचारों से मुक्त होकर आत्मा (या परमात्मा) से जुड़ना!" ...मेरे विचार से देश-काल-परिस्थिति-संस्कृति-धर्मपंथ-विश्वास आदि के अनुसार ध्यान के बहुत से तरीके हो सकते हैं. किसी एक व्यक्ति के लिए जो विधि बहुत सरल हो, वह किसी अन्य के लिए बहुत कठिन या बेअसर भी हो सकती है! मेरे विचार से खरी एवं वास्तविक ध्यानावस्था में आने के लिए व्यक्ति का भाव, तीव्र जिज्ञासा और तड़प ही महत्वपूर्ण हैं! ...और फिर समुचित अभ्यास और अभ्यस्त हो जाने के पश्चात् व्यक्ति जागते, सोते और कोई काम करते समय भी समानांतर रूप से अनवरत ध्यानावस्था में रह सकता है! इस अवस्था में वह अधिकांशतः आनंदित रहता है तथा उसके द्वारा किये गए लगभग सभी कार्य निष्पक्ष और न्यायसंगत होते हैं. ध्यान का ध्येय भी यही होना चाहिए.

(२) जीवन को व्यवस्थित और अनुशासित कैसे किया जाए...? आज की पीढ़ी में बढ़ती अनुशासनहीनता सबसे बड़ी समस्या है.
आपने आज की पीढ़ी की बात की, यानी नयी पौध की! पुराने अर्थात् पिछली पीढ़ियों के लोग ही माली बनकर नयी पौध को पोषक वातावरण प्रदान करते हैं. उनके कोरे कागज समान मन पर हम ही वो इबारत लिखते हैं जिन्हें मूलभूत संस्कार कहते हैं. नयी पीढ़ी में आज यदि कहीं अनुशासनहीनता दिखाई दे रही है तो हमारे द्वारा दिए गए वैचारिक पोषक वातावरण, जिसका जूस पीकर वे बड़े हो रहे हैं ..उस पर विचार करने की आवश्यकता है!!! हमें पुनः नजर दौड़ाने की जरूरत है हमारे द्वारा दिए जाने वाले मूलभूत संस्कारों या वैचारिक पोषक वातावरण पर!!! हम यह सब उपदेश के रूप में दे रहे हैं या खुद अमल करके एक उदाहरण के रूप में!? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम स्वयं अव्यवस्थित और अनुशासनहीन हों या परेशान, उद्विग्न या अशांत मन हों और आगामी पीढ़ी को व्यवस्थित, अनुशासबद्ध और शांत होने का पाठ पढ़ा रहे हों!!? अपने निजी और प्रैक्टिकल अनुभवों के आधार पर मेरा तो बहुत मजबूती से यह मानना है कि हमारे आसपास की दुनिया चाहे जितनी भी खराब हो, लेकिन यदि हम अपनी संतान को पर्याप्त समय तथा सर्वोत्तम बुनियादी संस्कार देने की ईमानदार कोशिश करें (खुद भी अमल करते हुए) और वह भी रीजनिंग (कार्यकारणभाव) समझाते हुए, पूरी निष्पक्षता व प्रोग्रेसिव दृष्टिकोण रखते हुए, ...तो फिर वह संतान आजीवन अडिग रहती है, चाहे जीवन में कितने भी झंझावात आ जायें; वह हर माहौल में खुद की राइटियचनेस (अच्छाई रूपी धर्म) को बरकरार रख सकती है.

(३) मन में निरंतर विचार आने से मन बैचैन और व्यथित रहता है ...इस का किस प्रकार निरोध किया जाए..? अपने मन को शांत कैसे करें...?
एक चंचल बच्चा जब बहुत उधम काट रहा होता है और उससे सारे घर वाले परेशान हो जाते हैं, तो उसे नियंत्रित करने का केवल एक ही कारगर उपाय होता है कि उसे किसी ऐसे काम में लगा दो जो उसकी रूचि का भी हो और साथ ही सार्थक व कंस्ट्रक्टिव भी हो! बच्चा उसमें रूचिपूर्वक व्यस्त हो जायेगा और नकारात्मक शरारतें छोड़ देगा! ...मन भी एक बच्चे समान ही है; जब तक उसके सामने कोई रचनात्मक और सार्थक लक्ष्य नहीं होता, वह व्यर्थ के विचारों में भटकता रहता है! ...अधिकांश काउंसलर कहते हैं कि पहले मन शांत करो फिर कोई काम हाथ में लो; लेकिन मैं कहता हूँ कि किसी भी बिंदु से अपनी इच्छा व रूचि अनुसार किसी सार्थक काम को शुरू करो, ..मन में सकारात्मकता आनी शुरू जाएगी, मन शांत होता चला जायेगा! उदाहरण के लिए- वह कार्य अपने प्रियजनों के लिए गरमागरम स्वादिष्ट पकोड़े या नाश्ता आदि बनाना भी हो सकता है! कहने का अर्थ यह कि खुद को किसी ऐसे काम में व्यस्त कर लें जो रचनात्मक हो, आपकी रूचि का भी हो, साथ ही वह काम आपको कुछ अचीवमेंट का एहसास कराये! अपने किसी प्रियजन के किसी बहुत छोटे से काम में भी उसकी बहुत थोड़ी सी हेल्प करके भी हम अचीवमेंट को अनुभूत कर सकते हैं, शर्त यह कि यदि हम इस प्रकार का प्रयास रोज या अक्सर यानी नियमित रूप से करें!

(४) मन को कैसे जीता जाए? मन ही उत्थान व पतन का कारण है!
मन में कुछ सकारात्मक विचारों को डालकर ही हम मन को साध सकते हैं! सकारात्मक विचार यदि न डल पा रहे हों तो हठपूर्वक (यानी दूषित मन के विपरीत) कोई सकारात्मक कार्य ही करना शुरू करें एवं सुखद अचीवमेंट को अनुभूत करें, अब तो अवश्य ही सकारात्मक विचार जन्म लेने लगेंगे!

(५) अधिकाँश लोग जीवन में ख़ुशी की तलाश में समय व्यर्थ कर देते हैं, क्यों..? क्या ख़ुशी ढूंढ़ने से मिल सकती है...?
देखा जाये तो हर एक व्यक्ति प्रसन्न या खुश रहना चाहता है. सभी अपने-अपने ढंग से खुशियाँ ढूंढने की कोशिश करते हैं. किसी को वह कोई अमुक कार्य करने पर मिलती है तो किसी को कोई अन्य काम करने में! भीतर से खुश रहना चूंकि इस मानव जीवन का प्रमुख उद्देश्य भी है अतः खुशी को ढूंढना व्यर्थ कदापि नहीं! ...और खुशी मिलती भी है! यह अलग बात है कि बहुतों को मिली खुशी क्षणिक या अस्थाई होती है क्योंकि खुशी पाने के क्रम में उनके द्वारा चुने एवं किये गये कार्य का चुनाव या तो सही नहीं होता या फिर वे इसे ठीक ढंग से (परिपूर्णता से/मन लगाकर/लगन से) करते नहीं हैं. पढ़ाई की दृष्टि से या जीविकोपार्जन की दृष्टि से या घरेलू गृहणी होने की दृष्टि से अधिकांशतः चुनने के लिए हमारे पास कुछ सीमित विकल्प होते हैं, उन्हीं के इर्दगिर्द हमारे प्रयास (कार्य/कर्म) होते हैं. ....तो उन्हीं विकल्पों में से कुछ/किसी को चुनकर हम कार्य करना आरंभ करते हैं. ..पश्चात् उस/उन कार्यों से हमें दीर्घकालिक खुशी इसलिए नहीं मिल पाती क्योंकि कुछ समय व्यतीत होते-होते उस चुने हुए कार्य में हमारी एकाग्रता और समर्पणभाव कम होने लगते हैं. हमारा मन अन्यत्र भटकने लगता है. हम अन्य एवं ज्यादा प्रलोभनों में पड़ते जाते हैं, और श्रम भी कम करना चाहते हैं. ..यदि श्रम अधिक भी करते हैं तो अधिक भौतिक रिटर्न के लालच में. इस स्थिति में काम के प्रति हमारा मूल उद्देश्य (खुशी पाना) कहीं खो जाता है. यानी अब हम उस काम को एन्जॉय नहीं कर रहे होते! जब तक हम किसी चुने हुए या किसी द्वारा सौंपे गए काम को एन्जॉयमेंट की फीलिंग के साथ नहीं करेंगे तब तक खुशियाँ हमसे दूर ही रहेंगी. हम भटकते ही रह जायेंगे उन्हें हासिल करने के लिए! ....सारांश में पुनः, ....स्वेच्छा से चुना हो या मज़बूरी में ही मिल गया हो कोई कार्य, ..और उसे करना आवश्यक या अनिवार्य सा प्रतीत हो रहा हो, तो यदि हम उस कार्य को पूरी तरह से मन रमा कर, लगन से, समर्पणभाव से और कर्तव्य समझकर करेंगे तो अवश्य ही हमें सफलता मिलेगी और गहरी खुशी भी!! यही तो अध्यात्म का भी एक सिद्धांत है-- "समक्ष आए प्रत्येक कार्य को कर्तव्य समझकर करो!" कार्य कोई सा भी हो सकता है, कार्य कभी छोटा या बड़ा नहीं होता. (नोट:- वस्तुतः चिरस्थाई खुशी या आनंद किसी भजन-कीर्तन, सत्संग, योगाभ्यास, धार्मिक अनुष्ठान आदि में नहीं छुपी! बल्कि इन सब से हमें प्रेरणा मिलती है हर समक्ष आए प्रत्येक काम को 'साधना' समझकर करने की! अध्यात्म तो अपने आम जीवन में उतारने का, अमल करने का शास्त्र है).

(६) भगवान् एक दिव्य माँ हैं अथवा पिता?
एक बच्चे के 'योगक्षेम' हेतु यद्यपि एक माँ की बहुत बड़ी भूमिका होती है लेकिन पिता का सहयोग मिलकर ही वह योगक्षेम 'पूर्ण' होता है. अतः भक्त की आवश्यकतानुसार भगवान् कभी माँ रूप में होते हैं तो कभी पिता रूप में! परन्तु वास्तव में वो लिंगभेद से परे हैं.

(७) भगवान है या नहीं?
भगवान् तो अनुभव या अनुभूति का विषय हैं. जिसको यह होती है उसके लिए हैं, जिसको नहीं होती उसके लिए नहीं. विश्वास या अविश्वास से किसी का कुछ बनता या बिगड़ता नहीं है! हाँ, विश्वास होने से हमारे मन-मस्तिष्क पर कुछ लगाम लगी रहती है, हम गलत करने से डरते हैं; ..और अविश्वास की दशा में हम निरंकुश हो जाते हैं! सही या गलत करने से ही हमारा कुछ बनता या बिगड़ता है.

(८) कौन से लोग ऐसे हैं जो भगवान् के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं...? जब कण कण में वह व्याप्त है तो फिर ऐसे विचार क्यों...?
भगवान् के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने वाले आज के जिज्ञासु और भविष्य के साधक हैं! गहरा ज्ञान पाने की शुरुआत क्रॉस-क्वेश्चनिंग से ही होती है. स्कूल-कॉलेज की भी किसी कक्षा में असहमत, असंतोषी और बहुत से बुनियादी प्रश्न करने वाला विद्यार्थी ही बहुत आगे तक जाता है.

(९) आत्मा-परमात्मा क्या कल्पना मात्र हैं?
आपका कहना कुछ हद तक बिलकुल सही है! चमत्कारी प्रकृति के रहस्यों और उसके अकाट्य सिद्धांतों को समझने के लिए विज्ञान में और अनेक सवालों को सुलझाने हेतु गणित विषय में भी हम अनेकों परिकल्पनाओं का सहारा लेते हैं. तो अध्यात्म विषय भी एक प्रकार का शास्त्र (विज्ञान) ही है- "सूक्ष्म का शास्त्र"! ..तो इसमें भी चमत्कारी जीवन से सम्बंधित रहस्यों और उसके अकाट्य सिद्धांतों को समझने-सुलझाने के लिए आत्मा, परमात्मा जैसे शब्दों द्वारा कल्पनातीत की कल्पना की गयी है. बिलकुल वैसे ही जैसे- ..कुछ अदृश्य सा झोंका आता है और मेज पर रखे सभी पन्ने उड़ जाते हैं, हमने उस शक्ति का नाम 'वायु', 'हवा', आदि रख दिया! इसी प्रकार जिसमें जीवन के मूलस्रोत का आभास हो रहा है/होगा, उसका नाम अध्यात्मशास्त्रियों ने 'आत्मा' रख दिया; ...और इस स्रोत का भी जो बड़ा स्रोत है, जिसमें से यह स्रोत उपजा है/होगा, उसका नाम 'परमात्मा' कल्पित कर लिया! हो सकता है कि विश्व में किसी अन्य भाषा, संस्कृति या सभ्यता के लोगों ने अपनी खोज-यात्रा में किन्हीं अन्य नामों की कल्पना की हो!

(१०) कलयुग में भगवान् में आस्था कम होने का मुलभुत कारण क्या है...? क्या शायद इसी लिए पाप कर्मों में भी निरंतर वृद्धि हो रही है!?
भगवान् में आस्था कम होने के कुछ कारण-- (१) अहंकार का बहुत बढ़ जाना, (२) अहं के कारण यह भ्रम होना कि मनुष्य सिर्फ देह है, (३) यह समझना कि देह और इसमें उपस्थित मस्तिष्क ही सर्वगुणसंपन्न और सर्वशक्तिशाली है, (४) विज्ञान द्वारा खोज निकाले गए सिद्धांतों की परिधि से भी स्वयं को बाहर मानना, (५) धर्मों (पंथों) में व्याप्त विभिन्न अंधविश्वासों से उकता जाना, (६) वर्तमान आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा आध्यात्मिक शिक्षा को स्वयं ही अपने आचरण द्वारा ना प्रकट कर पाना, (७) अध्यात्म, धर्म या भगवान् आदि शब्दों की व्याख्या आधुनिक समयानुसार प्रासंगिक या सर्वथा स्पष्ट ना होना, (८) धार्मिकता (अच्छेपन) को कायम रखने के लिए आध्यात्मिक या धार्मिक शिक्षा में समयानुसार किसी भी सकारात्मक परिवर्तन का साहस किसी में भी ना दीखना (लकीर के फ़क़ीर बने रहना), (९) इन सब कारणों से लोगों का धर्म के प्रति उदासीन एवं निष्क्रिय होना, (१०) वर्तमान धर्मगुरुओं की भी अकर्मण्यता, उदासीनता व मात्र दिखावटी प्रदर्शन से आमजन में जिज्ञासा और जानने की 'निष्काम' तड़प अब दुर्लभ होना, (११) जब जिज्ञासा, पर्याप्त तड़प आदि नहीं तो भगवान् सम्बन्धी ज्ञान का खोखला होना, ...और जब ज्ञान उथला तो विश्वास का 'टिकाऊ' होना कैसे संभव?! ....इन्हीं सब कारणों से आज 'धर्म' (सही सोच, सत्य, न्याय, अच्छापन आदि) की भारी हानि हो रही है और पाप व भ्रष्टाचार बढ़ रहे हैं.

(११) मुझे परमात्मा से साक्षात्कार करना है मैं क्या करूं?
मैं कोई गुरु नहीं अपितु आप ही की भांति कदाचित् एक साधक ही हूँ. अपने अनुभव व अनुभूति के आधार पर, ....चिरपरिचित सोलह अक्षर के महामंत्र का अपने खाली समय में प्रतिदिन कुछ देर तक सस्वर पाठ करें- "हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ; हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे". ...लय लाने के लिए राम को रामा और कृष्ण को कृष्णा उच्चारित किया जा सकता है. ...स्वयंभू गुरुओं, दिखावटी सत्संगों और कोरी भावुकता से बचें. गीताप्रेस, गोरखपुर के संस्थापक/लेखक दिवंगत श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार जी एवं स्वामी विवेकानंद जी का साहित्य पढ़ें, ..पर्याप्त रहेगा. .....तथा बहुत महत्वपूर्ण यह कि, अपने व अपने घर वालों से जुड़े प्रत्येक कार्य को कर्त्तव्य (साधना) समझकर करें. ...कहा गया है, "योगः कर्मसु कौशलम्", अर्थात् कुशलता से किया गया प्रत्येक कार्य ही योग (ईश्वर से जुड़ना) है!

Tuesday, October 10, 2017

(८३) चर्चाएं ...भाग - 2

(१) भगवान एक हैं - फिर भी लोग इस बात को क्यों नहीं समझ पाते?
इसका एक ही कारण दिखता है कि धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में हम सभी पंथों के लोग वर्षों से एक ही स्थान पर रुके हुए हैं, विज्ञान के क्षेत्र में हम व्यापक होकर कहाँ से कहाँ पहुँच गए परन्तु धर्म के क्षेत्र में हम अभी भी कुंए के मेंढक हैं. धर्म और ईश्वर आखिर हैं क्या, और क्यों, आपस में लड़ने से पहले इस पर कभी विचार कभी किया हमने!? "धर्म" अर्थात् ऐसा योग्य आचरण अथवा कार्य, जो हमें वाह्य (भौतिक) एवं आन्तरिक सुख प्रदान करा सके. श्रेयस्कर आचरण कौन सा है, इसे निर्धारित करने का कार्य मानवीय बुद्धि का नहीं, बल्कि केवल एक दिव्य अलौकिक शक्ति (सार्वभौमिक परमात्मा) का है, ऐसा सभी पंथ मानते हैं. ..यदि हम यह मानते हैं कि सभी धार्मिक पंथों का ईश्वर एक ही है और वह वही दिव्य अलौकिक शक्ति है, तो फिर उनके धर्मग्रंथों में दी गयीं नीतियों और आदेशों में भिन्नता क्यों, ईश्वर के नाम भिन्न क्यों? हास्यास्पद यह कि सभी के धर्मगुरु कहते हैं कि उनके पंथ का धर्मग्रन्थ और ईश्वर ही प्रामाणिक है; अन्य सब निम्न श्रेणी के या झूठे हैं! वस्तुतः प्रत्येक पंथ के शीर्ष स्तर पर जब ऐसी सोच या मनोवृत्ति होती है, तब परस्पर धार्मिक या पंथिक द्वेष जन्म लेता है. यही द्वेष विश्व भर में फैली अनेक बुराइयों एवं वैमनस्य की जड़ है. बिना यह समझे कि यह भिन्नता क्यों है, अपने-अपने ईश्वर और धर्मग्रन्थ को ही श्रेष्ठतम कहने का दावा करना अहं-सूचक है. वस्तुतः विश्व के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग ढंग से मानव सभ्यता का क्रमिक विकास हुआ. तब यातायात के इतने साधन उपलब्ध न होने से लोग अपने-अपने क्षेत्रों, कबीलों और संघों तक ही सीमित रहते थे. यही तो मूल कारण था कि भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का निर्माण हुआ एवं एक-दूसरे की बात समझने-समझाने के लिए असंख्य भाषाओँ का भी क्रमिक उदय एवं विकास हुआ. ..विकास के इस क्रम में सभी समुदायों में अच्छाई भी उभरी और बुराई भी. मूलतः आत्मिक प्राणी होने के कारण सभी संघों के तत्कालीन प्रबुद्ध, अग्रणी और नेतृत्व-क्षमतावान चुनिन्दा जनों को अच्छाई यानी "धर्म" का महत्त्व समझ में आया; और फिर उन्होंने अपने लोगों को "योग्य आचरण" यानी धर्म के मार्ग पर प्रवृत्त करने लिए स्थान-काल-परिस्थिति अनुसार, तत्कालीन लोगों के विवेक, बुद्धि, भाषा और संस्कृति अनुसार, कुछ नियम और आज्ञाएं लिखीं, बताईं या लागू कीं. ... निराकार सार्वभौमिक परमेश्वर को भी शब्दों के माध्यम से कुछ-कुछ समझाने की कोशिश की. ...समझने में सुविधा और श्रद्धा के सरल निर्माण हेतु देश-काल-संस्कृति-परिस्थिति अनुसार कालांतर में ईश्वर के विभिन्न सगुण रूपों का भी उदय हुआ. समय-समय पर किसी संघ में बुराई के अत्यधिक बढ़ जाने पर उस काल के किसी योग्य, न्यायप्रिय व साहसी ने अवतार रूप में दुष्टों का संहार करके आम जन को राहत पहुंचाई एवं लोककथाओं में अपनी उपस्थिति सदैव के लिए दर्ज की (आध्यात्मिक दृष्टि से हम सब भी तो छोटे-छोटे अवतार ही तो हैं). इतिहास गवाह है कि विभिन्न देशों के व्यक्तियों ने जब लम्बी यात्राएं की, तो उन्हें अन्य देशों व संस्कृतियों के बारे में पता चला. यही कारण है कि प्रत्येक समुदाय व संघ के ईश्वर एवं धार्मिक ग्रन्थ भिन्नता लिए हैं! सिर्फ भारत में ही कितनी अधिक भाषाएँ, सभ्यताएं, संस्कृतियाँ, ईश्वर के नाम एवं रूप हैं तो सम्पूर्ण विश्व के बारे में जरा सोचिए! ...अरे, इतना जानने के बाद भी धर्म के नाम पर लड़ने वाले संकुचित, खोखले और पिछड़े हैं भीतर से! ....परमेश्वर अर्थत ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च सत्ता को जानने-समझने के लिए विभिन्न उपासना पद्धतियाँ, धार्मिक कृत्य, कर्मकांड आदि सब एक प्रकार से माध्यम ही हैं उस तक पहुँचने का; ये सब लोगों की संस्कृति का ही एक हिस्सा हैं, तभी तो ये स्थान एवं जाति अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं! ...बस एक ही चीज पूरे संसार में, सब लोगों में, सब पंथों में, समुदायों में एक सी पाई जाती है, वह है एक सर्वोच्च अद्भुत शक्ति को मान्यता; जो अदृश्य व निराकार है, परन्तु हर जगह विद्यमान है! ...एक और चीज पूरे संसार में, सब लोगों में, पंथों में एक सी पाई जाती है, वह है- यथासंभव श्रेष्ठ (सर्वमान्य, सार्वभौमिक) नैतिक मूल्यों को अपनाना. ....तथापि एक चीज अस्थाई है और सब जगह अलग-अलग पाई जाती है, वह है- ईश्वर के विभिन्न नाम, रूप, उपासना पद्धतियाँ, ..यानी अलग-अलग संस्कृतियाँ!!! ...अब लोग ही फैसला करें कि 'सिद्धांत' रूपी 'धर्म' बड़ा है या 'संस्कृति' रूपी 'धर्म'!!! 'लौकिक धर्म' के नाम पर आपस में लड़ने वाले बहुत से लोगों को अभी यह भी ज्ञात नहीं होगा कि अध्यात्म आखिर है क्या???? अध्यात्म वह है जो हमें 'सिद्धांत' रूपी 'धर्म' से परिचित कराता है!

(२) भगवान् ने कभी नहीं कहा कि मेरी पूजा करो फिर भी लोग करते हैं क्यों? हम अक्सर देखते है कि लोग अपना काम वगैरह छोड़कर मंदिर में जाते हैं, खुद तो जाते हैं अपने छोटों को भी ले जाते है चाहे इसके लिए उन्हें उनके काम से वंचित क्यों ना करना पड़े, कहते हैं पुण्य मिलेगा, भगवान् आपकी सहायता करेगा कैसे?
परमात्मा के गुणों को अपने भीतर विकसित एवं दृढ़ करने के लिए तथा चंचल मन के विरुद्ध जाकर 'धर्म' यानी अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा व ऊर्जा पाने के लिए एक सामान्य व्यक्ति को कुछ ध्यान-स्मरण आवश्यक होता है. परमात्मा तो अदृश्य व निराकार है, तो समझने में सुविधा और भाव के सरल निर्माण हेतु प्रत्येक समाज के प्रबुद्धों ने अतीत में देश-काल-संस्कृति-समय एवं तत्कालीन लोगों की बुद्धि-विवेक अनुसार ईश्वर के विभिन्न सगुण रूपों की आराधना आरंभ की. आशय नेक था और वह केवल यही था कि तत्कालीन आम लोग प्रेरित होकर यथासंभव योग्य आचरण करें. ...संस्कृति-अनुसार प्रेरणा पाने का यह अद्भुत तरीका कालांतर में एक रूढ़िवादी सभ्यता में परिवर्तित हो गया! ...अब लोग बस पूजा-पाठ करते हैं, पूछो क्यों करते हैं, तो विरले ही यह जवाब सुनने को मिलेगा कि 'ईश्वरीय गुणों को आत्मसात करने के लिए'!!! समय के साथ हमने पूजा-अर्चना करने का लक्ष्य बदल दिया, बहुधा अब वह 'सकाम' है! परमेश्वर भी अवश्य खिन्न होंगे यह सब देखकर! ...पर फिर भी वह कुछ नहीं करेंगे, ...करेंगे तो उनके नियम, सिद्धांत व अनोखी स्वचालित न्याय-व्यवस्था!

(३) पाप और पुण्य का भेद समझना मुश्किल क्यों हो जाता है....?
ऐसा कर्म जिससे 'धर्म' (नैतिकता द्वारा अनुमोदित न्याय, सही बात, निर्दोष) की रक्षा हो, केवल वह ही करने योग्य है. ....ऐसा विचार या कर्म, जो शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, या आध्यात्मिक, इन चार रूप से किसी को (स्वयं या/और अन्य किसी को) नुकसान पहुंचाए, वह गलत (पाप) होगा, ...शेष सब सही!!! ...केवल किसी आपातकाल में (अर्थात् उपर्लिखित परिभाषित 'धर्म' के संकटकाल में), केवल धर्म (सत्य) की रक्षा और पुनर्स्थापना हेतु किसी को उपरोक्त चार तरह से आहत भी करना पड़े, तो वह कोई पाप नहीं, ....लेकिन ध्यान रहे कि कार्य संपन्न होते ही यानी सत्य की रक्षा होते ही तुरंत 'सामान्य धर्म' में लौटना अत्यंत आवश्यक, अन्यथा व्यक्ति गंभीर पाप का भागी होगा. अधिकांशतः हमें 'सामान्य धर्म' का अनुपालन ही करना होता है.

(४) अध्यात्म से जुड़ने का सही अर्थ क्या है...? लोग गलत बाबाओं के पास जा कर आध्यात्मिक होने की गलतफहमी पाल लेते हैं...!
अध्यात्म वह है जो "सिद्धांत" रूपी "धर्म" से हमारा परिचय कराता है. हमारी आत्मा उस धर्म से सराबोर है; या यह भी कहें कि आत्मा, साक्षात् धर्मस्वरूप ही है तो भी यह कोई अतिशयोक्ति वाली बात नहीं! किसी स्थूल गुरु या मार्गदर्शक से हमें केवल कुछ ऊपरी दिशा-निर्देश मिल सकते हैं, पर यात्रा तो हमें अपने प्रयासों से ही करनी होती है. ..लेकिन अज्ञानतावश लोग किसी गुरु या बाबा को ही सबकुछ (ईश्वर तक) मानकर अपना सबकुछ उसपर लुटा देते हैं. स्मरण रहे कि एक खरे गुरु को भौतिक लालसाएं छू भी नहीं सकतीं और वह बहुत साधारण जीवन व्यतीत करते हैं, बिना औपचारिकताओं के वह सबको सहज उपलब्ध रहते हैं. ..वह शिष्यों की भीड़ लगाने में विश्वास नहीं करते.

(५) आज देश अनेकों चुनौतियों का सामना कर रहा है ...आपके विचार में सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती कौन सी है? देश में गरीबी, बेरोज़गारी, बढ़ती असमानता, धार्मिक असहिष्णुता, रिश्वतखोरी प्रमुख है.
अच्छा मुद्दा उठाया आपने. आपने हमारे समक्ष खड़ी मौजूदा चुनौतियों के कुछ उदाहरण भी दिए! लेकिन मुख्य प्रश्न आपका यह है कि "सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती कौन सी है?" समस्या की जड़ में जाना हो तो कुछ खोदकर जड़ को ढूंढना आवश्यक. ...समस्या रूपी पेड़ की कुछ टहनियां या कुछ पत्ते काटने-छांटने से पेड़ नष्ट नहीं होगा, जड़ पर प्रहार करना होगा! ...मेरे विचार से देश में (दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड़कर) जहाँ भी गरीबी, बेरोजगारी, रिश्वतखोरी, असमानता, धार्मिक असहिष्णुता आदि जैसी समस्याएं हैं, उनकी जड़ में वहां के समाज (अभिजात वर्ग और अगुवाओं सहित) में व्याप्त नैतिक पतन है! ..कई बुद्धिजीवी कहेंगे कि "गरीब या बेरोजगार से नैतिकता की उम्मीद क्यों करते हो भाई!?" ...जी हाँ, ..बिलकुल सही बात है आपकी, मेरे विचार से भी नैतिकता की उम्मीद सदैव ऊपर (राजा, मंत्री, पुलिस, वकील, डॉक्टर, अभिजातवर्ग, व्यवसाई, नौकरीपेशा आदि) से ही आरंभ होनी चाहिए. ...क्या वहां पर्याप्त नैतिकता है????? लगभग सभी किसी न किसी प्रकार से किसी न किसी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं! कल की खबरों में एक खुलासा देखा कि उत्तरप्रदेश की अनेक ग्रामीण सरकारी पाठशालाओं में नियुक्त अध्यापकों ने भाड़े पर टीचर रखे हुए हैं (खुद हजारों रुपए प्रति माह वेतन लेकर केवल कुछ सौ रुपयों पर)!!! कहीं किसी अध्यापिका का पति ही भाड़े पर लगा है, कहीं मिड डे मील का रसोइया, कहीं सफाई कर्मचारी की बेटी, तो कहीं आंगनबाड़ी वाली महिला एक्स्ट्रा पार्ट-टाइम जॉब के रूप में नियुक्त कर रखी है. बढ़ती दुर्घटनाओं से चिंतित रेलवे का भी एक फैसला पढ़ने में आया कि फ़ील्ड-वर्क (जैसे खलासी, लाइनमैन आदि) के पद अब बहुत उच्चशिक्षा प्राप्त अभ्यर्थियों से नहीं भरे जायेंगे! ..क्योंकि उन्हें काम करने में शर्म आती है, और वे अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं करते! कुछ ऐसा ही नवनियुक्त सरकारी सफाई-कर्मचारी भी करते हैं! इसी प्रकार का कार्य पी.एम.एस अंतर्गत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में तैनात सरकारी डॉक्टर भी करते हैं, ..महीने में दो-चार दिन जाकर पूरे महीने का वेतन उठाते हैं और शहर में प्राइवेट प्रैक्टिस भी करते हैं! सब के सब बटोरने में, नोचने में लगे हैं! सभी इसी फिराक और होड़ में हैं कि कौन किसको अधिक 'चूना' लगा सकता है! पुलिस, प्रशासन आदि की बात भी करें तो कई दिन लग जायेंगे, ...उनके बारे में कुछ छुपा नहीं है किसी से! ...यानी इन सब बातों से क्या सिद्ध हुआ कि पिछड़े प्रदेश, इस वजह से पिछड़े हैं क्योंकि वहां नैतिकता को हाशिये पर डाल दिया गया है! ...तो सबसे बड़ी और गंभीर चुनौती हमारे समक्ष है तो वह है नैतिकता की! ...मनुष्य को मानव बनना होगा! जब हम अच्छे और सरल बनेंगे, दूसरे का हक़ मारना बंद करेंगे, अपना काम सिर उठाकर गर्व से करेंगे, जिम्मेदार बनेंगे, वेतन या फीस के बदले ईमानदारी से अपेक्षित काम करेंगे, तभी दुर्दिन दूर होंगे. ..इस स्थिति के लिए तथाकथित बड़ों (गुरुओं और नेताओं) को ही पहल करनी होगी.
...समाज में नैतिकता इसीलिये कम है क्योंकि परमेश्वर, प्रकृति आदि के नियमों और सिद्धांतों पर किसी को विश्वास ही नहीं रहा! किताबों में नियम-सिद्धांत खूब पढ़ते हैं, रटते हैं, ..और उन पर बड़े-बड़े भाषण, व्याख्यान, प्रवचन आदि भी देते हैं, पर स्वयं को उनकी परिधि से बाहर मानते हैं!!! अध्यात्म को मात्र पढ़ना या समझना काफी नहीं, उसके क्रियान्वयन से ही बात बनती है.

(६) लोग अक्सर अपनेआप को तकलीफ देकर भगवान को खुश करने की कोशिश करते हैं क्यों? जैसे हम व्रत करते हैं और नंगे पांव मंदिर के चक्कर लगाते हैं, ज्यादा भीड़ में घुस जाते हैं और बाद में बीमार पड़ जाते हैं; ये सब कोई अपने लिए नहीं करता लेकिन जिनके लिए करता है वो उसका मूल्य समझते हैं क्या? अगर भगवान को खुश करने के लिए तो कोई वो काम क्यों नही करता जिससे बाकियों की सोच सही हो और बढे?!
अक्सर लोग खुद अपनी या अपने किसी परिजन की कोई अभिलाषा पूर्ण करने के लिए, अथवा मन की शांति और हृदय की पवित्रता हेतु पूजा-पाठ, व्रत, दर्शन, आदि करते हैं. इसमें कोई भी संदेह नहीं कि इस प्रक्रिया में वो कुछ त्यागते हैं और कुछ कष्ट उठाते हैं. बहुत से पंथों में पूजा के विशिष्ट दिनों में व्रत आदि का प्रावधान इसलिए है कि उस अवसर पर हम अपनी इन्द्रियों के स्वाद, लालच आदि को त्यागकर कुछ संयम रखना सीखें. 'संयम' भी परमेश्वर का ही एक गुण है. लेकिन भारी भीड़ में धूप, गर्मी, या भीषण सर्दी और बरसात में लाइनें लगाकर, भारी कष्ट उठाकर व बीमार पड़कर भगवान् का दर्शन करने से उन्हें क्या लाभ पहुँचता है, उनका कौन सा गुण बढ़ता है, यह मेरी समझ से परे है! ...हाँ, शांत वातावरण वाले किसी पूजा स्थल पर दर्शन करने जाना और भावपूर्ण वातावरण में परिक्रमा आदि करना तो अवश्य ही उतने समय के लिए हृदय को पवित्र और मन को शांत कर देता है. ...बस एक बात और हो जाये तो कितना ही अच्छा हो कि हमारी ये धार्मिक गतिविधियाँ किसी विशिष्ट स्वार्थभावना से (अर्थात् सकाम) ना हों! इनसे यदि सत्य, संयम, उदारता सरीखे ईश्वरीय गुणों में वृद्धि हो रही हो तो समझ लेना चाहिए कि दर्शन, पूजा, व्रत, कष्ट उठाना आदि सफल रहे, अन्यथा पुनर्विचार की आवश्यकता! ....आपके मूल प्रश्न पर आते हैं, ...भगवान् तो अपनेआप में ही खुशी का समुद्र हैं, हम उनको क्या खुश करेंगे!!! हाँ, यदि हम ऐसा सोचते हैं कि हमारे किसी स्थूल धार्मिक अनुष्ठान से प्रसन्न होकर भगवान् हमें मनचाहा वरदान दे देंगे, तो यह हमारी भूल है! यदि ऐसा संभव होता तो विश्व में यह चीजें सबसे अधिक हमारे भारत में ही होने के कारण हम आज सर्वोच्च शिखर पर होते! ...कुछ लोग शायद तर्क दें कि हाँ, हमारा भारत कभी इन्हीं कारणों से शिखर पर था! ...मेरा उत्तर होगा कि, ..जी हाँ, बिलकुल था और इन्हीं कारणों से ही था; ...लेकिन तब विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य बड़ा होता था; ..निजी अभिलाषाओं तक सीमित न होकर वह समस्त प्राणिजगत के कल्याणार्थ तथा धर्म (सत्य व न्याय) की रक्षा के निमित्त होता था. ..तब हम पूजा-पाठ, व्रत, दर्शन, तपस्या, अनुष्ठान आदि से अपनी मलिनताओं और अवगुणों को धो कर अपनी पवित्र आत्मा को प्रकट करते थे; ...आत्मा के प्रकटीकरण होते ही साक्षात् ईश्वर से साक्षात्कार संभव होता था, ...और फिर हमें वे प्रत्येक अपेक्षित योग्यताएं मिलती थीं, जिनके बल पर हम "सत्य व न्याय" (धर्म) को पुनर्स्थापित करने में सफल होते थे, फिर हमारी जयजयकार होती थी, हम सिरमौर घोषित होते थे! .....यह था भारत का स्वर्णिम अतीत! लेकिन अभी हमारा आशय या लक्ष्य आदि इतना महान होता है क्या?

(७) अधिकाँश लोगों को दूसरों में दोष दिखाई देते है किन्तु अपनी स्लेट साफ़ क्यों दिखती है...? बहुत बड़ी विडंबना है ...क्यों?
जी हाँ, बिलकुल सही कहा आपने कि यह बहुत बड़ी विडम्बना है. इसका मूल कारण "प्रत्येक व्यक्ति का अपना अहंकार" है. व्यक्ति को अपनी बुद्धि, जाति, पंथ, उपासना पद्धति, ईश्वर-रूप, भक्ति, भाषा, संस्कृति, भौतिक हैसीयत (संपन्नता), पसंद-नापसंद आदि का अहंकार हो सकता है! जिस भी चीज का अहंकार व्यक्ति को होता है, वह अन्यों को उस क्षेत्र में छोटा व हीन समझता है! विश्व के इस भाग में अहंकार कुछ अधिक ही है! विरले ही ऐसा देखने में आता है कि किसी को अपने दोष स्वीकार्य हों, ...या वह दूसरे के गुणों की उन्मुक्तता से (दिल खोलकर) सराहना कर सके!!! मजे की बात यह है कि धार्मिक सभाओं या सत्संगों आदि में भी सामान्य साधकों से लेकर बड़े मार्गदर्शकों तक में यह मनोवृत्ति देखी जा सकती है! अहंकार ही है यह, जो हमें निरंतर यह बताता, जताता और समझाता रहता है कि तुम और तुमसे जुड़ी हर चीज सर्वोत्तम, शेष सब दीन-हीन! अनेक सत्संगों में अहं-निर्मूलन हेतु विशेष वर्कशॉप देखीं हैं मैंने, लेकिन सूक्ष्म निरीक्षण करने पर यह पाया कि यह कई स्वभावदोष और अहंकार तो अवश्य कम करती है लेकिन अनेक अन्य उपजा भी देती है. .....दार्शनिक भाव से विवेचना करें तो निष्कर्ष पाते हैं कि जीवन में हम अनेक भूमिकाओं में होते हैं; ...कहीं हम कुछ 'सीखते' हैं और कहीं कुछ 'सिखाते' हैं! ...जब हम सीख रहे हों तो सिखाने वाले के केवल गुणों पर ध्यान दें, तभी हम कुछ सीख पायेंगे; ...और जब हम किसी को कुछ सिखा रहे हों तो उसके अवगुणों पर अवश्य समुचित ध्यान दें, तभी हम उसका उचित विकास कर पायेंगे. ..ये दोनों काम अहंकार को किनारे कर देने पर ही संभव हो सकते हैं. यदि लोगों में खुद सुधरकर फिर अन्य को अपना समझकर सुधारने की सच्ची भूख जागेगी तभी अहंकार कुछ कम होगा और समाज श्रेष्ठ बनेगा. आश्चर्य की बात है कि सबके जीवन में ऐसा होता भी है, उदाहरण- अभिभावकों (खासतौर पर एक जागरूक माँ) द्वारा बच्चे को सिखाना, ...अपने बच्चे को कुछ सिखाने की प्रक्रिया में माँ अनेक गुण पहले खुद आत्मसात करती है, फिर बड़े मनोयोग से अपने बच्चे को भी सिखाती है. कैसे सीखती है और कैसे सिखाती है? ...बिलकुल वैसे जैसे ऊपर बताया! वह अपने अहं को न्यून करके ही उचित चीजें सीख पाती है और बच्चे के प्रत्येक अवगुण पर नजर रखते हुए उसे सर्वगुणसंपन्न बनाने की निःस्वार्थ चेष्टा करती है!

(८) अहंकार और स्वाभिमान में क्या अंतर है? अहंकार में कोई भी अपनेआप को सबसे अधिक शक्तिशाली समझता है तो अहंकार हो जाता है, नहीं तो बिना कुछ किये ही लोग दूसरों के सामने हारे मान लेते है क्यों?
जिसमें अहंकार होता है वह अपने बल, बुद्धि, राज्य, भाषा, संस्कृति और अपनी प्रत्येक चीज को पर "घमंड" करता है, उन्हें "श्रेष्ठतम" समझता है और अन्यों की तुच्छ या हीन!! इस कारण वह आक्रान्ता (आक्रामक) हो जाता है. वह दूसरों पर विचारों या अस्त्रशस्त्र से हमला करता रहता है, अपना वर्चस्व स्थापित करने की चेष्टा करता है. इस क्रम में वह धर्म (सत्य एवं न्याय) की भी अवहेलना करता है. ....जिसमें स्वाभिमान होता है, वह अपने बल, बुद्धि, राज्य, भाषा, संस्कृति और अपनी प्रत्येक चीज पर "गर्व" करता है, उन्हें "श्रेष्ठ" समझता है (लेकिन श्रेष्ठतम नहीं) और अन्यों की भी इन्हीं चीजों का सम्मान करता है. वह दूसरों से भी कुछ-कुछ सीखकर व सहयोग लेकर अपने से जुड़ी हर चीज को और बेहतर बनाने की सतत चेष्टा करता रहता है. वह आक्रान्ता नहीं होता, परन्तु अपने पर किये आक्रमण को सहन भी नहीं करता, समुचित प्रत्युत्तर अवश्य देता है, प्रत्येक दशा में वह धर्म (सत्य एवं न्याय) का पक्ष लेता है. ....तीसरे प्रकार के वो होते हैं जो बिना प्रतिरोध किये अधर्मी अहंकारी आतताई के समक्ष घुटने टेक देते हैं, या जान कर भी अनजान बने रहते हैं, वे कायर और नपुंसक होते हैं!

(९) सांसारिक सुखों की तलाश में आज लोग अधिक दुखी क्यों दिखाई देते हैं...? वास्तविक खुशी मन की शांति है, या अत्यधिक आराम सुविधा का संग्रह?
सांसारिक सुखों की तलाश में आज लोग इतना अधिक दुखी इसलिए दिखाई पड़ते हैं क्योंकि वे बहुत 'बड़ा' सोचते हैं! बड़ा यानी प्रचुर सुख-सामग्री, प्रचुर आमदनी, बहुत सारा लाभ! इस 'बड़े' की कोई सीमा नहीं होती जबकि हमारे शरीर की आवश्यकताओं की एक सीमा है! बहुत ज्यादा के चक्कर में हम सही ढंग से मिल रहा 'थोड़ा' या 'पर्याप्त' ठुकरा देते हैं, और इस कारण भी बेरोजगारी जैसे संकट में भी पड़ जाते हैं या बहुत घाटा उठा जाते हैं. फलतः अनेकों मानसिक या मनोदैहिक रोगों को न्योता दे बैठते हैं. अपने शरीर और परिवार की आवश्यकताओं के अनुरूप जरूरी भौतिक संसाधन जुटाना कोई बुरी बात नहीं, ...लेकिन लिप्सा में पड़कर उन आवश्यकताओं को विलासिता की हद तक विस्तारित करना दुखों को आमंत्रित करना ही है. उदाहरण के लिए-- "कहते हैं, जल ही जीवन है, ...तो क्या हम बहुत सारा पानी एकसाथ पी सकते हैं?" क्या हम शरीर (पेट) की भूख से बहुत अधिक मात्रा में इकट्ठा खा सकते हैं?? यदि आवश्यकता से बहुत अधिक पानी पियेंगे या खाना खायेंगे तो संकट में पड़ जायेंगे!!! ...ठीक ऐसा ही विलासिता की चीजें आवश्यकता से अधिक जुटाने पर भी होता है, उसका भी साइड इफ़ेक्ट होता है, पर वो हम नजरअंदाज कर देते हैं, और साइड इफ़ेक्ट के तौर पर मन की शांति खो बैठते हैं! उदाहरण के लिए-- मेरे परिवार के आकार के अनुसार मानों मुझे एक गेस्ट-रूम सहित तीन-चार कमरे का मकान पर्याप्त है, तो फिर यदि मैं दस कमरे का मकान खरीद लेता हूँ तो उसकी देखरेख, सफाई, मेंटेनेंस आदि पर समय, ऊर्जा व धन आदि क्या अधिक खर्च नहीं करना पड़ेगा!? उस धन को जुटाने के लिए क्या अधिक मेहनत और जोड़तोड़ नहीं करना पड़ेगा? क्या उस एक्स्ट्रा मेहनत या जोड़तोड़ की कोई सार्थकता बता सकते हैं??? इन्वेस्टमेंट के पॉइंट ऑफ़ व्यू से हम अनेक प्लाट, जमीनें आदि खरीद लेते हैं और उनकी सुरक्षा, देखरेख आदि के लिए हमारी रातों की नींदें हराम हो जाती हैं. पैसों से तो हम अमीर हो जाते हैं, लेकिन मन की शांति और आनंद के दृष्टिकोण से गरीबी हमपर हावी होने लगती है! हाँ, किसी बहुत ही नेक इरादे से ज्यादा काम करना, और ज्यादा कमाना हमें और अधिक आनंदित कर सकता है! लेकिन अनावश्यक संग्रह से हमें फिर भी दुःख ही पहुंचेगा.

(१०) आध्यात्मिक चर्चा में - अध्यात्म से सम्बन्धित प्रश्न क्यों नही पूछते हैं?
बिलकुल सही है आपका कहना. यहाँ नौकरी कैसे मिले, रोजगार में कैसे तरक्की हो जैसे गैर-आध्यात्मिक प्रश्नों के अतिरिक्त अन्य भी बहुत से ऐसे मुद्दे लिखे जाते हैं जिनका अध्यात्म से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता! अध्यात्म का शुद्ध अर्थ आखिर है क्या, केवल इसी पर एक लम्बी चर्चा हो जाये तो लोगों को कुछ बुनियादी बातें पता चल जायें! ..अध्यात्म से परिचय दरअसल हमारे व्यावहारिक जीवन को भी बहुत प्रकाशित करता है, उसे संवारता है. लेकिन श्रीमान् जी, साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि आध्यात्मिक चर्चा से क्या व्यवहार यानी असल भौतिक जीवन में भी कुछ सुधार आ रहा है या नहीं! केवल अनुष्ठान, ध्यान, साधना आदि ही इस बात के सूचक नहीं हैं कि हम साधक हैं और हम अध्यात्म से जुड़े हैं! बल्कि हमारे आम जीवन में नैतिकता की मात्रा यह निर्धारित करती है कि हम कितने आध्यात्मिक हैं! हमारी नैतिकता ही हमारी आध्यात्मिकता का दृश्य पैमाना है! ...अतः नैतिक गुणों या नैतिक मूल्यों की चर्चा भी एक प्रकार से आध्यात्मिक चर्चा ही होगी!

(११) भगवान् पर हमेशा भरोसा और विश्वास बना रहे इसलिए क्या किया जाये, क्योंकि निराशा के कारण भरोसा कम होता जाता है!?
भगवान् और भगवान् द्वारा बनाई गयी इस प्रकृति के नियम व सिद्धांत बहुत ही भरोसे और विश्वास के लायक हैं! इनके अनुसार हमें मिलने वाले हर दुःख और हर सुख के पीछे कारण के तौर पर कहीं न कहीं हम भी जुड़े होते हैं. जरा सोचिए- भगवान् कैसे हैं? भीतर से जवाब आएगा- बहुत ही नेक-दिल, विनम्र, सत्य को पसंद करने वाले एवं न्यायप्रिय. भगवान् यदि बहुत अच्छे व्यक्तित्व के स्वामी हैं तो वो हमसे क्या उम्मीद रखते होंगे? जवाब यह होगा कि- अच्छी सोच, नेक व्यवहार और ईमानदारी व लगन के साथ हर एक काम को करना! यदि हम इस प्रकार से हैं तो हम ऐसे ही नेक और कर्मठ बने रहकर यह भरोसा रख सकते हैं कि हमारे भी अच्छे दिन जरूर आयेंगे! लेकिन, यदि हमारी सोच और काम में मिलावट है तो हमारे दुःख बढ़ेंगे ही, घटेंगे नहीं; चाहे हम कितनी भी पूजा और किसी पंडित से कितने भी अनुष्ठान करवा लें! भगवान् एक ऐसा राजा है जो अपनी जयजयकार, फूलमाला व प्रसाद आदि चढाने आदि से खुश नहीं होता बल्कि वह हमारे अच्छे कामों और अच्छी सोच से प्रभावित होता है! वह चापलूसी पसंद राजा नहीं है! हम हर पल उसकी निगाह में हैं! अतः भरोसा रखिये निराशा के बादल एक दिन जरूर छटेंगे! जरूरी नहीं कि दुःख अभी के कर्म की वजह से हों, वो पुराने किसी कर्म की वजह से भी हो सकते हैं जो आपकी यादाश्त में ही नहीं! ..पर दुःख है तो कारण भी हम ही! ..आगे सुख आएगा तो भी कारण हम ही! ऐसा विश्वास रखेंगे तो दुःख परेशान नहीं कर पाएगा! सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं! आजके किये अच्छे का अच्छा फल आने में कुछ देर हो सकती है पर वो आएगा जरूर, चाहे वो किसी बदले हुए रूप में आए. अच्छा बन के और अच्छा करके भरोसा रखें कि अवश्य ही भगवान् इसे एक दिन ब्याज-समेत लौटायेंगे!

(१२) आज हमारे विद्यालय बच्चों के लिए असुरक्षित क्यों बनते जा रहे हैं...?
सामान्य समाज में भी तेजी से फैल रहा नैतिक पतन इसका एकमात्र कारण है! बस कहने को ही हम विकसित हो रहे हैं! विकास के साथ जब तक नैतिकता संलग्न न हो, वो विकास नहीं अभिशाप है!
आज के अधिकांश प्राइवेट स्कूल शिक्षा की दुकानें बनकर रह गए हैं. और अधिकांश अभिभावक भी मात्र मोटी फीस देकर निश्चिन्त होकर बाकी चीजों से मुंह मोड़ लेते हैं! सब अति व्यस्तता का रोना रोते हैं, ...लेकिन यह अति-व्यस्तता क्यों है? यदि हम व्यस्तता के क्षणों की गुणवत्ता का लेखाजोखा करें तो पता चलेगा कि कुछ बेवजह की व्यस्तता हमें नैतिकता की पटरी से नीचे उतार रही है! हम अभिभावक हों या स्कूल का स्टाफ, सभी आज नीचे को जा रहे हैं, लेकिन अपने व अपनों के लिए बेहतरी की उम्मीद पालते हैं! समाज में नैतिकता के ह्रास का प्रदूषण यदि फैलेगा तो चपेट में हम भी आयेंगे ही! भूकंप में पृथ्वी यदि डोलेगी तो झटका हमें भी लगेगा ही! हम सामाजिक प्राणी हैं, हमें समाज से सरोकार होता है, तो उसको ठीक करने की कोशिश क्यों नहीं करते? कुछ खुद सुधरें और कुछ औरों को भी प्रेरित करें, उस बेवजह की व्यस्तता को कम करें जो हमें और समाज को रसातल में लेकर जा रही है.
पुनः एक पाठक का कमेंट-- साइंस बरदान है या अभिशाप, इसे तर्क से आप स्वयं खुद से पूछें.
मेरा उत्तर-- हमने एक बार भी नहीं कहा कि साइंस अभिशाप है! हमने कहा कि जिस तरह से विकास हो रहा है, उस क्रम में हम नैतिकता को समानांतर रूप से नहीं लेकर चल रहे हैं, फलस्वरूप आपाधापी वाला विकास अभिशाप सिद्ध हो रहा है। विज्ञान तो अतुलनीय सिद्धांतों का पिटारा है भाई जी; उसमें कोई भी कमी नहीं। हां, उसको अप्लाई करने के हमारे ढंग में त्रुटि संभव है। जैसे परमाणु ऊर्जा का आविष्कार विज्ञान की एक बड़ी देन है। अब कुछ लोग इससे बिजली उत्पादन जैसा उपयोगी कार्य करते हैं, तो कोई विध्वंसक बम बनाता है। ऐसे ही इंटरनेट एक वैज्ञानिक खोज है; कोई इसे ज्ञान और उपयोगी जानकारियां हासिल करने के लिए इस्तेमाल करता है, तो कोई वीडियो गेम और अन्य समय-नाशक दुरुपयोग के लिए। विज्ञान ने हमको ताकत दी है विकास करने की। अब हमारे ऊपर है कि हम इस ताकत का सदुपयोग करें या दुरुपयोग। विज्ञान रूपी सिद्धांत गलत नहीं, उसे प्रयोग करने वाला हमारा विवेक सही या गलत होता है।

(१३) संसार को सुख पहुँचाना ही परमात्मा को सुख पहुँचाना है!?
जी हाँ, बिलकुल! ...मेरे विचार से इस संसार को परमात्मा ने ही रचा है, तो परमात्मा की कृति को कोई नुकसान या दुःख पहुँचाने की हम सोच भी कैसे सकते हैं? परमात्मा द्वरा रचित सभी स्थूल (भौतिक) चीजों में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है और सूक्ष्म चीजों में श्रेष्ठ है मनुष्य देह में उपस्थित आत्मा! मानव देह व आत्मा के अलावा भी सबकुछ यद्यपि परमात्मा द्वारा रचित है और हमें उनका भी ध्यान रखना है, तथापि वरीयता क्रम में अन्य सभी का नंबर मनुष्य और मनुष्यता के पश्चात् ही आता है. हम यह पहली चीज साध लेंगे तो अन्य स्वतः ही सध जायेंगी.

(१४) क्या स्वयं से संन्यास लेना सम्भव है? यदि हाँ, तो कैसे?
संन्यास से आपका क्या अर्थ है? यदि संन्यास से आपका अर्थ यह है कि घरद्वार छोड़कर हरिद्वार, काशी आदि जैसे तीर्थस्थलों में जाकर किसी आश्रम या मठ आदि में रहना, ..तो मेरा उत्तर होगा कि यह केवल नाम का (स्थूल) संन्यास होगा! असली संन्यास वो भी नहीं जिसके लिए बहुत से तथाकथित संत-महात्मा आह्वान करते हैं कि चल-अचल संपत्ति आश्रम के नाम कर दो और यहाँ आकर सेवा करो! .....संन्यास लेने का वास्तविक अर्थ है कि- अपनी दुनियावी इच्छाओं-आकांक्षाओं को उम्र बढ़ने के साथ सीमित करते जाना; किसी वस्तु या व्यक्ति का त्याग नहीं बल्कि उनके प्रति आसक्ति (संग्रह की प्रवृत्ति व मोह आदि का) का त्याग करना; संन्यास का अर्थ जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना नहीं बल्कि जिम्मेदारियों को बिना किसी लालच या स्वार्थ आदि के और अधिक लगन से निभाना है! यानी, ...लालच, स्वार्थ, अनावश्यक संग्रह, मोह, और आसक्ति आदि को क्रमशः त्यागना ही वास्तविक संन्यास है! ...और यह स्वयं से संभव है. सौ प्रतिशत!

(१५) पश्चिमी सभ्यता की नक़ल समाज को किस प्रकार दुष्प्रभावित कर रही है..?
माफ़ कीजियेगा, ..यहाँ आप कुछ वह गलती कर रही हैं जो हमारे रूढ़िवादी 'बड़े' लोग (नेता व साधू-संत) करते आए हैं कि आज हमारे समाज में व्याप्त विभिन्न बुराईयों का ठीकरा सीधे-सीधे पश्चिमी सभ्यता के सिर मढ़ देना! यदि एक बार को हम यह मान भी लेते हैं कि हमारे समाज में आज व्याप्त भ्रष्टाचार, अनैतिकता, व्यभिचार, खून-खराबा, समय की बर्बादी आदि अवगुण पश्चिमी सभ्यता की देन हैं, ..तो यह भी तुरंत मान लेना पड़ेगा कि पश्चिमी देशों के समाज में भी उपरोक्त अवगुण प्रचुर मात्रा में हैं!!! तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि आज अधिकांश पश्चिमी देश बहुमुखी विकास कर चुके हैं या तेजी से कर रहे हैं! ...क्या इन अवगुणों के साथ उनका यह विकास संभव हो पाता??? हम देखते हैं कि उनके यहाँ कानून और न्यायव्यवस्था बहुत बेहतर है, हर चीज का परेशानी-रहित एक सटीक सिस्टम है; वहां एक दुर्घटनाग्रस्त घायल को चिकित्सीय सुविधाएं तुरंत और परेशानी-रहित तरीके से मुहैया होती हैं; बीमा-क्लेम या बैंकिंग सिस्टम भी बहुत पारदर्शी और परेशानी-रहित है; विभिन्न टैक्स भी लोग ईमानदारी से भरते हैं; एक इनोसेंट पर्सन के लिए कानूनी पेचीदगियां बिलकुल नहीं हैं, लेकिन एक अपराधी का बच पाना बेहद मुश्किल है; जो भी लॉ एंड आर्डर का ईमानदारी से पालन करता है वह खुद को सामान्यतः बहुत प्रोटेक्टेड और सेफ फील करता है; आम जनता में अनुशासन और केयरिंग की भावना साफ दिखती है, कोई लाइन तोड़कर पहले जाने की जद्दोजहद करता नहीं दीखता, बुजुर्गों और प्रेगनेंट महिलाओं को लोग आउट ऑफ़ टर्न पहले मौका देते हैं; संसद में एक-दूसरे के ऊपर कुर्सियां नहीं फेंकी जातीं; राजनीति में अधिकांशतः दो ही प्रमुख राष्ट्रीय दल होते हैं, हर नेता अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग अलापता नहीं दिखता, शालीनता से बहस करने की कोशिश रहती है; डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक अपना-अपना काम निष्ठा व लगन से करते हैं, इसीलिए वहां मानव-त्रुटि के कारण आकस्मिक मृत्यु या दुर्घटनाएं लगभग नगण्य हैं; .....अब फाइव डे वीक में वो पांच दिन डट के काम करते हैं और फिर जो दो दिन वे मौज-मस्ती करते हैं उसमें कम से कम एक दिन वे पूरे परिवार के साथ बिताते हैं; वर्क फ़ोन और पर्सनल फोन अलग होता है तथा इसी प्रकार वर्किंग लाइफ और पर्सनल लाइफ भी; हौचपौच, व्यर्थ की भागादौड़ी, ट्रेनों में शोरशराबा विरले ही देखने को मिलता है; एक ही धर्मग्रन्थ से बहुत कुछ व्यावहारिक शिक्षा ले लेते हैं; अन्य धर्मों के प्रति उचित सहिष्णुता देखने को मिलती है; विश्व में कहीं भी कोई त्रासदी या प्राकृतिक आपदा आए तो वो सच्ची मदद पहुँचाने की चेष्टा करते हैं!!! ...इतने ही उदाहरण काफी हैं यह बताने के लिए कि बहुत से महत्वपूर्ण मामलों में निःसंदेह वे हमसे बेहतर हैं, इसीलिए वे विकसित राष्ट्र हैं! ...और हमपर वर्षों से विकासशील का तमगा लगा हुआ है! क्यों??? ...क्योंकि हम 'श्रीकृष्ण' की भी केवल रासलीला को ही देखते हैं वो भी व्यभिचारी दृष्टि से; ...पता नहीं कहाँ से सुना और सीखे लेकिन निश्चित ही बहुत से नशेड़ी भी भांग, धतूरा, मद्य, चरस, गांजा और अन्य अनेक नशीली चीजें 'शिवजी' के नाम पर लेते हैं (बाबा और भक्त दोनों), ...मौके-माहौल के हिसाब से हमारी वरीयताएं झट से बदल जाती हैं! ....दरअसल हमने उपर्लिखित दूषित प्रवृत्ति से अभी तक पश्चिमी सभ्यता में भी बुरा ही खोजा और उसे फ़ौरन अपना लिया, लेकिन अच्छे को देख ही नहीं पाए, ...या देखना ही नहीं चाहते! देखिये, ...अच्छा और बुरा हर जगह होता है, हर सभ्यता के कुछ गुण या दोष हैं; ...लेकिन असली विकास वहीं होता है जहाँ अच्छाई, बुराई पर हावी रहे! पश्चिमी विकसित देशों में अच्छाईयाँ, बुराईयों से अधिक हैं और वे बुराई पर हावी हैं; जबकि हमारे यहाँ बुरे से बुरा खोजकर उसे अपनाने की दूषित प्रवृत्ति है, इसीलिए हम दिनप्रतिदिन खोखले विकास की ओर अग्रसर हैं.