Thursday, July 30, 2009

(१९) खान-पान और धर्म

मैं कई धार्मिक मार्गदर्शकों से अक्सर मिला करता हूँ, विभिन्न सत्संगों में भी जाता रहता हूँ। वर्तमानकाल में भारत में मैंने लगभग सब धार्मिक दर्शनों (विचारों) में एक समान बात देखी है कि आज किसी व्यक्ति में धार्मिकता विद्यमान होने का पैमाना या मापदण्ड सर्वप्रथम उस व्यक्ति का खान-पान आदि ही माना जाता है। लोग इसी प्रकार से बात करते हैं कि अमुक व्यक्ति बहुत अच्छा व धार्मिक वृत्ति का है, क्योंकि वह तम्बाकू, मद्यपान व सामिष भोजन आदि से बिलकुल परहेज रखता है! धार्मिकता के मापदण्ड की सामान्यतः जब ऐसी सोच समाज में विकसित हो जाती है या हो ही गयी है, तो इन वस्तुओं का यदा-कदा सामयिक सेवन करने वाला व्यक्ति यह विचार करने को बाध्य हो जाता है कि या तो तथाकथित धार्मिक मापदण्ड गलत हैं और सम्बंधित व्यक्ति ढोंगी है, या मैं ही अत्यंत मैला हूँ। तात्पर्य यह कि उसमें खीज, क्रोध या हीन भावना का अंकुरण हो सकता है। होता तो बहुधा यही है कि वह किसी भी तथाकथित धार्मिक सम्प्रदाय या समाज से भलीभांति घुलमिल नहीं पाता। जग-निन्दा से बचने या सामाजिक निर्बन्धों के चलते वह विभिन्न सत्संगों या धार्मिक कृत्यों में सहभागी तो होता है, पर ऊपरी तौर पर ही। मानसिक विरोध या हीन भावना से वह परे नहीं रह पाता। कितनी घोर विडम्बना है कि आज किसी व्यक्ति में धार्मिकता का अनुमान मात्र उसके खान-पान से लगाया जाता है, उसके अन्य अच्छे कृत्यों पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है, उसके हृदय की गहराइयों में नहीं झाँका जाता है! उस व्यक्ति के मन में अन्यों के प्रति कैसे विचार चलते हैं, अन्यों के प्रति उसका आचरण कैसा है, वह सत्य और न्याय के पथ पर चलता है कि नहीं, नैतिक गुणों का कितना धनी है अर्थात् यथार्थ सदाचार उसके कृत्यों से परिलक्षित होता है अथवा नहीं, इन सब बातों पर कोई धार्मिक सौदागर गौर नहीं करता है।

जब धर्म के क्षेत्र में तथाकथित मूल्यांकन करने वालों द्वारा सदाचार के उपरोक्त पहलुओं पर ध्यान न देकर केवल खान-पान जैसे सामान्य कृत्यों पर ही प्रथम विचार किया जाता है तो अधिकतर व्यक्ति उनके संसर्ग में आने से पहले ही वाह्य धर्म कृत्यों से किनारा कर लेते हैं। कुछ केवल ऊपरी तौर पर धार्मिक कृत्यों में सहभागी होते हैं व छद्म रूप से स्वयं को परहेजी बताते हैं। और कुछ ऐसे भी होते हैं जो वर्ज्य (?) खान-पान को त्याग कर इन धार्मिक लोगों की संगत ग्रहण करते हैं। पर बहुत शीघ्र ही उनका मोह भंग हो जाता है, जब उनको यह पता चलता है कि ऊपर से कुछ वाह्य कृत्यों से वर्जन रखने वाले ये तथाकथित धार्मिक भीतर से या अन्य कृत्यों की दृष्टि से कितने खोखले व मैले हैं। ... और तब व्यक्ति न केवल उस छद्म सत्संग का परित्याग कर देता है, वरन प्रचलित धर्म के प्रति उसमें निराशा व क्षोभ उत्पन्न हो जाता है, फलस्वरूप वह अन्यों को भी उनके विरुद्ध करने हेतु प्रेरित करता रहता है। ... उधर वे तथाकथित धार्मिक भी उस व्यक्ति के विरुद्ध कुछ ऐसा ही अभियान सर्वदा चलाते रहते हैं, उसकी खान-पान पद्धति को कोस कर, निम्न व हेय ठहरा कर, उसको पापी-दुराचारी सिद्ध करने में लगे रहते हैं।

मेरे विचार से यदि हम धर्म के लक्षणों में व्यक्ति या समाज की खान-पान संस्कृति को सर्वप्रथम रखते हैं, तो हमें भारत के कुछ भूभाग या जनसंख्या को छोड़ कर लगभग शेष विश्व को अधर्मी घोषित करना पड़ेगा, और यदि हम ऐसा करते हैं तो हमसे बड़ा मूर्ख व अहंकारी और कोई नहीं होगा! लगभग सभी विकसित देशों व उनके भले नागरिकों को केवल खान-पान के आधार पर अधार्मिक घोषित कर हम केवल अपने अहम् का ही पोषण करेंगे, इससे यथार्थ नहीं बदल जायेगा। मेरा दृढ़ता से यह मानना है कि खान-पान सम्बन्धी वाह्य कृत्य मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करते हैं -- (१) जलवायु, (२) कार्य की परिस्थितियां, (३) संस्कृति व धार्मिक विश्वास।

(१) जलवायु और खान-पान पद्धति का परस्पर बहुत गहरा सम्बन्ध है। बहुत से देशों में तापमान बहुत कम (अधिकांशतः ५ डिग्री सेल्सियस से भी कम) और कभी शून्य से भी कम रहता है, बहुत से स्थानों पर वनस्पतियों आदि का उत्पादन अधिक नहीं हो पाता है, वहां के निवासियों के लिए उदर-पूर्ति हेतु सामिष भोजन व शरीर को गर्म रखने हेतु मद्य (liquor, wine, alcohol) का दवा के रूप में नियंत्रित व सुसभ्य सेवन अनिवार्य सा हो जाता है, अन्य सस्ते विकल्प के रूप में कुछ लोग नियंत्रित धूम्रपान भी करते हैं। यह सब उनके जीवित, स्वस्थ व सामान्य रहने के लिए आवश्यक सा होता है। कुछ गर्म परन्तु तटीय क्षेत्रों में, मरुस्थलों में, बंजर भूभागों में व पर्वतीय क्षेत्रों आदि में खेती बहुत दुरूह या असंभव होती है, अतः वहां के निवासियों को अनाज, दालें, खाद्य वनस्पतियाँ सरलता से उपलब्ध नहीं होतीं और वे अधिकतर सामिष भोजन पर ही निर्भर रहते हैं। वैसे यह सब जो मैं लिख रहा हूँ, उन तथ्यों से अधिकांश लोग भली-भांति परिचित ही होंगे, अतः विचार के अगले बिन्दु पर चलते हैं।

(२) कार्य की परिस्थितियां भी खान-पान पर बड़ा असर डालती हैं। जैसे - जो सात्त्विक माहौल में रहते हैं, ब्राह्मण वर्ण का कार्य करते हैं, धर्म-शिक्षण या विद्यादान आदि की सेवा करते हैं, उन्हें शारीरिक श्रम अधिक नहीं करना पड़ता, अतः वे सामान्य निरामिष भोजन पर आश्रित रह अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। सामिष भोजन व तम्बाकू, मद्य आदि रज-तमात्मक हैं। संभवतः इसीलिए संस्कृति व धर्मानुसार भी ब्राह्मण वर्ण में सामिष भोजन व धूम्र / मद्यपान आदि वर्जित माना गया है! पर जिन लोगों को लगातार रज और तम की परिस्थितियों में रहकर कठोर श्रम करना पड़ता है, उन्हें रज व तम के प्रभाव से जूझने हेतु रज-तमात्मक भोजन की आवश्यकता पड़ती है। पुरानी कहावत है - लोहे को लोहा ही काट सकता है! बहुत अधिक शारीरिक श्रम एवं कठोर व विषम कार्य परिस्थितियों के बीच कार्य करने वाले व्यक्तियों को तुंरत व अधिक बल-उर्जा आदि हेतु सामिष भोजन व अन्य मद्य, तम्बाकू जैसे उत्तेजक पदार्थों का सीमित सेवन करना कभी-कभी अपरिहार्य हो जाता है। पर जागरूक, सुसंस्कृत व सचेत रहने वाले इन पदार्थों के अनिष्टकारी पहलुओं से यथासंभव बचे रहते हैं। इन परिस्थितियों में कार्य करने वालों के उदाहरण के रूप में हम मुख्यतः सैनिकों व अन्य क्षात्र वर्ग तथा कुछ हद तक वैश्य व शूद्र-वर्ग को भी ले सकते हैं।

भारत में रज-तमात्मक परिस्थितियों में कार्य करने वालों में मुख्यतः या केवल भारतीय सेना के लोग ही स्थिति-अनुरूप आवश्यक रज-तमात्मक वस्तुओं का नियमित सेवन करने के बावजूद सुसभ्य व जागरूक हैं; अन्य क्षात्र वर्ग, वैश्य वर्ग या शूद्र वर्ग में सेवन के मामले में अनुशासनहीनता व अति दिखाई पड़ती है। संभवतः यह हमारी संस्कृति की ही कमी है या हम परिपक्व नहीं हैं।

(३) किसी समाज की खान-पान पद्धति पर उस भूभाग की संस्कृति व धार्मिक विश्वास भी बहुत प्रभाव डालते हैं। संस्कृति को ही ले लें तो कहीं खुशियों या कुछ विशेष अवसरों पर मद्य का संतुलित सेवन शुभ व अनिवार्य माना जाता है, तो कहीं पर अन्य कृत्य किये जाते हैं। ऐसे ही संस्कृति दर संस्कृति बहुत से अन्य कृत्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं। कोई कृत्य एक स्थान पर सभ्यता की निशानी माना जाता है, तो किसी अन्य स्थान पर वह असभ्यता का सूचक होता है। पर फिर भी सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उस कृत्य या किसी भी कृत्य को करते समय हमारे दिल की भावनाएं कैसी हैं, वे स्वच्छ हैं या नहीं स्वयं या अन्यों के प्रति?? कुछ भी करते समय यदि हममें मानसिक व आत्मिक स्वच्छता कायम रहती है, अपने व दूसरों के स्थूल देह को कोई क्षति नहीं पहुंचा रहे होते, यहाँ तक कि भावनाएं भी आहत न हों इस बात का भी पूरा ध्यान रखते हैं, तो माना जा सकता है कि उस समय हम अधार्मिक नहीं हैं; वह तो बस संस्कृति-अंतर्गत शारीरिक व मानसिक प्रसन्नता हेतु कृत्य कर रहे होते हैं।

भारत में पहले धर्म और संस्कृति एक ही थे। पूर्वकाल में लोग बहुत धर्मभीरु थे, धर्म के नाम पर कुछ भी करने को तत्पर रहते थे। अतः उस काल में तत्कालीन प्रबुद्धों व ज्ञानियों को सर्वहित में जो उचित जान पड़ता था, उसे वे धर्म के साथ जोड़ देते थे। इस प्रकार लोग अनुशासित रहते थे, साथ ही सदाचारी रहते थे। पर कालांतर में सर्वसाधारण की मन, बुद्धि आदि का बहुत विकास हो जाने से लोग निरंकुश हो गए व मनमाना आचरण करने लगे। समयानुसार व परिस्थिति-अनुसार योग्य मार्गदर्शन के अभाव में उन्हें लगने लगा कि धर्म के साथ खान-पान का कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि हमारे ही धार्मिक ग्रंथों में व विचारकों के वक्तव्यों में कहीं-कहीं बहुत विरोधाभास था। वैज्ञानिक शिक्षा कुछ और ही कहती थी।

पाश्चात्यों और विकसित देशों ने वैज्ञानिक मतानुसार अपनी जीवन-शैली व खान-पान में उचित परिवर्तन किये। अनुचित पर वे विविध प्रतिबन्ध भी लगाते रहते हैं, जैसे सार्वजनिक स्थानों पर धूम्र व मद्यपान पर प्रतिबन्ध; इसके अतिरिक्त फास्ट फ़ूड व कोल्ड-ड्रिंक आदि के सेवन को हतोत्साहित करना, खाद्य-पदार्थों के उच्च-मानक तय करना आदि।

हम भारत के पुरातन धर्मग्रंथों का सूक्ष्म अवलोकन करें तो पायेंगे कि कालानुसार, परिस्थिति-अनुसार हमारे तत्कालीन धर्माप्रमुखों की सोच धीरे-धीरे बदली, फलस्वरूप नए सम्प्रदायों व नए धर्मग्रंथों का सृजन हुआ, क्योंकि उसी सम्प्रदाय में रहते हुए परिवर्तन करना बहुत दुष्कर होता है। भारत में पाए जाने वाले परस्पर विरोधी विभिन्न धार्मिक दर्शन, काल-परिवर्तन की ही उपज हैं। पर फिर बीच में जड़ता का एक बहुत बड़ा काल आ गया; बस वहीं से हम पिछड़ गए, हमारी सोच पिछड़ गयी। पिछड़ने के कारण अब हम बस अन्धानुकरण ही करते हैं, कृत्य के साथ संलग्न अनुशासन व सभ्यता का ध्यान कतई नहीं रखते हैं।

इतने परिवर्तनों के बाद भी भारत में वर्तमान धार्मिक सम्प्रदाय या धर्म-मार्गदर्शक अभी भी खान-पान सम्बन्धी कुछ जड़ मान्यताओं पर ही विश्वास करते-कराते हैं और उन्हें ही धार्मिकता का सबसे बड़ा पैमाना मानते हैं। यह हमारी जड़ता का द्योतक है। यह बात ठीक है कि यदि हमें विश्वास है कि निज-धर्मानुसार सामिष वर्ज्य है, तो उससे परहेज करना चाहिए, पर अन्य कोई अपने वैयक्तिक विश्वास के चलते यदि सामिष ग्रहण कर रहा हो, तो हमें उसके विश्वास को कमजोर या हेय नहीं समझना चाहिए। वाह्य धर्म-कृत्य व विश्वास समुदाय दर समुदाय भिन्नता लिए होते हैं।

बाइबल में इस विषय पर बहुत सुन्दर लिखा है -- "मत्ती" के अध्याय-१५ के वचन संख्या १७ से १९ -- "१७ क्या नहीं समझते, कि जो कुछ मुंह में जाता है, वह पेट में पड़ता है, और सण्डास में निकल जाता है? १८ पर जो कुछ मुंह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। १९ क्योंकि कुचिन्ता, हत्या, परस्त्रीगमन, व्याभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा मन से ही निकलती है।" .... इसके अतिरिक्त "रोमियों" के अध्याय-१४ के वचन संख्या -- १ से ३, ६, १४, १५, १९ से २३ में लिखा है -- "१ जो विश्वास में निर्बल है, उसे अपनी संगति में ले लो; परन्तु उसकी शंकाओं पर विवाद करने के लिए नहीं। २ क्योंकि एक को विश्वास है कि सब कुछ खाना उचित है, परन्तु जो विश्वास में निर्बल है, वह साग-पात ही खाता है। ३ और खाने वाला न-खाने वाले को तुच्छ न जाने, और न-खाने वाला खाने वाले पर दोष न लगाये; क्योंकि परमेश्वर ने उसे ग्रहण किया है। ६ जो किसी दिन को मानता है, वह प्रभु के लिए मानता है; जो खाता है, वह प्रभु के लिए खाता है, क्योंकि वह परमेश्वर का धन्यवाद करता है, और जो नहीं खाता, वह प्रभु के लिए नहीं खाता, और परमेश्वर का धन्यवाद करता है। १४ मैं जानता हूँ, और प्रभु यीशु से मुझे निश्चय हुआ है कि कोई वस्तु अपने आप से अशुद्ध नहीं, परन्तु जो उसे अशुद्ध समझता है, उसके लिए अशुद्ध है। १५ यदि तेरा भाई तेरे भोजन के कारण उदास होता है, तो फिर तू प्रेम की रीति से नहीं चलता : जिसके लिए मसीह मरा उसको अपने भोजन के द्वारा नाश न कर। १९ इसलिए हम उन बातों का प्रयत्न करें, जिनसे मेल-मिलाप और एक-दूसरे का सुधार हो। २० भोजन के लिए परमेश्वर का काम न बिगाड़ : सब कुछ शुद्ध तो है, परन्तु उस मनुष्य के लिए बुरा है, जिसको उसके भोजन करने से ठोकर लगती है। २१ भला तो यह है, कि तू मांस न खाए और न दाख-रस पिए, न और कुछ ऐसा करे, जिससे तेरा भाई ठोकर खाए। २२ तेरा जो विश्वास हो, उसे परमेश्वर के सामने अपने ही मन में रख; धन्य है वह, जो उस बात में, जिसे वह ठीक समझता है, अपने आप को दोषी नहीं ठहराता। २३ परन्तु जो सन्देह करके खाता है, वह दण्ड के योग्य ठहर चुका : क्योंकि वह निश्चित धारणा से नहीं खाता और जो कुछ विश्वास (निश्चय) से नहीं, वह पाप है।।"

अंत में निष्कर्ष यही निकलता है कि आधुनिक विज्ञान व धार्मिक विश्वास दोनों में सामंजस्य बैठाते हुए हमारी जो निश्चित या योग्य धारणा (निश्चय) बने, विश्वास बने, उसी के अनुरूप हमें अपनी खान-पान पद्धति विकसित करनी चाहिए। ... और इस प्रकार विश्वासानुसार बरतते हुए अपने कृत्य को कमजोर या हेय नहीं समझना चाहिए, जग-निन्दा के भय से उसे छुपाना नहीं चाहिए, यह गलत होगा। इसके अतिरिक्त अन्यों के विश्वास को भी कमजोर न समझते हुए हमें उनका उचित आदर करना चाहिए। नम्रता का गुण दिखाते हुए, परेच्छा का ध्यान रखते हुए यदि हम अपना कोई कृत्य अस्थाई रूप से स्थगित कर सकते हैं तो अवश्य करना चाहिए। मैं परेच्छानुसार वर्तन में अन्यों के विश्वासानुसार निज खान-पान में कुछ जोड़ने की बात नहीं कर रहा हूँ, वरन अस्थायी तौर पर कुछ त्यागने की बात कर रहा हूँ। संभवतः यह सबके लिए सरल व अनापत्तिजनक रहेगा। नम्रता के अतिरिक्त यह कृत्य हमारे लचीलेपन व व्यापकता के गुण को प्रकट करेगा।

हाँ, ऊपर एक स्थान पर, मेरे विचार से प्रारम्भ में ही कहीं, मैंने प्रसंगवश रज-तमात्मक परिस्थिति को रज-तम से, या लोहे को लोहे से काटने की बात लिखी है। इसे व्यापक रूप से इस प्रकार समझने का प्रयत्न करें -- शारीरिक, मानसिक या जलवायु-सम्बन्धी कठिन / विषम परिस्थितियां माने रज-तम अर्थात् लोहा; और वह लोहा लकड़ी के एक मेज पर रखा है। लकड़ी का मेज माने हमारे सत्त्व गुण। लोहे (रज-तम) को हम एक और लोहे (रज-तमात्मक पदार्थ जैसे - सामिष भोजन व मद्य आदि) से काटते हैं अर्थात् दूर करते हैं। पर हमें यह अवश्य ध्यान रखना होगा कि काटने वाले लोहे की आरी आवश्यकता से अधिक न चल जाये, अन्यथा लकड़ी की मेज भी कट जायेगी अर्थात् हमारे सत्त्व गुण क्षतिग्रस्त हो जायेंगे। अतः रज-तम को काटने के लिए सन्तुलित रज-तम का ही प्रयोग करना चहिये, अन्यथा सत्त्व को हानि पहुँच सकती है। हमें सत्त्व को हर हाल में बचा कर रखना है। परिस्थिति-अनुसार सब कुछ उचित हो सकता है, पर समतौल के साथ, संतुलन के साथ। ... और जैसे ही हमें यह भान हो कि अमुक वस्तु हमारे स्वयं या अन्यों के लिए अब घातक सिद्ध हो रही है, तुंरत उसका परित्याग कर देना चाहिए। वैसे हमारे वैज्ञानिक और उन्नत देशों की सरकारें इस प्रकार की सोच के लिए अब निरन्तर जागरूक रहते हैं। समय-समय पर वे लोकहित हेतु खान-पान की नयी नीतियाँ प्रतिपादित करते रहते हैं। हमें चाहिए कि हम उनकी सिफारिशों, सलाहों व अनुमोदनों के प्रति सचेत रहे व समय रहते उन्हें अपने व्यवहार में शामिल करें।

... पर पुनः यह अच्छे से ध्यान में रखें कि खरा धर्म हमारे खान-पान से नहीं, वरन दूसरों के प्रति हमारी सोच व हमारे व्यवहार / आचरण आदि से परिलक्षित होता है। इस विषय में संक्षिप्त सारगर्भित विचार आप पहले भी एक लेख 'आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ अर्थात्' में पढ़ चुके हैं। इति।

Friday, July 24, 2009

(१८) हमारी जड़ता के कारण

हमने पिछले कई लेखों में भारतीयों, विशेषकर उत्तर भारत की अवनति के विषय में काफी चर्चा की। अब हम भारत की इस वर्तमान दुःखद परिस्थिति को कुछ अन्य बिन्दुओं या कोणों से समझने का प्रयत्न करते हैं।

जैसा कि सर्वविदित है कि हमारा राष्ट्र बहुत वर्षों तक परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। परतंत्रता के कारणों में भी झांकें तो हम पायेंगे कि हमारी परतंत्रता का मुख्य कारण हमारी ही बहुत सी कमजोरियां थीं। इंग्लैंड से ईस्ट इंडिया कम्पनी अपना व्यापार बढ़ाने ही तो सर्वप्रथम भारत में आयी थी। उनका मुख्य लक्ष्य तब मात्र व्यापार ही था और 'व्यापार' कभी भी दांव-पेंच रहित नहीं होता, यह तत्कालीन भारतीय भी अच्छी तरह से जानते ही होंगे। हमने ही उन्हें आश्रय दिया। उनकी धन-संपदा से, व्यापार करने के ढंग से हम शीघ्र मोहित हो गए। शीघ्र धनी हो जाने के लालच में हमने ही उनकी मदद की, हमने ही उनका माल बेचा। व्यापार करते-करते अंग्रेज हमारी तमाम कमजोरियों से परिचित होते गए। उस समय हम एक नहीं थे, हमारा शासक-वर्ग सत्ता-लोलुपता व विलासिता में डूबा था, पड़ोसी राज्यों में आपस में बनती नहीं थी, सभी निज राज्य-विस्तार के विषय में ही सोचा करते थे, अनेक राजाओं के चारित्रिक रूप से कमजोर होने के कारण राज्य की सेनाओं में भी एकता व स्वामिभक्ति की कमी थी, मंत्रियों या परिवारजनों द्वारा विद्रोह आदि आम बात थे। अंग्रेजों से पहले भी कई बार विदेशी आक्रमणों से आहत भारत की निज-संस्कृति का स्वरूप भी बिगड़ चुका था। विभिन्न जन-जातियों के बीच फूट पड़ी हुई थी, यहाँ तक कि हिन्दू भी एक नहीं थे, वर्णभेद, अस्पृश्यता व तदनुरूप राग-द्वेष अपने चरम पर था। हमारे अगुआ लगातार श्रेष्ठ नीतियों से परे जा रहे थे और फिर विभिन्न आपदाओं से घिर जाने के बाद कठिनाई से उबरने हेतु अंग्रेजों से ही मदद मांगते थे। अक्सर आपसी अनबन व फूट के मामलों में भी हम अंग्रेजी कम्पनी से सहायता माँगा करते थे। फिर अंग्रेज कूटनीति के माध्यम से हमारी समस्याओं को सुलझाते थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी व सम्बंधित अंग्रेजों ने हमारी इन्हीं सब कमजोरियों का लाभ उठा कर अपने व्यापार की जड़ें मजबूती से फैलाने के अतिरिक्त धीरे-धीरे हमारे राज्यों पर कब्जा किया, हमें गुलाम बना हमारे शासक बन बैठे।

कुल मिला कर हमने ही ऐसे संयोग उत्पन्न किये कि अंग्रेज व्यापारियों को भारत पर आधिपत्य जमाने का अवसर प्राप्त हुआ। वे संख्या में हमसे बहुत कम थे पर सुसंगठित थे और हम संख्या में उनसे कई गुना अधिक होने पर भी असंगठित थे, राग-द्वेष में डूबे थे, अशिक्षा व अविद्या की बेड़ियों में जकड़े थे। राम और कृष्ण की धरती के लोग उनके ही उपदेश भूल गए थे। आध्यात्मिक ज्ञान तो बहुत था, पर मात्र शब्दों या यंत्रवत कर्मकांडों तक ही सीमित था। गीता का ज्ञान तो बहुत बघारते थे, कंठस्थ भी थी, पर श्री कृष्ण के प्रवृत्ति व निवृत्ति के उपदेश व्यवहार में न लाते थे। यदि ऐसा न होता तो हमारी भौतिक व आध्यात्मिक प्रगति इतने लम्बे समय थमी न रहती। अध्यात्म के क्षेत्र में विपुल वाद-विवाद व मंत्रणायें होते रहने के बावजूद हम अध्यात्म का व्यावहारीकरण करने में अक्षम सिद्ध हुए। इन्हीं सब कमजोरियों के कारण पिछले काफी वर्षों से न तो हमने अपने भौतिक विकास पर ध्यान दिया था और न ही आध्यात्मिक विकास पर। हम जड़ व स्थिर थे। ... बहुत दिनों से एक स्थान पर रुका हुआ स्वच्छ पानी भी सड़ने लगता है, बदबू मारने लगता है। पर हम उस सड़न, उस बदबू से अनभिज्ञ बने बैठे बस अपने सुनहरे व सुगन्धित अतीत पर ही मुग्ध थे। मुख्यतः यही सब भारतीयों के पराभव के मूल कारण थे।

फिर भी अपनी वर्षों की दासता के लिए हम बारम्बार अंग्रेजों को ही कोसते रहते हैं, अपनी तत्कालीन कमजोरियों को विस्मृत कर देते हैं। ... भले ही अंग्रेजों ने हमें वर्षों गुलाम बनाये रखा, तब भी कुछ मायनों में हमें उनके प्रति आभारी भी होना पड़ेगा, क्योंकि उनके कारण ही हमारी व हमारे देश की भौतिक जड़ता कुछ हद तक समाप्त हुयी। परिवर्तन की दृष्टि से देखें तो उन्होंने ही हमारे देश में वैज्ञानिक युग का पुनः सूत्रपात किया। भौतिक शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में उन्होंने हमारी बहुत मदद की। आधुनिक भारत का निर्माण उसी काल में आरम्भ हुआ। हमारे देश में मैदानी व विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में रास्तों व सड़कों का निर्माण, रेलपथ का निर्माण, विभिन्न कल-कारखानों का निर्माण उन्हीं के काल में व उन्हीं के सौजन्य से सम्भव हो पाया। आज भी हम उस काल में संपन्न हुए जटिल उपयोगी कार्यों को अपने समक्ष पाते हैं, उनकी उपयोगिता गुणवत्ता के साथ आज भी हमारे सामने है, जैसे कालका-शिमला पहाड़ी रेलपथ। देखा जाये तो स्वतंत्रता के वर्षों बाद भी इतनी वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद हम उस स्तर की 'गुणवत्ता' व उपयोगिता के अन्य कार्य करने में अत्यंत मंद रहे हैं। यहाँ तक कि कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल के उपयोगी कार्य या निर्माण के रख-रखाव में भी हम अक्षम सिद्ध हो रहे हैं। हम कुछ भी कहें पर इतना तो मानेंगे ही कि लाख बुराइयों के बाद भी अंग्रेज मेहनती व अनुशासित थे। उन्होंने अपने ये गुण हमें देने की भरपूर कोशिश की, परन्तु हमने उनके कुछ और बुरे गुण तो अपना लिए पर मेहनत व अनुशासन से अभी भी मुँह चुराते हैं।

हम अपने समाज की नैतिक अवनति व भौतिक अपरिपक्वता के कारणों पर पुनः दृष्टिपात करें तो यह पाते हैं कि -- अंग्रेजों के भारत आने से पूर्व हमारा भौतिक विकास लगभग थमा हुआ था। शारीरिक रूप से हम आलसी व सुस्त थे, बस विभिन्न धार्मिक विचार-विमर्शों तक ही सीमित थे। जबकि उस समय अन्य विकासशील व विकसित देश निरन्तर चलायमान थे, वे समय के साथ-साथ क्रमबद्ध भौतिक प्रगति व परिवर्तनों के प्रति जागरूक थे। भारत में जब अंग्रेजों का आधिपत्य हो रहा था, उसी समय यहाँ पर भी भौतिक परिवर्तन का दौर आरम्भ हुआ। पहले बाहर के देशों के उत्पाद यहाँ आने शुरू हुए, तदुपरांत अपने यहाँ भी आधुनिक कल-कारखाने लगने शुरू हुए। हम उन उत्पादों से पहले से अधिक परिचित नहीं थे या परिचित संभवतः हों भी पर प्रयोग करने के अभ्यस्त नहीं थे। अचानक ही इतनी सुख-सुविधाओं के सामान आ गए कि हम उनकी चकाचौंध में खो से गए। अन्य राष्ट्रों ने तो अपना भौतिक विकास कई वर्षों में धीरे-धीरे निज श्रम से किया था; प्रगति, अनुसंधानों, खोजों व उत्पादों के सम्पर्क में धीरे-धीरे आये थे, अतः वे तो संतुलित थे। परन्तु हमें वह सब अनायास ही बिना किसी विशेष श्रम के एकदम से यूं ही मिल रहा था। हम मदमस्त हो गए। ठीक वैसे ही जैसे कई दिन के भूखे को अचानक ही खाद्य-सामग्री बहुतायत से उपलब्ध हो जाये तो उसको यह होश नहीं रहता कि कितना उसके लिए पर्याप्त व उचित रहेगा, ... बस खाने में जुट जाता है जंगलियों की भांति। ... कमोवेश आज भी हमारी वही दशा है। आज भी हमारा वही असंतुलन जारी है, हम प्रवृत्तियों में ही, भोगने में ही डूबे हैं। आज भी अनेकों भौतिक उपलब्धियाँ हमें अपने सामर्थ्य से नहीं वरन अन्य राष्ट्रों की कृपा से प्राप्त हो रही हैं। उदाहरण के तौर पर मोबाइल फोन, विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, स्वास्थ्य से सम्बंधित नवीनतम उपकरणों आदि को ही देख लें तो अत्यधिक उच्च गुणवत्ता का सामान आज भी विदेशों से ही आता है या उनकी तकनीक बाहर से आती है, बस उत्पादन ही यहाँ होता है और उस पर भी यह संशय बना रहता है कि उत्पाद पूरी तरह से मानकों के अनुरूप है अथवा नहीं। आज हमारा लक्ष्य बेहतर गुणवत्ता का सामान बनाना नहीं वरन केवल मुनाफा देने वाला सामान बनाना है। जैसे निर्माण करने में, वैसे ही प्रयोग करने में भी हम नीतिहीन ही हैं। अन्य विकसित राष्ट्रों के वर्तमान स्थिर संतुलन और हमारे असंतुलन का ठोस कारण हम फिर से वही पाते हैं कि उन्होंने भौतिक प्रगति को अपने प्रयासों व मेहनत से चरण दर चरण पाया और हमें वह सब एक झटके में ही मिल गया बिना किसी विशेष प्रयास के। हमने अधिक मेहनत तो की नहीं तो फिर हम उसका मूल्य क्या जानें। साधारण सी बात है जो सब जानते ही हैं कि परिश्रम से बनायी हुई या मेहनत की कमाई से लायी हुई वस्तु की कदर लोग बहुत करते हैं, दुरुपयोग नहीं करते। वही वस्तु यदि किसी को यूं ही मिल जाये बिना परिश्रम के, तो व्यक्ति उस वस्तु का अनियंत्रित उपयोग करता है, उसके दुरुपयोग की संभावनाएं बहुत प्रबल हो जाती हैं। भारत में आजादी के कुछ समय पहले से लेकर आज की दिनांक तक यही हो रहा है अर्थात् संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है।

चूँकि पूर्व में हमने कोई खास मेहनत नहीं की थी, अतः पहली बात तो यह कि हम विज्ञान के विभिन्न पहलुओं की जड़ों से अनभिज्ञ हैं या बहुत कम जानते हैं। अधिकांशतः हमारा ज्ञान सतही है। विदेशियों के सौजन्य से हमारा थोड़ा-बहुत वैज्ञानिक व भौतिक विकास तब शुरू हुआ था जब शेष विश्व अनुसंधानों के कई चरणों को पार कर चुका था। अतः हमें नक़ल का अवसर ही प्राप्त हुआ, सो विषयों को जड़ से जानने की हमारी जिज्ञासा ही लगभग समाप्त हो गयी या आज भी आलसी वृत्ति के होने के कारण हम उनको ठीक से समझना ही नहीं चाहते हैं। संचार माध्यमों का आज बहुत विस्तार हो जाने से सम्पूर्ण विश्व एक गाँव के समान ही हो गया है, हम निरन्तर एक-दूसरे के सम्पर्क में बने रहते हैं, अन्य देशों में हो रहे अन्वेषणों व आविष्कारों से निरन्तर परिचित रहते हैं, फिर भी आज भी हम चेत नहीं रहे हैं। आज भी हम अनियंत्रित ढंग से अंधों की भांति केवल भोगने में ही व्यस्त हैं। प्रवृत्ति में इतना डूब गए हैं कि निवृत्ति का ध्यान ही नहीं है। जबकि अन्य उन्नत राष्ट्र उनके सीमित धर्मग्रंथों में दी गयी नीतियों व स्वयं की सहज बुद्धि से से बहुत कुछ सीख चुके हैं। हमारे यहाँ तो इतना सुघड़ आध्यात्मिक ज्ञान सहजता से उपलब्ध है फिर भी निज-स्वार्थ में डूबे हुए हमारे वर्तमान धर्मगुरु उन्हें दूसरों को देने व दूसरों से उन पर अमल करवा पाने में अक्षम सिद्ध हो रहे हैं। यहाँ तक कि वे अन्यों को प्रेरित करने में भी असफल सिद्ध हुए हैं। हाँ अंधविश्वासों को बढ़ाने व निज-पूजा करवाने में वे अवश्य सफल रहे हैं। इस विषय पर विस्तार से चर्चा इससे पहले के अनेक लेखों में हम कर ही चुके हैं। अंग्रेजी सभ्यता लालच की थी पर उन्होंने अपने आप को परिष्कृत व परिमार्जित कर नीतिमान व धर्मभीरु बना लिया। उनकी सोच व कार्यों की गुणवत्ता पहले की तुलना में और अधिक श्रेष्ठ हो चुकी है। मात्र पैसा ही अब उनका उद्देश्य नहीं है, .. पर हमारा उद्देश्य?? हमारे यहाँ तो आज नैतिक मूल्य इतने रसातल में जा चुके हैं कि उनकी खुल कर व्याख्या करने में भी लज्जा का अनुभव होता है। कहने में संकोच होता है पर सच तो यही है कि न तो हम शिक्षित हैं और न ही सुसंस्कृत। हमारे अभिजात वर्ग के विषय में आप इसी ब्लॉग के एक अन्य लेख 'अभिजात वर्ग' में पढ़ ही चुके होंगे। इसके अतिरिक्त आज के विद्यालयों, अस्पतालों, परिवारों और कार्यालयों में भी नैतिकता के बहुत क्षीण चिन्ह दिखाई पड़ते हैं। भारत के कुछ प्रदेशों में आज की युवा पीढ़ी निरंकुश व दिग्भ्रमित है। उनके अभिभावक स्वयं इतनी आसक्ति व धन-यश आदि के मद में चूर हैं कि उन्हें स्थिति की गम्भीरता का भान ही नहीं है। बच्चों को बिना शिक्षित किये, बिना नैतिक गुण सिखाये वे उनको आज का हर वैभव, हर सुख, हर भौतिक शक्ति को दे देना चाहते हैं। अशिक्षित अर्थात् अपरिपक्व बच्चों को जब मल्टीमीडिया मोबाइल फोन, मल्टीमीडिया कंप्यूटर, इन्टरनेट, मोटरसाइकिल, स्कूटी व अन्य शक्तिशाली गैजेट्स मिल जायेंगे, तो उनका दुरुपयोग होना अवश्यम्भावी है। आज अभिभावकों ने सभी उच्च भौतिक संसाधन जुटा तो लिए हैं येनकेनप्रकारेण, और बस इसी में इतिश्री समझ ली है। अपने बच्चों को भी वे सब भौतिक सुख-सुविधाएं प्रदान तो कर रहे हैं पर बिना किसी मार्गदर्शन, बिना किसी सुसंस्कार के। ... बच्चों के लिए तो सर्वप्रथम अपने अभिभावक ही आदर्श होते हैं, उन्हीं को देख कर, उन्हीं से सीख कर वे बड़े होते हैं। और यहाँ के अभिभावक हैं कि वे स्वयं ही परिपक्व नहीं होना चाहते हैं तो फिर अपने बच्चों को इसके लिए प्रेरित करने में वे भला कहाँ समर्थ हो सकते हैं?? ... यह एक पुरातन व शाश्वत सत्य है कि निज क्रियमाण से या प्रारब्धवश शक्ति कोई भी प्राप्त कर सकता है, पर धर्म (righteousness) और शक्ति जब साथ में होंगे तभी शक्ति का सदुपयोग संभव है, अन्यथा रावण या अन्य शक्तिसम्पन्न आततायियों की कथाओं जैसा ही घटित होगा। रावण को धर्म, नीति आदि का शाब्दिक ज्ञान तो बहुत था पर व्यवहार में न लाता था, अमल नहीं करता था; उसके पास शक्तियां भी बहुत सी थीं पर अधर्मी होने के कारण वह शक्तियों का दुरुपयोग ही करता रहा, सदुपयोग का कभी विचार तक नहीं किया। यह ठीक है कि अंततोगत्वा उसका विनाश हुआ, पर विनाश से पूर्व उसने भूलोक व देवलोक को व्यथित करके रख दिया, भारी अव्यवस्था फैला दी। ... हमें सचेत होना होगा और देखना होगा कि कहीं हमारी अगली पीढी या स्वयं हम जाने-अनजाने रावण की नीतियों का अनुसरण तो नहीं कर रहे हैं!

आज के तथाकथित विकसित राष्ट्र भी कभी अपरिपक्व थे, उन्होंने आरम्भ में अपनी शक्तियों का दुरुपयोग भी किया, पर बहुत शीघ्र उनको यह एहसास हो गया कि उनका यह कदम आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। अनुभवों, पुराने श्रेष्ठ संस्कारों व उनके धार्मिक ग्रन्थ में दी गयी नैतिक शिक्षाओं ने उनके नेत्र समय से खोल दिए। अब वे शक्तिसम्पन्न राष्ट्र स्वयं चिंतित हैं कि उनके द्वारा अन्वेषित खोजें व शक्तियां गलत हाथों में न पड़ें व उनका दुरुपयोग न हो। सम्पूर्ण विश्व में विकसित व परिपक्व राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्ष आज इसी बात के लिए प्रयासरत हैं कि अन्वेषित शक्तियों का अच्छे कार्यों एवं लोकहित में ही प्रयोग हो। उदाहरण के लिए - परमाणु शक्ति। परिपक्व व सुलझे हुए देश इसका प्रयोग अब लोक हित में नाना प्रकार से कर सकते हैं या करते ही हैं, परन्तु यही शक्ति जब किसी अपरिपक्व हाथों में पहुँच जाये तो इसकी भयावहता की कल्पना सहज ही की जा सकती है। बुराई शक्ति में कतई नहीं होती, बुराई प्रयोग करने वाले में हो सकती है यदि वह अपरिपक्व व अधार्मिक हो तो। ... परिपक्वता प्राप्त करने हेतु हमें नीतिमान होना आवश्यक है। ... दृढ़ता से नीतिमान बनने के लिए हमें धार्मिक (righteous) बनना होगा। ... और धार्मिक बनने के लिए हमें अपने सहज स्वरूप को जानना अत्यंत आवश्यक है। स्वयं के सहज व खरे स्वरूप को जानने हेतु हम भारतवासियों के पास आध्यात्मिक ज्ञान का भण्डार पहले से ही है। आवश्यकता है तो बस उससे प्रेरित होने की, दैनंदिन जीवन में अमल में लाने की। ... और यह कार्य हमारे गुरुओं, हमारे अगुआओं व स्वयं हमारे लिए कोई मुश्किल नहीं, यदि हममें पर्याप्त इच्छाशक्ति पैदा हो जाये। इति।

Thursday, July 23, 2009

(१७) चरण-स्पर्श में भी आडम्बर !

भारतीय परम्परानुसार हम प्रायः आयु में अपने से अधिक बड़े लोगों, साधु-सन्यासियों, संतों, गुरुपद पर आसीत जनों के चरणों की वन्दना (चरण-स्पर्श) करते हैं और बदले में वे हमें आशीर्वाद देते हैं। चरण-स्पर्श करने वाले व्यक्ति में पैर छूते समय यह भाव होना चाहिए कि "मैं आपसे छोटा हूँ, सभी प्रकार से कनिष्ठ हूँ; अतएव स्वयं का अहम् कम करने हेतु तथा आगे की बहुमुखी प्रगति प्राप्त करने हेतु आशीर्वाद चाहता हूँ।" उत्तर में ज्येष्ठ व्यक्ति यही कहता है "कल्याण हो।" अर्थात् चरण-स्पर्श करने वाले व्यक्ति में तुलनात्मक रूप से वास्तव में कनिष्ठता का भाव, कोमलता, नम्रता एवं समर्पणभाव होना चाहिए। स्वयं का अहंभाव कम करने हेतु गम्भीरता होनी चाहिए, एक याचक का भाव होना चाहिए। ऐसे भाव जब होंगे, तब ही ज्येष्ठ व्यक्ति का आशीर्वाद फलीभूत होगा अन्यथा सम्पूर्ण क्रिया मात्र एक दिखावा बन कर रह जायेगी, किसी फल की प्राप्ति नहीं होगी।

श्रेष्ठ या खरे संत किसी साधक के चरण-स्पर्श करने मात्र की क्रिया से अधिक प्रसन्न नहीं होते, बल्कि वे वास्तव में साधक से प्रसन्न तब होते हैं जब वह 'धर्ममार्ग' पर चलता है, धर्माचरण करता है। गुरु की असली ख़ुशी शिष्य या सम्बंधित व्यक्ति के धर्ममार्ग पर चलने में ही निहित है। ऐसे ही ईश्वर को भी मात्र अपने यंत्रवत नामस्मरण, पूजा-पाठ व सम्बंधित विविध कर्मकाण्डों से उतनी प्रसन्नता नहीं मिलती, जितनी तब मिलती है जब उसका भक्त वास्तव में धर्माचरण करता है अर्थात् उसके दैनंदिन क्रियाकलापों में धार्मिकता (righteousness) झलकती है। अतः व्यावहारिक धर्माचरण ही सच्ची आराधना है गुरु अथवा ईश्वर की। फिर भी हम देखते हैं कि गुरु सदैव सभी को यह आशीर्वाद देते हैं कि "कल्याण हो।" यहाँ "कल्याण हो" का तात्पर्य यह है कि "हे याचक, तुम धर्ममार्ग पर चलो।" जब याचक धर्ममार्ग पर चल पड़ेगा तो उसका कल्याण तो सुनिश्चित हो ही जायेगा। अर्थात् खरे गुरु व संत सभी को धर्ममार्ग पर अग्रसर होने का खरा आशीर्वाद सदैव ही देते हैं।

अब कुछ चर्चा विपरीत स्थितियों पर भी ...। समाज में बहुत से अपरिपक्व, अपूर्ण, मायासक्त व ढोंगी साधु-संत भी हैं तथा बहुत से इसी प्रकार के याचक, शिष्य आदि भी। ऐसी अवस्था वाले साधु-संतों का स्वयं का अहं चरण-स्पर्श करवाने व छद्म आशीर्वाद देने से बढ़ता है, ऋणात्मक संचित होता है। अहंभाव के अतिरिक्त उनके इस कृत्य के पीछे अर्थ व यश का लोभ एवं आडम्बर भी छुपा होता है। इसी प्रकार से ढोंगी या स्वार्थी याचकों को भी संतों की चरण-वंदना करने से कोई लाभ नहीं मिलता, भले ही आशीर्वाद देने वाले संत खरे ही क्यों न हों। ऐसे याचकों का भी ऋणात्मक संचित बढ़ता है, वे अधोगति को प्राप्त होते हैं। याचना व आशीर्वाद में किसी प्रकार का ढोंग, स्वार्थ या अहं के जुड़े होने पर सम्बंधित ढोंगी व्यक्ति अंततः अधोगति को ही प्राप्त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। परन्तु दोनों व्यक्तियों (दाता या याचक) में से कोई एक सही है, खरा है, तो वह सही व्यक्ति अवश्य लाभान्वित होकर स्वच्छ अभीष्ट को प्राप्त करेगा।

अतः चरण-स्पर्श करने वाले व्यक्ति को सदैव याचक की भूमिका में होना चाहिए व उसमें अपने अहं का परित्याग करने की गम्भीरता होनी चाहिए तथा आशीर्वाद देने वाले में भी यही भाव होना चाहिए कि याचक का वास्तविक कल्याण हो, वह धर्ममार्ग पर चल कर अभ्युदय साध्य कर सके। सम्पूर्ण कृत्य में अहं व आडम्बर का किसी भी प्रकार से पोषण नहीं होना चाहिए।

वर्तमान में ऐसे खरे गुरु या खरे शिष्य बहुत ही कम संख्या में हैं, जो वैयक्तिक स्वार्थ, अहं व आडम्बरों से परे हों, तभी तो गुरु-शिष्य परम्परा की गौरवपूर्ण संस्कृति वाले भारत की यह दशा है। संख्या-वृद्धि का एक ही उपाय है -- शेष बचे-खुचे खरे संतों व शिष्यों द्वारा क्रियमाण कर्म का शत-प्रतिशत उपयोग व साथ ही शिक्षा व साधना हेतु समय का भी शत-प्रतिशत उपयोग। इसी प्रकार का गम्भीर व ईश्वर को समर्पित प्रयास ही ईश्वरीय-राज्य की पुनर्स्थापना का आधार होगा। इति।

Friday, July 17, 2009

(१६) भारत के वर्तमान धार्मिक संगठन व धर्म-शिक्षक

हमारे अब तक के मनन से हमें यह पता चलता है कि वास्तविक धर्म मूलतः आत्मानुभूति ही है। आत्मानुभूति अर्थात् आत्मा के गुणधर्मों की अनुभूति। विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार भी ऊर्जा अक्षुण्ण है, उसका स्वरूप बदलता रहता है और यह आवश्यक नहीं कि ऊर्जा के प्रत्येक स्वरूप की या ऊर्जा के स्वरूप-परिवर्तन के प्रत्येक चरण की सम्पूर्णता के साथ शाब्दिक व्याख्या की जा सके। जैसे परमाणु ऊर्जा के या परमाणु की संरचना के सम्बन्ध में समझने-समझाने हेतु विज्ञान अनेकों काल्पनिक अवधारणाओं का या चित्रों का अवलम्ब लेता है। भौतिक जगत् से सम्बंधित अन्य अनेक रहस्यों की व्याख्या हेतु भी विज्ञान अनेकों ऐसी गणनाओं का आलंबन लेता है जिनका औचित्य वह पूरी तरह से सिद्ध नहीं कर सकता, परन्तु उनकी सहायता से सम्बंधित रहस्य अंततः काफी हद तक खुल जाता है और हम उस ऊर्जा को नाना प्रकार से उपयोग करने में काफी हद तक सक्षम हो जाते हैं। यह अलग बात है कि हमारा वह ज्ञान कभी परिपूर्ण नहीं होता व शोधन-संशोधन कार्य अनवरत चलता रहता है।

... ऊर्जा के अनेक रूपों की भाँति आत्मा भी एक प्रकार की अक्षुण्ण ऊर्जा है। इसके विषय में अध्ययन को ही हम अध्यात्मशास्त्र कहते हैं और आत्मा के अति सूक्ष्म होने के कारण या अदृश्य होने के कारण शब्दों में उसकी व्याख्या बहुत दुरूह है। शब्दों में हम इसको समझने-समझाने का प्रयास तो करते हैं, अनेकों कल्पनाओं-संकल्पनाओं आदि का सहारा भी लेते हैं, पर अंततः हम इसे अनुभूतियों द्वारा ही लगभग ठीक-ठीक (?) समझ पाते हैं। पुनः हमें अपनी अनुभूतियाँ किसी अन्य को समझा पाना अत्यन्त दुरूह होता है। यहाँ तक कि अपनी अनुभूतियों का औचित्य भी बहुधा हम ठीक से नहीं सिद्ध कर पाते हैं। ... फिर भी हमने शब्दों के माध्यम से पिछले १५ लेखों में इसी समझने-समझाने का प्रयास करने का साहस किया है और यथासंभव हमारा दृष्टिकोण विज्ञान पर आधारित रहा है, ठोस तथ्यों पर आधारित रहा है। उदाहरणार्थ - क्रिया के फलस्वरूप प्रतिक्रिया का सिद्धांत। यहाँ और अधिक आत्म-स्तुति न करते हुए हम मूल विषय पर आते हैं।

चूँकि आत्मा व धर्म आदि केवल अनुभूतियों से समझ में आने वाले हैं, ... इस बात का गलत लाभ उठा कर वर्तमान में अधिकाँश धार्मिक संगठन, संस्थाएं आदि बहुत से अंधविश्वासों को बढ़ावा देते दीख रहे हैं। पिछले कई वर्षों से भारत में नैतिक मूल्यों का बहुत अधिक पतन हुआ है। धार्मिक संगठन व संस्थाएं भी इससे अछूते नहीं रहे हैं, बल्कि इनमें इस पतन का प्रभाव और अधिक तीव्रता से दिखलाई पड़ रहा है। मेरा मानना है कि धर्मोपदेशक या धर्म-शिक्षक का कार्य बहुत ऊंचे दर्जे का है, विशिष्ट कार्य है, व समाज भी इनके प्रति विशिष्ट आदर-भाव रखता है, थोड़ा लोभ और भय मिश्रित ही सही। तो इन धर्मोपदेशकों का मूल उद्देश्य यही होना चाहिए और यही होता भी था प्राचीन काल में कि सामान्य लोगों को लोभ व भय से परे ले जाकर, दण्ड-परितोष की भावना से मुक्त करा कर, संघ में सच्चे धर्म की स्थापना करना तथा उसकी खराई को अक्षुण्ण रखना; स्वयं के एवं अन्यों के ईश्वर व आत्मा सम्बन्धी ज्ञान अर्थात् अध्यात्मशास्त्रीय ज्ञान में लगातार वृद्धि कर निरंतर ईश्वर या प्रकृति के नियमों के और अधिक समीप पहुँचते जाना; धर्म के वाह्य स्वरूप के अवांछित तत्वों व भय-मिश्रित अंधविश्वासों की बेड़ियों को लगातार काटना, आदि-आदि। सारांश में यह कि ज्ञान की अगली अवस्थाओं या कक्षाओं में अनवरत अग्रसर होते / करते जाना।

परन्तु आज ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा है। विभिन्न धार्मिक संगठन अध्यात्मशास्त्र को और अधिक जटिल बनाने व दुरूह साबित करने में लगे हैं। बजाय अंधविश्वासों को दूर करने के, वे और अधिक अंधविश्वास बढ़ाने में लगे हैं। कारण स्पष्ट है कि आम लोगों को जब धर्म बहुत जटिल व साथ ही भौतिक लाभ पहुंचाने वाला लगेगा तब वे लोभवश इसकी ओर सहज ही आकृष्ट होंगे तथा दुरुहता जान पड़ने के कारण माध्यम बनेंगे आज के तथाकथित धार्मिक संगठन व उनसे सम्बद्ध व्यवसायिक धर्मगुरु। सच में आज धार्मिक संगठनों व धर्मगुरुओं ने धर्म की ही कुछ विशिष्टताओं (जैसे - धर्म का अनुभूतिजन्य होना) का लाभ उठा कर स्वयं को बहुत अधिक उन्नत यहाँ तक कि साक्षात् ईश्वर प्रचारित करना आरम्भ कर दिया है। आम लोगों को भौतिक व मानसिक लाभ का लालच देकर मन्त्र, दीक्षा व अनेक प्रकार की सामग्रियाँ जैसे - तेल, साबुन, शैंपू, मंजन; गृह-शांति व धन-वृद्धि हेतु अत्यधिक मंहगे तावीज, पत्थर, कवच आदि विक्रय करना आरम्भ कर दिए हैं। किस प्रकार पूरी तरह से व्यवसायिकता पर उतर आये हैं ये तथाकथित धर्मगुरु, यह सब लोग जानते हैं, पर निज लोभवश व सामाजिक लोक-लाज के भयवश लोग अज्ञान के पाश में जकड़े हैं, सम्मोहन की अवस्था में हैं। और तथाकथित धर्मगुरु उनकी इसी अवस्था का लाभ उठा कर स्वयं व अपने संगठन को मालामाल कर रहे हैं। सम्मानीय व्यापार का माध्यम बन गया है धर्म। कदाचित् धर्म व ईश्वर की इससे बड़ी विडम्बना नहीं हो सकती।

वैसे अपवाद तो सदैव होते हैं, पर सामान्यतः पूर्वकाल में धर्मगुरु व्यावसायिक दृष्टिकोण वाले नहीं होते थे। बहुत अधिक अतीत में न जाकर कुछ पीछे ही देखें तो हमें समर्थ रामदास, स्वामी रामकृष्ण, व आर्य चाणक्य जैसे श्रेष्ठ गुरु दीखते हैं, जिन्हें स्वार्थ, धन-लोलुपता व सांसारिक यश का लोभ छू तक नहीं गया था। इनमें से दो गुरुओं के शिष्य तो महान राजा हुए और वे अपना सर्वस्व अपने गुरु पर न्योछावर करने को सदैव तत्पर थे, परन्तु उनके गुरुओं ने कभी भी भौतिक लोभ को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और राजसी सुख की उपलब्धता होते हुए भी अतिसाधारण जीवन व्यतीत कर श्रेष्ठ गुरु का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया। सच्चा धर्मोपदेशक या गुरु पद का व्यक्ति वास्तव में सभी प्रकार के भौतिक वैभव से सर्वथा परे होता है या किसी सहज वैभव को अपनाते हुए भी वह अन्य आकांक्षाओं, लोलुपताओं आदि से स्वयं व निज संगठन को परे रखता है तथा सुख-सामग्रियों के अभाव से कभी भी तनिक सा भी परेशान नहीं होता है।

परन्तु आज के धर्मगुरुओं को देखिये -- पूरी तरह से व्यावसायिक हो गए हैं। टेलीविजन के कम से कम सात-आठ चैनलों पर २४ घंटे लगातार होने वाला प्रसारण इन्हीं की कृपा से संभव हो पा रहा है। वातानुकूलित स्टूडियो में, सज-धज कर, डिजाइनर परिधान धारण कर, बढ़िया से आसन पर विराजित हो, फूल-माला लगे माइक्रोफोन पर जब ये लच्छेदार भाषा में अपना सम्मोहित कर देने वाला प्रवचन देते हैं तो देखते ही बनता है। मानों देवता पुष्प-वर्षा कर रहे हों। भौतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है, वातानुकूलित गाड़ियाँ हैं, वैभवशाली मठ हैं, आश्रम हैं, अधिकांशतः हवाई यात्रा करते हैं। बहुत सी भौतिक वस्तुओं का उत्पादन भी करते हैं या बाहर किसी से बनवाकर अपना ठप्पा लगा कर विक्रय करते हैं, वह भी बिना किसी उत्पादन-कर के, क्योंकि उत्पाद तो साधकों हेतु ही बनाए जाते हैं, विक्रय हेतु नहीं (?), ऊपर से जो चढ़ावा आता है सो अलग। कुम्भ या अन्य किसी अवसर पर जब प्रयाग, काशी या हरिद्वार में अस्थायी रूप से निवास करना पड़ता है तो इन तथाकथित धर्मगुरुओं के लिए अस्थाई मगर पक्की 'अटैच लैट्रिन-बाथरूम के साथ टाईल युक्त वातानुकूलित कुटियाएँ' बनाई जाती हैं। मात्र कुछ दिन के प्रवास हेतु लाखों रुपया फूंक दिया जाता है। रहन-सहन की प्रणाली में परिवर्तन व साफ़-सफाई से रहना कोई गलत बात नहीं, यह ठीक है, पर इन सब के प्रति आसक्ति भाव के कारण अनावश्यक व्यय व दिखावा निंदनीय है।

यहाँ एक बात मैं अच्छे से स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं मात्र इन सब कृत्यों के विरोध में यह सब नहीं लिख रहा हूँ वरन इन कृत्यों के पीछे का मंतव्य ही विरोध-केंद्र है मेरा। ... और वर्तमान धर्मगुरुओं के असली मंतव्य से आप सब भली-भांति परिचित हैं पर लोभवश, भयवश उसे मानना नहीं चाहते। आपकी इसी मानसिक दुर्बलता व विकलांगिता का लाभ ही वे उठा रहे हैं। विज्ञान व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास का धर्म के क्षेत्र में आज जम कर दुरुपयोग हो रहा है। उथली (सतही) सकाम-भक्तियुक्त भक्तों (तीव्र-आसक्त भक्तों ) की भीड़ से धार्मिकता की सूजन निरंतर बढ़ती जा रही है। ... कारण हैं - तीव्र आसक्तियुक्त आज के अधिकाँश धर्मगुरु। .. मेरे विचार से धर्म बिकाऊ नहीं होता। धर्म-शिक्षा में दिया ही जाता है, लिया नहीं जाता। खरा गुरु जीवन-यापन हेतु धर्म का व्यापार नहीं करता। जीवनयापन हेतु न्यूनतम आवश्यक वस्तुएं स्वतः ही बिना किसी विशेष प्रयास के प्राप्त हो जाती हैं, यदि ऐसा नहीं भी होता है तो खरा धर्म-शिक्षक कबीर की भांति जुलाहे का, ईसा मसीह की भांति बढ़ई का, जैसे कार्य करने में कोई संकोच नहीं करेगा। जन कल्याण हेतु धर्म-शिक्षा अर्थात् 'धर्म' हेतु ही धर्म-शिक्षा तथा भौतिक शरीर की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किसी व्यवसाय / नौकरी आदि के बीच किसी प्रकार का कोई टकराव नहीं होता। हाँ इतना निश्चित है कि सच्चा धर्म-शिक्षक सांसारिक यश व धन का भूखा नहीं होता और अनावश्यक संग्रह व खर्च में उसकी कोई रुचि नहीं होती। उसकी आवश्यकताएं सीमित होती हैं और वह दिखावों से बिलकुल परे रहता है।

क्या वर्तमान में ऐसा कोई प्रसिद्ध गुरु या धर्म-शिक्षक आपकी दृष्टि में है जो इन सब गुणों से संपन्न हो। संभवतः नहीं। क्योंकि आज के धर्म-शिक्षक धर्मशिक्षा को व्यापार व यश का माध्यम या कम से कम वैयक्तिक यश का साधन तो मानते ही हैं। तो सम्बंधित आसक्तिवश वे निज स्वार्थपूर्ति में लिप्त हैं। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं कि उनके कृत्यों से धर्म व स्वयं उनके आध्यात्मिक संचित की कितनी हानि हो रही है। उन्हीं के कृत्यों के कारण आज आम लोग धर्म के खरे स्वरूप से परे जाते जा रहे हैं व धर्म के अन्य छद्म रूपों की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। यथार्थ तो यही है कि वर्तमान धर्मगुरुओं के पूर्वकर्मों का यह सुन्दर फल है कि आज उन्हें धर्म-शिक्षक जैसा उच्च पद प्राप्त हुआ है, इतने लोग उनको सुनते हैं, उनके अनुयायी हैं। विरलों को यह सौभाग्य प्राप्त होता है। ... परन्तु कदाचित् उनके वर्तमान कर्म उस सुन्दर फल में वृद्धि करने वाले प्रतीत नहीं हो रहे हैं। ईश्वर उनको सद्-बुद्धि प्रदान करे जिससे वे स्वयं के वर्तमान क्रियमाण को शोधित-संशोधित व परिष्कृत कर वास्तव में ईश्वर के कार्य में सहभागी बनें। उनके श्रेष्ठ संवाहक बनने पर ही हमारे संघ की शीघ्र उन्नति सम्भव होगी व नैतिक मूल्यों का पुनः उत्थान होगा। उदाहरण के लिए ऊपर उल्लेखित तीन खरे गुरुओं के मात्र एक-एक शिष्य (शिवाजी, विवेकानंद व चन्द्रगुप्त) समाज हित में बड़ा कार्य करने में समर्थ हुए थे। उन शिष्यों ने व उनसे भी बढ़कर उनके गुरुओं ने स्वयं को छोटा (नम्र व अनासक्त) बनाये रखा, तब ही ईश्वर ने उनको बड़ा किया अर्थात् उनके माध्यम से बड़ा कार्य करवाया। इति।

Sunday, May 10, 2009

(१५) मन

हमारे पूर्व अध्ययन के अनुसार हमें ज्ञात हुआ था कि अविनाशी आत्मा न केवल हमारा ऊर्जा-स्रोत है, वरन हमारा सच्चा ज्ञान-स्रोत भी है। फिर भी हमें इस आत्मा से ज्ञान-प्रकाश नहीं मिल पाता है, क्योंकि इस आत्मा के प्रकाश-पुंज के चारों ओर "अविद्या" का आवरण है। "अविद्या" के प्रमुख घटक हैं -- मन (वाह्यमन), चित्त (अंतर्मन), विभिन्न संस्कार (विचार-केन्द्र), वृत्ति, बुद्धि, व अहं।

साधारण भाषा में जिसे हम 'मन' कहते हैं, वह दो भागों में बँटा है - (१) वाह्यमन, (२) अंतर्मन या चित्त। वाह्यमन का आकार छोटा व अंतर्मन (चित्त) का आकार अपेक्षाकृत काफी बड़ा होता है। वर्तमान काल में सामान्य व्यक्ति की कर्मेन्द्रियों द्वारा किये जाने वाले अधिकांश कार्य अविद्या के घटक 'मन' के निर्देशानुसार ही होते हैं। अविद्या के घने आवरण के कारण आत्मा से निर्देश-स्पंदन कर्मेन्द्रियों तक जा ही नहीं पाते। तो फिर मन से हमारी कर्मेन्द्रियों को कार्य करने का निर्देश कैसे जाता है?, वह इस प्रकार -

क्रिया का स्वरूप --
(१) बाहर से स्पंदन ज्ञानेन्द्रियों (आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा) के माध्यम से अंतर्मन में जाते हैं (वाह्यमन से होते हुए)। इन्हें सूचना स्पंदन कह सकते हैं।
(२) स्पंदन भीतर पहुँचने पर तदनुसार अंतर्मन में "संस्कार" (impression) बनता है (संस्कार पहले से भी हो सकता है)।
(३) अंतर्मन में बने संस्कार से पुनः स्पंदन (विचार) वाह्यमन में जाते हैं। इन्हें क्रिया-विचार स्पंदन कह सकते हैं।
(४) क्रिया-विचारों के वाह्यमन में पहुँचने के बाद, तदनुसार यहाँ से कर्मेन्द्रियों को कार्य हेतु निर्णायक निर्देश जाता है। और फिर उन्हीं निर्देशों के अनुसार कार्य होता है।

हमारे अंतर्मन में अनेक छोटे-बड़े संस्कार हैं, लगातार कुछ नए भी बनते रहते हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी कार्य के लिए जिम्मेदार संस्कार, उस कार्य के समाप्त होने के बाद नष्ट नहीं होता; तथा बाद में जब-जब उस संस्कारानुरूप स्पंदनों का आदान-प्रदान पुनः होता है, तो वह संस्कार और भी अधिक बड़ा हो जाता है।

अंतर्मन में जिन संस्कारों का प्रभुत्व (अधिकता) होता है, उनके गठजोड़ को ही हम "वृत्ति" कहते हैं या हम यह कह सकते हैं कि 'वृत्ति' बड़े संस्कारों पर निर्भर करती है। अब यदि बड़ा संस्कार ईश्वरीय (सात्त्विक) होगा तो तदनुसार वृत्ति भी सात्त्विक होगी। अर्थात् वृत्ति, हमारे अंतर्मन के बड़े संस्कारों से ही बनती है।

"चित्त" (अंतर्मन) का कार्य है - नए "संस्कार" बनाना या/और संस्कारों में से अनेक विकल्प (options) खोजना/सुझाना, और "बुद्धि" का कार्य है - योग्य निर्णय लेना अर्थात् उन विकल्पों में से किसी एक को चुनना, तदुपरांत उस चुने हुए विकल्प को "वृत्ति" की सहमति से 'वाह्यमन' में भेजना। बुद्धि, 'वृत्ति' के ऊपर निर्भर करती है। अंततः "वाह्यमन" से कर्मेन्द्रियों को कृत्य हेतु निर्णायक निर्देश जाता है।

अब हम यह सोचेंगे कि यदि हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों से काम लेना बंद कर दें यानी आँख, कान, नाक आदि बंद कर लें, तो क्या किसी कार्य के लिए विचार नहीं आयेंगे? ... विचार तो अब भी आयेंगे, क्योंकि अब वे अंतर्मन में विद्यमान संस्कारों (impressions) से आ रहे हैं। उपरोक्त घटकों के कारण अविद्या का अंतिम महत्त्वपूर्ण घटक "अहं" बना, अर्थात् इन उपर्लिखित घटकों को ही सर्वस्व व अपना मानना और इनके कारण ही स्वयं को परमात्मा से भिन्न मानना।

तो उपरोक्त अध्ययन से हमारी समझ में एक नयी बात यह आयी कि किसी भी कृत्य के लिए अंतर्मन से वाह्यमन में जाने वाले निर्देशों पर 'वृत्ति' का नियंत्रण होता है; वृत्ति द्वारा नियंत्रण यानी बड़े संस्कार का प्रभाव। अतः हमने यह पाया कि अंतर्मन में विद्यमान बड़े संस्कारों का प्रभाव 'वृत्ति' पर, तदनुसार हमारी प्रत्येक क्रिया पर पड़ता है। अब यदि वह बड़ा संस्कार ईश्वरीय गुणों का होगा तो हमारे कार्य स्वतः अच्छे ही होंगे। अब तक के विश्लेषणों से, अब मन की गतिविधियों व हमारे कृत्यों के क्रमबद्ध कारण व चरण निम्नलिखित हैं --

(१) बाहर से सूचना-स्पंदन ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से वाह्यमन में से होते हुए अंतर्मन में जाते हैं।
(२) स्पंदन भीतर पहुँचने पर तदनुसार अंतर्मन में "संस्कार" (impression) बनता है, यदि वह संस्कार पहले से है तो वह संस्कार कुछ और बड़ा होता है।
(३) अंतर्मन में बने संस्कार से या अन्य संस्कारों से क्रिया-विचार स्पंदन निर्माण होते हैं। बुद्धि इनमें से एक या अधिक विकल्प चुनती है, तदुपरांत चुने हुए विचार निर्णायक अनुमोदन हेतु 'वृत्ति' के पास जाते हैं। यदि ये वृत्ति के अनुरूप हुए, तो पुनः ये स्पंदन (विचार) 'वाह्यमन' में जायेंगे अन्यथा वहीं नष्ट हो जायेंगे।
(४) क्रिया-विचारों के वाह्यमन में पहुँचने के बाद, तदनुसार वहां से कर्मेन्द्रियों को कार्य हेतु निर्णायक निर्देश जाता है। और फिर उन्हीं निर्देशों के अनुसार कर्मेन्द्रियों के माध्यम से कार्य होता है।

अर्थात् हमारे समस्त कृत्य अंतर्मन से आने वाले विचारों तदनुसार वाह्यमन में निर्मित निर्णायक निर्देशों के अनुसार ही होते हैं। अर्थात् कोई भी कार्य हम अंतर्मन की सहमति के बिना, अपितु वृत्ति की सहमति के बिना नहीं कर सकते।

नयी वृत्ति कैसे बनती है या वृत्ति कैसे बदलती है?
त्रिगुणों में से जिस गुण के संस्कार व्यक्ति के मन में सबसे अधिक होंगे, व्यक्ति की वृत्ति वैसी ही होगी या त्रिगुणों में जिस गुण के अनुरूप संस्कार सबसे बड़ा होगा, उसी संस्कार का मन पर आधिपत्य होगा। कर्मेन्द्रियाँ, यहाँ तक कि ज्ञानेन्द्रियाँ भी यथासाध्य उसी के अनुसार ही कृत्य करेंगी। इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ लगभग पूरी तरह से वृत्ति पर, या कृत्य वृत्ति पर निर्भर है। परन्तु ज्ञानेन्द्रियाँ फिर भी पूरी तरह से मन के अधीन नहीं हैं, यदि हैं भी तो एक सीमा तक ही (आँख, नाक, कान आदि कब तक बंद रखे जा सकते हैं?)। अतः ज्ञानेन्द्रियाँ वाह्य स्पंदनों को अंतर्मन तक पहुंचाती अवश्य हैं; पहुंचेंगे तो नया संस्कार बनेगा ही, या यदि पहले से है तो थोड़ा सा और बड़ा होगा। पर अभी यह नया संस्कार इतना बड़ा नहीं हो पाया है कि इस संस्कारानुसार कृत्य संभव हो सके। पर धीरे-धीरे वह प्रसंग बार-बार सामने आने पर ज्ञानेन्द्रियाँ उस प्रसंग के स्पंदन बार-बार अंतर्मन तक पहुंचाती रहती हैं और प्रत्येक बार सम्बंधित स्पंदन अंतर्मन तक पहुँचने पर वह नया संस्कार बड़ा होता जाता है। एक दिन वह इतना बड़ा हो जाता है कि वह पुराने बड़े संस्कार से भी बड़ा हो जाता है। ऐसा हो जाने पर व्यक्ति की वृत्ति उस नए व सबसे बड़े संस्कार के अनुरूप हो जाती है। तदुपरांत व्यक्ति की कर्मेन्द्रियों को नयी वृत्ति के अनुरूप ही निर्देश जाते हैं और तदनुसार व्यक्ति के कृत्य भी बदल जाते हैं। कुछ इसी प्रकार से ही सत्संग या योग्य मार्गदर्शन द्वारा हमारे मन में नामजप या ईश्वरीय गुणों का संस्कार बनता है, बढ़ता है, और एक दिन इतना बड़ा हो जाता है कि पूरे मन पर आधिपत्य कर लेता है। तब मनानुसार ही सही, पर कम से कम हमारे अधिकांश कार्य यथासंभव अच्छी प्रकृति के तो होने ही लगते हैं।

आगे का स्तर
यथोचित साधना से जब एक बड़ा सा ईश्वरीय संस्कार हमारे अंतर्मन में बन जाता है तो आगे के स्तर पर अन्य सभी संस्कार एक-एक करके नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार अंतर्मन में केवल ईश्वरीय गुणों का संस्कार ही शेष रह जाता है। साधना और बढ़ने पर यह संस्कार इतना बलिष्ठ हो जाता है कि ज्ञानेन्द्रियों से आने वाले अन्य स्पंदन (ईश्वरीय गुणों के विपरीत स्पंदन) वाह्यमन तक पहुँचते तो अवश्य हैं, परन्तु वहीं पर नष्ट हो जाते हैं; वे अंतर्मन में प्रविष्ट हो ही नहीं पाते। वाह्यमन और अंतर्मन के बीच की दीवार (परत) गर्म तवे के समान हो जाती है, उस पर पड़ते ही या छूते ही अवांछित स्पंदन तुरन्त वाष्पित हो जाते हैं। तो स्थिति अब यह हो गयी कि, ज्ञानेन्द्रियाँ अब भी स्वतंत्र हैं स्पंदन ग्रहण करने के लिए, मन तक भेजने के लिए; परन्तु अंतर्मन तक अब केवल योग्य स्पंदन ही जा पा रहे हैं। कर्मेन्द्रियाँ तो पहले भी और अब भी अंतर्मन या वृत्ति के अधीन ही हैं और वृत्ति तो अब अति सात्त्विक है, तो स्पष्ट हो जाता है कि कर्मेन्द्रियों द्वारा अब केवल अच्छे कार्य ही संपादित होंगे। ईश्वर का संस्कार मनुष्य की वृत्ति, विचार और कृत्य ऐसे ही बदलता है।

पुनरवलोकन
हममें से कुछ लोग जब बुद्धि का प्रयोग कर मनन करेंगे व निष्कर्ष निकालेंगे तो वे यह कह सकते हैं कि नया (ईश्वरीय) संस्कार बनने के लिए बार-बार नामजप करना या सत्संग में जाना या धार्मिक पुस्तकें पढ़ना आदि, ये सब भी तो कृत्य ही हैं, और पहले के अध्ययन / मनन के अनुसार सभी कृत्य तो 'वृत्ति' के अधीन हैं; तो फिर नया संस्कार बनने के लिए आवश्यक ये कृत्य हो पाना कैसे सम्भव होगा? ... इसका उत्तर यह है कि, जिसकी वृत्ति बिलकुल ही आसुरी (तामसिक) होगी, उसके लिए उपरोक्त कृत्यों के लिए तैयार हो पाना लगभग असम्भव ही या अत्यंत दुरूह होगा, परन्तु बहुधा यह पाया जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति की वृत्ति में कुछ न कुछ सात्त्विक गुण तो पहले से विद्यमान रहते ही हैं, भले ही वे सुप्तावस्था में क्यों न हों! गुरु या मार्गदर्शक मानव के उन सुप्त सात्त्विक गुणों को संकल्प, सम्पर्क या सत्संग द्वारा जगाते हैं। वृत्ति का यह कोमल कोना (soft corner) तब कर्मेन्द्रियों को इतनी छूट दे देता है कि हमारा नामजप, सत्संग आदि यंत्रवत ही आरम्भ हो जाता है, यदाकदा ही सही। तो इस क्रिया से अंतर्मन में एक नया संस्कार (ईश्वर का) बन ही जाता है। परन्तु वृत्ति तो इसके विपरीत है; वह इस संस्कार को कोई स्पंदन पुनः अंतर्मन से वाह्यमन में नहीं भेजने देती अर्थात् प्रारंभ में अन्य सात्त्विक कृत्य हम नहीं कर पाते। पर संतोष की बात यही है कि वृत्ति हमें कर्मेन्द्रियों से कार्य करने की "कुछ छूट" तो कम से कम दे ही रही है। फिर वही, पहले बताये क्रम के अनुसार ही सब कुछ होता है। सत्संग, नामजप आदि यंत्रवत, यदाकदा करने से ही उनका संस्कार अंतर्मन में बनता है; फिर धीरे-धीरे वह बड़ा हो जाता है, और एक दिन इतना बड़ा हो जाता है कि अन्य सभी संस्कार उसके सामने छोटे (गौण) हो जाते हैं। तब यह संस्कार ही हमारी वृत्ति बन जाता है। इस प्रकार वृत्ति में परिवर्तन होता है।

वृत्ति बदलने के अन्य उपाय
अन्य उपायों में सबसे प्रमुख व अलग सा उपाय है - "हठयोग" द्वारा। ... प्रत्येक व्यक्ति में सत्त्व, रज, तम तीनों गुण होते ही हैं, परन्तु इनका प्रतिशत प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न-भिन्न होता है। तीनों में जिस गुण का प्रभाव जिस क्षण सबसे अधिक होता है, हमारी वृत्ति, तदनुसार कृत्य, वैसा ही होता है। वृत्ति के मूल गुणों के विपरीत कुछ कार्य करना ही "हठयोग" है। आगे हम देखेंगे कि वृत्ति के विपरीत क्रिया करने (हठयोग) से वृत्ति में बदलाव कैसे आता है --

मान लीजिये कि हमारे भीतर बहुत सारे दोष हैं और हम उनको एक-एक करके दूर करना चाहते हैं। हमारे भीतर साधना का एक भी संस्कार नहीं है; वह हम बनाना चाहते हैं। परन्तु हमारी वृत्ति तो ऐसी है कि वह हमसे बुरे कार्य ही करवा रही है और साधना भी नहीं करने देती। तो बदलाव की क्रिया कैसे आरम्भ होती है? वह ऐसे --

यदि हमें अपने दोषों के बारे में पहले से पता है और हम इनको गलत समझते ही हैं तथा साधना करने के भी इच्छुक हैं, तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि हमारे भीतर अच्छाई का व साधना का तत्व या संस्कार पहले से ही विद्यमान है। क्योंकि इस प्रकार का कोई विचार मन में आने का मतलब ही यही हुआ कि उपरोक्त दोनों अच्छे संस्कार पहले से हैं ही। यदि उपरोक्त विचार (बुराइयाँ त्यागने के व साधना करने के) किसी सात्त्विक व्यक्तित्व से मिलने के पश्चात् या सत्संग आदि में जाने के बाद मन में आये, तो भी समझिये कि इनका छोटा सा संस्कार मन में बन ही गया। अब आवश्यकता है इसको बड़ा करने की, जिससे उपरोक्त दोनों कृत्य संभव हो सकें (व्यसन त्याग व साधना )। अगला चरण -- यह कि हम 'हठयोग' द्वारा वृत्ति के विपरीत जा कर उपरोक्त दोनों क्रियाएं करना आरम्भ कर देते हैं, तो धीरे-धीरे अच्छाइयों का (अर्थात् बुराई त्यागने का) व साधना का, दोनों संस्कार बढ़ने लगते हैं और एक दिन इतने बड़े हो जाते हैं कि बुरे संस्कार उनके सामने गौण हो जाते हैं। इस प्रकार वृत्ति बदलती है और बुद्धि भी सात्त्विक हो जाती है।

परन्तु अब प्रश्न यह उठता है कि हठयोग की क्रिया या हठयोग द्वारा वृत्ति के विपरीत क्रिया सम्भव कैसे हुयी? क्योंकि पहले के विश्लेषणों से तो यह पता चलता है कि प्रत्येक कृत्य के पीछे वृत्ति है। तो इस "वृत्ति विपरीत कृत्य" के सम्भव हो पाने का कारण और प्रक्रिया इस प्रकार से है --

यदि हममें पहले से ही साधना करने की चाह है या किसी के मार्गदर्शन के फलस्वरूप यह चाह उत्पन्न हुयी, तथा व्यसन त्यागने की भी चाह है - अर्थात् अपनी बुराइयों का भान हुआ है, तो इन सब बातों का यह अर्थ हुआ कि हमारी आत्मा पर पड़ा हुआ अविद्या और माया का जाल कहीं से तो टूट गया है या उसमें कोई छिद्र हो गया है। इस घोर कलियुग में इस प्रकार का विचार (बुराई त्यागने का व साधना करने का) मन में आना अर्थात् प्राथमिक स्तर की अनुभूति। अनुभूति आत्मिक ही होती है। इस प्रकार के विचार या अनुभूति से आत्मा की शक्ति अर्थात् आत्मबल बढ़ा। इस बढ़े हुए आत्मबल ने वृत्ति में विद्यमान सत्त्व अंश व अंतर्मन में विद्यमान अन्य छोटे-छोटे सात्त्विक संस्कारों का एकत्रीकरण किया और वृत्ति के मूल गुण के विपरीत क्रिया करने का निर्देश वाह्यमन में भेजना आरम्भ किया। इस क्रिया में मन में अत्यधिक अंतर्द्वंद होता है; अंततः शक्तिशाली की जीत होती है, परन्तु यह जीत टिकाऊ (स्थाई) नहीं होती। अतः हठयोग द्वारा हम बुरे व्यसन छोड़ते हैं व साधना भी करते हैं; परन्तु कम समय के लिए। जब-जब आत्मिक बल पराजित होता है, बुरी वृत्ति हावी होती है; तब-तब साधना छूटती है व पुनः बुराइयों में फंसते हैं। परन्तु कभी-कभी आत्मिक बल जीतता भी है। तो इस प्रकार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में व्यसन त्याग व साधना के कृत्य होते रहते हैं। हठयोग द्वारा बारम्बार ऐसा होते रहने से धीरे-धीरे ईश्वरीय संस्कारों का आकार बढ़ने लगता है और अंततः एक दिन हमारी वृत्ति ईश्वरीय गुणों के अनुरूप हो जाती है। यद्यपि हठयोग से फल की प्राप्ति (वृत्ति परिवर्तन) सम्भव हो सकती है, फिर भी कदाचित् यह सबके लिए सम्भव नहीं है। साधारण मनुष्य अधिक मानसिक द्वंद नहीं झेल सकता। अतः वृत्ति बदलने के लिए पहले वाला तरीका अर्थात् नियमित रूप से सत्संग में रहना अर्थात् आध्यात्मिक लोगों से मित्रता बढ़ाना, उनकी संगति में अधिकाधिक रहना, आध्यात्मिक ग्रंथों को पढ़ना आदि ये सब कृत्य करना सर्वप्रथम आवश्यक है और वृत्ति इसके लिए छूट भी दे रही है। इसके साथ ही यदि 'हठयोग' द्वारा भी ये सब कृत्य किये जायें, तो यह अतिरिक्त प्रयास हुआ; इससे ईश्वरीय गुणों का संस्कार शीघ्र उन्नत होगा, फलस्वरूप वृत्ति में परिवर्तन शीघ्र आयेगा, हमारी आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र होगी। इस प्रकार अपने सामर्थ्य के अनुसार 'हठयोग' द्वारा किया गया अतिरिक्त प्रयास (अधिक क्रियमाण) हमारी शीघ्र प्रगति होने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

साधना के अगले चरणों में माया (अविद्या) का आवरण झीना व पारदर्शी होता जायेगा, फलतः हमें आत्मिक प्रकाश की अधिकाधिक प्राप्ति होती जायेगी। आज के समय में यदि व्यावहारिकता एवं आध्यात्मिकता में सामंजस्य बैठाना हो तो आवश्यकता है कि साधना द्वारा किसी प्रकार से वृत्ति का नाश करके (विचारों या विचार-केन्द्रों का नहीं) उसका स्थान आत्मा (धर्म) ले ले। तब मन के प्रत्येक विचार के अनुरूप कृत्य के संपादन से पूर्व आत्मा से अनुमति लेना आवश्यक होगा और आत्मा तो सदैव धर्मानुकूल कृत्य हेतु ही अनुमति देगी। इति।

Friday, April 17, 2009

(१४) अभिजात वर्ग

हम लोग अपने यहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार, अनैतिकता आदि के विषय में काफी चर्चा करते हैं। बार-बार मनन करने पर एक ही निष्कर्ष सामने आता है कि इसकी जड़ हमारी असंतुलित मानसिकता व आध्यात्मिकता में ही है। हम भौतिकता के पीछे इतना व्यग्र व आसक्त हो गए हैं कि हमने नैसर्गिक आध्यात्मिकता, श्रेष्ठ मान्यताओं व नैतिक मूल्यों को विस्मृत कर दिया है। यदि हमें विकसित देशों का पिछलग्गू बनना ही है, तो हमें उन देशों के बहुमुखी भौतिक विकास, खुशहाली आदि पर बिलकुल तटस्थ व गंभीर दृष्टि डालनी चाहिए। हम पायेंगे कि उनकी सफलता व उस सफलता के स्थायित्व का राज उनके कर्तव्यबोध में, कर्तव्यपरायणता में, कठिन शारीरिक श्रम में, स्वस्थ मानसिकता में व उत्कृष्ट आध्यात्मिकता में छुपा है। शरीर तो सभी का एक जैसा ही होता है पर विकास एवं खुशहाली के पीछे असली चीजें यही होती हैं जो ऊपर बताई गयी हैं। यह बात उन्होंने देशाटन के दौरान शायद हमारे ही देश के तत्त्ववेत्ताओं व पूर्वजों से सीखी, भली भांति अपनाई, अपने आचार में शामिल की व बहुमुखी विकास एवं खुशहाली को प्राप्त किया। पर हम भारतवासियों को बाद में उनकी भौतिक तरक्की व विकास ही दिखाई दिया, उसके पीछे का मूल कारण नहीं। और फिर हम भी शीघ्र भौतिक विकास की राह पर चल दिए विभिन्न 'शॉर्टकटों' के माध्यम से। इस प्रक्रिया में हम मानसिक रूप से दिवालिया व आध्यात्मिक रूप से खोखले होते जा रहे हैं। उपरोक्त लेखन या समीक्षा को आप नकारात्मक सोच बिलकुल भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि यदि हमें वास्तव में सुधरना है तो हमें केवल 'अपनी' कमियों पर ध्यान देना होगा और 'अन्यों' की सिर्फ अच्छाइयों पर ही। 'अपनी' कमी अर्थात् मेरे सहित मेरे आस-पास के समाज / संघ की कमी।

ध्यान दें कि अधिसंख्य समाज (लगभग ९८%) मात्र अनुगामी होता है, वह अभिजात वर्ग (लगभग २%) का मात्र अनुसरण करता है। तो फिर तार्किक दृष्टि से तो यह अभिजात वर्ग ही वर्तमान स्थिति के लिए मुख्यतः जिम्मेदार है। २% अभिजात वर्ग के लोग अर्थात् समाज के महत्त्वपूर्ण लोग, जैसे -- नेता, अभिनेता, पत्रकार, वकील, न्यायाधीश, उद्योगपति, व्यापारी, अधिकारी, पुलिस, प्रशासक, शासक, चिकित्सक, अध्यापक, गुरु आदि। लगभग ९८% लोगों के लिए इनमें से एक या अधिक आदर्श स्वरूप होते हैं। वे उन्हीं का अनुसरण करते हैं।

तर्क करने वाले अब यह कहेंगे कि यदि ऐसा ही है तो फिर विश्व में विभिन्न क्रांतियाँ कैसे संभव हुयीं?? ये क्रांतियाँ तो आम लोगों द्वारा ही संचालित हुयीं। यदि अभिजात वर्ग के अनुसरण वाला सिद्धांत ठीक है तो ऐसा हो पाना तो लगभग असंभव ही था! फिर भी ऐसा क्यों हुआ??

देखा जाये तो तर्क के इस प्रश्न में ही इसका उत्तर छुपा हुआ है -- पहली बात तो क्रांति रोज-रोज नहीं होती। दूसरी बात यह कि क्रांति का मुख्य कारण आम नागरिकों में उपजा भारी असंतोष होता है। समाज का माहौल पहले बड़े-बड़े लोगों के गलत व्यवहार के कारण ख़राब होता है; कोई संदेह नहीं कि इसके लिए आम नागरिक भी जिम्मेदार होते हैं क्योंकि वे भी बड़े लोगों का अनुसरण कर रहे होते हैं। सभी के स्वेच्छाचार से माहौल धीरे-धीरे ख़राब होते-होते उस अवस्था तक जा पहुँचता है कि आम आदमी को अब उस माहौल में बेचैनी व घुटन महसूस होने लगती है। कह सकते हैं कि अति की स्थिति आ जाती है। इस स्थिति में ही आम आदमी जागता है। और आम आदमी के जागने पर ही क्रांति संभव होती है। हाँ, उनको जगाने के लिए कुछ समाज सुधारक क्रांतिकारी नेताओं का प्रयास अवश्य कार्य करता है, परन्तु फिर भी क्रांति का मुख्य कारण बुरी स्थितियों का 'संतृप्त अवस्था' तक पहुंचना ही होता है।

प्रारंभ में जब अभिजात वर्ग भ्रष्टाचार में लिप्त होता है तो उनको ऐसा करता देख अनुगामी वर्ग उन्हीं के कृत्यों को उचित जान वैसा ही अनुसरण करता है। पर स्थिति ख़राब होते-होते एक दिन ऐसा आता है कि जब उनको यह अहसास होता है कि उनका यह वर्तमान आचरण (अनुसरण) ही तो इस दम-घोंटू वातावरण के लिए जिम्मेदार है। और तब सारी भड़ास उच्च पदों पर आसीत् लोगों के विरुद्ध ही निकलती है, क्योंकि निश्चित रूप से वे सब ही समाज की इस अधोगति के लिए मूलतः जिम्मेदार होते हैं।

तो यह सब जानने के बाद भी क्या हम अतीत से सबक नहीं ले सकते? जैसे हर काल में समाज में उतार-चढाव आते रहे, क्रांतियाँ होती रहीं, वैसा ही क्या इस काल में भी होता रहेगा? क्या ज्वार-भाटे ही हम भारतीयों की नियति बन चुके हैं? क्या हमारा जीवन एक शांत नदी की भांति नहीं चल सकता? .... यह सब ठीक हो सकता है, यदि हमारे अनुकरणीय, हमारे अगुआ अर्थात् अभिजात वर्ग अपने-आप को परिवर्तित करे, संतुलित करे।

इधर मेरा पंजाब व हिमाचल जाने का कुछ कार्यक्रम बन रहा था, सो पर्यटन सम्बन्धी कुछ किताबें उलट-पुलट रहा था। इन्हीं में जानकारी मिली कि - "कालका-शिमला रेल पथ लगभग १०० वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह दुर्गम पहाड़ियों पर स्थित है। राह में लगभग १०२ सुरंगों में से व ८६९ पुलों पर से रेलगाड़ी गुजरती है। सबसे लम्बी सुरंग ३,७५२ फुट लम्बी है। इस मार्ग में पड़ने वाले पुलों व सुरंगों को देख कर तत्कालीन इंजीनियरों और कारीगरों के श्रम व कुशलता की दाद दी जा सकती है। ८६९ पुलों में से केवल एक पुल लोहे से निर्मित है, जबकि शेष पुल पत्थर से बने हैं, इनमें से एक पुल तो चार-मंजिला है।" ... कुछ इसी प्रकार की प्रशंसा हम प्राचीन इमारतों के विषय में भी सुनते हैं। ... पर समानान्तर रूप से पिछले दिनों समाचारपत्र में यह भी पढ़ने को मिला कि 'लखनऊ मेडिकल कॉलेज के एक नव-निर्मित भवन की तीसरी मंजिल से पत्थर की दीवार-टाइलें निकल कर डॉक्टरों के ऊपर गिरीं, वे बाल-बाल बचे!' ... वैसे सुनते हैं कि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में बड़ी तरक्की हो गयी है!

सत्य ही है कि तकनीकी क्षेत्र में अब अनेक क्रांतिकारी खोजें हो चुकीं हैं व उपकरण आदि बन चुके हैं, परन्तु साथ ही यह भी सत्य है कि जब तक हमारी ईमानदारी व कर्मठता इन अत्याधुनिक खोजों के साथ नहीं जुड़ती, तब तक इन सब आविष्कारों का कोई लाभ नहीं। जिन देशों ने ईमानदारी व कर्मठता अपना ली, वे आज मजबूती के साथ (बिना खोखलेपन के) शीर्ष पर हैं। हम भारतीय इतनी अधिक प्रतिभा रखते हैं, पूरा विश्व कायल है हमारा, तदपि ईमानदारी व कर्मठता के अभाव के कारण हमारे यहाँ के उत्पादों में वह गुणवत्ता, मजबूती, सफाई और सबसे बढ़कर निरंतरता नजर नहीं आती। प्रतिभा भरपूर है, लेकिन भ्रष्टाचार भी सर चढ़कर बोल रहा है। कोई अतिरिक्त स्वार्थ सिद्ध हो रहा हो, केवल तब ही विश्वस्तरीय गुणवत्ता दिखाई देती है, पर साधारणतः एक आम भारतीय कामचलाऊ कार्य करता ही नजर आता है, क्योंकि उसके अधिकांश आदर्श भी आज यही कर रहे हैं। यह एक कटु सत्य है। उद्योगपति हो या व्यापारी, इंजीनियर हो या डॉक्टर, नेता हो या प्रशासकीय अधिकारी, पुलिस हो या वकील; अधिकतर सभी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं या फिर कम से कम अवसरवादी तो हैं ही। आज भारत के अधिसंख्य भाग में यह काम या होड़ जोरों पर है कि कौन किसको अधिक से अधिक 'चूना' लगा सकता है, अर्थात् बेवकूफ बना कर ठग सकता है। व्यापारी, उद्योगपति, अधिकारी, इंजीनियर, नेता, वकील, डॉक्टर, दवा कम्पनियाँ, रोग-जाँच केंद्र (diagnostic centre), निजी वित्त (ऋण प्रदाता) कम्पनियाँ, निजी बीमा कम्पनियाँ, निजी दूर-संचार कम्पनियाँ, निजी शिक्षण संस्थान, अधिकांश धार्मिक संस्थाएं व अन्य बहुत से निजी संस्थान आदि आज जो भी सेवाएं दे रहे हैं, उनमें लोक-हित की भावना बहुत कम व निज-स्वार्थसिद्धि की भावना अधिक है। सभी इसी फिराक (खोज) में हैं कि कैसे दो पैसे और बन जायें - येन केन प्रकारेण। नैतिकता जाये भाड़ में! भौतिक जीवन की नश्वरता को भी भुला दिया है जैसे ...!

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी क्यों पीछे रहेंगी? जिस मूल देश से वे सम्बन्ध रखती हैं वहां तो उनका कार्य साफ-सुथरा है, पर भारत में चूँकि भ्रष्टाचार खूब है, अतः यहाँ वे भी चाँदी काट रहीं हैं। बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं। समाचार माध्यम -- प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जिनके ऊपर कभी बड़ा सामाजिक दायित्व माना जाता था, आज ये दोनों माध्यम पैसे व यश की होड़ में बिक चुके हैं। कर्तव्यबोध को तो एक तरफ जाने दीजिये, आज टी.आर.पी. की प्रतिस्पर्धा में समाचार माध्यम जो खेल खेल रहे हैं, उनसे कौन परिचित नहीं है! साधारण ख़बरों को नमक-मिर्च लगा कर असाधारण रूप देना, भ्रमित करने वाले कार्यक्रम गढ़ना, उत्तेजक व आक्रामक भाषा शैली का प्रयोग करना, यह सब आम बातें हैं भारतीय समाचार चैनलों पर। समाचारों को चटपटी चाट बना कर रख दिया है; गंभीरता, नम्रता, सौम्यता, सब नदारद हैं। हर चीज को बेचने में लगे हैं। कमोवेश प्रिंट मीडिया भी इसी राह पर चल रहा है, पर यहाँ लोक-लाज अभी थोड़ी-बहुत बाकी है।

एक और क्षेत्र, जो पत्रकारिता से पवित्र माना जाता था, वह था - धर्म का क्षेत्र। इस क्षेत्र में पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ही ले लें तो पायेंगे कि २४ घंटे चलने वाले हमारे ५-६ भक्ति चैनल दुनिया में निराले ही हैं। इनमें जो धार्मिक कार्यक्रम आते हैं, वे अधिकतर विज्ञापन ही प्रतीत होते हैं; और जो बीच-बीच में छोटे-बड़े विज्ञापन आते हैं, उनकी तो बात ही अनोखी है। इनको तटस्थ दृष्टि से देखिये तो पायेंगे कि ये सब भौंडी होड़ करते हुए, लोगों को भ्रम में डालते हुए, बस पैसा बटोरने में लगे हैं। इन धार्मिक चैनलों ने तो लोगों की रुचि बदल कर रख दी है, जनमानस को सस्तेपन की ओर ढकेल दिया है।

उधर मोबाइल कम्पनियों की भी होड़, आक्रामक विज्ञापन, अन्य निरुपयोगी सुविधाओं की आदत डलवाना, छुपे खर्च, कामचलाऊ गुणवत्ता, आदि किसी से छुपे नहीं हैं। इनके इन्हीं सब प्रयासों के चलते आज भारत की शहरी युवा पीढी के पास बिना किसी विशेष आवश्यकता के दो-तीन मोबाइल फोन या दो-तीन 'सिम कार्ड' होना अवश्यम्भावी है। घर में, बाहर, बस में, ट्रेन में, मोटरसाइकिल पर, कार में, ये इससे चिपके ही रहते हैं। कई युवा तो इन्हें अपने अभिभावकों से छुपा कर भी रखते हैं। ... गर्व कीजिए कि हमारा देश विकसित हो गया है! टेलीविजन पर आने वाले विभिन्न प्रतियोगी कार्यक्रमों में आजकल बहुत आम हो चले S.M.S. के खेल में इन दूर-संचार कम्पनियों की सहभागिता से भी बुद्धिजीवी वर्ग परिचित ही होगा!

बेवकूफ बना कर पैसा बटोरने का खेल चल ही रहा है, तो चिकित्सक वर्ग भी क्यों पीछे रहेगा? जो जागरूक लोग हैं, वे अवश्य यह जानते होंगे कि डॉक्टरों, दवा कम्पनियों व निजी रोग-जाँच केन्द्रों के बीच क्या सांठ-गांठ चलती है! धन अर्जित करने के लिए ये एक-दूसरे पर आश्रित हैं इसमें कोई संदेह नहीं, पर यहाँ तो इससे आगे भी बहुत कुछ होता है, और कारण है - अत्यधिक धन-लिप्सा।

राज नेताओं व पुलिस विभाग की बात करना यहाँ उचित नहीं होगा, कई पृष्ठ भर जायेंगे, फिर भी संभवतः बात पूरी न हो। मध्य, पूर्वी और उत्तर भारत में तो स्थिति बहुत विकट है तथा इससे सब परिचित हैं। ... आगे बढ़ते हैं।

वर्तमान में शासन-प्रशासन भी स्वायत्तता के नाम पर इन सब भ्रष्टाचारियों पर रोक लगा पाने में लगभग निष्फल ही है। ... पर एक कार्य प्रशासन अवश्य कर रहा है कि वह आम जनता को सचेत कर रहा है -- "भ्रष्टाचारियों से बच कर रहो, भ्रमित मत होओ, जागो और सतर्क रहो; 'ऐड्स' भी खूब फ़ैल रहा है, इसलिए बचाव हेतु वाह्य सुरक्षा उपाय अपनाओ, आदि-आदि।" अर्थात् साफ़ दिखाई पड़ रहा है कि भ्रष्टाचार और अनैतिकता की रोकथाम हेतु सरकार कुछ भी अधिक करने में अक्षम है, पर जनता को परामर्श दे रही है कि उनके विषैले परिणामों से खुद को बचा लो। ... यह तो वही बात हो गयी कि - "शहर में मच्छर बहुत हैं पर हम तो अहिंसावादी हैं, अतः मच्छरों को नष्ट नहीं कर सकते; हम समाजवादी व समवादी भी हैं, अतः उनको भगा व समझा भी नहीं सकते, वे कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं, अतः प्रिय नागरिकों, बेहतर हो कि आप ही सदैव मच्छरदानी में रहें। हाँ, जनता में से कोई यह भी कह रहा था कि रासायनिक प्रदूषण बहुत बढ़ गया है; तो हम क्या करें, सरकार इसमें कुछ नहीं कर सकती, बेहतर हो कि आप ऑक्सीजन-मास्क लगा कर चलें। स्वतंत्र देश में सब स्वतंत्र हैं।"

हमारे देश के कर्णधार, आदर्श व अभिजात वर्ग के लोग आखिर क्यों ऐसा कर रहे हैं? हम जैसे लोगों के पास मुख है, जीभ है, कलम है, पर कुछ करने का अधिकार नहीं है। संभवतः अपने पूर्वकर्मों के कारण हम अति-सीमित हैं, हम अभिजात वर्ग के भी नहीं हैं कि आम-जन हमारी सुने या हमारे कृत्यों पर ध्यान दे। तो फिर एक और क्रांति की प्रतीक्षा करना या किसी नए ईश्वरीय अवतार की बाट जोहना ही हमारी वर्तमान नियति है या फिर हमारे आदर्श, हमारे अगुआ, हमारे रोल-मॉडल, हमारे देश के बड़े व महत्त्वपूर्ण लोग, अर्थात् हमारा अभिजात वर्ग क्या स्वयं से कोई प्रथमोद्योग (पहल) करेगा? इन बड़े लोगों जैसे - नेता, अभिनेता, धर्मगुरु, खिलाड़ियों आदि व अभिजात वर्ग से सम्बंधित अन्य लोगों का यह अच्छा भाग्य है कि वे आज इन उच्च पदों पर आसीत् हैं, उनके पास सामर्थ्य है, शक्ति है, अधिकार हैं; लोग उनकी बात सुनते हैं, उनके अनुयायी हैं। वे चाहें तो मात्र स्वयं को बदल कर समाज को बदल सकते हैं। सस्ती लोकप्रियता व ढेर सारे धन का मोह त्याग कर वे मात्र संतुलित व आडम्बर-रहित जीवन जियें, उपदेश आदि न भी दें, तो केवल उनकी यह संतुलित और ठोस जीवन-शैली ही समष्टि (सर्व समाज) के लिए प्रेरणादायी होगी और एक बेहतर समाज का निर्माण होने में मदद मिलेगी। इति।

Wednesday, April 15, 2009

(१३) अध्यात्मप्रसार व प्रसारक का दृष्टिकोण

अध्यात्मप्रसार की व्यापकता इसमें निहित होगी कि सभी साधक प्रसार में भाग लें। अर्थात् प्रत्येक सीखने वाला साधक अन्य लोगों को (नए साधकों को) जितना शीघ्र हो सके, सिखाना आरंभ कर दे। अर्थात् प्रत्येक साधक तात्त्विक एवं प्रायोगिक शास्त्र के अध्यापन में शीघ्र हिस्सा ले, यह विचार मन में रख कर कि उन्नति हेतु प्रत्येक व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान की त्वरित आवश्यकता है। मेरे ऐसा कहने का तात्पर्य यह कतई नहीं है कि प्रत्येक साधक कोरा पाण्डित्य झाड़े और अहं का शिकार हो जाये। यहाँ सिखाने / पढ़ाने का उद्देश्य यह भी है कि सिखाने / पढ़ाने वाला साधक इससे स्वयं की भी शीघ्र प्रगति करेगा। वह कैसे? एक उदाहरण से स्पष्ट होगा --

एक प्रौढ़ व्यक्ति है, बीवी-बच्चे वाला है, नौकरी आदि करता है। अपने बचपन व जवानी में वह एक साधारण विद्यार्थी रहा था। किसी भी विषय की बहुत गहराई से पढ़ाई नहीं की थी। और अब तो अनेक वर्ष बीत चुके हैं पढ़े हुए, सो अब तो सब धूमिल हो चुका है। कमोवेश उसका यही हाल नैतिक मूल्यों व धार्मिकता के विषय में भी है। अर्थात् कुल मिला कर वह एक औसत व्यावहारिक व औसत आध्यात्मिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति है। उसका एक बच्चा है जो अभी छोटा सा ही ५-६ वर्ष का है। वह व्यक्ति चाहता है कि उसका बच्चा पढ़ाई में अच्छा रहे व नैतिक गुणों का भी धनी हो। यानी किताबी पढ़ाई, व्यवहार, व नैतिकता, तीनों में वह बच्चे को निपुण करना चाहता है। तो वह अपने बच्चे को कक्षा दर कक्षा स्वयं अध्ययन करके रोजाना पढ़ाता है। सत्संग आदि में जाकर या किन्हीं अन्य स्रोतों से वह आध्यात्मिक ज्ञान भी जुटाता है और अपने बच्चे को सिखाता है। यानी जितनी मेहनत उस व्यक्ति ने स्वयं अपने लिए नहीं की थी, उससे अधिक वह अपने बच्चे के लिए करता है, क्योंकि उसकी हार्दिक इच्छा है कि उसका बच्चा परिपूर्ण बने।

.... तो हम देखते हैं कि अपने बच्चे को अच्छा व परिपूर्ण बनाने की धुन में वह व्यक्ति स्वयं भी परिपूर्णता को प्राप्त करता जा रहा है। वह स्वयं भी नित कुछ सीख रहा है और इस तरह से सीखा हुआ टिकाऊ व आत्मसंतोष देने वाला होता है। इस उदाहरण से स्पष्ट हो गया होगा कि साधकों से किस प्रकार की अपील की जा रही है। उपरोक्त उदाहरण के अनुसार अध्यापन करने से किसी प्रकार के पाण्डित्य का अहंभाव जन्म नहीं लेता क्योंकि नितांत स्वयं का कोई स्वार्थ नहीं होता। मात्र एक लक्ष्य होता है कि दूसरे की ठीक-ठीक व शीघ्र प्रगति कैसे संभव हो सके। इस प्रकार के अध्यापन से साधक (अध्यापक) की स्वयं की भी निरंतर और टिकाऊ प्रगति होती रहती है। अर्थात् इस प्रकार का दृष्टिकोण रखने पर दोहरा व दोगुना लाभ मिलता है तथा सबसे बढ़कर यह होता है कि अनोखे आत्मसंतोष व आनंद की अनुभूति होती है, हल्कापन महसूस होता है। इति।

Tuesday, April 14, 2009

(१२) कर्म - शक्ति - धर्म - सुख

ईश्वर द्वारा निर्मित प्रत्येक वस्तु, यहाँ तक कि स्वयं ईश्वर की या प्रकृति की समस्त शक्तियां भी प्रत्येक जीव के लिए सहजता से उपलब्ध हैं। इनको प्राप्त करने हेतु मात्र पुरुषार्थ (परिश्रम / योग्य कर्म) की आवश्यकता होती है। सुपात्र या कुपात्र जैसी कोई शर्त नहीं होती। जैसे पेड़ की छाँव, सूर्य का प्रकाश, वर्षा का जल और अग्नि की ऊष्मा सज्जन एवं दुर्जन को समान रूप से प्राप्त होते हैं। तभी तो असुरों (दुर्जनों) को भी तपस्या आदि से ईश्वरीय शक्ति (या शस्त्र आदि) मिलने के दृष्टांत हम पौराणिक कथाओं में देखते हैं। ईश्वर भी एक तत्त्व है और इसके अनेक गुणधर्म हैं। सभी गुणधर्मों को एकत्रित रूप से हम 'धर्म' कहते हैं। यदि एक भी गुणधर्म छूट जाये या रह जाये तो 'धर्म' का स्वरूप 'अधर्म' में बदलने में देर नहीं लगती। 'धर्म' का मार्ग शांति की ओर ले जाता है जबकि 'अधर्म' की परिणति अंततः अशांति, दुःख आदि में होती है। उदाहरणार्थ - कर्ण, रावण आदि। ... दूसरे शब्दों में हम ऐसे कह सकते हैं कि शक्ति, सामर्थ्य आदि (सभी प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कार व उन पर आधारित उत्पाद) हम निज क्रियमाण से प्राप्त तो कर सकते हैं, पर यदि हम उनका प्रयोग ईश्वरीय गुणों के विपरीत करते हैं तो अवश्य ही हम दुःख व अशांति को प्राप्त करते हैं। उनका उपयोग ईश्वरीय गुणों के अनुरूप करने से हमें सुख व शांति का अनुभव होता है। ईश्वरीय गुणों के अनुरूप से तात्पर्य है -- सहज रूप से, प्रकृति के अनुरूप, लोक-हितार्थ, योग्य एवं न्यायपूर्ण। इति।

Monday, April 13, 2009

(११) परिश्रम (साधना)

हम सत्संग जाते हैं, महापुरुषों-संतों आदि के प्रवचन सुनते हैं व उनके पौराणिक ग्रंथों को पढ़ते हैं, .. पर वह नहीं करते, जो उन लोगों ने किया। अर्थात् परिश्रम व साधना नहीं करते। तभी तो हम उनकी बातों का महत्त्व जान कर भी नहीं जान पाते, उनकी बातों को अपनी दिनचर्या, आचरण आदि में शामिल नहीं कर पाते। उन महापुरुषों जैसा बनने के लिए हमें परिश्रम व साधना की आवश्यकता है। वास्तव में स्वयं साधना करके ही हम सत्य को खोज सकते हैं। बिना गहराई से जानने की उत्कंठा के, बिना तड़प व उद्विग्नता के केवल ऊपरी तौर पर ही किसी बात को ज्यों का त्यों मान लेना अनुभूति-रहित साधना ही है और वह निर्जीव है। ऐसी साधना अन्धविश्वास को जन्म देती है, बढ़ावा देती है। वास्तविक धर्म, ज्ञान, विद्या आदि की खोज दूसरे के पैरों से नहीं हो सकती। हाँ, संतों, महापुरुषों व गुरुओं द्वारा संचित व संकलित ज्ञान तथा उनके दिशा-निर्देशों से हमारी राह कुछ आसान अवश्य हो सकती है, पर चलना हमें अपने पैरों पर ही होगा। जैसे - तैराकी सीखने के लिए हम इससे सम्बंधित कुछ किताबें पढ़ सकते हैं - ये हमें तैराकी नहीं सिखातीं, पर इस विधा पर थोड़ा-बहुत शाब्दिक मार्गदर्शन देती हैं। इसके अलावा हम तैराकी के किसी प्रशिक्षक की मदद ले सकते हैं - वह हमें और अच्छे से मार्गदर्शन दे सकता है। ... पर फिर भी इन सब के बावजूद हमारे स्वयं के प्रयास व परिश्रम ही हमें तैराकी सिखाते हैं व इसमें निपुण करते हैं। व्यायाम-शाला में भी गुरु हमारे लिए दंड-बैठक नहीं लगा सकते। अपने शरीर-सौष्ठव हेतु हमें स्वयं ही व्यायाम करना पड़ता है। गुरु की भूमिका दिशा-निर्देशक की है, महत्त्वपूर्ण है, पर फिर भी सीमित है। ऐसे ही, आध्यात्मिक प्रगति हेतु भी श्रेष्ठ संतों के वचन हमारी सोई जिज्ञासा व उत्कंठा को झिंझोड़ कर जगाने का कार्य करते हैं। वे हमें परम-सत्य को जानने व उसको पाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। मात्र इतना ही कार्य है विभिन्न मार्गदर्शनों का; शेष साधक को स्वयं निज-क्रियमाण से ही करना पड़ता है। ऐसा करने पर ही साधना में स्थायित्व आता है, वह अटूट होती है व साधक अवश्य लक्ष्य को पाता है। इस स्थिति में आने पर वह दूसरों की जिज्ञासा व उत्कंठा जागृत करने का प्रयास आरम्भ कर देता है अर्थात् व्यष्टि उपरांत समष्टि साधना आरम्भ कर देता है। पर परम-सत्य इतना विशाल है कि उसे शब्दों में बांध लेना संभव नहीं। यह अनुभूति का विषय ही है। ठीक-ठीक अनुभूति हो जाये तो यह (परम-सत्य) बहुत छोटा व बहुत सरल है। अतएव सभी पंथिक ग्रन्थ या अन्य मार्गदर्शन भी उस परम-सत्य की मर्यादित व्याख्या ही कर सकते हैं। वर्तमान साधक इन सभी साधनों से अपनी प्रकृति अनुसार मर्यादित मार्गदर्शन ही ग्रहण कर सकता है व शेष अन्वेषण उसे स्वयं करना पड़ता है और उसकी कोई थाह नहीं। इसीलिए अध्यात्मशास्त्रीय साधना का मूलभूत सिद्धांत यही बताया गया है - जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियाँ, व उतने ही साधनामार्ग। एक जगह पढ़ा था - "तुममें से कोई भी यदि सत्य को समझने का प्रयत्न कर रहा हो, तो तुम जब भी उसके सम्पर्क में आओ तो सद्व्यवहार का परिचय दो; सत्य-अन्वेषण में उसकी मदद करो; और स्वयं को उस सत्य-अन्वेषक से उच्च अथवा अधिक प्रतिभासंपन्न न समझो।" साधना के आरंभ में जिज्ञासा व उत्कंठा जागृत होने का कारण उस व्यक्ति का प्रारब्ध या अन्य किसी व्यक्ति (गुरु) की खरी समष्टिगत साधना है, तदुपरांत आगे के चरणों में उस व्यक्ति (साधक) का सपरिश्रम क्रियमाण। यही सपरिश्रम क्रियमाण ही 'साधना' है। इसी से अंततः हमें सत्य की अनुभूति होती है। इति।

Saturday, April 11, 2009

(१०) सार संकलन

-->> हम सभी को एक संतुलन की आवश्यकता होती है - भौतिकता व आध्यात्मिकता के बीच।

-->> 'विश्व स्वास्थ संगठन' ने भी एक 'आदर्श स्वस्थ व्यक्ति' की जो परिभाषा बताई है, उसके अनुसार व्यक्ति को चार प्रकार से स्वस्थ होना चाहिए - शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, व आध्यात्मिक रूप से।

-->> स्वस्थ मानसिकता व आध्यात्मिकता हेतु हमें 'धर्म' की शरण में जाना आवश्यक होता है। 'धर्म' अर्थात् 'आत्मानुभूति' - आत्मा को अनुभूत करना - आत्मा के गुणधर्मों को अनुभूत करना। ईश्वर व आत्मा के गुणधर्म में कोई अंतर नहीं, मूलतः वे सच्चिदानंद ही हैं, अर्थात् पूर्णतयः शुद्ध, स्वस्थ, चैतन्यमय, चिरस्थायी व आनंदमय। ये गुणधर्म (properties) हैं, गुण-दोष (nature) नहीं। जैसे शक्कर का मूल गुणधर्म 'मिठास' होता है। परमात्मा या आत्मा के गुणधर्म तो हैं, पर ये (परमात्मा व आत्मा) गुण-दोष रहित हैं। आत्मा की अनुभूति अर्थात् इसके गुणधर्मों की अनुभूति अर्थात् धर्म (righteousness) की अनुभूति। शक्कर की मिठास भी शाब्दिक व्याख्या से परे है, खासतौर पर उसके लिए, जो उससे अनभिज्ञ हो। 'मिठास' को ठीक-ठीक जानने हेतु शक्कर को जीभ पर रखकर उसके स्वाद (गुणधर्म) को अनुभूत करना ही एकमात्र विकल्प है। ऐसे ही 'धर्म' भी आत्मा के गुणधर्म की अनुभूति ही है।

-->> आज यदि हम अपनेआप को सहज महसूस नहीं करते हैं, तो अवश्य ही संतुलन में कुछ गड़बड़ी है। क्योंकि हम स्वस्थ मानसिकता व आध्यात्मिकता के प्रति जागरूक व आस्थावान नहीं हैं। वास्तव में आज अधिसंख्य का झुकाव भौतिकता की तरफ अधिक है; मूल्यांकन व समीक्षा करने वालों का भी। निश्चित तौर पर हम नैसर्गिक आध्यात्मिकता की या 'धर्म' की अनदेखी करते हैं, या शायद हम 'धर्म' से अनभिज्ञ ही हैं।

-->> प्रत्येक व्यक्ति के कार्यों में धार्मिकता या अधार्मिकता का कम-ज्यादा प्रमाण, उस व्यक्ति की लिंगदेह (आंतरिक देह) में विद्यमान अविद्या व उसके घटकों (मन, बुद्धि, संस्कारों आदि) के प्रमाण (मात्रा) पर निर्भर है, क्योंकि अविद्या के ये घटक ही 'धर्म' की वास्तविक अनुभूति में बाधक हैं।

-->> चूँकि आत्मा का मूल गुणधर्म 'धर्म' है, अतः आत्मा से आने वाला प्रत्येक स्पंदन या निर्देश, 'धर्म' का ही निर्देश है। या वह साक्षात् 'धर्म' ही है। पर अविद्या के आवरण के कारण वे निर्देश हमारी ज्ञानेन्द्रियों या कर्मेन्द्रियों तक नहीं या कम पहुँचते हैं। इस स्थिति में हमारे अधिकतर कार्य अविद्या के घटकों (मन, संस्कार, बुद्धि, अहं आदि) द्वारा ही संपन्न होते हैं, तभी तो वे दोषपूर्ण (अधार्मिक) हो सकते हैं अथवा होते हैं, क्योंकि अविद्या के घटकों व वृत्ति का झुकाव सदैव सत्य की ओर हो यह आवश्यक नहीं। सारांश में 'आत्मा' अर्थात् जलता हुआ बल्ब (प्रकाश-स्रोत), तथा 'अविद्या' अर्थात् बल्ब पर ढका मोटा काला कपड़ा।

-->> अब जो भी विधि या साधन इस 'अविद्या' का नाश कर पाए, उस विधि या साधन का क्रियान्वयन ही 'साधना' कहलायेगा।

-->> चूँकि यह विषय 'आत्मा' से सम्बन्ध रखता है, अतः इसे 'अध्यात्म' (अधि+आत्मन) कहते हैं। विभिन्न सिद्धांतों व कृत्यों के समावेश उपरांत यह 'अध्यात्मशास्त्र' कहलाता है।

-->> अतः 'अध्यात्मशास्त्र' वह शास्त्र हुआ, जो व्यक्ति को उसके वास्तविक रूप से तथा वास्तविक (मूल) गुणधर्म से परिचित करवा सके।

-->> मूल रूप व मूल गुणधर्म (धर्म) से परिचित होने में बाधा हैं -- अविद्या के विभिन्न घटक। इनकी जानकारी अध्यात्मशास्त्र द्वारा पहले शब्दों, तदुपरांत अनुभूतियों द्वारा होती है व यथोचित साधना करने पर अविद्या के घटकों का नाश प्रारंभ होता है।

-->> विभिन्न आध्यात्मिक साधनायें हमें धर्म नहीं सिखातीं, वरन वे हमारे अज्ञान (अविद्या) के आवरण को नष्ट करतीं हैं मात्र। आवरण नष्ट होने या क्षतिग्रस्त होने पर हमें वास्तविक धर्म का पता स्वतः ही चलता है। जैसे - जलते हुए बल्ब के ऊपर ढका मोटा कपड़ा क्षतिग्रस्त होने या हटने के पश्चात् प्रकाश स्वतः ही प्राप्त होता है -- क्षतिग्रस्त होने पर थोड़ा-बहुत व हटने पर भरपूर।

-->> चूँकि 'धर्म' परमात्मा का गुणधर्म है और परमात्मा सर्वव्यापी है, अतः धर्म की उपलब्धता सर्वत्र व सर्वकाल है। यह हमें सहज ही व नैसर्गिक तथा सूक्ष्म रूप से सदैव प्राप्य है। जब भी आवश्यकता पड़ने पर हम इसे परमात्मा से प्राप्त करते हैं या दूसरे शब्दों में - सीखते हैं, तो उस समय हम परमात्मा को या उसके मार्गदर्शन स्पंदनों को 'गुरुतत्त्व' की संज्ञा देते हैं। अतः कह सकते हैं कि 'गुरु' एक ईश्वरीय तत्त्व है, जो प्राकृतिक रूप से सदैव कार्यरत है। देह के माध्यम से जो कार्य करता है, वह उसी तत्त्व का सगुण रूप है।

-->> आध्यात्मिक साधना हेतु परम आवश्यक है - साधना के प्रति श्रद्धा की, ईश्वर के प्रति श्रद्धा की, व सबसे बढ़कर तीव्र उत्कंठा या तड़प की। जितनी तीव्र उत्कंठा, उतनी ही तेज गति से आध्यात्मिक प्रगति।

-->> चूँकि आज अविद्या के घटक अधिक सक्रिय हैं अतः व्यक्ति मन के संस्कारों व वृत्ति के अधीन है, फलस्वरूप आरम्भ में या बाद में भी व्यक्तियों के साधना-मार्ग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं / होते हैं। पर यदि व्यक्ति एक बार दृढ़ता से संकल्प ले ले कि स्वयं के मूल को जानना व पाना है, तो आगे का मार्ग सरल हो जाता है, भले ही साधना-मार्ग भिन्न-भिन्न क्यों न हों। एक बार उत्कंठा जाग गयी तो समझिये लक्ष्य का पता चल गया, तदुपरांत साधना-पद्धति व साधन गौण हो जाते हैं। तीव्र उत्कंठा के साथ जब व्यक्ति साध्य की ओर गंभीरता से अग्रसर होगा, तो कहीं न कहीं से प्रेरक मार्गदर्शन अवश्य मिलेगा - सगुण या निर्गुण रूप में।

-->> एक बार जब विषय ठीक से समझ में आ जाये, साध्य के प्रति तड़प जाग जाये, तो व्यक्ति का कर्तव्य हो जाता है कि वह अन्यों को भी इस विषय के बारे में बताये, व आगे जाने हेतु प्रेरित करे। वह इसलिए क्योंकि भौतिक रूप से व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है व उसे समूह में या एकत्रित (संघ में) रहना आवश्यक होता है। व्यक्ति व संघ में एकता न हो तो उस व्यक्ति का अस्तित्व खतरे में होता है। अतः जब अधिसंख्य समाज धार्मिकता को जानेगा, धर्माचरण करेगा, तभी धार्मिक व्यक्ति उस संघ के साथ भली-भांति रह पायेगा। संघ में रहना ही माया है और यह ईश्वर द्वारा ही निर्मित है।

-->> परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना व जीवित रहना तो एक आम बात है; पर महत्त्वपूर्ण है - परिस्थितियों को अनुकूल बनाना, जीवित रहने योग्य बनाना। अनैतिकता व भ्रष्टाचार (अधार्मिकता) से समझौता कर जीवित रहने का प्रयास भले ही व्यावहारिक प्रतीत हो, पर है तो वास्तव में कायरतापूर्ण ही। सच्चा धार्मिक ही व्यष्टि (स्वयं की) व समष्टि (समाज की) साधना, विशेष रूप से समष्टि साधना के माध्यम से माहौल को धर्मानुकूल बनाने का साहस कर सकता है। वर्तमान में प्रचलित व्यावहारिकता यदि किसी गलत कृत्य (अराजकता, भ्रष्टाचार आदि यानी अधार्मिकता) का विरोध नहीं करती, तो वह (तथाकथित व्यावहारिकता) नपुंसकता ही है।

-->> आज दो ही उपाय हैं - पहला यह कि समाज को धर्म व अध्यात्मशास्त्र के विषय में बताना तथा गंभीर व परिणामकारक साधना के लिए प्रेरित करना, जिससे माहौल सत्य के अनुकूल बन सके; और दूसरा यह कि समुचित मार्गदर्शन एवं सुधरने के मौके मिलने के उपरांत भी न सुधरने वाले दुष्टों को दण्डित करना।

उपसंहार -- महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि लेखन किसका है, शब्द किसके हैं, विचार किसके हैं; बल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि उस लेखन, शब्दों या विचारों को कितना मथा जाता है, चिंतन किया जाता है। मंथन से ही सार निकलता है। सार से विषय समझ में आता है। विषय समझ में आने से व्यक्ति में उत्कंठा व तड़प जागती है, साध्य पता चलता है। फिर वह व्यक्ति लग जाता है व्यष्टि व समष्टि साधना में - अविद्या के ही घटकों की सहायता से! अविद्या जब पूरी तरह से हट जाती है तो उस व्यक्ति का अलग से कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। इस अवस्था को विरले ही प्राप्त करते हैं, पर सब प्राप्त कर सकने में सक्षम हैं। साधकों के लिए समष्टि साधना का महत्त्व, व्यष्टि साधना से जरा सा भी कम नहीं होना चाहिए, क्योंकि धर्मी (साधकों) का अस्तित्व धर्मीजनों के बीच ही संभव है। ... कभी-कभी तो समष्टि का विचार, व्यष्टि से भी अधिक श्रेयस्कर लगता है। इस माया में हमें सांघिक ढांचे में रहना ही है, तो क्यों न सभी की आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करते-करते सभी के साथ चला जाये प्रगति के पथ पर! इति।